दुनियाभर के देशों की उन गर्भवती महिलाओं के लिए एक अच्छी खबर है जो अपने होने वाले बच्चे को अमेरिकी नागरिक बनाने का सपना देख रही हैं. प्रजनन के अंतिम हफ्तों में प्रशांत महासागर के पश्चिमी छोर पर सैपनटापूसमूह (नौर्दर्न मैरीना आइलैंड्स) पर पर्यटन के नाम पर घूमनेफिरने आएं और अपने नवजात शिशु के साथसाथ उस के अमेरिकी नागरिक होने का सर्टिफिकेट भी लेते जाएं. यह आईलैंड अमेरिकी जमीन है.
यह स्थान इन दिनों चीनी लोगों के लिए बर्थ टूरिज्म का केंद्र बनता जा रहा है. चीनी महानगर शंघाई या गोंजेओ से मात्र 4-5 घंटे की फ्लाइट है और 45 दिन के लिए तो वीजा की भी दरकार नहीं है. यहां बड़े आकर्षक और मनोहारी समुद्रतट हैं, खरीदारी के लिए मौल, कैसिनो और अस्पताल हैं. स्थानीय चामोरो समुदाय के लोगों की अपनी मेलजोल वाली संस्कृति है. वर्ष 2009 में पहली बार अमेरिका की इमिग्रेशन नीति में जब बदलाव हुआ था तब नियमादोष के चलते साल के अंत तक मात्र 9 चीनी पर्यटक गर्भवती महिलाएं आई थीं, जिन की संख्या अब बढ़ कर 472 हो गई है. इस का भंडाफोड़ उस समय हुआ जब एक लास एंजिल्स से गई गायनीकोलौजिस्ट ने अवैध इमिग्रेशन और करों की चोरी में संशय होने की शिकायत पर एफबीआई से शिकायत कर दी थी. एफबीआई कुछ मामलों में जांच कर रही है, पर धंधा बदस्तूर जारी है.
एंकर बेबी के नाम से इस बहुचर्चित कारोबार में पड़ोसी देश कनाडा के बाद चीनी समुदाय ने लास एंजिल्स और इस के आसपास के छोटे नगरों में गहरी जड़ें जमा ली हैं. इस कारोबार में चीनी समुदाय के एक गिरोह ने एक वैबसाइट भी तैयार की है, जिस के जरिए गर्भवती महिलाओं को प्रजनन के अंतिम सप्ताहों में बर्थ टूरिज्म के लिए कैलिफोर्निया लाया जाता है. हालांकि एंकर बेबी के लिए भारत से भी गर्भवती महिलाएं आती हैं पर उन की संख्या बहुत कम है.
पियु रिसर्च सैंटर के अनुसार, अमेरिका में जन्म लेने वाले 12 बच्चों में से 1 बच्चा एंकर बेबी होता है. इन में साल 2013 में कुल 36 हजार बच्चे एंकर बेबी थे, जो वैध रूप से बर्थ टूरिज्म के कारण हुए थे. लेकिन अमेरिका में ऐसे लाखों हिस्पैनिक पेरैंट्स हैं जो पंजीकृत नहीं हैं और उन के प्रतिवर्ष 3 लाख बच्चे पैदा होते हैं. इन का अमेरिकी नागरिक के रूप में पंजीकरण होता है. टैक्सास प्रशासन ने वर्ष 2015 में नवजात शिशुओं को सर्टिफिकेट देने में असमर्थता जताई थी, लेकिन यह फैसला अवैधानिक करार दिया गया. कनैडियन नागरिक अमेरिकी महिलाओं को सरोगेसी मदर के रूप में अपना रहे हैं. इस का खर्च बड़ा है.
इस धंधे में मोटी कमाई करने वाले चीनी बिचौलिए ट्रांसलेटर कहे जाते हैं. ये गर्भवती महिला से बतौर पैकेज 50 हजार से 80 हजार डौलर लेते हैं. इस पैकेज में एक महिला के चीन के किसी नगर से अमेरिका आनेजाने, अस्पताल में शिशु के जन्म आदि पर व्यय और समीप में किसी अपार्टमैंट में ठहरने के लिए आधी धनराशि पेशगी ले ली जाती है. यही ट्रांसलेटर नवजात शिशु के लिए पासपोर्ट की भी व्यवस्था करता है. अमूमन एक सामान्य अस्पताल में नौर्मल डिलीवरी के लिए 7,500 डौलर तथा सिजैरियन के लिए 10, 500 डौलर फीस चुकानी पड़ती है, जबकि दवाओं का व्यय अलग है.
पियू रिसर्च सैंटर की रिपोर्ट पर भरोसा करें, तो वर्ष 2013 में 2 लाख 75 हजार महिलाएं पर्यटक के रूप में अमेरिका आई थीं. इन में हजारों गर्भवती थीं. यूएस इमिग्रेशन ऐंड कस्टम एनफोर्समैंट ने लास एंजिल्स, अरवाईंन, सेंटा क्लारा आदि नगरों में 40 स्थानों पर छापे मारे थे. इन छापों के दौरान इस धंधे में लिप्त कौंट्रैक्टर के रूप में काम करने वाले ट्रांसलेटर अमेरिकी इमिग्रेशन नियमों और टैक्स में अनियमितता तथा वीजा अवधि के बिना अनुमति समयावधि से अधिक ठहरने आदि के आरोपी पाए गए थे. इन में कुछ पर केस भी चल रहे हैं.
यह आश्चर्य की बात है कि जो चीन अमेरिका सा लगने लगा है और लगातार तेजी से अपने नागरिकों की दशा सुधार रहा है, वहां भी लोग अमेरिकी नागरिकता पाने के लिए बेचैन रहते हैं.
ध्यान रहे, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव अभियान के दौरान एंकर बेबी कारोबार में अनियमितता के सवाल पर संविधान के 14वें संशोधन में बदलाव किए जाने का आश्वासन दिया था. यही नहीं, ट्रंप ने चुनाव अभियान में मैक्सिको सीमा पर दीवार खड़ी करने का भी आश्वासन दिया था, लेकिन अभी तक दोनों पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो सकी है.
संविधान के अनुसार, अमेरिकी जमीन पर जन्म लेने वाले बच्चे को अमेरिकी नागरिकता प्रदान की जाती है. इस के लिए जन्म प्रमाणपत्र दिया जाता है. यही बच्चा आगे चल कर 18 साल की उम्र के बाद अपने माता और पिता को वैधानिक तौर पर ग्रीनकार्ड के रूप में अमेरिका का स्थायी निवासी बना कर अमेरिका ले आता है.
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भारत में 2020 तक 20 प्रतिशत भारतीय मानसिक समस्याओं का सामना कर रहे होंगे, ऐसा विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ है. हर वर्ष 2 लाख लोग आत्महत्या करते हैं जोकि विश्व में होने वाली आत्महत्याओं का 25 प्रतिशत है. देश में अकेलापन और आर्थिक व मानसिक असुरक्षा बुजुर्गों के दुख के प्रमुख कारण हैं.
7 अगस्त, 2017 को मुंबई के ओशिवारा में अपनी मां से मिलने पहुंचे ऋतुराज साहनी को बंद फ्लैट से अपनी मां आशा साहनी का कंकाल मात्र ही मिला. अमेरिका में बसे बेटे ने आखिरी बार, अपनी मां से फोन पर बात अप्रैल 2016 में की थी. पुलिस को फ्लैट से सुसाइड नोट मिला, ‘‘मेरी मौत के लिए किसी को दोषी न ठहराया जाए.’’ आखिरी बार की बातचीत में महिला ने अपने पुत्र से कहा था, ‘मैं घर में बहुत अकेलापन महसूस करती हूं और ओल्डएज होम जाना चाहती हूं.’ आशाजी के नाम पर सोसायटी में करीब 5 से 6 करोड़ रुपए के 2 फ्लैट हैं.
