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इस ट्रिक से बढ़ाए फोन की इंटरनल मेमोरी

क्या आपको पता है कि आप फोन के मेमोरी कार्ड को इंटरनल मेमोरी बना सकते हैं. अगर नहीं… तो आज हम आपको ऐसी ट्रिक बताने जा रहे हैं, जिसकी मदद से आप अपने फोन की इंटरनल मेमोरी को बढ़ा सकते हैं. इसके लिए आपको किसी भी तरह का कोई ऐप डाउनलोड करने की जरूरत नहीं है. यह आप कुछ सिंपल स्टेप में फोन की सेटिंग में बदलाव कर ऐसा कर सकते हैं.

ऐसे बढ़ाए इंटरनल मेमोरी

हम जो ट्रिक आपको बताने जा रहे हैं उसके माध्यम से आपके फोन की इंटरनल मेमोरी और SD कार्ड मेमोरी एक ही हो जाएगी. ऐसा करने पर फोन की सभी चीजें आपकी इंटरनल मेमोरी में सेव हो जाएंगी. ऐसा होने पर आपको ज्यादा मेमोरी यूज करने को मिल जाएगी. फोन की मेमोरी फुल होने पर आपको मीडिया फाइल्स को SD कार्ड में मूव नहीं करना होगा. इसके लिए आपको ये स्टेप फौलो करने होंगे.

यह करना होगा

  • फोन की इंटरनल मेमोरी और माइक्रो एस डी कार्ड की मेमोरी को एक करने के लिए सबसे पहले स्मार्टफोन की Settings में जाकर Storage पर टैप करें. अब इसमें आपको Portable Storage (पोर्टेबल स्टोरेज) का औप्शन मिलेगा, उस पर टैप करें.
  • इसके बाद फोन में नया पेज ओपन होगा जिसमें आप टौप पर दिखाई दे रहे तीन डौट को टैप करें. अब फिर से Settings का औप्शन दिखेगा, उस पर टैप करें.
  • Settings में जाने के बाद Format as internal पर टैप करें.
  • फिर Erase & Format पर टैप करना होगा और आगे की प्रोसेस फौलो करते जाएं. ऐसा करने से पहले अपना डाटा सेव करके रख लें. ताकि डाटा के डिलीट होने का कोई चांस न रहे.
  • इस प्रोसेस के पूरा होने पर इंटरनल स्टोरेज SD Card की स्टोरेज ले लेगी. अब आप जो भी ऐप और गेम इंस्टौल करेंगे वो इंटरनल स्टोरेज में सेव होंगे.

क्या आप जानते हैं ईमोजी के बारें में ये खास बातें..?

सोशल मीडिया प्लैटफौर्म्स पर हर जगह ईमोजी की बौछार है. अब ये हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुके हैं. बच्चों से लेकर युवा तक इनके जरिए दूसरों तक अपनी भावनाएं जाहिर करने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं. पर वे कई बार ऐसे ईमोजी भी बाकी लोगों को भेज देते हैं जिनका मतलब उन्हें भी नहीं मालूम होता, जबकि असल में वे ईमोजी बेहद शर्मिंदा करने वाले होते हैं. आइए जानते हैं ईमोजी असल में है क्या? और कुछ ऐसे ईमोजी के बारे में, ताकि आपको आगे से किसी के सामने शर्मिंदा न होना पड़े.

क्या है ईमोजी?

ईमोजी का असल अर्थ पिक्टोग्राफ होता है, जो कि पिक्चर और कैरेक्टर से मिलकर बना है. ये आइडियोग्राम और स्माइली होते हैं, जिन्हें इलेक्ट्रानिक मैसेज और वेब पेजों पर इस्तेमाल किया जाता है. ये ढेर सारे जौनर में उपलब्ध होते हैं, जिसमें फेशियल एक्सप्रेशंस, कौमन अपजेक्ट्स, जगहें, मौसम, जानवर, खाने-पीने का सामान की आकृति होती है. जापान में साल 1999 में इनका सबसे पहले इस्तेमाल हुआ था, जबकि 2010 के बाद यह काफी प्रचलन में आए. आज ये पश्चिमी देशों में पौपुलर संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं. स्टैंडर्ड यूनिकोड प्लैटफौर्म में फिलहाल 722 विभिन्न ईमोजी कैरेक्टर्स हैं. साल 2013 में आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में ‘ईमोजी’ शब्द जोड़ा गया था.

हाथ लहराती लड़कीः बैगनी रंग के लिबास में हाथ लहराती लड़की का यह ईमोजी न तो अच्छे हेयरकट को दर्शाता है. न ही किसी को हाय-हेलो करता है. देखने में यह मल्टी फंक्शनल मालूम पड़ता है. मगर असल में यह इन्फौर्मेशन डेस्क गर्ल का ईमोजी होता है.

नाचते हुई दो लड़कियां: पीले रंग की जुड़वां लड़कियों का ईमोजी भी कई बार लोग उत्साह जाहिर करने या अपनी दोस्ती का प्यार जगजाहिर करने के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं. पर इसका असल मतलब कुछ और ही होता है. दोनों ही लड़कियों के सिर पर बनी (खरगोश) वाले कान भी होते हैं. जापानी कौन्सेप्ट के अनुसार, बनी गर्ल सेक्स अपील को दर्शाती हैं.

चमकदार सिताराः सोशल मीडिया पर कुछ अलग, अनोखा और करिश्माई होने पर लोग इस चमकदार सितारे वाले ईमोजी को प्रयोग में लाते हैं. कई लोग इसे शूटिंग स्टार भी समझ बैठते हैं, जिसका असली अर्थ चक्कर आना होता है. ऐसे में आप आगे से संभल कर इस ईमोजी को भेजें, क्योंकि हो सकता है सामने वाले को इस ईमोजी का मतलब पता हो.

