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कर्ज के ‘जाम’ में ‘न्यू सिल्क रोड’, टूट रहा है भरोसा

चीन की महत्वाकांक्षी ‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना के रास्ते में बाधाएं आती नजर आ रही हैं. इस परियोजना में शामिल कुछ देशों ने इसका हिस्सा बनने पर चीनी कर्ज के नीचे दब जाने के खतरे को लेकर अपनी आशंकाएं जाहिर करनी शुरू कर दी हैं. 2013 में जब चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने ‘न्यू सिल्क रोड’ के नाम से भी मशहूर इस प्रोजेक्ट की घोषणा की थी. इसके तहत दुनियाभर में रेलवे, रोड और बंदरगाहों का नेटवर्क तैयार हो रहा है. चीन इसके लिए कई देशों को अरबों डॉलर का कर्ज दे रहा है.

इस परियोजना की घोषणा के पांच साल बाद अब चीन पर आरोप लग रहे हैं कि वह सहयोगी देशों को एक तरह से ‘कर्ज जाल’ में लपेट रहा है. कहा जा रहा है कि ऐसे मुल्क जो कर्ज चुकाने में कामयाब नहीं होंगे, चीन के कर्ज जाल का शिकार हो जाएंगे. ऐसे में शी चिनफिंग को अपनी इस अहम परियोजना का यह कहते हुए बचाव करना पड़ रहा है कि यह कोई ‘चीन क्लब’ नहीं है.

चिनफिंग का कहना है कि इस परियोजना में शामिल देशों के साथ चीन का व्यापार पांच खरब डॉलर बढ़ा है. हालांकि, अब कुछ देश इस बात को लेकर सवाल उठा रहे हैं कि चीन के कर्ज के रूप में इतना पैसा खर्च करना क्या फायदे का सौदा है?

अगस्त में अपनी चीन यात्रा के दौरान मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने घोषणा की थी कि उनका देश चीन की मदद से चलने वाली तीन परियोजनाओं को बंद कर रहा है. पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक तरफ जहां इसमें और पारदर्शिता की मांग की है तो दूसरी तरफ चीनी कर्ज को लेकर चिंता जाहिर की है. अरबों डॉलर के चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को लेकर इमरान की चिंता है कि उनका मुल्क चीन के कर्ज को चुका पाने में सक्षम होगा या नहीं.

मालदीव के निर्वासित नेता मोहम्मद नशीद ने कहा है कि चीन की नीयत जमीन कब्जाने की है. उनके मुताबिक, मालदीव का 80 फीसद कर्ज चीन का ही है. पिछले साल कर्ज अदा नहीं कर पाने की वजह से मालदीव को एक रणनीतिक बंदरगाह 99 साल की लीज पर चीन को देना पड़ा.

चीन ने आलोचनाओं को खारिज किया

हालांकि चीन ने आलोचनाओं को खारिज किया है. अपनी डेली प्रेस ब्रीफिंग में चीन के विदेश मंत्रलय की प्रवक्ता हुआ ने इस आशंका को खारिज किया कि चीन अपने सहयोगियों को कर्ज के जाल में फंसा रहा है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और श्रीलंका को दिया गया कर्ज उन देशों के कुल विदेशी कर्ज का एक छोटा सा हिस्सा है. पश्चिमी देशों से आने वाले पैसे को अच्छा बताना और चीन के पैसे को जाल बताना तार्किक नहीं है.

ग्रामीण बाजार में बढ़ने लगी मोटरसाइकिल की मांग

बेहतर मानसून और खेती के सहायक उद्यमों से बढ़ी किसानों की आमदनी से ग्रामीण बाजार की रौनक लौटने लगी है. चालू वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों में दोपहिया वाहनों की बिक्री के आंकड़े तो कम से कम यही संकेत दे रहे हैं. इस बदले रुख के चलते ग्रामीण बाजार में मोटरसाइकिल की मांग फिर लौट आई है. कंपनियां आने वाले त्योहारी सीजन में इस बाजार में धमाकेदार बिक्री के साथ दोहरे अंक में वृद्धि की उम्मीद कर रही हैं.

लगातार मानसून की बेरुखी के बाद तीन-चार वर्ष से ग्रामीण बाजार की सेहत बहुत अच्छी नहीं रही है. इस वजह से वहां दोपहिया वाहनों की मांग में भी कमी आई. खासतौर पर कृषि पर आधारित उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत के राज्यों में मोटरसाइकिल की मांग काफी नीचे चली गई थी. जबकि शहरी क्षेत्र में दोपहिया वाहनों में स्कूटर की मांग मोटरसाइकिलों से लगातार आगे बनी रही है. इसी तरह दक्षिण और पश्चिमी भारत के दोपहिया बाजार में भी ग्राहकों की प्राथमिकता स्कूटर ही है.

ऑटो उद्योग के जानकारों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों यानी अप्रैल से जुलाई 2018 में दोपहिया वाहनों के बाजार में फीसद की वृद्धि दर्ज की गई है. इसमें मोटरसाइकिल की वृद्धि दर 16 फीसद रही है तो स्कूटर की 10 फीसद. यानी चालू वित्त वर्ष की शुरुआत से ही देश को दोपहिया वाहनों में मोटरसाइकिल की वृद्धि दर ने रफ्तार पकड़ ली है.

होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर्स इंडिया (एचएमएसआइ) के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सेल्स एंड मार्केटिंग वाइएस गुलेरिया मानते हैं कि ग्रामीण बाजार से अब मांग आने लगी है. इसका अर्थ साफ है कि इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है. मोटरसाइकिल में भी शुरुआती स्तर की 100 से 110 सीसी वाली 40000 रुपये के आसपास की कीमत वाली मोटरसाइकिल की मांग ज्यादा है. यही बाजार मोटरसाइकिल वर्ग में ग्रोथ दिखा रहा है.

दरअसल उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत के ग्रामीण बाजार दोपहिया वाहनों में परंपरागत रूप से मोटरसाइकिल का ही बाजार रहे हैं. इसलिए तीन-चार वर्ष पूर्व जब से ग्रामीण अर्थव्यवस्था दबाव में आना शुरू हुई, मोटरसाइकिलों की मांग घटने लगी थी. लेकिन अब स्थितियां बदल रही हैं.

बाजार की इन बदलती स्थितियों को देखते हुए कंपनियों को इस त्योहारी सीजन में भी ग्रामीण बाजार से आस अधिक है. टीवीएस मोटर के वाइस प्रेसिडेंट मार्केटिंग अनिरुद्ध हलदर ने कहा कि ग्रामीण और छोटे शहरों के बाजार की हिस्सेदारी दोपहिया वाहन उद्योग में लगातार बढ़ रही है. अधिकांश दोपहिया कंपनियों ने इसी बाजार को ध्यान में रखकर त्योहारी सीजन की रणनीति बनाई है. गुलेरिया कहते हैं कि इस सीजन से उद्योग को बिक्री में दोहरे अंक की वृद्धि की उम्मीद है. हालांकि ईद और ओणम से शुरू होने वाला त्योहारी सीजन केरल की बाढ़ के चलते दोपहिया वाहन कंपनियों के लिए बहुत अच्छा नहीं रहा. लेकिन कंपनियों को उम्मीद है कि जन्माष्टमी से लेकर नवंबर-दिसंबर तक चलने वाले सीजन में उत्तर भारत से मांग बढ़ेगी जो आगे चलते हुए पश्चिमी राज्यों तक जाएगी.

सैल्फी मतलब मौत को न्योता

सैल्फी के प्रति लोगों में दीवानगी तो काफी समय से देखी जा रही है लेकिन यह दीवानगी बीमारी बन जाएगी किसी को इस बात का पता नहीं था. अभी हाल ही में इंगलैंड में लंकाशायर में एक चौंकाने वाला मामला तब सामने आया जब वहां रहने वाली वेकी वार्टन ने दुनिया से फेसबुक के जरिए गुजारिश की कि वे मेरी बेटी जिसे सैल्फी लेने की बुरी लत लग गई है को इस खतरनाक बीमारी से बचा लें. असल में उन की बेटी कैटलिन अपने आप को खूबसूरत दिखाने के लिए एक दिन में 100 बार सैल्फी क्लिक करती है और जब उसे लगता है कि इस सैल्फी में वह बेहद खूबसूरत लग रही है तो उसे फेसबुक पर अपलोड कर देती है.

इस के लिए वह सिर्फ पोज ही नहीं देती बल्कि हर सैल्फी के लिए अलगअलग तरीके का मेकअप करती रहती है ताकि कोई भी उस की सैल्फी देख कर कमी न निकाल पाए और सब के मुंह से वाह क्या खूबसूरत लड़की है सिर्फ यही निकले.

सुंदर दिखने की चाहत में वह खाना तक स्किप कर देती है क्योंकि उसे लगता है कि वह सुंदर सिर्फ पतली रह कर और मेकअप कर के ही दिख सकती है. बारबार कमर मापना कि कहीं वजन तो नहीं बढ़ गया उस की दिनचर्या में शामिल हो गया है. इस से उस की पढ़ाई चौपट होने के साथसाथ इस का असर उस के दिमाग व शरीर पर भी दिखने लगा है. जब उस की मां अपनी बेटी को इस हाल में देखती है तो परेशान हो कर उसे समझाने की कोशिश करती है कि तुम बिना मेकअप ही ख्ूबसूरत लगती हो और तुम्हें किसी के सामने अपनी खूबसूरती का प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं है तो वह इस बात को भी हवा में उड़ा कर अपना वही पुराना रुटीन जारी रखती है. अगर कोई उसे यह बोल दे कि आज तो तुम थोड़ी मोटी लग रही हो तो फिर तो वह इतनी परेशान हो जाती है कि घर में किसी से भी उस का दुख देखा नहीं जाता.

वह खुद की खूबसूरती बढ़ाने के लिए मौडलों, टीवी शोज को देखती रहती है ताकि वहां से ब्यूटी के नए टिप्स मिल कर वह अपनी खूबसूरती को और बढ़ा सके. उस के फ्रैंड्स भी उसे इस आदत के लिए टोकते हैं लेकिन वह किसी की सुनने को तैयार नहीं. उसे देख कर सिर्फ ऐसा लगता है कि उसे सिर्फ सैल्फी से प्यार हो गया है. किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि 11 साल की उम्र में सैल्फी लेने का शौक उसे बीमारी की ओर धकेल देगा.

बात अगर सैल्फी की दीवानगी तक होती तो भी ठीक था पर इस के क्रेज में युवा अपनी जान गंवा रहे हैं यानी यह जान की दुश्मन बनती जा रही है.

ऐसे देती है मौत को न्योता

सैल्फी जहां हमें बीमारी की ओर धकेल कर हमारी पर्सनैलिटी को प्रभावित कर रही है वहीं ये हमें मौत के करीब भी ले जा रही है. क्योंकि हम सैल्फी के दीवानेपन में कहीं भी सैल्फी लेने से गुरेज नहीं करते, चाहे इस के लिए हमें ट्रेन की छत या फिर नदी के सब से खतरनाक किनारे पर जा कर ही क्यों न खड़ा होना पड़े यानी हर हाल में बैस्ट सैल्फी होनी चाहिए चाहे उस के लिए जान ही क्यों न चली जाए.

इसी सैल्फी प्रेम के चलते अभी हाल ही में मिर्जापुर और सहारनपुर में 3 युवकों ने रेलवे टे्रक पर अपनी जान गंवा दी. हैरानी की बात यह है कि उन्हें ट्रेन के अपने करीब आने का जरा भी एहसास नहीं हुआ. अगर वे सैल्फी के चक्कर में होश न खोते तो उन्हें यों जिंदगी को अलविदा न कहना पड़ता.