संदर्भ यही है कि महिला अपने अकेलेपन से ऊब गई थी और मौत को ही अंतिम विकल्प मान कर इस दुनिया से चली गई. मगर अफसोस इस बात का है कि उस के पासपड़ोस के लोगों ने एक बार भी उस विषय में चर्चा नहीं की. क्या उस के घर अखबार वाला या कामवाली बाई कोई भी नहीं आती थी? क्या अपने पुत्र के सिवा किसी अन्य से बातचीत नहीं होती थी? क्या पूरी मुंबई या भारत में उस से संपर्क रखने वाले, उस के सुखदुख के साथी, पड़ोसी, मित्र या रिश्तेदार नहीं बचे थे? ऐसा कैसे हो सकता है जबकि उस की उम्र मात्र 63 वर्ष थी.
यह घटना सामाजिक जीवन के तानेबाने की जटिलता को सुलझाती दिखाई देती है.
समाज और बुजुर्ग
हम समाज से हैं और समाज हम से है. व्यक्ति परिवार, पड़ोस, विद्यालय, समुदाय, राज्य, धर्म आदि विभिन्न लोगों से जुड़ा रहता है. इन सब के बावजूद हम अकेले कैसे पड़ जाते हैं, यह विचारणीय है.
सही कहावत है, बचपन खेल कर खोया, जवानी नींद भर सोया, बुढ़ापा देख कर रोया. बचपन और जवानी का समय, विभिन्न प्रकार की गतिविधियों, जिम्मेदारियों के बीच कब गुजर जाता है, पता नहीं चलता. लेकिन वृद्धावस्था की समस्याओं की व्यापकता, गंभीरता और जटिलता वर्तमान समय की प्रमुख समस्या के रूप में सामने आ रही है. जैसेजैसे लोगों के रहनसहन के स्तर में उन्नति हुई है, वैसे ही वृद्ध व्यक्तियों की अधिक समय तक जीवित रहने की संभावना भी बढ़ती जा रही है. सो, वृद्ध व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि हो रही है.
समाज की यह परंपरा रही है कि वृद्धों के पुत्र व अन्य संबंधी उन की देखभाल करते हैं. इस के बावजूद, कई परिवारों में वृद्धों को पर्याप्त व आवश्यक देखभाल और सहायता नहीं मिल पाती. इस कारण वे दुखी व शारीरिकमानसिक बीमारियों से त्रस्त रहते हैं. वृद्धों की दुखदाई परिस्थिति के लिए परिवार का परस्पर मतभेद, कमजोर आर्थिक स्थिति, साधनों का अभाव और संतानों का विदेश जा कर बस जाना प्रमुख कारण हैं.
क्या न करें : रेमंड के मालिक विजयपत सिंघानिया का कहना है कि उन का पुत्र उन्हें कौड़ीकौड़ी के लिए तरसा रहा है और वे करोड़ों की जायदाद बेटे के नाम करने के बाद मुंबई की ग्रैंड पराडी सोसायटी में किराए के मकान में रह रहे हैं. जब अरबों की जायदाद पा कर भी किसी संतान में लालच आ सकता है तो मामूली हैसियत वाले परिवारों की बात ही क्या? अपने जीतेजी प्रौपर्टी अपनी संतानों के हवाले बिलकुल नहीं करनी चाहिए.
ऐसा नहीं है कि सिर्फ बुजुर्ग ही अकेलेपन के शिकार हो मानसिक अवसाद से घिर जाते हैं बल्कि युवा भी जब समाज से कटते हैं तो वे भी मानसिक रोगी बन जाते हैं और आत्महत्या कर लेते हैं या अपने को घर में कैद कर रहने लगते हैं. ऐसे कई युवकयुवतियों को घर से पुलिसबल द्वारा जबरन अस्पताल में भरती कराने की खबरें भी समयसमय पर सुर्खियां बनती रहती हैं.
क्या करें : अपनी आर्थिक सुरक्षा बरकरार रखनी चाहिए.
अपने स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए मौसमी फल, सब्जी व स्वास्थ्यवर्धक आहार लेना चाहिए. पड़ोसी, रिश्तेदार व मित्रों के संपर्क में रहना चाहिए. सभी की यथासंभव आर्थिक, मानसिक या शारीरिक स्तर की मदद जरूर करनी चाहिए. जब आप आगे बढ़ कर दूसरों के सुखदुख में काम आएंगे तभी आप दूसरों की नजरों में आ पाएंगे.
अकेलेपन को अपना साथी न बना कर नियमित रूप से अपनी सोसायटी, महल्ले के क्लब या पार्क में जाएं. लोगों के संपर्क में रह कर उन के सुखदुख जानें. इस तरह के संपर्क आप को जीवन के सकारात्मक रुख की ओर ले जाते हैं.
यदि आर्थिक रूप से समर्थ हैं तो ड्राइवर, कामवाली, घरेलू नौकर की समयसमय पर आर्थिक मदद अवश्य करें. यदि धनाभाव है तो कमजोर तबके के बच्चों की पढ़ाई में निशुल्क या कम पैसे से ट्यूशन दे कर अपना समय व्यतीत करें व अकेलापन भी दूर करें.
यदि आप संयुक्त परिवार में हैं तो घर के सभी सदस्यों को साथ ले कर चलें. किसी भी प्रकार का भेदभाव पारिवारिक संबंधों की कड़वाहट का कारण बन सकता है. अगर आप अकेले ही वृद्धावस्था का सफर काट रहे हैं और आप की संतानें दूसरे शहरों या विदेशों में बसी हैं तो आप को अपने बच्चों से संपर्क में रहने से ज्यादा, अपने पड़ोसियों के संपर्क में रहना जरूरी है. आप की किसी भी परेशानी में बच्चों के पहुंचने से पहले पड़ोसी स्थिति संभाल लेंगे. यह तभी संभव है जब आप पड़ोसियों से मधुर संबंध रखेंगे. आप अपनी सोसायटी, महल्ले के बुजुर्ग लोगों का एक अलग ग्रुप बना कर अपना समय बहुत ही अच्छे ढंग से बिता सकते हैं. बारीबारी से चायपानी का प्रोग्राम, साथ घूमने का प्रोग्राम, लूडो, कैरम, शतरंज जैसे खेल साथ में खेलने का प्रस्ताव भी समय को रोचक बनाता है.
सब का संगसाथ
महिमाजी पूरे महल्ले के बच्चों को अपने घर पर बुला कर रमी खेलती मिल जाएंगी. आतेजाते को पुकारेंगी, ‘‘ए लली, थोड़ी देर रमी खेलो न.’’ सब जानते हैं कि वे ताश खेलने की काफी शौकीन हैं. जो भी फुरसत में रहता है, उन के पास जा कर ताश खेल लेता है. किसी दिन उन की आवाज न सुनाई दे तो लोग खुद ही उन का हालचाल पूछने लगते हैं.
सुनयनाजी भजन, सोहर, बन्नाबन्नी सभी लोकगीत बहुत सुरीले स्वर में गाती हैं. हर घर के तीजत्योहार या किसी भी प्रोग्राम में उन की उपस्थिति अनिवार्य है. उन के लिए हर घर से निमंत्रण आता है.
महेशजी ने व्यायाम में महारत हासिल की हुई है. वे पार्क में नियमित रूप से लोगों को योग के टिप्स देते मिल जाते हैं. यदि वे पार्क में न दिखें, तो लोग उन का हालचाल लेने उन के घर पहुंच जाते हैं.
