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मौब लिंचिंग बेमकसद नहीं : क्या इन के पीछे छिपे हैं सियासी स्वार्थ

लोग 4 साल पहले तक मौब लिंचिंग शब्द से अनजान थे, लेकिन अब सवा सौ करोड़ देशवासी जान गए हैं कि मौब लिंचिंग के माने होते हैं बेकाबू भीड़ द्वारा किसी को पीटना या पीटपीट कर उस की हत्या कर देना. यह महज इत्तफाक नहीं है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आते ही मौब लिंचिंग के हादसे बढे़, बल्कि आंकड़े और हादसे दोनों यह गवाही भी देते हैं कि मौब लिंचिंग हमेशा बेमकसद नहीं होती, उस के अपने अलग माने, मंशा और मकसद होते हैं.

मौब लिंचिंग पर 22 जुलाई को एक बार फिर बहस और चर्चा गरमा गई जब राजस्थान के अलवर शहर के नजदीक रामगढ़ गांव में भीड़ ने रकबर उर्फ अकबर खान नाम के एक मुसलिम नौजवान की हत्या कर दी. रकबर का कुसूर इतनाभर नहीं था कि वह मुसलमान था बल्कि यह भी था कि हादसे की रात वह गाय ले कर आ रहा था. इस पर गौरक्षकों की भीड़ ने उसे गौ तस्कर मान लिया और सजा दे कर इंसाफ भी कर दिया.

हादसा नहीं साजिश

21 जुलाई की देररात रकबर खान असलम खान के साथ गाय खरीद कर अलवर वापस लौट रहा था. 28 वर्षीय यह नौजवान मेहनतमजदूरी कर अपने घर के 11 लोगों का पेट पाल रहा था. अलवर के कोलगांव के इस मेहनती बाश्ंिदे के ख्वाब वैसे ही थे जैसे आम नौजवानों के होते हैं कि घर की सहूलियतों व सुख के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाए जाएं. कभीकभार रकबर दूध भी बेचता था. यह धंधा उसे मुनाफेदार लगा तो उस ने गाय पालने की सोची.

रकबर सालों से बचत कर पैसे इकट्ठा कर रहा था जिस से एक अच्छी सी गाय खरीद सके. जब उस के पास 50 हजार रुपए जमा हो गए तो वह गाय खरीदने चला गया और उस ने अच्छी नस्ल की 2 गाएं खरीद लीं.

खानपुर से कोलपुर के लिए वह पैदल ही चल पड़ा, मकसद था, किराए के पैसे बचाना और गाय ले कर आना. अलवर के नजदीक जाने कहां से गौरक्षकों की भीड़ आ गई और उन्होंने उसे पीटना शुरू कर दिया. रकबर बेचारा मरते दम तक नहीं समझ पाया कि आखिर उसे किस जुर्म की सजा, इंडियन पीनल कोड की किस धारा के तहत मिली, जिस में न कोई चार्जशीट थी, न गवाह थे, न सुबूत थे. थी तो बस, मौत.

रकबर खान की मौत पर हल्ला मचा, तो रोज नएनए चौंकाने वाले खुलासे सामने आने लगे जिन में से पहला था कि उस की मौत गौरक्षकों की पिटाई से नहीं, बल्कि पुलिस की लापरवाही से पुलिस  हिरासत में हुई. राजस्थान के तेजतर्रार गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने घटनास्थल का दौरा करने के बाद कहा कि रकबर की मौत मौब लिंचिंग से नहीं, बल्कि पुलिस कस्टडी में हुई.

गुलाबचंद कटारिया ने खुलेतौर पर माना कि पुलिस वाले पहले गाय को गौशाला ले गए, लेकिन उन्होंने जख्मी रकबर को तवज्जुह नहीं दी, जो सरासर गलत है. रकबर की पोस्टमौर्टम रिपोर्ट से उजागर हुआ कि उस की मौत पिटाई से ही हुई है. उस के जिस्म पर चोटों के दर्जनभर निशान थे.

रकबर की मौत कई शक और सस्पैंस पैदा कर रही है या उन्हें दूर कर रही है, यह समझना अब कोई मुश्किल काम नहीं है. मसलन, सारा ठीकरा पुलिस के सिर फोड़ा जा रहा है. हालांकि वह पूरी तरह गलत नहीं है. इस हादसे की खबर पुलिस को रात पौने एक बजे के करीब लगी थी, लेकिन सुबह 4 बजे उस ने रकबर को अस्पताल पहुंचाया. इस दौरान पुलिस वालों ने रास्ते में चाय की चुस्कियां भी ली थीं.

