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बैंक एटीएम से जुड़े नियमों में हुआ बदलाव, जानना है जरूरी

सरकार ने सभी बैंकों के एटीएम से संबंधित नियमों को बदल दिया है. सरकार की तरफ से जारी आदेश में पुराने कई नियमों में बदलाव के लिए कहा गया है. ऐसे कैश वैन और उसमें तैनात स्टाफ की सुरक्षा के लिए किया गया है. पिछले कुछ सालों में कैश वैन से नगदी लुटने और अलग-अलग प्रकार की वारदातों के सामने आने के बाद ये बदलाव किए गए हैं.

रात 9 बजे के बाद नहीं भरा जाएगा कैश

एटीएम से संबंधि नियमों को जारी करते हुए सरकार की तरफ से कहा गया कि शहरी इलाकों में रात 9 बजे के बाद एटीएम में कैश नहीं भरा जाएगा. सुरक्षा के मद्देनजर यह भी कहा गया कि एक कैश वैन में सिंगल ट्रिप में 5 करोड़ से अधिक नहीं रहेंगे. साथ ही कैश वैन पर तैनात कर्मियों को किसी भी प्रकार के हमले, अपराधियों के वाहनों का पीछा करने और अन्य खतरों से निपटने के लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा.

तय समयसीमा के अंदर भरा जाएगा कैश

एटीएम और कैश वैन से जुड़े आदेश में कहा गया कि कैश ट्रांसपोर्टेशन से जुड़े सभी कर्मचारियों की बैक ग्राउंड की जांच के लिए उनका आधार वेरिफिकेशन कराना जरूरी होगा. इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षा की दृष्टि से शाम 6 बजे के बाद किसी भी एटीएम में कैश नहीं भरा जाएगा. इसके अलावा एक ATM में लोड करने के लिए कैश को पिछले दिन या दिन की शुरुआत में बैंक से कलेक्ट किया जाएगा. इस बदलाव के पीछे कैश भरने का काम तय समयसीमा से पहले करने का मकसद है.

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सिक्योरिटी अलार्म और मोटराइज्ड सायरन लगेंगे

सभी कैशवैन में सुरक्षा के मद्देनजर जीएसएम आधारित औटो-डायलर के साथ सिक्योरिटी अलार्म और मोटराइज्ड सायरन लगाए जाएंगे. कैश वैन में अब सीसीटीवी, लाइव जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम और बंदूकों के साथ कम से कम दो सुरक्षाकर्मी तैनात रहेंगे. सुरक्षाकर्मियों की बंदूकों से दो साल में कम से कम एक बार टेस्ट फायरिंग की जाएगी. बंदूकों की बुलेट हर दो साल में बदली जाएगी. कैश ट्रांसपोर्टेशन से जुड़े कर्मचारियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा. कर्मचारियों को ऐसा प्रशिक्षण भी दिया जाएगा जिसमें किसी मुश्किल की स्थिति से कैशवैन को सुरक्षित कैसे निकाला जाए.

नक्सली क्षेत्रों में शाम 4 बजे के बाद कैश नहीं डलेगा

गाइडलाइन के अनुसार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शाम 4 बजे के बाद एटीएम में कैश नहीं डाला जाएगा. मौजूदा समय में करीब 8 हजार प्राइवेट वैन प्रतिदिन करीब 15 हजार करोड़ रुपये बैंक, करेंसी चेस्ट और एटीएम में डालती हैं. अभी कैशवैन में कैश और पैंसेजर कंपार्टमेंट के बीच मजबूत लौक लगा हुआ होता है. कैश कंपार्टमेंट में स्टील का मजबूत दरवाजा होता है. इसका दरवाजा अंदर की तरफ मैन्युअली या इलेक्ट्रिकली खुलता है.

संकरी दीवार पर अभिनेत्री करा रही थी फोटोशूट, हो गया हादसा

बौलीवुड स्टार्स को शूटिंग से लेकर फोटोशूट तक करने के लिए काफी मेहनत करना पड़ता है. ऐसे में कई बार वो हादसो का शिकार भी हो जाते हैं. ऐसा ही कुछ हुआ बौलीवुड अदाकारा उर्वशी रौतेला के साथ. हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया है जिसमें उर्वशी फोटोशूट करा रही हैं. इस दौरान वो एक गंभीर हादसे का शिकार होते होते बाल-बाल बची हैं.

उर्वशी का ये वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया है. वीडियो में आप उर्वशी को पोज देते देख सकते हैं. उर्वशी गार्डन में एक बहुत ही संकरी दीवार पर चढ़कर पोज दे रही हैं. इस दौरान उन्होंने काफी हाई हील्स पहनी हुई हैं. इसी कारण उनका बैलेंस बिगड़ जाता है और वो खुद को संभालने की एक सफल कोशिश करती हैं.

इस दौरान उर्वशी खुद को संभाल ले जाती हैं और खुद को चोट लगने से तो बचा लेती हैं लेकिन इस दौरान उनकी बेल्ट खुल जाती है जिसके बाद वो हंसने लगती हैं. उर्वशी ने इस दौरान खुद को काफी अच्छे से संभाला नहीं होता तो उन्हें काफी चोट आ सकती थी. बता दें कि उर्वशी ने अभिनेता सनी देओल के साथ फिल्म ‘सिंह साहब द ग्रेट’ से अपना बौलीवुड डेब्यू किया था. इसके बाद ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ और ‘हेट स्टोरी 4’ जैसे बोल्ड फिल्में देकर वो देश भर में मशहूर हो गईं.

बता दें कि उर्वशी रौतेला ने 15 साल की उम्र में मौडलिंग की शुरुआत की थी, और मिस यूनिवर्स में भारत का प्रतिनिधित्व भी कर चुकी हैं. उर्वशी यो यो हनी सिंह के म्यूजिक वीडियो ‘लव डोज’ के जरिये भी कहर बरपा चुकी हैं.

सरकारी नौकरी के पीछे युवा

कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पकौड़ा बेचने को भी रोजगार बताया तो पूरे देश में हंगामा मच गया. देशभर में प्रधानमंत्री की खिल्ली उड़ाई गई. विपक्षी पार्टियों ने तो यह शोर मचाया कि समोसेपकौड़े या चाय बेचना भला कोई रोजगार कैसे हो सकता है. ऐसा कह कर सरकार नौकरियां पैदा करने में अपनी नाकामी छिपा रही है.

विपक्ष का आरोप अपनी जगह सही है, पर यह इस मानसिकता को भी उजागर करता है कि नौकरी सिर्फ सरकारी होनी चाहिए. सरकारी नौकरी का यह मोह कितना विकट है, इस का उदाहरण इस साल मार्च में तब देखने को मिला जब महाराष्ट्र में मुंबई पुलिस में सिपाही की भरती के सिर्फ 1,137 पद निकले, लेकिन इस के लिए 2 लाख से ज्यादा युवाओं के आवेदन आए.

कुछ ऐसा ही हाल उत्तर प्रदेश में शिक्षक भरती के लिए मांगे गए आवेदन के समय हुआ, जिस में कुछ हजार पदों के लिए 10 लाख से ज्यादा एप्लीकेशंस आ गईं. जिस देश में नौकरियों का मामला एक अनार, सौ बीमार वाला हो, वहां कुछ सौ नौकरियों के लिए लाखों आवेदन आ जाना हैरान नहीं करता. पर महाराष्ट्र में सिपाही बनने की कतार में करीब 2 हजार ऐसे लोग भी दिखे जिन के पास मैडिकल, ला, एमबीए या इंजीनियरिंग आदि की डिगरियां थीं, जबकि इस नौकरी के लिए जरूरी शैक्षिक योग्यता सिर्फ  8वीं पास थी.

यह ऐसा विरोधाभास है जो इस से पहले भी कई बार चपरासी, सफाईकर्मी जैसे कर्मचारियों की भरतियों में नजर आ चुका है. यों तो कोई पद छोटा या बड़ा नहीं होता पर इस बात से इत्तफाक रखने के बावजूद डाक्टरोंइंजीनियरों को चपरासीसिपाही बनने की लाइन में देखना हैरानी पैदा करता है.

सवाल उठता है कि क्या देश में बेरोजगारी सच में ऐसा लाइलाज मर्ज बन गई है कि अच्छीखासी योग्यता भी हमारे नौजवानों को, क्या सरकारी और क्या प्राइवेट, कैसी भी नौकरी के योग्य नहीं ठहरा रही है. अगर ऐसा नहीं है तो फिर चपरासी से ले कर सिपाही बनने के लिए खड़े इन लाखों शिक्षित और ट्रेंड बेरोजगारों की लंबी कतारों का रहस्य क्या है.

महाराष्ट्र में सिपाही भरती के इन उम्मीदवारों के बारे में खुलासा यह हुआ कि ज्यादातर ग्रामीण इलाकों के इन पढ़ेलिखे नौजवानों की अंगरेजी कमजोर थी. लिहाजा, ये प्राइवेट सैक्टर में जाने के बजाय कैसी भी सरकारी नौकरी प्राप्त करना बेहतर समझते हैं, क्योंकि प्राइवेट सैक्टर में अंगरेजी बोलचाल की मजबूरी है. लेकिन हमारे देश में जहां हर गली में अंगरेजी सिखाने वाले संस्थान मौजूद हैं, इस कथित मजबूरी में दूसरे तथ्य छिपे लगते हैं.

तथ्य यह है कि सिपाही बनने के एवज में 25 हजार रुपए महीने की सैलरी के अलावा रहने को घर, दूसरे भत्ते और मानसिक सुकून देने वाली ऐसी नौकरी की गारंटी मिलती है जिस के जाने का खतरा, प्राइवेट नौकरी के मुकाबले छटांकभर भी नहीं है, तमाम कामचोरी के बावजूद.

यही नहीं, किसी ठीक जगह तैनाती मिल जाए तो रिश्वतखोरी के बल पर ऊपरी कमाई के ढेरों मौके मौजूद होते हैं. बस, ऊपर वालों को उन का कमीशन वक्त पर पहुंचाया जाता रहे. सरकारी नौकरियों की यही कुछ खासीयतें हैं कि इंजीनियरिंगएमबीबीएस की डिगरी वाले लोग भी चपरासी, सिपाही और यहां तक कि सफाई कर्मचारी बनना मंजूर कर लेते हैं. इस का एक असर यह हुआ है कि हर साल सरकारी नौकरियों में कटौती भले ही की जा रही हो, लेकिन आवेदकों की संख्या बढ़ती ही जा रही है.