ये कोई पहला या दूसरा मामला नहीं है बल्कि इस से पहले भी कई लोग इस का शिकार हो चुके हैं जिस का विवरण इस प्रकार हैः

  1. अप्रैल, 2014 में सेंट पीर्ट्सबर्ग में 17 साल का रशियन फोटोग्राफर सैल्फी लेने के चक्कर में ट्रेन की छत पर जा चढ़ा और इस दौरान उस का संतुलन बिगड़ने से वह गिर पड़ा, जिस से उस की मौत हो गई.
  2. मई, 2014 में एक युवक सैल्फी के चक्कर में इतना पागल हो गया कि वह चलती बाइक पर पोज बनाबना कर सैल्फी लेने लगा. इस दौरान वह यह भी भूल गया कि इस से उस का संतुलन बिगड़ सकता है. हुआ वही जिस का डर था. सैल्फी के चक्कर में वह बाइक से गिर गया और उस की दर्दनाक मौत हो गई.
  3. मई, 2014 में केरल में एक युवक ट्रेक पर स्टाइल मारता हुआ सैल्फी क्लिक कर रहा था कि इतने में ट्रेन आ गई और वह उस की चपेट में आ गया.
  4. अक्तूबर, 2014 में फिलीपींस में एक युवती अपने फ्रैंड्स के साथ बीच पर सैल्फी ले रही थी कि अचानक आई तेज लहरें उसे अपने साथ बहा कर ले गईं.
  5. मार्च, 2015 में रशियन यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएट युवक ब्रिज पर खड़ा हो कर सैल्फी क्लिक कर रहा था कि संतुलन बिगड़ने से वह ब्रिज से नीचे गिर गया और उस की मौत हो गई.
  6. अगस्त, 2015 में विलासिका दी ल सागरा में एनुअल बुल रनिंग फैस्टिवल में एक युवक जानवरों के साथ सैल्फी लेने के प्रयास में मौत का शिकार हो गया.
  7. जनवरी, 2016 में फिलीपींस में एक 19 साल का स्टूडैंट सैल्फी के चक्कर में 20 मंजिला अपार्टमैंट से गिर गया, जिस से उस की मृत्यु हो गई.
  8. ये सभी हादसे उन के साथ हुए जो खुद से ज्यादा सैल्फी से प्यार करते थे.

ऐक्सैसरीज फोर सैल्फी

अभी तक तो फ्रंट कैमरे वाले मोबाइल ने ही युवाओं को पागल किया हुआ था लेकिन अब सैल्फी के प्रति उन की बढ़ती रुचि को देखते हुए मार्केट में अब सैल्फी ऐक्सैसरीज जैसे सैल्फी स्टिक, सैल्फी स्टैंड भी आ गए हैं, जिस से इस ओर झुकाव और ज्यादा बढ़ गया है.

इस से उन्हें लगने लगा है कि वे खुद की और बेहतर सैल्फी खींच कर अपने ग्रुप में छा सकते हैं. भले ही इस से आप सैंटर अटै्रक्शन बन जाएं लेकिन ये आप को सैल्फी मेनिया की ओर धकेल रहा है जिस से आप अनजान हैं. इसलिए समय रहते संभल जाएं.

कई डीमैरिट भी

  1. खुद को ले कर हर समय कौशंस रहते हैं.
  2. सैल्फी के चक्कर में बाकी चीजों से ध्यान भटकता है.
  3. अगर सैल्फी अच्छी नहीं आती हो तो तनाव में रहने लगते हैं.
  4. सैल्फी हमें अनसोशल बनाती है.
  5. ऐंजौयमैंट को खत्म करती है.
  6. किसी भी तरह का खतरा मोल लेते हैं.

एक सच यह भी

भले ही सैल्फी के कई नुकसान हैं लेकिन हम इस बात को भी इग्नोर नहीं कर सकते कि हम सैल्फी के माध्यम से खुद को देख कर अपना आत्मविश्वास बढ़ा सकते हैं. क्योंकि अगर हमें लगता है कि हम अच्छे लग रहे हैं तो हमारा कौंफिडैंस तो बढ़ता ही है साथ ही हम जहां जा रहे होते हैं वहां भी खुद को बेहतर ढंग से प्रैजेंट कर पाते हैं. हमें यह बात माननी होगी कि हर चीज के फायदे और नुकसान दोनों होते हैं लेकिन जब हम किसी भी चीज की अति करते हैं तो हमें सिर्फ नुकसान ही उठाने पड़ते हैं. ठीक यही बात टैक्नोलौजी के संदर्भ में लागू होती है. अगर हम इस का प्रयोग ज्ञान बढ़ाने के लिए करेंगे तो यह हमारे लिए वरदान साबित होगी वरना ये हमें विनाश की ओर ले जाएगी. इसलिए संभल कर लें सैल्फी.

‘बिकनी’ से होगी समुद्र की सफाई

‘बिकनी’ को ले कर अक्सर खबरें आती रहती हैं, कभी बौलीवुड एक्ट्रैस इसे पहनने से मना कर देती हैं, तो कभी मौडल्स इसे पहन कर रैंप पर अपना जादू बिखेरती हैं. वर्षों से महिलाएं इसे अपने शरीर को आकर्षक दिखाने के लिए पहनती आ रही हैं.

कपड़ों की तरह ये भी कई अलगअलग डिजाइंस व वैराइटी में उपलब्ध हैं. इसे ले कर कई तरह के रिसर्च भी किए जा चुके हैं. हम आप को एक ऐसी ही खास तरह की बिकनी के बारे में बता रहे हैं जो आप के फिगर को सैक्सी लुक देने के साथसाथ समुद्र की सफाई का भी काम करेगी. यानी जब आप इसे पहन कर समुद्र में जाएंगी तो समुद्र में फैली गंदगी दूर हो जाएगी.

आप सोच रही होंगी भला ये कैसी बिकनी है जिसे पहनने से समुद्र की सफाई होगी? दरअसल यूनिवर्सिटी औफ कैलिफोर्निया के प्रोफेसरों ने मिल कर सूक्ष्मरंध्र मटैरियल से बनी एक ऐसी बिकनी तैयार की है जो पर्यावरण के अनुकूल है और जब आप इसे पहन कर समुद्र में उतरतीं हैं तो यह सफाई का काम भी करेगी. इसे एक खास तरह के मैटेरियल से बनाया गया है जिसे स्पौंज कहा जाता है, इसलिए इसे स्पौंज बिकनी का नाम दिया गया है.

इस का बाहरी हिस्सा नैट की तरह होता है जो 3डी प्रिंटेड प्लास्टिक से बना होता है और अंदर का हिस्सा स्पौंज का होता है, जिस की वजह से शरीर में आसानी से फिट हो जाती है. यह स्पौंज समुद्र में जमे तेल और कैमिकल से निकलने वाले हानिकारक तत्त्वों को अपने अंदर सोख लेता है और पानी के प्रदूषण को साफ करता है. यह बिकनी अपने वजन से 25 गुना ज्यादा गंदगी सोख सकती है.

आप के मन में यह बात अवश्य आ रही होगी कि गंदगी सोखने की वजह से स्किन इंफैक्शन का खतरा ज्यादा होगा, लेकिन ऐसा नहीं है, इस से किसी तरह का इंफैक्शन नहीं होता. यह किफायती होने के साथसाथ इसे रिसाइकिल भी किया जा सकता है.

चाइल्ड अब्यूज और पैरेंटिग पर सवाल उठाती है ‘गली गुलियां’

इन दिनों इस बात पर काफी बहस हो रही है कि अच्छी परवरिश करने, बच्चे को अच्छा इंसान बनाने व पढ़ाई के लिए बच्चे को कितना पीटना चाहिए. हम आए दिन खबरें सुनते हैं कि माता पिता द्वारा हर दिन की जाने वाली पिटाई से तंग आकर बच्चा घर से भाग गया. यानी कि हमारे देश में लड़कियों से बलात्कार के अलावा बच्चे के साथ हिंसा की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ी हैं, जिनका बच्चे के कोमल मनमस्तिष्क पर काफी गहरा असर पड़ता है.

उसी पर मूलतः भारतीय मगर अमरीका के लॉस एंजेल्स शहर में बसे फिल्मकार, एक मनोवैज्ञनिक रोमांचक फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ लेकर आए हैं. पुरानी दिल्ली की पृष्ठभूमि पर बनी और पुरानी दिल्ली में ही फिल्मायी गयी फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ में मनोज बाजपेयी, नीरज कबि, शहाना गोस्वामी, ओम सिंह ने अभिनय किया है. इस फिल्म को बुसान, लंदन, मेलबॉर्न सहित 27 से अधिक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कृत किया जा चुका है.

फिल्म निर्देशक बनने का ख्याल कैसे आया?

मैं मूलतः भारतीय हूं, मगर अमरीका के लौस एजेंल्स शहर में रहता हूं. बचपन से फिल्मों का शौक रहा है और बचपन से फिल्म बनाने का सपना देखता आया हूं. मगर हमारा परिवार व्यवसाय को महत्व देता है. इसलिए पहले मैने चार्टड एकाउंटेंंसी की पढ़ाई पूरी की फिर अमरीका में नौकरी की. काम करते हुए मेरी समझ में आया कि यह मेरे लिए नहीं है. तो मैंने नौकरी छोड़ दी. चेक रिपब्लिक के प्राग शहर जाकर  फिल्म विधा की पढ़ाई की. फिर लौस एंजेल्स में मैने ‘यूएसए फिल्म स्कूल’ से सिनेमा में मास्टर की डिग्री हासिल की. उसके बाद कई लघु फिल्में व डाक्यूमेंटरी बनायी.

मुझे लौस एंजेल्स में ही फिल्म प्रतिनिधि व एजेंट मिल गए .तो मैं वहीं रह गया और अब सायकोलॉजिकल रोमांचक ड्रामा वाली फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ का निर्माण, लेखन व निर्देशन किया है. जिसे 27 से अधिक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराहा जा चुका है. फिल्म के साथ ही फिल्म के कलाकार मनोज बाजपेयी को कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं.

फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ का प्रेरणा स्रोत क्या रहा?

‘गली गुलियॉं’ पुरानी दिल्ली के एक इलाके का ही नाम है. दिल्ली का यह इलाका मेरे दिलो दिमाग में बसा हुआ है. यहां पर मेरे नाना व नानी रहा करते थे, जिनसे मिलने मैं अक्सर आया करता था. जब मैं यहां आता था और लोगों से बात करता था,तो मुझे अहसास होता था कि यहां रह रहे लोग चाह कर भी यहां से बाहर नहीं जा पा रहे हैं. मेरी नानी भी चाहते हुए भी किसी न किसी वजह के चलते पुरानी दिल्ली से बाहर रहने नहीं जा पायीं. बचपन में मैं इन गलियों में खो जाता था और आज भी यही हाल है. मैने बचपन में बूचड़खाना वगैरह जो कुछ देखा था, वह सब मेरे दिमाग में अंकित था. यानी कि मुझे मेरी फिल्म की कहानी का सूत्र पुरानी दिल्ली से मिला.

स्नातक तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने जब फिल्म बनाने का निर्णय लिया, तो मेरी सोच थी कि भले ही फिल्म रिस्की हो, मगर वह ऐसी कहानी पर होनी चाहिए, जिसकी कई परतें हों. सीधी सादी महज मनोरंजन परोसने वाली कहानी पर मैं फिल्म नहीं बनाना चाहता था.

तो आप फीचर फिल्म बनाने वाले थे?

ऐसा नही है. सच यह है कि मैं चाइल्ड अब्यूज व बालशोषण पर डाक्यूमेंट्री बनाने के लिए शोध कार्य करने पुरानी दिल्ली पहुंचा था. मैने पाया कि अस्सी प्रतिशत बच्चे बाल शोषण के शिकार होते हैं. बचपन में हिंसा के शिकार यह बच्चे धीरे धीरे ‘सीजोफ्रेनिया’ नामक बीमारी के शिकार हो जाते हैं. इतना ही नहीं इस तरह के बच्चे बाद में आजीवन हिंसा से जुड़े रहते हैं. शोध के आधार पर जब कहानी लिखने बैठा, तो मुझे अहसास हुआ कि इस पर एक विचारोत्तेजक फीचर फिल्म बनायी जानी चाहिए. मैं ऐसे इंसान पर फिल्म बनाना चाहता, जो मनोवैज्ञानिक रूप से तितर बितर हो चुका हो. तो मैने उस पर ‘गली गुलियां’ बनायी. फिल्म में एक किरदार मेरी नानी के उपर है, तो फिल्म में कई कहानियां हैं, जिन्हे मैने बचपन में सुना था.

शोध के दौरान आपको चाइल्ड एब्यूज व बच्चों के साथ होने वाली हिंसा की क्या वजहें समझ में आयी?

