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गुरुओं की दुकानदारी चलाने के लिए महिमामंडन ‘गुरुगीता’ में

हमारा एक वर्गविशेष प्राचीन गुरुशिष्य प्रणाली को वैकल्पिक प्रणाली के तौर पर प्रस्तुत करता रहता है और उस के प्रति अपनी भावुकतापूर्ण ललक व्यक्त करता है.

गुरुशिष्य प्रणाली के प्रामाणिक दस्तावेज की खोज में ‘गुरुगीता’ नाम की एक पुस्तक पिछले दिनों दिखी. यह इस पुस्तक का 1986 में छपा 5वां संस्करण है. इस से पहले इस का तीसरा संस्करण 1920 में प्रकाशित किया गया था. दूसरा संस्करण 1920 से पूर्व छपा होगा.

यह 221 श्लोकों की पुस्तक है, भारतधर्म महामंडल, वाराणसी से छपी है.

इस में गुरु और शिष्य के संबंधों पर महादेवपार्वती के संवाद के रूप में बहुत विस्तार से प्रकाश डाला गया है.

माहात्म्य में ही कह दिया गया है कि इस किताब की एक प्रति दान करने से सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, इस के पाठ से गरीबी दूर होती है, बड़ेबड़े रोग ठीक हो जाते हैं, संपत्तियां प्राप्त होती हैं, बंध्या नारी के पुत्र पैदा हो जाता है और विधवा होने की आशंका दूर हो जाती है, पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा मिल जाता है आदि.

इदं तु भक्तिभावेन पठ्यते श्रूयतेऽथवा, लिखित्वा वा प्रदीयेत सर्वकालफलप्रदम्.

205

इस गुरुगीता को जो भक्तिपूर्वक पढ़ता, सुनता या लिख कर दान करता है, उस की सब प्रकार की कामनाएं पूरी होती हैं.

सर्वपापहरं स्तोत्रं सर्वदारिद्र्यनाशनम्,

अकालमृत्युहरणं सर्वसंकटनाशनम्.

208

यह गुरुगीता सब प्रकार के पापों का नाश करती है, सब प्रकार की गरीबी को दूर करती है, असमय होने वाली मृत्यु का निवारण करती है और सब संकटों को नष्ट करती है.

सर्वशांतिकरं नित्यं वन्ध्यापुत्रफलप्रदम्,

अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं परम्.

213

इस के पाठ से सब पाप/दुष्ट ग्रह आदि शांत होते हैं, बांझ औरत को भी पुत्र की प्राप्ति होती है, स्त्रियों के विधवा होने की आशंका दूर होती है और परम सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

आयुरारोग्यमैश्वर्यपुत्रपौत्रादिवर्धकम्,

निष्कामतस्त्रिवारं वा जपन्मोक्षमवाप्नुयात्.

214

निष्काम भाव से इस का थोड़ा सा पाठ करने पर आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, पुत्र, पौत्र आदि की वृद्धि होती है और इस का 3 बार जप करने से मोक्ष प्राप्त हो जाता है.

शुचिदेव सदा ज्ञानी गुरुगीताजपेन तु,

यस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते.

220

ज्ञानी मनुष्य गुरुगीता का पाठ करने से सदा पवित्र रहते हैं. ऐसे पवित्र मनुष्यों के दर्शन करने से पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा मिल जाता है.

गुरु का अर्थ

गुरु शब्द का अर्थ बताते हुए गुरुगीता कहती है कि ‘गु’ शब्द का अर्थ अंधकार है और ‘रु’ शब्द का अर्थ है उसे रोकने वाला :

गुशब्दस्त्वंधकार: स्याद् रुशब्दस्तन्निरोधक:

अंधकारनिरोधित्वाद् गुरुरित्यभिधीयते.

15

‘गुरु’ शब्द का अर्थ अंधकार है और ‘रु’ शब्द का अर्थ उस को रोकने वाला. अंधकार को रोकने या दूर करने वाले को ‘गुरु’ कहते हैं.

लगता है गुरुगीता को अपने इस मनगढं़त अर्थ पर स्वयं भी विश्वास नहीं है. इसलिए  उस ने श्लोक 16 में इन्हीं शब्दों को तोड़मरोड़ कर एक नया अर्थ निकाल कर फिर से भरमाने की कोशिश की है :

गकार: सिद्धिद: प्रोक्तो रेफ:

पापस्य दाहक:,

उकार: शंभुरित्युक्तास्त्रियाऽऽत्मा

गुरु: स्मृत:.                       16

‘ग’ 6गकार8 का अर्थ है ‘सिद्धि देने वाला’, ‘र’ 6रकार8 का अर्थ है ‘पापों को दूर करने वाला’ और ‘उ’ 6उकार8 का अर्थ है ‘शिव’  अर्थात गुरु का अर्थ है, सिद्धिदाता शिव पापहर्ता शिव.

एक अन्य श्लोक में कहा है-

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुगुरुर्देवो महेश्वर:,

गुरु: साक्षात् पर ब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:.

147

अर्थात गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु शिव है. गुरु परंब्रह्म है.

लगता है सदियों से गुरुओं के बारे में लोगों को संशय रहा है और हर ग्रंथ में गुरु महिमा इसीलिए गाई गई है कि यह संशय दूर रहे.

गुरु केवल ब्राह्मण

श्लोक नं. 34 कहता है, ‘गुरु’ केवल ब्राह्मण हो सकता है, यह पद उस के लिए गुरुगीता ने आरक्षित घोषित कर रखा है. शिष्य भी ऐरागैरा नहीं बन सकता. वह भी ‘कुलीन’ होना चाहिए. अर्थात यह सारा ऊंची जातियों का खेल है क्योंकि शूद्र के लिए शिक्षा का कहीं विधान ही नहीं है. शूद्र ‘कुलीन’ कैसे हो सकता है? क्षत्रिय व वैश्य शामिल हों तो भी आश्चर्य होगा. प्राचीन गुरुशिष्य प्रणाली ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मणों की शिक्षा के लिए बनाई गई थी.

आज यदि उस गुरुशिष्य प्रणाली को निहित स्वार्थी तत्त्व लागू कर या करवा देते हैं तो हमारी शिक्षा की सब समस्याएं, आरक्षण मांगने वालों के आंदोलन, पढे़लिखे बेरोजगारों का संकट आदि पलक झपकते ही खत्म हो जाएंगे, क्योंकि तब पढ़ ही कुछ प्रतिशत जनसंख्या वाली उच्च जातियों के सदस्य सकेंगे. बाकी जब पढ़ ही नहीं पाएंगे, तब कैसा आरक्षण.

शिष्य का अर्थ

शिष्य के लिए जरूरी है कि वह आस्तिक हो अर्थात उस का दिमाग खुला नहीं, बंद होना चाहिए. वह सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हो.

शरीरमर्थं प्राणांश्च गुरुभ्यो य: समर्पयन् ,

गुरुभि: शिष्यते योगं स शिष्य इति कथ्यते.

54

गुरु के लिए शरीर, धन और प्राणों तक को अर्पित कर दे क्योंकि वह गुरु से शिक्षा प्राप्त करता है, इसलिए ‘शिष्य’ कहलाता है.

पत्नी भी गुरु को अर्पित

गुरुगीता बात यहीं नहीं खत्म करती, बल्कि यह भी कहती है कि शिष्य अपनी पत्नी भी गुरु को अर्पित करे :

आत्मदाराऽऽदिकं सर्वं गुरवे च निवेदयेत्.

55

अपनी पत्नी आदि सबकुछ गुरु को अर्पित करें.

इस के बाद शिष्य को खानेपीने के बारे में गुरुगीता का आदेश है कि वह गुरु के पैरों का धोवन पिए तथा उस का जूठा बचा खाना खाए :

गुरुपादोदकं पेयं गुरोरुच्छिष्टभोजनम्,

57

गुरु के पैरों को जिस पानी से धोया जाए, उसे पिए तथा गुरु का जूठा बचा खाना खाए.

यह मर्ज दवा से बेहतर है

जो लोग आज प्राचीन गुरुशिष्य प्रणाली को लाने के लिए चिल्ला रहे हैं, क्या उन के बच्चे ये सब करने को तैयार होंगे या यह सिर्फ गरीबों, दबे व कुचले लोगों और सदियों से अधिकारवंचितों के बच्चों के लिए ही प्रस्तावित किया जाएगा?

गुरु के पैर दबाने की गुरुगीता में बहुत महिमा गाई गई है :

सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरो: पादसेवनात्,

सर्वतीर्थावगाहस्य फलं प्राप्नोति निश्चितम्.

169

गुरु के पैर दबाने से सब पाप नष्ट हो जाते हैं. जितना फल सब तीर्थों में नहाने पर मिलता है, वह सब गुरु के पैर दबाने वालों को मिलता है.

इसी तरह की महिमा गुरु के पैरों का धोवन पीने की भी गाई गई है :

सप्तसागरपर्यंत तीर्थस्नानादिकै: फलम्,

गुरोरंघ्रिपयोबिंदुसहस्रांशेन दुर्लभम्.

161

सात समुद्रों तक जितने तीर्थ हैं, उन में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, गुरु के पैरों की धोवन की एक बूंद पीने से उस से हजारगुना ज्यादा फल प्राप्त होता है.

यद्यपि गुरु को शिव, ब्रह्मा आदि कहा गया है और उसे इंसान के रूप में देखने वाले को नरकगामी घोषित किया गया है तथापि यह कटु यथार्थ है कि वास्तव में वह एक इंसान ही रहता है.

इसीलिए गुरुगीता ने शिष्य को आदेश दिया है कि वह यदि गुरु को कोई बुरा काम करता देखे या गुरु कोई बुरा काम उसी (शिष्य) से करे तो शिष्य का कर्तव्य है कि उस की बाबत कभी मुंह न खोले, उस के बारे में अंधा और गूंगा ही नहीं बना रहे, बल्कि बहरा भी बन जाए :

दुष्कृतं न गुरोर्ब्रूयात्,

परिवादं न शृणुयादन्येषामपि कुर्वताम्. 63

गुरु के कुकर्म की बाबत पर मुंह न खोलें. यदि उस के कुकर्म की चर्चा दूसरे लोग करें भी, तो उस चर्चा के प्रति बहरा बन जाएं, उसे अनसुना कर दें.

गुरोर्यत्र परीवादो निंदा वापि प्रवर्तते,

कर्णौ तत्र पिधातव्यौ गंतव्यं वा ततोऽन्यत:.

70

जहां कोई गुरु के दुष्कर्म की चर्चा करे, उस की निंदा करे, वहां शिष्य का कर्तव्य है कि वह अपने कानों पर हाथ रख ले या वहां से उठ कर किसी और जगह चला जाए.

गुरु दुष्कर्म करते ही होंगे, तभी तो इन श्लोकों में उन्हें दबाने व छिपाने के लिए इतना जोर दिया गया है. इस से बढ़ कर गुरुशिष्य प्रणाली की विडंबना और क्या हो सकती है?

गुरु ही ईश्वर है

गुरुगीता शिष्य से आशा करती है कि उस का आस्तिकवाद गुरु पर ही केंद्रित हो, ईश्वर पर नहीं.

गुरुमूर्तिं स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत्,

गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यं न भावयेत्.

66

हमेशा गुरु की मूर्ति का ध्यान करे, सदा गुरु के नाम का जाप करे, सदा गुरु की आज्ञा का पालन करे तथा गुरु के सिवा और किसी का चिंतन न करे.

शिष्य नौकर है

शिष्य सदा गुरु के नौकर (=भृत्य) की तरह ही अपने को समझे-

आज्ञया कुरुते कर्म शिष्यश्च भृत्यवत्.

75

अर्थात गुरु के व्यक्तिगत काम करें, उस के घर के काम करें आदि.

यदि गुरु संतुष्ट है तो शिष्य समझे कि उसे कोटिकोटि जन्मों में किए गए जप, व्रत, तप और कर्मकांड का फल प्राप्त हो गया है.

विष्ठा का कीड़ा

गुरुगीता कहती है कि शिष्य के लिए उचित है कि वह वाणी, मन, शरीर और कर्म के द्वारा गुरु का हित करे, उसे हर तरह से लाभ पहुंचाए. जो शिष्य गुरु का हित नहीं करता, उस के फायदे के लिए यत्न नहीं करता, वह अगले जन्म में टट्टी में कीड़ा बनता है.