यह कैसी दीवानगी

कुछ वर्षों से यह बात बारबार कही जाती है कि आवेदकों की सालदरसाल बढ़ती तादाद दरअसल सरकारी नौकरियों के बढ़ते आकर्षण के साथ डिगरी की कमजोर पड़ती ताकत के चलते है. लेकिन इस चिंता का कोई असर समाज और युवाओं में नहीं दिखाई दिया है. इस के उलट, बीते दशक में सरकारी नौकरी पाने की इच्छा और बढ़ी है.

इस का एक खुलासा इसी वर्ष  एसएससी यानी स्टाफ सिलैक्शन कमीशन की ओर से जारी आंकड़ों से हुआ. एसएससी के मुताबिक, 10 वर्षों में सरकारी नौकरी पाने वालों की संख्या में 30 गुना बढ़ोतरी हुई है.

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यहां अहम सवाल यह उठता है कि जब देश का प्राइवेट सैक्टर नौकरियों के लिहाज से सरकारी रोजगारदाता संगठनों के मुकाबले चौगुना हो गया हो, तो हमारे पढ़ेलिखे और काबिल नौजवान आखिर सरकारी नौकरियों के पीछे क्यों पड़े हैं? आमतौर पर इस का जवाब यह कह कर दिया जाता है कि सरकारी नौकरी की सब से बड़ी खूबी जौब सिक्योरिटी है यानी कुछ भी हो जाए, नौकरी नहीं छूटती. कर्मचारी कितना ही निकम्मा, घूसखोर, लापरवाह क्यों न हो, कोई माई का लाल उस से उस की नौकरी नहीं छीन सकता.

कई मामलों में यह बात सच साबित होती है. तरहतरह के आरोपों में पकड़े गए सरकारी कर्मचारियों पर उन के विभाग कथित तौर पर कार्यवाही करते तो दिखते हैं, लेकिन ऐसा कम ही होता है कि किसी कर्मचारी की लेटलतीफी, कामचोरी, लापरवाही, घूसखोरी की वजह से नौकरी गई हो.

किसी बड़ी घटना या लापरवाही हो जाने पर भले ही कर्मचारियों को कुछ समय के लिए निलंबित कर दिया जाता है, विभागीय कार्यवाही के नाम पर एकाध प्रमोशन पर रोक लगा दी जाती है, लेकिन उन की नौकरी फिर भी कायम रहती है जबकि प्राइवेट सैक्टर में ऐसा नहीं है.

वैसे इस वर्ष भारतीय रेल विभाग ने दावा किया कि उस ने अपने 18,600 कर्मचारियों पर रिश्वतखोरी व दूसरे कई मामलों में कड़ी कार्यवाही की है. यह कड़ी कार्यवाही चाहे जितनी भी कठोर बताई जाए, फिर भी ऐसी नहीं होती कि किसी को नौकरी से हाथ धोना पड़े.

कहने को तो अब सरकारी नौकरियों में यह खतरा है कि वहां कामचोरी, रिश्वतखोरी, अनुशासनहीनता और लेटलतीफी जैसी बातों को ले कर सख्ती बरती जा सकती है, लेकिन यह कठोरता कम ही मामलों में नौकरी पर आंच लाती है.

बहरहाल, सरकारी नौकरी के सुरक्षित होने (जौब सिक्योरिटी) की बात को कई बार व्यंग्य में भी कहा गया है. जैसे, वर्ष 2016 में जब टाटा संस के चेयरमैन साइरस पलोनजी मिस्त्री की अचानक विदाई हुई, तो सोशल मीडिया पर एक चुटकुले को जबरदस्त ढंग से शेयर किया गया. चुटकुले का भाव यह था कि नौकरी हो तो सरकारी वरना अपना धंधा कर लेना ही ठीक है, क्योंकि प्राइवेट सैक्टर में साइरस मिस्त्री जैसे लोगों की नौकरी भी सुरक्षित नहीं है.

नौकरियां हजार, आवेदक करोड़

यह तो तकरीबन साफ है कि सरकारी नौकरियों को मलाईदार मानने की मानसिकता इसी तरह आगे भी कायम रह सकती है. इस का भी अनुमान लगाया गया है कि 2020 तक महज 40 हजार नौकरियों के लिए होने वाली एसएससी की परीक्षाओं में शामिल होने वाले उम्मीदवारों की तादाद 4 करोड़ सालाना पार कर जाएगी.

उल्लेखनीय है कि 2008-09 में इन नौकरियों के लिए 9 लाख 94 हजार युवाओं ने आवेदन दिए थे, जिन में से उस साल 30,323 लोगों को नौकरी मिली थी. आवेदकों की यह संख्या 2016-17 के बीच एसएससी की 18 परीक्षाओं के लिए 3 करोड़

37 लाख तक पहुंच गई यानी चाहे कुछ हो जाए सरकारी जौब की जो चमक है, वह आने वाले वक्त में भी फीकी पड़ती नजर नहीं आती.

इस मर्ज का एक सिरा इस से भी जुड़ा है कि अब अच्छीभली डिगरी (एमए, बीएड, पीएचडी आदि) रखने वाले नौजवान माली, चपरासी व सफाईकर्मी जैसी नौकरियों के लिए मारामारी करते हैं, बशर्ते नौकरी सरकारी हो. अकसर ऐसी घटनाओं के

बारे में इस अफसोस के साथ खबरें दिखाई जाती हैं कि अगर सफाई करने की ही नौकरी करनी थी तो आखिर इतनी पढ़ाईलिखाई करने का फायदा क्या हुआ?

बेशक, बेरोजगारी का यह संकट कुछ अनोखा ही है कि इंजीनियरिंग स्नातक और पीएचडी डिगरीधारक चपरासी, कुली जैसे पदों पर काम करने को राजी हो रहे हैं. यह स्थिति तब है, जब पिछले 2 दशकों में एक ओर युवाओं को विदेशों में बड़ी संख्या में रोजगार मिले हैं, तो दूसरी तरफ देश में नई तरह के कई कामधंधे विकसित

हुए, जिन में लाखोंकरोड़ों रोजगार पैदा हुए हैं. आईटी, बीपीओ, मीडिया, इंजीनियरिंग, फैशन टैक्नोलौजी से ले कर फिल्म निर्माण तक में लाखों नए रोजगार प्राइवेट सैक्टर में इसी अवधि में पैदा हुए हैं.

प्राइवेट सैक्टर भी डांवांडोल

एक समस्या यह भी है कि निजी क्षेत्र में भी अब नए रोजगारों के पैदा होने की गति थम गई है. कुछ विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि कहने को तो देश में औनलाइन शौपिंग जैसी नई चीजें आईं, पर इस सैक्टर में बड़ी मात्रा में रोजगार पैदा नहीं हुए, क्योंकि इस में मोबाइल ऐप आदि जरियों से लोगों को खुद ही शौपिंग करने का विकल्प दे दिया गया.

अब तो आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस के कारण कई और नौकरियों पर खतरे की तलवार लटक रही है. इस के अलावा पिछले कुछ वर्षों में कई प्राइवेट एयरलाइंस बंद हुई हैं. दूरसंचार (टैलीकम्युनिकेशन) कंपनियों में जियो जैसी कंपनी के एकाधिकार के कारण दूसरी कंपनियों में तेज छंटनी चल रही है. ऐक्सपोर्ट से जुड़ी इकाइयों को बाहर से काम नहीं मिलने की वजह से उन में ताले पड़ गए हैं. वहीं ट्रंप प्रशासन की तरफ से वीजा कटौतियों के कारण देश के आईटी, बीपीओ सैक्टर को नए काम मिलने की दर में भारी गिरावट आई है.

इस के अलावा देश की आबादी में बढ़ोतरी की तुलना में रोजगार बाजार की सुस्त रफ्तार भी बेरोजगारी के नए संकट पैदा कर रही है. नतीजतन, इंजीनियरों को मजबूरीवश कुलीचपरासी की नौकरी भी आकर्षित कर रही है.

कहां गया स्किलइंडिया

बदलाव का एक छोर और है. असल में युवा स्वतंत्र कारोबार खड़ा करने या निजी क्षेत्र की मेहनत वाली नौकरियों के बजाय सरकारी नौकरियों को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं. एक सच यह भी सामने आ रहा है कि ज्यादातर युवा एक के बाद एक डिगरियां तो हासिल करते जाते हैं, लेकिन वे स्वतंत्र आजीविका तलाश करने की जहमत नहीं उठाते.

जब उन की योग्यता के मुताबिक काम मिलना मुश्किल हो जाता है तो वे मजबूरी में सरकारी नौकरियों की तरफ भागते हैं. उम्र निकल जाने या अयोग्यता के कारण वह भी नहीं मिलती तो झक मार कर कोई प्राइवेट नौकरी खोजी जाती है. इसलिए सरकार के साथसाथ खुद युवाओं को भी अब इस पर विचार करना होगा कि उन के लिए क्या जरूरी है, कागजी योग्यता का वजन बढ़ाना या किसी काम के लिए खुद को योग्य साबित करना. अपनी डिगरियों की अनुपयोगिता को कोसने के बजाय वे यह देखें कि वे क्या काम कर सकते हैं.

यदि वे अपनी योग्यता पर ध्यान देंगे, तो सरकारी नौकरी के आकर्षण और उस की भेड़चाल से खुद को बचाते हुए अपने लिए उपयुक्त रोजगार खोज पाएंगे और बेरोजगारी की समस्या का निदान पेश कर पाएंगे. युवाओं को समझना होगा कि सरकारी नौकरी के पीछे भागते रहने का ट्रैंड बेरोजगारी के नए संकट खड़े करने के सिवा कुछ नहीं करेगा.

सरकारों को भी यह बात समझनी होगी कि महज कंपीटिशन की सख्ती इस का मुकम्मल इलाज नहीं है. नए अवसर पैदा करना एक रास्ता है जिस के बारे में न जाने क्यों सरकार ने सोचना बंद कर दिया है. कहने को तो सरकार स्किल इंडिया जैसा प्रोग्राम चला रही है पर उस का कोई ठोस लाभ मिलता हुआ नजर नहीं आ रहा है.

एसएससी में घटते मौके

अगर कर्मचारी चयन आयोग की नौकरियों को ही पैमाना माना जाए, तो आंकड़े कहते हैं कि पिछले 10 वर्षों में सरकारी नौकरी पाने वालों की संख्या में 30 गुना इजाफा हुआ है. देश की केंद्रीय सेवाओं के तहत ग्रेड सी और डी नौकरियों के लिए परीक्षाएं आयोजित करने वाले एसएससी के आंकड़े बताते हैं कि देश में न सिर्फ सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है, बल्कि इस से पता चलता है कि देश में कितनी ज्यादा बेरोजगारी है.

