जैसा कि आप जानते हैं गूगल ने सालों बाद अपनी ईमेल सर्विस जीमेल के फीचर्स में कई बड़े बदलाव किये थे. जिसका ऐलान गूगल ने अपनी इसी साल हुई आई/ओ 2018 कौन्फ्रेंस के दौरान किया था. बदलाव के बाद अब आपका जीमेल स्मार्ट हो गया है. हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इसमें एक कास फीचर स्मार्ट कंपोज फीचर जोड़ा गया है. इस खास फीचर के जरिए यूजर किसी ईमेल को आसानी से ड्राफ्ट कर सकते हैं.
ऐसे करें इस्तेमाल
– जीमेल के नए इंटरफेस में गियर की तरह दिख रहे ‘Setting’ बटन पर जाएं.
– ‘Setting’ बटन पर क्लिक करने के बाद कई विकल्प सामने आ जाएंगे. इसमें ‘General’ में स्क्रौल डाउन करें और Smart Compose पर क्लिक करें.
– यहां दिखाई दे रहे ‘Writing suggestions on’ पर क्लिक करें. इसके बाद आप इस फीचर का इस्तेमाल कर सकते हैं.
अगर आप इस फीचर का इस्तेमाल नहीं करना चाहते हैं तो वापस ऐसे ही जाकर इसे बंद कर सकते हैं. अभी यह फीचर सिर्फ अंग्रेजी में ही उपलब्ध कराया गया है. इस फीचर का उद्देश्य ईमेल में सेंटेंस को लिखने की प्रक्रिया को तेज करना है. हालांकि, गूगल का यह स्मार्ट कपोज फीचर अभी इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं है, लेकिन गूगल ने इस फीचर को प्रयोग के तौर पर उपलब्ध करा दिया है. आने वाले कुछ सप्ताह में इस फीचर को इस्तेमाल के लिए उपलब्ध करा दिया जाएगा.
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आईपीएल के सीजन 11 में भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की लोकप्रियता अभूतपूर्व है. उनकी कप्तानी, उनकी रणनीतियों के सभी कायल हैं. आईपीएल से पहले टीम इंडिया के दक्षिण अफ्रीकी दौरे और उससे पहले भी पिछले कुछ समय से धोनी की बल्लेबाजी की कई बार आलोचना हुई. धोनी ने हालाकि इस सभी आलोचनाओं का जवाब अपने बल्ले से ही दिया. धोनी बार बार यह साबित किया है आज भी भारत में तो क्या दुनियाभर में उनका कोई सानी नहीं है.
पिछले एक साल में जब भी धोनी की टीम इंडिया में जगह पर सवाल उठे हैं, कोच से लेकर कप्तान विराट कोहली तक ने खुल कर उनका बचाव किया. चाहे नाजुक मौकों पर विराट कोहली को सलाह देना हो या कि रिस्ट स्पिनर्स को बीच मैदान पर मार्गदर्शन देना हो, धोनी अब भी टीम इंडिया एक बेहतरीन लीडर बने हुए हैं, कप्तानी छोड़ने के बाद भी.
साल 2018 के आईपीएल में तो धोनी ने अपनी लोकप्रियता के नए शिखर को छू लिया है. उन्होंने एक के बाद एक मैचों में फिनिशर की भूमिका इस अंदाज में खेली कि विरोधी भी उनके कायल हो गए हैं. गेंदबाजों में उनका खौफ लौट आया है. लेकिन एक चीज जो नहीं बदली है वह है उनका कूल अंदाज.
हाल ही में भारत में क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया कि कैसे उन्होंने भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी में लीडरशिप के गुणों को पहचाना. सचिन ने अपनी गौरव कपूर के साथ हुए ब्रेकफास्ट विथ चैम्पियन्स में इंटरव्यू के दौरान धोनी के बारे में खुल कर चर्चा की. सचिन ने बताया कि कैसे जब धोनी के फिल्डिंग सेट करते समय वे उनसे बात करते थे तब वे धोनी के लीडरशिप के गुण को पहचान सके.
इस चैट शो में बातचीत दौरान सचिन ने बताया, “जब भी मैं स्लिप पर फील्डिंग करता था तब हमेशा धोनी से फील्डिंग पोजिशन्स के बारे चर्चा करता था. अपने विचार बताने के बाद में उससे फील्डिंग के बारे में पूछा करता था. इसी तरह की बातचीत के दौरान ही मैं धोनी की लीडरशिप क्षमता के बारे में जान सका.”
सचिन की कप्तानी में कभी नहीं खेले धोनी
गौरतलब है कि धोनी ने कभी भी कोई मैच नहीं खेला था. सचिन ने आखिरी बार साल 2000 में कप्तानी की थी, जबकि धोनी ने अपना टेस्ट करियर साल 2005 में राहुल द्रविड़ की कप्तानी में और अपना वनडे करियर 2004 में सौरव गांगुली की कप्तानी में शुरू किया था. हालाकि सचिन को धोनी का खूब साथ मिला क्योंकि सचिन ने 2013 में क्रिकेट को अलविदा कहा था. धोनी 2008 में ही टीम इंडिया के कप्तान बन गए थे. सचिन को धोनी की कप्तानी काफी समय तक करीब से समझने का मौका मिला था.
सचिन के बारे में सभी क्रिकेट पंडित जानते हैं कि सचिन को क्रिकेट की काफी गहराई तक समझ है उनका क्रिकेट विश्लेषण बेहतरीन है. गेंदबाजों की मानसिकता के बारे में उनका अनुमान काफी सटीक कहा जाता है. उनकी कप्तानी जाने के बाद भी भारत का हर कप्तान मैदान पर उनसे सलाह लेता नजर आता था. धोनी भी सचिन की सलाह को काफी महत्व देते थे और नाजुक मौकों पर उनसे सलाह लेना नहीं भूलते थे.
दिग्गजों से भरी टीम की कप्तानी संभाली थी धोनी ने
धोनी ने जब कप्तानी संभाली थी तब टीम में सचिन, सौरव, वीवीएस लक्ष्मण, राहुल द्रविड़, वीरेंद्र सहवाग जैसे दिग्गज मौजूद थे. इनके रहते धोनी ने न केवल सफलतापूर्वक टीम की कप्तानी की बल्कि कभी किसी ने धोनी या उनकी कप्तानी के बारे कोई शिकायत नहीं की. सचिन का धोनी के बारे में यह खुलासा उस समय आया है जब धोनी की लीडरशिप की इस आईपीएल में धूम मची हुई है.
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बौलीवुड अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे हैं. मीडिया में आई खबरों के मुताबिक काफी लम्बे समय से उन्हें पीठ दर्द की शिकायत है. जो अब काफी बढ़ गई है और जिसके चलते वह बेहद परेशान हैं. बता दें कि कुछ समय पहले वह इलाज कराकर वापस काम पर लौट आए थे, लेकिन यह दर्द एक बार फिर से शुरू हो गया है. जिसके कारण वह अब अपनी फिल्मों से जुड़े काम भी नहीं कर पा रहे हैं.
खबरों के मुताबिक मिथुन चक्रवर्ती अपने पीठ दर्द से छुटकारा पाने के लिए दिल्ली में अपना इलाज करवा रहे हैं. इससे पहले उन्होंने लौस एंजेलिस में भी इलाज करवाया था. जानकारी के लिए बता दें कि अपनी खराब तबियत के चलते ही उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था. साथ ही वह पिछले एक साल से अपने प्रोजेक्ट्स पर ध्यान भी नहीं दे पा रहे हैं.
आपको बता दें कि फिल्मों में शानदार अभिनय के कारण तीन बार नेशनल अवौर्ड जीत चुके मिथुन चक्रवर्ती ने साल 2009 में फिल्म ‘लक’ में काम किया था. इस फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें गंभीर चोट लग गई थी. दरअसल, इस फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्होंने एक स्टंट किया था जिसमें उन्हें चौपर से कूदना था, लेकिन खराब टाइमिंग की वजह से वह नीचे गिर गए थे. इस स्टंट को करते हुए उनकी पीठ में चोट लग गई थी. अब इस सालों पुराने लगे चोट की वजह से उनको काफी दर्द भी सहना पड़ रहा है.
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कर्नाटक चुनाव के नतीजे आने से पहले ही पेट्रोल-डीजल और महंगा हो गया है. 19 दिन बाद तेल कंपनियों ने दाम बढ़ाने शुरू किए तो दो दिन में ही तेल कंपनियों ने पेट्रोल पर 32 पैसे और डीजल पर करीब 43 पैसे की बढ़ोतरी की गई है. दिल्ली में आज यानी मंगलवार को पेट्रोल 75 रुपए के पास पहुंच गया है. सोमवार के बाद मंगलवार को भी तेल कंपनियों ने पेट्रोल पर 15 पैसे की बढ़ोतरी की है. इससे पेट्रोल 5 साल के उच्चतम स्तर 74.95 पैसे पर पहुंच गया है. वहीं, डीजल की बात करें तो दिल्ली में इसका भाव 66.36 पर पहुंच गया है. डीजल का यह अब तक का रिकौर्ड स्तर है.
दो दिन में बढ़ाए गए दाम
तेल कंपनियों ने 24 अप्रैल के बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में रोजाना होने वाले बदलाव को बंद कर दिया था. लेकिन, कर्नाटक चुनाव की वोटिंग खत्म होते ही सोमवार से कंपनियों ने दाम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं. सोमवार को पेट्रोल पर 17 पैसे और डीजल पर 21 पैसे की बढ़ोतरी की गई थी. पहले से तय था कि कंपनियां अपना नुकसान पूरा करने के लिए तेल के दाम में तेज बढ़ोतरी शुरू करेंगी. यही वजह है दो दिन में पेट्रोल 32 पैसे और डीजल 43 पैसे महंगा हो गया है.