अस्पताल पहुंचाने से पहले पुलिस ने रकबर को नहलाया था, क्योंकि वह पूरी तरह कीचड़ में सना हुआ था. ऐसी हालत में पुलिस उसे भला अपनी गाड़ी में कैसे ले जाती, उस के गंदा होने का अंदेशा था यानी तकरीबन 3 घंटे पुलिस रकबर को यहां से वहां घुमाती रही और पहले गायों को गौशाला पहुंचाया गया.

अगर रकबर की मौत पर हल्ला नहीं मचता, तो गौरक्षकों और हिंदूवादियों की मंशा अधूरी रह जाती. मंशा यह थी कि कैसे गौतस्करी के नाम पर इस हत्या से दहशत फैलाई जाए. नवल किशोर शर्मा नाम के शख्स ने पुलिस को रकबर की पिटाई की खबर दी थी. नवल किशोर के बारे में दिलचस्प बात यह है कि वह विश्व हिंदू परिषद का कार्यकर्ता है. इसी नवल किशोर शर्मा ने रकबर की एक तसवीर सोशल मीडिया पर शेयर की थी.

पुराने जमाने के जासूसी उपन्यासों में भी इतने पेच नहीं होते थे जितने इस हत्याकांड में दिखे. मसलन, नवल किशोर शर्मा जैसे हिंदूवादी क्या इतनी रात गए गौरक्षा के लिए गश्त लगाते हैं और गौ तस्करों से इतनी हमदर्दी रखते हैं कि उन की हिफाजत के लिए पुलिस को खबर दें और उस के फोटो खींच कर वायरल भी करें.

बाद की लीपापोती सियासी खानापूर्ति भर थी जिस के तहत कुछ पुलिस वालों को सस्पैंड किया गया और 3 लोगों धर्मेंद्र यादव, परमजीत सिंह व नरेशचंद को आरोपी बनाया गया. इन तीनों की उम्र 26 साल के लगभग है.

अब तक देशभर में रकबर की मौत पर जम कर हल्ला मच चुका था. संसद के अंदरबाहर नेताओं ने इस पर बयानबाजी की. इसी बहस और बयानबाजी के बीच पहली दफा यह बात आम लोगों को समझ आई कि मौब लिंचिंग के लिए कोई अलग से धारा कानून में नहीं है. सरकार इस पर सोचविचार कर रही है कि क्या किया जाए.

बढ़ावा देती बयानबाजी

रकबर की मौत के बाद शुरू हुई नेताओं की बयानबाजी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा तो कांग्रेस के ही एक सीनियर नेता शशि थरूर ने कहा कि इस देश में मुसलमान होने से बेहतर है गाय होना.

इस तंत्र पर भाजपाई नेता इतने तिलमिलाए कि उन्होंने ऐसे बयान दे डाले जिन की उम्मीद सभी को थी, लेकिन इंतजार रकबर की मौत के  बाद जा कर खत्म हुआ. दो टूक कहें तो आज जबां पर  दिल की बात आ गई जैसी थी.

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो मौब लिंचिंग के लिए सरकार कानून बनाएगी या फिर मौजूद कानून में बदलाव करेगी, लेकिन अगले ही लफ्जों में उन की मंशा उजागर हो गई जब उन्होंने यह भी कह डाला कि देश की सब से बड़ी मौब लिंचिंग तो 1984 में हुई थी. 1984 यानी हिंदूसिख हिंसा जो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई थी.

बात रकबर की मौत के बाद कानून और सरकार की भूमिका की हो रही थी लेकिन सधे और पके नेता राजनाथ सिंह 34 साल पहले के दौर में पहुंच गए. यह सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती मौब लिंचिंग का हल तो कतई नहीं कहा जा सकता. मेरे घर में गंदगी तो मेरे घर की गंदगी पर एतराज क्यों, जैसी इन बातों से अगर देश चलना है तो मुसलमानों और दलितों को हर कभी हर कहीं गौरक्षा के नाम पर मरने (शहीद होने नहीं) के लिए तैयार रहना चाहिए.

राजनाथ सिंह का यह कहना भी मुद्दे की बात से ध्यान भटकाना जैसा था कि कश्मीर में सैनिकों पर हमला करने वालों के समर्थन में जश्न मनाया जाता है और संसद पर हमला करने वालों के लिए हमदर्दी जताई जाती है.