पूप (मल) ईमोजीः बातचीत के दौरान मस्ती में लोग इस ईमोजी को भी इस्तेमाल कर लेते हैं. यह पूप ईमोजी होता है. यानी इसके जरिए मल दर्शाया जाता है. हालांकि, जापानी संस्कृति में यह गुडलक के लिए यूज होता है.

आंखें बंद वाला ईमोजीः क्रौस का चिन्ह आंखों पर लिए वाले ईमोजी को लोग बिना सोचे-समझे इस्तेमाल कर लेते पर यह किसी के निधन या बेहोश होने पर इस्तेमाल किया जाता है.

प्रार्थना करते हुए हाथः पूजा-पाठ या विनम्र निवेदन के लिए अक्सर लोग ये दो जुड़े हाथ वाला ईमोजी यूज करते हैं, मगर जापानी संस्कृति में इस ईमोजी को गलती पर माफी मांगने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

इन ईमोजी के हैं गंदे अर्थः वहीं, लव होटल ईमोजी का मतलब वेश्यालय होता है. साइलेंट फेस का अर्थ मुंह बंद रखने के लिए किया जाता है. सिरिंज वाले को ड्रग लेने के लिए दर्शाया जाता है. स्पलैश वाला आर्गैज्म के लिए. गोल-मटोल आंखें- सेक्सी सेल्फी की मांग के लिए.

इस गेंदबाज ने वो कर दिखाया जो अब तक कोहली और धोनी भी नहीं कर सकें

भारतीय टीम ने लीड्स में खेले गए तीसरा वनडे गंवा कर सीरीज भी अपने हाथ से जाने दी. तीसरे मैच में भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए इंग्लैंड को 50 ओवर में 257 रन का लक्ष्य दिया. इस मैच में भारतीय बल्लेबाज इंग्लैंड के सभी गेंदबाजों के सामने परेशान नजर आए. इंग्लैंड की तरफ से लेग स्पिनर आदिल रशीद और तेज गेंदबाज डेविड विली ने 3-3 विकेट लेकर भारत की मजबूत बल्लेबाजी को बांधे रखा.

भारतीय टीम में रोहित शर्मा, विराट कोहली, महेंद्र सिंह धौनी और पांड्या जैसे बल्लेबाज है जो कभी भी छ्क्के मार सकते हैं लेकिन ये सभी इंग्लैंड के खिलाफ ऐसा करना में पूरी तरह नाकाम रहे. तीसरे मैच में भारत की पारी में केवल 2 छ्क्के लगे वह भी शार्दुल ठाकुर के बल्ले से. अब जब मुख्य बल्लेबाज एक भी छक्का ना मार पाए और गेंदबाज ऐसा कर दे तो आश्चर्य तो होगा ही. 8वें नंबर पर बल्लेबाजी करने उतरे शार्दुल ने बेन स्टोक्स के ओवर में 2 छक्के लगाए. 19वें ओवर करने आए स्टोक्स की पहली और पांचवीं गेंद पर छक्का मार शार्दुल ने भारतीय टीम का स्कोर 250 के पार पहुंचाया.

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शार्दुल के छक्कों की तो बात हो गई लेकिन क्या आपको पता है कि भारतीय टीम ने इससे पहले आखिरी छक्का पहले वनडे में मारा था. उस मैच में भी 32वें ओवर में मोइन अली की गेंद पर छक्का लगा था. भारत ने उस मैच में इंग्लैंड को 8 विकेट से हराया था. इसके बाद लौर्डस में खेले गए दूसरे वनडे में भी भारतीय बल्लेबाज एक भी छक्का नहीं मार पाए थे. अगर गेंदों का हिसाब लगाए तो भारतीय टीम की तरफ से 637 गेंद पर छक्का लगा था.

तीसरे मैच में इसके आसार कम ही नजर आ रहे थे लेकिन वो तो भला हो शर्दुल का जिन्होंने ये कभी याद ना रखने वाला रिकौर्ड नहीं बनने दिया. शार्दुल ने तीसरे मैच में धोनी के आउट होने के बाद बल्लेबाजी की और 8वें विकेट के लिए भुवनेश्वर कुमार के साथ 35 रन की साझेदारी की. इन दोनों की साझेदारी की बदौलत भारत ने 8 विकेट के नुकसान पर 156 रन बनाए.

रिचा चड्ढा को मिली फिल्म ‘‘शकीला’’ की बायोपिक फिल्म

इन दिनों बायोपिक फिल्मों की भेड़चाल का हिस्सा बनने के लिए सभी दौड़ लगा रहे हैं. एक तरफ खिलाड़ियों पर बायोपिक फिल्में बन रही हैं, तो दूसरी तरफ कलाकारों पर भी बायोपिक फिल्में बन रही हैं. सिल्क स्मिता के जीवन पर बनी बायोपिक फिल्म ‘‘द डर्टी पिक्चर्स’’ में सिल्क स्मिता का किरदार विद्या बालन ने निभाया था. हालिया प्रदर्शित संजय दत्त की बायोपिक फिल्म ‘‘संजू’’ में संजय दत्त के किरदार में रणबीर कपूर नजर आ रहे हैं.

