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कील मुंहासों से पाएं निजात

जवानी आने की निशानी माने जाने वाले कीलमुंहासे एक ऐसी बला हैं, जिन्हें कोई भी लड़का या लड़की अपने चेहरे पर नहीं देखना चाहता. इस का ठीकठाक और सटीक इलाज शायद हकीम लुकमान के पास भी नहीं रहा होगा.

कीलमुंहासे क्यों होते हैं, इस की कई वजहें गिनाई जा सकती हैं. मसलन, हार्मोनों में बदलाव, हाजमा खराब होना, तैलीय चमड़ी होना, ज्यादा चिकनाई वाली चीजें खाना वगैरह.

कीलमुंहासे आमतौर पर 16 साल की उम्र से अपना रंग चेहरे पर दिखाने लगते हैं. इस से चेहरा न केवल भद्दा दिखता है बल्कि जिस के चेहरे पर ये जडें़ जमा लेते हैं उस का काफीकुछ छीन लेते हैं.

यह मुमकिन है कि लमुंहासों से अब छुटकारा पाया जा सकता है. इस के लिए बाजार में मिलने वाली क्रीमों के इस्तेमाल के अलावा खुद की कुछ आदतें बदलना भी जरूरी हैं, मसलन:

* ज्यादा से ज्यादा पानी पीएं.

* चेहरे को 3-4 बार किसी अच्छे फेसवाश से साफ करें.

* पेट साफ रखें और कब्ज से बचें.

* कीलमुंहासों को फोड़ें नहीं और न ही उन्हें रगड़ें.

* ज्यादा तेल वाली चीजें न खाएं.

* चेहरे को दिन में एक बार उबटन से साफ करें. यह उबटन घर में ही बनाया जा सकता है. मलाई, बेसन, हलदी और नीबू के रस से एक चम्मच लेप बनाएं और उसे चेहरे पर लगा कर कुछ देर बाद धो लें.

* खाना और नींद वक्त पर लें और देर रात तक नहीं जागे.

* सिगरेट, तंबाकू और शराब का सेवन न करें.

इन कुछ उपायों से कीलमुंहासों की समस्या काफी हद तक हल होती है जिसे पूरी तरह खत्म करने के लिए किसी अच्छी कंपनी की क्रीम इस्तेमाल करें.

कीलमुंहासे ठीक हो जाने पर उन की तरफ से लापरवाह नहीं हो जाना चाहिए क्योंकि एक बार ठीक होने के बाद वे दोबारा भी हो सकते हैं.

कुछ माहिरों का तो यह मानना है कि कीलमुंहासों की एक बड़ी वजह खून की खराबी होती है जिसे नीम की गोलियों से काबू किया जा सकता है इसलिए 2-3 महीने तक नियमित नीम की गोलियां खाना नुकसान की बात नहीं क्योंकि नीम से किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचता है.

प्रकाश स्तंभ (भाग-1) : पारिवारिक झगड़ों ने क्या उस का पीछा छोड़ा

‘‘दीदी, जरा गिलास में पानी डाल दो,’’ रम्या ने खाने की मेज के दूसरी ओर बैठी अपनी बड़ी बहन नंदिनी से कहा था.

‘‘आलस की भी कोई सीमा होती है या नहीं? तुम एक गिलास पानी भी अपनेआप डाल कर नहीं पी सकतीं,’’ नंदिनी ने टका सा जवाब दिया था.

‘‘पानी का जग तुम्हारे सामने रखा था इसीलिए कह दिया. भूल के लिए क्षमा चाहती हूं. मैं खुद ही डाल लूंगी,’’ रम्या उतने ही तीखे स्वर में बोली थी.

‘‘वही अच्छा है. तुम जितनी जल्दी अपना काम खुद करने की आदत डाल लो तुम्हारे लिए उतना ही अच्छा रहेगा,’’ नंदिनी सीधेसपाट स्वर में बोली थी.

‘‘मैं सब समझती हूं, इतनी मूर्ख नहीं हूं. ईर्ष्या करती हो तुम मुझ से.’’

‘‘लो और सुनो. मैं क्यों ईर्ष्या करने लगी तुम से?’’

‘‘बड़ी बहन कुंआरी बैठी रहे और छोटी का विवाह हो जाए, क्या यह कारण कम है?’’ रम्या तीखे स्वर में बोली थी पर इस से पहले कि नंदिनी कुछ बोल पाती, उन की मां रचना ने दोनों का ध्यान आकर्षित किया था.

‘‘तुम दोनों अपने झगड़े से थोड़ा सा समय निकाल सको तो मैं भी कुछ बोलूं?’’

‘‘क्या मां? आप भी मुझे ही दोष दे रही हैं?’’ नंदिनी ने शिकायत की थी.

‘‘मैं किसी को दोष नहीं दे रही बेटी. मैं तो भली प्रकार जानती हूं कि मेरी 30-30 साल की दोनों बेटियां 5 मिनट के लिए भी आपस में लड़े बिना नहीं रह सकतीं.’’

‘‘30 साल की होने का ताना आप मुझे ही दे रही हैं न? रम्या तो मुझ से 2 साल छोटी है और मैं बड़ी हूं तो सारा दोष भी मेरा ही होगा,’’ नंदिनी ने आहत होने का अभिनय किया था.

‘‘मेरा ऐसा कोई तात्पर्य नहीं था. मैं जो कहने जा रही हूं उस का तुम दोनों से कुछ भी लेनादेना नहीं है. मैं तो केवल यह कहना चाहती हूं कि मैं ने यह शहर या यों कहूं कि यह देश ही छोड़ कर जाने का निर्णय कर लिया है,’’ रचना ने मानो शांत जल में पत्थर दे मारा था.

‘‘क्या? कहां जा रही हैं आप?’’ खाने की मेज पर बैठे पति नीरज के विस्फारित होते नेत्रों को उस ने देखा था. रम्या के पति प्रतीक का मुंह खुला का खुला रह गया था और दोनों बेटियों की नजर मां पर ही गड़ी हुई थी.

‘‘हमारे बैंक की एक नई शाखा ‘सीशेल्स’ में खुलने जा रही है. मैं ने वहीं जा कर नई शाखा का कार्यभार संभालने की स्वीकृ ति दे दी है. हमारे बैंक से और 2-3 कर्मचारी भी साथ जा रहे हैं,’’ रचना ने अपनी बात पूरी की थी.

‘‘क्यों उपहास कर रही हैं मां? अब इस आयु में आप देश छोड़ कर जाएंगी?’’ रम्या हंस पड़ी थी पर नंदिनी केवल उन का मुंह ताकती रह गई थी.

‘‘यह उपहास नहीं वास्तविकता है बेटी. दिनरात की इस कलह में मेरा मन घुटने लगा है. मैं शायद मां की भूमिका सफलतापूर्वक नहीं निभा पाई. तुम दोनों का व्यवहार इस का प्रमाण है. फिर भी मैं कहूंगी कि मैं ने अपनी ओर से पूरा प्रयत्न किया था. नंदिनी की पढ़ाई में कभी कोई रुचि नहीं रही. फिर भी पीछे पड़ कर उसे स्नातक तक की पढ़ाई करवाई. कंप्यूटर कोर्स करवाया. एकदो जगह नौकरी भी लगवाई पर यह मेरा और उस का…या कहें हम दोनों की बदनसीबी है कि वह अब तक जीवन में व्यवस्थित नहीं हो सकी.

‘‘तुम्हारे लिए भी मैं ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार सबकुछ किया पर तुम ने अच्छीभली नौकरी छोड़ कर विवाह कर लिया और अब तुम और तुम्हारे पति प्रतीक दोनों बेकार बैठे हैं,’’ रचना का स्वर बेहद निरीह प्रतीत हो रहा था.

‘‘और ऐसे में आप ने हम सब को छोड़ कर जाने का फैसला ले लिया?’’ रम्या और नंदिनी ने समवेत स्वर में प्रश्न किया था.