विनयजी को गप मारने की आदत है. अपने दरवाजे पर बैठेबैठे वे हर आनेजाने वाले की कुशलता पूछ लेते हैं. जिस दिन वे न दिखाई दें, उस दिन लोग उन के घर ही चल देते हैं.
प्रकाशजी एक बडे़ से बंगले के मालिक हैं. अपने बच्चों के विदेश प्रवास और पत्नी की मृत्यु के बाद अकेलेपन को दूर करने का उन्होंने एक नायाब तरीका ढूंढ़ा. उन्होंने अपने बंगले के आधे हिस्से में असहाय, निराश्रित वृद्धजन के लिए द्वार खोल दिए, जिस में रहनेखाने की सुविधा के बदले श्रमदान को अधिक महत्त्व दिया. वहां पर दिनभर किसी भी कार्य में दिया योगदान ही आप को वहां की सुविधा का लाभार्थी बनाता है, जैसे साफसफाई, खाना बनाना या बगीचे का रखरखाव. इस प्रकार वे अपनी उम्र के लोगों से जुड़े हुए हैं और वहीं वे उन का सहारा भी बन गए हैं.
सार यह है यदि आप दूसरों से किसी भी रूप से जुड़े रहते हैं तो दूसरे भी आप की उपस्थिति के आदी हो जाते हैं. आप की अनुपस्थिति को वे महसूस करते हैं और आप के पास दौड़े चले आते हैं. इसलिए खुद को पड़ोस से काट कर नहीं, जोड़ कर रखिए. फिर आप अकेले हों या दुकेले, परिवार के साथ या बगैर, जवां या अधेड़ या फिर वृद्ध ही क्यों न हों, आप को अकेलापन नहीं सताएगा. सब का संगसाथ जीने की राह आसान बनाएगा.
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दशकों से दुनिया को इस बात की जानकारी है कि जल पर लगातार जलवायु का, तथाकथित विकास का और जीवनशैली का संकट मंडरा रहा है. इस के बावजूद इस जानकारी व समझदारी का कोई सार्थक या सकारात्मक नतीजा नहीं निकल पा रहा है. दरअसल, हम सब जल बचाने, उस के प्रति संवेदनशील होने का उपदेश दूसरे को तो देते हैं लेकिन खुद को इस सब से परे समझते हैं. इसी होशियारी का यह नतीजा है कि सबकुछ जानने, समझने के बावजूद हर गुजरते दिन के साथ ही धरती का जल संकट गहराता जा रहा है.
घर में नईनई बहू आई थी, गांव में बरसात को छोड़ कर पूरे साल पानी की किल्लत रहती थी. अधेड़ सास बड़ी दूर से ढोढो कर पानी लाती, लेकिन बारबार कहने के बावजूद बहू पानी खर्चने में जरा भी नहीं हिचकचाती. सास ने बहुत समझाया, यहां की रीत बताई, पर बहू हर दूसरे दिन बालों में शैंपू करती, कपड़े साबुन, डिटर्जेंट पाउडर से धोती. पानी की टोकाटोकी को ले कर सास के साथ ताने से ले कर नोकझोंक और लड़ाई तक की नौबत आ गई. बहू ने भी जिद में अपनी आदत नहीं बदली. पानी पर कलह का पानी जब नाक से ऊपर चला गया तो एक दिन बहू ने थोड़े से पानी के साथ जहर खा लिया. बिहार के एक गांव की यह सच्ची घटना मीडिया में थोड़ी सी जगह पा सकी और घंटे दो घंटे की चर्चा, बस.
असल में पानी की बरबादी को ले कर हमारी नई कसबाई व शहरी जीवनशैली जिद्दी और आत्महंता प्रवृत्ति वाली है. ‘जल ही जीवन है,’ ‘जल है तो कल है,’ ‘कल के लिए आज बचाएं जल,’ जैसे न जाने कितने स्लोगन, नारों, जुमलों की बरसात रोज होती है, लेकिन हम हैं तो चिकने घड़े ही. नतीजा, पर उपदेश कुशल बहुतेरे. पानी की परवा करना हमारी आदत नहीं बन पाती.
टीवी पर उभरती वह तसवीर अंदर तक झकझोर देती है, एक आदमी जोहड़ के सडे़, मटमैले हरे पानी को पीने के लिए कटोरा भरता है. दूसरी तसवीर अरबों के खेल मेले आईपीएल के लिए बेतहाशा पानी बहा कर तैयार किए जा रहे क्रिकेट स्टेडियम और इस कृत्य के विरोध की है. ब्रेक में एक विज्ञापन दिखता है, जिस में लोग झमाझम बरसात के दौरान बालटी, बोतल तो क्या, छाते में भी पानी इकट्ठा कर रहे हैं. संदेश साफ है, जल बेशकीमती है. यह दुर्लभ होने वाला है. समय से पहले सचेत हों, इसे बचाएं.
हैरानी यह है कि यह सब देखते हुए भी बहुत से लोग नल को खुला छोड़ कर शेविंग कर रहे होते हैं या नल के बहते पानी के नीचे सब्जी धो रहे होते हैं. अगर वे किसी पानी वाले इलाके में रहते हैं तो यह सब देखते हुए भी उन्हें जल संकट का कोई एहसास नहीं होता. वे या तो अनजान बने रहते हैं जैसे यह सब किसी और ग्रह पर हो रहा है या फिर रस्मअदायगी वाले अफसोस के बाद वे सोच लेते हैं कि यह सबकुछ उन के साथ नहीं होने वाला.
इन में से बहुत से लोगों के सामने ही सरकारी नलों, प्याऊ, छबील, सार्वजनिक हैंडपंपों का विलोपीकरण हुआ है. बोतलबंद पानी बिकने लगा और आज इस का अरबों का व्यापार हो गया. गांव तक में वाटर कंटेनर बिकने लगे हैं. देश में बीते 4 दशकों में पानी की खपत चार गुना ज्यादा हो गई. आज एशिया के जो 27 शहर पानी की किल्लत से सब से ज्यादा ग्रस्त हैं उन में ऊपरी 4 नाम चेन्नई, दिल्ली, कोलकाता और मुंबई हैं.
हम हैं जिम्मेदार
अंधाधुंध पानी खर्चते हुए कभी हम ने सोचा कि पानी का परिदृश्य इस कदर क्यों बदला? कमी हमारी थी या पानी की? पानी के मामले में अमेरिका और चीन के बाद हमारा ही नंबर है. दुनिया का केवल 4 प्रतिशत ताजा जल अपने देश में है और संसार की 16 प्रतिशत से ज्यादा की आबादी यहीं रहती है, फिर भी हम जलधनाढ्य गिने जाते हैं. कारण, यहां के अनगिनत जलस्रोत, प्राचीन जल संस्कृति और पानी की स्वस्थ परंपरा है.
ऋ ग्वेद के अध्वर्यु सूक्त में, अध्वर्यु को राष्ट्र के योजनाकार के रूप में जिन 10 कर्तव्यों का निर्देश दिया गया है उन में दूसरा कर्तव्य वर्षाजल का संरक्षण है. देवताओं को जलदान के लिए रामेश्वरम से गंगोतरी तक की यात्रा, कांवड़ उठाने का कठिन प्रण, जगहजगह जलाभिषेक. पूजापाठ हो या शौच निबटान अथवा किसी भी तीजत्योहार में पानी का समुचित इस्तेमाल. नहानस्नान में समूचे संसार में हमारा कोई सानी नहीं.
पानी के मामले में एक तो हमारी जीवनशैली पहले ही खुलेहाथ वाली थी तिस पर हम ने पाश्चात्य जीवनशैली का अंधानुकरण कर लिया. बीते 2-3 दशकों से हम ने पानी की परवा करनी ही छोड़ दी है. बाजार ने धावा बोला तो हम उस के प्रवाह में बह गए. जल को प्रकृति का उपहार मानने वाले उसे बिकाऊ उत्पाद साबित करने वालों के सामने हार गए.