देखिए, वजहें कोई ऐसी नही है, जो हल ना की जा सकें. मेरी समझ में आया कि यदि लोग थोड़ा सा जागरूक हो जाएं, तो चीजें खत्म हो सकती हैं. चाइल्ड पैरेंटिंग को लेकर बहुत सी कहानियां हमने सुनी हैं. हमें यह नही भूलना चाहिए कि बच्चा बहुत सेंसेटिव होता है. आप बच्चे को प्यार दिए बिना उसकी जिंदगी संवार नहीं सकते. बच्चे को मारपीट कर नहीं, बल्कि प्यार से ही उसकी सही परवरिश की जा सकती है. उनका भविष्य संवारा जा सकता है. लेकिन भारत में मां बाप अपने छोटे छोटे बच्चे को पीटते रहते हैं. हमारे माता पिता एक ही बात कहते हैं कि हमने यदि बच्चे की पिटाई न की होती, तो यह इतना सफल इंसान न होता. बचपन में मारपीट सहन करने वाले 80 प्रतिशत बच्चे बड़े होकर दिमागी रूप से बीमार रहते हैं. उनके दिमाग में बचपन में हुई पिटाई हमेशा याद रहती है. मैंने अपनी फिल्म में इसी मुद्दे को भारतीय सभ्यता संस्कृति के साथ उकेरा है. हमने इसमें तमाम सत्य घटनाओं को लिया है, पर हमारी फिल्म पूरी तरह से काल्पनिक कथा है.

चाइल्ड एब्यूज, बच्चों के साथ हिंसा और चाइल्ड पैरेंटिंग यह तीन अलग अलग चीजें हैं?

गलत…यही सोच बदलनी है. यह तीनों चीजें अलग नहीं हैं. मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने सामाजिक संदेश देने के लिए यह फिल्म नहीं बनायी. मेरी फिल्म कोई संदेश वाहक नहीं है. पर फिल्म देखते हुए लोग मनोरंजन के साथ साथ यह समझ सकेंगे कि उन्हें अपने बच्चों की परवरिश किस तरह से करनी चाहिए. फिल्म देखकर लोग खुद ब खुद इस बात का अहसास करेंगे कि हिंसा उनके पैरेंटिंग का हिस्सा होनी चाहिए या नहीं. हिंसा के प्रभाव का भी इस फिल्म में विस्तार से चित्रण है. पर मैंने संदेश देने वाला कोई संवाद नहीं रखा है. बच्चों के साथ जो हिंसा होती है, उसने मेरी फिल्म के मुख्य पात्र पर कहीं न कहीं असर किया है.

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मनोज बाजपेयी के किरदार को कैसे परिभाषित करेंगे?

देखिए, हमारी फिल्म में दो कहानियां समानांतर चलती हैं. पुरानी दिल्ली के एक मकान में खुदोस (मनोज बाजपेयी) रहता है, जिसे मनोज बाजपेयी ने निभाया है. वह अकेलेपन की जिदंगी जी रहा है. उस क्षेत्र का कोई भी इंसान उससे बात नही करता है. पर खुदोस ने इन सभी लोगों की कहानी जानने के लिए अपने आस पास के तमाम घरों में कैमरे लगा रखे हैं. इसलिए उसे हर दिन पता होता है कि किसके घर में क्या चल रहा है? तो वहीं दूसरी कहानी एक मुस्लिम बच्चे इदरीस (ओम सिंह) की है, उसके पिता लियाकत (नीरज कबि) बूचड़ हैं. उन्हें बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है. वह अक्सर अपने बेटे को पीटते रहते हैं. एक दिन जब बच्चा पिट रहा होता है, तो उसके रोने की आवाज सुनकर खुदोस उसकी तलाश शुरू करता है कि आवाज किस मकान से आ रही है? मगर उसने जितने कैमरे लगा रखे हैं, उनमें यह घर नहीं दिखता, तब उसे अहसास होता है कि उससे यह घर रह गया है. फिर वह बच्चे की तलाश के साथ अन्य घरों में भी कैमरे लगाना शुरू करता है. वह इस बच्चे की मदद करना चाहता है. उसे इस नारकीय जिंदगी से बाहर निकालना चाहता है.

पर फिल्म में पिता द्वारा अपने बेटे को पीटे जाने की वजहें भी दिखायी होंगी?

जी हॉं! वजहें भी बतायी हैं. लियाकत का किरदार कोई विलेन नहीं है. इस किरदार को निभाने के लिए नीरज कबि इसीलिए तैयार हुए कि यह किरदार सिर्फ ब्लैक या व्हाइट नहीं है. पर काफी रीयल पिता है. वह अपने बेटे से बहुत प्यार करता है, पर गुस्से में उसकी पिटाई भी कर देता है. पर बाद में वह बेटे से माफी भी मांगता है.

फिल्म फेस्टिवल में लोगों की क्या राय रही?

बहुत पसंद की गयी. हिंदुस्तान हो या शिकागो हो या कोरिया, हर देश के दर्शकों ने इस फिल्म के साथ रिलेट किया. पैरेंटिंग की थीम तो युनिवर्सल है. इसलिए हर बच्चे और हर पिता ने इससे खुद को जुड़ा हुआ पाया. लोग इमोशनली जुड़ रहे थे. इसलिए भाषा मायने नहीं रखती. हमने तो आम जनता को भी यह फिल्म दिखायी. यह कोई बुद्धिमत्ता वाली फिल्म नहीं है. फिल्म देखकर निकलते हुए हर दर्शक रो रहा था.

आपने इस फिल्म को कहां कहां फिल्माया है?

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के अलावा पुरानी दिल्ली की गलियों व वहां के एक दो मकानों में फिल्म को फिल्माया है. पूरे चालिस दिन हमने शूटिंग की.

अब इसके बाद?

कश्मीर की पृष्ठभूमि पर फिल्म ‘‘ए स्टोन इज थ्रो अवे’’ की योजना पर काम चल रहा है. फिल्म की पटकथा तैयार है. इसमें मुख्य भूमिका अमरीकन कलाकार निभाएंगे.

मेरे जीवन का सबसे बेहतरीन काम ‘गली गुलियां’ में है : मनोज बाजपेयी

दो राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता मनोज बाजपेयी हाल ही में व्यावसायिक फिल्म‘‘सत्यमेव जयते’’ में जौन अब्राहम के साथ नजर आए, तो तमाम आलोचकों ने सवाल उठाया कि मनोज बाजपेयी जैसे समर्थ व प्रतिभावान अभिनेता को ‘सत्यमेव जयते’ जैसी फिल्म करने की क्या जरुरत पड़ी? मगर मनोज बाजपेयी का मानना है कि यह फिल्म सफल है और फिल्म का मकसद पूरा हुआ. वैसे वह यह भी दावा करते हैं कि उन्होंने दोस्ती निभाने के लिए यह फिल्म की.

जी हां! मनोज बाजपेयी उन कलाकारों में से हैं, जो हर फिल्म में अपने अभिनय से दर्शकों को आश्चर्यचकित करते रहते हैं. वह  बड़े बजट की फिल्मों के बनिस्बत अपनी मन पसंद छोटे बजट व कंटेट प्रधान फिल्मों को प्राथमिकता देते आ रहे हैं.. फिर चाहे वह 1994 की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में डाकू मान सिंह का किरदार हो या 1998 की फिल्म ‘‘सत्या’’ का भीखू म्हात्रे का किरदार हो. या 2003 में आयी फिल्म ‘पिंजर’ का राशिद, जिसने उन्हे राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया. या फिर हंसल मेहता की 2016 में आयी फिल्म ‘‘अलीगढ़’’ में प्रोफेसर रामचंद्र सिरस का किरदार हो. या अब सात सितंबर को प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘‘गली गुलियां’ का खुदोस हो.

वैसे तो वह दो विचारोत्तजेक और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कार जीत रही फिल्मों ‘लव सोनिया’ व ‘गली गुलियां’ को लेकर चर्चा में हैं. जिसमें से ‘लव सोनिया’ में मनोज बाजपेयी का एक छोटा सा किरदार है, मगर ‘गली गुलियां’ के वह नायक हैं. हाल ही में ‘‘मेलबार्न इंडियन फिल्म फेस्टिवल’’ में फिल्म ‘गली गुलियां’ के लिए मनोज बाजपेयी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार से नवाजा गया.

फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ में मनोज बाजपेयी ने खुदोस का अति कठिन किरदार निभाया है, जो कि शारीरिक व मानसिक रूप से पुरानी दिल्ली की गलियों में फंसा हुआ है. मनोज बाजपेयी इस फिल्म को अपनी अब तक की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के साथ साथ अति बेहतरीन परफार्मेंस मानते हैं.

फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ और इसमें आपका अपना किरदार क्या है?

यह फिल्म खुदोस नामक एक ऐसे आदमी की कहानी है, जो कि पुरानी दिल्ली की गलियों में फंसा हुआ है. मानसिक और शारीरिक रूप से वह वहां से बाहर निकलना नहीं चाहता. वह अपने आंतरिक अंर्जद्वंदों से लड़ रहा है. वह पेशे से इलेक्ट्रीशियन है. दूसरों के घरों में क्या चल रहा है, इसे जानने के लिए उसने चोरी से लोगों के घरों में कैमरे लगा रखे हैं और अपने घर में बैठकर वह सब कुछ देखता रहता है. दूसरों की कहानी, उनकी जिंदगी पर नजर महज इस सुख को पाने के लिए रखता है कि उसकी जिंदगी उन सभी से बेहतर है. उसके दोस्त घर की चारी दीवारी और सीसीटीवी कैमरे हैं. उसे अब घर से बाहर निकलने में डर लगता है. उसे जब एक छोटे बच्चे की चीख सुनाई देती है, जो कि पड़ोस में है और अपने पिता से हर दिन मार खाता रहता है. वह इस बच्चे को बचाना चाहता है.

पूरी फिल्म में वह इस बच्चे की तलाश करता रहता है. अब सवाल है कि उसे बच्चा मिलता है या नहीं मिलता है? उन गलियों में यह रह पाता है या नहीं रह पाता है. लोग जिंदगी में जो कुछ देखते हैं, उससे हासिल क्या होता है? इन सभी की कहानी है फिल्म‘‘गली गुलियां’’. कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कृत होने के बाद अब यह फिल्म 7 सितंबर को भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो रही है. मेरे अनुसार मेरे जीवन का सबसे बेहतरीन काम फिल्म ‘गली गुलियां’ में है. मेरे मापदंडों के अनुसार यह मेरे जीवन की बेहतरीन परफार्मेंस है. बेहतरीन फिल्म है.

आपके लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?

खुदोस के चरित्र में कई परते हैं. इन परतों को समझने के अलावा खुदोस के दिमाग और उसकी जटिलता को समझना सबसे बड़ी चुनौती रही.

अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में ‘‘गली गुलियां’’ पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया रही?

मैं हाल की ही बात लेता हूं. जब मेलबार्न फिल्म फेस्टिवल में मुझे इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला. वहां की ज्यूरी के सभी विदेशी सदस्यों ने पुरस्कार देने के बाद मुझसे बात की. सभी ने एक ही बात कही कि, ‘एक लाइन में पांच बातें कहना अमूमन होता नहीं है, पर इस फिल्म में ऐसा है.’ देखिए, जब किसी फिल्म में लेखक या किरदार एक ही लाइन में पांच महत्वपूर्ण बातें कहता है, तो वह लोगों को बहुत भाता है. फिल्म में बच्चे इदरीस और खुदोस की आपस में मुलाकातें न होने के बावजूद जो रिश्ता है, वह लोगों के दिलों को छू गया.

लोग इस फिल्म के साथ इसलिए रिलेट कर रहे थे, क्योंकि बच्चे का दुःख, बच्चे का दर्द तो युनिवर्सल है. वह असल है. इस दुःख व दर्द को भारतीय हो अमरीकन हो या इराकी हो, सभी समझते हैं. बच्चे का दर्द, खुदोस की उस बच्चे की तलाश यह बात हर किसी को बहुत अच्छी लगी. दिल्ली के माहौल में अपने आप में घुटन महसूस करना भी कमाल की बात लगी. यह बात लोगों के दिलो को अंदर तक छू गयी.

जब आपके पास इस फिल्म का औफर आया, तो क्या इस किरदार के लिए आपको कोई तैयारी करनी पड़ी?

जी नहीं. मैं किसी से नहीं मिला. मैं नहीं चाहता था कि मैं किसी डाक्टर से मिलूं और उससे रोग के बारे में चर्चा करुं. मुझे रोग नहीं, इस इंसान के बारे में जानना था. हमारे यहां जब कोई इंसान किसी अन्य तरह से सोचता है, तो हम उसे रोगी मान लेते हैं. पर मैं खुदोस को मनोरोगी नहीं मानना चाहता था. मैं जानना चाहता था कि यह इंसान इस तरह का है, तो क्यों है? वह जो कुछ कह रहा है, उसकी वजहें क्या हैं? उसकी प्रताड़ना व दुःख क्या है? इसकी खोज क्या है? उसके रिश्ते क्या हैं?