अब दक्षिण की सर्वाधिक चर्चित अदाकारा रही शकीला खान की जिंदगी पर इंद्रजीत लंकेश एक अति बोल्ड बायोपिक फिल्म ‘‘शकीला’’ बना रहे हैं. जिसमें शीर्ष भूमिका निभाने के लिए रिचा चड्ढा को अनुबंधित किया गया है. इस फिल्म की शूटिंग अगस्त माह से शुरू होगी. दक्षिण भारत में हर फिल्म के प्रदर्शन के साथ ही शकीला की लोकप्रियता निरंतर बढ़ती गयी. हालात ऐसे हो गए थे कि पुरुष कलाकारों की बनिस्बत शकीला की इज्जत काफी अधिक थी.

सूत्रों की माने तो इस बोल्ड बायोपिक फिल्म से जुड़ने के लिए स्वरा भास्कर और हुमा कुरेशी ने भी काफी प्रयास किए. पर यह फिल्म रिचा चड्ढा के ही हाथ लगी. रिचा चड्ढा बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं, इस बात को वह फिल्म ‘‘गैंग आफ वासेपुर’’ से ही साबित करती आ रही हैं. रिचा चड्ढा महज अभिनय तक सीमित नही हैं. अभिनय व गायन में माहिर रिचा ने एक लघु फिल्म का निर्माण व निर्देशन भी किया है. इन दिनों वह एक किताब लिखने के अलावा एक फीचर फिल्म की पटकथा भी लिख रही हैं.

यह हमारी खुद की ‘धड़क’ है : शशांक खेतान

प्यार के साथ सामाजिक मुद्दो को उकेरने मे फिल्मकार शशांक खेतान को महारत हासिल है. इस बात को वह 2014 में प्रदर्शित अपनी पहली फिल्म ‘‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’’ और 2017 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’’ से साबित कर चुके हैं. इन दोनों ही फिल्मों ने बाक्स आफिस पर जबरदस्त सफलता बटोरी थी. इन दोनों ही फिल्मों का मौलिक लेखन खुद शशांक खेतान ने किया था. अब वह अपनी तीसरी फिल्म ‘‘धड़क’’ में प्यार के साथ ही ‘औनर किलिंग’ का ज्वलंत मुद्दा भी लेकर आए हैं, जिसे नागराज मंजुले ने अपनी मराठी भाषा की सफलतम फिल्म ‘‘सैराट’’ में उठाया था और ‘धड़क’’, ‘सैराट’ पर आधारित फिल्म है. इस तरह ‘धड़क’ शशांक खेतान के करियर की पहली फिल्म है, जिसका मौलिक लेखन उन्होंने नहीं किया. मगर शशांक खेतान का दावा है कि यह ‘सैराट’ पर आधारित होते हुए भी नई और उनके अंदाज की फिल्म है.

नागराज मंजुले निर्देशित मराठी भाषा की फिल्म ‘‘सैराट’’ देखने के बाद किस बात ने आपको इतना प्रभावित किया कि आपने उसका रीमेक धड़क के नाम से बनाने की सोची?

किसी एक प्वाइंट को मैं हाईलाइट नहीं कर सकता. जब मैंने अपनी मां के साथ नासिक के थिएटर में ‘सैराट’ देखी, तो मैं शाक्ड रह गया था. फिर मेरे दिमाग में आया कि ‘सैराट’ की कहानी में जिस तरह के रिश्तों, जिस तरह के कंफलिक्ट की बात की गयी है, उस पर मैं भी अपनी बात रखूं. उसके बाद मैंने कहानी लिखनी शुरू की. मुझे खुशी है कि मैंने ऐसी कहानी लिखी, जिसमें ‘रूह’ तो ‘सैराट’ की है, पर कहानी मेरे अपने अंदाज की है. यह हमारी अपनी खुद की ‘धड़क’ है. मेरी राय में हर फिल्म का काम होता है कि वह दर्शक को सोचने पर मजबूर कर दे. ‘सैराट’ ने मुझे इस कदर सोचने पर मजबूर किया कि मैं ‘धड़क’ लेकर आ गया.

सैराट के किस विचार ने आपको उद्वेलित किया?

हम 21 वीं सदी में जी रहे हैं. हम गर्व से कहते हैं कि हम 2018 में जी रहे हैं. फिर भी हमारे देश में ‘औनर किलिंग’ जैसे कई ऐसे मुद्दे अलग अलग रंगों के साथ हमारे सामने आते जा रहे हैं. इसी बात ने मुझे नई कहानी लिखने के लिए उद्वेलित किया. इसी के साथ फिल्म के दोनों किरदारों के भोलेपन ने भी मुझे प्रेरित किया. दोनों किरदार जिस तरह अपने प्यार को पाने की कोशिश करते हैं, जिंदगी जीने की कोशिश करते हैं, उस बात ने भी मुझे प्रभावित किया.

औनर किलिंग पर आपकी फिल्म ‘‘धड़क’’ क्या कहती है?

फिल्म देखकर दर्शक निर्णय ले, वही ज्यादा बेहतर होगा. पर जातिवाद, उपजातिवाद, धर्म और आपके घर वाले ही आपकी पसंद से खुश ना हो, यह सारे जो मुद्दे हैं, उन सारे मुद्दों पर हमारी फिल्म काफी कुछ कहती है. पर इन सभी मुद्दों के बीच हमारी फिल्म में प्यार के जो सही मायने होते हैं, वह भी चित्रित किया गया है.

सैराट की कहानी महाराष्ट्र के गांव की है. इसे आप धड़क में राजस्थान के उदयपुर शहर ले गए. इसके पीछे कोई खास सोच?

मैं खुद मारवाड़ी हूं. राजस्थान में काफी रहा हूं. दूसरी बात ‘औनर किलिंग’ का मुद्दा हमारे देश के कई राज्यों का काफी ज्वलंत मुद्दा है. इसलिए यह कहानी कहीं भी रखी जा सकती थी. पर मैं राजस्थान से बहुत परिचित हूं. इसलिए मैं कहानी को राजस्थान ले गया.