एक महीने में डेढ़ रुपए महंगा हुआ पेट्रोल
पिछले एक महीने के ट्रेंड की बात करें तो पेट्रोल करीब 1.5 रुपए और डीजल पर करीब 2 रुपए बढ़ाए हैं. अप्रैल की शुरुआत में पेट्रोल के दाम 73.56 रुपए के पास थे. 15 मई तक यह दाम 75 रुपए तक पहुंच गए हैं. वहीं, डीजल की कीमतें पेट्रोल के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ी हैं. अप्रैल की शुरुआत में डीजल 64.96 के करीब था. 15 मई तक डीजल के दाम 66.35 पर पहुंच गए हैं यानी इसमें करीब दो रुपए का इजाफा हुआ है.
क्यों बढ़ रहे हैं दाम
पेट्रोल-डीजल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करते हैं. कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. ब्रेंट क्रूड जहां 78 डौलर प्रति बैरल के पार निकल गया है वहीं, नायमैक्स पर क्रूड के दाम 71 डौलर प्रति बैरल के पार निकल चुकी हैं. इससे पहले कच्चा तेल 2014 में इतना महंगा हुआ था. करीब 4 साल के बाद कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं.
रुपए में कमजोरी भी है वजह
औयल मार्केटिंग कंपनियां अपने नुकसान को पूरा करने में जुटी हैं. अमेरिकी डौलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो रहा है. रुपए का भाव 67 के पार निकल चुका है. यह रुपये का 15 महीने के निचला स्तर है. इसकी वजह से तेल कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है. दरअसल, रुपए में कमजोरी से कंपनियों को कच्चा तेल महंगा मिल रहा है. यही वजह है कि घरेलू मार्केट में भी पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं.
अभी और बढ़ेंगे दाम
सीनियर एनालिस्ट अरुण केजरीवाल के मुताबिक, पेट्रोल-डीजल की कीमतें अभी और बढ़ेंगी. 19 दिन तक कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ. जिसकी वजह से तेल कंपनियों को काफी नुकसान हुआ है. इसकी भरपाई के लिए कंपनियों को करीब 4-5 रुपए तक दाम बढ़ाने होंगे. ऐसे में पेट्रोल 3 और डीजल 4 रुपए तक महंगा हो सकता है. दिल्ली में पेट्रोल की कीमतें 76 रुपए और डीजल 68 रुपए का स्तर छू सकता है.
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25 मई को प्रदर्शित होने वाली अपनी फिल्म ‘परमाणुः ए स्टोरी आफ पोखरण’ को लेकर अति उत्साहित जौन अब्राहम खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं कि उन्हें देश को शक्तिशाली बनाने वाली 1998 की इस घटना पर फिल्म बनाने व उसमें एक अहम भूमिका निभाने का अवसर मिला. इसी के साथ उनका मानना है कि सोशल मीडिया पानी का बुलबुला मात्र है.
‘‘सरिता’’ पत्रिका के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत करते हुए सोशल मीडिया के सवालपर जौन अब्राहम ने कहा-‘‘सच यह है कि मैं सोशल मीडिया का फैन नही हूं. पर सोशल मीडिया आज की तारीख में बहुत तेजी से बढ़ रहा है. इन दिनों एक चलन हो गया है कि सारे ब्रांड सोशल मीडिया पर कलाकार की लोकप्रियता को देखकर ही कलाकार को अपना ब्रांड अम्बेसेडर बनाते हैं. पर मैं सोशल मीडिया पर फौलोवर के जो आंकड़े दिखाए जाते हैं, उन्हें सही नहीं मानता.
इतना ही नहीं मेरा मानना है कि बहुत जल्द वह वक्त आएगा, जब सारे सेलीब्रेटी, सारे कलाकार सोशल मीडिया से बाहर हो जाएंगे. सोशल मीडिया का बाक्स आफिस पर भी कोई असर नही होता.’’
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भारतीय जनता पार्टी के लिए सब से आसान काम है दलितों व पिछड़ों को बेवकूफ बनाना, वह भी इस तरह कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. दलितों व आदिवासियों को संविधान बनने के समय और शूद्र व पिछड़ों को मंडल आयोग द्वारा मिला संवैधानिक आरक्षण सीधे खत्म करने का जोखिम उठाने से बच रही भाजपा इस थ्योरी पर चल रही है कि आरक्षण को कमजोर कर उस की अहमियत ही खत्म कर दो और ऐसे करो कि आरक्षित तबका भौचक्का, मुंह ताकता रह जाए कि आखिर हो क्या रहा है.
चुनावी साल में फूंकफूंक कर कदम रख रहे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अकसर अपनी छाती ठोंक कर कहते रहते हैं कि जब तक वे हैं, कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता. लेकिन दलितों के हितों
के दावे करते रहने वाले शिवराज सिंह चौहान आरएसएस की आरक्षण खत्म करो की मंशा पूरी करने के लिए जिन नएनए टोटकों का आविष्कार कर रहे हैं, सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र पहले 58 से 60 व अब 60 से 62 साल कर देना उन में से एक है.
इन दिनों रोज दर्जनों घोषणाएं कर चुनावी तैयारियों में जुटे शिवराज सिंह ने एक अहम फैसला यह लिया है कि अब राज्य में सरकारी कर्मचारियों के रिटायरमैंट की उम्र 62 साल होगी. यह घोषणा वाकई अहम है जिस से उन्होंने एक तीर से एक ही निशाना साधा है. उन की मंशा हर किसी की समझ में नहीं आ रही कि यह आरक्षण को कमजोर करने की साजिश है और इस का बड़ा असर दलित आदिवासियों व पिछड़े वर्ग के बेरोजगार नौजवानों पर पड़ेगा.
यह है घोषणा
रिटायरमैंट की उम्र बढ़ाने की घोषणा करने की देर थी कि राज्यभर के सरकारी कर्मचारियों में खुशी की लहर दौड़ गई. जगहजगह नारियल फोड़े गए और मंदिरों में प्रसाद चढ़ाया गया. जिन कर्मचारियों को 1 अप्रैल, 2018 को रिटायर होना था उन की नौकरी की मियाद 2 साल और बढ़ गई. वे 2 साल और ब्राह्मणश्रेष्ठों की तरह हलवापूरी खाएंगे और दक्षिणा ले कर जनजनार्दन को तृप्त करेंगे.
कहनेसुनने को तो यह चुनावी घोषणा है जिस के बारे में मीडिया और जानकारों ने तुरंत आंकड़े पेश कर दिए कि इस से क्याक्या प्रभाव पड़ेंगे. लेकिन हकीकत में इस घोषणा के माने कुछ और भी हैं जिस से मायूस आरक्षित वर्ग है जो समझ तो रहा है कि एक और धोखा सामाजिक समरसता के बाद दे दिया गया है, लेकिन वह कर कुछ नहीं पा रहा.
सेवानिवृत्ति की उम्र 62 साल कर देने से राज्य के 4 लाख 35 हजार सरकारी कर्मचारियों को फायदा मिलेगा. अगले 2 साल में राज्य के 33 हजार कर्मचारियों को रिटायर होना था जो अब 2020 तक नौकरी पर रहेंगे. इस फैसले से गलेगले तक कर्ज में डूबे मध्य प्रदेश के सरकारी खजाने के 6,600 करोड़ रुपए बचेंगे. रिटायर्ड कर्मचारियों को भविष्य निधि, बीमा और दूसरा पैसा दिया जाता, वह भी हालफिलहाल बच गया है.
दलील में भी छल
रिटायरमैंट की उम्र बढ़ाने में भी शिवराज सिंह चौहान ने बड़ी चालाकी से दलितों को ही ढाल की तरह इस्तेमाल किया है जिस से उन का दलित हितों का ढिंढोरा डपोर शंख नजर आने लगा है.
यह रही हकीकत
रिटायर होने से बच गए 4 लाख
35 हजार कर्मचारियों में से दलित कितने हैं, इस सवाल का ठीकठाक जवाब किसी के पास नहीं है. वजह, तमाम आंकड़ेबाजी में यह अहम आंकड़ा किसी ने पेश नहीं किया. सामान्य प्रशासन विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बात वाकई हैरान करने वाली है कि आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की तादाद 10 प्रतिशत के आसपास ही है यानी लगभग 45 हजार दलित और 3 लाख 90 हजार सवर्ण कर्मचारियों को फायदा होगा. पिछड़े तो नाममात्र के होंगे क्योंकि जब ये नौकरियां आती थीं तब तक मंडल आयोग की सिफारिशें लागू नहीं हुई थीं.
इस अधिकारी के मुताबिक, इस आंकड़े में अगर फर्क भी आया तो वह किसी भी सूरत में 2 फीसदी से ज्यादा नहीं होगा यानी फैसले से बड़ा फायदा सामान्य वर्ग के कर्मचारियों को होना तय है.
दरअसल, जो कर्मचारी रिटायर होने से बच गए उन में से अधिकांश की भरती 1980 के बाद हुई थी. नौकरियों में आरक्षण तब भी था पर उस दौर में आरक्षण का फायदा कम ही लोग उठा पा रहे थे. इस का सटीक उदाहरण आज भी आरक्षित वर्ग के खाली पड़े हजारों पद हैं जिन पर भरतियां हुई ही नहीं हैं.