राजनाथ सिंह से एक कदम आगे चलते हुए केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने यह कहते हिंदूवादियों की तबीयत हरी कर दी कि हर घटना को मौब लिंचिंग से जोड़ने वाले राजनेताओं में अगर हिम्मत है तो वे कश्मीर में होने वाली पत्थरबाजी को भी मौब लिंचिंग कहें. फिर उन्होंने भी हिंसा की निंदा की और कानून बनाने की बात भी कही.

कभी ओलिंपिक में निशानेबाजी में पदक जीतने वाले राज्यवर्धन सिंह ने सीधेसीधे उन पत्थरबाजों पर निशाना साधा जो आमतौर पर नहीं, बल्कि शर्तिया मुसलमान होते हैं. पर यह उन्होंने नहीं बताया कि उस के माने क्या, क्या कश्मीर के हिंदुओं यानी कश्मीरी पंडितों का बदला राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सहित पूरे देश के मुसलमानों से लिया जाना जायज है उसी तरह जैसे 2002 में गुजरात में मुसलमानों की हत्याओं से लिया गया था.

भाजपा की ही एक और सांसद मीनाक्षी लेखी ने तो अपने हिंदूवादी तेवर दिखाते यह तक कह डाला कि मौब लिंचिंग पर बहस करने वाले बताएं कि अयोध्या में कारसेवकों को नरसंहार मौब लिंचिंग क्यों नहीं थी. गोधरा में साबरमती ऐक्सप्रैस में जिंदा जलाए गए रामभक्तों की घटना मौब लिंचिंग क्यों नहीं थी.

एक तरह से मीनाक्षी ने और करोड़ों हिंदुओं के जज्बातों को भड़काने का ही काम किया है कि चूंकि  मुगलकाल में हिंदुओं पर कहर ढाए गए थे, कांग्रेस के शासनकाल में रामभक्तों को मारा गया था इसलिए आज रकबर खान को गौभक्तों द्वारा पीटपीट कर मारा जाना गुनाह नहीं, बल्कि इंसाफ और फख्र की बात है. सरकार में मौजूद ये नेता लोकतंत्र की नहीं, जंगलराज की बातें करते नजर आए जहां खून का बदला खून होता है और जिस की लाठी उस की भैंस होती है.

इस वक्त देशभर में रकबर खान जैसे लोगों की मौतों पर बहस चल रही थी. यह बहस ठंडी न पड़े और लोग इसे सिर्फ हिंदुओं के नजरिए से देखें, इस बाबत एक दिलचस्प बयान तेलंगाना के गोशामहल से भाजपा के विधायक टी राजा ने दिया जो टाइगर के नाम से मशहूर है. टी राजा का कहना था कि गाय की रक्षा के लिए लड़ा जा रहा यह युद्ध तब तक नहीं रुकेगा जब तक देश में गाय को राष्ट्रमाता का दरजा नहीं मिल जाता.

बकौल टी राजा, गाय हिंदुओं की माता होने के नाते पूजनीय भी है. सो, गौ तस्करी करना अपनेआप मौब लिंचिंग को बढ़ावा देना है. अगर यह खूनखराबा यानी लिंचिंग बंद करनी है तो गौ तस्करी रोकनी होगी और गाय को राष्ट्रमाता का दरजा देना होगा. अगर सांसद खूनखराबा नहीं  चाहते हैं तो इस मांग को संसद में उठाएं.

मुसलमान और दलित ही क्यों

भड़काऊ बयान दर्जनभर भाजपाई नेताओं ने दिए, जिस से लगता है कि मौब लिंचिंग कोई गुनाह नहीं, बल्कि एक तरह का इंसाफ है.

मौब लिंचिंग पर पहली दफा आरएसएस की तरफ से उस के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार बोले कि अगर लोग गौ मांस खाना छोड़ दें तो मौब लिंचिंग खत्म हो जाएगी. बकौल इंद्रेश कुमार, गौ मांस खाने से कुछ लोगों का दिल दुखता है, इसलिए वे मौब लिंचिंग करते हैं. शायद ही कोई बता पाए कि दिलों में दर्द 4 सालों से ही उठना क्यों शुरू हुआ और राम के जमाने यानी त्रेतायुग में भी लोग गौ मांस खाते थे जब मौब लिंचिंग क्यों नहीं होती थी. क्या सिर्फ इसलिए कि तब गौ मांस खाने वाले हिंदू थे, मुसलमान नहीं.