‘‘धड़क’’ ‘‘सैराट’’ में अंतर?

हमारी फिल्म में मधुकर गरीब है. वह अपने पिता के साथ मिलकर एक रेस्टोरेंट चलाता है. मधुकर के दिमाग में भोलापन और बेधड़क पना भी है, जो कि उदयपुर और राजस्थान के हर बच्चे में होता है. इसी तरह से पार्थवी का किरदार भी बहुत अलग है. पार्थवी राजशाही परिवार से हैं. उनके पिता की बहुत बड़ी कोठी है और राजनीतिक महत्वाकांक्षा है. जिसके चलते पार्थवी में राजशीपना व निडरता है. यह खूबी राजस्थान के बाहर के लोगों में नहीं आ सकती. इसकी वजह से किरदार में नयापन आने के साथ कंफलिक्ट में भी एक नया अप्रोच आ जाता है. हमारी फिल्म मेवाड़ के इलाके की है, जहां के लोगों में एक अलग तरह की प्राइड होती है. वहां के किसी आम आदमी से भी बात करेंगे, तो आपको अहसास होगा कि उनमें एक रूतबा है. यह बात बहुत ही मायने रखती थी. इसी वजह से मधुकर और पार्थवी को प्रशांत व आर्शी से अलग बना देते हैं.

धड़क में गरीबी अमीरी का कंफलिक्ट है या..?

हमारी फिल्म में गरीबी अमीरी के साथ साथ क्लास का मुद्दा भी है. इसी के साथ फिल्म में कई मल्टीलेयर भी हैं. हमारी फिल्म में क्लास बहुत बड़ा मुद्दा है. जब हम क्लास और आर्थिक क्षमता की बात करते हैं, तो औनर किलिंग का मुद्दा आ ही जाता है. जब किसी इंसान को अपनी क्लास या अपनी आर्थिक क्षमता पर जरूरत से ज्यादा यकीन हो, तो वह अपने आत्मसम्मान को जरूरत से ज्यादा ही गंभीरता से लेता है. इसी वजह से हमारे देश में आज भी क्लास, जाति व धर्म के नाम पर लोगों को मारा जा रहा है. अब तो हालात इतने बदतर हो गए हैं कि लोग उम्र भी नहीं देखते. बच्चे से बूढ़े तक किसी की भी हत्या की जाती है. इस समसामायिक मुद्दे पर मेरी फिल्म ‘धड़क’ बहुत कुछ कहती है.

आपने किस तरह का रिसर्च किया है?

मैं रिसर्च करते करते फंसता चला गया. मैंने महसूस किया कि इस समस्या की कोई मूल जड़ नहीं है. बल्कि यह समस्या तो हर इंसान के अंदर है. आनर किलिंग की समस्या पहले भी थी. फर्क सिर्फ इतना है कि अब इस मुद्दे को लेकर खबरें छपने लगी हैं. लोग चर्चाएं करने लगे हैं. हकीकत में यह सारी बातें हमारे इंसानी दिमाग में सदियों से पलती आ रही हैं. लोगों के दिलों में भी भेदभाव की भावना डली हुई है. हम किसी एक इसांन या किसी एक क्षेत्र या जाति धर्म को दोषी ठहरा कर इस समस्या का समाधान नहीं निकाल सकते. हम सभी को अपने अंदर झांकते हुए सोचने की जरूरत है कि हम इस भेदभाव को कैसे खत्म करें.

औनर किलिंग या भेदभाव में आर्थिक स्थितियों और राजनीति में से कौन कितना जिम्मेदार है?

दोनों एक दूसरे से आंतरिक रूप से जुडे़ हुए हैं. आर्थिक स्थिति बहुत मायने रखती है. दो अलग जाति या अलग धर्म के लोग यदि आर्थिक रूप से समकक्ष हों, तो भी भेदभाव कम होगा. लेकिन यदि जाति व धर्म अलग हो उसी के साथ उनके बीच गरीबी अमीरी का अंतर हो, तो इनका मिलन संभव नही है. इन सबके उपर राजनीति हमेषा अपना असर डालती है. जाति, धर्म, क्लास और पढ़ाई के स्तर आदि को राजनीति अपने हिसाब से घुमाती रहती है. राजनेता अपनी सोच व अपनी आवश्यकता के अनुसार हर बात को घुमाता रहता है. मेरी समझ के अनुसार क्लास, जाति, धर्म, इकोनोमिक्स, पालीटिक्स यह सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. इन्हें अलग करके नहीं देखा जा सकता.

आप मूलतः मारवाड़ी हैं. आपका जन्म कलकत्ता में हुआ. आपकी परवरिश नासिक में हुई और उसके बाद आप मुंबई आ गए. अपनी इस यात्रा के दौरान आपने सारी चीजों को कैसे अनुभव किया?

यह सारी स्थितियां मेरी आंखों के सामने से होकर गुजरी हैं. जब हम बड़े हो रहे थे यानी कि 15 साल के थे, तब औनर किलिंग की चर्चा इतनी नहीं हो रही थी. तब हमें इस बात का अहसास नहीं था कि हम इतने जटिल समाज में रह रहे हैं. पर अब इंटरनेट, न्यूज चैनल व अखबारों के माध्यम से हमें पता चलने लगा है कि हम हमेशा से ऐसे जटिल समाज में रहते रहे हैं. अब तक लोगों को अपनी बात कहने का मौका नहीं मिल रहा था. लोगों के साथ जो बुरा हो रहा था, उसकी शिकायतें पुलिस स्टेशन में दर्ज नहीं हो रही थीं. उसकी कहानी को अखबारों में जगह नहीं मिल रही थी. तो मैंने बदलाव देखा है. एक वक्त वह था, जब हम बेफिक्र होकर घूमते थे. पर अब हम फूंक फूंक कर कदम रखने लगे हैं.