इस सारी प्रक्रिया के दौरान पूरी गुरुगीता में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं होता कि गुरु शिष्य को कब और कैसे पढ़ातालिखाता था, और न ही यह स्पष्ट होता है कि शिष्य कभी कुछ पढ़तालिखता था भी या नहीं. इस के बारे में गुरुगीता के 79वें श्लोक में बहुत गोलमोल ढंग से सिर्फ यह लिखा मिलता है कि जैसे कोई मनुष्य खुरपे द्वारा मिट्टी को खोदतेखोदते एक दिन नीचे जल प्राप्त कर लेता है, उसी तरह जो शिष्य गुरुसेवा में लगा रहता है, वह गुरु की सारी विद्या को प्राप्त करने में एक दिन सफल हो जाता है.

पर इस से यह स्पष्ट नहीं होता कि गुरु किस विधि से और क्या पढ़ाता था? शिष्य कैसे सीखता था? उसे लिखना, पढ़ना, गणित आदि गुरु कैसे सिखाता था? कब से कब तक? क्या कोई पाठ्यक्रम भी होता था या नहीं और उसे किस प्रकार व्यवहार में लाया जाता था? शिष्य की योग्यता को सेवा के मीटर से मापने के अतिरिक्त क्या कोई अन्य विधि भी थी? उसे कैसे व्यवहार में लाया जाता था? कौन उस का स्तरीकरण, मानकीकरण और प्रामाणिकीकरण करता था?

गुरुडम का मकड़जाल

गुरुगीता में जिस गुरुशिष्य परंपरा का प्रतिपादन किया गया है और जिस शिक्षाविधि का वर्णन है, वह शिक्षापद्धति के स्थान पर गुरुडम स्थापित करने की ही विधि है.

यदि प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा फिर लागू की जाती है तो शिक्षा का बेड़ा तो गर्क होगा ही.

एकलव्य की त्रासदी

प्राचीनकाल  में भी यही कुछ था. प्राचीनकाल के (महाभारतकालीन) शिष्यों में एकलव्य जैसा वफादार शायद कोई शिष्य नहीं था. उसे गुरु ने शिक्षा देने से इसलिए इनकार कर दिया था कि वह शूद्र था, आदिवासी था. ब्राह्मण गुरु उसे शिक्षा कैसे दे सकता था. शिक्षा के लिए जरूरी था कि शिष्य का पहले उपनयन संस्कार हो. वह संस्कार शूद्र का हो नहीं सकता था. सब धर्मशास्त्रों  ने उस के उपनयन संस्कार का निषेध किया है.

लाचार हो कर एकलव्य जंगल को लौट गया और एक अनगढ़ पत्थर को गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति के रूप में सम्मानित कर के स्वयं ही धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा. जैसा कहा जाता है, अभ्यास से आदमी पूर्ण हो जाता है, अपने निरंतर अभ्यास से एकलव्य भी धनुष चलाने में प्रवीण हो गया.

जब गुरुजी को यह पता चला कि उन की मूर्ति के प्रति सम्मान रखते व अभ्यास करतेकरते एकलव्य धनुष चलाने में इतना पारंगत हो गया है जितना शायद अर्जुन भी नहीं है, तो प्राचीन गुरुपरंपरा के प्रतिनिधि गुरुद्रोण ने उस विद्या के लिए गुरुदक्षिणा मांग ली जो उस ने उस कथित शिष्य को कभी दी ही नहीं थी और गुरुदक्षिणा भी ऐसी मांगी कि जिस से उस शूद्र की खुद अर्जित विद्या भी अनहोई के समान हो जाए. गुरु ने शिष्य का धनुष चलाने के लिए जरूरी अंग, उस का अंगूठा गुरुदक्षिणा के नाम पर कटवा लिया और एकलव्य का सारा अभ्यास पलभर में सदा के लिए मिट्टी में मिला दिया.

अंगूठा कट जाने पर वह अब पहले की तरह धनुष चलाने के योग्य नहीं रह गया था. इसी गुरु द्रोण के नाम पर भारत सरकार ने श्रेष्ठ कोच के लिए ‘गुरु द्रोणाचार्य पुरस्कार’ स्थापित किया हुआ है. जब उत्तम व श्रेष्ठ ‘गुरु’ का यह हाल है, उस का शिष्य के प्रति इस तरह का अमानवीय, भेदभावपूर्ण और  आपत्तिजनक व्यवहार है, तब छुटभैया गुरुओं के चरित्र की कल्पना आसानी से की जा सकती है.

शिष्य की बेटी, गुरु की दक्षिणा

उपनिषदों में एक ऐसे गुरु के दर्शन होते हैं जो अपने भावी शिष्य की सुंदर व युवा बेटी को अग्रिम दक्षिणा के रूप में ग्रहण करता है और उसे ‘ज्ञान’ बाद में देता है. गुरुदक्षिणा भी युवा लड़की के रूप में और वह भी अग्रिम. इस पर भी तुर्रा यह कि वह गुरु शुरू में ही शिष्य को उस समय की सामाजिक गाली देता है, उसे ‘शूद्र’ कह कर उस का संबोधन करता है.

छांदोग्य उपनिषद (अ. 4) में आता है कि जानश्रुति काफी सामान – गौएं, रथ आदि – रैक्व को देने को तैयार है ताकि वह गुरु उसे अपना शिष्य बना ले और उसे ज्ञान दे. फिर भी वह उसे शिष्य बनाने को तैयार नहीं होता. परंतु जब वह अपनी युवा बेटी उसे पत्नी के तौर पर पेश करता है और कहता है- जायायं (मैं यह अपनी बेटी आप के लिए पत्नी के तौर पर लाया हूं), तब गुरु रैक्व कहता है-

शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति.

(अरे शूद्र, इस कन्या के मुख के कारण मैं तुझे ज्ञान देता हूं) अर्थात कन्या का मुख देखते ही ‘गुरुजी’ ज्ञान बघारने को तत्पर हो गए. दूसरे शब्दों में, गुरुजी भावी शिष्य से उस की बेटी दक्षिणा के तौर पर अग्रिम लेते हैं, तब कहीं जा कर ज्ञान देते हैं.

क्या यह गुरुशिष्य संबंध पितापुत्र सा आदर्श संबंध है, जैसा अकसर प्रचार किया जाता है? क्या कोई पिता अपने पुत्र की पत्नी या बेटी इस तरह ग्रहण करता है?

गुरुगीता शिष्य को अपनी पत्नी गुरु को अर्पण करने का आदेश देती है जबकि उपनिषद के मुताबिक, शिष्य अपनी बेटी गुरु की भेंट चढ़ाता है. आखिर, ये सब क्या है?

गुरुपत्नियों से संबंध

गुरुपत्नियां भी यौनशोषण किया करती थीं. हर धर्मशास्त्र में, हर स्मृति में, गुरुपत्नी से संबंध बनाने वाले शिष्य की चर्चा है, कभी उसे गुरुपत्नीगामी कहा गया है तो कहीं गुरुतल्पगामी आदि.

हर स्मृति में ऐसे शिष्य को ही दोषी ठहराया गया है और उसे सख्त से सख्त दंड का भागी बनाया गया है, परंतु कहीं भी उस से गुरु की पत्नी को न दोषी कहा गया है और न उस के लिए किसी दंड का विधान किया गया है.

मनुस्मृति में इस विषय में कई वैकल्पिक विधान किए गए हैं. यदि शिष्य गुरुपत्नी से संबंध बनाए तो उस के लिए विधान है कि उसे लोहे की तपाई हुई शय्या पर लिटाया जाए तथा वह स्त्री की लोहे की बनी व आग में लाल की हुई मूर्ति का उसी तरह आलिंगन करे जैसे उस ने गुरुपत्नी से किया था. उस मूर्ति से तब तक उसे चिपटा कर रखे जब तक कि वह मर न जाए :

गुरुतल्प्यभिभाष्यैनस्तप्ते स्वप्यादयोमये.

सूर्मी ज्वलन्ती स्वाश्लिष्येन्मृत्युना

स विशुद्ध्यति.

(मनुमृति, 11/103).

इस तरह के बर्बर दंडविधान केवल शिष्य के लिए हैं, न कि उस के साथ सहयोग करने वाली गुरुपत्नी के लिए. यदि बलपूर्वक शिष्य ने यह करतूत की होती तो मनुस्मृति वैसा लिख सकती थी, जैसा अन्य कई मामलों में उस ने लिखा है. बलात्कार इस तरह के मामलों में वैसे भी एकदम असंभव व अकल्पनीय था. यह सबकुछ आपसी रजामंदी से या लुभाफुसला कर ही किया जाता था. स्पष्ट है, ये सब काम गुरुपत्नी ही कर सकती थी, अल्पायु व अबोध शिष्य नहीं कर सकता था.

यदि यह कहा जाए कि कुछ शिष्य भी गुरुपत्नियों को फुसला कर या बलपूर्वक उन से शारीरिक संबंध बना लेते थे तो यह भी प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा के माथे पर कलंक ही है.

उस की कथित महानता के बावजूद यदि यह सब होता था तो वह परंपरा आज आदर्श कैसे हो सकती है? क्या गुरुओं, संस्कृति, धर्म, शिक्षा आदि के यही संस्कार थे? यदि वे संस्कार इस तरह की गिरावट भी नहीं रोक सके तो कैसी महानता?

विद्या मुक्ति दिलाती है

प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा के पक्षधर कहते हैं कि प्राचीनकाल की विद्या का लक्ष्य बहुत महान था. ‘सा विद्या या विमुक्तये’

अर्थात विद्या वह होती है जो मुक्ति दिलाए. प्राचीनकाल की विद्या का उद्देश्य आजकल की तरह रोजगार के योग्य बनाना नहीं, बल्कि जन्ममरण के बंधन से मुक्त करना था.

जन्ममरण के इन बंधनों से मुक्त होने की उन्हीं की डींगें कुछ सार्थक हो सकती हैं जिन्होंने दुनियावी बंधनों व विदेशी हमलावरों की गुलामी से अपने को कभी मुक्त रहने या होने में रुचि दिखाई हो. जो लोग हजारों सालों तक कभी इस मुट्ठीभर गिरोह के गुलाम बने रहे तो कभी उस गिरोह के, उन की विद्या उन्हें इन सब से मुक्त क्यों नहीं करवा सकी? इहलोक में इस विद्या ने किस को मुक्त करवाया है? जो विद्या इस लोक में गुलामी से मुक्त नहीं करवा सकी, वह कथित परलोक में किसे और कैसे मुक्त करवाएगी? क्या है कोई प्रमाण ग्रंथों में या किसी के पास कि इस विद्या ने ‘इस’ को मुक्त करवाया है, इस ने ‘उस’ को मुक्त करवाया है?

जो विद्या कुषाणों, शकों, हूणों, तुर्कों, मुगलों, पुर्तगालियों, अंगरेजों आदि से हमें मुक्त न रख सकी, वह विद्या कब और किसे तथा कहां व कैसे मुक्त करती थी या करती है?

हमारी विद्या विमुक्ति के लिए नहीं, पराजय के लिए रही, इस से हम विमुक्त नहीं, विजित हुए:

सा विद्या या विजिताय

(हमारी विद्या हमारे हारते रहने का कारण सिद्ध हुई) अर्थात हमारी विद्या है- हारे को हरिनाम.

रोजगार बनाम भीख

जो लोग प्राचीन विद्या को रोजगार के पीछे न दौड़ने वाली बता कर उस की महानता सिद्ध करना चाहते हैं, हमारा उन से कहना है कि यदि प्राचीन भारत की विद्या रोजगार की उपेक्षा न करती तो अपने यहां न शिष्य भीख मांग कर खाता, न गुरु. वह विद्या विमुक्ति क्या दिलाती जो दूसरों के आगे हाथ फैलाना सिखाती थी?

भीख मांगना रोजगार न होने के कारण इतना महत्त्वपूर्ण बना दिया गया कि मनुस्मृति ने यहां तक कह दिया कि जो ब्रह्मचारी (=विद्यार्थी) निरोग रहते हुए भीख नहीं मांगता वह अवकीर्णिव्रत करे.