आज हम जरूरत से कई गुना ज्यादा कपड़े रखते हैं. धोबी जो एक तालाब में बरसों से हजारों कपड़े धो डालता था, हफ्ते में आता था, सप्ताहभर के कपड़े इकट्ठे धुलते थे. अब रोज कपड़े धोते हैं. कम पानी खर्चने वाले रीठेमजीठे का इस्तेमाल अब कहां? साबुन, डिटर्जेंट, वाशिंग पाउडर और मशीन, शैंपू पहले से चौगुना पानी खा जाते हैं. शौच और स्नान में हम पहले से दस गुना पानी बरबाद करने लगे हैं. शावर, फ्लश, बाथटब आम हो गए हैं.
तमाम मशीनों, उत्पादों, गैजेट्स का दखल बढ़ गया. हम पहले से कई गुना ज्यादा डीजलपैट्रोल फूंकने लगे हैं. बर्गर, चिकन, पास्ता और चिप्स जैसे ढेरों फास्टफूड खाने लगे हैं. देश में हर दिन 10 करोड़ से ज्यादा पानी की बोतलें बिकती हैं. कोल्डड्रिंक की 6 करोड़ बोतलें हम गटक जाते हैं बिना यह जाने कि कोल्डड्रिंक की एक केन तैयार करने में 20 लिटर पानी लगता है और ठंडा पेय पीने के बाद शरीर को लगभग 9 गुना अतिरिक्त पानी की आवश्यकता पड़ती है.
बरतन, फर्नीचर, साफसफाई के सरंजाम, कागज का अतिशय इस्तेमाल, ऊर्जा व्यय सबकुछ बढ़ा और इस ने परोक्ष तौर पर पानी की खपत पर असर डाला. विकास जीवन का अंग है पर इस की कीमत पानी से चुकाना हमें सस्ता लग रहा था, सो, हम इस के प्रति लापरवाह रहे. तब जबकि हम पानी के संतुलित उपयोग को बहुत पहले से जानते थे. रेगिस्तानी इलाकों में महज राख और रेत से जूठे बरतन साफ करते देखे जा सकते हैं. पानी की दिक्कत वाली जगहों पर लोग बरतन जूठा नहीं करते, न अंजुली से पानी पीते हैं बल्कि पानी सीधा मुंह में डालते हैं. एक लोटे से पूरा घर पानी पी लेता है. एक बरतन में सामूहिक भोजन करते हैं. जहां पानी सामान्य है, वहां 2 हाथों और जहां पानी भरपूर है, वहां 1 हाथ की अंजुली से पानी पीने की परंपरा है.
गांवों में कुएं समाप्तप्राय हैं और पानी के लिए हैं नल, हैंडपंप या फिर कोई मशीनी उपाय. शहरों में सार्वजनिक बंबे लुप्त हो चुके हैं. उत्तर प्रदेश के मेरठ जैसे शहर में 30 हजार से ज्यादा तालाब थे. हजारों तालाब वाले सभी शहरों में ये दहाई में भी नहीं बचे. नई जीवनशैली ने बाजार के साथ मिल कर इन्हें विकास से पाट डाला. गांवगांव में पक्के मकान बने और जहां चाहा वहां जमीन की छाती भेद कर भूजल का दोहन शुरू कर दिया. लोटे, बालटी, ढेंकली, रहट से निकलने वाला पानी अनवरत मोटी धार वाले पाइप से निकलने लगा.
पानी बिना अतिरिक्त श्रम के सुलभ हुआ तो अंधाधुंध दुरुपयोग शुरू हो गया, क्योंकि लोगों को कुएं से पानी निकालने के लिए मेहनत नहीं करनी थी, न सार्वजनिक जलस्रोत, बंबे, नल की सीमाएं थी. घरघर नल लगे तो इफरात से पानी खर्च होने लगा. अमेरिका में 1990 के बाद ऐसा ही हुआ था. वहां तब प्रति परिवार जल खपत औसतन 10 घनमीटर थी जो वर्ष 2000 तक 200 घनमीटर तक पहुंच गई. भारत में प्रतिव्यक्ति ताजा पानी की जो उपलब्धता 1955 में थी वह 1990 में घट कर आधी रह गई.
आबादी बढ़ने की मौजूदा रफ्तार को देखते हुए 2020 में पानी की उपलब्धता प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 40 लिटर से भी कम रह जाने का अनुमान है. देश में हर व्यक्ति को मौजूदा जीवनशैली में रोजमर्रा के लिए कम से कम 100 लिटर पानी चाहिए. हम कृषिप्रधान देश कहे जाते हैं और बाढ़सुखाड़ से मरने के बावजूद हम ने सिंचाई व्यवस्था के आधुनिकीकरण की कभी परवा नहीं की. हमारी कृषिदक्षता महज 35 फीसदी है जो विश्व की औसत 70 फीसदी की आधी है. इस के चलते हम कुल उपलब्ध पानी के आधे का उपयोग और उस पानी के आधे हिस्से को कच्ची नाली, वाष्पीकरण और दूसरे कुप्रबंधन में बरबाद कर देने पर कोई अफसोस नहीं करते.
कुल मिला कर सवाल यह है कि जन जागरूकता के लिए करोड़ों खर्च करने के बावजूद न पानी की बरबादी में कमी आ रही है न भूजल स्तर बढ़ रहा है. तमाम प्रचार और जल संकट की भयावह तसवीरें देखने के बाद, दुखभरी कहानियां सुनने के बावजूद हमारे कानों पर जूं तक नहीं रेंगती और योजनाओंअभियानों को आपेक्षिक सफलता नहीं मिलती तो
उस की एक ही वजह है कि हम ने जल को जीवन से नहीं जोड़ा है. पानी की किफायतदारी, जलबुद्धिमत्ता हम से अभी दूर है. हमारी नई जीवनशैली जल संकट की जननी है.
जब तक हम में यह समझने वाली जलजागृति नहीं आएगी और हम अपनी जीवनशैली में आपेक्षिक बदलाव कर उस पर अमल नहीं करते, जलसंग्रह और संरक्षण के सारे प्रयास बेमानी हैं. पानी के उपभोग में प्रभावी अंतर लाना कठिन नहीं है, जीवनशैली में कुछ छोटेमोटे बदलावों के साथ हम जल, ऊर्जा, धन और धरती बचा सकते हैं.
ऐसे बचा सकते हैं जीवन जल
– किचन में खाना बनाने के लिए जरूरत के हिसाब से कड़ाही या पैन चुनें, बड़े बरतन में अधिकतर जरूरत से ज्यादा पानी इस्तेमाल हो जाता है.
– फ्रिज से निकाली ठंडी चीजों को सामान्य तापमान पर लाने के लिए चलते नल का इस्तेमाल न करें, बल्कि किसी बरतन में पानी भर कर उस में रखें.
– हाथ से आइसक्यूब गिर जाए तो उसे डस्टबिन में नहीं, गमले में डालें
– चीजें कम पानी में उबालें, आलू वगैरह के लिए उन का बस डूब जाना ही बहुत है. उबले वाले पानी को ठंडा कर पौधों में डालें.
– फल, सब्जी चलते नल के नीचे रगड़ कर धोने के बजाय टब में पानी ले कर धोएं और दालचावल इत्यादि का धोवन गमले में डालें.
– बाथरूम में बाथटब से नहाना पानी की बरबादी है. इस्तेमाल ही करना है तो बाथटब को आधा भरें, शावर भी कम देर के लिए चलाएं, शावर ऐसा लगाएं जो कम पानी फेंके. बेहतर है बालटी और मग से नहाएं.