सरकार के पास भी मौब लिंचिंग के ठोस आंकड़े नहीं हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ऐसा क्या हो गया कि कट्टर हिंदूवादी भीड़ इंसाफ पर उतारू हो आई, वह भी सिर्फ गाय के मामले में.

इंडिया स्पेंड नाम के एक वैबपोर्टल के मुताबिक, साल 2010 से ले कर जून 2017 तक गाय से जुड़े मुद्दों पर मौब लिंचिंग की 60 वारदातें हुईं, जिन में 25 लोग मारे गए. मरने वालों में 20 मुसलमान और 5 दलित थे यानी ऊंची जाति वाला कभी मौब लिंचिंग का शिकार नहीं हुआ. इस पोर्टल के मुताबिक ही जो 60 वारदातें हुईं उन में से 58 भाजपा के कार्यकाल में हुईं.

इसी दौरान गाय को ले कर मौब लिंचिंग के 21 बर्बर हादसों में सभी मुसलमान या दलित थे. पहला चर्चित मामला भी अलवर का ही है जिस में 5 अप्रैल, 2017 को पहलू खान नाम के शख्स की मौत हो गई थी. 1 अप्रैल, 2017 को अलवर के बहरोड़ में गौरक्षकों ने गौ तस्करी के शक में 6 वाहनों को रोका था और उन पर सवार लोगों की जम कर धुनाई की थी. पहलू खान हरियाणा के नूंह के जयसिंहपुर का बाश्ंिदा था.

दूसरा चर्चित हादसा भी अलवर का ही है जिस में 9 नवंबर, 2017 की रात गौरक्षकों ने गोविंदगढ़ थाने के इलाके में गाय तस्करी के शक में उमर खान नाम के शख्स को खूब पीटा और बाद में उसे गोली मार दी थी. फिर उस की लाश रेल की पटरियों पर फेंक दी गई थी.

इस से पहले 22 जून, 2017 को जुनैद खान नाम के नौजवान को दिल्ली के नजदीक हरियाणा के वल्लभगढ़ में भीड़ ने पीटपीट कर मार डाला था. इस फसाद की जड़ में दिल्ली से मथुरा जा रही शटल ट्रेन में बैठने को ले कर विवाद था. बाद में हवा उड़ी कि जुनैद गौ तस्कर था. पुलिस ने जिन 5 नौजवानों को आरोपी बनवाया, वे सभी हिंदू थे.

इस से पहले अखलाक की मौत भी सुर्खियों में रही थी. ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश) के बिसाहड़ा गांव के इस बाश्ंिदे को घर में गौ मांस रखने के शक में पीटपीट कर मारा गया था. इस से इतनी दशहत फैली थी कि बिसाहड़ा के दर्जनभर मुसलमान परिवार गांव छोड़ कर चले गए थे.

देश के 12 राज्यों में हुई इस तरह की वारदातों में अधिकतर मरने वाले दलित या मुलसमान ही थे. इस से लगता है महज 4 वर्षों में गाय को ले कर कट्टर हिंदूवादियों में इतनी जागरूकता आ गई है कि इन तबकों के लोगों को चुनचुन कर मारा जा रहा है जिस का असल मकसद इन्हें दबाना और इन में दहशत फैलाए रखना है.

जवाब साफ है कि देश के बहुसंख्यक हिंदू बेकाबू हो चले हैं और उन्हें हिंदूवादी संगठनों व भाजपा की शह भी मिली हुई है जो नेताओं के बयानों से समझ भी आती है.

दहशत है मकसद

रकबर की मौत के बाद का ड्रामा अब सब के सामने है कि कट्टरवादियों का असल मकसद दशहत बनाए रखना है. इस बाबत खुद विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों के लोग किसी को मारने से पहले उस के फोटो खींचते हैं, उन्हें वायरल करते हैं ताकि बवाल मचे.

इसी बवाल से हिंदूवादी संगठनों खासतौर से आरएसएस की बादशाहत और पूछपरख कायम रहती है, जिस ने देश को हिंदू राष्ट्र घोषित करवाने का ठेका ले रखा है. आरएसएस की तरफ से मौब लिंचिंग पर कभी कोई बयान क्यों नहीं आता, यह बात भी काबिलेगौर है.

सैंटर फौर स्टडी औफ सोसाइटी ऐंड सैक्युलरिज्म (सीएसएसएस) की इस बाबत एक रिपोर्ट काबिलेगौर है जिस में कहा गया है कि साल 2014 से यानी केंद्र में भाजपा की सत्ता आने के बाद से देश में कोई भी बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ है, उलटे इस में कमी आई है.