उल्लेखनीय है कि एसएससी वर्ष 1977 से ग्रेड बी और सी के लिए परीक्षा आयोजित कर रहा है. ग्रेड ए के पदों के लिए परीक्षा का आयोजन यूपीएससी यानी यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन करता है. एसएससी के कुछ आंकड़े इस प्रकार हैं :

  • वर्ष 2016 से ले कर 31 दिसंबर, 2017 के बीच 3 करोड़ 37 लाख आवेदक एसएससी की 18 परीक्षाओं में शामिल हुए हैं. इन में 40 हजार से अधिक नौकरियां मिलनी हैं.
  • वर्ष 2008-09 में 9 लाख 94 हजार लोगों ने अलगअलग नौकरियों के लिए आवेदन दिए थे और उस साल 30,323 नौकरियां मिली थीं.
  • वर्ष 2015 में 1 करोड़ 48 लाख आवेदक अलगअलग परीक्षाओं में बैठे थे, जबकि 25,138 नौकरियां मिली थीं.
  • एसएससी के तहत संयुक्त स्नातक स्तर परीक्षा सब से बड़ी परीक्षा होती है, जिस में 40 लाख से अधिक आवेदक भाग लेते हैं.

टैलेंट का अभाव

जिन नौजवानों के पास उच्चशिक्षा की डिगरियां हैं और जो छोटी से छोटी सरकारी नौकरी पाने के लिए कतार में खड़े नजर आ रहे हैं, उन के बारे में एक मुश्किल यह है कि प्राइवेट सैक्टर उन्हें किसी काम का नहीं मानता है. इस की एक बानगी वर्ष 2016 में एक एचआर कन्सल्ंिटग फर्म द्वारा दुनिया की 42 हजार अहम कंपनियों के बीच कराए गए सर्वेक्षण में मिली थी.

ये ज्यादातर कंपनियां वैश्विक स्तर पर युवाओं को नौकरी देती हैं. इन की चिंता यह है कि इन्हें प्रतिभावान नौजवान नहीं मिल रहे हैं. इस कारण इन में से 47 फीसदी कंपनियों को अपने यहां खाली पदों को भरना मुश्किल हो रहा है. भारत में 48 फीसदी कंपनियों की यही शिकायत है यानी उन्हें नौकरी की अपेक्षा के मुताबिक काबिल लोग नहीं मिल रहे हैं. सब से खराब स्थिति आईटी सैक्टर की है, जहां कंपनियां युवाओं में स्किल की कमी से जूझ रही हैं.

हालांकि यह सर्वेक्षण एक और समस्या की तरफ इशारा करता है. इस के अनुसार, अब योग्य कर्मचारी अपनी मेहनत के बदले ज्यादा बेहतर पैकेज मांगते हैं, जबकि कंपनियां उन्हें जो वेतनभत्ते औफर करती हैं वे उन की उम्मीदों के मुकाबले काफी कम होते हैं.

नौकरी की योग्यता

कर्मचारियों की बढ़ी उम्मीदों के बीच टैलेंट की कमी का नतीजा यह निकलता है कि एक ओर काबिल कर्मचारियों का अभाव पैदा हो जाता है, तो दूसरी ओर डिगरियों को तमगे की तरह गले में लटकाए युवा उन सरकारी नौकरियों के लिए भी हाथपांव चलाता रहता है जिन के मुकाबले वह कई गुना ज्यादा काबिल हो सकता है. लेकिन असल में डिगरी से काबिलीयत का आकलन ही सरकारी नौकरी के लिए की जा रही कवायदों और प्राइवेट सैक्टर में योग्य लोगों की कमी का कच्चा चिट्ठा खोल देता है. हकीकत यह है कि जिन डिगरियों के बल पर कई नौजवान प्राइवेट नौकरी छोड़ कैसी भी सरकारी नौकरी कर लेने का दम भरते नजर आते हैं, उन में से ज्यादातर क्लर्क बनने लायक भी नहीं होते.

इस के कई खुलासे भारतीय उद्योगों के संगठन एसोचैम और रोजगारों के रूपस्वरूप का आकलन करने वाली संस्था एस्पायरिंग माइंड अतीत में कर चुके हैं. एसोचैम ने साल 2015 में जारी अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि आईआईएम और चुनिंदा प्रबंधन संस्थानों के अलावा ज्यादातर संस्थानों से मैनेजमैंट की शिक्षा डिगरी पाए नौजवान किसी नौकरी के काबिल नहीं हैं. उन की ट्रेनिंग इस स्तर की नहीं है कि उन्हें डिगरी के मुताबिक नौकरी दी जा सके.

एसोचैम के मुताबिक, आईआईएम के अलावा अन्य संस्थानों से आए सिर्फ 7 फीसदी छात्र ही कायदे की नौकरी के योग्य होते हैं. बाकी छात्र तो 8 या 10 हजार रुपए महीने वाली नौकरी के लायक ही होते हैं, भले ही उन्होंने डिगरी हासिल करने पर लाखों रुपए क्यों न खर्च किए हों. कुछ यही दशा इंजीनियरिंग में भी पाई गई. एस्पायरिंग माइंड संस्था तो पिछले कई वर्षों से यह कहती रही है कि देश के संस्थानों से निकले करीब 8 प्रतिशत इंजीनियर ही ठीकठाक नौकरी के योग्य होते हैं.

शायद यही वजह है कि देश में हर साल जो 15 लाख युवा कालेजों से इंजीनियरिंग की डिगरी ले कर निकलते हैं, उन में से ज्यादातर क्लर्क, कुली, चपरासी आदि नौकरियों के लिए आवेदन करते हैं. अब वक्त आ गया है जब खुद युवाओं समेत सामाजिक संगठनों और सरकार में इस बात पर विचार हो कि नौजवानों के लिए कागजी योग्यताओं का वजन बढ़ाते हुए सरकारी नौकरी पाने के अंतहीन प्रयास किया जाना जरूरी है या फिर किसी काम के लिए युवाओं को खुद को वास्तव में योग्य साबित करना.

युवाओं को देखना होगा कि आज भी गांव का नौजवान कसबाई या शहरी नौजवान के मुकाबले इसलिए ज्यादा संतुष्ट है, क्योंकि उसे स्थायी किस्म की सरकारी और ऊपर से आकर्षक दिखने वाली किसी प्राइवेट नौकरी के पीछे नहीं भागना है.

इस के उलट, उसे या तो खुद का कोई कारोबार शुरू करना होता है या फिर पारंपरिक पेशे में अपना हुनर दिखाते हुए आजीविका का प्रबंध करना होता है.

आज जहां सरकार और समाज को अब यह देखने की जरूरत है कि अधिक पूंजी लगा कर कम रोजगार पैदा करने की नीति न तो देश और न ही युवाओं का कोई भला कर रही है, वहीं युवाओं को भी सरकारी नौकरी में स्थायित्व खोजने के बजाय अपनी योग्यता साबित करने पर जोर देना होगा जो कागजी डिगरियों से ज्यादा इस पर निर्भर करती है कि वे असल में कितने हुनरमंद हैं.

धर्म के नाम पर सिंकती हैं रोटियां, मंदिरों में लगी सैकड़ों दानपेटियां

पाखंडी सब ऐश कर रहे जनता लुटे बेचारी,

भोले भक्तों की कमाई भरे दानपेटियां सारी.

इसी के बल पर दाढ़ीचोटी वाले मौज मनाते,

आंखें खोल कर रहने की अब आई बारी.

चढ़ावे के नाम पर मची लूट व अंधेरगर्दी पर ये लाइनें बड़ी सटीक लगती हैं. धार्मिक जगहों पर लगी दानपेटियों में भक्त सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात, नकदी, जेवर वगैरह चढ़ाते रहते हैं इसलिए मंदिरों, गुरुद्वारों वगैरह में इतनी ज्यादा दौलत बरसती है कि नोट गिनने के लिए मशीनें लगानी पड़ती हैं.

ऐसी इमारतों की दीवारों, दरवाजों, गुंबदों वगैरह पर सोनेचांदी के पतरे चढ़ाए जाते हैं. मूर्तियां व सिंहासन सोनेचांदी के बन जाते हैं. उसी दौलत की बदौलत पंडेपुजारी, संतमहंत, मैनेजर वगैरह सब मौज करते हैं.

धर्म व मजहब के नाम पर दानपुण्य, चढ़ावे, खैरात वगैरह की महिमा का बखान सदियों से किया जाता रहा है. धर्म की किताबों में ऐसे किस्से भरे पड़े हैं. चढ़ावे के चलन को बढ़ाने के लिए धर्म प्रचारक खूब बढ़चढ़ कर झूठी कहानियां सुनाते हैं, अफवाहें फैलाते हैं, ऊलजुलूल बातों से लोगों को तरहतरह से भरमाते व बहकाते हैं.

पंडेपुजारी यह बात जानते हैं कि ज्यादातर लोग खुद पर यकीन रखने की जगह भाग्य व भगवान पर भरोसा करते हैं, इसलिए वे अपने मसलों से घबरा कर मठमंदिरों की शरण में चले जाते हैं और वहां लगी दानपेटियों में यह सोच कर पैसे डालते हैं कि इस से भगवान खुश होंगे और उन का काम जल्दी बन जाएगा, लेकिन अगर चढ़ावे से ही मन्नतें पूरी होतीं तो दुनिया में कभी किसी की कोई इच्छा अधूरी ही नहीं रहती.

गोरखधंधा है यह

सिर्फ अपना घर भरने की गरज से पंडेपुरोहित जीने से मरने तक में लोगों को दान करने व चढ़ावा चढ़ाने की घुट्टी पिलाते रहते हैं. मसलन चढ़ावा चढ़ाने से सारे पाप कट जाएंगे, दुखतकलीफें खत्म हो जाएंगी, खराब ग्रह ठीक हो जाएंगे, बीमारी व गरीबी चली जाएगी, कई गुना पैसा लौट कर आएगा, पुण्य व मोक्ष मिलेगा, इसलिए अपनी कमाई का कम से कम 10वां हिस्सा तो मंदिर या तीर्थ में ब्राह्मण को जरूर दान कर देना चाहिए. कभीकभार वे ज्यादा दान भी मांगते हैं. आजकल भगवा दुपट्टा डाले रंगदार गलीगली में पैदा हो गए हैं.

भोले भक्त, अंधविश्वासी लोग खासकर औरतें उन की उलझाऊ बातों में आ जाती हैं और जहांतहां लगी दानपेटियों में अरबोंखरबों रुपए की बरसात होती रहती है.