कहा जा रहा है कि यह वास्तविक कहानी है? तो क्या ऐसे किसी इंसान से आपकी मुलाकात हुई?

किसी किरदार की तैयारी के लिए मैं किसी इंसान से मिलने में यकीन नहीं करता. देखिए, गांव से लेकर यहां तक मैने अपनी जिंदगी जी है. इस दौरान मेरा साबका कई तरह के लोगों से निरंतर पड़ता रहा है. मेरी यात्रा के दौरान खुदोस जैसे लोग भी मुझे मिले. मगर यह रिकार्ड है कि किसी किरदार को निभाने के मकसद से मेरी किसी से मुलाकात नहीं हुई. अगर आप यह कहते हैं कि किरदार को निभाने से पहले होमवर्क के लिए ऐसे इंसान से मैं नहीं मिला, इसलिए मैं बुरा कलाकार हूं, तो मैं इस बात को भी मानने के लिए तैयार हूं. मैं तमाम कलाकारों के इंटरव्यू देखता व पढ़ता रहता हूं, जो दावा करते हैं कि किस किस इंसान से मिले, पर मैं नहीं मिलता, यह सच है. ईश्वर की दया से आज तक नहीं मिला. मैंने जीवन इस तरीके से जिया है और हजारों लोगों से मिला हूं कि मुझे हर किरदार जाना पहचाना लगता है. हर इलाका, हर गली मुझे देखी व जानी पहचानी लगती है. इसके लिए मुझे कहीं जाने की जरुरत महसूस ही नहीं होती. सिर्फ मुझे अपनी याददाश्त को तेज करने व कल्पना शक्ति को बढ़ाने की जरुरत होती है, वही मैं करता हूं.

जो कलाकार दावा करते हैं कि उन्हे फलां किरदार के लिए फलां से मिलना पड़ा. तो क्या आप मानते हैं कि वह अपने आब्जर्वेशनमें कमजोर रहे हैं?

मेरा हमेशा से मानना है कि किसी किरादार को निभाने के लिए किसी से मिलना जरुरी नही है. कुछ लोग किरदार को निभाने से पहले कुछ लोगों से मिलने जाते हैं, शायद इससे उनकी जिंदगी आसान होती होगी. पर मेरे जैसे कलाकार नहीं जाते. देखिए, किरदार को लेकर तैयारी के संदर्भ में शेखर कपूर ने बहुत पहले कहा था कि, ‘मुझे नहीं जानना कि आप किरदार को निभाने के लिए क्या करते हैं. मुझे तो कैमरे के सामने परिणाम चाहिए, परफार्मेंस चाहिए.’’ हर निर्देशक को परफार्मेंस/परिणाम ही चाहिए, वह आप चाहे जैसे करके लाइए. हर कलाकार का काम करने का ढंग रहा है. मेरा अपना ढंग रहा है. मैं लोगों से अपनेपन के साथ मिलता हूं.

मुलाकात के दौरान यह जानने की कोशिश करता हूं कि वह कहां से आए हैं, उनके संघर्ष क्या रहे हैं, उनकी उपलब्धियां और उनके जीवन के उतार चढ़ाव क्या रहे. जिससे जब मुझे वैसा किरदार निभाने का मौका मिले, तो मैं अपनी याददाश्त को टटोलकर उस तरह के किरदार को कैमरे के सामने बड़ी सहजता के साथ पेश कर सकूं. मिलनसार स्वभाव के चलते मैं लोगों को अपना दोस्त बनाता रहता हूं. इससे मेरे कलाकार को फायदा मिलता है.

मगर समय के बदलाव के साथ अक्सर कलाकार बताते हैं कि उन्होंने अमरीका जाकर फलां फिल्म इंस्टीट्यूट से अभिनय का चार वर्ष का प्रशिक्षण लेकर आए हैं. क्या अभिनय का यह प्रशिक्षण लाभदायक होता है?

मैं नहीं मानता. आप अमरीका जाकर तकनीक सीखते हैं, तो यह बात मेरी समझ में आती है. मगर अभिनय का प्रशिक्षण अमरीका या किसी अन्य देश में जाकर लेने की बात मेरी समझ से परे है. जब आपको हिंदी व भारतीय फिल्मों में अभिनय करना है, तो फिर आपको अमरीका जाने की जरुरत क्या है? भारत में ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ , ‘पुणे फिल्म संस्थान’ के अलावा कुछ निजी प्रशिक्षण संस्थान हैं. अब तो भोपाल, लखनऊ में भी कुछ अच्छे प्रशिक्षण संस्थान हैं. इसके अलावा लगभग हर शहर में अभिनय के वर्कशाप होते रहते हैं. मेरा मानना है कि आप तीन नाटकों में अभिनय करोगे, तो ज्यादा बेहतर तरीके से अभिनय सीख जाओगे. अमरीका या दूसरे देश में अंग्रेजी में अभिनय सीखने की बनिस्बत अच्छा है कि आप हिंदुस्तान के भ्रमण पर निकल जाएं, विदेश जाकर अभिनय सीखने का कांसेप्ट गलत है. यह बात मेरी समझ में नहीं आती, हो सकता है कि जो वहां जा रहे हैं, उन्हे कोई फायदा हो रहा हो.

जब लोग आपसे आपकी असफल फिल्मों की चर्चा करते हैं, तो आपको गुस्सा आता है?

किसने कहा? पर सच यह है कि यहां लोग मेरी सफल फिल्मों की बजाय असफल फिल्मों की ही चर्चाएं करते हैं. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जो लोग मेरी फिल्म ‘‘अलीगढ़’’ को सिनेमाघरों में देखने में हिचकिचा रहे थे, वही अब इसे क्लासिक फिल्म की संज्ञा दे रहे हैं. देखिए, आम दर्शक मुझे अपने बीच का इंसान मानते हैं. वह मेरे किरदारों के साथ खुद को जोड़ पाते हैं. जब मैं अलग अलग तरह की फिल्में दर्शकों के सामने रखता हूं, तो उनकी तरफ से मुझे जो प्यार मिलता है, उसे मैं अहसास करता हूं. आम दर्शकों को मेरी फिल्में याद रहती हैं. वह मेरे किरदारों पर आपस में चर्चा करते हैं. यही मेरी सफलता है. इसीलिए मैं बड़े बजट की बजाय छोटे बजट की कंटेंट प्रधान फिल्में करने में यकीन रखता हूं.

मगर ‘‘सत्यमेव जयते’’ तो पूरी तरह से व्यावसायिक फिल्म है?

देखिए, फिल्म के निर्माता और निर्देशक लंबे समय से मेरे साथ काम करना चाहते थे. वह मेरे दोस्त भी हैं. तो दोस्ती के लिए यह फिल्म की. इससे पहले मैंने दोस्ती के लिए ही ‘‘बागी 2’’ भी की थी. दूसरी बात जौन अब्राहम बहुत अच्छे इंसान हैं. उनका साथ मुझे अच्छा लगा. इस फिल्म में इमोशंस के साथ टकराव भी था. हमारे देश के भ्रष्टाचार जैसे अहम मुद्दे पर यह फिल्म बहुत कुछ कहती है.

इसके बाद क्या करने वाले हैं?

‘‘सोन चिरैया’’ सहित कुछ फिल्में कर रहा हूं. उचित समय पर उनके बारे में बातें होंगी.

सैक्स ब्राइब : न झांसे में आएं और न खामोश रहें

गुरुग्राम, हरियाणा की एक गृहिणी विनीता (बदला हुआ नाम) बताती हैं, ‘‘मैं मकान की रजिस्ट्री के सिलसिले में रजिस्ट्री कार्यालय गई. वेहां कागजात तैयार करवाने के सिलसिले में कई लोगों से मिली. हर जगह यही जवाब मिला, 30 से 40 हजार रुपए लगेंगे. यह मेरे लिए मुश्किल था, क्योंकि मैं इतना खर्च करने की स्थिति में नहीं थी.

‘‘उन का तर्क था कि यदि आप अंदर से खुद कागजात पास करवा लें तो हम यह काम 5 हजार रुपए में करवा देंगे. कई जगह इस से मिलताजुलता जवाब पा कर मैं ने खुद ही कागजात बनवाने का निर्णय लिया. सब का यही कहना था कि तुम ने बेकार ही यह पचड़ा मोल लिया.

‘‘खैर, पहले कागजात तैयार करा कर, नियम के मुताबिक स्टैंप ड्यूटी, ड्राफ्ट आदि बनवाए. मेरी उम्र 50 साल से अधिक है. कार्यालय में कैमरे लगे होने के बावजूद मुझ से वहां औफिस इंचार्ज ने सैक्स की मांग की. मैं घबरा गई. मैं ने उन्हें समझाया कि आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं. काम करना तो आप का काम है, मैं इसे करवा कर रहूंगी. इस की फीस जो सरकार ने तय की है उसे मैं दे ही रही हूं.

‘‘खैर, मैं एफआईआर कराने की सोच रही थी, पर घर वालों ने मेरा जरा भी साथ नहीं दिया. अब मैं सोशल ऐक्टिविस्ट बन गई हूं. कई महिलाओं की मदद कर चुकी हूं.’’

पैसा भी, सैक्स भी : सरकारी, निजी और ऐसी ही तमाम जगहों पर जहां पब्लिक डीलिंग है, वहां यह बात बहुत कौमन है. पैसा भी चाहिए और देहसुख भी. सीधे तरीके से मिल जाए तो ठीक अन्यथा काम रोकने, अटकाने तथा जोरजबरदस्ती में भी कोई कमी नहीं है. गरीब की जोरू वाला हाल है.

प्रेरणा एक एनजीओ में नौकरी के लिए गई. उस का आकर्षक व्यक्तित्व देखते हुए एनजीओ की फाउंडर ने कहा, ‘‘आप का काम हमारे लिए फंड लाना और उसे सैंक्शन कराना रहेगा. आप इस कार्य के लिए ट्रैंड हैं, आप को कोई दिक्कत तो नहीं है न.’’

मैं उन का इशारा नहीं समझी, इसलिए इस काम के लिए तुरंत हां कर दी. लेकिन पहले ही असाइनमैंट पर मुझे असली बात समझ में आ गई जब मुझ से हमबिस्तर होने के लिए कहा गया. मैं उस व्यक्ति पर आक्रामकता दिखा कर फाउंडर के पास गई तो वे बोली, ‘मैं ने तो आप से पहले ही कह दिया था और आप ने ही हामी भरी. तभी आप को भेजा गया.’ मैं ने शिकायत भी दर्ज कराई पर कुछ नहीं हुआ. उलटे, मेरी ही फजीहत करने की पूरी कोशिश की गई.

छात्रा कुमारी नैना का कहना है, ‘‘आज नौकरी पाना मेरे लिए मुश्किल हो गया है. जहां भी मेरे साथ कोई हरकत करता है, मैं उस का जम कर विरोध करती हूं. इस वजह से हर जगह मुझे बदनाम करने की कोशिश की जाती है. अब हर कोई मुझ से डरता है, कोई काम करवा कर राजी नहीं है. इतनी पूंजी भी नहीं है कि मैं अपना ही कोई काम शुरू कर सकूं.’’

तमाम नियमकायदों के बावजूद महिलाओं का जीवन काफी कठिन है. किसी के प्रति आवाज उठाना खतरे से खाली नहीं है. बाहरी दुनिया के खतरों को जानना तथा उन्हें हल करना जितना आसान दिखता है उतना वास्तव में है नहीं.

एक छात्रा रुचिका का कहना है कि जब उस ने अपने क्लास टीचर द्वारा छात्राओं को छूने की बात घर आ कर पेरैंट्स को बताई तो भाई ने 2 झापड़ उसी को जड़ दिए और बोला कि उस की हिम्मत तुम्हारे ही साथ ऐसा करने की कैसे हो गई और लड़कियां भी तो क्लास में हैं. यह मेरे लिए काफी बड़ा आघात था.

रुचिका ने घर वालों को बताया कि टीचर ने अन्य युवतियों के साथ भी ऐसा किया हो, इस का मुझे यह उसे क्या पता. खैर, यह बात प्रिंसिपल तक पहुंची. माफीनामे और टीचर को स्कूल से निकाल देने पर मामला शांत हुआ. कानूनी ऐक्शन न लेने का मलाल रुचिका को आज भी है.