– कपड़े हर दिन न धोएं. वाशिंग मशीन तभी इस्तेमाल करें जब उस के लिए पर्याप्त कपड़े इकट्ठे हों. मशीन में वाशिंग पाउडर कम डालें.
– रंगीन कपड़े ठंडे पानी से धोएं. बेवजह पानी गरम करना वाटर फुटप्रिंट बढ़ा देगा.
– ब्रश, शेविंग, हाथ धोने से पहले साबुन लगाते समय नल बंद रखें. इस दौरान 15 लिटर पानी बरबाद हो सकता है.
– फ्लश के सिस्टम टैंक में पानीभरी बड़ी बोतल डाल दें.
– लौन में पौधों को पानी अलसुबह या देर शाम को दें. अपने बगीचे में स्थानीय पौधे लगाएं, ये कम पानी लेते हैं.
– पौधों के थाले में थोड़ी सड़ीगली सब्जियां बिखरा दें या सूखी पत्तियों से ढक दें. नमी देर तक बनी रहेगी और पानी भी कम लगेगा.
– कार बालटी, मग, स्पंज से धोएं. पाइप प्रयोग करें तो उस में पिस्टल नोजेल लगाएं ताकि पानी के प्रवाह को रोका और शुरू किया जा सके.
– शाकाहारी बनें, स्थानीय बाजार से ही फलसब्जीअनाज खरीदें. जितनी दूर से ये सब आएगा उतना ही वाटर फुटप्रिंट बढ़ेगा.
– पानी का बिल हर महीने चैक करें, खर्च की समीक्षा करें. रात में मीटर को देखें लीकेज तो नहीं हो रहा. रिसाव तुरंत ठीक कराएं. अगर एक बूंद पानी प्रति सैकंड टपका तो हर महीने 800 लिटर से ज्यादा पानी व्यर्थ हो सकता है.
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व्यक्तिगत ट्रिप की तुलना में पैकेज्ड टूर कई मामलों में काफी सुविधाजनक होता है. पैकेज्ड टूर में सबकुछ टूर औपरेटर द्वारा मैनेज कर देने और गाइड उपलब्ध करवा देने से आसानी होती है और व्यक्तिगत ट्रैवल की तुलना में यह सस्ता भी पड़ता है. लेकिन किसी टूर औपरेटर के जरिए पर्यटन पर जाने से पहले कुछ बातें जान लें तो आप यात्रा में होने वाले कड़वे अनुभवों, कुढ़न या तनाव से बच जाएंगे और टूर का मजा किरकिरा नहीं होगा.
भ्रामक धारणा-1 : मैं ने ट्रैवल इंश्योरैंस ले लिया, मेरे सभी बैगेज की सुरक्षा की पूरी टैंशन खत्म.
असलियत : किसी अच्छी ट्रैवल इंश्योरैंस पौलिसी में मैडिकल, ऐक्सिडैंट कवर के अलावा ट्रिप की रद्दगी, फ्लाइट की देरी और बैगेज लौस कवर रहता है, लेकिन सारा बैगेज नहीं. इस में एयरलाइन चैक्डइन बैगेज का ही लौस कवर होता है, एयरपोर्ट से बाहर का नहीं यानी होटल या टूर बस से बैगेज खो जाने पर आप को यह कवरेज नहीं मिलेगा. हां, आप टूर औपरेटर की मदद से स्थानीय पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा सकते हैं. एयरपोर्ट पर सामान खोने की सूचना भी संबंधित एयरलाइंस को तुरंत देनी होगी और इस का लिखित प्रमाण आप को रखना होगा. इस विषय में अपने इंश्योरैंस एजेंट से जानकारी लेनी लाभकारी साबित हो सकती है.
भ्रामक धारण-2 : भ्रमण संबंधी जो शैड्यूल ब्रोशर में है, वही फाइनल है.
असलियत : ज्यादातर टूर औपरेटर नियम और शर्तों के तहत लिख देते हैं कि उन के नियंत्रण से बाहर ट्रैफिक समस्या, मौसम की गड़बड़ी, स्थानीय त्योहार, स्पोर्ट्स, हड़ताल, होटल बंद होना, होटल में या फ्लाइट में ओवरबुकिंग होना, ट्रेन या विमान का मार्ग बदलना आदि व अन्य कारणों से तय कार्यक्रम में कोई भी तबदीली संभव है. इसलिए टूर औपरेटर द्वारा हमेशा टूर पैकेज, ट्रैवल प्लान, साइटसीइंग आदि में अचानक या शौर्ट नोटिस पर बदलाव संभव है. इसलिए पेमैंट देने और औफर डौक्यूमैंट पर दस्तखत करने से पहले सबकुछ अच्छी तरह पढ़ लें और छोटेमोटे बदलावों के लिए तैयार रहें.
भ्रामक धारणा-3 : ट्रिप खत्म होने दो, तब इस की कम्प्लेन कर के सबक सिखाएंगे.
असलियत : आप ने आनंदपूर्वक छुट्टी बिताने के लिए मुंहमांगी कीमत दी है, फिर सेवा में कमी की कोई शिकायत टूर खत्म होने के बाद क्यों करेंगे. बीत गई, सो बात गई. टूर खत्म होने पर शिकायत करने से भी क्या फायदा? आप टूर के किसी भी चरण में अगर दिक्कत महसूस करते हैं, तो उसी वक्त टूर कंपनी को शिकायत करें क्योंकि वे स्थानीय होटल वालों और स्थानीय वैंडर्स के भरोसे टूर आयोजित करते हैं. आप की पुख्ता शिकायत मिलने पर वे उसी वक्त उन्हें टाइट कर के आप को बेहतर सेवाएं दिलवाएंगे. हां, मौखिक शिकायत के साथसाथ लिखित शिकायत भी जरूर दें. अपनी शिकायत स्पष्ट, सटीक और सही शब्दों में लिखें, गोलमोल नहीं.
भ्रामक धारणा-4 : 10-15 मिनट इधरउधर तो चलता है, यार.
असलियत : हम भारतीय 10-15 मिनट की कोई कीमत नहीं समझते. टूर में भी हम यही मान कर चलते हैं कि बरात की बस की तरह यहां भी हमारे आए बिना बस नहीं चलेगी. लेकिन यकीन मानिए, आप को यहां काफी मुसीबतें झेलनी पड़ सकती हैं. किसी भी गु्रप टूर में समय की पाबंदी होती है और यहां देरी करने की कोई गुंजाइश नहीं. अगर आप एकदो मिनट से ज्यादा की देरी करते हैं और तय समय पर किसी पर्यटन स्थल, होटल या शौपिंग मौल से अपनी बस तक नहीं पहुंचते हैं, तो गाड़ी छूट जाएगी. फिर अनजानी जगह आप को काफी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है.
भ्रामक धारणा-5 : मैं ने फीस दे दी, अब वीजा का पेपरवर्क करने का जिम्मा टूर औपरेटर का है.
असलियत : टूर औपरेटर वीजा आवेदन शुल्क के साथसाथ खुद की सर्विस फीस भी लेते हैं. वे आप के लिए आवेदन जरूर करते हैं, लेकिन इस पर उन का कोई बस नहीं चलता कि आप को वीजा समय पर मिल ही जाए. अगर आप का आवेदन रद्द हो जाता है, तो आप की फीस जब्त कर ली जाएगी. टूर औपरेटर से इस की वापसी की उम्मीद करना बेकार है.
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न्यूजीलैंड के पूर्व विस्फोटक सलामी बल्लेबाज ब्रैंडन मैकुलम का मानना है कि टी-20 की बढ़ती लोकप्रियता के कारण टेस्ट क्रिकेट जीवित नहीं रह पाएगा. 36 साल के मैकुलम ने वर्ष 2016 के शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया था. न्यूजीलैंड के लिए 101 टेस्ट, 260 वनडे और 71 टी-20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेलने वाले मैकुलम मौजूदा समय में इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) सहित दुनियाभर के टी-20 लीगों में खेल रहे हैं.