दूसरा, तब पिछड़ा वर्ग आरक्षण के दायरे में नहीं आता था. उस की गिनती सामान्य वर्ग में ही होती थी. तब 10 फीसदी भी पिछड़े सरकारी नौकरी हासिल नहीं कर पाते थे. दोटूक कहा जाए तो लगभग 75 प्रतिशत ऊंची जाति वालों को इस फैसले का लाभ मिलना है.
उलट इस के, लगभग 50 फीसदी आरक्षित वर्ग के युवा बेरोजगार अब 2 साल तक और सरकारी नौकरियों से वंचित रहेंगे, क्योंकि जब कर्मचारी रिटायर ही नहीं होंगे तो पदों पर भरतियां भी नहीं होंगी.
और बढ़ेंगे दलित बेरोजगार
सवर्णों को तो शिवराज सिंह ने खुश कर दिया लेकिन बेरोजगारों की नाराजगी भी मोल ले ली. राज्य में बेरोजगारों ने बेरोजगार सेना के बैनर तले एकजुट हो कर इस फैसले का विरोध करते हुए इसे बेरोजगारी बढ़ाने वाला बताया जो एक कड़वा सच मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देशभर का है.
यह कम हैरत की बात नहीं कि इस बेरोजगारी की दोहरी मार भी उन दलित युवाओं पर ही ज्यादा पड़ने वाली है जो पढ़ाईलिखाई सरकारी नौकरी मिलने की उम्मीद में करते हैं. उलट इस के, सवर्ण युवा बड़ी तादाद में प्राइवेट सैक्टर में चले जाते हैं.
अधिकतर दलित गरीब होते हैं, इसलिए वे महंगी ऊंची शिक्षा नहीं ले पाते और न ही प्राइवेट सैक्टर में उन्हें आसानी से नौकरी मिलती है. एक दलित युवा निरंजन सिंह का कहना है कि बीई इलैक्ट्रौनिक्स करने के बाद उस ने प्राइवेट सैक्टर में नौकरी हासिल करने की कोशिश की, पर वह नहीं मिली. अब निंरजन भोपाल के अशोका गार्डन स्थित एक रैफ्रीजरेशन कंपनी में मामूली पगार पर काम कर रहा है और इंतजार कर रहा है कि कब सरकारी नौकरी की जगह निकले और वह कोटे से नौकरी पाए. निरंजन का एक डर यह भी है कि अगर 2 वर्षों में कोर्ट से मामला नहीं निबटा तो उस की नौकरी की अधिकतम उम्र निकल जाएगी.
तेजी से पढ़ते दलित बेरोजगारों की तादाद बढ़ने की वजह यह भी है कि राज्य सरकार ने साल 1998 के बाद नियमित नौकरियां देनी ही बंद कर दी हैं. 1998 में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने रिटायरमैंट की उम्र 58 से बढ़ा कर 60 साल की थी. उन्हें इस का खासा फायदा भी मिला था. तब सवर्ण कांग्रेस की तरफ झुके थे और दलित भी, क्योंकि 1998 में रिटायर होने वाले दलित कर्मचारियों की संख्या न के बराबर थी, लिहाजा, उन्हें कोई नुकसान इस फैसले में नजर नहीं आया था. दूसरा, 20 साल पहले दलित व पिछड़ा युवा आज की तरह ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था.
बहुजन संघर्ष दल के अध्यक्ष फूलसिंह बरैया कहते हैं, ‘‘अब दलित पढ़लिख रहा है और भाजपा का दोहरा चरित्र भी समझने लगा है.’’ आरक्षण में प्रमोशन को फूलसिंह बरैया एक धोखा व बहाना मानते हुए कहते हैं कि अगर वाकई शिवराज सिंह चौहान दलितों के प्रति इतने संवेदनशील और गंभीर हैं जितना वे खुद को बताते हैं तो अगले
2 वर्षों में रिटायर होने जा रहे कर्मचारियों की ही उम्र बढ़ाते पर चूंकि वे भी आरक्षण कमजोर करो मुहिम की टीम के मैंबर हैं, इसलिए उन्होंने सारी गाज दलितों पर गिरा दी है.
58 साल ही होना चाहिए
राजनीति से परे प्रशासनिक नजरिए से देखें तो भी रिटायरमैंट की उम्र 62 साल किया जाना कोई तुक की बात नहीं है. वजह सिर्फ इतनी नहीं कि सरकार युवाओं को नौकरियां नहीं दे पा रही, बल्कि यह भी है कि 25-30 साल की सरकारी नौकरी में कर्मचारी खासा पैसा बना लेता है.
सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह हर साल 3 बार महंगाई भत्ते और वेतनवृद्धि के जरिए बढ़ती है जो पद और तनख्वाह के हिसाब से औसतन 5 हजार से ले कर 20 हजार रुपए सालाना तक होती है. यह भार आखिरकार आम लोगों को ही ढोना पड़ता है. इस पर भी अगर रिटायरमैंट की उम्र बढ़ा दी जाए तो यह भी बोझ सरकार को नहीं, बल्कि आम लोगों ही उठाना पड़ता है.
दूसरा, 95 फीसदी सरकारी नौकरियों में ऊपरी कमाई भी कर्मचारियों को होती है. रिटायरमैंट की उम्र 58 साल होना इस लिहाज से भी ठीक है कि इस उम्र तक कर्मचारी हर लिहाज से सैटल हो जाता है.
रही बात हालिया फैसले की, तो रिटायरमैंट की उम्र बढ़ाया जाना सिर्फ चुनावी शिगूफा नहीं है बल्कि यह दलितों और पिछड़ों के पेट पर इस तरह लात मारने वाली बात है कि वह चिढ़ न पाए, बस, बेबसी से तिलमिला कर रह जाए.
विदिशा की एक दलित युवती नेहा अहिरवार का मत है कि भाजपा आरक्षण भले ही खत्म न करे, लेकिन उस का महत्त्व कम करने से चूक नहीं रही. अगर 2019 में भी वह सत्ता में आई तो दलितों के पर कतरने और अंगूठा काटने के लिए वह देशभर में शिवराज सिंह का यह फार्मूला लागू कर सकती है जिस के चलते दलित व पिछड़े युवाओं को नौकरी की गुंजाइश ही खत्म हो जाएगी और उन की हिम्मत व आस टूट जाएगी.
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उत्तर कोरिया के सनकी, सिरफिरे, बमबारी में तेजी दिखाने वाले तीसरी पीढ़ी के युवा तानाशाह किम जोंग उन से यह आशा नहीं थी कि पहले वे ट्रेन से बीजिंग जाएंगे और उस के तुरंत बाद दक्षिण कोरिया पहुंच जाएंगे और वह भी बेहद परिपक्वता व गांभीर्य के साथ.
द्वितीय विश्वयुद्घ में कोरिया जापान के अधीन आ गया था पर 1945 में जापान की पराजय के बाद रूस व अमेरिका ने कोरिया को अकारण 2 भागों में बांट दिया था. एक का नेता बने किम इल सुंग और दूसरे के ली बिओम सियोक. दोनों ने कोरिया को एक करने की कोशिश की पर उत्तर कोरिया चीन व रूस समर्थक कोरिया चाहता था जबकि दक्षिण कोरिया अमेरिका समर्थक.
1953 में बंद हुई लड़ाई के बाद दोनों के बीच वाकयुद्ध चालू है और किम इल सुंग की तीसरी पीढ़ी के किम जोंग उन ने भी परंपरा को कायम रखा. उत्तर कोरिया इस बीच गुप्तरूप से दुनियाभर से हथियार खरीदता रहा और आणविक बम भी बनाता रहा. उस की आणविक क्षमता व अब तक की नीति के चलते तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ने के खौफ से दुनिया भयभीत रही है.
पिछले कुछ महीनों में या तो डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों के कारण या फिर चीन के बेहद कुशल डिप्लोमैट शासक शी जिनपिंग के समझाने पर उत्तर कोरिया ने अपने तेवर ही ढीले नहीं किए, किम ने नया इतिहास भी रच डाला.
वे उत्तर कोरिया व दक्षिण कोरिया की सीमा तक गए और पैदल चल कर दक्षिण कोरिया में पहला कदम रखा, जहां दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे इन इंतजार कर रहे थे. चौंकाने वाली बात यह रही कि बिगडै़ल किम जोंग उन ने हाथ मिलाने के बाद मून को 9 इंच की सीमा की पटरी पार कर उत्तर कोरिया में आने को कहा. वहां दोनों नेताओं ने हाथ मिलाए, फोटो खिंचवाए.
किम जोंग उन ने शांति संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद मून से न केवल हाथ मिलाया, बल्कि उन के गले लग कर उन का अभिवादन भी किया. ये दोनों काम स्क्रिप्टेड नहीं थे यानी पहले से तय नहीं थे, लेकिन बेहद संतोष व आशा वाले हैं.