अंकिता कहती है कि एक प्रोजैक्ट की स्वीकृति पर अनुभाग अधिकारी जब मेरे जिस्म को छूने लगा तो मैं ने उसे वहीं रोक दिया. पति को ये बातें बताईं. उन्होंने जब उस से बात की तो वह मेरे कागज दाएंबाएं न कर सका. सरकारी कार्यालय में सैक्सुअल हैरासमैंट के खिलाफ कमेटी भी बनी होती है.

नियति ने डाक्टर की आशिकमिजाजी की बात अपने पति को बताई तो वह उस पर ही आरोप मढ़ने लगा और जबतब इस बात का ताना मारने लगा. ऐसे में नियति ने परिवार में इस मुद्दे को उठाया तो सब ने उस के पति को समझाया कि गलत समझे जाने के फेर में बातों को दबाना ठीक नहीं है. यदि घर का कोई सदस्य अन्याय के खिलाफ आप के साथ खड़ा न हो और आप को ही दोषी ठहराए तो उस के खिलाफ भी आवाज बुलंद करने में देरी न करें.

अपनी ओर से कोई संकेत न दें : सैक्स ब्राइब की मांग करने वाले लोग सौफ्ट टारगेट की तलाश में रहते हैं. सो, ऐसे लोगों से बेकार की बातचीत न करें और ऐसा कोई संकेत भी न दें जिस से उन्हें अनुचित काम करने का मौका मिले.

लक्ष्मीकांता बताती हैं, ‘‘मैं बिजली के दफ्तर गई तो वहां एक कर्मचारी मुझ से व्यक्तिगत बातें पूछता रहा. फिर बोला कि ब्याज तो मैं 10 हजार रुपए भी माफ करा दूंगा पर कभी बाहर मिलें.’’ लक्ष्मीकांता ने आगे बताया, ‘‘कहने लगीं कि शायद मेरी बातों से उस ने मेरे विधवा होने का पता लगा लिया, इसीलिए वह ऐसा प्रस्ताव रख रहा था. लेकिन मैं ने उसी समय तय कर लिया कि इस दफ्तर में मुझे दोबारा नहीं आना है. मैं ने उपभोक्ता फोरम से निवेदन किया. ट्रेन के टिकट पेश कर के अपनी अनुपस्थिति जताई. तब मेरा गलत बिल ठीक हुआ. हां, आधे घंटे के इस काम में 6 महीने जरूर लग गए.

शौर्टकट न तलाशें : कोई भी काम करने के लिए अवैध शौर्टकट या ऐसा कोई तरीका न अपनाएं जिस से कोई व्यक्ति आप से गलत मांग करे. ईमानदार व तेजतर्रार व्यक्ति के सामने हर कोई अमान्य, अवैध प्रस्ताव रखते हुए डरता है.

बस, साहब को खुश कर दो : रचना कहती है कि साहब के पीए ने मुझ से यह प्रस्ताव रखा कि ‘बस, साहब को खुश कर दो’ तो मैं सन्न रह गई पर हिम्मत कर के मैं ने कहा, ‘‘साहब सरकार द्वारा हमारा काम करने के लिए रखे गए हैं. तुम्हें पता है ऐसा कहने से तुम्हारी नौकरी और जिंदगी पर बात आ सकती है. तुम अपनेआप को समझते क्या हो.’’ पीए बजाय डरने के मुझे ही धमकाते हुए बोला, ‘‘अपना लैक्चर अपने पास रखो. आप जैसी दोचार महिलाएं रोज आती हैं औफिस में और तीसरे दिन साहब की शरण में होती हैं.’’

खैर, मैं ने संबंधित अथौरिटी से शिकायत की. लेकिन जब मैं ने जानना चाहा कि पीए को क्या सजा हुई, यह पूछने पर कहा गया कि हम बाहर के लोगों को जानकारी नहीं दे सकते. आखिर, 6 महीने बाद उस पर कार्यवाही हुई.

प्रमाण नहीं होता : सैक्स की मांग करने वालों के खिलाफ पुख्ता सुबूत जुटाना मुश्किल होता है. मोबाइल में रिकौर्डिंग व फोटोग्राफी की व्यवस्था होने पर भी उस का उपयोग कई विभागों में सुरक्षा के नाम पर प्रतिबंधित होता है. फिर भी महिलाओं को चुप्पी साधने के बजाय अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए. कोर्ट तक में नारी की इस बात पर संज्ञान लिया जाता है कि ऐसी गैरवाजिब बातों के कोईर् प्रमाण नहीं छोड़ता.

घर वालों को विश्वास में लें : यदि किसी भी विभाग में आप से काम करने के एवज में कोई कर्मचारी अनुचित मांग यानी सैक्स या ऐसी ही कोई दूसरी मांग करता है तो तुरंत अपने घर वालों को इस की जानकारी दें.

सूचना का अधिकार तथा ऐसे ही जनफ्रैंडली टूल आ रहे हैं, जिन से सरकारी बाबुओं को काम को रोकना मुश्किल होता है. हर महकमे का विजिलैंस विभाग भी है जहां शिकायत दर्ज होने पर उन्हें ऐक्शन लेना पड़ता है. फिर अब तो सैक्सुअल हैरासमैंट औन वर्कप्लेस जैसे कानून भी महिला फ्रैंडली हो रहे हैं.

कहीं भी कोई भी जोरजबरदस्ती या नम्रता से सैक्स की सीधे या छद्म मांग करे तो उस को मुंहतोड़ जवाब दें तथा कानूनी कार्यवाही करें. सहने और टालने से काम हो जाने पर नजरअंदाज करने से आप सिर्फ अपने को बचा पाती हैं. कानूनी ऐक्शन ले कर आप अपने जैसी कई महिलाओं को बचाती हैं और समाज में नारी गरिमा की मिसाल पेश करती हैं.

युवा प्यार चुनें या परिवार, हम बताते हैं

फिल्म का मुख्य नायक अमिताभ बच्चन कालेजलाइफ से ही फिल्म की नायिका राखी से प्यार करता है. कालेज के बाद राखी को पारिवारिक वजहों के चलते फिल्म के सहनायक शशि कपूर से शादी करनी पड़ती है. जब वह यह बात अमिताभ बच्चन को बताती है तो वह बजाय भड़कने के, बड़े भावुक व दार्शनिक अंदाज में राखी से कहता है कि उसे कोई हक नहीं है कि वह अपनी खुशियों के लिए अपने मांबाप के अरमानों का गला घोंटें. फिल्म ‘कभी कभी’ का यह दृश्य इतना प्रभावी था कि आज तक दर्शकों के जेहन में मौजूद है.

80 के दशक की फिल्म ‘कभी कभी’ महज इसलिए हिट नहीं हुई थी कि वह कई नामी सितारों से सजी हुई थी, बल्कि इसलिए ज्यादा पसंद की गई थी कि उस में 2 पीढि़यों की प्रेमकथाएं और प्रेमियों का अंतर्द्वंद्व अलगअलग तरह से दिखाया गया था.

ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि अब कोई युवा इस तरह का जवाब प्रेमिका को नहीं देता. 30-40 सालों में वक्त व हालात बहुत बदल गए हैं. लवमैरिज अब कोई अजूबी बात नहीं रह गई है. अब उन्हें पारिवारिक स्वीकृति और सामाजिक मान्यता मिलने लगी है.

लेकिन प्यार तब की तरह आज भी सफल हो, इस की गारंटी नहीं. बदलाव यह भी आया है कि अब प्यार में बाधा मांबाप या परिवारजन कम, खुद युवा ज्यादा डालने लगे हैं. प्यार की नाकामी वे बरदाश्त नहीं कर पाते तो या तो वे हिंसक हो उठते हैं या फिर अंतर्मुखी बनते जिंदगी जीने का सलीका भूल जाते हैं.

हर दौर में युवाओं का दिल टूटता रहा है लेकिन प्यार जैसा हसीन जज्बा आज भी बरकरार है. कभी जिम्मेदारियां उठाने को तैयार करने वाला प्यार अब युवाओं को जिम्मेदारियों से भागना और आंखें बंद कर लेना सिखा रहा है, तो बात जरूर चिंता की है कि क्या वाकई प्यार युवाओं को खुदगर्ज व पलायनवादी बना रहा है जो रत्तीभर भी अपने परिवार या जीवन के बारे में नहीं सोच पाते.

एक हादसा, कई सबक

प्यार को ले कर आज के युवा कहां मात खा रहे हैं और फिर पूरा परिवार सकते में आ जाता है, यह बीती 3 जुलाई को भोपाल में हुए एक हादसे से साफ हो गया. इस दिन भोपाल के शिवाजी नगर इलाके में रहने वाले 30 वर्षीय अतुल लोखंडे ने एकदम फिल्मी स्टाइल में खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी.

इस दिन अतुल रात में साढ़े 9 बजे चंद कदमों की दूरी पर रहने वाली अपनी प्रेमिका रश्मि के घर पहुंचा था. रश्मि के पिता के दरवाजा खोलते ही अतुल ने रश्मि से शादी करने का प्रस्ताव रख दिया. रश्मि के पिता द्वारा इनकार करने पर उस ने अपने साथ लाए देशी तमंचे को अपने माथे पर लगा कर अपनी जीवनलीला खत्म कर ली.

फिर जैसा कि होता है, इस प्रेमप्रसंग की चर्चा के साथ तरहतरह की बातें हुईं. अतुल ने खुदकुशी करने से पहले फेसबुक पर एक पोस्ट डाली थी जिस का सार यह था कि रश्मि के पिता ने उस से कहा था कि आज शाम को घर आओ और अपनी प्रेमिका के लिए मर के दिखाओ अगर उस से प्यार करते हो तो. बच गए तो तुम दोनों की शादी पक्की, मर गए तो सात जन्म हैं ही. फिर पैदा हो कर कर लेना शादी.

इन बातों का उल्लेख इसलिए किया गया कि अतुल की नासमझी, कायरता और जनून समझ में आए, जो आजकल के हर दूसरे युवा की परेशानी है. अतुल भारतीय जनता पार्टी के अरेरा मंडल का उपाध्यक्ष था जिस में अपार संभावनाएं मौजूद थीं. यह वही अतुल था जो रश्मि से ब्रेकअप होने के बाद अकसर दोस्तों से कहता रहता था कि वह कभी खुदकुशी नहीं करेगा. गौरतलब है कि अतुल और रश्मि लगभग 13 वर्षों से एकदूसरे से प्यार करते थे जो किसी से छिपा नहीं था.

किस काम की भावुकता

अपनी फेसबुक पोस्ट में अतुल ने यह भी लिखा था कि उस ने रश्मि से 2 वादे किए थे, जिन में से दूसरा वह पूरा नहीं कर पाया. इस के आगे उस ने लिखा था, ‘‘इसलिए मैं जा रहा हूं. सब यही कहेंगे कि लड़की के चक्कर में चला गया, घर वालों के बारे में एक बार भी नहीं सोचा. सब के बारे में सोचसमझ कर ही यह कदम उठाया है. उस के अलावा कहीं कुछ दिख ही नहीं रहा. बहुत कोशिश कर ली, भूल ही नहीं पा रहा हूं और भुलाया पराए को जाता है अपनों को नहीं.’’

यह हताशा बताती है कि अतुल की व्यावहारिकता पर भावुकता भारी पड़ रही थी और उस से भी ज्यादा भारी पड़ रहा था ब्रेकअप का तनाव जिस से वह कोशिश करता तो निबट सकता था.

अतुल के पिता मधुकर लोखंडे जेलकर्मी हैं और रश्मि के पिता जल संसाधन विभाग में कार्यरत हैं. दोनों ही परिवार मध्यवर्गीय हैं. पड़ोसी होने के नाते किशोरावस्था से ही ये दोनों एकदूसरे को जानते थे. इस जानपहचान का प्यार में बदल जाने का एहसास उन्हें युवावस्था में आने के बाद हुआ.

हादसे के बाद उम्मीद के मुताबिक, दोनों के परिजनों ने एकदूसरे पर तरहतरह के आरोप लगाए. रश्मि का कहना था कि दोनों एकदूसरे को पसंद करते थे, लेकिन पिछले एक साल से अतुल उसे परेशान करने लगा था. कुछ महीने पहले ही रश्मि की नौकरी बैंक में पीओ के पद पर लगी थी.

बकौल रश्मि, वह अतुल को समझाती रहती थी कि वह कुछ करेधरे और भविष्य के प्रति गंभीर हो लेकिन वह अव्वल दर्जे का लापरवाह युवक था. रश्मि ने यह भी बताया कि एक बार रास्ते में अतुल ने उसे रोक कर उस की स्कूटी की लाइट तोड़ दी थी और उसे सरेराह थप्पड़ भी मारे थे.