अवकीर्णिव्रत में क्या होता है? इस में काने गधे की चरबी से चौरास्ते पर हवन करना होता है.

जैसे शिष्य भीख पर पलता था वैसे ही गुरु. शिष्य भीख मांग कर लाता और माल गुरु के आगे रख देता था तथा बाद में खुद खाता था-

जो पेटपूजा के लिए रोटी नहीं कमा सकता, जो भूख लगने पर हरेक के आगे हाथ फैलाता है, वह विमुक्ति के प्रति कितना गंभीर हो सकता है.

मांग कर खाने वालों, परोपजीवी लोगों को न आत्मसम्मान की चिंता होती है न मानवीय गरिमा की. वे तो मानो परतंत्र, पराधीन और गुलाम बनने के लिए अभिशप्त होते हैं. यही कारण है कि हम सब डींगों के बावजूद हजारों वर्षों तक विजित बने रहे, विमुक्ति तो हम ने बहुत लंबी व निरंतर गुलामी के बाद 1947 में प्राप्त की, वह भी अपनी विद्या के बल पर नहीं, बल्कि आधुनिक जगत में सीखी विद्या के बल पर.

ऐसे में न गुरुशिष्य परंपरा की फिर से स्थापना वांछनीय है, न कथित परलोक में कथिततौर पर विमुक्त करने वाली विद्या ही अपनाने योग्य है, क्योंकि उस से रोजगार की जगह भीख ही पल्ले पड़ती है.

आधुनिक शिक्षा मानवीय समानता पर आधारित है. यह अनेकता में एकता स्थापित करने के उद्देश्य से प्रेरित है.   परंतु प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा वाली विद्या, एकता में अनेकता पैदा करती है तथा संगठन को विघटन में परिणत करती है.

जनेऊ : जातिभेद का नागपाश

प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा में विद्या की शुरुआत उपनयन (जनेऊ) संस्कार से होती है-

उपनीय गुरु: शिष्यं शिक्षयेत्.

(मनुस्मृति, 2/69)

अर्थात, गुरु शिष्य का उपनयन संस्कार कर के उसे शिक्षा दे.

उपनयन संस्कार की शुरुआत ही असमानता, भेदभाव और विघटन से ग्रस्त है, क्योंकि हर बच्चे के उपनयन का समय उस की जाति के अनुसार निर्धारित किया जाता है. ब्राह्मण के बालक का गर्भ से 8वें, क्षत्रिय के बालक का गर्भ से 11वें और वैश्य के बालक का गर्भ से 12वें वर्ष में उपनयन करने का विधान है:

जाति के अनुसार हर बालक के जनेऊ (यज्ञोपवीत) की सामग्री भी एकदूसरे से भिन्न होनी चाहिए.

ब्राह्मण के बालक का जनेऊ कपास से बने सूत का होना चाहिए, क्षत्रिय के बालक का यज्ञोपवीत सन की रस्सी का बना हो तथा वैश्य के बालक का यज्ञोपवीत ऊन (भेड़ के बालों) का बना हो.

कार्पासमुपवीतं स्याद् विप्रस्य,

शणसूत्रमयं राज्ञो, वैश्यस्याविजसौत्रिकम्.

(मनु., 2/44)

यानी जनेऊ की सामग्री भी जन्म पर आधारित जाति के भेदभाव की परिचायक होनी चाहिए ताकि बिना बोले ही वह सामग्री हरेक को ऊंचनीच, भिन्नतावाद और विघटन सिखा व बता दे.

शूद्र के लिए शिक्षा वर्जित

ऊपर हम ने देखा है कि उपनयन संस्कार अर्थात विद्या आरंभ संस्कार केवल 3 जातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- के बालकों का होता था. बहुसंख्यक शूद्र जाति के बालकों के उपनयन अर्थात विद्या आरंभ का कहीं कोई विधान उपलब्ध नहीं होता. इस का मतलब स्पष्ट है कि प्राचीन शिक्षा पद्धति और गुरुशिष्य परंपरा के अनुसार शूद्र के लिए विद्या (पढ़नालिखना) वर्जित थी. अछूतों यानी आज के दलितों के लिए तो शिक्षा के पास फटकने की अनुमति भी न थी.

स्वामी दयानंद की अदया

स्वामी दयानंद सरस्वती का कहना है कि मूर्ख को शूद्र कहते हैं. जो पढ़लिख नहीं सकता था, वह शूद्र कहलाता था.

यह सरासर गलतबयानी है. ऐसा नहीं था कि वह पढ़लिख नहीं सकता था, वह अयोग्य था और मूर्ख था, वह शूद्र था, बल्कि वास्तविकता यह थी कि शूद्र को पढ़ने ही नहीं दिया जाता था, उसे अनपढ़ रखा जाता था और जानबूझ कर उसे मूर्ख बनाया जाता था.

जब शूद्र के विद्या आरंभ करने का कोई अवसर ही नहीं है, उस का उपनयन संस्कार ही नहीं है, किसी गुरु के पास उस के जाने का कोई विधान ही नहीं है और उसे पढ़ने दिया ही नहीं जाता, तब स्वामीजी ने उसे किस आधार पर ‘पढ़लिख सकने के अयोग्य’ घोषित कर दिया?

स्पष्ट है कि प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा और शिक्षापद्धति केवल 3 जातियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) के बालकों को पढ़नेलिखने का अधिकार देती है और उन में भी परस्पर जातिगत भेद को हर कदम पर गहरा करती है.

इस तरह प्राचीन शिक्षापद्धति न केवल जातिगत भेदभाव को हवा देती है, बल्कि बहुसंख्यक शूद्र व दलित जातियों के लिए विद्या को वर्जित भी घोषित करती है.

इतना ही नहीं, यह गुरुशिष्य परंपरा का कहना है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जातियों की लड़कियों का उपनयन संस्कार नहीं होना चाहिए, उन को विद्या देने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि सवर्ण लड़कियों का विवाह ही उन का विद्या आरंभ संस्कार है, पति की सेवा करना ही गुरुकुल में वास अर्थात विद्याध्ययन है तथा घरबार का कामकाज ही अग्निहोत्र आदि कर्म है.

संक्षेप में, न बहुसंख्यक शूद्रों (स्त्री-पुरुष दोनों) को पढ़ने का अधिकार है, न सवर्ण या असवर्ण लड़कियों को. यह है महान गुरुशिष्य परंपरा और प्राचीन शिक्षा पद्धति.

इस परंपरा के ‘गुरुगीता’ जैसे ग्रंथ ज्ञानियों को नहीं, शोषितों को पैदा करते हैं और गुरुओं के नाम पर शिष्यों की पत्नियां हथियाने  वालों को उकसाते हैं. यदि यह शिक्षा है तो अशिक्षा किसे कहते हैं? यदि यह ज्ञान है तो अज्ञान किसे कहते हैं और यदि इस तरह के लोग गुरु होते हैं तो गुरुकंटाल किन्हें कहते हैं?

निराला है यह स्वाद : नूडल्स कटलेट

नूडल्स कटलेट

सामग्री

– 1 पैकेट नूडल्स

– 1 कप गोभी कसी

– 1/2 कप चीज

– 1 प्याज कटा

– 1-2 हरीमिर्चें

– 3 बड़े चम्मच कौर्नफ्लोर

– तलने के लिए तेल

– नमक स्वादानुसार.

विधि

1 पैकेट नूडल्स बिना मसाले के उबाल लें. इस में गोभी, चीज, प्याज, नमक व हरीमिर्च डाल कर अच्छी तरह मिला कर आटा तैयार कर बराबर भागों में बांट लें. मनपसंद आकार दें. व फिर कौर्नफ्लोर से डस्ट कर गरम तेल में शैलो फ्राई करें.

निराला है यह स्वाद : दही सैंडविच

दही सैंडविच

सामग्री

– 1 कप हंग कर्ड

– 1/2 कप कच्चा नारियल कसा

– 1-2 हरीमिर्चें

– 1 टुकड़ा अदरक

– 4 ब्रैड स्लाइस

– 2 बड़े चम्मच मक्खन

– नमक स्वादानुसार.

विधि

नारियल को मिर्च, अदरक, नमक व दही के साथ महीन पीस लें. इस चटनी को ब्रैड स्लाइस के बीच लगाएं व दूसरा ब्रैड स्लाइस ऊपर रख कर बंद करें. गरम तवे पर मक्खन लगा कर दोनों तरफ से सेंक लें. तिकोना काट कर गरमगरम सर्व करें.

मोटा पैसा बना रहे कोचिंग सैंटर

देश में बढ़ती बेरोजगारी ने मातापिता को अपने बच्चों के कैरियर के प्रति सचेत कर दिया है. यही वजह है कि आज हर मातापिता अपने बच्चों को डाक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं.

अपनी जिंदगीभर की खूनपसीने की कमाई से वे अपने बच्चों को अच्छे कोचिंग सैंटरों में दाखिला दिला कर आईआईटी और मैडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करा रहे हैं.

देश में इलाहाबाद, दिल्ली, कोटा जैसे शहरों के अलावा मध्य प्रदेश के भोपाल, जबलपुर, इंदौर, ग्वालियर और छत्तीसगढ़ के रायपुर, भिलाई जैसे बड़े शहरों में पीएससी, यूपीएससी, बैंक, रेलवे जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ ही साथ आईआईटी और मैडिकल की प्रवेश परीक्षा की कोचिंग देने वाले दर्जनों बड़े सैंटर हैं जो छात्रों व बेरोजगारों से मोटी फीस ले कर अपना कारोबार चमका रहे हैं.

इस के अलावा जिला और तहसील लैवल पर भी संविदा शिक्षक और पटवारी परीक्षा की तैयारी के लिए कुकुरमुत्ते की तरह कोचिंग सैंटर खुल गए हैं जो नौजवानों की जेब ढीली कर मोटा पैसा बनाने का काम कर रहे हैं.

बताया जाता है कि कैसे तथाकथित कोचिंग सैंटरों में उन लोगों द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है जो खुद कभी किसी परीक्षा में पास नहीं हुए.

सरकारी नौकरी के साथसाथ मैडिकल और इंजीनियरिंग में अच्छी रैंक पाने को बेताब हजारों नौजवान मजबूरन इन कोचिंग सैंटरों में जा कर परीक्षा की तैयारी करने में जुटे हुए हैं.

सपने बिकते हैं कोटा में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज से 3 साल पहले शिक्षा नीति में बदलाव लाने की बात कही थी पर 3 साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी शिक्षा नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

देश के पढ़ेलिखे नौजवानों के लिए कैरियर गाइडैंस के लिए सरकारी कोशिशों का नतीजा सिफर ही रहा है. निजी क्षेत्रों ने इस का फायदा उठा कर कोचिंग के नाम पर बड़ेबड़े सैंटर खोल कर अपना धंधा जमा लिया है.

राजस्थान का कोटा शहर सपने बेचने वालों का शहर बन गया है. सौ से ज्यादा कोचिंग सैंटर यहां इंजीनियर और डाक्टर बनाने का सपना बेचते हैं.

कोटा में देशभर के तकरीबन एक लाख बच्चे पढ़ रहे हैं. इन कोचिंग सैंटरों में पढ़ाई के अलावा बच्चों के रहनेखाने तक का खर्च हर साल 2 लाख रुपए से ज्यादा होता है.

इन कोचिंग सैंटरों से कोटा के रियल ऐस्टेट कारोबार ने भी पंख लगा कर ऊंची उड़ान भरी है. पूरे कोटा में होस्टलों की तादाद भी 500 से कम नहीं है. इस के अलावा बड़ी तादाद में छात्र पेइंग गैस्ट बन कर भी रह रहे हैं.

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मैडिकल और आईआईटी की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोटा में बने इन कोचिंग सैंटरों का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है. यही वजह है कि देशभर के मातापिता अपने बच्चों को 8वीं क्लास के बाद ही कोटा में कोचिंग के लिए भेजने लगे हैं.