‘‘यहां रह कर भी मैं तुम दोनों के लिए कहां कुछ कर पाई. वहां थोड़ा अधिक पैसा मिलेगा तो शायद मैं तुम लोगों की कुछ अधिक सहायता कर पाऊंगी. वैसे भी ऐसे अवसर कभीकभी ही मिलते हैं. वह तो सीशेल्स जैसे छोटे से द्वीप पर कोई जाना नहीं चाहता वरना तो मुझे यह भी मौका नहीं मिलता.’’

‘‘आप कब तक  जाएंगी, मम्मीजी?’’ प्रतीक ने प्रश्न किया था.

‘‘1 माह तो जाने में लग ही जाएगा, थोड़ा अधिक समय भी लग सकता है,’’ परिवार के अन्य सदस्यों को गहरी सोच में डूबे छोड़ कर रचना अपने कमरे में चली गई थीं.

आरामकुरसी पर पसर कर रचना देर तक शून्य में ताकती रही थीं. कमरे के अंधेरे में वह काल्पनिक आकृतियों को बनतेबिगड़ते देखती रही थीं. साथ ही अतीत की अनेक बातें उन के मानसपटल से टकराने लगी थीं.

‘क्या हुआ रचना? इस तरह सिर थामे क्यों बैठी हो?’ उस दिन उन की सहेली निमिषा ने रचना को आंखें मूंदे स्वयं में ही डूबे देख कर पूछा था.

उत्तर में रचना ने अपनी आंखें खोल दी थीं. उन की डबडबाई आंखें लगातार बरसने लगी थीं.

‘क्या हुआ? कुशलमंगल तो है? मैं ने तुम्हें इस तरह स्वयं पर नियंत्रण खोते कभी नहीं देखा,’ निमिषा हैरान हो गई थी.

‘तुम स्वयं पर नियंत्रण की बात कर रही हो, मैं ने तो अपने सारे जीवन को अनियंत्रित होते देखा है.’

‘क्यों, क्या हुआ? कोई विशेष बात?’

‘सप्ताह भर से रम्या के फोन पर फोन आ रहे हैं. अपने पति के साथ यहीं हमारे पास रहना चाहती है,’ रचना धीमे स्वर में बोली थीं.

‘क्यों? प्रतीक का स्थानांतरण यहीं हो गया है क्या?’

‘किस का स्थानांतरण, निमिषा. वही हुआ जिस का डर था. फोन पर रम्या बता रही थी कि प्रतीक की नौकरी छूट गई है. मुझे तो पहले ही संदेह था कि वह नौकरी करता भी था या नहीं. अब वह नौकरी नहीं करना चाहता. व्यापार करेगा और व्यापार उसे मेरे अलावा करवाएगा कौन? एक और राज की बात बताऊं तुम्हें?’

‘क्या?’

‘प्रतीक खुद कोई बात नहीं करता. हर बात में रम्या को आगे करता है. पहले उसी की चिकनीचुपड़ी बातों में आ कर रम्या यहां अच्छीभली नौकरी छोड़ कर गुंइर चली गई. अब दिन में 2-3 बार फोन आता है. मैं सप्ताह भर से समझा रही हूं कि मेरी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि उस की सहायता कर सकूं तो रोने लगी. बोली कि आप तो बैंक में अफसर हैं, क्या कर्ज नहीं ले सकतीं?’

‘नीरज भाई साहब क्या कहते हैं?’

‘वह क्या कहेंगे? आज तक कुछ कहा है जो अब कहेंगे? उन पर तो जीवन भर व्यापार का भूत सवार रहा. पर व्यापार में कमाया कम और गंवाया अधिक. अब तो उन का शरीर ही साथ नहीं देता. अस्थमा तो पुराना रोग है ही पर हर दिन कुछ न कुछ लगा ही रहता है. बेटीदामाद के आने के समाचार से भी उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ता. वह तो, बस अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं.’

‘फिर तुम क्यों चिंता में घुली जा रही हो? आ रही है तो आने दो. उन दोनों के आने से भला कितना अंतर पड़ जाएगा,’ निमिषा ने समझाना चाहा था.

‘प्रश्न केवल भोजनकपड़े का नहीं है. व्यापार के लिए पूंजी कहां से जुटाऊं. ऊपर से मेरी दोनों बेटियों में बिलकुल नहीं पटती. नंदिनी को कोई वर अपने उपयुक्त लगता ही नहीं. संसार के सब से अधिक धनवान, सुदर्शन और प्रसिद्ध वर से ही विवाह करेगी वह. हम तो उस के विवाह की उधेड़बुन में खोए थे कि रम्या ने अपनी इच्छा से विवाह कर लिया. जगहंसाई न हो इसलिए हम ने परंपरागत रूप से विवाह करवा दिया. वर पक्ष से तो कोई औपचारिकता निभाने भी नहीं आया.’

‘विवाह के पहले तो प्रतीक बड़ी डींगें हांकता था. विवाह को 6 माह भी नहीं हुए कि नौकरी छूट गई. घर वालों ने घर से निकाल दिया. अब वह हमारी शरण में आना चाहते हैं. अब स्थिति यह है कि मेरी नौकरी न हो तो हमारा परिवार भूखों मर जाए,’ रचना अपनी रामकहानी सुनाती रही थी.

‘तुम्हारी समस्या तो वास्तव में विकट है. मैं तो केवल सलाह दे सकती हूं पर उस पर अमल तो तुम को ही करना है. मैं तुम्हारे स्थान पर होती तो कब की भाग खड़ी होती. तनिक सोचो, यदि तुम उन्हें छोड़ कर चली जाओ तो क्या वे भूखे मरेंगे? अपना पेट भरने के लिए तो हाथपैर हिलाएंगे ही न,’ निमिषा ने बात सच कही थी पर रचना को लगा कि उस की सलाह मानने की शक्ति उस में नहीं थी.

‘तुम ठीक कहती हो. मेरी नियति ही ऐसी है. कालिज में प्रवेश लेते ही मातापिता चल बसे. अपने छोटे भाई और स्वयं को व्यवस्थित करने में मैं ने कठिन परिश्रम किया. संतोष इसी बात का है कि उस का जीवन पूरी तरह से व्यवस्थित है, व्यावसायिक रूप से भी और पारिवारिक तौर पर भी. उसे देख कर बड़ी संतुष्टि मिलती है. पर मुझे तो विवाह के बाद भी चैन नहीं मिला. मुझे तो लगता है कि मेरी दोनों बेटियां अभिशाप बन कर मेरे जीवन में आई हैं. थकीहारी घर पहुंचती हूं तो नंदिनी एक प्याली चाय को भी नहीं पूछती. सर्वगुण संपन्न वर न जुटा पाने के लिए शायद वह मुझे ही दोषी समझती है. सदा मुंह फूला ही रहता है उस का.’

‘भूल जाओ यह सब, रचना. अपनी ओर से तुम ने दोनों बेटियों के लिए कर्तव्य पूरा कर दिया. हो सके तो उन पर जिम्मेदारी डाल कर उन में परिवर्तन लाने का प्रयत्न करो. कभीकभी परिस्थितियां स्वयं बदलने लगती हैं अत: प्रतीक्षा करो.’

दोनों सहेलियां भोजन करने लगी थीं पर रचना की विचारशृंखला पहले की भांति ही चलती रही. रम्या आजकल में आने ही वाली थी. दोनों बहनों में एक क्षण को भी नहीं बनती. इस समस्या को कैसे सुलझाएं इसी ऊहापोह में डूबी थी. निमिषा ठीक ही कहती है कि मेरा घर तो पूरा अजायबघर है, इसे सचमुच छोड़ कर भाग जाने का मन होता है.

रचना घर पहुंची तो रम्या आ चुकी थी. उस का पति प्रतीक टीवी देखने में व्यस्त था जबकि रम्या अपना सामान खोल रही थी.

‘मां, अच्छा हुआ आप आ गईं. अब आप ही बता दीजिए कि मैं अपना सामान कहां लगाऊं? मैं दीदी से कह रही थी कि वह ऊपर का कमरा हमारे लिए खाली कर दे. वह अकेली जान नीचे के गेस्टरूम में सरलता से रह लेंगी. हम दोनों ऊपर का कमरा ले लेंगे,’ रम्या रचना को देखते ही बदहवास हो उठी थी.