मैकुलम ने क्रिकेट मंथली को दिए एक साक्षात्कार में कहा, “मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले समय में टेस्ट क्रिकेट नहीं बच पाएगा क्योंकि कितनी टीमें हैं, जो इसे खेल सकती हैं.” मैकुलम ने कहा कि उन्होंने हमेशा से टेस्ट क्रिकेट का सम्मान किया और उनके लिए यह खेल का सबसे अच्छा था.
उन्होंने कहा, “मैं भी एक यथार्थवादी हूं और लोग टी-20 देख रहे हैं. सिर्फ खेल ही नहीं बल्कि टीवी समाज भी बदल रहा है क्योंकि लोगों के पास टेस्ट क्रिकेट को देखने के लिए चार या पांच दिन नहीं हैं. वे दिन का पहला सत्र और पांचवें दिन आखिरी सत्र ही देखना चाहते हैं.”
टी20 क्रिकेट के बादशाह हैं मैकुलम
मैकुलम ने टी-20 क्रिकेट में अब तक कुल 9000 से भी अधिक रन बनाए हैं और सर्वाधिक रनों के मामले में वह वेस्टइंडीज के क्रिस गेल के बाद दूसरे नंबर पर हैं. मौजूदा समय में वह आईपीएल में बेंगलुरु के लिए खेल रहे हैं. मैकुलम ने आईपीएल के सभी 11 सत्रों में हिस्सा लिया है. दो करोड़ की बेस प्राइस वाले ब्रेंडन मैकुलम को इस साल की आईपीएल नीलामी में बेंगलुरु ने 3.60 करोड़ में खरीदा था.
इस आईपीएल में मैकुलम का बल्ला उस तरह से नहीं चल रहा है जिसके लिए वह मशहूर है. यह भी एक मजेदार तथ्य ही है कि मैकुलम उसी टीम के लिए खेल रहे हैं जिसके खिलाफ उन्होंने आईपीएल के ही पहले मैच में सबसे रिकौर्ड 158 रनों की पारी खेली थी. कभी अपनी टीमों में सबसे खास खिलाड़ी माने जाने वाले मैकुलम को इस सीजन में केवल छह मैचों में खेलने का मौका मिला है जिसमें उन्होंने केवल छह छक्के और 16 चौके लगाते हुए 147.77 के स्ट्राइक रेट और 21.16 औसत के साथ केवल 127 रन ही बनाए हैं. उनका सर्वाधिक स्कोर 43 रहा है. ऑरेंज कैप की दौड़ में वे इस समय 40वें स्थान पर हैं.
भारत में मैकुलम की लोकप्रियता कम नहीं है
इस आईपीएल के शुरु होने से पहले जनवरी में एक औन लाइन वोटिंग कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसमें चेन्नई के 26 और राजस्थान के 46 फीसदी प्रशंसक चाहते थे कि न्यूजीलैंड के मैक्कलम उनकी टीम के लिए खेलें. भारत में मैकुलम की काफी लोकप्रियता है यह बात कई मौकों पर साबित होती रहती है.
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इस पर नेहा डर गई और संदीप उस का शारीरिक शोषण करता रहा. रणवीर ने लगभग 4 साल तक गाजियाबाद में नौकरी की. बाद में उस की नौकरी छूट गई तो वह अपने गांव तिलसड़ा आ गया.
नेहा का बेटा 5 साल का हो चुका था. वह उसे गांव के प्राइमरी स्कूल में नहीं पढ़ाना चाहती थी. बेटे को शहर में पढ़ाने के लिए नेहा ने पति पर दबाव डाला तो रणवीर ने कानपुर शहर में बर्रा विश्व बैंक के बी ब्लौक में एक कमरा किराए पर ले लिया और नेहा के साथ रहने लगा.
यह मकान सपा नेता वैभव मिश्रा का था. वह बर्रा में ही अपने दूसरे मकान में परिवार सहित रहते थे. किराए के मकान में आ कर नेहा ने अपने बेटे का दाखिला इंग्लिश मीडियम स्कूल में करा दिया. किराए के इसी मकान में नेहा की मुलाकात प्रवीण कुमार श्रीवास्तव से हुई. वह मूलरूप से पटेलनगर, कालपी का रहने वाला था और डी ब्लौक बर्रा में किराए पर रहता था. प्रवीण कुमार सपा नेता वैभव मिश्रा का ड्राइवर था. इस के अलावा वह मकान का किराया भी वसूलता था.
नेहा को मिला नया प्रेमी
चंचल व हंसमुख नेहा से प्रवीण की जल्द ही दोस्ती हो गई. दोस्ती प्यार में बदली, फिर दोनों के बीच नाजायज रिश्ता बन गया. इस के बाद वह नेहा की हर तरह से मदद करने लगा. नेहा का पति रणवीर सिंह किसान था. कभी वह नेहा के साथ रहता तो कभी महीनों तक गांव में, जिस से प्रवीण को नेहा से मिलने में कोई बाधा नहीं होती थी.
संदीप सिंह नेहा की टोह में लगा रहता था. वह अय्याश प्रवृत्ति का था. उसे जब पता चला कि नेहा अब बर्रा विश्व बैंक कालोनी में रहने लगी है तो वह वहां भी आने लगा और नेहा का शारीरिक शोषण करने लगा. नेहा जब उस का फोन रिसीव नहीं करती तो वह विभिन्न नंबरों से काल करता. नेहा जब फोन रिसीव कर लेती तो वह उसे भद्दीभद्दी गालियां देता और अश्लील फोटो नातेरिश्तेदारों व घर वालों को भेजने की धमकी देता.
दरअसल नेहा के पास स्मार्टफोन नहीं था. संदीप ने फेसबुक पर उस के नाम की आईडी बना रखी थी, जिसे वह खुद ही अपडेट करता था. अकसर वह सोशल साइट पर नेहा की फोटो के साथ किसी न किसी रिश्तेदार का फोन नंबर डाल कर घर वालों को परेशान करता रहता था. संदीप ने नेहा के मौसेरे भाई को नेहा की अश्लील फोटो भेज भी दी थी.
शारीरिक शोषण और संदीप की गंदी हरकतों से आजिज आ कर नेहा ने अपने नए प्रेमी प्रवीण कुमार श्रीवास्तव को अपनी व्यथा सुनाई और संदीप से निजात दिलाने की बात कही. इस पर प्रवीण ने नेहा को बातचीत के जरिए समस्या को सुलझाने की सलाह दी.
पहली मार्च को होली थी. संदीप होली मनाने पत्नी और बच्चों के साथ दिल्ली से अपने घर घाटमपुर आया. इन दिनों संदीप के पिता महेंद्र सिंह नौबस्ता (कानपुर) के आशानगर में नया मकान बनवा रहे थे. संदीप इसी निर्माणाधीन मकान में कई रोज रह कर देखरेख करता था.
8 मार्च को संदीप ने नेहा सिंह से बात करने के लिए उस का फोन नंबर मिलाया. लेकिन नेहा ने फोन रिसीव नहीं किया. कई बार प्रयास के बाद नेहा ने फोन रिसीव किया तो वह नाराज हुआ और कर्रही (बर्रा) में मिलने को कहा. नेहा मिलने आई तो संदीप ने उसे गालियां दीं और फोन न उठाने तथा मिलने से इनकार करने पर 2 थप्पड़ भी जड़ दिए. नेहा तमतमा कर घर चली गई और संदीप पत्नीबच्चों के साथ दिल्ली चला गया.