दिल्ली भी कम नहीं

यूपीएससी, पीएससी की तैयारी के लिए इलाहाबाद, मेरठ के अलावा देश की राजधानी नई दिल्ली में भी कई सारे कोचिंग सैंटर हैं, जो होनहार नौजवानों को कलक्टर बनाने का सपना दिखाते हैं.

छोटेछोटे कमरों में चलने वाले इन कोचिंग सैंटरों में भी 2 लाख रुपए की मोटी फीस में 9 महीने के क्रैश कोर्स के जरीए आईएएस परीक्षा की तैयारी कराने का दावा किया जाता है.

दिल्ली में रह कर आईएएस की तैयारी कर रहे मध्य प्रदेश के एक छात्र सिद्धार्थ दुबे कहते हैं कि दिल्ली में 100 वर्गफुट का एक कमरा 8,000 से 10,000 रुपए तक मासिक किराए पर मिलता है. कोचिंग सैंटरों की फीस और महंगा किराया गरीब तबके के होनहार छात्रों के लिए टेढी खीर साबित होता है.

इन कोचिंग सैंटरों में पढ़ने वाले छात्र यह बात मानते हैं कि अकेले कोचिंग सैंटर के दम पर कोई नौजवान प्रतियोगी परीक्षा पास नहीं कर सकता जब तक कि वह खुद मेहनत न करे.

आज कोचिंग सैंटरों में जाना छात्रों की मजबूरी हो गई है, क्योंकि देशभर के कोनेकोने से आए और छात्रों के संपर्क में रहने से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए मनमुताबिक माहौल मिल जाता है.

शासनप्रशासन और कारपोरेट की तिकड़ी मिल कर देश में लागू वर्तमान दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली को जानबूझ कर बदलना नहीं चाहती है. ऐसे में मजबूर हो कर छात्रों को कोचिंग सैंटरों के जाल में उलझना पड़ता है.

पैसे लेकर फर्जीवाड़ा

2 दिसंबर, 2017 को कर्मचारी चयन बोर्ड एसएससी की परीक्षा में मेरठ के डीएवी स्कूल में मोबाइल फोन के साथ पकड़े गए बागपत के रहने वाले सौरभ धामा ने पूछताछ में कई चौंकाने वाले राज खोले.

उस ने बताया कि मेरठ में एक कोचिंग के संचालक पंकज धामा ने उसे एसएससी की परीक्षा पास कराने के बदले मोटी रकम मांगी थी. सौरभ ने खुद और अपने भाई की नौकरी के लिए अपनी पुश्तैनी 7 बीघा जमीन भी गिरवी रख दी थी, जिस के बाद पंकज ने उसे पेपर के साथ आंसरशीट भी मुहैया करा दी थी.

नकल करते पकड़े गए अभ्यर्थी ने बताया कि मेरठ में कोचिंग सैंटर चलाने वाला पंकज धामा अब तक कई नौजवानों से मोटी रकम ले कर नौकरी लगा चुका है. इस परीक्षा में कई ऐसे अभ्यर्थी भी हैं जो पंकज के संपर्क में थे.

मेरठ की यह घटना बताती है कि कोचिंग सैंटर मोटी रकम ले कर देश की परीक्षा प्रणाली से खिलवाड़ कर के काबिल बेरोजगार नौजवानों का हक भी मारते हैं.

कोटा, दिल्ली, भोपाल और इंदौर के कोचिंग सैंटर तो आईआईटी और मैडिकल प्रवेश परीक्षा की कोचिंग लेने वाले छात्रों को 10वीं और 12वीं क्लास की परीक्षा में नियमित परीक्षार्थियों के रूप में शामिल कराने का काम भी करते हैं.

बताया जाता है कि ये कोचिंग सैंटर अपने यहां दर्ज बच्चों को उसी शहर के निजी स्कूलों से सांठगांठ कर उन को उन स्कूलों में दाखिला दिला देते हैं. निजी स्कूल इन छात्रों की हाजिरी लगाते रहते हैं जबकि ये छात्र उन स्कूलों में कभी पढ़ने जाते ही नहीं हैं.

कोचिंग और सरकार

वर्तमान समय में जब नौजवान तबका अपने कैरियर के लिए मोटी रकम खर्च कर कोचिंग सैंटरों में जाने को मजबूर है तो सरकार क्यों इस दिशा में कोशिश नहीं करती? हर स्कूल, कालेज में कैरियर गाइडैंस देने वाले शिक्षकों की नियुक्ति की जाए, क्योंकि उचित मार्गदर्शन की कमी में स्कूल में पढ़ रहे छात्र को हायर सैकेंडरी पास करने के बाद कौनकौन से अवसर उपलब्ध हैं, इस की जानकारी भी नहीं रहती है.

कालेज के उबाऊ सिलेबस से हट कर क्यों न उन्हें प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कराई जाए, जिस से ये नौजवान किसी कोचिंग सैंटर के मकड़जाल में न फंस कर अपने कैरियर को बना सकें? आखिर कब तक सरकारी तंत्र निजी संस्थानों के हाथों की कठपुतली बना रहेगा?

देश में विकासखंड लैवल पर शुरू हुए कौशल विकास केंद्रों में अच्छी तादाद में प्रशिक्षक और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और उन्हें मजबूत बनाने की कोशिश की जाए तो शायद बेरोजगारों का भविष्य संवर सके.

युवाओं की खोखली सामाजिक सोच

भारतीय उन्मादी धर्मनिष्ठ युवाओं द्वारा अमेरिकी टैलीविजन सीरियल ‘क्वांटिको सीजन-3’ के एक एपिसोड के प्रसारण पर जम कर हल्ला मचाया गया. आरोप लगाया गया कि ‘द ब्लड औफ रोमिया’ नामक एपिसोड में ‘भारतीय राष्ट्रवादियों’ को न्यूयौर्क में परमाणु बम हमला करने के लिए प्लौट रचते हुए दिखाया गया था ताकि उस का शक पाकिस्तान पर जाए. 1 जून को प्रसारित हुए इस एपिसोड के बाद सोशल मीडिया पर राष्ट्रवादी बिल्ला लगाए युवाओं का गुस्सा देखा गया. सीरियल में अभिनय कर रही भारतीय अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा और शो निर्माताओं से माफी मंगवाई गई. यह विरोध मोबाइलों से ट्रौल करने में माहिर युवा कैडर ने किया जिस पर कट्टरवादी सोच हावी रहती है.

इस विरोध से जाहिर होता है कि हमारे ये युवा कितने कम उदार, अलोकतांत्रिक और अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान न करने की जिद रखने वाले हैं. ऐसी घटनाओं से बारबार हमारे युवाओं की छोटी सोच उजागर होती रही है. परदे पर जो दिखाया गया है उसे स्वीकार करने और सोचनेसमझने की मानसिकता उन में दिखाईर् ही नहीं देती.

दूसरी तरफ बिहार से खबर है कि लालू प्रसाद यादव के परिवार में उपेक्षा को ले कर तनातनी चल रही है. लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप का छोटे भाईर् तेजस्वी से मनमुटाव है. तेजप्रताप ने अपनी अनदेखी से चिढ़ कर कहा था कि पार्टी में सामंतवादी लोग घुस आए हैं और ऐसे लोग दलित नेताओं व युवाओं को तरजीह नहीं दे रहे हैं.

झारखंड के सिंहभूम जिले में बच्चा चोर और इसी राज्य में पशु चोरी के शक में कुछ लोगों की युवा लठैतों द्वारा जानें ले ली गईं.

देश में अफवाहों का बाजार जानलेवा रूप ले चुका है. ये अफवाहें युवा ही फैला रहे हैं. अफवाहों पर भरोसा कर मौब लिंचिंग जैसी घटनाओं को अंजाम देना आम बात हो गई है. देश के तकरीबन हर हिस्से में गौरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी, राष्ट्रवाद के नाम पर फर्जी देशभक्ति का प्रदर्र्शन कर समाज में द्वेष, ईर्ष्या, नफरत पैदा करने में युवा आगे हैं.

14 जून को महाराष्ट्र के जलगांव के वाकड़ी गांव में ईश्वर बलवंत जोशी के कुएं पर 2 दलित बच्चों के नहाने पर युवा भीड़ द्वारा उन्हें सरेआम नंगा कर मारापीटा गया.

इस तरह की घटनाएं आएदिन हो रही हैं. इन घटनाओं को युवा ही अंजाम दे रहे हैं. आज भी देश में ऊंचनीच का भेदभाव व्याप्त है. अब पढे़लिखे युवाओं का एक वर्ण एवं वर्ग सामाजिक बराबरी के सिद्धांत को स्वीकार करना नहीं चाहता.

संवेदनहीन युवा

पंजाब के लुधियाना के शिवम बिरदी की नोएडा में नौकरी लगी तो वह अपनी प्रेमिका ज्योति को भी साथ ले आया. प्रेमिका भी नौकरी करने लगी. दोनों लिवइन में साथ रह रहे थे. ज्योति एक दिन देर रात में काम से लौटी तो दोनों के बीच झगड़ा हो गया. शिवम ने चाकू से प्रेमिका की हत्या कर दी और शव सूटकेस में ठूंस कर गाड़ी में रखने लगा कि मकानमालिक को शक हो गया और वह पकड़ा गया.

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इसी तरह दिल्ली की गीता कालोनी की डोली ने आत्महत्या कर ली. आरोप है कि उस के पति विजय ने गर्भ में पल रहे बच्चे का डीएनए टैस्ट कराने की बात कही थी. पति ने किसी युवक के साथ उसे घूमते हुए देख लिया था, इसलिए उसे शक था कि पत्नी के पेट में पल रहा बच्चा उस का नहीं है.

इन दोनों खबरों में युवाओं की अपने प्यार और परिवार के प्रति प्रेम, सहनशीलता, दायित्वहीनता दिखाई देती है. साथ ही, अपनेअपने जीवनसाथी के प्रति भरोसे की कमी भी नजर आती है. ये चीजें युवाओं ने सीखी ही नहीं हैं.

गुजरात के वेरावल में एक युवक की पत्नी की मौत हो गई तो उस युवक ने दूसरी शादी कर ली. युवक के घर वालों ने बताया कि बहू गौरी की सीढि़यों से गिर कर मौत हुई थी और उस के मांबाप को सूचना दे कर बुला लिया गया था. कुछ ही दिनों बाद गौरी के परिवार वालों ने पुलिस में शिकायत की कि बेटी की हत्या की गई है पर बाद में गौरी के परिवार वालों ने समाज की बैठक बुलाई और सजा का फैसला सुनाते हुए फरमान जारी किया कि युवक राजू 10 साल तक दूसरी शादी नहीं कर सकता. युवक ने चूंकि शादी कर ली तो उस का पूरा परिवार बिरादरी से बाहर कर दिया गया.

हैरानी यह है कि समाज में इस तरह की मध्यकालीन पंचायती सोच आज भी मौजूद है. युवावर्ग इस का विरोध करने के स्थान पर इसे पुनर्स्थापित कर रहा है.

परिवार से संबंधित एक और खबर है कि देश का हर चौथा बुजुर्ग दुर्व्यवहार का शिकार है और दुर्व्यवहार करने वाले उस के अपने ही युवा बेटे, बहू और बेटियां हैं. गैरसरकारी संगठन हेल्पएज इंडिया द्वारा देश के कई शहरों में सर्वे कराए जाने के बाद जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि दुर्व्यवहार करने वालों में आधे से अधिक पढे़लिखे लोग हैं जो उन्हें अपमानित करने से ले कर मौखिक अभद्रता, उपेक्षा व मारपीट तक करते हैं.

जून में ही बौलीवुड फिल्मस्टार सलमान खान का भाई अरबाज खान सट्टेबाजी के आरोप में पकड़ा गया. उस के साथ निर्माता व फाइनैंसर पराग सांघवी का नाम भी आया है. जांच एजेंसी की पूछताछ में खुलासा हुआ कि फिल्म इंडस्ट्री की कई हस्तियां सट्टेबाजी में लिप्त हैं. आईपीएल के दौरान देश में 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का सट्टेबाजी का धंधा होता है.