‘मैं ने पहले ही कहा था कि मैं अपना कमरा किसी को नहीं देने वाली. अतिथियों के लिए अतिथिकक्ष होता है, उन्हें वहीं रहना चाहिए,’ नंदिनी ने रचना के कुछ बोलने से पहले ही अपना निर्णय सुना दिया था.

‘रहने दे रम्या. बड़ी बहन है तेरी. क्यों छेड़ती है बेचारी को. तुम दोनों अपना सामान अतिथिकक्ष में जमा लो. थोड़ा छोटा अवश्य है पर बहुत हवादार और आरामदायक कमरा है,’ रचना ने समझौता करवा दिया था.

‘ठीक है. हमें कौन सा यहां जीवन बिताना है? कहीं भी रह लेंगे…प्रतीक का काम जमते ही हम यहां से चले जाएंगे. हमें तो बड़ा सा, खुला घर चाहिए,’ रम्या ने मुंह बनाया था.

‘छोड़ो, यह सब. इतनी छोटी सी बात के लिए क्यों अपना मन खराब करती हो. कुछ और बताओ. क्या हालचाल हैं. इतने दिनों बाद घर आई हो, इतने दिनों तक क्या किया, कहां घूमेफिरे?’

‘मां, मैं अतिथिकक्ष में अपना सामान जमा लेती हूं. बातें बाद में करेंगे. पहले कुछ खाने को दो. सामान बांधने और यहां आने के चक्कर में नाश्ता तक नहीं किया. बस, एक कप चाय पी थी.’

रम्या की बात सुन कर रचना पिघल उठी थी. बेचारी ने सुबह से कुछ नहीं खाया है.

‘नंदिनी, तुम ने छोटी बहन को खाने तक को नहीं पूछा?’ रचना आश्चर्य- चकित स्वर में पूछ बैठी थी.

‘जरूर कुछ खिलाती माताश्री, पर आप की लाड़ली ने मुझ से कहा तक नहीं कि वह भूखी है. यह शुभ समाचार तो इस ने आप के लिए ही रख छोड़ा था.’

‘चल, मैं अभी कुछ बना देती हूं,’ रचना द्रवित हो उठी थी, ‘बेचारी सुबह से भूखी है.’

रचना ने आननफानन में गरमागरम पूडि़यां और रम्या की पसंद की सब्जी बना दी थी. पिता नीरज गुलाबजामुन ले आए थे. बहुत दिनों बाद पूरा परिवार एकसाथ भोजन करने बैठा था.

‘अच्छा हुआ रम्या, तुम आ गईं, न जाने कितने दिनों बाद आज हम ढंग का भोजन कर रहे हैं…नहीं तो सूखी दालरोटी खातेखाते मन ऊब गया था,’ नंदिनी अपनी प्लेट में पूड़ी डालते हुए बोली थी.

‘ऐसी बातें तुम्हें शोभा नहीं देतीं नंदिनी, तुम क्या अब भी छोटी बच्ची हो? जो खाने का मन हो स्वयं बना कर खा सकती हो,’ नंदिनी की बात सुन कर रचना तीखे स्वर में बोली थी.

‘हां, पता है कि मैं बच्ची नहीं हूं पर मां, हर क्षण यह बताने की आवश्यकता नहीं है. आगे से मैं अपने लिए खुद ही भोजन बना लूंगी,’ नंदिनी एकदम से भड़क उठी और अपनी प्लेट छोड़ कर वह रोती हुई ऊपर कमरे में चली गई थी.

‘तुम भी चुप नहीं रह सकतीं, रचना. रुला दिया न बेचारी को,’ नीरज बाबू रूखे स्वर में बोले और बेटी को समझाने उस के कमरे में चले गए थे.

नीरज बाबू के समझानेबुझाने से उस समय युद्धविराम अवश्य हो गया था पर दोनों बहनों के बीच शीतयुद्ध की स्थिति बनी रहती थी. रचना को हर घड़ी यही चिंता सताती थी कि कहीं स्थिति विस्फोटक न हो जाए.

‘मां, प्रतीक बहुत बुद्धिमान और परिश्रमी है,’ रम्या बोली, ‘परिवार का थोड़ा सहारा मिल जाता तो पता नहीं कहां से कहां पहुंच जाता. पर उस के पिता और भाई तो उस की शक्ल देखने को तैयार नहीं हैं.’

‘लेकिन बेटी, उसे अपनी नौकरी को कुछ अधिक गंभीरता से लेना चाहिए था कि नहीं?’ रचना ने अपनी बात स्पष्ट की थी.

‘मां, सच पूछो तो अपने पिता के भरोसे ही प्रतीक नौकरी छोड़ कर आया था पर पिता की बेरुखी  से बिलकुल टूट गया है. वैसे भी उस का दोष क्या है मां. यही न कि उस ने अपनी पसंद से विवाह किया है,’ रम्या रो पड़ी थी.

रचना प्रस्तर मूर्ति बनी बैठी रही थीं. काश, वह भी ऐसा कर पातीं, पर नहीं, चाहे कुछ हो जाए वह अपने खून का तिरस्कार करने की सामर्थ्य नहीं रखती थीं.

– क्रमश:

इक घड़ी दीवार की (भाग-1) : सात्वत की अनदेखी क्यों कर रही थी चेष्टा

दोपहर का समय था. सात्वत दिल्ली के रिंग रोड से अपनी कार मोड़ कर बाईं ओर डब्लू.एच.ओ. भवन के नजदीक पहुंचा ही था कि पल भर को उस की नजर उस ओर मुड़ी और उसी पल स्वत: उस का पैर तेजी से ब्रेक पर पड़ा और कार चीत्कार करती हुई रुक गई.

सात्वत झटके से कार का दरवाजा खोल कर उतरा और तेजी से बाईं ओर भागा. वह भवन के आगे शीशे के दरवाजे तक पहुंच चुकी थी. सात्वत इतनी दूर से भी वर्षों बाद उसे देख कर पहचान गया था…शक की कोई गुंजाइश नहीं थी. वह चेष्टा ही थी…वही लंबा, छरहरा बदन, गर्दन तक कटे बाल, वही हलके कदमों वाली चाल. पलभर को ही दिखाई दी, किंतु वही आंखें, वही नाक और होंठ…शर्तिया वही है. वह तेजी से उधर बढ़ना चाहता था कि अचानक खयाल आया, उस की कार बीच रोड पर खड़ी है और सीट पर उस का लैपटाप, मोबाइल और हैंड बैग रखा है.

सात्वत ने फौरन जा कर कार को बाईं ओर लगाया, शीशा चढ़ा कर गाड़ी लौक की फिर दौड़ता हुआ डब्लू.एच.ओ. भवन की ओर गया. जब तक वह गेट के पास पहुंचा चेष्टा ओझल हो चुकी थी. शीशे के द्वार के बाहर वह पल भर रुका तो द्वार अपनेआप खुल गया. वह तेजी से लौबी के अंदर गया और चारों ओर देखने लगा. वह कहीं नहीं थी. शायद वह भवन के अंदर चली गई थी. तब तक एक वरदीधारी उस के पास आया और बोला, ‘‘आप कौन हैं? क्या चाहिए?’’

उसे खामोश पा कर उस ने फिर कहा, ‘‘प्लीज, रिसेप्शन पर जाइए,’’ और एक ओर इशारा किया.

सात्वत ने रिसेप्शन पर जा कर वहां बैठी महिला से इस तरह आने के लिए माफी मांगी फिर बोला, ‘‘मैडम, वह लड़की जो अभीअभी अंदर आई थी, वह किधर गई?’’

महिला ने उसे ऊपर से नीचे तक गौर  से देखा फिर अंगरेजी में पूछा, ‘‘आप को क्या काम है?’’

सात्वत ने कहा, ‘‘मैं उसे जानता हूं, उस से मिलना चाहता हूं, उस से पुरानी जानपहचान है.’’

रिसेप्शन पर बैठी युवती ने दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘आप बिना पूर्व समय लिए यहां किसी से नहीं मिल सकते.’’