पंडेपुजारी, मठाधीश, ट्रस्ट व सरकार ऐसी धार्मिक जगहों के मालिक बन जाते हैं, वहीं सांईं बाबा, बालाजी, काशी विश्वनाथ, अक्षरधाम, वैष्णो देवी वगैरह बहुत से मंदिरों में रोज खूब चढ़ावा चढ़ता है, इसलिए गरीबों से भरे देश में भगवान की अमीरी खूब दिखाई देती है. वह भगवान जिस के बारे में दावा किया जाता है कि वह न तो कुछ खाता है, न पहनता है. जिसे किसी चीज की जरूरत ही नहीं है, तो आखिर उसे रुपएपैसे, जेवर, कपड़े, हलवापूरी व छप्पन भोग लगाने की जरूरत क्या है? लेकिन इस के एजेंट हैं कि हरदम भक्त और भगवान के बीच अपना घर भरने की जुगत में लगे रहते हैं.

धर्म के नाम पर कारोबार करने वाले कई तरह से लोगों को डराते हैं. वे धार्मिक अंधविश्वास फैला कर लोगों को उकसाते हैं, फिर रखरखाव की आड़ में अपनी कमाई के लिए धार्मिक जगहों पर बड़ीबड़ी दानपेटियां लगाते हैं, जबकि भगवान के घर में चोरीचकारी इतनी है कि किसी को किसी पर भरोसा नहीं है.

शुद्ध होने का स्वांग करने वाले कितने बेईमान हैं, यह पंडों की बेईमानियों से साफ है. मंदिरों में लगी दानपेटियों को जंजीरों से बांध कर उन में 5-5 ताले लगा दिए जाते हैं. हर पंडे के पास अलग चाबी होती है ताकि सब मिल कर ही तिजोरी खोलें.

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सभी तीर्थों में ऐसे मंदिर हैं जहां दर्शन करने वालों को मोटा चढ़ावा चढ़ाने के लिए तकरीबन मजबूर किया जाता है. चढ़ावा न चढ़ाने पर उन के साथ बदसलूकी की जाती है. इस से तंग आ कर बहुत से लोग तोबा कर चुके हैं और उन मंदिरों में आगे से कभी न जाने की कसम खा चुके हैं. पर धर्म का नशा ऐसा है कि एक मंदिर से दुत्कारे जाने पर लोग दूसरे मंदिर की ओर चल देते हैं.

मची है छीनाझपटी

धर्म के कारोबारी चढ़ावे के नाम पर बेहिसाब धनदौलत इकट्ठा करते हैं. वे बेखौफ हो कर मजे से अपनी दुकानें चलाते हैं. दानपेटियों के गोरखधंधे से फायदा धर्म के ठेकेदारों व नुकसान भक्तों का होता है. जेब गरीबों की हलकी होती है.

ऐसा कहा जाता है कि सोमनाथ मंदिर की अकूत दौलत को लूटने के लिए उस पर 16 बार हमले हुए. आज भी मंदिरों में अकसर दानपेटियों के ताले तोड़ कर चोरियां होती रहती हैं, जबकि गजनी से कोई नहीं आता.

ज्यादातर मठमंदिर बहुत मोटी कमाई का जरीया हैं. इन पर कब्जा करने के लिए अकसर बेतहाशा खींचतान व छीनाझपटी मचती है. लड़ाईझगड़ा, मुकदमेबाजी, हत्याएं व खूनखराबा होता है. कई बार बिल्लियों की लड़ाई में

बंदर बाजी मार जाता है. पुरोहितों को हटा कर आला सरकारी अफसर बैठा दिए जाते हैं और धार्मिक कमाई पर सरकारें काबिज हो जाती हैं, लेकिन भक्त अपनी आंखें मूंदे रहते हैं. कुछ निजी मंदिर भी बनने लगे हैं. यह दूसरे कारोबारों से ज्यादा मुनाफे का धंधा जो है.

धर्म के नाम पर आंखें मूंद कर चढ़ावा चढ़ाने व अपनी जेबें हलकी करते रहने का ही नतीजा है कि इस देश में मंदिरों की भरमार है. हर गलीमहल्ले, सड़क व चौराहे पर बहुत से पुलिस थानों व ज्यादातर सरकारी इमारतों में न सिर्फ देवीदेवताओं की मूर्तियां लगी होती हैं, बल्कि बाकायदा पूजापाठ, आरती वगैरह करने का पक्का इंतजाम भी रहता है.

पिछड़ापन यों बरकरार

बहुत हैरत व अफसोस की बात तो यह है कि अपने देश में इतने स्कूल व अस्पताल नहीं हैं, जितने मठमंदिरों, मजारों वगैरह की भरमार है.

दूरदराज के बहुत से पिछड़े इलाकों में बसी आबादी रोटी, कपड़ा और मकान की बुनियादी सहूलियतों से दूर है. आज भी पीने के लिए साफ पानी, सड़क, संचार, सेहत वगैरह के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं.

आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी देश के बहुत से इलाकों में पिछड़ापन बरकरार है. बहुत सी सरकारी स्कीमों में पानी की तरह पैसा बहाने के बावजूद आज भी करोड़ों लोग बेघर हैं.

गंवई इलाकों व गंदी बस्तियों में करोड़ों लोग गरीबी की रेखा के नीचे रह कर कीड़ेमकोड़ों की तरह अपनी बदहाल जिंदगी बसर करते हैं. इस में सुधार व बदलाव होना बहुत जरूरी है.

उपाय भी हैं

दानपेटियों को तो मंदिरों की जगह स्कूलकालेजों व अस्पतालों में लगाया जाना चाहिए, लेकिन अपनीअपनी दुकानें चलाने वाले धर्म के धंधेबाज ऐसा कभी न होने देंगे.

यह कोई नई बात नहीं है. धर्म व राजनीति के नाम पर रोटियां सेंकने वाले हमेशा जनता को बेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा करते रहे हैं.

अमीर वही हुए हैं, जिन्होंने पैसे की कीमत समझी, उसे बचाया, महफूज रखा व सही जगह लगा कर कई गुना बढ़ाया.

एकएक बूंद मिल कर सागर बन जाता है. इसी तरह अगर जीने से मरने तक धर्म के नाम पर किए गए खर्च को जोड़ा या बचाया जाए तो अच्छीखासी रकम जमा हो जाती है जो अपने जरूरी खर्चों में काम आ सकती है. तंगहाली में तो बचत की अहमियत और भी बढ़ जाती है, इसलिए उस की अनदेखी करना कतई वाजिब नहीं है.

जनता को खुद चालबाज मक्कारों के फैलाए हुए जंजाल से निकलना होगा. लोगों को यह बात अच्छी तरह से समझनी होगी कि दानचढ़ावे से कुछ हासिल नहीं होता. यह सिर्फ मन का वहम है, इसलिए दानपेटियों में अपनी मेहनत की कमाई बहाने से कुछ न मिलेगा.

याद रखें कि दानपेटियों में धन डालने से सिर्फ उन्हें मिलता है जो बिना कुछ करेधरे ही हलवापूरी खाना चाहते हैं, इसलिए अपने पैसों का इस्तेमाल सुखी जिंदगी जीने के लिए करें, दानपेटियों में डाल कर उसे बरबाद न करें.

सुखद दांपत्य के लिए हमेशा सोच समझ कर बोलें

शेखर और नीता का विवाह हुए 2 साल ही हुए थे. दोनों दांपत्य जीवन से काफी खुश भी थे पर नीता की जरूरत से ज्यादा बोलने की आदत से शेखर कई बार मन ही मन झुंझला जाता था. नीता को अकेले में समझाने की कई बार कोशिश की, लेकिन नीता ने उस की बात पर ध्यान ही न दिया.

चाहे परिवार का कोई सदस्य हो या शेखर के औफिस के सहयोगी, नीता की जबान को कभी ब्रेक नहीं लगता. एक बार तो हद ही हो गई, एक पारिवारिक समारोह में वह शेखर के साथ शामिल हुई. कई दोस्तों व रिश्तेदारों के साथ शेखर खुशी से एंजौय कर रहा था. शेखर के कजिंस ने कालेज के दिन याद किए तो नीता अपने स्कूलकालेज के किस्से सुनाने लगी.

वह एक बार जब शुरू हुई तो फिर रुकी ही नहीं. दोस्त, सहेलियों और टीचर्स के किस्से पर किस्से. अचानक उसी के बोलने की आदत पर एक कजिन ने चुटकी ली, ‘‘भाभी, आप बहुत लकी हैं जो शेखर जैसा शांत पति मिला. यह तो ज्यादा बातें करने वाली लड़कियों से बहुत दूर भागता था.’’

नीता के कान खड़े हुए, वह बोली, ‘‘अच्छा, कोई थी क्या?’’

‘‘नहीं, इस की कोई गर्लफ्रैंड नहीं थी. इतना कम बोलता था, कौन लड़की इस के साथ बोर होती.’’

नीता ने कहा, ‘‘इस का मतलब, मैं ज्यादा बोलती हूं?’’

‘‘नहीं भाभी, हां, यह तो है कि आप के जैसा नहीं है यह, नहीं तो सोचो, आप दोनों ही बोलते रहते तो सुनता कौन?’’ कजिन तो मस्ती कर रहा था, छेड़छाड़ हो रही थी पर नीता को तो जैसे बात का बतंगड़ बनाने का मौका मिल गया था. सब हैरान रह गए, वह फिर चुप ही नहीं हुई, अपने बोलने की आदत को अपना विशेष गुण समझती हुई सब को चुप करवा कर ही मानी, रंग में भंग पड़ता चला गया.

शेखर को यह सब देख कर बहुत दुख हुआ, शर्मिंदगी हुई. घर जा कर नीता को समझाया भी कि हर जगह ज्यादा बोलना ठीक नहीं होता पर वह इसी बात पर बहस करती गई कि किसी ने बोलने पर मुझे टोका कैसे?

बिना सोचेसमझे बोलने की आदत से नीता कई बार अनुचित बातें भी कह जाती, जिन से किसी भी लड़की को बचना चाहिए.

धीरेधीरे दोनों में किसी बात के बढ़ने पर अच्छीखासी बहस होने लगती. झगड़ा बढ़ जाता पर क्या मजाल जो कभी नीता चुप हो जाए. गुस्से में एक दिन शेखर का हाथ उठ ही गया जो वह कभी चाहता नहीं था. पर नीता का लगातार बहस करते जाना शेखर के हाथ उठाने का कारण बनने लगा.