युवाओं का सट्टेबाजी की ओर रुझान बढ़ रहा है. वे रातोंरात करोड़पति बनना चाहते हैं. उन में सट्टेबाजी के साथसाथ नशाखोरी जैसी बुराइयां भी भरी हुई हैं. आंकडे़ बताते हैं कि देश के 80 प्रतिशत से ज्यादा युवा किसी न किसी नशे की गिरफ्त में हैं.

हमारे युवाओं के लिए आज फिल्मी हीरो, अपराधजगत का माफिया डौन, भ्रष्ट अधिकारी और बेईमान कारोबारी आदर्श बन रहे हैं.

क्या यह दुर्दशा इसलिए हो रही है कि देश के अधिकांश युवाओं के सामने भविष्य अस्पष्ट है. जो मिल रहा है वह थोड़े से युवाओं के लिए है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए कटऔफ लिस्ट जारी हो रही हैं. सैंट स्टीफंस कालेज में प्रवेश के लिए पहली कट औफ में 98.75 प्रतिशत अंक रखे गए हैं. सीबीएसई, नीट, जेईई, एसएससी जैसी परीक्षाओं में गलाकाट प्रतिस्पर्धा देखी जा सकती है पर क्या केवल अंक को ही किसी युवा की प्रगति का आधार माना जा सकता है?

पर ये मेधावी युवक जो कुछ कर रहे हैं, केवल अपने लिए ही कर रहे हैं. इन का समाज या देश से कोई सरोकार नजर नहीं आता. बाद में जा कर ये अपने परिवार से भी कट जाते हैं. ज्यादातर युवा आत्मकेंद्रित हो रहे हैं, अपने लिए ही जीने वाले चाहे सफल हों या असफल.

हाल में युवा प्रदर्शनों पर गौर करें तो रेलवे में नौकरी के नियम, एसएससी परीक्षा, छात्रसंघ चुनाव, आरक्षण आदि मुद्दों को ले कर वे सड़कों पर दिखे. पर यह लड़ाई उन की व्यक्तिगत जरूरतों को ले कर थी, स्वयं तक सीमित थी. सामाजिक मुद्दों को ले कर उन में कोई जागृति नहीं है. किसी तरह के आंदोलन की तैयारी का तो सवाल ही नहीं है. समाज में बिखराव युवाओं को खा गया है. भारतीय युवा आरक्षित और गैरआरक्षित श्रेणियों में बंट गया है. दोनों के बीच सामंजस्य के भाव नहीं, वैमनस्यता फैलाईर् जा रही है. उन में परिपक्व और निस्वार्थ नेतृत्व है ही नहीं जिस पर भरोसा किया जा सके.

दुनियाभर के इतिहास में हमेशा युवाशक्ति का गौरवगान हुआ है. युवाओं ने ही बड़ीबड़ी राजनीतिक व सामाजिक क्रांतियों का नेतृत्व किया है. युवा ही हैं जो इतिहास बदलने की ताकत रखते हैं.  भारत में भी आजादी की अलख जगाने से ले कर संपूर्ण क्रांति और जन लोकपाल विधेयक के लिए हुए आंदोलनों में युवाशक्ति की ही अहम भूमिका रही है. छोटेबड़े सामाजिक बदलाव के वाहक युवा ही बने हैं.

मौजूदा दौर में न केवल पारिवारिक नेतृत्व अपनी जगह छोड़ रहा है, सामाजिक नेतृत्व का अभाव भी खटकने लगा है. पिछले समय से सामाजिक नेतृत्व को ले कर निराशा और दायित्वहीनता की स्थिति नजर आ रही है. इस स्थिति में देश, समाज जटिल दौर में खड़ा दिखाई दे रहा है.

आज देश में पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक मूल्यों के मानक बदल रहे हैं. गैरबराबरी, नफरत, ईर्ष्या, बिना उद्यम किए शीर्ष पर पहुंचने की होड़, एकदूसरे को नीचे गिराने की मंशा, योग्य लोगों पर नाकाबिलों का वर्चस्व, तिकड़में, कोरी बातें बना कर सफल दिखने वालों की बढ़ती संख्या, असहनशीलता, अकर्मण्यता, नशाखोरी, दायित्वहीनता, अंधविश्वास, जैसी प्रवृत्तियों का बोलबाला है.

अंधविश्वास की जकड़न

महिलाओं के प्रति यौनहिंसा से देश पीडि़त है. समाज में छुआछूत, ऊंचनीच और जातपांत की खाई अब भी बहुत गहरी है. दलितों, महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार की घटनाएं आएदिन देखनेसुनने में आती हैं. डायनप्रथा के नाम पर महिलाओं की हत्याएं की जाती हैं. अंधविश्वास में जकड़े लोग नरबलि तक दे डालते हैं जो सभ्य कहलाने वाले समाज के माथे पर कलंक है.

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार, आज भारत दुनिया की सब से बड़ी युवा आबादी वाला देश है. यहां आधी से अधिक आबादी युवाओं की है. देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या की आयु 35 वर्ष से कम है. यहां 60 करोड़ लोग 25 से 30 वर्ष के हैं जो विश्व के किसी भी देश की तुलना में  सब से अधिक है.

राजनीति में मौजूद युवा नेताओं में भी सामाजिक सोच की और पढ़ने व सही ज्ञान पाने की इच्छा में कमी उजागर होती रहती है.

हाल में त्रिपुरा के युवा मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने कह डाला था कि देश में महाभारत युग में भी तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध थीं जिन में इंटरनैट और सैटेलाइट शामिल थे.  देब का दावा था कि महाभारत के दौरान संजय ने हस्तिनापुर में बैठ कर धृतराष्ट्र को बताया था कि कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध के वक्त क्या हो रहा था. संजय इतनी दूर रह कर आंखों से कैसे देख सकते थे. इस का मतलब है उस समय भी इंटरनैट और सैटेलाइट था.

यह कपोलकल्पित बात पहले पीपल के पेड़ के नीचे बैठा बुर्जुग साधू ही कहता था, शिक्षित मुख्यमंत्री नहीं कह सकता था.

इस से पहले भी वे इसी तरह की हास्यास्पद बातें कर सुर्खियों में रहे. उन्होंने कहा था कि युवा सरकारी नौकरियों के लिए समय बरबाद करने के बजाय पान की दुकान लगा लेते तो उन के खाते में अब  तक 5 लाख रुपए जमा होते. वे प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत लोन ले कर पशुधन खरीद सकते हैं.

इसी तरह उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने कहा था कि रामायण काल में टैस्टट्यूब बेबी की अवधारणा थी. शर्मा ने कहा था कि सीता का जन्म धरती के अंदर से निकले घड़े में हुआ था. इस का अर्थ है कि रामायण काल में भी टैस्टट्यूब बेबी का विज्ञान था.

वे यह बताने को तैयार नहीं कि सीता के मातापिता में क्या दोष था जो टैस्टट्यूब बेबी की नौबत आई. अगर ग्रंथों के आधार पर ही बताया जाए तो सीता के बारे में तथ्य उजागर करने पर उन के जैसी सोच वाले युवा ही सिर फोड़ने को तैयार हो जाएंगे, जैसे प्रियंका चोपड़ा के पीछे पड़ गए. ऐसे में युवा नेता पौराणिक काल की सोच में जी रहे हैं, वे विचलित और दिग्भ्रमित हैं. युवाओं की सोच और समझ किसी तरह के सामाजिक, राजनीतिक परिवर्तन वाली दिखाई नहीं पड़ती. इसीलिए आज युवा होते हुए भी भारत राजनीतिक, सामाजिक सड़ीगली सोच वाले वृद्ध और जर्जर हो चुके नेतृत्व से संचालित होने के लिए अभिशप्त है?

इन उदाहरणों से पता चलता है कि हमारे युवाओं में कितनी काबिलीयत है. इस से यह भी मालूम होता है कि देश की शिक्षा, राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था में कैसे अभाव व विसंगतियां हैं. हमारे युवाओं को वह शिक्षा नहीं मिल पा रही जिस से उन में सामाजिक समझ उत्पन्न हो. उन में सही राजनीतिक सोच पैदा नहीं हो पा रही है. सामाजिक नेता कोई है नहीं. युवाओं ने परदे के फिल्मी हीरोहीरोइनों या क्रिकेट खिलाडि़यों को अपना आदर्श मान लिया है. फिल्में भी ऐसी जिन में मौलिकता व क्रिएटिविटी का सर्वथा अभाव दिखाईर् देता है. मैदान में भी खिलाड़ी बढ़ते नजर आ रहे हैं और खेलों में जबरदस्त राजनीति है.

पुरातन व संकीर्ण सोच

कभीकभार ताजी हवा देने वाले कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी, चंद्रशेखर आजाद जैसे सामाजिक सोच वाले नेता सामने आते तो हैं पर उन पर सरकारों और कट्टर संकीर्ण सोच वाले समाज के लोगों का कहर टूट पड़ता है. सरकारें और पुरानी सोच वाले समाज के लोग ऐसे नेताओं को डरानेदबाने में दिनरात एक कर देते हैं. उन पर हमले किए जाते हैं, देशद्रोह जैसे मुकदमे थोप कर उन्हें जेल में डाल दिया जाता है.

यही कारण है कि आज के युवा भारत पर बुजुर्ग नेता राज ही नहीं कर रहे, उस पर प्राचीन संस्कृति, परंपराओं के नाम पर पुरानी खोखली सोच थोपी भी जा रही है. देश, समाज को आगे ले जाने का दायित्व युवाओं का है पर युवाओं को उन के दायित्व को सिखानेसमझाने वाला कोई नहीं है.

अप्रैल 2011 में जनलोकपाल विधेयक को ले कर अन्ना हजारे के नेतृत्व में आंदोलन हुआ था. इस आंदोलन में स्वत:स्फूर्त युवाओं की उपस्थिति देखी गई. आंदोलन में अरविंद केजरीवाल, योगेंद्र यादव, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास, प्रशांत भूषण जैसे चेहरे उभर कर सामने आए. आंदोलन के प्रभाव का तब की यूपीए सरकार पर जबरदस्त असर हुआ पर बाद में इस से जुड़े  लोग अलग होते गए और आंदोलन लक्ष्य से हट गया. कारण यह था कि युवाओं का बड़ा वर्ग किसी एक नेता को नेता स्वीकार करने को तैयार नहीं था.

मध्यकाल में यूरोप में सांस्कृतिक आंदोलन के नाम पर पुनर्जागरण हुआ था. इस में सामाजिक नेताओं की भूमिका प्रमुख थी. बाद में मार्टिन लूथर द्वितीय ने क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव किए. यही नहीं, तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा ने बर्बर, अंधेर, कट्टर समाज के बीच प्रकाश की लौ जगाई. कई सामाजिक सुधार किए.

1917 की रूसी क्रांति इतिहास की महत्त्वपूर्ण सामाजिकराजनीतिक घटना थी. उस ने निरंकुश शाही शासन ही नहीं, पूंजीपतियों की आर्थिक व सामाजिक सत्ता को समाप्त कर विश्व में मेहनतकशों का राज स्थापित किया.

भारत में छोटेबड़े सामाजिक सुधार होते रहे हैं. समाज सुधारक नेता भी युवा थे. महाराष्ट्र में वर्णव्यवस्था के खिलाफ सामाजिक जागृति पैदा करने वाले ज्योतिबा फूले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना युवा अवस्था में ही की थी. उन्होंने छुआछूत, भेदभाव, स्त्री शिक्षा की अलख जगाई.

भीवराव अंबेडकर युवा ही थे जब उन्होंने छुआछूत का दंश झेला और आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया.

राजा राममोहन राय पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मध्ययुगीन बुराइयों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा. सतीप्रथा, जातिप्रथा का भेदभाव, छुआछूत, बहुविवाह प्रथा, विधवा विवाह जैसी अमानवीय बुराइयों ने उन्हें झकझोर डाला. उन का युवामन इन बुराइयों को खत्म करने के लिए बगावत कर बैठा.

गांधी ने जब अश्वेतों के साथ भेदभाव देखा और खुद भोगा तो वे युवा ही थे. वे छुआछूत, भेदभाव के खिलाफ संघर्ष के रास्ते पर उतर पड़े.

नेहरू धर्म, जाति की अमानवीयता देख चुके थे और वे समयसमय पर अपने प्रगतिशील विचारों से युवाओं को अवगत कराते रहे.

जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया में युवाओं का बगावती जज्बा ही था जब उन्होंने भ्रष्ट व भेदभावपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ बिगुल फूंक कर देश में समाजवादी व्यवस्था का सपना देखा था.

भारतीय समाज में नेतृत्व का एक सामंती तरीका चलता आया है. खुद को मसीहा, अवतार बता कर भेड़ों की भीड़ को हांका जाए. यह तरीका सफल भी हो रहा है. हिंदूरक्षक, गौरक्षक, दलितरक्षक, पिछड़ा, मुसलिम रक्षक यानी एकदूसरे के प्रति नफरत फैला कर नेता बनना. इन्हें इस बात से कोईर् मतलब नहीं होता कि समाज में समस्याएं क्या हैं, उन पर काम कैसे करना है. नेतृत्व का यह रूप बरगलाने वाला है. यह रूप खतरनाक है. बाद में जब भीड़ की आंखें खुलती हैं तो रोनाधोना मचता है कि नेता ठग, बेईमान, भ्रष्ट, बहुरूपिया था.

सोच का अभाव

युवाओं की मानसिकता एक संप्रदाय, वर्ग, जाति में रहते हुए दूसरे के प्रति नफरत पैदा कर के नेता बनने की रही है. वह अवतार, व्यक्तिपूजा, चमत्कारों पर भरोसा करने वाला है. वह लंबे समय से ऐसे ही नेतृत्व को गढ़ता आया है और उस का गुलाम बना रहता रहा है.

हम दुनिया में भारत को विश्वगुरु के रूप में पेश करते हैं. देश आर्थिक तकनीक क्षेत्र में तो आगे बढ़ा है पर जहां तक सामाजिक विकास की बात है वह अभी भी विश्व में सब से कम रैंक के साथ निचले स्तर के देशों में एक है. हाल के आंकड़े बताते हैं कि भारत मानव विकास सूचकांक में कुल 187 देशों में से 135वें स्थान पर है. सामाजिक विकास की यह खेदजनक स्थिति इसलिए है कि हम आज भी रूढि़वादी मान्यताओं, विश्वासों के नकारात्मक सोच वाले समाज में जी रहे हैं जो समानता व भाईचारे के सिद्धांत में विश्वास नहीं करता. इस से सामाजिक, आर्थिक गैरबराबरी से ले कर पिछड़ने के कई आयाम जुड़े हुए हैं.

देश में हजारों युवा संगठन हैं, लाखों एनजीओ हैं. युवाओं के लिए केंद्र और राज्य सरकारों में राजधानियों से ले कर जिलों, तहसीलों में युवाओं के लिए विभाग काम कर रहे हैं. जातीय, धार्मिक सेनाएं और संगठन हैं. राजनीतिक पार्टियों के युवा संगठन हैं, फिर भी युवाओं को सही प्रगतिशील सोच की राह दिखाने वालों का एकदम अभाव है. धर्म, जाति, राष्ट्रवाद के नाम पर उन्मादी होते युवावर्ग को उदार, लोकतांत्रिक मूल्यों का खुलापन समझाने वाला कोई नहीं है.

सच तो यह है कि युवाओं के पास समय ही नहीं है. सोच नहीं है, समझ नहीं है. वह आत्मकेंद्रित बन गया है. वह कुछ करना भी नहीं चाहता, मुझे क्या, मेरी बला से.

कब जागेगा युवा

युवा धर्म, जाति की जकड़न में जकड़ा रहना चाहता है. गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता की मार सब से ज्यादा युवाओं पर पड़ती है. पर फिर भी वे सामाजिक मुद्दों पर एकजुट नहीं, बंटे हुए हैं. सोशल मीडिया पर वे अपना अधकचरा ज्ञान बघारने में आगे दिखते हैं. दिखावे का आवरण ओढे़ युवा भौतिकवादी व अवसरवादी बन गया है.

युवा पढ़लिख नहीं रहा है. वह सुनीसुनाई बातों पर ज्यादा यकीन करने का आदी हो गया है. तार्किक सोच का उस में अभाव है. वह तर्कपूर्ण सोचना ही नहीं चाहता. धार्मिक ताकतें यही

तो चाहती हैं कि युवा तर्क न करे, हर चीज पर आस्था, विश्वास रखे. युवा तर्कशक्ति को बढ़ाना नहीं चाहता. बुराइयों से लड़ने का उस में जज्बा दिखाई नहीं देता.

आर्थिक नेतृत्व तो देश में ही नहीं, दुनियाभर में मजबूत है पर किसी भी समाज  की मजबूती के लिए सामाजिक नेतृत्च की जरूरत अधिक है. समाज मजबूत होगा तभी देश, परिवार खुशहाल होगा.

भारत में ही नहीं, यह कमी दुनियाभर में है. राजनीति में भी जो युवा हैं उन की पिछड़ी सोच समयसमय पर उजागर होती रही है. वे भी मध्यकाल के विचार जगजाहिर करते रहते हैं. नए वैज्ञानिक व तर्कशील सोचविचारों का उन में अभाव है जिन से परिवार, समाज और देश को आगे ले जाया जा सके.

किसी भी देश की युवाशक्ति समाज को तभी सही दिशा में ले जा सकती है जब वह खुद सही दिशा की ओर अग्रसर हो. क्या हमारे युवा आंखें खोलेंगे…

नहीं रहीं रीता भादुड़ी

बौलीवुड और छोटे परदे की चर्चित अदाकारा रीता भादुड़ी का 62 वर्ष की उम्र में आज सुबह मुंबई के सुज्वाय अस्पताल में किडनी की बीमारी के चलते निधन हो गया. पिछले दस दिनों से इस अस्पताल में उनका किडनी का इलाज चल रहा था. शुरू से ही जुझारू रही रीता भादुड़ी अंतिम समय तक काम करती रहीं. इन दिनों वह ‘‘स्टार भारत’’ पर प्रसारित हो रहे सीरियल ‘‘निमकी मुखिया’’ में दादी यानी कि इमरती देवी के किरदार को निभा रही थीं.

अपनी बीमारी की वजह से उन्हें काम करने में दिक्कत हो रही थी. इसके बावजूद वह लगातार काम करती रहीं. उन्होंने कुछ लोगों से कहा था- ‘‘बुढ़ापे में होने वाली बीमारी के डर से क्या काम करना छोड़ दें. मुझे काम करना व व्यस्त रहना पसंद है. मुझे हर समय अपनी हालत पर सोचना पसंद नहीं. इसलिए मैं खुद को व्यस्त रखती हूं.’’

रीता भादुड़ी ने यह कोई नई बात नहीं कही थी. हमें याद है रीता भादुड़ी शुरू से ही मेहनत कश व ईमानदार कलाकार रही हैं. रीता भादुड़ी से हमारी पहली मुलाकात 1987 में निर्माता राकेश चौधरी के शिक्षा जगत पर आधारित सीरियल ‘‘चुनौती’’ के सेट पर हुई थी. उसके बाद भी उनसे हमारी काफी मुलाकातें होती रहीं है, इन मुलाकातों पर बाद में बात करेंगे. सीरियल ‘चुनौती’ में उन्हें काफी पसंद किया गया था. इसके बाद रीता भादुड़ी ने काफी जटिल किरदार राकेश चौधरी निर्देशित सीरियल ‘‘मुजरिम हाजिर है’’ में निभाते हुए काफी शोहरत बटोरी थी. हमने उन्हें हमेशा सेट पर ही पाया था. वह कभी भी मेकअप रूम में आराम करने नहीं जाती थीं. उनका सीन न होने पर भी वह सेट पर बैठी रहती थीं. उनका शुरू से ही मानना रहा है कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं है. हर इंसान को सदैव काम करते हुए खुद को व्यस्त रखना चाहिए.

रीता भादुड़ी ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1968 में फिल्म ‘‘तेरी तलाश’’से की थी. उसके बाद वह पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में ट्रेनिंग लेने पहुंच गयी थीं. उसके बाद 1974 में फिल्म ‘‘कन्याकुमारी’’ से उनके अभिनय करियर की शुरुआत हुई थी. तब से अब तक रीता भादुड़ी ने लगभग सत्तर फिल्मों में अभिनय किया. वह मूलतः बंगाली थीं, पर गुजराती भाषा की फिल्मों में उन्होंने इतना काम किया कि काफी लोग उन्हें गुजराती भाषी अभिनेत्री तक मानते रहे हैं. उनकी चर्चित फिल्मों में ‘‘जूली’, ‘उधार का सिंदूर’, ‘कालेज गर्ल’, ‘सावन को आने दो’, ‘बेटा’, ‘राजा’,  ‘मां की ममता’, ‘विरासत’, ‘हीरो नंबर वन’रही हैं. वह 2012 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘कवि रीते जैस’’ में नजर आयी थी.

फिल्मों के अलावा छोटे परदे पर भी रीता भादुड़ी ने काफी काम किया. ‘चुनौती, ‘मुजरिम हाजिर’के अलावा ‘रिश्ते’, ‘खिचड़ी’, ‘छोटी बहू’, ‘अमानत’, ‘हम सब बाराती’, ‘एक महल हो सपनों का’, ‘साराभई वर्सेस साराभाई’, ‘काजल’और ‘नेमकी मुखिया’ सहित कई लोकप्रिय सीरियलों में अभिनय किया था.

रीता भादुड़ी के निधन पर अनिल कपूर, जरीना वहाब, जुही परमार, रूबीना दलाइक, शिवानी चक्रवर्ती सहित तमाम बौलीवुड और टीवी उद्योग से जुड़े कलाकारों ने अपना दुःख प्रकट किया है.

फोन या लेपटौप की स्क्रीन साफ करते समय भूलकर भी ना करें ये गलतियां..!

अगर आप फोन और लैपटौप का इस्तेमाल करते हैं तो ये खबर आपके लिए ही है. अगर फोन या लैपटौप का डिस्पले साफ करते समय हाथ साफ नहीं हैं तो डिस्पले पर निशान पड़ जाते हैं और डिवाइस देखने में अच्छी नहीं लगती. स्क्रीन पर आने वाले मामूली निशान तो आसानी से साफ हो जाते हैं, लेकिन यदि गंदगी का कोई गहरा निशान बन जाए तो उसे हटाना काफी मुश्किल होता है. टचस्‍क्रीन के सही ढंग से साफ नहीं होने पर यह सही से काम भी नहीं करती है.

महंगे स्मार्टफोन्स और टैबलेट्स की स्क्रीन को सुरक्षित रखने के लिए डायरी कवर, टैम्पर्ड ग्लास, स्क्रीन प्रोटेक्टर जैसी चीजें मार्केट में उपलब्ध हैं. हालांकि, गोरिल्ला ग्लास आने के बाद स्क्रीन डैमेज का खतरा काफी कम हुआ है. लेकिन फिर भी कई बार फोन की स्क्रीन काफी गंदी हो जाती है जिसे साफ करते समय कई बातों का ध्यान रखना बेहद जरुरी है.

जानें स्मार्टफोन और लैपटौप की स्क्रीन को साफ करते वक्त किन सावधानियों को बरतना चाहिए.

स्क्रीन साफ करते समय क्या न करें

– स्क्रीन साफ करते समय ग्लास क्लीनर जैसे कैमिकल्स का इस्तेमाल न करें. साथ ही अमोनिया जैसे क्लीनर्स का भी इस्तेमाल करने से बचें. स्क्रीन को आसानी से बिना कैमिकल के भी साफ किया जा सकता है.

– स्क्रीन को साफ करने के लिए कभी भी पानी का इस्तेमाल न करें. यह स्मार्टफोन या टैबलेट को खराब भी कर सकता है. अगर जरुरत हो तो माइक्रोफाइबर कपड़े को हल्का-सा पानी में भिगोएं और उससे फोन की स्क्रीन को साफ करें.

– इसे साफ करने के लिए प्लास्टिक, टिशू पेपर या किसी भी तरह का सख्त कपड़ा इस्तेमाल न करें. इससे स्क्रीन पर स्क्रैच पड़ सकते हैं.

– स्क्रीन साफ करते समय उस पर ज्यादा दबाव न डालें. इससे स्क्रीन टूट भी सकती है.