इधर अतुल के बड़े भाई मुकुल का कहना था कि नौकरी लग जाने के बाद रश्मि अतुल से दूरी बनाने लगी थी जिस से अतुल अवसाद में आ गया था. अतुल की मां सुनंदा की मानें तो रश्मि और उस के परिजनों के तमाम आरोप झूठे व मनगढं़त हैं. रश्मि ऐशोआराम की जिंदगी जीना चाहती थी. उस की शाही फरमाइशें अतुल पूरी नहीं कर सकता था, इसलिए वह उस से कटने लगी थी. इस से पहले उस का घर आनाजाना आम बात थी और वह उन के यहां हर समारोह में शामिल होती थी.

अतुल के पिता खामोश रहे तो तय है उन के पास बोलने को कुछ नहीं था. कुछ दिनों से वे घर से अलग भी रह रहे थे.

परिवार पर भारी प्यार

देखा जाए तो समस्या कोई खास नहीं थी सिवा इस के कि अतुल प्यार में अपनी नाकामी यानी रश्मि द्वारा ठुकराए जाने को हजम नहीं कर पा रहा था. खुदकुशी कर उस ने अपने तथाकथित प्यार का सुबूत तो दे दिया लेकिन मांबाप, भाईभाभी, बहन और भतीजी की हालत देखने को वह मौजूद नहीं.

बुजदिली भरा कारनामा

भोपाल के अतुल की ही तरह की बुजदिली पुणे के अखिलेश्वर कुमार ने भी दिखाई थी. 22 वर्षीय अखिलेश्वर को उस के मांबाप ने बड़ी उम्मीदों से पढ़ने के लिए पुणे भेजा था वरना कहां आंध्र प्रदेश का विशाखापट्टनम और कहां महाराष्ट्र का पुणे. आमतौर पर पहले संतानों को इतनी दूर भेजने से अभिभावक कतराते थे, लेकिन अब कैरियर और भविष्य के लिए कलेजे पर पत्थर रख कर कलेजे के टुकड़ों को भारी मन से घर से दूर भेजते हैं. अखिलेश्वर पुणे के आईबीएस कालेज से होटल मैनेजमैंट का कोर्स कर रहा था.

घर से निकलते ही अखिलेश्वर को भी एक युवती से प्यार हो गया जो हैरानी या हर्ज की बात नहीं थी. लेकिन इस साल की पहली तारीख से ही प्रेमिका ने न मालूम किन वजहों से उस से मिलनाजुलना बंद कर दिया, तो वह परेशान हो उठा. इस ब्रेकअप के दौरान वह विशाखपट्टनम मम्मीपापा और भाई से बात करते हुए उन से झूठ बोलता रहा कि वह एकदम ठीक है और पढ़ाई भी ठीकठाक चल रही है.

लेकिन ठीकठाक कुछ नहीं था. अखिलेश्वर के दिलोदिमाग में तूफान और द्वंद्व उमड़घुमड़ रहे थे. एक तरफ रोज फोन पर 2 बार बात कर चिंता करने वाले मांबाप थे तो दूसरी तरफ वह युवती थी जिस से जानपहचान हुए अभी 1 साल भी पूरा नहीं हुआ था. फिर एक दिन अखिलेश्वर ने सल्फास की गोलियां खा कर खुदकुशी कर ली.

अपने 15 पृष्ठों के सुसाइड नोट में अखिलेश्वर ने अपनी लवस्टोरी लिखने के साथसाथ बारबार मम्मीपापा और भाई से माफी मांगी है. पर क्या अखिलेश्वर का गुनाह माफी के काबिल है. जवाब बहुत स्पष्ट और संक्षिप्त है, बिलकुल नहीं.

दूसरे हजारोंलाखों युवाओं की तरह इस युवक ने भी यह नहीं सोचा कि मांबाप संतान को कितना चाहते हैं और ऐसी बुजदिली औलाद दिखाए तो वे जिंदगी जीते नहीं, बल्कि उसे ढोने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

जीना बड़ा काम है

दुनिया के आसान कामों में से एक है, आत्महत्या कर लेना. पर इस से दूसरों, खासतौर से मांबाप, पर क्या गुजरती है, इस का रत्तीभर भी अंदाजा संतानों को नहीं होता. वे भूल जाते हैं कि कैसे मां ने अपना खूनपसीना बहा कर उन्हें बड़ा किया है, कैसे पिता ने उंगली पकड़ कर चलना सिखाया है, पढ़ाई करने के लिए दूर भेजा भी है तो सिर्फ इसलिए कि संतान दुनिया की दौड़ में पिछड़े न. कोई अतुल या अखिलेश्वर मांबाप, भाईबहनों के बारे में नहीं सोचता तो इस की बड़ी वजह सिर्फ प्यार में असफलता नहीं, बल्कि मांबाप के प्रति एहसानफरामोशी है जिस के माने निकम्मे युवक नहीं समझ पाते.

प्यार करना कतई हर्ज की बात नहीं, हर्ज की बात है प्यार में अंधे हो कर मातापिता और परिजनों के प्यार व परवरिश को भूल जाना. हर्ज की बात है एक लड़की का इतना भारी पड़ जाना कि उस के आगे खून के रिश्तों की कोई कीमत ही न रहे. कैसे कोई युवक, जो नेतागीरी में होने के कारण ज्यादा व्यावहारिक होता है, अपनों को जिंदगीभर के दुख दे जाता है, यह अतुल की नादानी से सहज समझा जा सकता है.

क्या वाकई अतुल को मांबाप की परवा थी, इस सवाल के जवाब में शायद ही कोई हां में सिर हिलाए. जिन मांबाप ने जन्म दिया, तरहतरह की तकलीफें उठा कर पालापोसा, पढ़ायालिखाया और काबिल बनाया, उन की अहमियत या कीमत बेटे की निगाह में क्या रह गई थी, कहने की जरूरत नहीं.

सोचें युवा

प्यार में पड़े युवा, दरअसल, यह मान बैठते हैं कि अब जिंदगी में कुछ है तो वह सिर्फ प्रेमिका है जो उन की धड़कनों और सांसों में रचबस गई है. लेकिन वे यह नहीं सोच पाते कि वे अपने मांबाप की धड़कनों और सांसों में तो जन्म से ही रचतेबसते हैं.

ऐसे में क्या प्रेमिका और प्यार के लिए मांबाप को छोड़ जाना इंसाफ की बात है? अगर है तो कैसे? युवा बचपन और किशोरावस्था में सोचा करता है कि वह बड़ा हो कर मांबाप के सपने पूरे कर उन की सेवा करेगा और उन का कर्ज उतारेगा. लेकिन प्यार में पड़ कर वह यह सब भूल जाता है. उसे लगता है कि एक प्रेमिका ही है जो उसे चाहती है और उस पर सबकुछ कुरबान कर रही है. मांबाप ने क्याक्या कुरबान किया, यह वह इस वक्त भूल जाता है.

अतुल के मामले में प्रेमिका मुकर गई थी तो उस में मांबाप और घर वालों की क्या गलती, यह जाने क्यों उस ने नहीं सोचा. अगर वाकई रश्मि शर्तें थोप रही थी तो यह सरासर उस की चालाकी थी जो खुद मान रही है कि वह अतुल से कन्नी काटने लगी थी. ऐसे में रश्मि की ज्यादती या गलती की सजा घर वालों को क्यों मिले?

सोशल मीडिया पर आएदिन ऐसी पोस्ट वायरल होती रहती हैं कि एक पिता संतान के लिए क्याकुछ नहीं करता.  खुद अभावों में रह कर संतान को अभाव महसूस न हो, इस के लिए कभीकभी कर्ज में डूब भी जाता है. एक पिता बेटे की जिंदगी संवारने के लिए उसे नसीहतें देता है तो कोई गलती नहीं करता, बल्कि वह अपनी जिम्मेदारी निभाता है. वह पिता ही होता है जो बेटे को दुनियादारी दिखाता है, ऊंचनीच और भलाबुरा बताता है क्योंकि उस के पास तजरबा होता है.

प्यार में पड़ी संतान को अगर पिता उस के नुकसान बताता है तो बेटे की नजर में वह आदर्श न हो कर खलनायक बन जाता है. आजकल के युवा, अफसोस की बात है, ये सब नहीं समझ पाते. पिता अगर यह सिखाता है कि जिम्मेदार और गंभीर बनो तो ये नसीहतें संतान को कांटों जैसी चुभने लगती हैं और बात अगर प्रेमिका की हो, तो वह उस की खातिर उन्हें छोड़ देने को भी तैयार हो जाते हैं.

इस बात की भी गारंटी नहीं होती कि शादी के बाद प्रेमिका अच्छी जीवनसाथी साबित होगी और परिवार को साथ ले कर चलेगी. इस पर भी मांबाप अकसर बहू द्वारा किए गए अपमान और अनदेखी बरदाश्त कर लेते हैं तो बेटे की खुशी के लिए, क्योंकि वे नहीं चाहते कि उन की वजह से बेटे के दांपत्य में खटास या दरार आए.

भोपाल के ही एक युवा अनिमेष की मानें तो उस के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था. ऐसे वक्त में पिता ने दोस्त की तरह सहारा देते उसे संभाला था वरना वह भी अतुल की तरह खुदकुशी का मन बना चुका था. पिता ने समझाया था कि शर्तें थोपने वाली प्रेमिका के लिए जान दे देना बुद्धिमानी या प्यार निभाने की बात नहीं, क्योंकि वह फिर जिंदगीभर ऐसा करती रहेगी. वह सुधरने वाली नहीं.

प्रेमिका अपने प्रेमी के मांबाप के बारे में बुराभला कहे तो हैरानी की बात है कि बेटों को कोई खास फर्क नहीं पड़ता, लेकिन मांबाप प्रेमिका की कमजोरियां, चालाकी और गलतियां बताने लगें तो बेटे तिलमिला उठते हैं. यही बात प्यार में पड़ी बेटियों पर भी लागू होती है.

प्यार में कामयाब हों या न हों लेकिन युवाओं को यह याद रखना चाहिए कि जब भी दुविधा या विवाद की स्थिति बने तो उन की प्राथमिकता परिवार होना चाहिए, प्यार नहीं. कम से कम वह प्यार तो कतई नहीं जो यह कहता है कि मांबाप की इच्छाएं और इज्जत ताक पर रख कर उस से शादी कर सकते हो तो करो वरना जियो चाहे मरो, उसे कोई मतलब नहीं.

उलट इस के, कोई मांबाप यह नहीं कहते कि अगर प्रेमिका को नहीं छोड़ सकते तो मर जाओ. हां, प्रेमिका का पिता जरूर यह कह सकता है, जो कथित तौर पर रश्मि के पिता ने कहा था और अतुल ने जान दे कर उन की बात मान भी ली.

प्रेमिका अगर शादी नहीं करना चाह रही तो कोई पहाड़ नहीं टूटता, बल्कि अच्छी बात यह है कि शादी से पहले ही यह समझ आ जाता है कि शादी के बाद वह क्याक्या गुल खिला सकती थी जिस से जिंदगी सिरदर्द बन कर रह जाती.

बरदाश्त करना सीखें

प्यार में नाकामी बरदाश्त करना हर युवा को आना चाहिए, खुद के लिए नहीं तो उन मांबाप और घर वालों के लिए जो वाकई उसे प्यार करते हैं. यह बात अतुल जैसे युवा स्वीकारते भी हैं. अफसोस की बात यह है कि यह एहसास उन्हें मरने से पहले क्यों नहीं होता. एक नाकामी से जिंदगी खत्म नहीं हो जाती बल्कि उसे नए सिरे से शुरू करने का मौका मिल जाता है. यकीन मानें ऐसी हालत में आप को कोई संभाल सकता है, भावनात्मक सहारा दे सकता है तो वे मांबाप ही हैं, कोई और नहीं. इसलिए उन्हें और उन की भावनाओं को समझें वरना हश्र अतुल जैसा होना तय है. अलगाव या आत्महत्या के बाद प्रेमिका तो किसी और से शादी कर अपनी घरगृहस्थी बसा लेती है पर जिन मांबाप से बेटा हमेशा के लिए छिन जाता है, उस की भरपाई कोई नहीं कर सकता.