नीता को यह समझने में काफी समय लगा कि उस के कम बोलने या कभी चुप रहने से दोनों का झगड़ा, बहस बंद हो जाती है. जब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो उसे समझ आया कि हर बार झगड़े का कारण उस का लगातार बोलना ही था. अपनी इस कमी को सुधारने के बाद उसे फिर हमेशा शेखर का प्यार मिला. सारे दोस्तों, रिश्तेदारों से उस ने बोलने पर नियंत्रण करते ही अपने सुधरे व्यक्तित्व पर प्रशंसा भी बटोरी.

अमित और अंजलि भी देखने में बेहद स्मार्ट, सुंदर, सुशिक्षित दंपती माने जाते हैं. पर अमित की आदत है बिना सोचेसमझे वह कहीं भी कुछ भी बोल देता है.

अमित के सारे गुण इस एक अवगुण के सामने फीके पड़ जाते हैं. एक बार अमित ने घर में अपने दोस्तों को डिनर पर बुलाया हुआ था.

सभी खाने की तारीफ कर रहे थे. सुंदर, सुघड़ अंजलि बड़े उत्साह से मेहमानों की आवभगत कर रही थी. अमित के दोस्तों की पत्नियां अंजलि के स्वभाव, व्यवहार से तो अवगत थी हीं, घर में एक जगह पेंटिंग का सामान रखा देख एक दोस्त की पत्नी ने पूछा, ‘‘अंजलि, तुम पेंटिंग भी बनाती हो?’’

‘‘हां, कभीकभी. घर में ये सब पेंटिंग्स मेरी ही बनाई हुई हैं.’’ अमित के कानों में जब यह बात पड़ी तो वह फौरन बताने लगा, ‘‘और भी बहुत सी पेंटिंग्स रखी हैं ऊपर अलमारियों में, इसे लगा था कि बड़े पैमाने पर इस काम को करेगी और पेंटिंग्स बिकेंगी पर सब टांयटांय फिस, कोई नहीं बिकी. पूरा प्लान ही चौपट हो गया. अब तो पेंटिंग्स लोगों को उपहार में दे कर इस को खुश होना पड़ता है. इस के साथ ऐसा कई बार हुआ है. कई स्कूलों में इस ने ड्राइंगटीचर के लिए अप्लाई कर भागदौड़ भी की, पर कहीं बात नहीं बनी.’’

इन कटाक्षभरी बातों पर मेहमानों के सामने अंजलि की आंखों में नमी सी आ गई पर उस ने कुशलतापूर्वक उस समय स्वयं पर नियंत्रण रखा और बात उपहास में टाल दी. लेकिन अकेले में बाद में वह फूटफूट कर रोई. हालांकि, ऐसा अमित ने पहली बार नहीं किया था.

ज्यादा बोलना देखनेसुनने में कोई बहुत बड़ा अवगुण नहीं लगता पर ऐसे लोगों के साथ जीवन बिताना किसी यातना से कम नहीं होता. ज्यादा बोलने वाला पति या पत्नी कब किस के सामने क्या बोल दे, इस आदत को झेलने वाला इस शंका में कैसे जीता है, यह वही जानता है.

कहा जाता है कि जिस ने अपने मुंह और जबान पर नियंत्रण रख लिया, उस ने खुद को कई कष्टों से बचा लिया. जहां जरूरत हो, वहीं बोलना चाहिए, इसी में बुद्धिमानी है. यदि एक मूर्ख भी चुप बैठा रहे तो उसे समझदार ही समझ लिया जाता है, पर जैसे ही वह मुंह खोलता है, हकीकत सामने आ जाती है.

ज्यादा बोलने वाले इंसान इधरउधर की बातें कर के अकसर झूठी खबरों को बढ़ावा देते हैं. ऐसे लोग अच्छे श्रोता हो ही नहीं सकते. सामने वाले की बात खत्म होने से पहले ही अपनी बात शुरू कर देना मूर्खता की निशानी है. जिस व्यक्ति को यह धैर्य नहीं, वह मूर्ख है.

हर इंसान को सामने वाले की बात सुनने में तेज होना चाहिए और बोलने में धीमे. बिना सोचेसमझे बोलने वाले लोग अकसर अपनी शेखी बघारने वाले होते हैं. कहा जाता है, दूसरों को ही अपनी प्रशंसा करने दो, अपने होंठों को नहीं.

भले ही जबान छोटी सी होती है पर वह बड़ेबड़े नुकसान कर जाती है. जैसे एक जंगल को एक छोटी सी आग नष्ट कर सकती है ऐसे ही ज्यादा बोलना पतिपत्नी के मधुर रिश्ते में कड़वाहट भर कर नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए कम बोलें, अच्छा बोलें. सोचसमझ कर बात करें. जहां जरूरत न हो वहां चुप ही रहें. अनावश्यक बातों से रिश्ते में कटुता न आए, इस का ध्यान रखें.

यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो इस का मतलब है कि उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है. इसीलिए वह हृदय के तराजू में तोल कर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है.

सपनों की नहीं हकीकत की उड़ान भरेगी आंचल

इस वर्ष 22 पदों के लिए हुए एयरफोर्स कौमन ऐडमिशन टैस्ट में रिकौर्ड 6 लाख युवा शामिल हुए थे. उम्मीदवारों की इतनी बड़़ी तादाद बताती है कि युवाओं में सेना की नौकरी का जनून सिर चढ़ कर बोल रहा है. आकर्षक वेतन और दूसरी कई सहूलियतों के साथसाथ एयरफोर्स की नौकरी का अपना एक अलग ही रुतबा और रोमांच है. साथ ही, देशभक्ति की भावना भी है.

कुछ वर्षों पहले तक सेना की नौकरी से परहेज करने वाले युवाओं की पहली पसंद और प्राथमिकता अब सेना की ही नौकरी हो चली है तो इस की दूसरी अहम वजह इस नौकरी का कुछ अलग हट कर होना भी है, जिस में आन, बान व शान तीनों है. समाज में भी सैन्य अफसरों को उम्मीद के मुताबिक सम्मान मिलने लगा है जो देश के लिए एक सुखद संकेत है.

मिसाल बनी आंचल

एयरफोर्स के लिए जो 22 उम्मीदवार चुने गए उन में से एक मध्य प्रदेश के अफीम उत्पादन के लिए प्रसिद्ध जिले नीमच की 22 वर्षीया आंचल गंगवाल है. आंचल उन 5 युवतियों में से है जिन्हें एयरफोर्स की फ्लाइंग ब्रांच के लिए चुना गया. मध्य प्रदेश से चुनी गई वह इकलौती उम्मीदवार है.

आंचल के पिता सुरेश गंगवाल नीमच के बसस्टैंड पर चायनाश्ते की दुकान चलाते हैं. जाहिर है आंचल का मामूली खातापीता परिवार है, लेकिन आंचल की उपलब्धि ने गंगवाल परिवार को गैरमामूली बना दिया है. इस से भी ज्यादा अहम है आंचल की जिद और लगन जिस के चलते लड़ाकू विमान उड़ाने का उस का सपना पूरा हो गया है और कई युवाओं की वह रातोंरात आदर्श बन गई है.

आंचल की इच्छा बचपन से ही कुछ करगुजरने की थी. घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उसे पढ़ने और कोचिंग के लिए ढेर सारा पैसा व दूसरी सुखसुविधाएं हासिल हों, लेकिन यह अभाव कभी आंचल की लगन के सामने आड़े नहीं आया.

बचपन से ही पढ़ाई में होनहार आंचल ने हाईस्कूल और ग्रेजुएशन के दौरान विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में हाथ आजमाए. इन में भी वह कामयाब रही. वह मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल के जरिए होने वाली परीक्षा में लेबर इंस्पैक्टर पद के लिए चुनी भी गई. इस के पहले उस का चयन पुलिस सब इंस्पैक्टर पद के लिए भी हुआ था, लेकिन यह नौकरी उसे रास नहीं आई. लेबर इंस्पैक्टर की नौकरी आंचल के लिए एक आर्थिक सहारा भर थी, वरना तो उस की मंजिल आसमान था. आंचल जब 12वीं में थी, उस दौरान उत्तराखंड में आए प्राकृतिक कहर ने लोगों का जीना दूभर कर दिया था. ऐसे में सेना के जवानों ने किस तरह लोगों की मदद की, यह जज्बा उसे अंदर तक छू गया और उस ने सेना में जाने की ठान ली.

आंचल एकदो नहीं, बल्कि 5 बार एयरफोर्स कौमन ऐडमिशन टैस्ट में शामिल हुई और आखिरकार छठी बार चुन ली गई. तय है अगर पहली या दूसरी असफलता से ही घबरा कर वह हार मान लेती तो जिंदगीभर लेबर इंस्पैक्टर ही बनी रहती. आंचल की लगन ने उसे आसमान की बुलंदियों तक पहुंचा दिया. चयन के दिन आंचल के घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा था. नीमच के लोगों ने उस की कामयाबी का जश्न मनाया था और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित कई दिग्ग्जों ने उसे बधाई दी थी.

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अच्छी बात यह रही कि मांबाप ने कभी उस के इस ख्वाब में खलल नहीं डाला, बल्कि उसे प्रोत्साहित किया. आंचल के पिता ने इस प्रतिनिधि को बताया कि 3 भाईबहनों में मझली आंचल ने कभी उन से किसी चीज की जिद नहीं की. उलटे तीनों भाईबहन घर की हालत देखते हुए अभावों से कुछ इस तरह समझौता कर लेते थे कि उन्हें पता ही नहीं चलता था. मसलन, स्कूल की एक जोड़ी ड्रैस को रोज रात को धो कर, सुबह प्रैस कर पहन लेना.

ऐसी कई बातें आंचल भी बताती है जिन से यह साफ झलकता है कि सफलता के लिए साधन और धन उतने माने नहीं रखते जितना कि लगन माने रखती है. यह कतई जरूरी नहीं कि सफल वही युवा होते हैं जिन के मांबाप के पास ढेर सारा पैसा होता है. आंचल ने साबित किया है कि पैसों और सहूलियतों की कमी में भी आप सफल हो सकते हैं. शर्त इतनी है कि कुछ करगुजरने का जज्बा और जनून हर वक्त जेहन में रखना चाहिए.

ऐसे करें तैयारी

22 पद और 6 लाख उम्मीदवार, यह अनुपात बताता है कि एयरफोर्स की नौकरी हासिल करने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगाना पड़ता है. तब कहीं जा कर युवा अपना सपना साकार कर पाते हैं.