कोरियाई विभाजन क्या समाप्त होगा, यह कहना तो गलत होगा पर दुनिया एक संभावित खतरे से दूर हो गई है. उत्तर कोरिया बेहद गरीब है, लगभग भारत जैसा, जबकि दक्षिण कोरिया जापान जैसा समृद्ध है. बहरहाल, कई बार सिरफिरे नेता भी इतिहास रच डालते हैं, यह किम जोंग उन ने साबित किया है. किम ने यह भी मान लिया है कि एक भूभाग में रहने वालों को एकदूसरे के दुश्मन होने से समस्या का हल नहीं निकलता, जैसे पश्चिम जरमनी, पूर्व जरमनी या भारत, पाकिस्तान. भारत व पाकिस्तान के भूखे देशवासियों का अरबोंखरबों रुपया हर साल सेना पर खर्च होता है जबकि दोनों जानते हैं कि न एकदूसरे को हरा सकते हैं और न हरा कर कुछ पा ही सकते हैं.
उत्तर कोरिया को इतने साल कम्युनिस्ट धर्म ने अलग रखा. अगर उत्तर कोरिया में लोकतंत्र जल्दी आ जाता तो वह कहीं का कहीं होता. अब 65 साल पीछे रहने के बाद वह दक्षिण कोरिया से हमेशा पिछड़ा रहेगा पर मरे नेताओं को कब्र से निकाल कर तो सजा दी नहीं जा सकती.
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ओडिशा के कटक शहर में जन्मी गायिका, संगीतकार, गीतकार और निर्माता सोना महापात्रा एक जानीमानी परफौर्मर हैं. उन्होंने अलबम, संगीत वीडियो, विज्ञापनों के जिंगल्स और 14 भाषाओं में कई फिल्मों के 150 गाने गाए हैं. स्पष्टभाषी और दृढ़प्रतिज्ञ सोना और उन के म्यूजिक डायरैक्टर पति राम संपत ने साथ मिल कर अपना प्रोडक्शन हाउस ‘ओम ग्रोन’ खोला है. उन का शो ‘लाल परी मस्तानी’ रेड एफएम रेडियो का एक आकर्षक शो है. मुंबई के सांताक्रुज इलाके में उन के घर पर उन से मिलना हुआ. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के अंश :
‘लाल परी मस्तानी’ शो से जुड़ने की वजह क्या है?
यह एक रेडियो शो है. जहां गाने बजाए जाते हैं. हर शो में एक थीम महिलाओं की समस्या से जुड़ी हुई होती है और मैं उस पर बातचीत करती हूं. यह एक पुरानी कहानी है जो मुझ से जुड़ी हुई है. मुझे याद आता है एक बार मैं 15 साल पहले दिल्ली गई थी. मैं एक गैस्टहाउस में बैठी थी. वहां कई देशों के ट्रैवलर्स आए हुए थे. वहां एक टूरिस्ट लड़की अफगानिस्तान के बौर्डर साहवान से घूम कर आई थी. उस का कहना था कि वहां पर तालिबानी आतंक के चलते आज गानाबजाना बंद कर दिया गया है. महिलाओं को घर पर रहने को मजबूर कर दिया गया है. सब को बुरका पहना दिया गया है. वहीं एक महिला लाल रंग के कपड़ों में घूमती और गानाबजाना करती है और दरगाह में रहती है.
वहीं से मुझे एक आइडिया आया. मैं ने सोशल मीडिया पर ‘लाल परी मस्तानी’ के नाम से हैंडल भी बनाया है. इस के द्वारा मैं लोगों से जुड़ती हूं, जिस से वे समाज में कुछ अच्छा कर सकें. इस तरह मैं ने ‘लाल परी मस्तानी’ प्रोजैक्ट लौंच किया है, जहां पर मैं हर महीने गाने रिलीज करती हूं और उन के साथ विभिन्न विषयों पर चर्चा करती हूं. सोशल मीडिया पर पहले मीराबाई, फिर अमीर खुसरो और आगे कबीर को लाऊंगी.
इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा कैसे मिली?
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद एमबीए किया, लेकिन घर में कला का माहौल मैं ने बचपन से देखा है. मेरा सपना था कि मैं एक अच्छी परफौर्मर बनूं. मुझे औडियंस के साथ जुड़ने की बहुत तमन्ना थी फिर चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो. स्कूलकालेज में भी कई बार मंच पर गई हूं. मुझ में किसी स्थान की संस्कृति और लोगों के बारे में जानने की बहुत रुचि है. संगीत मेरा पैशन है. मैं ने 9 साल की उम्र से शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू कर दिया था और 3 से 4 गुरुओं से तालीम ली है. लेकिन मुंबई आ कर काम करना आसान नहीं था. मुंबई के बारे में मैं ने बहुतकुछ नकारात्मक बातें सुन रखी थीं. तभी मैं ने उस से हट कर कुछ अलग करने की सोची.
मैं ओडिशा की हूं और कई नई जगहों पर जा चुकी हूं. इसलिए हर जगह के बारे में जानकारी थी. मुंबई आने के बाद मैं ने नौकरी शुरू कर दी. इस के साथसाथ विज्ञापनों के जिंगल्स में काम करने लगी. काम करने से मुझे साथी कर्मियों का मानसिक रूप से बहुत सहयोग मिला. मैं हमेशा से आत्मनिर्भर थी और अब तक वैसी ही हूं.
पहली सफलता कब मिली?
मेरी हमेशा से इच्छा थी कि पहली सफलता मुझे अपने गाने से मिले और ऐसा हुआ भी. मुझे मेरे ही अलबम से कामयाबी मिली. अपनी शर्तों पर मैं ने उसे रिलीज किया था. यहां तक के सफर के बारे में बताएं?
मैं ने कोई फार्मूला नहीं बनाया था. जो जैसे आता गया, मैं करती गई. सब एकसाथ चलता रहा. अलबम बनाने में 2 साल लगे. उस दौरान लोगों से मिली और फिर फिल्मों में गाने गाए. प्रोड्यूसर बनी. ऐसे ही कारवां चलता गया. मेरी कोशिश रहती है कि हर दिन कुछ अच्छा काम करूं. मेरे अंदर जो प्रतिभा है उसे मैं ने बाहर निकालने की कोशिश की है. सिंगिंग, राइटिंग और किसी शो का निर्माण करना, यह सब मेरी मेहनत और लगन से संभव हुआ है. मुझे ये सब पसंद है, इसलिए समय का बंटवारा उसी हिसाब से कर लेती हूं. थकान होती है, पर पैशन की वजह से वह बाहर निकल जाती है.
क्या अब भी आप संघर्षरत हैं?
हां, संघर्ष यह है कि मैं अपनी प्रतिभा को दर्शकों के आगे पूरी तरह से लाना चाहती हूं, लेकिन मैं किसी रैट रेस में भागना नहीं चाहती.
क्या महिला होने की वजह से आगे बढ़ने में संघर्ष अधिक होता है? यह सही है कि आज भी महिलाओं के प्रति लोगों की सोच बदली नहीं है. कई जगहें तो और भी खराब हो चुकी हैं. बौलीवुड में पहले मंगेशकर बहनों के बिना कोई अलबम रिलीज नहीं होता था. अभी अवार्ड शो में केवल पुरुषों को ही संगीत के अवार्ड मिलते हैं, जबकि महिलाओं को बहुत कम.
महिला सिंगर बहुत हैं, लेकिन एकदो का ही नाम सामने आता है. पहले ऐसा नहीं था. इंडस्ट्री में कुछ आजादखयाल के लेखक और संगीतकार हुआ करते थे जो फिल्म द्वारा समाज में कुछ सुधार लाने की सोचते थे. अब फिल्म म्यूजिक में भी महिलाओं की आवाज बहुत कम सुनाई पड़ती है, जो गलत है.
आगे की क्या योजनाएं हैं?
अभी मैं लाल परी मस्तानी शो के अलावा एक फिल्म भी बना रही हूं और स्टेज शो करती हूं्. इन सब में मैं पूरे महीने व्यस्त रहती हूं. मेरी इच्छा बहुत है, पर जिसे हाथ में लिया है उसे अच्छी तरह पूरा करने की कोशिश कर रही हूं.
फिल्मों में गानों का स्तर घट रहा है, इसे कैसे देखती हैं?
पुराने गाने आज भी चलते हैं और अधिक दिनों तक ‘रिमिक्स’ का दौर नहीं चल सकता. नए गानों को लाना ही पड़ेगा.
परिवार का कितना सहयोग रहा?
मेरे पति राम संपत ने मुझे बहुत सहयोग दिया है. उन्होंने मुझे काम करने की पूरी आजादी दी है. हम दोनों एकसाथ बहुत काम करते हैं और एकदूसरे को सहयोग भी देते हैं. कामयाबी का श्रेय मैं अपने परिश्रम और अपने पति राम को देती हूं.
समय मिलता है तो क्या करती हैं?
समय मिलता है तो हर भाषा का लोक संगीत सुनती हूं. लाइट म्यूजिक बहुत सुनती हूं.
नए टैलेंट को इस क्षेत्र में आने के लिए क्या संदेश देंगी?
मुझे बुरा लगता है जब नए बच्चे जल्दी से सिंगर बनने की इच्छा रखते हैं. शौर्टकट कुछ नहीं होता. रिऐलिटी शो में जीतने पर भी आप कुछ अधिक नहीं कर पाते, मेहनत करनी पड़ती है.
सरिता के पाठकों को क्या संदेश देना चाहती हैं?
महिलाएं आत्मनिर्भर बनें. अपनी हर कामयाबी को खुद सैलिब्रेट करें, तभी वे अपने बच्चों को आगे बढ़ा सकती हैं. सहमी, डरी और त्याग करने वाली महिलाएं कभी कुछ नहीं कर पातीं.