सात्वत ने अनुरोध भरे स्वर में कहा, ‘‘मैडम, मुझे यहां आप के आफिस में किसी से नहीं मिलना है. अभी जो लेडी यहां अंदर आई हैं मैं केवल उन से मिलना चाहता हूं. मैडम, मेरा उन से मिलना बहुत जरूरी है.’’

उस महिला और गार्ड के चेहरों पर हठ और आक्रोश के भाव को देख कर सात्वत समझ गया कि उन से कुछ भी अनुरोध करना बेकार है. वह कोई अनावश्यक सीन नहीं खड़ा करना चाहता था इसलिए ‘आई एम सौरी’ बोल कर बाहर आ गया.

सात्वत धीरेधीरे चलता हुआ, अपनी कार के पास आ गया और गेट खोल कर अंदर बैठ गया. उस ने शीशा नीचे किया और सेल फोन निकाल कर अपने आफिस फोन किया. उस ने अपनी सेक्रेटरी को कहा, ‘‘कुछ जरूरी काम से मुझे आने में देर हो जाएगी…चीफ को खबर कर देना.’’

वह कार में बैठा डब्लू.एच.ओ. बिल्ंिडग की ओर देखता हुआ सोचने लगा कि चेष्टा को तो पूना में होना चाहिए, यहां दिल्ली में क्या कर रही है. हो सकता है, उस के पति का ट्रांसफर हो गया हो. 5 साल पहले, पटना छोड़ने के बाद सात्वत ने पहली बार चेष्टा की झलक देखी. हालांकि बीते 5 साल में वह अपने मन में चेष्टा को हमेशा से देखता आया है.

सात्वत की चेष्टा से मुलाकात पटना में 7 साल पहले हुई थी और उस के बाद ही दोनों गहरे दोस्त हो गए थे और कुछ ही दिनों में दोनों एकदूसरे को चाहने भी लगे थे. हालांकि दोनों के स्टेटस में बहुत अंतर था.

सात्वत छोटी जाति का था और चेष्टा ऊंची जाति की. एक निम्न- मध्यवर्गीय परिवार का सात्वत गांव से पटना पढ़ने आया था. चेष्टा के पिता आई.जी. पुलिस थे और पटना की एक पौश कालोनी में उन का बड़ा भव्य मकान था. चेष्टा की शुरू से ही शिक्षा पटना में हुई थी. फिर भी दोनों में कुछ समानताएं थीं. मसलन, दोनों पढ़ने में तेज थे और दोनों को एथलेटिक का शौक था. दोनों की मुलाकात दौड़ के मैदान में ही हुई थी. चेष्टा 100 और 200 मीटर की दौड़ में चैंपियन थी और सात्वत मिडिल डिस्टेंस दौड़ में हमेशा प्रथम आता था. शाम को दोनों अकसर साइंस कालिज के मैदान में साथसाथ प्रैक्टिस करते थे.

विश्वविद्यालय एथलेटिक प्रति- योगिताओं में दोनों कानपुर, बंगलौर और कोलकाता गए थे. इस दौरान दोनों काफी घनिष्ठ मित्र हो गए थे किंतु सात्वत हकीकत को जानता था. अपने और चेष्टा के बीच के वर्गों की दूरी को वह पहचानता था. उस ने सोचा था, चेष्टा के साथ उस की शादी का एक ही उपाय है कि वह जल्दी से किसी अच्छी नौकरी में लग जाए, पर्याप्त कमाने लगे. हो सकता है तब चेष्टा के पिता जाति को नजर- अंदाज कर विवाह के लिए राजी हो जाएं. इसलिए उस ने और भी मेहनत से पढ़ना शुरू किया. एम.एससी. में टौप करने के बाद ही उस ने अच्छी नौकरी की तलाश शुरू की.

अपने एक प्रोफेसर के सुझाव पर उस ने दिल्ली की एक मल्टीनेशनल फर्म में ईमेल से अपना आवेदन और सी.वी. भेज दिया था. प्रारंभिक वेतन 40 हजार रुपए था. इंटरव्यू के लिए उसे बुलावा आ गया था और जैसेतैसे कर वह दिल्ली पहुंचा था. फर्म के आफिस में इंटरव्यू के लिए अंदर जाने से पहले उसे लगा था कि वह बेकार आया…ये लोग शायद उसे बाहर से ही भगा देंगे.

इंटरव्यू कार्ड दिखाने पर उसे अंदर ले जा कर बैठाया गया. वह चुपचाप, दुबका, सिकुड़ा रिसेप्शन में बैठा रहा. एक चपरासी एक ट्रे में पानी का गिलास ले कर लोगों को पिलाते हुए घूम रहा था पर उसे पानी पीने में भी संकोच महसूस हो रहा था. खैर, उस का नाम पुकारा गया और उसे घोर आश्चर्य हुआ जब 5 मिनट के बाद ही उसे चुन लिया गया. चीफ आफिसर ने उस से कहा था कि वह बाहर लौबी में बैठ कर चाय पीए. उसे 1 घंटे के अंदर ही नियुक्तिपत्र मिल जाएगा. आज ही ज्वाइन कर लो, कल से 1 महीने की ट्रेनिंग शुरू हो जाएगी.

उसे पटना वापस जाने की इजाजत नहीं मिली. फर्म के एक बड़े अधिकारी ने पी.ए. को बुला कर कहा था, ‘‘इन साहब के लिए कंपनी के गेस्ट हाउस में एक कमरा बुक करा दो,’’ उस के बाद उसे कैशियर से 10 हजार का एडवांस दिला कर कहा गया, ‘‘कंपनी की गाड़ी से मार्केट चले जाओ और अपने लिए कुछ कपड़े खरीद लो.’’

सबकुछ इतनी जल्दी और तेजी से हुआ कि उसे कुछ सोचने का मौका ही नहीं मिला. चंद घंटों में ही सात्वत का जीवन बदल गया. सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक लगातार ट्रेनिंग. आज 5 साल बाद उस का वेतन 2 लाख रुपए प्रतिमाह हो गया है. उस ने अपना फ्लैट खरीद लिया है.

नौकरी मिलने के दूसरे दिन ही उस ने चेष्टा को घर पर फोन किया था, लेकिन फोन चपरासी ने उठाया और उस ने फोन पर चेष्टा को नहीं बुलाया. इस के बाद यह सिलसिला कई बार चला. अंत में तंग आ कर उस ने कहा था कि चेष्टा को कह देना सात्वत का फोन आया था. यहां दिल्ली में नौकरी मिल गई है और मौका मिलते ही पटना आऊंगा.

1 महीने बाद उसे बंगलौर ब्रांच आफिस में भेज दिया गया. वहां कंपनी का ब्रांच आफिस था. वहां नए आफिस और उस के काम के लिए उसे सुबह से रात तक लगातार काम करना पड़ा था. 1 साल बाद ही उस का वेतन 60 हजार रुपए प्रतिमाह हो गया और उसे एडवांस ट्रेनिंग के लिए अमेरिका जाना पड़ा. वहां से लौट कर वह दिल्ली आया तो वह पहली बार 10 दिन की छुट्टी ले कर पटना पहुंचा. पटना पहुंचते ही वह सब से पहले कालिज गया. सोचा था, पहले चेष्टा से मिलेगा फिर उस के मांबाप से. किंतु कालिज में उस की मुलाकात चेष्टा से नहीं हो सकी.

चेष्टा की सहेलियों से उस ने चेष्टा के बारे में पूछा था तो वे आश्चर्य से उसे यों देखने लगीं मानो चेष्टा को जानती ही नहीं हैं. जब उस ने कई बार जोर दे कर कहा कि चेष्टा कहां है, वह उस से अभी मिलना चाहता है तो चेष्टा की एक सहेली ने कहा कि वह यहां नहीं है और करीब 9 महीने पहले उस की शादी भी हो गई.

फिर चेष्टा की सहेलियों की मिली- जुली बातों से उसे पता चला था कि उस के पिता ने बहुत जल्दी, एक हफ्ते के अंदर चेष्टा की शादी कर दी थी. बड़ा अच्छा लड़का मिल गया था, आफिसर है, पूना में पोस्टेड है, हैंडसम है.