एयरफोर्स की नौकरी के लिए कौमन ऐडमिशन टैस्ट साल में 2 बार आयोजित होता है. आंचल उत्साहित हो कर बताती है, ‘‘इस टैस्ट में अंगरेजी, जनरल अवेयरनैस, करंट अफेयर्स और मिलिटरी ऐप्टिट्यूड से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं. यह परीक्षा एयरफोर्स की सभी शाखाओं के उम्मीदवारों के लिए होती है.’’

आंचल बताती है, ‘‘वह एसएसबी यानी सर्विस सिलैक्शन बोर्ड के इंटरव्यू में 5 बार रिजैक्ट हुई. यह इंटरव्यू बेहद कठिन होता है जो 5 दिनों तक चलता है. इस में पहले उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग होती है, फिर साइकोलौजिकल टैस्ट होता है और आखिर में ग्राउंड टैस्ट और पर्सनल इंटरव्यू होता है.

‘‘इस के साथ ही प्रोग्रैसिव ग्रुप टास्क, कमांड टास्क और सिचुएशन रिऐक्शन टैस्ट भी कम महत्त्पूर्ण नहीं होते जो यह तय करते हैं कि वाकई उम्मीदवार देश की सुरक्षा सेवाओं के योग्य है या नहीं. इन टैस्ट्स का मकसद उम्मीदवार की मानसिक और शारीरिक योग्यता के अलावा उस की क्षमता, कौशल को आंकना होता है. सब से आखिर में मैडिकल टैस्ट होता है. इस में भी उम्मीदवार फिट निकले तो एक शानदार नौकरी उस का इंतजार कर रही होती है. पर ये सब लिखित परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद की प्रक्रिया है जिस में 3-3 नंबर के 100 सवाल पूछे जाते हैं. यह परीक्षा बेहद कठिन होती है.’’

आंचल बताती है, ‘‘इस के लिए युवाओं को कड़ी मेहनत के अलावा नियमित अध्ययन, अपनी फिटनैस और अनुशासन पर खासा ध्यान देना जरूरी है.’’ एयरफोर्स की नौकरी के ख्वाहिशमंद युवाओं के लिए आंचल सलाह देते कहती है, ‘‘स्कूल और कालेजलाइफ से एनसीसी जौइन कर लेना चाहिए और एक नियमबद्ध जीवन जीने की आदत डाल लेनी चाहिए.

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वह कहती है, ‘‘अगर किसी रिटायर्ड मिलिटरी अफसर का सहयोग मिल जाए तो काफी सहूलियत होती है.’’ खुद आंचल ने इंदौर में कुछ दिन कोचिंग लेने के साथ लिखित परीक्षा और एसएसबी इंटरव्यू के लिए रिटायर्ड कर्नल निखिल दीवान के निर्देशन में तैयारी की थी.

आंचल हैदराबाद की एयरफोर्स अकादमी में फाइटर एयरक्राफ्ट की ट्रेनिंग ले रही है जो 3 चरणों में पूरी होगी. इस में ग्राउंड ड्यूटी के साथसाथ हैलिकौप्टर, चौपर और ट्रांसपोर्ट कैरियर की ट्रेनिंग भी दी जाती है.

सपनों की उड़ान

इस मुकाम तक पहुंचने के लिए आंचल ने कितनी कड़ी मेहनत की होगी, इस का सहज अंदाजा हर कोई नहीं लगा सकता. हंसमुख और एक हद तक बिंदास स्वभाव वाली आंचल ने युवावस्था एक मकसद के लिए बलि चढ़ाई है और बदले में जो हासिल किया है वह उसे उन 6 लाख युवाओं से श्रेष्ठ साबित करता है जो इस परीक्षा में बैठे थे.

आंचल को कभी इस बात पर कोई शर्म या झिझक नहीं हुई कि उस के पिता की चाय की दुकान है, उलटे वह अपने मातापिता पर गर्व करती है कि उन्होंने उसे ऐसे संस्कार दिए जिन में हालात से लड़ने की प्रेरणा थी. आंचल की कामयाबी पर हर किसी ने उसे हाथोंहाथ लिया. उसे अपनी कामयाबी पर कतई गरूर नहीं है, बल्कि वह चाहती है कि युवा बड़े सपने देखें और उन्हें पूरा करने के लिए जीजान से खुद को झोंक दें, तो कोई मंजिल मुश्किल नहीं.

पाकिस्तान : निजाम बदला, इरादे नहीं

क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान अहमद खान नियाजी पाकिस्तान के नए हीरो बन गए हैं. इमरान खान की पाकिस्तान तहरीके इंसाफ (पीटीआई) ने विरोधियों को पीछे छोड़ सब से अधिक सीटें हासिल कीं. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पीएमएल-एन और पूर्व प्रधानमंत्री व दिवंगत नेता बेनजीर भुट्टो के पति आसिफ अली जरदारी की पीपीपी को परास्त कर पीटीआई सब से बड़े दल के रूप में उभरी है.

नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुसलिम लीग (पीएमएल-एन) नैशनल असैंबली में 62 सीटें हासिल कर दूसरे स्थान पर है, जबकि आसिफ अली जरदारी के पुत्र बिलावल भुट्टो के नेतृत्व वाली पाकिस्तान पीपल्स पार्टी 43 सीटें हासिल कर तीसरे स्थान पर है. 272 सदस्यीय नैशनल असैंबली की 270 सीटों के लिए हुए चुनाव में इमरान खान की पार्टी को सब से ज्यादा 116 सीटें मिली हैं जबकि सरकार बनाने के लिए 136 सीटें चाहिए. पीटीआई की सहयोगी पीएमएलक्यू को 5 सीटें हासिल हुई हैं और 6 सीटें जीतने वाली मुत्तहिदा कौमी मूवमैंट (एमक्यूएम) ने पीटीआई को समर्थन देने के लिए रजामंदी दे दी थी. कुछ निर्दलीयों के सहयोग से पीटीआई सरकार बनाने लायक सीटें जुटाने में सफल हो गई.

आतंक के साए में हुए चुनावों के दौरान आत्मघाती हमलों से चुनाव अभियान काफी प्रभावित हुआ. हमलों में 3 उम्मीदवारों समेत 180 लोगों की जानें गईं.

भ्रष्टाचार बना मुद्दा आजादी के बाद युद्ध, आतंकवाद, तख्तापलट, अस्थिरता और मजहबी कट्टरता से जर्जर हो चुके पाकिस्तान की जनता बड़े राजनीतिक दलों से तंग आ चुकी थी. पिछले चुनावों में नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन को बहुमत मिला था पर अघोषित संपत्ति के मुकदमे के कारण उन पर आजीवन प्रतिबंध लग गया. फौज उन के खिलाफ हो गई. उधर, दिवंगत बेनजीर भुट्टो के पुत्र बिलावल भुट्टो कुछ खास नहीं कर पाए. बेनजीर के पति आसिफ अली जरदारी भी भ्रष्टाचार के जरिए अकूत संपत्ति जोड़ने का मामला झेल रहे हैं.

विश्वभर में क्रिकेटर के तौर पर मशहूर, औक्सफोर्ड से पढे़ इमरान ने 1996 में पाकिस्तान तहरीके इंसाफ का गठन किया था. राजनीति में उन्होंने भ्रष्ट सत्ता विरोधी नेता के रूप में अपनी शुरुआत की थी. वे भारत में हुए अन्ना हजारे के आंदोलन से प्रभावित रहे. उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में भी भ्रष्टाचार और व्यवस्था परिवर्तन के लिए बड़ी क्रांति की जरूरत है. लिहाजा, उन्होंने अपने स्तर पर भ्रष्टाचार से आजादी के लिए आंदोलन शुरू किया था. इमरान खान ने 1971 में राष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट में कैरियर शुरू किया था.

वे आते ही पाकिस्तान क्रिकेट में छा गए. 1992 में उन के नेतृत्व में पाकिस्तान क्रिकेट वर्ल्डकप चैंपियन बना था. उन्हें क्रिकेट का शहजादा कहा जाता था. उन के पिता इकराम उल्लाह नियाजी आर्किटैक्ट थे. मां शौकत जिस परिवार से थीं वह क्रिकेट खिलाडि़यों का था. उन के मामा अहमद रजा खान टीम के चयनकर्ता थे. इमरान 19 साल की उम्र में इंगलैंड जाने वाली टीम में चुने गए. उसी दौरान उन्होंने औक्सफोर्ड में दाखिला ले लिया था.

खेल के दौरान इमरान की छवि प्लेबौय की थी. भारतीय फिल्म अभिनेत्री जीनत अमान से उन के प्रेमसंबंधों की चर्चा होती रहती थी. बाद में 1995 में उन्होंने ब्रिटिश उद्योगपति गोल्ड स्मिथ की बेटी जेमिमा स्मिथ से शादी की. जेमिमाइमरान के 2 बेटे हैं. यह शादी ज्यादा समय तक नहीं टिकी. जेमिमा के तलाक के बाद उन्होंने टीवी ऐंकर रेहम खान से दूसरी शादी की पर उन दोनों का साथ भी ज्यादा नहीं रहा. इमरान ने इसी साल अपनी आध्यात्मिक गुरु बुशरा मानेक से तीसरी शादी की है. इन चुनावों के दौरान इमरान खान ने नए पाकिस्तान का नारा दिया. नवाज शरीफ के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई थी. पनामा पेपर्स में नवाज शरीफ का नाम आने के बाद इमरान खान का उत्साह और बढ़ गया. लोगों ने नए पाकिस्तान के नारे पर पाकिस्तान तहरीके इंसाफ को सब से बड़ी पार्टी के रूप में चुन लिया.

इस से पहले 1997 के चुनावों में इमरान खान की पार्टी ने 9 लोगों को मैदान में उतारा था पर एक पर ही जीत दर्ज हुई. 2002 में एक सीट जीते. 2008 के चुनाव का बहिष्कार किया गया. 2013 में पीटीआई दूसरी सब से बड़ी पार्टी बनी. ऐसा कहा व माना जाता है कि इमरान खान पाकिस्तान की सेना, आईएसआई और कठमुल्लों के सहयोग से चुनाव जीते.