चोट खाई नागिन बन गई नेहा अपमानित नेहा ने प्रेमी प्रवीण कुमार से संपर्क किया और संदीप द्वारा बेइज्जत करने और थप्पड़ मारने की बात बताई. नेहा ने कहा कि संदीप की ज्यादतियां अब बरदाश्त नहीं होतीं. अत: उसे रास्ते से हटाना ही होगा, जिस के लिए तुम्हें साथ देना होगा.
अगर तुम ने साथ नहीं दिया तो आज के बाद मुझ से बात नहीं करना. प्रेमिका की जिद पर प्रवीण कुमार संदीप को रास्ते से हटाने को राजी हो गया. साथ देने के लिए उस ने अपने दोस्त बर्रा निवासी देवेंद्र नागर को भी राजी कर लिया.
18 मार्च, 2018 को संदीप ने दिल्ली से नेहा को फोन किया कि वह 19 मार्च को कानपुर आ रहा है, उसे मिलना होगा. इस पर नेहा ने जवाब दिया कि बेटे शुभम के पेपर 15 मार्च को खत्म हो गए हैं. अब वह अपनी ससुराल तिलसड़ा (घाटमपुर) में है, इसलिए मिलना संभव नहीं है. इस पर संदीप ने उस के फोटो और वीडियो वायरल करने की धमकी दी. धमकी से नेहा डर गई और बर्रा विश्व बैंक कालोनी स्थित मकान में मिलने का वादा कर लिया.
संदीप के शहर आने की जानकारी पर नेहा 19 मार्च की दोपहर ससुराल से कानपुर आ गई. किराए के मकान पर पहुंचने के बाद नेहा ने प्रवीण कुमार को मैसेज किया कि संदीप आ रहा है. आ जाना, आज उसे उल्टा करना है. मैसेज पढ़ कर प्रवीण अपने दोस्त देवेंद्र के साथ रात 9 बजे नेहा के कमरे पर पहुंच गया. नेहा ने दोनों को छत पर बैठा दिया.
इधर 19 मार्च को संदीप रात 10 बजे दिल्ली से कानपुर आया. इस बीच वह पिता, पत्नी व प्रेमिका के संपर्क में रहा. रास्ते में उस ने खाने का सामान व शराब की बोतल खरीदी, फिर रात 12 बजे के आसपास नेहा के घर पहुंच गया.
नेहा ने संदीप के साथ खाना खाया और उसे शराब पिलाई. इस के बाद संदीप ने बदन से सारे कपड़े उतारे और नेहा के शरीर से खेलने लगा. शारीरिक भूख मिटाने के बाद संदीप अंडरवियर में ही पलंग पर लेट गया और कुछ ही देर में खर्राटे भरने लगा.
उचित मौका देख कर नेहा ने छत पर बैठे प्रवीण व उस के दोस्त देवेंद्र नागर को कमरे में बुला लिया. तीनों मिल कर संदीप का गला स्टोल (दुपट्टे) से कसने लगे तो वह हाथपैर चलाने लगा. तभी नेहा हंसिया ले आई और उस ने संदीप के सिर, गले व दिल पर कई वार किए. प्रवीण ने भी संदीप को हंसिए से गोदा जिस से उस की मौत हो गई.
संदीप को मौत के घाट उतारने के बाद नेहा और उस के प्रेमी प्रवीण ने उस के गले से सोने की चेन और अंगुलियों से दोनों अंगूठियां उतार लीं. पैंट की तलाशी ली तो जेब में पैसे मिले, जो निकाल लिए. फिर संदीप को अंडरवियर पहनाया जो जल्दबाजी में उल्टा पहना दिया गया. फिर पैंटशर्ट पहनाई और लाश चादर में लपेट दी.
शव को ठिकाने लगाने के लिए प्रवीण कुमार रात 3 बजे अपने मालिक वैभव मिश्रा के घर पहुंचा और बताया कि उस की बहन की तबीयत ज्यादा खराब है, उसे अस्पताल पहुंचाना है. अत: कार की चाबी चाहिए. वैभव मिश्रा ने पहले तो इनकार किया. लेकिन पत्नी के कहने पर कार की चाबी दे दी. कार ले कर प्रवीण कुमार नेहा के कमरे पर आया और संदीप के शव को कार में रख कर तीनों पांडु नदी के काठ पुल पर पहुंचे और शव को पुल के नीचे फेंक दिया. लाश फेंक कर वे वापस लौट आए.
इधर 21 मार्च को गहोई निवासी बबलू भदौरिया ने पांडु नदी में एक युवक की लाश पानी पर तैरती देखी तो उस ने बर्रा थानाप्रभारी को सूचना दे दी.
थानाप्रभारी भास्कर मिश्रा ने तीनों अभियुक्तों से पूछताछ के बाद 23 मार्च, 2018 को कानपुर कोर्ट में सीएमएम की अदालत में पेश किया, जहां से तीनों को जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उन की जमानत नहीं हुई थी.
क्या आपको पता है कि आप फोन के मेमोरी कार्ड को इंटरनल मेमोरी बना सकते हैं. अगर नहीं… तो आज हम आपको ऐसी ट्रिक बताने जा रहे हैं, जिसकी मदद से आप अपने फोन की इंटरनल मेमोरी को बढ़ा सकते हैं इसके लिए आपको किसी भी तरह का कोई ऐप डाउनलोड करने की जरूरत नहीं है. यह आप कुछ सिंपल स्टेप में फोन की सेटिंग में बदलाव कर ऐसा कर सकते हैं.
ऐसे बढ़ाए इंटरनल मेमोरी
हम जो ट्रिक आपको बताने जा रहे हैं उसके माध्यम से आपके फोन की इंटरनल मेमोरी और SD कार्ड मेमोरी एक ही हो जाएगी. ऐसा करने पर फोन की सभी चीजें आपकी इंटरनल मेमोरी में सेव हो जाएंगी. ऐसा होने पर आपको ज्यादा मेमोरी यूज करने को मिल जाएगी. फोन की मेमोरी फुल होने पर आपको मीडिया फाइल्स को SD कार्ड में मूव नहीं करना होगा. इसके लिए आपको ये स्टेप फौलो करने होंगे.
यह करना होगा
फोन की इंटरनल मेमोरी और माइक्रो एस डी कार्ड की मेमोरी को एक करने के लिए सबसे पहले स्मार्टफोन की Settings में जाकर Storage पर टैप करें. अब इसमें आपको Portable Storage (पोर्टेबल स्टोरेज) का औप्शन मिलेगा, उस पर टैप करें.
इसके बाद फोन में नया पेज ओपन होगा जिसमें आप टौप पर दिखाई दे रहे तीन डौट को टैप करें. अब फिर से Settings का औप्शन दिखेगा, उस पर टैप करें.
Settings में जाने के बाद Format as internal पर टैप करें.
फिर Erase & Format पर टैप करना होगा और आगे की प्रोसेस फौलो करते जाएं. ऐसा करने से पहले अपना डाटा सेव करके रख लें. ताकि डाटा के डिलीट होने का कोई चांस न रहे.
इस प्रोसेस के पूरा होने पर इंटरनल स्टोरेज SD Card की स्टोरेज ले लेगी. अब आप जो भी ऐप और गेम इंस्टौल करेंगे वो इंटरनल स्टोरेज में सेव होंगे.
गर्मी का मौसम दिन पर दिन परवान चढ़ रहा है. इस मौसम में अगर आप फ्रिज खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो खरीदारी करते समय आपको कुछ खास बातों का ध्यान रखने की जरूरत है. बता दें कि आजकल बाजार में उपभोक्ताओं की जरूरत के हिसाब से कई ब्रांड्स के फ्रिज उपलब्ध हैं.
कैसा हो आपका फ्रिज?