स्मार्टफोन में छिपे हुए ऐप्स और फोल्डर का ऐसे लगाएं पता

आपने कई बार देखा होगा कि कुछ लोग अपने फोन पर किसी भी ऐप या दूसरी मीडिया फाइल को हाईड कर देते हैं. दरअसल गूगल प्ले स्टोर पर कई ऐप्स मौजूद हैं, जिनकी मदद से आप अपने फोन के ऐप्स, फोल्डर्स के साथ-साथ फोटोज और वीडियोज को भी हाईड कर सकते हैं. लेकिन उस हाईड किये गए ऐप को कोई और नहीं देख सकता. उसे केवल वहीं देख सकता है जिसने उसे हाईड कर रखा है.

आज हम आपके लिए एक ऐसा तरीके लेकर आएं हैं जिसकी मदद से आप किसी के भी मोबाइल में जाकर हाईड ऐप्स या फोल्डर को आसानी से देख सकेंगे. इसके लिए आपको ना ही अलग से कुछ खास करने की जरूरत है और ना ही अलग से कोई ऐप डाउनलोड करने की आवश्यकता.

स्टेप 1: हाईड ऐप्स या फोल्डर का पता लगाने के लिए सबसे पहले आप अपने फोन की सेटिंग्स में जाइये.

स्टेप 2: यहां आपको कई सारे विकल्प दिखेंगे. इनमें आपको Apps का विकल्प भी दिखाई देगा, इसपर टैप करें.

स्टेप 3: Apps पर टैप करने के बाद एक पेज खुलेगा. यहां आपको फोन के सारे ऐप्स दिखाई देंगे. इन ऐप्स में से उन ऐप्स को खोजिए जो मोबाइल के ऐप्स या फोल्डर को हाईड करते हैं. फिर उस ऐप पर टैप करें.

स्टेप 4: यहां आपको Force Stop का विकल्प दिखाई देगा इस पर टैप करें.

स्टेप 5: आपका स्मार्टफोन एक बार फिर से आपसे पूछेगा कि ऐप को Force Stop करना है या नहीं. OK पर टैप कर दें.

इसके बाद ऐप काम करना बंद कर देगा और फोन के सारे हाईड किए हुए ऐप्स दिखने लगेंगे. ऐसे ही सारे हाईड की हुई फोटोज, वीडियोज और फोल्डर्स को आप आसानी से देख सकते हैं वो भी बिना किसी परेशानी के.

मैं निजी जिंदगी में पार्थवी से बहुत अलग हूं: जान्हवी कपूर

बौलीवुड में अभिनेत्री के तौर पर जो मुकाम, जो सुपर स्टारडम श्रीदेवी को मिला, वह किसी अन्य अभिनेत्री को नहीं मिल पाया. इसके बावजूद वह अपनी बेटी जान्हवी कपूर को फिल्मों/बौलीवुड से जुड़ने की इजाजत देने से पहले हिचकिचा रहीं थी. पर अंततः श्रीदेवी ने अपनी बेटी जान्हवी कपूर को अभिनय के क्षेत्र में उतरने की इजाजत दे दी थी. श्रीदेवी के सामने ही उनकी बेटी जान्हवी कपूर की पहली फिल्म ‘‘धड़क’’ की शूटिंग भी शुरू हो गयी थी. जान्हवी को फिल्मों से जुड़ने की इजाजत दिए जाने पर एक खास मुलाकात के दौरान श्रीदेवी ने हमसे कहा था- ‘‘मैं एक ही बात जानती हूं, ‘नो पेन नो गेन’. बिना दर्द सहे, कुछ भी नहीं मिलता. मेहनत तो करनी पड़ेगी. देखिए, यह मेरी बेटी की डेस्टिनी है कि उसे हीरोईन बनना है. शुरुआत में मेरे प्रोत्साहित ना करने के बावजूद हीरोईन बनने का उसका डेडीकेशन खत्म नहीं हुआ. मैंने अपनी तरफ से उनका ध्यान पढ़ाई की तरफ रखने की कोशिश की, लेकिन उनकी डेस्टिनी में फिल्म हीरोईन बनना लिखा है, तो घूम फिरकर वह वहीं आ गयीं.’’

हाल ही में जब जान्हवी कपूर से हमारी मुलाकात हुई, तो हमने उन्हें उनकी मम्मी की यह बात भी बतायी.

प्रस्तुत है जान्हवी कपूर से हुई बातचीत के अंश…

यूं तो आप सिनेमा से जुड़े परिवार से ही संबंध रखती हैं. पर आपके दिमाग में अभिनय को करियर बनाने की बात पहली बार कब आयी थी?

बचपन से ही मुझे अभिनय व फिल्मों का शौक रहा है. मैं बचपन से ही सिनेमा देखते हुए बड़ी हुई हूं. मुझे जिंदगी का नजरिया फिल्मों ने ही सिखाया है. पर बीच में मुझे लगा कि कुछ दूसरा काम करना चाहिए. इसलिए मैंने फैशन का कोर्स किया. लेकिन उसके बाद मुझे लगा कि अभिनय को ही करियर बनाना चाहिए.

आपकी मम्मी श्रीदेवी जी के साथ मेरी कई मुलाकातें रही हैं. उनसे काफी बातचीत हुई थी. उन्होंने बताया था कि वह पहले नहीं चाहती थी कि आप सिनेमा से जुड़े. आप बताएं कि आपने उन्हें कैसे मनाया था?

मुझे अपनी मम्मी को मनाना नहीं पड़ा. पहले उन्होंने मुझे मना करते हुए कहा था कि, ‘जल्दबाजी मत करो. थोड़ा समय लेकर समझो. यह आसान काम नहीं है. अभिनेत्री के तौर पर बहुत काम करना पड़ता है. मेहनत करनी पड़ती है और तमाम तरह की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है.’ वास्तव में मेरी मम्मी को लगता था कि मैं संघर्ष नहीं कर पाउंगी. मैं उनकी बहुत ही ज्यादा प्रोटेक्टिव बेटी रही हूं. जबकि वह मेरी छोटी बहन खुशी को लेकर इतना प्रोटेक्टिव कभी नहीं थी, जितना मुझे लेकर थीं. उन्हें लगता था कि उनकी बेटी संघर्ष क्यों करें. वह कहती थी कि, ‘मैंने आपको एक अच्छी जिंदगी जीने की सुविधाएं दी हैं, आप उसे जियो.’ एक दिन मैंने अपनी मम्मी से कहा कि, ‘मुझे संघर्ष करने से परहेज नहीं है. मैं अभिनय ही करना चाहती हूं. मैं अपनी मेहनत, अपनी प्रतिभा के बल पर साबित करना चाहती हूं कि मैं कुछ बेहतर रचनात्मक काम कर सकती हूं.’ उसके बाद मम्मी ने आगे बढ़ने का आशीर्वाद दिया था.

आपकी पहली फिल्म ‘‘धड़क’’ प्रदर्शित हो रही है. इससे आप काफी उत्साहित होंगी?

उत्साहित भी हूं और नर्वस भी. अभी तक तो मैं फिल्म की शूटिंग वगैरह में व्यस्त थी, तो बहुत मजा आ रहा था. अब 20 जुलाई को फिल्म के प्रदर्शन के बाद लोगों की प्रतिक्रिया का बेसब्री से इंतजार है. हां! जो मैंने सोचा था कि मुझे अभिनय करना है, उसकी शुरुआत जरूर हो गयी है. पर अभी मुझे बेहतरीन काम करने का हक कमाना है.

करियर की पहली फिल्म के रूप में आपने ‘‘धड़क’’को ही तवज्जो क्यों दी?

‘धड़क’से पहले भी कई फिल्मों के साथ मेरे जुड़ने की बातें होती रही हैं. पर कहीं न कहीं उन फिल्मों के साथ जुड़ने के लिए मैं पूरी तरह से तैयार नहीं हो रही थी. मगर मैंने अपनी मम्मी के साथ मराठी फिल्म ‘सैराट’देखी थी. ‘सैराट’देखने के बाद मैं फिल्म के किरदारों के साथ जुड़ गयी थी. मेरे मन में यह बात आयी थी कि इनके प्यार को सुरक्षित किया जाना चाहिए. फिल्म खत्म होने के बाद मेरा दिल भारी हो गया था, काफी देर तक मैं बात नहीं कर पायी थी. इस फिल्म को देखने के बाद मेरे दिमाग में आया था कि हम भी इसी तरह का कुछ काम करके लोगों को एक अलग तरह का अहसास दिला सकें. फिर जब करण जोहर ने बताया कि वह ‘सैराट’का रीमेक कर रहे हैं, जिसका निर्देशन शशांक खेतान करेंगे और हीरो होंगे ईशान खट्टर, तो मैं बहुत उत्साहित हो गयी थी. मुझे इस बात की खुशी थी कि जिन प्यार करने वालों के प्यार को सुरक्षित करने की बात मेरे दिमाग में आयी थी, अब उन्हीं किरदारों को परदे पर साकार करने का मौका मुझे मिल रहा है. मैंने शंशाक की फिल्म ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ देख रखी थी. तो मुझे इस बात का अहसास था कि वह अपने किरदारों को बहुत वास्तविक बनाते हैं और कहानी को बहुत ह्यूमर के साथ पेश करते हैं. ईशान तो पहुंचे हुए प्रतिभाशाली कलाकार हैं.

आपको ‘सैराट’में क्या खास बात पसंद आयी?

जिस तरह से नागराज मंजुले ने दोनों किरदारों को फिल्म में पेश किया है, वह बहुत अनूठा है. उन्होंने दोनों किरदारों को बहुत वास्तविक और यथार्थ के धरातल पर पेश किया है. इसमें हीरो या हीरोईन वाला मसला भी नहीं है. लड़की का किरदार तो काफी सशक्त है. रिंकू राजगुरू ने इस किरदार को बहुत ही बेहतर तरीके से परदे पर पेश किया है. पहली बार किसी फिल्म में दिखाया गया कि लड़की खुद दुनिया को ही नहीं, बल्कि लड़के को भी बता रही है कि प्यार में उसे क्या कदम उठाना चाहिए. मेरे लिए यह बहुत दिलचस्प बात थी. दर्शकों को यह बात बहुत पसंद आयी. लड़की का किरदार बहुत बेहतर है. कई मोड़ों से गुजरते हुए वह शादी करती है, मां बनती है. मेरी नजर में रिकूं राजगुरू का अभिनय अति सर्वश्रेष्ठ है.

सैराट’ की हीरोईन और ‘धड़क’में आप में क्या फर्क है?

देखिए, दोनों फिल्मों की दुनिया अलग है. इसलिए किरदारों की दुनिया भी अलग है. ‘सैराट’महाराष्ट् के गांव की कहानी है. ‘धड़क’ राजस्थान में झीलों की नगरी उदयपुर की कहानी है. तो ‘धड़क’में मेरा किरदार बहुत अलग है. पार्थवी की परविरश राजशाही परिवार में हुई है. उसके पिता राजनीति में है. वह महल जैसी कोठी में रहती है. जो कि बदलते समय के साथ अब होटल में परिवर्तित हो चुकी है. इसी के चलते अब पार्थवी का साबका तमाम देशी व विदेशी पर्यटकों से होता रहता है.

जब हम रेकी करने उदयपुर गए, तो मैंने पाया कि लोगों में एक शान का अहसास है. वहां के लोगों में इस बात का अहसास झलकता है कि वह शानो शौकत से रहने वाले लोग हैं. यह बात मेरे किरदार में भी है. पार्थवी थोड़ा घमंडी भी है. वह मानकर चलती है कि वह जो कुछ कहे, उसे लोगों को मानना चाहिए. उसमें बचपना भी है. पर वह मानती है कि राजशाही परिवार की होने की वजह से वह रानी है. मेरा पार्थवी का किरदार काफी सशक्त है. इसी तरह‘सैराट’में अर्चना उर्फ आर्शी का किरदार भी काफी सशक्त है. हां! पार्थवी आत्मकेंद्रित ज्यादा है.

जान्हवी और पार्थवी में कितना अंतर है?