पाकिस्तान तहरीके इंसाफ की जीत पर विपक्षी पार्टियां चुनावों में धांधली का आरोप लगा रही हैं. पाकिस्तान में मौजूद यूरोपियन यूनियन के पर्यवेक्षक ने भी चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे. सेना पर इमरान को जिताने के लिए मीडिया पर गैरजरूरी पाबंदियां लगाने के आरोप हैं. सेना द्वारा मीडिया हाउसों को इमरान की पार्टी को ज्यादा कवरेज देने और विरोधियों को अधिक तवज्जुह न देने का दबाव बनाया गया. इमरान खान ने नए पाकिस्तान का नारा जरूर दिया पर इस के लिए वे क्या करेंगे, इस बारे में उन्होंने न तो चुनावप्रचार में कोई खाका पेश किया और न उस से पहले और न ही चुनाव जीतने के बाद. अलबत्ता, उन्होंने पुराने इरादे जरूर जाहिर कर दिए जो पिछले पाकिस्तानी शासकों के रहे हैं.

इमरान का सेना और वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ खतरनाक गठजोड़ है. सेना और आईएसआई की नीतियों से समूची दुनिया वाकिफ है. इन दोनों के साथ पाकिस्तान के मजहबी कट्टरपंथी मिले हुए हैं. सेना, आईएसआई और कट्टरपंथियों का गठजोड़ लोकतांत्रिक तरीके से चुन कर आई सरकारों के लिए हमेशा नुकसानदेह साबित होता आया है

इमरान का तालिबानप्रेम पिछले सालों में इस कदर सार्वजनिक रहा है कि उत्तर पश्चिम प्रांत खैबर पख्तूनख्वा में उन की प्रांतीय गठबंधन सरकार ने 2017 में हक्कानी मदरसे को 30 लाख डौलर की मदद की थी. हक्कानी मदरसे को तालिबान की रीढ़ कहा जाता है. पूर्व तालिबान चीफ मुल्ला उमर समेत अन्य नेताओं ने यहीं से शिक्षा हासिल की थी. ये कट्टरपंथी पाकिस्तान में बैठ कर भारतविरोधी गतिविधियों को अंजाम देते हैं. अब, इन के मजबूत होने की आशंका है. कश्मीर राग

जनता ने धार्मिक कट्टरपन को नकारा है पर सब से बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आई पाकिस्तान तहरीके इंसाफ कट्टरपंथी नेताओं और संगठनों से दूर नहीं है. इमरान खान आतंकियों के प्रति नरम रुख रखते हैं, यह सभी जानते हैं. कश्मीर को ले कर भी उन का रुख अन्य पाकिस्तानी नेताओं जैसा ही है. इमरान ने पूरे चुनावी कैंपेन में काफी उग्र तरीके से कश्मीर का मुद्दा उठाया. उन्होंने चुनावी दौरों में कश्मीर में सेना की मौजूदगी पर सवाल उठाए. कश्मीर के युवाओं पर ज्यादती किए जाने के आरोप लगाए यानी वे पुराने नेताओं की तरह कश्मीर राग अलापते रहेंगे.

इसलामिक कल्याणकारी राज्य बनाने का वादा करने के कारण इमरान खान को तालिबान खान कहा जाता है. उन की पार्टी को अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित घोषित उन आतंकियों का समर्थन प्राप्त है जो अलकायदा से जुड़े हैं. इमरान खान पाकिस्तान के तालिबान से भी सहानुभूति रखते हैं और उन को पख्तून नेता कहते हैं. इमरान चुनाव से पहले मौलाना फजलुर रहमान खलील से मिले थे. हरकत उल मुजाहिदीन संस्थापक फजलुर अमेरिकी आतंकी लिस्ट में शामिल है.

मुत्तहिदा मजलिस के प्रमुख फजलुर रहमान तहरीके तालिबान पाकिस्तान से संबंध रखता है. मुत्तहिदा 6 कट्टरपंथी धड़ों से बना एक गुट है जो आतंकी गुटों का समर्थक है. 2013 के अमेरिकी ड्रोन हमले में तहरीके तालिबान पाकिस्तान का कमांडर वलीउर रहमान मारा गया था, तब इमरान ने उसे शांतिसमर्थक बताया था.

जीत के बाद उन्होंने अपनी प्राथमिकता गिनाते हुए भारत का जिक्र जिस तरह सब से बाद में किया उस से उन के इरादों के बारे में बहुतकुछ संकेत मिल जाते हैं. इमरान खान ने चुनाव जीतने के बाद अपने पहले भाषण में साफ कह दिया कि वे चीन को प्राथमिकता देंगे.

पाकिस्तान की भारत नीति आर्मी हैडक्वार्टर से संचालित होगी? इमरान कट्टरपंथियों को नाराज नहीं कर पाएंगे. सेना से हाथ मिलाने का मतलब है इमरान सिर्फ चेहरा होंगे, हुकूमत सेना व मुल्लों की ही चलेगी.

पाकिस्तान में गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, धार्मिक कट्टरता जैसे कई मुद्दे हैं जिन से निबटना इमरान के लिए कड़ी चुनौती है. सेना उन की सहयोगी बनी दिखती है लेकिन उसे जनता से जुड़े इन मुद्दों से कोई मतलब नहीं है. भारत के विरोध का मुद्दा सेना के लिए सर्वोपरि है. इमरान को सेना के मुताबिक चलना पड़ेगा. जहां तक पाकिस्तान की नई हुकूमत के साथ भारत पर असर का सवाल है, साफ है कि जब तक चुनी हुई सरकार पर सेना, आईएसआई और कट्टरपंथियों का गठजोड़ हावी रहेगा, तब तक भारत के लिए खतरनाक स्थिति रहेगी. तीनों की मिलीभगत से भारत के विभिन्न हिस्सों में सीमापार से घुसपैठ और आतंकी गतिविधियां जारी रहेंगी. जम्मूकश्मीर के बदतर हालात के लिए यही तीनों जिम्मेदार हैं.

पाकिस्तान के 71 साल के इतिहास में आधे से भी कम समय चुनी हुई सरकारें रही हैं. ज्यादा समय वहां सेना ने सीधा शासन किया है. वहीं, भले ही वहां लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार रही हो, फिर भी उस की कार्यप्रणाली में सेना, खुफिया एजेंसी आईएसआई और कठमुल्लों का हस्तक्षेप रहा है. ये मिल कर न केवल पाकिस्तान को रौंदते रहे, पड़ोसी भारत के साथ दुश्मनी का नारा दे कर अपना उल्लू साधते रहे हैं. पाकिस्तानी नेताओं की सब से बड़ी दिक्कत यह है कि वे सेना, आईएसआई और धार्मिक कट्टरपंथियों का खुल कर विरोध नहीं कर पाते. जो भी विरोध की हिम्मत करता है उसे या तो जान से मरवा दिया जाता है या देशद्रोह, भ्रष्टाचार जैसे आरोपों में जेल में ठूंस दिया जाता है.

इमरान खान भी सेना, आईएसआई और कठमुल्लों के शिकंजे से बाहर नहीं निकल पाएंगे. उन्हें इन के आदेशों पर ही चलना पड़ेगा. पाकिस्तान की यही नियति है. मजहब ने उसे इतना पंगु बना दिया है कि भूख, गरीबी, हिंसा, आतंक, गृहयुद्घ इस देश की स्थायी समस्याएं बन गए हैं. जब तक यह देश धर्म का दामन नहीं छोड़ेगा तब तक ऐसे ही हालात रहेंगे. चुनावों में चुन कर आए इमरान खान भी ऐसे हालात में सेना की कठपुतली बन कर रहेंगे तो कोई आश्चर्र्य नहीं. वे नारा चाहे नए पाकिस्तान का दें, लेकिन नीतियां उन की भी वही पुरानी रहेंगी जो अब तक के शासकों की रही हैं.

मियां बीवी की लड़ाई वकीलों की कमाई

विवाह बहुत आसान है पर तलाक बहुत कठिन. कभी असल में पैसे की कमी की वजह से तो कभी केवल अपना अहं साबित करने के लिए पतिपत्नी मनमुटाव के बाद एकदूसरे को अदालतों, पुलिस थानों और अफसरों के आगे घसीटते रहते हैं. एकदूसरे पर जान छिड़कने वाले जानलेवा बन जाते हैं.

एक मामले में समस्तीपुर, बिहार का एक जोड़ा महज 8 हजार मासिक के गुजारेभत्ते की अपील करने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. सुप्रीम कोर्ट में वकीलों को बहुत मोटी फीस देनी पड़ती है और दूसरे और हजारों के खर्च होते हैं.

बड़ी बात यह है कि 2010 में तलाक की दी गई अर्जी 2018 में भी पैंडिंग है. उसी दौरान मैंटेनैंस को ले कर पतिपत्नी फैमिली कोर्ट से हाई कोर्ट और हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का चक्कर लगा आए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने पति को कोई राहत नहीं दी और मामले को बेगूसराय के फैमिली कोर्ट पर ही छोड़ दिया. एक तरह से यह पतिपत्नी दोनों के प्रति अन्याय है कि 2010 में दाखिल मामला 2018 में भी निबटाया नहीं गया और जब उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में गुजारेभत्ते को ले कर मामला पहुंचा तो अदालतों ने सिर्फ खर्च की सीमा पर कई सुनवाइयां कर डालीं. इतने में तो वे बेगूसराय से मामला अपने हाथ में ले कर तलाक की डिक्री दे सकते थे. सुप्रीम कोर्ट के पास अनुच्छेद 142 के अंतर्गत इस तरह के फैसले करने का हक है.

पतिपत्नी के बीच विवाद अदालतों में न उलझे रहें यह देखना हर अदालत का काम है. बेगूसराय अदालत की ही 2-3 सुनवाइयों में 2010 में ही फैसला कर डालना चाहिए था. जब 2018 में सुप्रीम कोर्ट को यह एहसास था कि पतिपत्नी में फिर प्रेम पैदा हो ही नहीं सकता तो क्व8 हजार कैसे, कब दिए जाएं इस पर फैसला करने के साथ दोनों को एकदूसरे से मुक्त कर देना चाहिए था.

हमारा विवाह कानून इस मामले में एकदम आतंकवादी है कि वह पतिपत्नी को तलाक न दिला कर मामले को लटकाए रखता है. उस के पीछे अदालतों की आज भी सोच यही है कि विवाह तो संस्कार है, जो तोड़ा नहीं जा सकता.

जैसे जब लड़केलड़की में प्रेम हो तो पतिपत्नी बनने से रोकटोक संभव नहीं है और मिनटों में प्रेमी पतिपत्नी बन सकते हैं, वैसे ही जब विवाह हो चुका हो तो बच्चे हों या न हों, एकदूसरे से मुक्ति भी तुरंत हो जानी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के पास अब ऐसे काफी मामले आते हैं और यदि वह फटकार लगाने लगे कि फैमिली कोर्ट ने 2-3 माह में क्यों नहीं निर्णय दिया तो यह समस्या इसी कानून के रहते दूर हो सकती है. कानून की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट को लोगों की इस सब से बड़ी समस्या का खयाल रखना चाहिए कि जब भी कोई जोड़ा अदालत तक पहुंचता है वह एकदूसरे से उकता चुका होता है.