VIDEO : हैलोवीन नेल आर्ट
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धर्म के नाम पर ढोंग, पाखंड और आडंबर के खेल में 4 दशकों तक जनता को मूर्ख बनाता रहा आसुमल सिरूमलानी उर्फ आसाराम बापू आखिरकार आजीवन सीखचों के पीछे चला गया. अदालत में साढे़ 4 वर्षों तक चली कार्यवाही में आसाराम के झूठ, पाखंड से आवरण हटा कर उसे बलात्कारी सिद्ध कर बेनकाब कर दिया गया.
यह फैसला उस समय आया है जब देश में चारों ओर धर्म, जातीय नफरत की फैली विषैली हवा का माहौल है और समूचा देश बच्चियों व महिलाओं के साथ हो रहे पाश्विक हमलों से आहत, उद्वेलित है. बच्चियों के यौनशोषण को ले कर धर्मों में तूतू मैंमैं हो रही है. असुरक्षा और अविश्वास के वातावरण के बीच जोधपुर की विशेष अनुसूचित जाति, जनजाति अदालत ने ढोंगी आसाराम को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने का फैसला सुना कर न्याय के प्रति एक नई आशा जगाई है.
15 अगस्त, 2013 की रात को आसाराम ने जोधपुर स्थित अपने आश्रम में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की लड़की के साथ यौन दुराचार किया. लड़की आसाराम के छिंदवाड़ा स्थित गुरुकुल में पढ़ती थी. उसे कुछ मानसिक परेशानी हुई तो स्कूल के निदेशक शरद चंद्र और वार्डन शिल्पी मिल कर उसे आसाराम के पास जोधपुर ले गए. उस के मातापिता को भी जोधपुर बुला लिया. कहा गया कि लड़की पर ‘बुरी आत्मा’ का फेर है, इस का इलाज किया जाएगा.
जोधपुर आश्रम में आसाराम ने उसे कुटिया में बंद किया. डेढ़ घंटे तक बंधक बना कर रखा. लड़की के मांबाप को बाहर बैठा कर रखा गया. बलात्कार किए जाने के बाद लड़की अपने मांबाप और भाई के साथ रवाना हुई तो रास्ते में उस ने मांबाप के गुरु यानी आसाराम की काली करतूत का खुलासा किया.
घिनौनी करतूत
पीड़िता ने अपने बयानों में जो कुछ बताया, अदालत ने 25 अप्रैल, 2018 को दिए अपने फैसले में उसे शामिल किया, ‘‘मैं जोधपुर के मणाई आश्रम में सीढ़ियों के पास बैठी हुई थी तो बापू ने पीछे वाले दरवाजे से इशारा कर के मुझे बुलाया. मैं आ गई तो बापू ने कहा कि जाओ, देख कर आओ कि तुम्हारे मम्मीपापा क्या कर रहे हैं. मैं ने जा कर देखा तो पापा चले गए थे, मम्मी गार्डन के गेट पर बैठी थीं. वापस आ कर मैं ने बापू को बताया कि मम्मी बैठी हैं और पापा चले गए हैं.
‘‘उस दौरान बापू ने पहले से ही रूम की लाइट बंद कर दी थी और वे बेड पर लेटे हुए थे. उन्होंने मुझे बेड पर अपनी साइड में बिठा लिया और फिर मेरा हाथ सहलाने लगे. उन्होंने मुझ से कहा कि पढ़लिख कर क्या करोगी. मैं तुम्हें वक्ता बना देता हूं. तुम समर्पित हो जाओ. हमारे साथ ही रहना. मैं तुम्हारी जिंदगी संवार दूंगा. फिर उठ कर उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया और बदतमीजी करने लगे.
‘‘जब उन्होंने अपने कपड़े उतार लिए, तो मैं चिल्लाई कि आप यह क्या कर रहे हो, तो उन्होंने मेरा मुंह दबा दिया और धमकाया कि जरा सी भी आवाज निकाली तो देखना, मैं क्या करता हूं. तुम्हारे मांबाप को मरवा दूंगा. तुम्हारा खानदान खत्म हो जाएगा.
‘‘फिर वे बदतमीज करने पर उतारू हो गए, कहा कि मेरे प्राइवेट पार्ट को छुओ और…करो.’’
पीडि़ता ने इस आशय के बयान दिए हैं कि आसाराम ने उस के प्राइवेट पार्ट और मुंह पर और सभी जगह किस किया. वह रो रही थी कि उसे छोड़ दो.
पीड़िता ने अपने बयान में आगे बताया कि उस ने आसाराम से कहा, ‘‘हम तो आप को भगवान मानते हैं. आप यह क्या कर रहे हो.’’
करीब सवा घंटे बाद आसाराम ने उसे छोड़ा और कहा कि अपने बाल व कपड़े ठीक कर लो, फिर जाना और किसी से कुछ मत बताना.
अदालत ने अपने फैसले में लिखा है कि पीड़िता इस घटना से शौक्ड रह गई. जिस आदमी को वह भगवान समझती थी उस ने उस के साथ ऐसी घिनौनी हरकत की. उस के कपड़े खोल डाले. वह कुछ सोच नहीं पा रही थी. जब वह कमरे से बाहर आई तो उस की मां गार्डन के गेट पर बैठी हुई थी. वह अपनी माता के साथ रूम में आ गई. उस की माता ने पूछा भी था कि क्या हुआ तो उस ने कहा कि अभी यहां से चलो. बापू अच्छा इंसान नहीं है.
जज ने फैसले में आगे लिखा है कि इस साक्ष्य से अभियोजन पक्ष आरोपित अपराध की आधारशिला साबित करने में सफल हुआ है. यह तय कानून है कि पीडि़ता का एकमात्र साक्ष्य ही अपराधी को दंडित करने के लिए पर्याप्त है, बस, सावधानी यह रखनी है कि बयान संदेह से परे और विसंगतियों से हीन हो. न्यायाधीश के अनुसार, उक्त साक्ष्य को किसी संपुष्टिकारक साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है. न्यायालय ने उपरोक्त साक्ष्य को देखते हुए यह तय किया कि अभियुक्त ने उस पर आरोपित अपराध किया ही होगा.
थाने पहुंचा मामला
लड़की ने मांबाप को सारी बात बताई तो पिता ने कहा कि वह बापू से पूछेगा कि आखिर उस ने ऐसा क्यों किया. लड़की के पिता कर्मवीर सिंह ने आसाराम के सहायक से पूछा कि बापू कहां है. सहायक ने बताया कि उन का 19 अगस्त को दिल्ली में सत्संग है.
मांबाप लड़की को ले कर दिल्ली आए. वहां आसाराम का सत्संग का पंडाल तो लगा था पर वह नहीं आया. इस पर उन्होंने दिल्ली के कमला मार्केट थाने में एफआईआर दर्ज कराई. पुलिस ने जीरो एफआईआर लिखी. पीडि़ता के बयान लिए और मैडिकल जांच कराई. बाद में जीरो एफआईआर जोधपुर ट्रांसफर कर दी गई. 31 अगस्त को जोधपुर पुलिस ने आसाराम को बड़ी हीलहुज्जत के बाद इंदौर से गिरफ्तार कर लिया.
लड़की के मातापिता आसाराम के अंधभक्त थे. ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय करने वाला लड़की का पिता आसाराम को खुलेहाथों दानदक्षिणा देता था. उस ने शाहजहांपुर में आसाराम के लिए एक आश्रम भी बनवा कर दिया था. आसाराम के प्रवचनों में यह परिवार नियमित जाता था.
तरहतरह के हथकंडे
आसाराम ने सजा से बचने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाए. शुरू में उस ने लड़की को झूठा बताया. कहा गया कि 50 करोड़ रुपए झटकने के लिए साजिश की गई है. साथ ही, लड़की के घर वालों पर समझौते के लिए दबाव बनाया. खुद की बीमारी का बहाना बनाया और स्वास्थ्य के झूठे प्रमाणपत्र पेश किए. सरकार और अदालतों पर दबाव डालने के लिए प्रदर्शन करवाए.
जमानत के लिए आसाराम व उस के अंधभक्तों द्वारा सुप्रीम कोर्ट तक को प्रभावित करने की कोशिशें की गईं. मामले को सांप्रदायिक रंग दिलाने के प्रयास किए गए. नेताओं से कहलवाया गया कि किसी हिंदू संत को ही क्यों फंसाया गया. सोनिया गांधी के इशारे पर फंसाने का आरोप लगाया गया. यहां तक कि आसाराम ने खुद को नपुंसक साबित करने की कोशिश भी की.
आसाराम पर जब बलात्कार का आरोप लगा तो भक्तों की फौज यह सच स्वीकार करने को तैयार नहीं थी. यह अराजकता का ऐसा नमूना है कि उस के जेल जाने और मुकदमा शुरू होते ही तमाम और मामले खुले, मामलों में गवाहों पर जानलेवा हमले भी शुरू हो गए. उन के एक निजी सहायक और आश्रम के एक विश्वासपात्र रसोइए समेत 3 गवाहों की हत्याएं भी कर दी गईं. कई और हत्याएं हुईं, कई गवाह लापता हुए.
आसाराम को बचाने के लिए दिल्ली से राम जेठमलानी, सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे नामी वकीलों को जोधपुर बुलाया गया. फिर भी उसे छुड़ाया नहीं जा सका. उस की जमानत के लिए 12 बार अर्जी लगाई गईं पर हर बार वे निरस्त कर दी गईं.