इन समस्याओं को लेकर तमाम फिल्में पहले भी बनी हैं?

जी हां! पर मुझे लगता है कि तब तक बनती रहनी चाहिए, जब तक समस्या पूरी तरह से खत्म ना हो जाए. किसी समस्या पर 40 साल से फिल्म बन रही हैं, इसके यह मायने नहीं है कि अब उस पर फिल्म नहीं बननी चाहिए. जब तक समस्या जिंदा हो, तब तक उस पर टिप्पणी की जानी चाहिए.

सोशल मीडिया पर लोग सैराट से धड़क की तुलना करते हुए आलोचना भी कर रहे हैं?

सोशल मीडिया पर इस तरह की बातें होती रहती हैं. मुझे इस बात का अहसास है कि लोग मेरी फिल्म ‘धड़क’ की तुलना ‘सैराट’ से करेंगे, मगर बिना फिल्म देखे नकारात्मक बातें करना उचित नहीं है. खैर, इस तरह की बुराईयां मुझे विचलित नहीं कर रही हैं. क्योंकि मैंने ईमानदारी के साथ एक अच्छी फिल्म बनायी है. मैंने ‘सैराट’ की रूह को ‘धड़क’ में रखा है. ‘सैराट’ के सभी अच्छे पहलुओं को अपनी फिल्म का हिस्सा बनाया है. पर मैं हमेशा आलोचना सुनने के लिए तैयार रहता हूं.

प्यार को लेकर आपकी यह तीसरी फिल्म है. तीनों फिल्मों में आपने प्यार को किस तरह से अलग अलग पाया?

तीनों फिल्मों में प्यार को लेकर बतौर लेखक निर्देशक मैं मैच्योर हुआ हूं. वह मैच्योरिटी मेरी फिल्मों में भी नजर आती रही है. ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ मेरी पहली फिल्म थी. उसमें भोलापन था और प्यार में कोई कंफलिक्ट नहीं था. उसके बाद मेरी दूसरी फिल्म थी ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’. इस फिल्म में प्यार के साथ नारी उत्थान की बात की गयी. वुमन इम्पावरमेंट की बात की गयी. इसमें मैंने प्यार के साथ यह दर्शाया कि हमें औरतों के साथ किस तरह से पेश आना चाहिए. उन्हें किस तरह का स्थान देना चाहिए. अब अपनी तीसरी फिल्म ‘‘धड़क’’ में मैंने अब तक की सबसे ज्यादा मैच्यौर और संजीदा कहानी कही है.तीनों फिल्में प्यार को ही बयां करती हैं, पर अलग अलग क्षेत्र से हैं, उनके अपने अलग टकराव हैं.

10-12 वर्षो में प्यार को लेकर समाज में जो बदलाव आए हैं, उसे आप किस रूप में देखते हैं?

मुझे नहीं लगता कि प्यार को लेकर कोई बदलाव आया है. हां! अब हम तकनीक की वजह से उस पर बातें ज्यादा करते हैं. सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि अब रिष्तों को लेकर हमारी सहनशीलता में कमी आयी है, जिसके चलते पति पत्नी के बीच पहला झगड़ा होते ही, अलग रहने की बात होने लगती है. जबकि हमारे माता पिता 40-50 साल से सफल वैवाहिक जीवन जीने की मिसाल रख रहे हैं. पर अब जो सहनशीलता की कमी है, उसका सारा दोष हम तकनीक पर डाल रहे हैं. अब समाज इस तरह से विकसित हो रहा है कि वह हमें अहसास करा रहा है कि किसी भी रिष्ते को बरकरार रखने के लिए सहनशीलता की जरूरत नहीं हैं. मैं यह बात पुरूष स्त्री दोनों के लिए कह रहा हूं. मुझे लगता है कि एक सफल रिश्ता बनाने के लिए हर इंसान में सहनशीलता होना बहुत जरूरी है. हां! प्यार को लेकर यह बहुत बड़ा बदलाव जरूर आया है. अन्यथा आज भी इंसान जब प्यार में पड़ता है, तो वह पूरी जिंदगी उसी प्यार में डूबे रहने की बात सोचता है. लोग हर रिश्ते में हमेशा खुशी ही चाहते हैं, मगर जरा सी समस्या आनेपर लोग उस रिश्ते से दूरी बना लेते हैं. आप यह कह सकते हैं कि सहनशीलता की कमी के चलते लोग पलायनवादी होते जा रहे हैं. कुल मिलाकर यदि आप चाहते हैं कि आपका प्यार 50 वर्षो तक चले, तो आपके अंदर सहनशीलता होनी ही चाहिए. हर रिश्ते में मनमुटाव होते रहते हैं.

आप इशान और जान्हवी को किस तरह के कलाकार मानते हैं?

दोनों मेहनती व प्रतिभाशाली कलाकार हैं. दोनों को इमोशन की अच्छी समझ होने के साथ उसे एक्सप्रेस करने का उनका अंदाज भी बहुत अच्छा है. दोनों में अभिनय के साथ साथ नृत्य की प्रतिभा भी है.

कहा जा रहा हैं कि सिनेमा बहुत बदल गया है. आपकी क्या राय है?