अदालतों को प्रक्रिया की बारीकियों में जाने के बजाए समझानेबुझाने का लाभ न हो तो बंधनमुक्ति पर जोर देना चाहिए. ‘मियांबीवी की लड़ाई, वकीलों की कमाई’ का सिद्धांत दफना दिया जाना चाहिए.

मुफ्त में डाउनलोड करें विंडोज 10

माइक्रोसाफ्ट (Microsoft) का लेटेस्ट डेस्कटौप औपरेटिंग सिस्टम विंडोज 10 (Windows 10) का अपग्रेड 190 देशों में उपलब्ध है. अगर आप Windows 10 औपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो नीचे दिए गए निर्देशों का पालन कर नया औपरेटिंग सिस्टम डाउनलोड करके इंस्टाल कर सकते हैं.

Windows 10 का रिव्यू पढ़ें

विंडोज 7 (Windows 7), विंडोज 8 (Windows 8) और विंडोज 8.1 (Windows 8.1) के यूजर्स को Windows 10 का अपग्रेड मुफ्त मिलेगा. हालांकि Windows का कोई और पुराना वर्जन इस्तेमाल करने वाले यूजर को इसे खरीदना पड़ेगा. Windows 10 की कौपी को डाउनलोड और इंस्टाल करने का तरीका इस बात पर निर्भर करेगा कि आपके कंप्यूटर में कौन सा औपरेटिंग सिस्टम मौजूद है. अलग औपरेटिंग सिस्टम के लिए तरीका थोड़ा अलग होगा. अगर आपको इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं तो यह गाइड आपके काम आएगा. सबसे पहले यह सुनिश्चित करें कि आपका सिस्टम  Windows 10 की न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करता है.

Windows 10 ISO डाउनलोड करें

Windows 10 पाने का सबसे आसान तरीका है कि Microsoft की वेबसाइट पर जाएं और Windows 10 ISO फाइल डाउनलोड करें. डाउनलोड के साइज को देखते हुए आपको तेज इंटरनेट की जरूरत पड़ेगी. इसके अलावा एक ब्लैंक USB या DVD ड्राइव भी पास रखें जिस पर बाद में ISO फाइल को बर्न किया जा सके. इसके जरिए ही आप अपने मशीन पर सेटअप को रन कर सकेंगे. ज्यादा निर्देश और लाइसेंस आवश्यकताओं के लिए Microsoft की वेबसाइट पर जाएं.

Windows 7 या Windows 8.x से अपग्रेड करने के लिए

– Windows Update खोलें. (Start Menu या Start Screen में Windows Update सर्च करके जाएं).

– अगर आपका कंप्यूटर अपग्रेड हो सकता है तो आपको upgrade to Windows 10 का विकल्प दिखाई देगा.

अगर अपडेट नहीं मिलता है तो आपको मैनुअली Windows 10 की कौपी रिजर्व करनी होगी. इन निर्देशों का पालन करके अपनी कौपी रिजर्व कर सकते हैं. अगर आप अप्रगेड की कौपी का इंतजार नहीं कर सकते और थोड़ा परिश्रम करने के लिए भी तैयार हैं तो Windows 10 ISO डाउनलोड कर लें. इसके बारे में निर्देश ऊपर दिए गए हैं.

अगर Windows 10 का अपडेट आ जाता है तो आपका कंप्यूटर अपने आप ही नए अपडेट को डाउनलोड करना शुरू कर देगा. जब भी पूछा जाए, Microsoft के सभी टर्म्स और कंडीशन पर सहमति जताते जाएं.

Windows 10 अपग्रेड को फोर्स डाउनलोड करें

वैसे, Windows 7 या Windows 8.x औपरेटिंग सिस्टम पर Windows 10 अपग्रेड को फोर्स डाउनलोड (अगर आप अपग्रेड के लिए अपनी बारी का इंतजार नहीं करना चाहते) का तरीका भी मौजूद है. आप नीचे दिए गए निर्देशों का पालन करें.

यह Windows 7 SP1 और Windows 8.1 (अपग्रेड के लिए Windows 8 यूजर को Windows 8.1 में अपग्रेड करने की जरूरत होगी) के लिए है और इसके लिए किसी खास तकनीकी ज्ञान की जरूरत नहीं. यह है तरीकाः

– “C:\Windows\SoftwareDistribution\Download” फोल्डर में नेविगेट करें (C की जगह उस ड्राइव के नाम का इस्तेमाल करें जिसमें आपके सिस्टम पर विंडोज इंस्टाल है) और सभी फाइल्स डिलीट कर दें.

– सर्च ओपन करने के लिए Windows key दबाएं. इसमें “Windows Update” टाइप करें जो आपको Windows Update पेज पर ले जाएगा. यूजर इस पेज तक पहुंचने के लिए सिस्टम के कंट्रोल पैनल (Control Panel) सेटिंग्स का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

– एक बार फिर सर्च बार खोलने के लिए Windows key दबाएं और “cmd” टाइप करें. यह आपको कमांड प्रोम्प्ट (Command Prompt) का ड्रॉप डाउन देगा जिसके साथ कई और विकल्प उपलब्ध होंगे. Command Prompt विकल्प को नहीं चुनें, बल्कि Run को Administrator के तौर पर चुनें. आप विकल्प पर राइट क्लिक करके इसका चुनाव कर सकते हैं.

– लेकिन enter बटन नहीं दबाएं.

– एक बार फिर Windows Update मेन्यू वाले पेज पर वापस जाएं. स्क्रीन की दायीं तरफ बने Check for updates विकल्प को चुनें. क्लिक करने के बाद Windows Update पर “Checking for updates…” दिखेगा.

– इस बीच, Command Prompt बौक्स पर जाएं और जो कमांड आपने पहले टाइप किया था, उसके लिए एंटर दबाएं. इसके बाद Windows Update पेज पर मैसेज लिखा आएगा Windows 10 डाउनलोड हो रहा है.

ध्यान रहे कि इस अपडेट का साइज करीब 6GB है. इसलिए यूजर डाउनलोड करने से पहले अपने इंटरनेट डेटा की लिमिट जांच लें. अपडेट इंस्टाल करने से पहले यही सुझाव होगा कि अपने सिस्टम में मौजूद सभी महत्वपूर्ण फाइल और फोल्डर का बैकअप बना लें.

रिटेल स्टोर से Windows 10 की कौपी खरीदें (Windows XP यूजर के लिए बेहतर)

– Windows 10 यूएसबी ड्राइव को अपने कंप्यूटर में प्लग-इन करें या Windows 10 डिस्क को DVD drive में डालें.

– अपने कंप्यूटर को रीबूट करें.

– स्टेंडर्ड बूट प्रेफरेंस को बदलकर boot from your USB या DVD drive कर दें. ऐसा करने के लिए बूटिंग प्रोसेस शुरू होने से पहले Esc या F1 की (key) दबाने की जरूरत होगी. हालांकि, ये कमांड आपके सिस्टम के मदरबोर्ड मैन्युफैक्चरर पर भी निर्भर करेगा.

– आगे जाने के लिए किसी भी बटन (key) को दबाएं और स्क्रीन पर Next चुनें.

– फिर Install पर क्लिक करें.

– अगर आप अपने मौजूदा औपरेटिंग सिस्टम और फाइल्स को रखना चाहते हैं तो पहला विकल्प चुनें या फिर Custom सेलेक्ट करके आप अपने सिस्टम के मौजूदा औपरेटिंग सिस्टम को Windows 10 से पूरी तरह से रिप्लेस कर सकते हैं.

अगर आपने दूसरा विकल्प (Custom) चुना है तो आपको Windows 10 को मौजूदा पार्टिशन पर इंस्टाल करने की जरूरत पड़ेगी या फिर एक पार्टिशन डिलीट करके सबसे पहले नया पार्टिशन क्रिएट करना होगा. दोनों ही स्थिति में आपके स्क्रीन पर विकल्प मौजूद रहेंगे. जब सबकुछ पूरा हो जाए Next पर क्लिक करें.

अब आपके कंप्यूटर पर Windows 10 इंस्टाल होना शुरू हो जाएगा. इस प्रोसेस में थोड़ा वक्त लगेगा इसलिए धैर्य रखें.

आपने देखा ‘स्त्री’ का नया गाना ‘नजर न लग जाए’

राजकुमार राव और श्रद्धा कपूर की आने वाली हौरर कौमेडी फिल्म ‘स्त्री’ अपने ट्रेलर के बाद से ही चर्चा में है. ट्रेलर में राजकुमार राव का मजेदार कौमेडी अंदाज देखने को मिला. तो वहीं हाल ही में फिल्‍म का ‘कमरिया’ रिलीज हुआ जिसमें नोरा फतेही थिरकती नजर आई थीं. अब इस फिल्म एक और गाना ‘नजर न लग जाए’ रिलीज कर दिया गया है. इस गाने में राजकुमार और श्रद्धा एक दूसरे पर प्यार जताते नजर आ रहे हैं.

फिल्म ‘स्त्री’ में राजकुमार और श्रद्धा की जोड़ी पहली बार नजर आने वाली है. इस नए गाने की शुरुआत में श्रद्धा, राजकुमार को बताती हैं कि उनके पास कोई फोन नहीं हैं तो राजकुमार पूछते हैं कि वह उनको कैसे बुलाएंगे. श्रद्धा उन्हें कहती है कि वह बस उसे याद करले और वो आ जाएगी. पूरे गाने में राजकुमार और श्रद्धा एक दूसरे के साथ रोमांस करते नजर आ रहे हैं. कहीं वो मेले में श्रद्धा को चूड़ियां पहनाते दिख रहे हैं तो कहीं रिक्शे में एकसाथ गाने सुनते नजर आ रहे हैं. गाने के ज्यादातर सीन मेले के हैं जहां दोनों ने काफी समय बिताया हैं.

इस गाने को ऐश किंग और सचिन-जिगर ने गाया हैं और इसके बोल गीतकार वायु ने लिखे हैं. फिल्म में राजकुमार राव और श्रद्धा कपूर के अलावा अपारशक्ति खुराना और पंकज त्रिपाठी भी अहम भूमिका में नजर आने वाले हैं. यह फिल्म 31 अगस्त को रिलीज होगी.

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