संतों की छवि को नुकसान
अपने फैसले में जज मधुसूदन शर्मा ने लिखा है, ‘‘अभियुक्त ने न केवल पीडि़ता का विश्वास तोड़ा, आम लोगों में संतों की छवि को नुकसान भी पहुंचाया. सजा देने का उद्देश्य समाज को सुरक्षित करना है और अभियुक्त को रोकना है. अपराध न केवल पीडि़त, बल्कि उस समाज के विरुद्ध भी है जिस से अपराधी और पीडि़त संबंध रखते हैं. उचित दंड नहीं दिया तो कोर्ट कर्तव्य से पथभ्रष्ट हो जाएगा.ॉ
फैसले में आगे लिखा है, ‘‘अभियुक्त के प्रति अवांछित सहानुभूति न्याय व्यवस्था को अधिक हानि पहुंचाएगी क्योंकि इस से जनता का विधि की व्यवस्था में विश्वास कम होगा. यदि न्यायालय क्षतिग्रस्त व्यक्ति को संरक्षित नहीं करेगा तो क्षतिग्रस्त व्यक्ति स्वयं बदला लेने के मार्ग पर चलेगा.’’
आश्रमों का साम्राज्य
देश में मौजूद आसाराम के 230 से ज्यादा आश्रमों में से कई विवादों में रहे हैं. खासतौर से सरकारी जमीन से ले कर आम लोगों की जमीन हथियाने के मामले सामने आए. गुजरात, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में तो शासन ने आश्रम से जमीनें छीन ली हैं.
गुजरात के मोटेरा आश्रम में 2008 में 2 मासूम चचेरे भाइयों दीपेश और अभिषेक वाघेला की लाशें नदी की तलहटी में मिली थीं. ये आसाराम के आश्रम में रहते थे. उन के मातापिता ने काला जादू के नाम पर हत्या की आशंका जताई थी. इस साल जनवरी में भी ओडिशा का एक साधक खून से लथपथ हालत में मृत मिला था.
2008 में ही छिंदवाड़ा के गुरुकुल में 2 छात्रों के शव बाथरूम में मिले थे. उस समय इस आश्रम को बंद करने की मांग उठी थी. जिस नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में आसाराम को सजा हुईर् है वह भी इसी गुरुकुल में पढ़ती थी.
70 के दशक में साबरमती तट के छोटे से आश्रम से निकल कर 19 देशों में 400 से अधिक आश्रमों, 4 करोड़ से ज्यादा भक्तों और 10 हजार करोड़ रुपए से भी अधिक की संपत्ति का स्वामी बना आसाराम ऐसा नाम है जो धर्म की डगर पर सरपट दौड़ता रहा. उस के आगे नतमस्तक बड़ेबड़े राजनेता, उद्योगपति और राजनीतिबाज उस की राह आसान बनाते रहे.
अहमदाबाद के मोटेरा में आसाराम ने एक कुटिया बनाईर् थी. कुछ समय बाद यहां आश्रम बन गया. इस के बाद राज्य सरकार उसे जमीन दान में देती रही.
80 से 90 के दशक के बीच कांग्रेस सरकार ने 14 हजार 500 वर्ग मीटर जमीन दान दी. 1997 से 1999 के बीच भाजपा सरकार उस पर मेहरबान हुई. उसे 23 हजार वर्ग मीटर जमीन और दे दी. इस के बाद 10 एकड़ जमीन दी गई.
इसी तरह मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड की सरकारों ने उसे जमीनें दीं. कई जगह तो जमीनें कब्जा ली गईं. छिंदवाड़ा में 10 एकड़ जमीन पर आश्रम है, यह जमीन किसी महिला की थी, जिस की हत्या के बाद इसे हड़प लिया गया. अहमदाबाद में एक किसान ने आसाराम पर 15 हजार गज जमीन कब्जाने का आरोप लगाया था. दिल्ली के रिज क्षेत्र में कई एकड़ में आश्रम बना कर सरकारी जमीन कब्जा ली गई, जिस का मामला अदालत में है.
इस तरह जमीन के बिना ही आसाराम की कुल संपत्ति करीब 10 हजार करोड़ रुपए आंकी गई. यह बात 2014 में उस के विभिन्न आश्रमों में छापों के दौरान बरामद दस्तावेजों से साबित हुई.
और भी हैं चाणक्य
ये ढोंगी लोगों को त्याग और आत्मसंयम की सीख देते हैं जबकि खुद महंगी गाडि़यों में घूमते हैं. आलीशान आश्रमों में रहने वाले इन ढोंगियों की फेहरिस्त लंबी है. इन में आसाराम, उस का बेटा नारायण साईं, निर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंह, राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर, इच्छाधारी बाबा भीमानंद उर्फ शिवमूर्ति द्विवेदी, स्वामी नित्यानंद, सच्चिदानंद उर्फ सचिन दत्ता शामिल हैं. ये बाबा स्वयं को भगवान बताने से परहेज नहीं करते.
पिछले कईर् सालों से हिंदुत्व को ले कर कारोबारी संतों, ज्योतिषियों और धर्म के तथाकथित संगठनों व राजनीतिबाजों ने हिंदुओं को पूरी तरह से गर्त में धकेल दिया पर हाल के दिनों में अदालतों की सख्ती से इन में से कइयों के ढोंग की पोलें खुली हैं.
कुछ दिनों पहले बाबा राम रहीम के आश्रम में चल रही काली करतूतों का काला चिट्ठा जगजाहिर हुआ था. हरियाणा की 2 लड़कियों ने राम रहीम पर बलात्कार का आरोप लगाया था. बाद में अदालत के आदेश पर उसे जेल भेज दिया गया. उस पर एक पत्रकार की हत्या का मामला भी दर्ज है. गुरमीत राम रहीम का साम्राज्य 700 एकड़ में फैला है.
दिल्ली के रोहिणी में आध्यात्मिक विश्वविद्यालय चलाने वाला कथित बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित शिष्या के साथ दुष्कर्म के आरोप के बाद से फरार है. कहा जाता है कि बाबा 16,800 लड़कियों के साथ यौनसुख पाना चाहता था ताकि ऐसा करने के बाद उसे सिद्धि मिल सके.
आश्रम के अंदर सुरंग में बने कमरे में वह लड़कियों को गुप्त प्रसाद देने के बहाने दुष्कर्म व अश्लील हरकतें करता था.
इस से पहले हरियाणा में सतलोक आश्रम के बाबा रामपाल का साम्राज्य तहसनहस हुआ था. उस पर भी महिलाओं के साथ यौनशोषण, हत्या जैसे कई मामले हैं.
ऐसी तमाम घटनाएं बताती हैं कि बाबागीरी इस देश में इतना बड़ा धंधा है जहां बिना किसी निवेश के भक्तों की फसल बोई जा सकती है और उसे बारबार काट कर मालामाल हुआ जा सकता है.
अंधभक्त दर अंधभक्त
मजे की बात है कि आसाराम, रामपाल, राम रहीम जैसे बाबाओं की गिरफ्तारी के बाद भी इन के अंधभक्तों की जरा भी कमी नहीं हुई. इन्हीं अंधभक्तों की अंधश्रद्धा का फायदा उठा कर ये ढोंगी बाबा और स्वयंभू संत हर गलत काम को अंजाम देने से नहीं चूकते.
देशभर में कुकुरमुत्तों की तरह फैले बाबाओं ने सामाजिक विभाजन का पूरा फायदा उठाया. 4 वर्णों में बंटी मानसम्मान की मारी हजारों जातियां, उपजातियां ऐसे लोगों के चंगुल में फंसा दी गईं. दलितों, पिछड़ों को ईश्वर, पूजापाठ, मंदिरों से दूर रखा गया. इन बाबाओं ने इन वर्गों के लोगों को बरगलाया और अपने आश्रमों से जोड़ा. शिष्य मूंडे़ गए. उन्हें प्रवचनों में बुलाया गया. इन जातियों को जोड़ कर धूर्त और चालाक लोग गिरोह बना कर स्वयंभू संत, गुरु हो गए.
अपनी बातों में फंसा कर ये ढोंगी लोगों को बरगलाते हैं. आसाराम जैसे लोगों की वाकपटुता की वजह से भोलेभाले लोग आसानी से उन की बातों में आ जाते हैं. ये तरहतरह की मोहमाया त्याग, स्वर्गनरक, पापपुण्य, दानदक्षिणा के बहाने बना कर लोगों से पैसे ऐंठते रहते हैं. ये लोगों की कमजोरियों का फायदा उठाने की कला बखूबी जानते हैं. आस्था के नाम पर भक्तों के साथ खिलवाड़ किया जाता है.
ये पाखंडी धर्म की मार्केटिंग की बारीकियां जानते हैं. अखबार, टैलीविजन, इंटरनैट के माध्यम से लोगों के दुखों का उपाय करने के लिए स्वयं का प्रचार करते हैं. अपने दुखपरेशानियों में उलझी जनता इन के झांसे में आसानी से आ जाती है.
आसाराम विरोध करने वालों को चुप कराने की अकसर कोशिश कराता रहा. ‘सरिता’ ‘गृहशोभा’ पत्रिकाओं में आसाराम के पाखंडों के खिलाफ जब कुछ लिखा जाता था, तो वह अपने अनुयायियों, खासतौर से महिलाओं को भेज कर कार्यालय में हंगामा करवाता था. संपादक व लेखकों को धमकियां दी जाती थीं.