सिनेमा बदला है. क्योंकि लोग बदल रहे हैं. पर मेरी राय में हमारा हिंदी सिनेमा बदलना नहीं चाहिए. हम हौलीवुड से प्रभावित होकर जो काम करने लगे हैं, वह गलत है. यदि इसी तरह हम हौलीवुड से प्रभावित होते रहे, तो एक दिन हौलीवुड हमारे सिनेमा पर कब्जा कर लेगा. हमें हमारे देश की पहचान से भागना नहीं चाहिए, बल्कि उसे बेहतर बनाने की कोशिश करते रहना चाहिए. हौलीवुड ने बहुत से देशो के सिनेमा को खत्म किया है. हौलीवुड ने यूरोप के सिनेमा को खत्म कर दिया. क्योंकि वहां के लोगों ने हौलीवुड की तरह फिल्में बनानी शुरू कर दी थी और हौलीवुड से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाए. इसलिए हम भारतीय फिल्मकारों को चाहिए कि हम अपने देश की पहचान वाला सिनेमा ही बनाएं, पर उसे बेहतर जरूर करें. भारतीय सिनेमा में अपना अनूठापन है, जिसकी वजह से हम जिंदा हैं. पर इस अनूठेपन को हम हौलीवुड की नकल करके खो रहे हैं, जो कि गलत है. यदि सिनेमा बौलीवुड की तरह बनेगा, तो कमाल का बिजनेस करेगा. पर जब हम उससे अलग हो जाते हैं, तो असफलता ही हाथ लगती है. हमने 2017 में बच्चों की परीक्षाओं के समय ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ रिलीज की थी, जो कि एक साधारण हिंदी फिल्म थी और बाक्स आफिस पर सफलता दर्ज करायी थी. ‘संजू’ भी टिपिकल बौलीवुड फिल्म है. हमें हमारे सिनेमा की जो ताकत है, उसे नजरंदाज नहीं करना चाहिए.

इसके बाद की क्या योजना है?

2-3 विषयों पर काम चल रहा है.

सोशल मीडिया पर फिल्मों को बहुत ज्यादा प्रमोट किया जा रहा है. क्या इससे बाक्स आफिस पर फर्क पड़ता है?

सच यह है कि हम सभी लोग इस मुद्दे पर कंफ्यूज हैं. हम सभी सोशल मीडिया को समझने की कोशिश कर रहे हैं. सोशल मीडिया इतनी तेजी से विकसित हो रहा है कि उसे नजरंदाज भी नहीं किया जा सकता. हां! सोशल मीडिया पर फिल्म को प्रमोट करने से फिल्म हर जगह चर्चा में रहती है. पर उसे दर्शक मिलते हैं या नही, यह हमें पता नहीं. मुझे लगता है कि सोशल मीडिया पर फिल्मों को लेकर जितनी बातें होती हैं, उससे दर्शक मिलते हैं या नहीं, यह समझने के लिए 4-5 वर्ष का वक्त लगेगा. मैं खुद सोशल मीडिया पर बहुत कम एक्टिव हूं. मैं सोशल मीडिया की बजाय किताबें पढ़ने और खेलों में ज्यादा समय बिताता हूं.

यानीकि आप खेलते भी हैं?

जी हां! हमारी आल स्टार फुटबाल टीम है. इस टीम में रणबीर कपूर, अभिषेक बच्चन, इशान खट्टर, डीनो मोरिया, वरूण धवन, सुजीत सरकार और मैं भी हूं. हमारा एक क्लब है. यह बंटी वालिया की टीम है. हम सभी हर रविवार को फुटबाल खेलते हैं. इसके अलावा मैं टेबल टेनिस व बैडमिंटन भी खेलता हूं. मैं अपनी तरफ से ज्यादा से ज्यादा समय खेल को देता हूं. खेल मेरी जिंदगी है. इसके अलावा मैं पढ़ता भी बहुत हूं. मैं ज्यादा से ज्यादा फिक्शन पढ़ता हूं. मेरा मानना है कि पढ़ने से ही आपकी कल्पना शक्ति बढ़ती है.

धोनी अपने साथी बल्लेबाजों पर बना रहे हैं दबाव : गौतम गंभीर

टीम इंडिया के इंग्लैंड दौरे की वनडे सीरीज में टीम इंडिया की शर्मनाक हार पर अब विशलेषण शुरू हो गया है. दूसरा मैच हराने के बाद तीन वनडे मैचों की सीरीज के अंतिम और निर्णायक मुकाबले में इंग्लैंड ने टीम इंडिया को 8 विकेट से हराकर सीरीज 2-1 से जीत ली. पहले बल्लेबाजी करने उतरी टीम इंडिया को इंग्लैंड ने 256 रनों पर रोका, जिसके बाद विजयी लक्ष्य को मेजबान टीम ने 44.3 ओवर में जो रूट के शतक और कप्तान इयान मोर्गन की शानदार पारी के दम पर हासिल कर लिया. टीम इंडिया के शर्मनाक प्रदर्शन के दौरान पूर्व भारतीय कप्तान एमएस धोनी की धीमी बल्लेबाजी की गौतम गंभीर ने आलोचना की है.

गंभीर ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा है कि धोनी की धीमी बल्लेबाजी उनके साथी बल्लेबाजों पर दबाव बना रही है. क्रिकबज को दिए इंटरव्यू में गंभीर ने कहा धोनी अपनी पारी की शरुआत से ही बहुत डौट बौल खेल रहे हैं जिसकी वजह से उनके साथी बल्लेबाजों पर दबाव पड़ रहा है.