सात्वत को यह जान कर लगा मानो किसी अदृश्य हाथों ने उसे धक्का दे दिया हो. वह अचानक मुड़ कर तेजी से होटल गया और सामान पैक कर के पहली फ्लाइट पकड़ कर दिल्ली वापस चला आया था.

सात्वत का दिल्ली से चेष्टा के घर बारबार फोन आने के कारण ही चेष्टा के मांबाप ने उस की शादी इतनी जल्दी कर दी थी. लड़के के पिता भी आई.जी. थे और दिल्ली में पोस्टेड थे. उन्होंने चेष्टा के पिता के साथ ही आई.पी.एस. की ट्रेनिंग की थी. दिल्ली में एक मीटिंग में दोनों की मुलाकात हुई. बातचीत हुई और वहीं शादी तय हो गई. अगले महीने ही चेष्टा की शादी हो गई और वह पति के साथ पूना चली गई. मांबाप ने कहा, बाकी पढ़ाई वहीं पूना में कर लेगी.

सात्वत हर साल गांव जाता रहा लेकिन केवल 2-3 दिन के लिए. वह पटना स्टेशन से ही सीधे गांव चला जाता था. उस ने आज तक दोस्त के यहां छोड़ा सामान नहीं लिया. दोस्त का फोन आया तो कह दिया कि किसी को दे देना, उसे जरूरत नहीं है.

गांव में सात्वत ने नया घर बनवा दिया. पिता को हमेशा रुपए भेजता रहा है. लेकिन उस के मांबाप जब भी उस की शादी की बात करते तो वह टाल जाता था जबकि उस के मांबाप, रिश्तेदार, सभी आश्चर्य करते किंतु वह हमेशा इस बारे में खामोश रहता. शुरू में सात्वत ने सोचा था कि जीवन की नैसर्गिक प्रक्रिया के तहत अतीत की यादें धूमिल हो कर लुप्त हो जाएंगी और शारीरिक जरूरतों के कारण वह एक नई राह पर चल सकेगा किंतु यादों के निशानों की गहराई समय के साथ बढ़ती ही गई. वह कभी भी उन बेडि़यों को तोड़ कर बाहर नहीं निकल सका. कोई भी देह आकर्षण उसे अपनी ओर खींच नहीं सका.

कार में बैठेबैठे यादों के साए में वह सुषुप्त सा हो गया था. अचानक पूर्ण चेतन होते हुए उस ने आंखें खोलीं और लंबी सांस ली. यहां क्यों बैठा है, इंतजार में, अब मिल कर क्या हासिल होगा? फिर भी वह बैठा ही रहा, इंतजार करता हुआ, बंधा हुआ.

सात्वत ने चौंक कर देखा, चेष्टा सामने फुटपाथ पर तेजी से आई.टी.ओ. चौराहे की ओर चली जा रही है. वही चाल, मानो जमीन के ऊपर हवा में चल रही है. कब डब्लू.एच.ओ. भवन से निकली, कब आगे निकल गई, उसे पता ही नहीं चला. उस ने झट से गाड़ी स्टार्ट की फिर विचार की बिजली कौंधी, ‘यदि वह आई.टी.ओ. के पास रोड पार कर के चली गई तो वह उस तक कभी भी नहीं पहुंच सकेगा. वह दरवाजा खोल कर बाहर निकला. उस ने जल्दी से गाड़ी लौक की और आतंकित हो कर उस के पीछे चेष्टा, चेष्टा की आवाज लगाते दौड़ा.

वह बिना रुके, बिना पीछे देखे तेजी  से आगे चलती गई.

‘‘रुको, चेष्टा रुको, मैं हूं सात्वत.’’

एक पल के लिए चेष्टा के कदम थोड़ा हिचके, सात्वत को ऐसा लगा…फिर उसी गति से बढ़ने लगे. सात्वत तेजी से दौड़ा कि तभी सामने ट्रैफिक गुजरने लगा. दाहिनी ओर का सिग्नल हो गया था. सात्वत उस से बेखबर उस के पार निकलना ही चाहता था कि सामने सड़क पार करते एक टेंपो से टकराया और उछल कर गिरा. टेंपो ब्रेक लगा कर रुक गया.

‘‘अंधा है क्या, पागल है क्या? गाड़ी के नीचे आ जाता, बत्ती नहीं देखता, पागल है?’’ टेंपो चालक ने घुड़का.

वह दर्द से कराहते, लंगड़ाते हुए उठा, ‘‘सौरी, सौरी,’’ कहते हुए फुटपाथ की ओर बढ़ा, तब तक एक नारी के कोमल हाथ ने उस की बांह पकड़ कर सहारा दिया और फुटपाथ के कोने पर ले जा कर बैठा दिया.

सात्वत ने दर्द से धुंधली हुई दृष्टि से देखा कि चेष्टा उस की ओर आंसू भरी आंखों से देख रही थी, ‘‘पागल हो क्या? सीरियस एक्सिडेंट हो जाता तो?’’

सात्वत केवल उस की ओर देखता रहा. दुनिया सिमट गई और कुछ भी दिखाई नहीं दिया, न सुनाई दिया. बस, आंखों से 2 बूंदें ढुलक गईं.

चेष्टा कुछ पल अभिभूत सी उस की ओर झुकी रही फिर चौंक कर चेतन हुई. सात्वत का फुलपैंट घुटने के नीचे थोड़ा फट गया था और घुटने से रक्त बह रहा था. सात्वत ने चेष्टा की नजरों का पीछा करते हुए उधर देखा फिर जेब से रुमाल निकाला. चेष्टा ने उस के हाथ से झट से रुमाल ले लिया और उस के जख्म पर कस कर बांधते हुए बोली, ‘‘गाड़ी के नीचे आ जाते तो?’’

सात्वत ने नीचे देखते हुए फुसफुसा कर कहा, ‘‘सौरी, क्या करता? तुम रुक नहीं रही थीं…तुम मेरी आवाज सुन कर भी क्यों नहीं रुक रही थीं?’’

चेष्टा ने एक पल को उस की ओर देखा और बोली, ‘‘मैं रुकना नहीं चाहती थी.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘पहले उठो, चलो, ड्रेसिंग करवा लो.’’

‘‘मैं ठीक हूं, कोई खास चोट नहीं है,’’ सात्वत उठ कर खड़ा हो गया.

अगलबगल लोग उन दोनों की ओर घूर रहे थे.

चेष्टा ने कहा, ‘‘चलो, यहां से चलें.’’

सात्वत ने पीछे की ओर इशारा किया और बोला, ‘‘उधर मेरी कार है.’’

दोनों उस ओर बढ़े. सात्वत जल्दी से चलना चाह रहा था लेकिन वह लंगड़ा रहा था. अपनी कार के पास आ कर इशारा कर के सात्वत रुका तो चेष्टा ने उस की ओर अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘तुम ड्राइव नहीं कर सकोगे. लाओ, चाबी मुझे दो.’’

सात्वत ने जेब से चाबी निकाल कर चेष्टा की ओर बढ़ा दी. दरवाजा खोल कर दोनों अंदर बैठ गए तो गाड़ी स्टार्ट करते हुए चेष्टा ने पूछा, ‘‘कहां जाना है? पहले अस्पताल चलें, ड्रेसिंग करवाने?’’

सात्वत जल्दी से बोला, ‘‘नहींनहीं, मेरे फ्लैट में ड्रेसिंग का सामान है. मैं कर लूंगा…अभी मुझे तुम्हें छोड़ कर कहीं नहीं जाना है.’’ कुछ पल की खामोशी रही. चेष्टा बिना कुछ बोले सामने की ओर देखती कार चलाती रही तो सात्वत ने पूछा, ‘‘तुम यहां क्या कर रही हो? तुम तो पूना में थीं?’’