फर्जी बाबाओं का साम्राज्य रातोंरात खड़ा नहीं होता. धीरेधीरे ये जनता के दुखदर्द की नस पकड़ते हैं. धर्र्म के नाम पर ऐश करने वाले ये बाबा जितने दोषी हैं उतने ही इन के भक्त हैं. राम रहीम की गिरफ्तारी के वक्त उस के अंधभक्तों ने पंचकूला में बवाल मचाया था, जिस से कई लोगों की जानें चली गईं. सरकारी कार्यवाही में बाधा डालने की कोशिशें की जाती रहीं. उसी तरह आसाराम की गिरफ्तारी से ले कर सजा सुनाए जाने तक उस के अधंभक्त धमकियां, हत्याएं, तोड़फोड़, धरनेप्रदर्शन करते रहे.
धर्म का धंधा ऐसा धंधा है, जहां बिना किसी प्रयास के बड़ेबड़े राजनीतिबाज और रईसों की फौज न सिर्फ अनुयायी बनी दिखती है बल्कि आसाराम सरीखे ऐसे फर्जी चरित्र वालों की ढाल बन कर खड़ी भी नजर आती है.
नरेंद्र मोदी का आसाराम बापू के चरणों में सिर झुका कर प्रणाम करता हुआ वीडियो आजकल बहुत चर्चित है. ये घटनाएं साबित करती हैं कि हमारा समाज किस तरह बाबाओं के सामने घुटने टेक कर बैठा हुआ है.
धर्मसंरक्षित यौनशोषण
दरअसल, यौनशोषण धर्र्म द्वारा संरक्षित है. धर्म की किताबों में देवताओं, अवतारों द्वारा स्त्रियों के साथ यौन संबंध बनाने, मौजमस्ती, ऐयाशी करने के किस्से भरे पड़े हैं. समाज की मानसिकता स्पष्ट है कि स्त्री दोयम दर्जे की है, पुरुष की अंकशायिनी बनना ही उस की नियति है. यही उस का धर्म है.
ग्रंथों में बलात्कार की अनगिनत कथाएं हैं. ब्रह्मा द्वारा अपनी पुत्री के साथ सहवास करना, ऋष्यशृंग, ऋषि पराशर द्वारा मछुआरे की बेटी के साथ, वेदव्यास द्वारा अंबिका, अंबालिका और दासी, महात्मा दीर्घतमा द्वारा सुदेष्णा और उन की दासी व अन्य ऋषियोंमुनियों द्वारा दूसरों की स्त्रियों व कन्याओं के साथ यौन संबंध बनाने की कहानियां भरी पड़ी हैं. ऐसे किस्से ढोंगी बाबाओं को ललचाते रहे हैं.
देखिए कुछ उदाहरण-
तत: कालेन महता मेनका परमाअप्सरा:,
पुण्करेषु नरश्रेष्ठ स्नातुं समुपचक्रमे.
तां ददर्श महातेजा मेनका कुशिकात्मज:,
रूपेणाप्रतिभा तत्र विद्युत जलदे यथा.
दृष्टवा कंदर्पवशमो मुनिस्तामिदमब्रवीत्,
अप्सरास्स्वागत तेअस्तु वस चेह ममाश्रमे.
अनुगृहीष्व भद्रं ते मदनेन सुमोहितम्.
(वाल्मीकि रामायण 1/63/4,5,6)
अर्थात बहुत समय बीत जाने पर मेनका नाम की परम सुंदरी अप्सरा पुष्कर में स्नान करने आई. महातेजस्वी विश्वामित्र ने कुशिक की पुत्री मेनका को देखा. अद्वितीय रूप वाली मेनका बादलों में बिजली के समान मालूम पड़ती थी. विश्वामित्र ने कामभावना के वशीभूत हो कर उस से कहा, ‘‘हे अप्सरा, तुम्हारा स्वागत है. तुम यहां आश्रम में रहो. मुझ काम मोहित पर तुम कृपा करो.’’
पराशर ऋषि ने सत्यवती से बलात्कार किया. पराशर सत्यवती के रूपसौंदर्य़ पर आसक्त हो गए और बोले, ‘‘देवी, मैं तुम्हारे साथ सहवास करना चाहता हूं.’’ सत्यवती ने कहा, ‘‘मुनिवर, आप ब्रह्मज्ञानी हैं और मैं निषाद कन्या. हमारा सहवास संभव नहीं है. मैं कुंआरी हूं, मेरे पिता क्या कहेंगे.’’ पराशर मुनि बोले, ‘‘बालिके, तुम चिंता मत करो. प्रसूति होने पर भी तुम कुंआरी ही रहोगी.’’ पराशर ने फिर मांग की तो सत्यवती बोली, ‘‘मेरे शरीर से मछली की दुर्गंध निकलती है.’’ तब उसे आशीर्र्वाद देते हुए पराशर ने कहा कि तुम्हारे शरीर से जो मछली की गंध निकलती है वह सुगंध में परिवर्तित हो जाएगी. इतना कह कर पराशर ने अपने योगबल से चारों ओर घने कोहरे का जाल रच दिया ताकि कोई उन्हें उस हाल में न देखे. इस प्रकार पराशर ने सत्यवती के साथ दैहिक संबंध कायम किया.
इसी तरह वेदव्यास द्वारा अंबिका, अंबालिका और उन की दासी के साथ यौन रिश्ते बनाए गए. इस से धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर पैदा हुए.
लिखा है-
किं तु मातु: स वैगुण्यात् अंध एवं भविष्यति,
तस्य तद् वचनं शृवा माता पुत्रमथाब्रवीत. 10
नांघ: कुरुणां नृपतिरनुरूपस्तपोधन,
ज्ञाति वंशस्य गोप्तारे पितृणां वंशवर्द्धनम्. 11
द्वितीयं कुरुवंशस्य राजानं दातुमर्हसि,
स तथेति प्रतिज्ञाय निश्चक्राम महायशा:. 12
(महा. आदि पर्व, अध्याय 105)
सत्यवती ने व्यास से पुत्र उत्पन्न करने का अनुरोध पांडुवंश की सुरक्षा के लिए किया था. पहला पुत्र अंधा होने की आशंका थी, तो सत्यवती ने कहा कि अंधा बालक कुरुवंश का राजा नहीं हो सकता. ऐसा दूसरा पुत्र दो जो जाति तथा वंश की रक्षा करे. व्यास ने माता की बात मान ली.
ततोनिष्क्रांतमालोक्य सत्या पुत्रमथाब्रवीत,
शशंस स पुनर्मात्रे तस्य बालस्य पांडुताम्. 19
तं माता पुनरेवान्यमेकं पुत्रमयाचत्,
तथेति च महर्षिस्तां मातरं प्रत्यभाषत्. 20
(महा. आदि पर्व अध्याय 105)
दूसरी बार व्यास सहवास कर के निकले तो सत्यवती ने होने वाले बालक के विषय में पूछा. व्यास ने उसे पांडु रंग का बताया तो माता ने एक और बालक के लिए कहा और व्यास मान गए.
तीसरी बार जब व्यास गए तो अंबालिका ने स्वयं न जा कर व्यास के पास अपनी दासी भेज दी. व्यास ने उसे दासी जान कर भी उस से सहवास किया और प्रसन्न हो कर उसे दासीपन से मुक्त कर दिया.
इसी तरह महाभारत में भीष्मसत्यवती संवाद में दीर्घतमा मुनि द्वारा सुदेष्णा और उस की शूद्र दासी के साथ सहवास करने की कथा भी है.
कथा के अनुसार, सुदेष्णा दीर्घतमा धर्मात्मा को अंधा और बूढ़ा समझ कर उन से सहवास करना नहीं चाहती थी और उस ने अपनी शूद्र दासी को उस के पास भेज दिया. दीर्घतमा ने दासी को शूद्र समझते हुए भी कामुकता पूरी की और काक्षीवद् आदि 11 पुत्र उत्पन्न किए.
वाल्मीकि रामायण में कहा गया है-
देवतानां प्रतिज्ञाय गंगामभ्येत्य पावक:,
गर्भ धारय वै दैवि देवतानामिदं प्रियम्
समंततस्य देवीमभ्यषिंचत पावक:,
तमुवाच ततो गंगा सर्वदेवपुरोगमम्.
शक्ता धारणे देव तेजस्तव समुद्धतम्,
गंगा तं गर्भमतिभास्वरम्.
उत्ससर्ज महातेजा: स्रोतेभ्यो हि तदानद्य,
निक्षिप्त मात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरंजितम.
तं कुमारं ततो जातम्.
अर्थात देवताओं के पास प्रतिज्ञा कर के अग्नि देवता गंगा के पास आया और बोला, ‘‘हे देवी, तुम मुझ से गर्भधारण करो. देवताओं की इच्छा है.’’ तब अग्नि ने उसे गर्भधारण कर दिया. वह उस के तेजोमय गर्भ को धारण करने में कठिनाई अनुभव करने लगी. गंगा ने उस गर्भ को फेंक दिया. उस के फेंकने पर एक तेजस्वी बालक पैदा हुआ.
श्रीमद्भागवत पुराण की एक कथा में कहा गया है कि उतथ्य की गर्भवती पत्नी के साथ बृहस्पति ने बलात्कार किया और उस के वीर्य से भरद्वाज नामक पुत्र उत्पन्न हुआ. बाद में यही भरद्वाज एक बार गंगा स्नान को गया तो वहां कपड़े बदल रही घृताचि नामक अप्सरा को देख कर स्खलित हो गया. शरद्वान ऋषि भी जानपदी नाम की अप्सरा को कम कपड़ों में देख कर वीर्यपात कर बैठे जिस से कृप नामक बालक पैदा हुआ.