दरअसल धोनी ने तीसरे वनडे में 66 गेंदों पर केवल 42 रन बनाए जिसमें 4 चौके शामिल थे. धोनी जब क्रीज पर आए तब भारत का 25वां ओवर चल रहा था और टीम इंडिया का स्कोर 3 विकेट के नुकसान पर 125 रन था. उनके साथ कप्तान विराट कोहली क्रीज पर मौजूद थे. ऐसे में धोनी से उम्मीद थी कि वे बड़ी और तेज पारी खेलेंगें लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा.

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गंभीर ने धोनी की इसी पारी पर टिप्पणी की है. इसके अलावा दूसरे वनडे में भी धोनी अपने रंग से बिलकुल उलट नजर आए जब टीम को उन्हें एक फिनिशर के रूप में जरूरत थी जिसके लिए वे जाने जाते हैं. इस मैच में भी धोनी 27वें ओवर में विराट कोहली की जगह बल्लेबाजी करने आए तब सुरेश रैना क्रीज पर थे. भारत का स्कोर 140 रन हो चुका था जबकि भारत 323 रनों का लक्ष्य का पीछा कर रहा था. इस पारी में भी धोनी 59 गेंदों पर केवल 37 रन बना सके और अपनी इस पारी में केवल 2 ही चौके लगा पाए थे.

पहले इतनी डौट बौल नहीं खेलते थे धोनी

गंभीर ने साफ कहा कि उन्होंने एक दो साल पहले तक धोनी को इतनी डौट बौल खेलते नहीं देखा है जिस पर उन्हें निश्चित रूप से काम करने की जरूरत है. जाहिर है कि धोनी अपने सर्वश्रेष्ठ फौर्म में नहीं हैं. आमतौर पर धोनी शुरुआत में समय लेते हैं लेकिन बाद में वे इसकी भरपाई भी कर लेते हैं लेकिन अभी ऐसा हम नहीं देख पा रहे हैं. अगर आप समय लेते हैं तो आपको निश्चित रूप से अंत तक रुकना होगा.

उल्लेखनीय है कि गौतम गंभीर ने कई सालों तक उनकी कप्तानी में बल्लेबाजी भी की है और जब धोनी कप्तान बने थे, उस समय गंभीर भी कप्तानी के प्रबल दावेदार थे.

सरकार की इस रणनीति से बैंक डिफौल्टर्स पर कसेगा शिकंजा

बैंकों को कर्ज न चुकाने वाले प्रवर्तकों को देश से बाहर जाने से रोकने के लिए सरकार ने वित्तीय सेवा सचिव राजीव कुमार की अगुवाई में एक उच्चस्तरीय समिति बनाई है. यह समिति डिफौल्टरों को देश से भागने से रोकने के उपाय सुझाएगी और साथ ही मौजूदा कानूनों में बदलाव पर भी सुझाव देगी. यह कमेटी ऐसे कारोबारियों पर खासतौर से नजर रखेगी जिनके पास दूसरे देश की नागरिकता भी है. सरकार की इस कोशिश से नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और विजय माल्या जैसे प्रकरणों को रोका जा सकेगा.

सूत्रों ने बताया कि समिति की पहली बैठक में दोहरी नागरिकता तथा प्रणाली को ठोस और तर्कसंगत बनाने पर विचार हुआ, जिससे आर्थिक अपराधों में शामिल लोग देश से भाग नहीं पाएं. इस समिति के अन्य सदस्यों में प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो, खुफिया ब्यूरो और भारतीय रिजर्व बैंक के प्रतिनिधि शामिल हैं. इसके अलावा गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के अधिकारी भी समिति का हिस्सा हैं.

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जानकारी के मुताबिक, मौजूदा प्रणाली में किसी डिफौल्टर को अपराधी घोषित करने में काफी समय लगता है. ऐसे में समिति ऐसे तरीकों पर विचार कर रही है ताकि ऐसे मामलों में पहले से सतर्क किया जाएगा. इस बारे में कई सुझाव मिले हैं, जिससे ऐसे प्रवर्तकों पर अंकुश लगाया जा सके. इनमें भारतीय नागरिकता छोड़ने और घरेलू कानून में बदलाव के संदर्भ में सुझाव शामिल हैं.

पंजाब नेशनल बैंक में दो अरब डौलर का घोटाला सामने आने के बाद वित्त मंत्रालय ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से 50 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज लेने वालों के पासपोर्ट का ब्यौरा जुटाने को कहा था. इस घोटाले का सूत्रधार नीरव मोदी और उसका मामा मेहुल चोकसी देश से भाग चुके हैं.

इसके अलावा बैंकों से ऋण आवेदन फार्म को संशोधित कर उसमें कर्ज लेने वालों का पासपोर्ट का ब्योरा भी शामिल करने को कहा था. शराब कारोबारी विजय माल्या मार्च, 2016 में देश छोड़कर भाग गया था. माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस अपना कर्ज चुकाने में विफल रही थी.

अकाउंट में मिनिमम बैलेंस ना होने पर पीएनबी ने वसूला करोड़ों रूपये

पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) ने वित्त वर्ष 2018 में न्यूनतम बैलेंस न रखने पर पेनाल्टी के रूप में 151.66 करोड़ रुपये जुटाए  हैं. यह राशि करीब 1.23 करोड़ बचत खातों से जमा हुई है. एक आरटीआई में पूछे गए सवाल के जवाब में यह जानकारी सामने आई है.

पीएनबी ने आरटीआई एक्टिविस्ट चंद्र शेखर गौड़ की ओर से दायर सवाल के जवाब में बताया कि वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान, 1,22,98,784 बचत खातों से कुल 151.66 करोड़ रुपये न्यूनतम राशि न रखने के जुर्माने के तौर पर रिकवर किये गये हैं.