  • – क्रमश: 

दिल्ली को बचाओ इन दुकानदारों से

यह ठीक है कि व्यापारी और दुकानदार अंतत: घरों की सेवा करते हैं और उन्हें रोजमर्रा का सामान दिलाते हैं पर इस का मतलब यह नहीं कि इस चक्कर में वे अपने ग्राहकों की बस्तियों को ही उजाड़ दें. पेड़ छांव देते हैं पर जब घर की दीवारों में घुस कर घर को गिराने लगें तो उन्हें काटना ही होता है चाहे पेड़ कितने ही उपयोगी क्यों न हों. दिल्ली एक उदाहरण बन रहा है कि शहरों का प्रबंध और शहरों के नियम दुकानदारों के इशारों पर हों या घरों के, सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी नियुक्त कर रखी है जो घरों के इलाकों में घुस रहे दुकानदारों, दफ्तरों, रेस्तराओं और यहां तक कि डांस बारों पर रोक लगाने की कोशिश कर रही है. दुकानदारों की मजबूत लौबी जो पौलिटिकल पार्टियों को पैसा देती है, उन नियमों को बदलवाना चाहती है जिन के सहारे मौनीटरिंग कमेटी काम कर रही है.

ये नियम भी दिल्ली प्राधिकरण यानी डीडीए ने ही बना रखे हैं पर इन का उद्देश्य शुरू से किसी तरह हर जने को सरकारी अंगूठे के नीचे रखना रहा है. इस चक्कर में इन्होंने सरकारी अफसरों को अरबों बनाने के अवसर दे रखे हैं. वे कागज पर बनी घुंडी और लगी मुहर से पूरी बिल्डिंग को नियमित भी कर सकते हैं और ढहाने लायक भी घोषित कर सकते हैं.

अगर वे पैसा ले कर मंजूर कर दें तो नागरिकों के पास बहुत थोड़े अधिकार हैं कि दखलंदाजी कर सकें. सुप्रीम कोर्ट नागरिकों और घरों के लिए दिल्ली को बचाने की कोशिश कर रहा है पर यह फल नहीं दे पा रहा क्योंकि नौकरशाही दुकानदारों के साथ है. नौकरशाही ने शहरी नियमों

के लिए बने मास्टर प्लान में भारी हेरफेर कर के छूट दे दी है ताकि उन दुकानदारों को अभयदान मिल जाए, जिन्होंने घरों के बीच व्यवसाय शुरू कर रखे हैं. दिल्ली के 80% इलाके इस के शिकार हैं. दिल्ली में बाजारों की कमी नहीं है. वहां आसानी से बहुमंजिला पार्किंग वाली बहुमंजिला दुकानें बनाई जा सकती हैं. लोगों को आज जरूरत से ज्यादा दुकानें मिल रही हैं, जो सुविधा नहीं क्योंकि दुकानदार अति मोटा मुनाफा वसूल कर अपना निकम्मापन छिपाते हैं.

दिल्ली के ज्यादातर दुकानदार घमंडी हैं और ग्राहकों को गुलामों की तरह समझते हैं. शौपिंग किसी भी तरह आनंद की बात नहीं है. अगर सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में सफल होता है तो ही देश भर के शहरों को संदेश मिलेगा.

हमारी कमर्शियल राजधानी तो पहले ही पानी के सैलाब में डूबी है. दिल्ली दुकानदारों के सैलाब में डूब रही है.

दमदार एक्शन करते जल्द ही साथ दिखाई देंगे ऋतिक रोशन और टाइगर श्रौफ

ऋतिक रोशन और टाइगर श्रौफ जल्द ही एक साथ पर्दे पर दिखाई देंगे. उनकी फिल्म का ऐलान तो पहले ही किया जा चुका है, लेकिन अब इसकी शूटिंग भी शुरू हो चुकी है. ऋतिक रोशन ने अपने ट्विटर हैंडल पर टाइगर श्रौफ के साथ एक फोटो शेयर किया है. उन्होंने बताया कि उनकी नई फिल्म शुरू हो चुकी है.

सिद्धार्थ आनंद की इस फिल्म में ऋतिक रोशन और टाइगर श्रौफ पहली बार एक साथ दिखाई देंगे. इस फिल्म को आदित्य चोपड़ा की यश राज फिल्म की ओर से प्रड्यूस किया जा रहा है. जब इस इस फिल्म की घोषणा हुई है तब से ही लोग इस फिल्म को ले कर उत्साहित हैं.

पूजा कर शुरू किया ये प्रोजेक्ट

शुक्रवार को पूजा के साथ यशराज फिल्म के कार्यालय में पूजा के साथ ऋतिक रोशन और टाइगर श्रौफ स्टारर इस फिल्म के प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई. इस फिल्म के बारे में सिद्धार्थ आनंद ने भी अपने इंस्टाग्राम के जरिए जानकारी दी. इस फिल्म से जुड़ी पहली जारी की गई पहली तस्वीर में ऋतिक रोशन और टाइगर श्रौफ एक साथ खड़े हो कर पोज देते दिखाई दे रहे हैं.

ऋतिक रोशन ने ट्विट कर दी जानकारी

ऋतिक रोशन ने अपने ट्विटर पेज पर इस पिक्चर को शेयर किया है. इस फोटो के साथ उन्होंने लिखा है कि  “And people thought it was a 2 hero film. Journey begins #HrithikvsTiger @iTIGERSHROFF #sidanand”. हालांकि इस फिल्म के बारे में अब तक बहुत अधिक जानकारी साझा नहीं की गई है लेकिन खबरों के अनुसार इस फिल्म में काफी एक्शन होगा. इस फिल्म में काफी फाइट सीन होने की संभावना जताई जा रही है. इस फिल्म को अक्टूबर में रिलीज किए जाने की संभावना है. ऋतिक रोशन आजकल आनंद कुमार की बायोपिक ‘सुपर 30’ की शूटिंग में व्यस्त हैं.

रिपोर्ट फीचर का नया ले आउट लेकर आया व्हाट्सऐप

व्हाट्सऐप ने नए बीटा वर्जन 2.18.246 को रोल आउट कर दिया है. फिलहाल यह बीटा वर्जन एंड्रायड औपरेटिंग सिस्टम के लिए जारी किया गया है. बीटा वर्जन में रिपोर्ट फीचर के लेआउट में काफी सुधार किया गया है. बता दें कि नया लेआउट पर्सनल और ग्रुप चैट दोनों के लिए जारी होगा. रिपोर्ट बटन पर क्लिक करने के बाद एक नया अर्लट बौक्स खुलेगा. इस अलर्ट की मदद से यूजर ग्रुप से बाहर निकल पाएंगे या फिर एक व्यक्ति को ब्लौक कर सकेंगे.

नया अपडेट जारी होने के बाद यूजर रिपोर्ट किए गए ग्रुप और पर्सनल चैट की चैट हिस्ट्री बनाए रख सकेंगे. जो पहले मुमकिन नहीं था. नए रिपोर्ट फीचर को इस्तेमाल करने के लिए सबसे पहले उस ग्रुप या पर्सनल चैट पर जाएं जिसे आप रिपोर्ट करना चाहते हैं. किसी पर्सनल चैट को रिपोर्ट करना है तो चैट में दिखाई दे रहे तीन डौट मेन्यू पर जाएं. इसके बाद व्यू कौन्टेक्ट पर जाएं और फिर नीचे दिखाई दे रहे रिपोर्ट औप्शन पर क्लिक करें. ग्रुप चैट में रिपोर्ट फीचर इस्तेमाल करने के लिए ऊपर दाहिने तरफ दिखाई दे रहे तीन डौट मेन्यू पर क्लिक करें. इसके बाद व्यू ग्रुप इंफो पर जाएं और रिपोर्ट पर क्लिक करें.

बता दें कि यूजर सिर्फ उसी पर्सनल चैट को रिपोर्ट कर सकेंगे जो नंबर मोबाइल में सेव है. मोबाइल में जो नंबर पहले से सेव नहीं है, ऐसे व्यक्ति से की गई चैट को केवल ब्लौक किया जा सकेगा. आप व्हाट्सऐप के इस नए फीचर को चेक कर सकते हैं, इसके लिए आपको व्हाट्सऐप बीटा प्रोग्राम के लिए नामांकन करना होगा.