किसी संतान को यह हक नहीं है कि वह अपने निर्दोष मांबाप को रोताबिलखता छोड़ जाए, वह भी उस प्रेमिका के लिए जो उस की हुई नहीं और न पहले कभी थी. जो प्यार, सहयोग और सहारा परिवार से मिलता है वह अगर प्रेमिका दे पाती तो किसी विवाद या शर्तों की नौबत ही नहीं आती.

ऐसी हालत में ‘कभी कभी’ फिल्म में अमिताभ बच्चन द्वारा बोला गया डायलौग हमेशा याद रखना चाहिए जो गुजरे कल का है, लेकिन आज भी प्रासंगिक है.

असम एनआरसी मामला : 2 करोड़ 80 लाख घुसपैठिए?

असम के कामरूप जिले के चौउतारा गांव की रहने वाली आईमोना खातून नैशनल रजिस्टर औफ सिटीजंस यानी एनआरसी केंद्र में उपलब्ध सूची में अपना नाम खोजखोज कर थक चुकी है. उस का नाम तो दर्र्ज नहीं है पर उस के पति कासिम अली और 2 बेटियों जसमीना (8) व असमीना खातून (4) के नाम दर्र्ज हैं.

खातून अपनी दुखभरी दास्तां यों बयां करती है कि एनआरसी की पूरी प्रक्रिया के दौरान लाइनों में लग कर मैं ने और मेरे पति ने परिवार से संबंधित जानकारी के साथ एनआरसी के सेवा केंद्र में आवेदन जमा करवाए थे. बदले में केंद्र की ओर से हमें पक्की रसीद मिली थी.

कुछ इसी प्रकार बिहार के मधुबनी जिले के जोकहर के निवासी दिवंगत भोला शेख के 65 वर्षीय पुत्र अजहर अली 1982 में बिहार से असम आए और यहीं बस गए. इन का विवाह छयगांव की रहने वाली अमीरुन नेशा के साथ हुआ. अजहर के 2 बेटे और 3 बेटियां हैं. एनआरसी के मसौदे में अजहर की पत्नी और 2 बेटियों के नाम सूची में हैं पर इन का और इन के बेटे अजमुद्दीन अली व बेटी अनवारा बेगम के नाम सूची में नहीं हैं.

वे कहते हैं, ‘‘इस में मेरा क्या कुसूर है? मैं भारतीय नागरिक हूं और मैं ने सारे दस्तावेज जमा भी करवाए, फिर भी मेरा और मेरे बेटे व एक बेटी के नाम 40 लाख वाले संदिग्ध लोगों की सूची में रख दिए गए. दूसरी ओर देश के पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के रिश्तेदार, असम की एक महिला पूर्व मुख्यमंत्री सैयदा अनोवारा तैमूर के साथसाथ कई पूर्र्व विधायकों तथा बिहार व उत्तर प्रदेश से यहां आ कर बसने वालों में से कइयों के नाम सूची से गायब हैं.

दरअसल, बात सिर्फ 40 लाख घुसपैठियों की नहीं है. सरकार ने इन के अलावा करीब 2 करोड़ 80 लाख लोगों के सिर पर नागरिकता की तलवार लटका दी है. कहींकहीं तो हिंदू परिवार में मुसलमान व्यक्ति का नाम एकसाथ सूची में है. जिन लोगों के नाम सूची से गायब हैं वे चिंतित और घबराए हुए हैं कि अब क्या होगा.

आखिर क्यों सरकार ने इतने लोगों को नागरिकता के सवाल पर कठघरे में खड़ा कर दिया  है?

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि जिन लोगों के नाम एनआरसी में नहीं हैं वे घुसपैठिए हैं. इन से देश की सुरक्षा के लिए खतरा है. इन लोगों के कारण राज्य के संसाधनों पर काफी दबाव पड़ रहा है और राज्य के मूल नागरिक तकलीफ झेल रहे हैं.

राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर कुछ दस्तावेजों के आधार पर तैयार किया गया है. इस में यह नहीं देखा गया कि कई वैध नागरिकों के पास ये दस्तावेज न हों और अवैध नागरिकों ने नकली दस्तावेजों के आधार पर अपने नाम शामिल करवा लिए हों. इस से वैध नागरिक कठघरे में खड़े हो गए हैं.

दरअसल, असम से बंगलादेशी घुसपैठियों को खदेड़ने की मांग को ले कर अखिल असम छात्रसंघ द्वारा ऐतिहासिक असम आंदोलन चलाया गया था जिस में 855 लोगों को जानें गंवानी पड़ी थीं. बाद में 1983 में यहां के नेल्ली नरसंहार में 7 हजार लोगों के कत्लेआम जैसे जघन्य मामलों के कईर् सालों बाद राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की दूसरी सूची जारी की गई.

एनआरसी की सूची जारी होने के बाद कई लोगों ने खुशी जाहिर की तो कई गुस्से में हैं. सूची जारी होने के पश्चात असम में धीरेधीरे नफरत का जहर घुलने लगा है. हाड़तोड़ मेहनत से भूखप्यास बुझाने वाली प्रदेश की धरती क्या खून से लाल होगी. अभी तक तो सबकुछ ठीक है पर राज्य और बाहर की राजनीतिक पार्टियां वोटबैंक की सियासत का जो खेल खेल रही हैं उस में ज्यादा स्वाद भाजपा को मिल रहा है.

कब हुई शुरुआत

प्रदेश में असमिया और गैरअसमिया को ले कर 1950 से टकराव होना शुरू हुआ. पर 1971 में बंगलादेश बनने के बाद तकरीबन 10 लाख बंगलादेशी नागरिकों ने असम में शरण ली. बाद में 9 लाख बंगलादेशी नागरिक वापस अपने देश लौट गए थे. आगे चल कर चोरीछिपे बंगलादेशी नागरिकों की असम में घुसपैठ जारी रही. इसे देख कर यहां के स्थानीय लोगों को भय सताने लगा कि ये संदिग्ध नागरिक यहां कुछ भी कर सकते हैं.

संदिग्ध नागरिकों को राज्य से खदेड़ने को ले कर असम छात्र संघ (आसू) ने आंदोलन की शुरुआत की. 6 साल चले आंदोलन का खात्मा 14 अगस्त, 1985 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और आंदोलनकारी नेताओं के बीच हुई बैठक के बाद हुआ. समझौते के बाद आंदोलनकारी नेताओं ने असम गण परिषद नाम से एक राजनीतिक पार्टी बनाई और 2 बार राज्य में इन की सरकार रही पर वह सरकार भी राज्य में घुसपैठियों की रोकथाम में नाकाम रही.

असम में बांग्ला भाषा

असम में पहले बांग्ला भाषा का प्रचलन था. 1837 में ब्रिटिश सरकार ने एक कानून बना कर देश के तमाम राज्यों के न्यायालयों, स्कूलों और कालेजों में स्थानीय भाषा को लागू करने का आदेश दिया था. पर विंडबना यह रही कि असम उस समय बंगाल में शामिल था और ऐसे में असम  में असमिया भाषा के स्थान पर बांग्ला भाषा को ही लागू किया गया. हालांकि इस का विरोध आनंदराम ढेकियाल फुकन ने किया था. फुकन की मृत्यु के सालों बाद यानी 1872 में लैफ्टिनैंट गवर्नर जौर्ज केश्वेल के निर्देश के बाद असम में असमिया भाषा की शुरुआत हुई.

40 लाख कोई मामूली संख्या नहीं है. विश्व में ऐसे कई देश हैं जिन की कुल आबादी 40 लाख से भी कम है. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का दूसरा और अंतिम मसौदा जारी होने के बाद 40 लाख 7 हजार 707 लोगों के नाम लिस्ट से गायब हैं और इसी संख्या को भारतीय जनता पार्टी घुसपैठियों की संख्या मान कर चल रही है.

खुद को भारतीय साबित करने के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में प्रदेश में रहने वाले 3 करोड़ 29 लाख 91 हजार 358 लोगों ने आवेदन किए थे. 30 जुलाई को जारी की गई सूची में 2 करोड़ 89 लाख 83 हजार 668 लोगों के नाम, पते और फोटाग्राफ हैं. इस पूर्वोत्तर राज्य असम की समस्या है कि बंगलादेशी नागरिकों  को भारतीय नागरिकता मिल जाती है तो असमिया लोगों के अल्पसंख्यक होने के खतरे की घंटी बजनी शुरू हो जाएगी.

हालांकि सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक एनआरसी की फाइनल सूची जारी नहीं होती तब तक किसी को घबराने की आवश्यकता नहीं है.

असली नागरिक तो कठघरे में हैं जबकि वास्तविक घुसपैठियों ने नागरिकता के दस्तावेज बना लिए. मूल नागरिकों के साथ दस्तावेज जमा कराने की व्यावहारिक दिक्कतें हो सकती हैं. 1971 के बाद अगर भारत के किसी हिस्से से कोई नागरिक असम चला गया और वह वहां इतने सालों में कई घर बदल चुका हो तब क्या उस के पास रिहाइश का कोई सुबूत मिल सकता है?

आधार कार्ड आने से पहले ये लोग क्या प्रमाण देंगे. अगर कोई नागरिक अपने मूल गांव, कसबे या शहर भी लौट कर अपनी नागरिकता का कोई प्रमाण असम से चल कर लेने आएगा तो उसे कम से कम 10 दिन लगेंगे. ऐसे में वह एनआरसी की सूची में कैसे शामिल हो सकता है.

5 हजार रुपए दो, एनआरसी लो

असम में रहने वाले हिंदीभाषियों का एक संगठन है, पूर्वोत्तर हिंदुस्तानी सम्मेलन. इस का मुख्य कार्यालय गुवाहाटी स्थित फैंसी बाजार में है. सम्मेलन ने बाकायदा अखबारों में विज्ञापन दे कर कहा कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में नाम दर्ज कराने के लिए आजीवन सदस्य और साधारण सदस्य होना जरूरी है. साधारण सदस्यों के लिए 100 रुपए और आजीवन सदस्यों के लिए 5 हजार रुपए फीस है. ये पैसे संगठन के बैंक खाते में जमा कराने होते हैं. इस के बाद एनआरसी में नाम शामिल कराने का काम शुरू किया जाता है.

40 लाख में सब घुसपैठिए नहीं

प्रदेश की एनआरसी की सूची से बाहर 40 लाख लोगों में सब घुसपैठिए नहीं हैं. एनआरसी के प्रदेश समन्वयक प्रतीक हजेला का कहना है कि सभी नागरिकों को भारतीयता साबित करने का एक और मौका दिया जाएगा, ताकि अंतिम सूची तैयार कर के घुसपैठियों का असली आंकड़ा सामने रखा जा सके. पर इस के पहले लोकसभा में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सूची से बाहर किए गए 40 लाख से अधिक लोगों को घुसपैठिया करार दिया था.

एनआरसी में घुसपैठियों के नाम

30 जुलाई को जारी एनआरसी में दर्ज प्रदेश के मोरीगांव जिले के 39 परिवारों के 200 सदस्य बंगलादेशी हैं, लेकिन इन सभी का नाम एनआरसी की सूची में शामिल है. विदेशी न्यायाधिकरण में चल रहे मामले को छिपाने और गलत पते दे कर इन घुसपैठियों ने एनआरसी की सूची में अपना नाम दर्ज करवा लिया.

दरअसल, घुसपैठियों की समस्या भारत में ही नहीं है, बदलते हुए सामाजिक, आर्थिक माहौल में दुनियाभर में गरीबी, भुखमरी, बेकारी के चलते और सब से बड़ा कारण आतंकवाद के प्रभाव के चलते करोड़ों लोग विस्थापित हो रहे हैं. ये लोग अपनी बेहतरी के लिए निकटवर्ती देशों में शरण के लिए घुस रहे हैं. कहींकहीं सरकारें इन्हें शिविरों में रख रही हैं तो कहीं इन्हें नागरिकता दे कर अपने देश के समान नागरिकों की तरह अधिकार प्रदान करती हैं.

पिछले एक दशक से अफगानिस्तान, इराक, सीरिया युद्ध के दौरान हजारों लोग देश छोड़ने को मजबूर हुए. इन लोगों के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, जरमनी जैसे देशों ने अपनी सीमाएं खोल दीं. हर व्यक्ति को हवा में सांस लेने, पानी पीने, घूमनेफिरने का जो प्राकृतिक अधिकार है, लोकतंत्रों का भी तकाजा है कि यही प्राकृतिक हक सब को मिले, चाहे नागरिकता प्राप्त हो या न हो.