बैंक ने आरटीआई के जवाब में बताया वित्त वर्ष 2018 की पहली तिमाही में बैंक ने 31.99 करोड़ रुपये, दूसरी तिमाही में 29.43 करोड़ रुपये, तीसरे में 37.27 करोड़ रुपये और चौथी में 52.97 करोड़ रुपये जुर्माने के तौर पर वसूले हैं.

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अर्थशास्त्री जयंतीलाल भंडारी ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका पर सवाल उठाया है खासकर कि इस मामले में और कहा, “एक तरफ सरकार ज्यादा से ज्याद लोगों को बैंकिंग सेवा से जोड़ने के लिए अभियान चला रहा है वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बचत खातों में न्यूनतम राशि न होने पर शुल्क वसूल रही है.”

भंडारी ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से पेनाल्टी रेट पर तुरंत ध्यान देने के लिए निवेदन किया है. उन्होंने यह आग्रह गरीब और मध्य वर्गीय लोगों को ध्यान में रखते हुए किया है.

मारा ठुमका

ठुमका एक ऐसी क्रिया है जिस से मन प्रसन्न हो जाता है खासतौर से उस वक्त जब ठुमका कोई नायिका लगाए. अब वह नायिका पूर्व ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी हो या नवोदित हरियाणवी गायिका सपना चौधरी, दर्शकों को इस से खास फर्क नहीं पड़ता और न ही वे ठुमके के राजनीतिकरण में दिलचस्पी लेते हैं.

सपना चौधरी के कांग्रेस में जाने मात्र की अटकलों से एक भाजपा सांसद इतने व्यथित हो उठे कि उन्होंने उम्मीद के मुताबिक यह ताना दे मारा कि कांग्रेस को चुनाव जीतना है या ठुमके लगवाने हैं. यह बात सांसद महोदय विस्मृत कर गए कि मनोज कुमार द्वारा निर्देशित फिल्म ‘क्रांति’ में ठुमका लगा कर चाल बदलने का दावा करने वाली हेमा मालिनी उन्हीं की पार्टी से मथुरा से सांसद हैं और वे अपना मशहूर डायलौग ‘चल धन्नो आज तेरी बसंती की इज्जत का सवाल है’ मंच से जरूर बोलती हैं. ऐसे में सपना के ठुमकों पर उन्हें एतराज क्यों.

बेहतर होगा कि ठुमके के प्रति अपना नजरिया बदलते भाजपाई उसे साहित्यिक या पौराणिक लिहाज से देखें क्योंकि उन का नायक रामचंद्र भी ठुमक कर चलता था.

खिचड़ी सरकार की दरकार

खिचड़ी सरकार का भय दिखा कर भारतीय जनता पार्टी 2019 के आम चुनावों में जीत हासिल करना चाहती है. कर्नाटक विधानसभा और 10 राज्यों में हुए उपचुनावों के परिणामों से यह तो साफ है कि 1977 के बाद कांग्रेस के पर्याय के रूप में खिचड़ी सरकारों का जैसा दौर रहा वैसा ही 2019 के बाद भी संभव है जिस में दालचावल का शोरवा नहीं रहेगा, दाल अलग दिखेगी, चावल अलग. सवाल है कि इस में बुराई क्या है.

कांग्रेस के बाद देश कोई अराजकता में तो नहीं डूबा. कइयों की सहमति से फैसले होते थे. कुछ फैसले ढंग के होते थे, कुछ बेढंगे. इस के विपरीत कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की जबजब अकेली सरकारें बनी हैं तब दाल तो अकेली थी लेकिन चावलों का पता ही नहीं था. यही नहीं, दाल में कंकर ज्यादा थे, दाल कम. दोनों सरकारों ने जनता के हितों से जम कर खेला. अगर अदालतें न होतीं तो देश का लोकतंत्र इंदिरा गांधी के युग में भी और नरेंद्र मोदी के युग में भी हवा हो चुका होता. अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की मिलीजुली सरकारों को मंत्रिमंडल की बैठकों में आम सहमति से फैसले लेने पड़े और वे सही थे. यह देश अपनेआप में एक खिचड़ी है. यह न जरमनी है, न चीन जहां लगभग पूरी जनता एक परंपरा, एक इतिहास, एक बोली और एकतरह के विचारों वाली हो. पर इसी एकतरह में हिटलर और माओ पैदा हुए हैं, जिन्होंने लाखों अपनों को मरवाया और परायों को भी जम कर मारा.

भारत को विभिन्नता चाहिए. भारत को ऐसा एकाधिकार नहीं चाहिए. खिचड़ी सरकारों में 10-15 सांसदों वाली पार्टी भी अपनी बात कह सकती है. आज नरेंद्र मोदी को उन की पार्टी के 50 सांसद भी कुछ कहना चाहें तो कह नहीं सकते. नरेंद्र मोदी ने तो अपने मंत्रिमंडल के मंत्रियों के भी पर कुतर रखे हैं और सारे असंवैधानिक, अनैतिक व अतार्किक फैसले पीएमओ यानी प्राइम मिनिस्टर औफिस कर रहा है.

मोदी के नेतृत्व की यह सरकार न संविधान को मानती है न मानव अधिकारों को. इस ने तो भरी अदालत में यहां तक कह दिया कि हर नागरिक के शरीर पर सरकार का हक है, उस का खुद का नहीं. आज जनता अगर कुछ खुली सांस ले पा रही है तो इसलिए कि देश की राजनीति में कई दालें, सब्जियां, कई तरह के चावल और तरहतरह के मसाले हैं. बढि़या खिचड़ी बनती है. यह स्वादिष्ठ भी होती है और हाजमा भी ठीक रखती है.

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