व्हाट्सऐप यूजर की सहुलियत के लिए इस नए फीचर को रोल आउट करने की तैयारी में है. रोल आउट होने से पहले उम्मीद है कि रिपोर्ट फीचर को इससे भी बेहतर बनाया जा सकता है. अगस्त 2018 के शुरुआत में एक रिपोर्ट सामने आई थी जिसमें कंपनी के पिक्चर-इन-पिक्चर मोड के बारे में पता चला था. व्हाट्सऐप पिक्चर-इन-पिक्चर फीचर की मदद से यूजर चैट में आए इंस्टाग्राम और यूट्यूब वीडियो लिंक को देख पाएंगे. इसके लिए अलग से लिंक ओपन कर ऐप पर जाने की जरूरत नहीं होगी.

लेने जा रहे हैं जीवन बीमा ? जान लें यह काम की बातें

जीवन बीमा (लाइफ इंश्योरेंस) एक तरह का कौन्‍ट्रेक्ट है जिसमें बीमाधारक की मृत्यु के बाद परिवारजन या आश्रितों को कवर की राशि मिलती है. जीवन बीमा दो तरह के होते हैं- एक तो पूरे जीवन के लिए और एक टर्म इंश्योरेंस. टर्म इंश्योरेंस में प्रीमियम कम होता है क्योंकि इसमें शुद्ध रूप से लाइफ कवर मिलता है बिना किसी बचत और प्रोफिट के. होल लाइफ पौलिसी में पूरे जीवन का कवर मिलता है. इसलिए, इसकी मेच्योरिटी निर्धारित नहीं होती है. बीमाधारक को मृत्यु तक प्रीमियम भरना होता है और उसकी मृत्यु के बाद उसके परिवार को राशि मिल जाती है.

फंड को चुनने के अलावा इसके कई और पहलू भी हैं जिनका आपको ध्यान होना चाहिए.

परिपक्‍वता अवधि

इंश्योरेंस पौलिसी खरीदने का मतलब है कि आप अनुबंध या कौन्‍ट्रेक्ट से सहमत हैं. आप पौलिसी खरीदते समय अपनी सहमति देते हैं. यदि आपने पौलिसी खरीदते समय मेच्योरिटी डेट से सहमत हो गए हैं तो आप बाद में इसमें बदलाव नहीं कर सकते हैं. उदाहरण के तौर पर, यदि आपने 60 साल का प्लान लिया है, तो आप मेच्योरिटी डेट में बदलाव नहीं कर सकते हैं. आप 80 साल के लिए आपको दूसरा कवर ही लेना पड़ेगा.

इंश्योरेंस कंपनी से लोन

आप इंश्योरेंस कंपनी से लोन भी ले सकते हैं. इस लोन पर ब्याज दर क्या लगेगी यह इस पर निर्भर करता है कि आप लोन कब लेते हैं. ये ब्याज दर एक इंडेक्स पर निर्भर है. उदाहरण के तौर पर, बैंकों द्वारा निर्धारित 10 साल की जी-सेक या बेस इंटरेस्ट रेट बीमा नियामक विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) द्वारा अप्रूवल की गई होती है. बीमाकर्ता द्वारा यह अलग-अलग हो सकती है.

पौलिसी को सरेंडर करने के दौरान

यदि आप कुछ साल बाद अपनी पौलिसी सरेंडर करते हैं, तो इसके चार्ज आपकी पौलिसी और इसके फीचर्स पर निर्भर करेंगे. सरेंडर वेल्यू का, भुगतान किए गए पेमेंट से कोई सीधा लिंक नहीं है, बल्कि यूनिट लिंक पौलिसी में यह यूनिट वैल्यू पर या ट्रेडिशनल पौलिसी के अर्जित लाभ पर निर्भर करता है. अगर आपके पास यूलिप (यूएलआईपी) है तो आपको 5 साल के बाद पूरी यूनिट वेल्यू मिलेगी क्योंकि 5 साल पर सरेंडर चार्ज ज़ीरो हो जाते हैं. ट्रेडिशनल पौलिसी में सरेंडर वैल्यू अर्जित लाभ की कोई डिस्काउंट की गई वेल्यू होती है. सरेंडर चार्ज हर पौलिसी में अलग होते हैं और कौन्‍ट्रैक्‍ट में लिखे होते हैं.

इंश्योरेंस का कौन्‍ट्रैक्‍ट

इंश्योरेंस का कौन्‍ट्रैक्‍ट यूबेरिमा फंड्स के सिद्धांत का पालन करता है, जिसका मतलब है पूरा विश्वास. इसमें आपको आवश्यक निजी जानकारी, स्वास्थ्य की स्थिति और स्वास्थ्य से संबन्धित पहले रही समस्याएं बतानी होती हैं. अगर आप सही जानकारी प्रदान नहीं करते हैं तो आपका क्लेम रिजेक्ट हो सकता है. इंश्योरेंस पौलिसी के कौन्‍ट्रैक्‍ट में इस बारे में सारी जानकारी होती है.

पौलिसी के बारे में प्राप्‍त कर लें पूरी जानकारी

बीमा कानून की धारा 45 के अनुसार आप किसी पौलिसी को 3 साल के बाद अस्वीकृत नहीं कर सकते हैं. यदि बीमाकर्ता फिर से मूल्यांकन करता है और पहली पौलिसी के बाद दूसरी पौलिसी जारी करता है तो जरूरी है कि क्लेम और नियम व शर्तों की पूरी जानकारी दी जाये. पौलिसी के बारे में पूरी तरह निश्चिंत होने के बाद आप स्वास्थ्य का घोषणा पत्र दे सकते हैं.

लोन और रिपेमेंट का प्रीमियम पर कोई असर नहीं

लाइफ इंश्योरेंस की एंडावमेंट पौलिसी लोन की सुविधा देती है, जबकि यूनिट-लिंक इंश्योरेंस और टर्म-इंश्योरेंस में ऐसा नहीं होता है. सामान्य तौर पर, स्वीकृत किया गया लोन सरेंडर वेल्यू का एक अनुपात होता है. ध्यान रहे कि लोन और रिपेमेंट का प्रीमियम पर कोई असर नहीं पड़ता है.

अन्य

– अगर आप लोन का भुगतान नहीं करते हैं तो राशि आपके इंश्योरेंस से वसूली जाती है.

– एक नियम के रूप में, एक व्यक्ति को वार्षिक आय से 10 गुना का कवर लेना चाहिए.

– टर्म-इंश्योरेंस पौलिसी में अगर बीमाधारक की मृत्यु हो जाती है तभी नौमिनी को राशि मिलती है. पौलिसी के सरवाइवल या मेच्योरिटी बेनिफिट नहीं हैं.

– अगर आपने पौलिसी लेते समय नॉमिनी निर्धारित नहीं किया है, तो कानूनी उत्तराधिकारी को बीमा लाभ मिलेगा. दावे के निपारे के समय बीमाकर्ता द्वारा उत्तराधिकार का दस्तावेज मांगा जाता है.

सिर्फ रास्ते बताने के नहीं बल्कि और भी कई काम आता है गूगल मैप

गूगल मैप्स का इस्तेमाल आजकल लगभग हर कोई कर रहा है. इस ऐप के जरिए यूजर्स किसी भी रास्ते की जानकरी ले सकते हैं. आपको कहीं भी जाना हो तो यह ऐप आपको वहां तक का आसान रास्ता बताती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि गूगल मैप्स केवल रास्ता बताने वाली ऐप नहीं है. इससे कई अन्य काम भी किए जा सकते हैं. आपको बता दें कि गूगल ने इस ऐप में कई तरह के फीचर्स को एड किया है. यहां हम आपको ऐसे ही 5 काम की जानकारी दे रहे हैं जो गूगल मैप्स से किए जा सकते हैं.

पार्किंग लोकेशन को करता है सेव

अगर आप गाड़ी पार्क करके भूल गए हैं कि आपने पार्किंग कहां की है तो गूगल मैप्स का यह फीचर आपके काम आएगा. इस फीचर की मदद से यूजर्स यह पता लगा सकते हैं कि उन्होंने अपनी कार कहां पार्क की थी. आपको बता दें कि एंड्रौयड फोन इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को मैप पर ब्लूट डौट दिखाई देगा. यह सेव योर पार्किंग का विकल्प है. वहीं, आईओएस यूजर्स सेट ऐज पार्किंग लोकेशन पर टैप कर अपनी गाड़ी को मैप पर लोकेट कर सकते हैं.