भारत दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र है पर अफसोस है कि यहां की केंद्र सरकार धर्म, जाति के आधार पर राजनीतिक नफानुकसान वाली नीतियों पर चल रही है.

एक लोकतांत्रिक देश का दायित्व है कि वह बिना नस्ल, धर्म, जाति, भाषा का भेद किए नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराए लेकिन सरकार इस मामले में हिंदूमुसलमान का खेल खेल रही है. भाजपा शुरू से ही बंगलादेशी मुसलमानों का विरोध करती रही है. उधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत कांग्रेस इन तथाकथित बंगलादेशी लोगों का बचाव करती आई हैं.

भाजपा इन मुसलमानों के नाम पर ममता बनर्जी और कांग्रेस दोनों पर हमले साध रही है और देश में यह संदेश देना चाहती है कि बंगलादेशी मुसलमानों की वजह से देश के नागरिकों के लिए संसाधनों का अभाव हो रहा है.

हमारे यहां नेताओं और धर्मगुरुओं द्वारा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ जैसी अच्छी बातों के प्रवचन दिए जाते हैं पर हकीकत में हम धार्मिक, जातीय, भाषायी, क्षेत्रीयता की संकीर्ण सोच से गहरे तक ग्रस्त हैं. हम ने धर्म द्वारा बताई गईर् तमाम संकीर्णता को अपना लिया है.

समाज का दोहरापन हर जगह झलकता है. विदेशियों को शरण देना छोड़ हमारे यहां तो अपने लोगों को ही निर्वासित किया जाता रहा है. हिंदू धर्म के नियम के अनुसार बालविधवाओं को खुद अपने घर से निर्वासित कर दिया जाता है. आज वाराणसी, वृंदावन, इलाहाबाद, हरिद्वार में हजारों विधवाएं हिंदू धर्म के आदेशों का दंश झेल रही हैं.

हमारे अपने सैनिक विदेशी दुश्मनों से नहीं, अपनों से ही लड़ते हुए मारे जा रहे हैं. किसी भी सरकार को यह हक नहीं है कि वह अपने ही देश के नागरिकों से उस की नागरिकता का सुबूत मांगे, उसे नागरिकता के कठघरे में खड़ा करे. देश के सभी हिस्सों में आज लाखों ऐसे लोग हैं जिन के पास सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार, बेईमानी, निकम्मेपन के चलते राशनकार्ड, वोटर आईकार्ड, आधारकार्ड नहीं हैं कि जिन्हें वे रिहाइश के सुबूत के तौर पर दिखा सकें.

दुनिया आज ग्लोबल विलेज के तौर पर जानी जाती है. गरीबी, भुखमरी, बेकारी और धर्म के मारे पड़ोसी देशों से कुछ लोग इधर से उधर आजा रहे हैं. ऐसे में भारत को उदारता दिखाते हुए उन्हें अपने यहां अपना लेना चाहिए. इस मानव श्रम का सदुपयोग करने की नीतियां अब विश्व के देशों को सीखनी चाहिए. धर्म के नाम पर नफरत पैदा कर के राजनीतिक फायदा उठाने की सोच को त्यागने से ही देश व समाज का भला होगा.

(साथ में जगदीश पंवार)

प्राइवेट स्कूलों की मनमानी और पेरैंट्स से मोटी रकम की वसूली

कोलकाता के एक निजी स्कूल की एलकेजी कक्षा की सालाना फीस लगभग 2 लाख रुपए है. तकरीबन ऐसा ही हाल हाईफाई कहे जाने वाले अंगरेजी माध्यम स्कूलों का हर शहर में है. इतनी महंगी फीस ले कर भला ये स्कूल बच्चों को कौन सा ज्ञान का खजाना मुहैया करा रहे हैं, पता नहीं. हां, इतना जरूर है कि ऐसे स्कूलों में ज्ञान कम, ढोंग ज्यादा परोसा जाता है. फिर भी महंगी फीस वाले स्कूलों की तादाद बढ़ी है, लोगों में इन का क्रेज बढ़ा है. साथ ही, बढ़ा है बच्चों द्वारा मातापिता से किया जा रहा गैरजिम्मेदाराना व्यवहार और बच्चों में डिप्रैशन.

शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर यह लूट अब आम है. इस पर गौर करने वाला कोई नहीं है. सरकार इसे सरप्लस के रूप में देखती है और मातापिता नई उम्मीद के रूप में. पैसे वाले पेरैंट्स इस बात से खुश हैं कि उन का बच्चा हाईफाई स्कूल में पढ़ रहा है जबकि कम आमदनी वाले मातापिता इस बात को ले कर फिक्रमंद हैं कि उन का बच्चा हाईफाई स्कूल में नहीं पढ़ पा रहा है. सारे पेरैंट्स अपनी सोच में गुम हैं. कोई बच्चों के बारे में सोच ही नहीं रहा कि वे पढ़ क्या रहे हैं, किसलिए और क्यों पढ़ रहे हैं?

पैसा नहीं अच्छी शिक्षा की गारंटी

अच्छी शिक्षा का पैमाना मोटी रकम नहीं है. जब कोई बच्चा नर्सरी कक्षा में पढ़ रहा होता है तो उसे जितनी ज्ञान की जरूरत होती है, उतना ही दिया जाना चाहिए. चाहे वह कम सुविधा दे कर हो या ज्यादा. अगर नर्सरी के बच्चों पर गैरजरूरी दबाव बना रहे हैं तो वह विकास तो नहीं करेगा, डिप्रैशन में जरूर चला जाएगा. आजकल के ज्यादातर हाईफाई स्कूल यही काम कर रहे हैं. रही बात इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधा की, तब भी इस तरह से पैसा वसूली कहीं से भी जायज नहीं.

आज निजी विद्यालयों में पढ़ रहा तकरीबन हर छात्र होम ट्यूशन भी पढ़ता है. अगर पेरैंट्स के 2-3 बच्चे हैं और वे उन को इन स्कूलों में शिक्षा देना चाहते हैं तो वे या तो बच्चों को पढ़ा पाएंगे या फिर खानेपीने तथा दूसरी चीजों की व्यवस्था ही कर पाएंगे. आम परिवार के लिए ऐसे स्कूल बने ही नहीं हैं. यानी कि ये स्कूल साफतौर पर समाज को अमीर और गरीब की शिक्षा का फर्क समझा रहे हैं और शिक्षा के नाम पर समाज में ऊंचनीच का भाव पैदा कर रहे हैं. ऐसे स्कूल यह दर्शा रहे हैं कि अच्छी गुणवत्ता से लबरेज शिक्षा सिर्फ महंगे विद्यालयों में मुहैया है. वे इस बात को भी ठोकपीट कर बता रहे हैं कि हाईफाई अंगरेजी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा ही जीवन में सफल हो सकता है.

सोचें, क्या आज के प्राइवेट स्कूल इस लायक नहीं हैं कि वे छात्रों को बेहतर व समझदार इंसान बना सकें?

रोजगारपरक हो शिक्षा

शिक्षा कारगर तभी है जब वह अच्छी नौकरी दिलवाने में सफल हो. भविष्य में किसी अच्छे संस्थान में नौकरी मिल जाएगी, यही सोच कर सभी पेरैंट्स अपने बच्चों पर हैसियत से ज्यादा खर्च करते हैं. पैसों को प्राथमिकता देने के चक्कर में वे ये भूल जाते हैं कि बच्चों की अपनी जिंदगी भी होती है. सिर्फ पैसा कमाना ही सबकुछ नहीं होता. स्कूल और ट्यूशन के बीच पढ़ाई के बोझ तले दबे रहने वाले बच्चों का भविष्य में क्या और कैसा स्वरूप होगा, इस विषय पर आमतौर पर पेरैंट्स गौर नहीं करते.

हाईफाई स्कूलों में 12 घंटे की पढ़ाई के बाद भी घर में ट्यूशन की पढ़ाई और त्योहारों में प्रोजैक्ट्स बनाने में ही बीत जाता है बच्चों का पूरा वक्त और आधी जिंदगी. बच्चों के साथ उन के मातापिता का जीवन भी उन के प्रोजैक्ट्स और होम वर्क करवाते बीत जाता है और छूट जाते हैं कई महत्त्वपूर्ण त्योहार, परिवार और बेशकीमती पल.

ए, बी, सी, डी या 1, 2, 3, 4 जैसी चीजें ही प्राइमरी लैवल पर बच्चों को सिखाई जा सकती हैं, चाहे वह कोई सस्ता सरकारी स्कूल हो या निजी महंगा विद्यालय. आजकल जरूरत से ज्यादा सुविधाएं भी बच्चों को बिगाड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही हैं. तभी तो आजकल वैज्ञानिक बनने वाले विद्यार्थी भी मौलिक शोध में पीछे हैं. तभी तो भारत को सी वी रमन के बाद से कोई नोबेल पुरस्कार इस क्षेत्र में अब तक नहीं मिल सका है.

एकसमान हो फीस

एक तरह की शिक्षा के लिए फीस का स्तर भी एकसा होना चाहिए. जबकि हकीकत यह है कि हर तरह के प्राइवेट स्कूलों ने अपने हिसाब से फीस के नियम बना रखे हैं. प्राइवेट और सरकारी विद्यालयों की फीस में इतना भारी अंतर न सिर्फ भेदभाव व असमानता प्रदर्शित करता है बल्कि इस से यह जाहिर भी होता है कि शिक्षा कारोबार बन चुकी है. सुविधा के अनुसार शिक्षा बेची जा रही है. ऐसे स्कूलों का मकसद बच्चों के चहुंमुखी विकास के नाम पर पैसा कमाना है.

एक कर, एक चुनाव की बात तो की जा रही है लेकिन एक ही तरह की शिक्षा और एक ही तरह की फीस की बात नहीं की जाती. जब हर तरह का बच्चा एक कक्षा में पढ़ सकता है बिना भेदभाव के, तो फीस भी ऐसी होनी चाहिए जिसे हर मातापिता अदा करने में सक्षम हो. या फिर शिक्षा मुफ्त हो वरना समानता की बात करनी बेमानी होगी.

हर जगह के बोर्ड अलग हैं, गुणवत्ता अलग है और फीस भी अलग है. जब शिक्षा में ही इस तरह की असमानता है तो बाकी जगहों का हाल भी वही बन जाता है. शिक्षा पर काले बादल मंडरा रहे हैं. बच्चों को ज्ञान की जगह पैसे कमाने वाली मशीन बनने की ट्रेनिंग दी जा रही है.

शिक्षकों को मिले पर्याप्त वेतन

दिक्कत यह भी है कि हाईफाई स्कूलों में भी शिक्षकों को कम सैलरी मिलती है. जिस में वे मुश्किल से अपना जीवनयापन कर पाते हैं. ज्यादातर हाईफाई स्कूलों के शिक्षकों का भी यही हाल है. जब तक रोजीरोटी की सही व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक कोई इंसान विकास या उत्थान की बात नहीं सोच पाता. ऐसे में जब तक शिक्षकों के हालात नहीं सुधरते तब तक छात्रों का भी हाल सही नहीं रहने वाला. इतनी ज्यादा फीस भर पाना हर पेरैंट्स के बस की बात नहीं है. सरकारी नौकरी वाले या कालाधन जमा करने वाले हाईफाई लोग ही ऐसी फीस का भार वहन कर सकते हैं. आम पेरैंट्स अगर एक बच्चे के प्राइमरी स्तर पर इतना खर्च करने लगे तो उन्हें दोवक्त की रोटी के बारे में सोचना पड़ सकता है.

ऐसे में ये स्कूल सिर्फ पैसे वाले लोगों के लिए हैं जो आम लोगों में असंतोष का भाव पैदा कर रहे हैं और उन पेरैंट्स पर ज्यादा पैसे कमाने के लिए गैरजरूरी दबाव भी बना रहे हैं. ज्ञान के नाम पर पैसों को आधार बना कर इस तरह का भेदभाव बंद होना चाहिए. साथ ही, फीस ऐसी हो जो एक साधारण तबका भी वहन कर सके. शिक्षा के बाजारीकरण को रोका जाना चाहिए.

सरकार को तथा सभी पेरैंट्स को इस पर गौर कर हल निकालना होगा. सभी राज्यों को फीस रैगुलेटिंग अथौरिटी पर विचार करना चाहिए, जिस से शिक्षा में फीस की मनमानी रुक सके और कम से कम शिक्षा में तो समानता लाई जा सके, यहां तो भेदभाव रुके और सभी विद्यार्थियों को समान अवसर मिले चाहे गरीब हो या अमीर.

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