पुराणों के अनुसार, बहलाफुसला कर या जबरन स्त्रियों के साथ ऋषियों, मुनियों द्वारा संबंध बनाना बलात्कार नहीं माना जाता था. आसाराम, राम रहीम, रामपाल, वीरेंद्र देव दीक्षित जैसे लोग तो इसी धर्म के प्रतीक हैं. यह वही प्रवृत्ति है जो स्त्रियों के प्रति सदियों से पुराणों में चरितार्थ होती आई है. ये लोग आधुनिक चरित्र हैं जिन्हें स्त्रियों के शोषण का धार्मिक हक प्रदान था. पौराणिक काल में राजा ऐसे ऋषियों को भूमि, धनसंपत्ति और कन्याएं दे कर कृतार्थ होते रहे.
आज के बाबा
आधुनिक साधु और बाबा आज अगर बलात्कार के मामलों में लिप्त पाए जाते हैं तो आश्चर्य कैसा? ये लोग धार्मिक किताबों की कथाओं का फायदा उठाते आए हैं. अपने प्रवचनों में और स्त्रियों को बहलाफुसला कर बिस्तर पर लाने के लिए ऐसी कहानियों का भरपूर इस्तेमाल करते हैं. ये खुद को ईश्वर का अवतार बता कर स्त्रियों को राजी करने में कामयाब हो जाते हैं. इसी वजह से कथित चमत्कारी बाबाओं और स्वयंभू भगवानों द्वारा स्त्रियों के शोषण के किस्से हमेशा से प्रकाश में आते रहे हैं.
सोचने की बात है कि हम किस तरह के समाज में रह रहे हैं. हमारे ज्ञान पर हमें शर्मसार होना चाहिए. हमारा ज्ञान लज्जित नहीं हो रहा? तमाम वैज्ञानिक तरक्की के बावजूद विज्ञान की धज्जियां उड़ रही हैं. अज्ञान का अंधकार चारों ओर दिख रहा है.
सवाल है कि क्या आसाराम, राम रहीम, रामपाल के साथ धर्म का यह घिनौना ढोंग आजीवन कैद हो गया है? नहीं, जब तक इस देश में लोग धर्म, साधुसंत, गुरु, प्रवचकों में सुख, समृद्धि, शांति, ऐश्वर्य तलाशते रहेंगे, तब तक नए आसाराम, रामपाल, रामरहीम पैदा होते रहेंगे और लोगों को ठगते रहेंगे, स्त्रियों का यौनशोषण करते रहेंगे.
हाल के दशकों में कितने ऐसे साधु या बाबा हुए जिन्होंने कोई सुधार या जनजागृति का काम किया हो? कहां हैं धर्म की अच्छाइयों का बखान करने वाले नेता और हिंदू धर्र्म के संगठन? जो संगठन और उन के कार्यकर्ता हाथों में भगवा झंडा और सिर और कंधे पर भगवा दुपट्टा डाले धर्म की अलख जगाते सड़कों पर घूमते नजर आते हैं क्या वे पहले हिंदू धर्म की इस भीतरी गंदगी को साफ करने का बीड़ा उठाएंगे?
क्या अब ऐसे तमाम बाबाओं, साधुसंतों, गुरुओं के खिलाफ समाज को उठ खड़े होने का वक्त नहीं आ गया? इन के विरुद्ध क्रांति की आवश्यकता नहीं है? क्या अभी भी समाज को और ठगे जाने की घटनाओं का इंतजार है?
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पिछले दिनों फेसबुक डाटा लीक की वजह से फेसबुक और मार्क जुकरबर्ग की बहुत किरकिरी हुई. लेकिन, मार्क जुकरबर्ग ने अपनी गलती स्वीकारते हुए फेसबुक में बड़े बदलाव का ऐलान किया. फेसबुक सोशल नेटवर्किंग साइट्स में सबसे बड़ा प्लेटफौर्म है. जिसके दुनिया भर में करीब 2.2 बिलियन डौलर यूजर्स हैं.
फेसबुक संस्थापक जुकरबर्ग ने जब यह प्लेटफौर्म शुरू किया था शायद उन्होंने भी इसके इतने बड़े होने की कल्पना नहीं की होगी. जुकरबर्ग को लेकर काफी बातें मशहूर हैं. लेकिन, उनकी कुछ बाते ऐसी भी हैं, जिन्हें सुनकर शायद विश्वास भी न हो. दुनिया के अमीरों में शामिल जुकरबर्ग बेहद कंजूस हैं और वह कलर ब्लाइंड भी हैं. जी हां, आज उनके जन्मदिन पर हम आपको उनसे जुड़े कुछ ऐसे ही फैक्ट्स की जानकारी दे रहे हैं.
‘कंजूस‘ जुकरबर्ग
साल 2012 में अपनी शादी के वक्त मार्क जुकरबर्ग कई लोगों की नजर में कंजूस बन गए थे. दरअसल, हुआ यह था कि उन्होंने अपनी पत्नी प्रिसिला चान को केवल 25,000 डौलर की एक रूबी वेडिंग रिंग गिफ्ट की थी, जबकि उस समय उनके पास 19 अरब डौलर से ज्यादा की संपत्ति थी. इसी वजह से सोशल मीडिया पर जुकरबर्ग का खूब मजाक उड़ाया गया और इस गिफ्ट को लेकर लोगों ने उन्हें कंजूस तक करार दिया.
ऐसे शुरू हुई थी लवस्टोरी
जुकरबर्ग और उनकी पत्नी प्रिसिला चान की पहली मुलाकात साल 2003 में बाथरूम की लाइन में इंतजार करते हुए हुई थी, जब वे हार्वर्ड फ्रेटरनिटि पार्टी में गए थे. इसी मुलाकात से उनकी लव स्टोरी शुरू हुई जो शादी तक पहुंची.
कलर ब्लाइंड
जुकरबर्ग कई इंटरव्यू में बता चुके हैं कि वे कलर ब्लाइंड हैं. उन्हें लाल और हरा रंग देखने में दिक्कत होती है, जबकि नीला रंग अच्छे से दिखाई देता है. इसी वजह से फेसबुक की साइट पर ब्लू कलर का इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया गया है.
ठुकरा दी थी माइक्रोसौफ्ट की नौकरी
जुकरबर्ग को हाईस्कूल के दौरान ही माइक्रोसौफ्ट और AOL जैसी नामी कंपनियों से नौकरी औफर हो गई थी. उस वक्त जुकरबर्ग ने ऐसा प्रोग्राम बनाया था, जिसमें आर्टिफिशल इंटेलीजेंस के जरिए यूजर की म्यूजिक सुनने की आदतों का पता लगाया जा सकता था. इसी वजह से उन्हें नौकरी के ये औफर मिले थे, लेकिन उन्होंने स्वीकारने से इनकार कर दिया.
पहनते हैं एक ही तरह के कपड़े
मार्क जुकरबर्ग अधिकतर समय ग्रे कलर की टीशर्ट पहने दिखते हैं. इसे लेकर उनका कहना है कि वे क्या पहनते हैं इससे ज्यादा जरूरी ये बात है कि वो क्या करते हैं. जुकरबर्ग को सुबह-सुबह अपना समय कपड़े ढूंढने में खराब करना बिल्कुल पसंद नहीं है.
साल भर पहनी केवल एक टाई
मार्क जुकरबर्ग ने साल 2009 में पूरे साल केवल एक ही टाई पहनी थी, क्योंकि वे अपने इंवेस्टर्स को दिखाना चाहते थे कि मंदी के बाद भी फेसबुक अपनी तरक्की को लेकर बेहद सीरियस है.
केवल शाकाहारी ही खाते हैं
मार्क जुकरबर्ग पूरी तरह से शाकाहारी हैं. उनका कहना है कि वे नौनवेज खाना केवल तभी शुरू कर सकते हैं, जब वे किसी जानवर को खुद मारने की हिम्मत जुटा पाएंगे. चूंकि उनमें ऐसी हिम्मत नहीं है, इसलिए उन्होंने शाकाहारी बनने का ही निश्चय किया.
चार साल से एक भी ट्विट नहीं
जुकरबर्ग फरवरी 2003 से ट्विटर पर हैं और जनवरी 2018 तक यहां उनके 5 लाख 56 हजार फौलोअर्स भी हो चुके हैं. लेकिन इसके बाद भी अबतक उन्होंने केवल 19 ट्विट ही किए हैं. आखिरी बार उन्होंने 18 जनवरी 2012 में ट्विट किया था.
फेसबुक पर बनी फिल्म नहीं आई पसंद
साल 2010 में फेसबुक की कहानी को लेकर एक फिल्म बनी थी, जिसका नाम था ‘द सोशल नेटवर्क’. जुकरबर्ग इसे देखकर जरा भी खुश नहीं हुए क्योंकि फिल्म में उनकी छवि को इस तरह से दिखाया गया था जैसे उन्होंने फेसबुक का इन्वेंशन सोशल स्टेटस पाने के लिए किया हो.
जुकरबर्ग के डौगी का भी है FB पेज
मार्क जुकरबर्ग के पास हंगेरियन नस्ल का एक डौग भी है जिसका नाम बीस्ट है. इसके नाम पर भी जुकरबर्ग ने एक फेसबुक पेज बना रखा है. जनवरी 2018 तक बीस्ट के फेसबुक पेज को 27 लाख से ज्यादा लोग लाइक कर चुके थे.
VIDEO : हैलोवीन नेल आर्ट
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