वौयस कमांड भी उपलब्ध

गाड़ी चलाते समय यूजर्स मैप को इस्तेमाल करने के लिए वौयस कमांड का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके लिए आपको मैप पर दिए गए माइक्रोफोन पर क्लिक करना होगा. इसके बाद आपको बोलकर अपनी लोकेशन बतानी होगी. ऐसा करने से मैप पर उस लोकेशन का रास्ता दिखाया जाएगा.

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औफिस और घर को कर सकते हैं डिफौल्ट सेट

मैप पर औफिस और घर की लोकेशन को डिफौल्ट सेट कर सकते हैं. इससे नेविगेशन जल्दी शुरू हो जाता है. इसका एक फायदा है यह भी है कि आप जब औफिस में काम कर रहे होंगे तो यह आपको घर जाने वाले रास्ते के ट्रैफिक के हाल की जानकारी भी देता रहेगा.

मल्टीपल लोकेशन विकल्प उपलब्ध

अगर आपको एक साथ कई जगह जाना है तो आप मल्टीपल लोकेशन की मदद ले सकते हैं. इसके लिए आपको अपने फोन में मैप्स में जाकर पहले लोकेशन सेट करनी होगी. जब आप अपनी डेसटीनेशन लोकेशन सेट करते हैं तो आपको Your Location के बराबर में तीन डौट दिए गए हैं. यहां पर क्लिक कर आपको Add Stop का विकल्प मिलेगा. यहां आप मल्टीपल स्टौप्स एड कर सकते हैं.

मनपसंद जगह कर सकते हैं सेट

आप अपनी मनपसंद जगह को गूगल मैप्स पर सेट कर सकते हैं जहां आप अक्सर जाते हैं. आप इन सभी लोकेशन्स को अपने ‘लेबल योर फेवरेट प्लेस’ औप्शन के तहत हमेशा के लिए मार्क कर सकते हैं.

सिर्फ अपनी बेटी का खर्च उठाएंगे शमी, कोर्ट से मिली राहत

भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी को अदालत की तरफ से बड़ी राहत मिली है. जज नेहा शर्मा ने शुक्रवार को अलीपुर कोर्ट में हसीन जहां के सभी दावों को खारिज कर फैसला शमी के पक्ष में सुनाया. बता दें कि हसीन जहां ने मोहम्मद शमी से गुजारा भत्ता के तौर पर प्रतिमाह 7 लाख रुपए की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने नकार दिया है. अब शमी को सिर्फ अपनी बेटी के लिए हर महीने 80,000 रुपए गुजारा भत्ता देना होगा.  इस मामले पर शमी के वकील का कहना है कि शमी अपनी बेटी का खर्च उठाने के लिए शुरू से ही तैयार थे. वहीं इस फैसले से नाखुश हसीन जहां के वकील ने कहा कि उनकी क्लाइंट अब हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहीं हैं.

बता दें कि हसीन जहां ने शमी पर कई गंभीर आरोप लगाए थे, हसीन ने अपने फेसबुक अकाउंट, व्हाट्सएप और फेसबुक मेसेंजर पर विभिन्न महिलाओं के साथ की गई शमी की बातचीत का स्क्रीनशाट पोस्ट किया था. उन्होंने उन महिलाओं की तस्वीरें और फोन नंबर भी अपलोड किए थे. हसीन जहां ने आरोप लगाया था कि शमी के परिवार के सदस्यों ने उनकी हत्या करने की कोशिश भी की.

हसीन जहां ने कहा था कि शमी के परिवार में हर व्यक्ति उन्हें प्रताड़ित करता था. उनकी मां और भाई भी उनके साथ दुर्व्यवहार करते थे. यह मारपीट सुबह के 2-3 बजे तक चलती थी. वे उनकी हत्या भी करना चाहते थे.

वहीं इन आरोपों पर मोहम्मद शमी ने कहा था कि कोई तीसरा शख्स उनके घर को बर्बाद करने पर तुला है और वही हसीन के कान भर रहा है. शमी ने साथ ही कहा कि इस मामले में उन्हें कुछ साबित नहीं करना है. जो साबित करना है, उनकी पत्नी हसीन जहां को करना है क्योंकि आरोप उन्होंने लगाए हैं. हसीन के आरोप बेबुनियाद हैं. बता दें कि इस समय मोहम्मद शमी भारतीय टीम के साथ इंग्लैंड के दौरे पर हैं जहां वे टीम के साथ 5 टेस्ट मैचों की सीरीज का हिस्सा हैं. वहीं शमी से अलग होने के बाद हसीन ने एक बार फिर से मौडलिंग की दुनिया में कदम रख दिया है.

विराट कोहली ने आलोचकों को दिया करारा जवाब

भारतीय कप्तान विराट कोहली ने शुक्रवार को कहा कि टीम में बार-बार बदलाव से उनके खिलाड़ी असुरक्षित महसूस नहीं करते और ऐसा सोचना भी अजीब है. कोहली ने बतौर कप्तान 37 टेस्ट में 37 बदलाव किए और कल से इंग्लैंड के खिलाफ शुरू हो रहे तीसरे टेस्ट में भी यह चलन जारी रहने की उम्मीद है. कोहली ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि कोई ऐसा सोचता है. यह सब बातें बाहर ही की जाती है और लोगों को मनगढंत कहानियां बनाने का शौक है . हमारे लिये मैच जीतना प्राथमिकता है . हम यह नहीं सोचते कि किसी का कैरियर दाव पर है या उसके भविष्य का क्या होगा.”

उन्होंने कहा, “हमारा फोकस इस टेस्ट पर है. हम किसी के कैरियर के बारे में नहीं सोच रहे. यह सोचना भी अजीब है.” उन्होंने कहा, “यह आपकी सोच है. मैं ऐसा नहीं सोचता लिहाजा अपने खिलाड़ियों से यह नहीं कहूंगा कि उनके कैरियर दाव पर है . यह सोच ही अजीब है.”

भारतीय कप्तान ने कहा, “जब आप अच्छा नहीं खेल पा रहे हैं तो कुछ और सोच ही नहीं सकते. आपके जेहन में सिर्फ टीम को जीत दिलाने का ख्याल होता है. इसके अलावा और कुछ नहीं.” उन्होंने यह भी कहा कि वह कमर की तकलीफ से उबर चुके हैं और पूरी तरह फिट हैं. उन्होंने कहा, “मैं ठीक हूं. मुझे 2011 में पहली बार दर्द हुआ था. कई बार कार्यभार से ऐसा होता है. आप मांसपेशियों को मजबूत बनाने पर मेहनत कर सकते हैं, आराम कर सकते हैं और रिहैबिलिटेशन ताकि फिर से फिट हो सकें.”

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कोहली ने कहा, “हमने सिर्फ इस बात पर ध्यान दिया है कि इस मैच में टीम को किस चीज पर अपना ध्यान लगाना चाहिए. जब आप विषम परिस्थति में होते हैं तो आप किसी और चीज के बारे में नहीं सोच सकते. अगर आप दूसरी तरह से देखें तो आपके लिए यह अच्छी बात है कि आपके पास सोचने के लिए कुछ और है ही नहीं.”

कोहली ने कहा, “हमने जो बात की है, उसमें टीम से यही कहा है कि हमारे पास इस मैच को जीतने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है. आप इस मैच के लिए किस तरह से सोचते हैं, इस पर काफी कुछ इस पर निर्भर करता है. इसके अलावा हर खिलाड़ी पर निर्भर करता है कि वह किस तरह से चीजों को सोचता है और अपनी जिम्मेदारी को कैसे संभालता है.”

पहले दो टेस्ट मैचों में चोट के कारण बाहर रहने वाले तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह पूरी तरह से फिट हो गए हैं और चयन के लिए उपलब्ध हैं. कोहली का कहना है कि वह बुमराह के आने से काफी उत्साहित हैं. कोहली ने हालांकि यह नहीं बताया कि बुमराह अंतिम-11 में होंगे या नहीं.

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