देश की समस्याएं हर रोज और ज्यादा उलझती लग रही हैं और ऐसा लगता नहीं कि देश की व्यवस्था जिन राजनीतिबाजों और नौकरशाहों के हाथों में है वे इन्हें सुलझाना जानते हैं या चाहते हैं. देश अगर सोचे कि सर्वोच्च न्यायालय, सीएजी (महालेखा परीक्षक), चुनाव आयुक्त, स्वतंत्र प्रैस जैसी संस्थाएं कुछ कर सकती हैं तो वह गलत है. ये संस्थाएं सरकार के कामकाज पर नजर रखने के लिए हैं, समस्याओं को हल करने में सरकार को सहयोग देने के लिए नहीं.

देश की अधिकांश समस्याओं के बारे में आम जनता की बढ़ती उदासीनता इन समस्याओं के विकराल रूप लेने की जड़ है. आम जनता अब तमाशबीन बनती जा रही है. वह समस्याओं के बारे में केवल उतना जानतीसमझती है जितना उसे सीधेसीधे महसूस होता है. आज प्याज के दाम बढ़ गए हैं, सड़कें टूट गई हैं, पार्किंग की जगह नहीं मिल रही है जैसी समस्याओं के बारे में जनता भुक्तभोगी तो होती है पर उस पर किया क्या जाए, यह न वह समझती है न समझने में रुचि रखती है.

नेता और अफसर, जो इस जनता, जो खुद अर्धशिक्षित, अर्धसूचित होती है, में से निकलते हैं या इस से वास्ता पड़ता है, उन अंधों की तरह होते हैं जो जानवरों की भीड़ में हाथी, घोड़े, जेबरा, सांप को पहचानने की कोशिश कर रहे लगते हैं.न उन्हें कोई बताने वाला है, न कोई रोकने वाला.

अति शक्तिशाली माना जाने वाला मीडिया केवल इन विकराल समस्याओं के अंश भर को छूता है. मीडिया को लगने लगा है कि जनता की खुद की इन समस्याओं में कोई रुचि नहीं है. आज मीडिया के रूप में जो दिख रहे हैं वे सैंसेशनलिज्म या तमाशबीनी को ही जनता की रुचि समझते हैं और नतीजा यह है कि वे इन समस्याओं को सतही तौर पर लेते हैं.

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल

(1 साल)
USD99USD49
 
सब्सक्राइब करें

सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
  • देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
  • 7000 से ज्यादा कहानियां
  • समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
 

डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
USD150USD129
 
सब्सक्राइब करें

सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
  • देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
  • 7000 से ज्यादा कहानियां
  • समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
  • 24 प्रिंट मैगजीन
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...