मैं निजी जिंदगी में पार्थवी से बहुत अलग हूं. हम दोनों भोले हैं, पर परवरिश का अंतर भी है. मैं मुंबई में पली बढ़ी हूं. मेरी शिक्षा दीक्षा अलग हुई है. मेरा पारिवारिक माहौल अलग है.

ऐसे में खुद को पार्थवी में ढालने के लिए क्या तैयारी की?

मैं अपनी मेहनत को लेकर बहुत कुछ नहीं कहना चाहती. अन्यथा कल फिल्म देखकर आप कहेंगे कि बेचारी ने सब कुछ किया, पर बात जमी नहीं.

आप अभी से इतनी नकारात्मक सोच लेकर क्यों चल रही हैं? आपकी मेहनत जरुर सफल होगी?

मैं बहुत सकारात्मक सोच वाली लड़की हूं. मैं हमेशा सकारात्मक सोच के साथ ही आगे जाती हूं. मुझे इस फिल्म से बहुत उम्मीदें है. क्योंकि मैंने अपनी तरफ से कोई कमी नही छोड़ी है. इसलिए चिंता नही है. मैंने पूरी ईमानदारी से काम किया है. इसके बावजूद मैं चाहती हूं कि लोग फिल्म देखकर, मेरी मेहनत व मेरे काम के बारे में बातें करें. जब लोग मेरे काम की तारीफ करेंगे, तब मुझे लगेगा कि अब मैंने अपने काम के बारे में बात करने का हक पा लिया है. अभी अपने बारे में बात करना मुझे अजीब सा लग रहा है.

आपको खुलकर बात करनी चाहिए?

इस किरदार को निभाने से पहले मैं ईशान के साथ रेकी पर गयी थी. जयपुर और उदयपुर में हम खूब घूमे. हर आम इंसान से हमने मिलने की कोशिश की, उनके रहन साहन, पहनावे, चाल ढाल को हमने समझा. लोगों से व्यवहार करने का तरीका और उठने बैठने का तरीका सीखा. हमने वहां के इतिहास, वहां की सभ्यता,संस्कृति व भाषा को भी जाना. उसके बाद पटकथा को लेकर मैंने अपने किरदार की कहानी पर काम करना शुरू किया. हमने यह समझने की कोशिश कि किसी स्थिति में उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी? उसके दिमाग में क्या चल रहा है? उसके पसंदीदा रंग व फिल्म आदि के बारे में भी समझा. उसकी बचपन कि यादें क्या हैं, इसे भी समझा.

‘‘धड़क’’ करने से पहले आपने अपने घर में किससे सलाह ली थी?

मैंने यह फिल्म अपनी मां श्रीदेवी के सामने ही साइन कर ली थी. उनसे मुझे कुछ सलाह मिली थी. मेरे पापा ने मुझे सलाह दी थी कि मुझे अभिनय नही करना है. मेरी मम्मी बार बार मुझसे कहती थी कि एक अच्छा कलाकार बनने के लिए एक अच्छा इंसान बनना जरूरी है. कई बार ऐसा हुआ कि मैंने मम्मी के सामने कोई सीन पढ़ा, तो मम्मी ने कहा कि मैं कुछ नहीं बताउंगी. तुम खुद अपने आपसे करो. मेरी मम्मी को यह बात सताती थी कि उनकी बेटी की तुलना उनसे की जा सकती है? मेरी मम्मी चाहती थी कि मैं खुद अपनी एक अलग पहचान बनाउं. ऐसे में यदि मम्मी किसी सीन को अपने अंदाज में करने की सलाह देती, तो उसमे उनकी छाप आ जाती.

सैराट’ के साथ ही ‘धड़क’ में भी औनर किलिंग का मुद्दा उठाया गया है. फिल्म करने से पहले आप औनर किलिंग से कितना वाकिफ थी?

औनर किलिंग की खबरें पढ़ती व सुनती रही हूं. मुझे लगता है कि ‘सैराट’के बाद इस मुद्दे को लेकर लोगों में जागरूकता आयी. मैं एक वाकिया बताना चाहूंगी. हम रेकी के लिए उदयपुर और जयपुर गए थे. तब मैंने वहां पर कुछ लोगों से ‘औनर किलिंग’पर मेरी बातचीत हुई थी. मैंने उनसे पूछा कि उनकी बेटी किसी गैर जाति या गैर बिरादरी के लड़के से प्यार कर घर से भागकर शादी कर ले, तो वह क्या करेंगे? इस पर कईयों के जवाब मुझे मेरी फिल्म ‘‘धड़क’’की कहानी के अनुरूप मिले. तब मुझे अहसास हुआ कि हमारे देश की संस्कृति में यह चिंता का विषय है. रेकी के ही दौरान हमें पता चला कि हमारे देश में सिर्फ जातिवाद हीं नही सामाजिक व आर्थिक स्तर में अंतर होने पर भी औनर किलिंग हो रही है. यह समस्या छोटे शहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बड़े शहरों में भी व्याप्त है.

हमारी फिल्म के निर्देशक शशांक ने मुझे बताया था कि वह कई ऐसे परिवारों को जानते हैं, जहां प्रेम में जाति रोड़ा बनी, पर वहां औनर किलिंग नहीं हुई. लेकिन पारिवारिक विरोध हुआ. यह शर्मिंदगी की बात है कि प्यार को लोग कड़वा अहसास बना देते हैं.

इशान खट्टर के साथ काम करने के आपके अनुभव क्या रहे?

उससे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला. वह ‘धड़क’से पहले विश्व प्रसिद्ध निर्देशक माजिद मजीदी के संग फिल्म ‘बियांड द क्लाउड्स’की शूटिंग पूरी कर चुका था. मेरी राय में वह अति प्रतिभाशाली कलाकार के साथ अच्छा इंसान है. सेट पर उसकी वजह से एक एनर्जी आ जाती थी. उसके अंदर अभिनय की प्यास बहुत ज्यादा है. जब हम कोई सीन उसके साथ करते थे, तो वह हमें हकीकत के करीब ले जाता था. सेट पर उसके साथ काम करना अपने आप मजेदार हो जाता था. उसके जैसा सहकलाकार हो, तो काम अपने आप अच्छा हो जाता है.

आपके हाथ से रोहित शेट्टी की फिल्म ‘‘सिंबा’’ चली गयी?

मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं. रोहित ने इस फिल्म में नए चेहरों को शामिल किया है. फिल्म के लिए कलाकारों का चयन करना तो निर्देशक का अपना अधिकार है. मैं तो इस फिल्म को देखने के लिए बेताब हूं.

आपको फैशन की जो समझ है, वह अभिनय में कहां मदद करती है?

फैशन में मेरी जो समझ है, वह सब मैंने मनीष मल्होत्रा जी से सीखा है. फैशन की यह समझ मुझे कहीं न कहीं अपने किरदार को गढ़ने में मददगार साबित होती है. मसलन, ‘धड़क’ में मेरा पार्थवी का किरदार अमीर खानदान से है. उसके पास अनाप शनाप धन है. तो जब वह अपने लिए कपड़े बनवाएगी, तो उसके पास पैसे बहुत होंगे, उसके कपड़ों में घेर काफी होगा. कपडे के उपर कई तरह के काम करवाएगी. पर यदि पैसा नही होगा, तो उसके कपड़ों के रंग वगैरह हर चीज पर फर्क पड़ जाएगा. देखिए, जब आप कोई कपड़ा पहनते हैं, तो आपको एक अलग तरह का अहसास होने लगता है. सेट पर पार्थवी के कपड़े पहनते ही मेरे अंदर अपने आप बदलाव आ जाता था. तो फैशन की समझ कलाकार को बहुत ज्यादा मदद करती है.

वनडे मैच में नंबर 4 पर खेलने के लिये भारतीय टीम मे जारी है विवाद

भारतीय टीम ने इंग्लैंड के खिलाफ अपने क्रिकेट सीरीज का आगाज टी20 सीरीज में जीत हासिल करके की. इसके बाद दोनों देशों के बीच वनडे सीरीज खेली जा रही है लेकिन भारतीय टीम में चौथे नंबर पर बल्लेबाजी को लेकर अब भी निश्चितता नहीं बनी है. क्रिकेट में जब नंबर चार पर बल्लेबाजी करने वाले बल्लेबाजों की बात होती है तो इसमें महेला जयवर्धने या एबी डीविलियर्स का नाम सबसे पहले आता है जिन्हें इस क्रम पर बेजोड़ बल्लेबाज माना जाता था. नंबर चार की बल्लेबाजी टौप और्डर और निचले क्रम के बल्लेबाजों के बीच पुल का काम करता है. किसी भी टीम के लिए इस नंबर की बल्लेबाजी उनके बैटिंग लाइनअप को बैलेंस करने का काम करती है.

भारतीय टीम की बात करें तो युवराज सिंह के अलावा इस क्रम पर आठ बल्लेबाजों को आजमाया जा चुका है लेकिन इस नंबर पर युवी जितना सफल कोई नहीं रहा. इस क्रम पर बल्लेबाजी करने वाले खिलाड़ी को परिस्थिति के हिसाब से खुद को ढालना होता है. इस क्रम पर ऐसे बल्लेबाज की जरूरत होती है जो ना तो बहुत तेज खेलता हो और ना ही स्लो बल्लेबाजी करता हो. शायद यही वजह रही कि युवराज इस क्रम पर भारतीय टीम के लिए काफी समय तक खेलते रहे और सफल हुए. अब टीम के नए कप्तान विराट के लिए इस क्रम के लिए किसी स्थायी बल्लेबाज को ढूंढ़ना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.

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विश्व कप 2011 में भारतीय टीम के लिए विराट ने इस भूमिका को बखूबी निभाया था. गंभीर टीम के लिए तीसरे ओपनर के तौर पर थे इसलिए वो तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी करते थे. इसके बाद विश्व कप 2015 में अजिंक्य रहाणे ने इस क्रम पर बल्लेबाजी की. वर्ष 2015 के विश्व कप के बाद  इस नंबर पर कई भारतीय बल्लेबाजों को आजमाया गया लेकिन कोई भी इस क्रम पर सफल नहीं हुआ. एक बार फिर से चैंपियंस ट्रौफी 2017 के लिए युवी पर भरोसा जताते हुए उन्हें इस क्रम पर बल्लेबाजी की जिम्मेदारी दी गई.

औस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत में खेले गए सीरीज में नंबर चार पर हार्दिक पांड्या को आजमाया गया जिनकी जिम्मेदारी स्पिन अटैक को आक्रामक अंदाज में खेलना था लेकिन वो इस नंबर पर निरंतर नहीं रह सके. मनीष पांड, श्रेयस अय्यर को भी कुछ मैचों में मौका मिला लेकिन कुछ खास हासिल नहीं हुआ. इसके बाद टीम मैनेजमेंट ने केदार जाधव को चौथे नंबर पर आजमाया लेकिन वो चोटिल हो टीम से बाहर हो गए.

आइपीएल 2018 में अपने अच्छे प्रदर्शन के जरिए भारतीय टीम में जगह बनाने वाले दिनेश कार्तिक को इस नंबर पर बल्लेबाजी की जिम्मेदारी दी गई लेकिन फिर सवाल ये उठा कि लोकेश राहुल अब किस नंबर पर बल्लेबाजी करेंगे. राहुल ने भी इस आइपीएल में बेहतरीन प्रदर्शन किया था और टी20 प्रारूप में ओपनिंग के लिए पूरी तरह से फिट थे. इंग्लैंड के खिलाफ विराट ने उन्हें तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी के लिए भेजा और उन्होंने इस सीरीज में अपने टी20 करियर का दूसरा शतक भी लगाया.

वनडे में लग रहा था कि लोकेश ओपनिंग करेंगे लेकिन उन्हें चौथे नंबर पर भेजा गया और वो पूरी तरह से फ्लौप रहे. इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय टीम स्थिति के हिसाब से अपने बल्लेबाजों का क्रम तय करती है लेकिन टीम को एक अदद बल्लेबाज की जरूरत है जो नंबर चार पर बल्लेबाजी कर सके. सबसे बड़ी बात ये कि विश्व कप तक भारतीय टीम को एक बल्लेबाज तो इस क्रम के लिए तैयार करना ही पड़ेगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो टीम को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है.

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