आजकल बाजार में सिंगल डोर फ्रिज, डबल डोर, वार्डरोब लुक रेफ्रिजरेटर, टौप फ्रीजर, बौटम फ्रीजर, साइड बाय साइड फ्रीजर और बिल्ट इन फ्रीजर जैसे फीचर्स वाले कई फ्रिज उपलब्ध हैं. लेकिन यह जरूरी नहीं है कि वे सभी आपके लिए हों. आप अपने जरूरत के हिसाब और बजट के हिसाब से फ्रीज खरीदें. क्योंकि बाजार में आपको कम कीमत से लेकर अधिक कीमत तक में विभिन्न फीचर्स वाले फ्रिज मिल जाएंगे.
फ्रिज की क्षमता
बाजार में आपको फ्रिज में छोटे से लेकर बड़े साइज तक की रेंज मिल जाएंगी, लेकिन आपको कौन-सा फ्रिज चाहिए, इस बात का फैसला आपको अपनी जरूरत के अनुरूप करना होगा. छोटे परिवार यानी तीन से चार सदस्यों के लिए 190 से 250 लीटर तक की क्षमता वाला फ्रिज सही रहता है. अगर परिवार बड़ा है, तो आप अपने परिवार के सदस्यों की संख्या और जरूरत के अनुरूप ही इसकी क्षमता का चुनाव करें. जरूरी फीचर्स फ्रिज का चुनाव करते समय उसकी क्षमता, कम्प्रेसर, कूलिंग सिस्टम, एयर फिल्टरेशन सिस्टम, डी-फ्रौस्ट फीचर और वारंटी आदि पर ध्यान दें.
स्पेस के अनुरूप चुनें
बड़े शहरों में फ्लैट्स में जगह की कमी के चलते रसोई काफी छोटे होते हैं. अगर आप फ्लैट में रहते हैं तो इस बात को ध्यान में रखते हुए फ्रिज का चुनाव करें, जो घर के दरवाजे से आराम से अंदर आ जाए और सेट भी हो जाए. छोटे घरों के लिए कौम्पेक्ट डिजाइन मल्टी फ्रीजर फ्रिज भी उपलब्ध हैं, क्योंकि छोटे घरों में बड़े फ्रिज रखने में काफी दिक्कत होती है.
स्टार रेटिंग का ध्यान रखें
फ्रिज 24 घंटे और 365 दिन चलने वाला उपकरण है, इसलिए इसमें बिजली भी काफी खर्च होती है. बाजार में फ्रिज में आपको एनर्जी सेविंग मौडल्स मिलेंगे, जिसमें बिजली की खपत कम होती है. इसका पता स्टार रेटिंग से होता है, जितने समय में एक स्टार रेटिंग वाला फ्रिज 100 रुपये की बिजली खपत करेगा, उतने ही समय चलने में 5 स्टार रेटिंग का फ्रिज करीब 69 रुपये की बिजली की खपत करता है. लंबे समय को मद्देनजर रखते हुए 5 स्टार फ्रिज ही फायदेमंद रहेगा. बाजार में अब इन्वर्टर तकनीक पर आधारित फ्रिज भी आ गए हैं, जो 5 स्टार रेटिंग वाले सामान्य फ्रिज के मुकाबले 20 से 30 फीसदी ज्यादा एनर्जी सेविंग करते हैं. कीमत में यह फ्रिज सामान्य फ्रिज के मुकाबले थोड़े मंहगे होते हैं.
स्टाइल एवं डिजाइंस
फ्रिज की दुनिया में अब डिजाइन और स्टाइल की रेंज में भी कोई कमी नहीं है. इसमें आपको काफी वैरायटी मिल जाएगी. किचन को मौडयुलर लुक देने के लिए रेफ्रिजरेटर में अनूठे डिजाइंस मिलेंगे. नौर्मल रेंज में फ्रिज को डिजाइनर लुक देने के लिए आजकल कई ब्रांड फ्लोरल प्रिंट्स उपलब्ध करवा कर रहे हैं, जो देखने में स्टाइलिश लगते हैं.
ऊपर दिए गए विभिन्न बातों को ध्यान में रखने के पश्चात ही आप फ्रिज खरीदें, तो आपको इसका अच्छा परिणाम मिलेगा.
राज कुमार राव की गिनती अब सफल कलाकारों में होने लगी है. मगर जब वह बौलीवुड में जमने के लिए संघर्ष कर रहे थे, उन दिनों उन्हें तमाम निर्माता निर्देशकों ने रिजेक्ट कर दिया था. पर अब वही फिल्मकार जब राज कुमार राव के पास अपनी फिल्म का औफर लेकर आते हैं, तो राज कुमार राव खुद को विजेता महसूस करते हुए उनका अपमान तो नहीं करते पर उनकी फिल्म स्वीकार भी नहीं करते हैं.
इस बारे में खुद राज कुमार राव कहते हैं – ‘‘इसमें हार जीत वाला कोई मसला नही हैं, लेकिन जिन्होंने कभी मुझे रिजेक्ट किया था यदि वह मेरे पास आते हैं, तो मैं उनकी इज्जत करते हुए बड़ी विनम्रता के साथ कह दूंगा कि मैं उनकी फिल्म नहीं कर सकता. उनसे मेरी कोई निजी दुश्मनी नहीं है, पर मुझे उनके माइंड सेट, उनकी सोच से समस्या है. यदि कल वह मेरे अंदर की क्षमता को नहीं भांप पाए, तो आज कैसे भांप सकते हैं. लेकिन मैं उनका अपमान करूं, यह संभव नहीं है.’’
बौलीवुड अभिनेता और प्रोड्यूसर इंदर कुमार की 28 जुलाई, 2017 को मौत हो गई थी. सलमान खान की फिल्म ‘वौन्टेड’ में उनके को-स्टार रहे इंदर कुमार की मौत का कारण हार्ट अटैक बताया गया था. लेकिन अब उनका एक सुसाइड वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है. यह वीडियो काफी तेजी से वायरल भी हो रहा है. बताया जा रहा है कि यह वीडियो उनके मौत के पहले का है. वीडियो को देखकर उनके निधन पर कई तरह के सवालिया निशान लगाएं जा रहे हैं. वीडियो को देखकर यह तो समझ आ रहा है कि इस वीडियो को खुद इंदर ने ही शूट किया है.
वायरल हो रहे इस वीडियो में इंदर कुमार आत्महत्या तकने का कारण बताते नजर रहे हैं वह इस वीडियो में कहते दिख रहे हैं कि वो सिक्स पैक के साथ आए तो एक्टर बनने थे लेकिन उनके हाथ नाकामियाबियों के सिवा और कुछ ना लगा. वे बौलीवुड में एक बड़े एक्टर नहीं बन पाए. उनकी अय्याशियों ने उन्हें बर्बाद कर दिया. जिसके चलते वो अपने लक्ष्य से भटक गए और इसलिए अब वो आत्महत्या करने जा रहे हैं.
जैसा कि आप देख सकते हैं वीडियो में उनके एक हाथ में शराब की बोतल है और दूसरे हाथ में मोबाइल जिससे वह वीडियो बना रहे हैं. इस वीडियो में उन्होंने अपने मम्मी-पापा को भी मैसेज दिया है. उन्होंने कहा, ‘मां-पापा आपने मुझे सबकुछ दिया लेकिन मैं कुछ नहीं कर पाया. हो सके तो मुझे माफ कर देना. आई एम सौरी.’
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ये वीडियो इंदर का रियल लाइफ वीडियो नहीं है. बल्कि निधन से पहले किसी फिल्म के लिए शूट का हिस्सा है. कहा जा रहा है कि इस विडियो को लेकर इंदर कुमार की पत्नी जल्द ही प्रेस कौन्फ्रेंस करेंगी और इसका पीछे का सच लोगों के सामने लेकर आएंगी.