पर यह कोई ताली बजा कर खुश होने वाली बात नहीं है, क्योंकि इसी रिपोर्ट में इस हकीकत का खुलासा करते यह भी कहा गया है कि समाज में सांप्रदायिक सोच का बोलबाला बढ़ा है और इस की बड़ी वजह सत्ताधारी दल यानी भाजपा नेताओं के नफरत फैलाने वाले बयान हैं. इन में से जाहिर है अधिकांश नेताओं का सीधा नाता आरएसएस से है. अब दंगों की जगह मौब लिंचिंग लेती जा रही है.

चिंता का विषय

मौब लिंचिंग पर बहुत कम काम हुआ, लेकिन इस मसले पर मशहूर अमेरिकी लेखक पौल ब्रास के खयालात काबिलेगौर हैं और मौजूदा हालत में खरे भी उतरते हैं. अपनी एक किताब ‘द प्रोडक्शन औफ हिंदूमुसलिम वायलैंस इन कंटैंपररी इंडिया’ में पौल ब्रास ने लिखा है कि संस्थागत दंगा प्रणाली यानी साजिशपूर्वक दंगे माकूल राजनीतिक हालात में करवाए जाते हैं, इस के लिए रोजाना के मामूली झगड़ों को सांप्रदायिक रंग दे कर उन्हें बड़ा किया जाता है.

बकौल पौल ब्रास, सांप्रदायिक दंगों (विवादों) से हमेशा उस पार्टी को फायदा होता है जो समाज के बहुसंख्यक तबके की अगुआई या रहनुमाई करने का दावा करती है. जैसे, आजादी के बाद हिंदू महासभा, फिर जनसंघ और अब भाजपा कर रही है. भाजपा नेताओं को यह कहने में कभी कोई गुरेज नहीं हुआ कि वह हिंदुओं की पार्टी है.

अब चूंकि हिंदुओं की पार्टी सत्ता में है, इसलिए उन्हें बड़े दंगे करवाने की जरूरत नहीं रह गई है. वे अपना मकसद नफरत फैलाने वाले भाषणों और दुष्प्रचार से हासिलकर रहे हैं.

नफरत बढ़ाने, अफवाहों का सहारा लेने की जरूरत किसे है, इस सवाल का जवाब बेहद साफ है कि भाजपा और आरएसएस को, जिन के करताधरता देवीदेवताओं की तरह मंदमंद मुसकराते हुए तमाशा देखा करते हैं. एक कहावत है कि भीड़ बेवकूफों की होती है जो पलभर में हर उस शख्स के खून की प्यासी हो जाती है जिस से उस का कोई सीधा वास्ता नहीं होता.

अब साल 2019 के चुनाव यह तय करेंगे कि देश के लोग दरअसल क्या सोच रहे हैं. जिन वजहों के चलते उन्होंने कांग्रेस को 2014 में खारिज किया था वे नई शक्ल में सामने आ रही हैं. भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी ज्यों की ज्यों हैं. देश में अमनचैन का नामोनिशान नहीं है. महिलाओं का तो दूर, छोटी बच्चियों तक का बलात्कार इफरात से हो रहा है. मुसलमानों और दलितों को दबा दिया गया है फिर भले ही इस के लिए सैकड़ों पहलू खान, उमर और रकबर खानों को मौब लिंचिंग के जरिए मारना पड़े.

खुद को श्रेष्ठ समझने वाले ये हिंदू अभी यह नहीं सोच पा रहे हैं कि इस कट्टरवादी सोच से वे खुद ही दोफाड़ हो रहे हैं. पिछड़े व दलित अब खुद को हिंदू कहलवाने में हिचकिचाने लगे हैं क्योंकि उन पर अब पहले से ज्यादा अत्याचार हो रहे हैं. जब यह भीड़ इन्हीं हिंदुओं की तरफ मुड़ने लगेगी तब इन का भगवान कैसे इन्हें बचाएगा, यह सोचने वाला कोई नहीं.

इस बात को मौब लिंचिंग से ही समझा जा सकता है कि अब इंसाफ पर उतारू हो आई हिंसक होती भीड़ मुसलमानों और दलितों के अलावा दूसरों को भी मारने लगी है. गाय के बाद अब बच्चाचोर गिरोह के लोग मारे जा रहे हैं जो सभी मुसलमान या दलित नहीं हैं.

सरकार की चिंता यही बात है, इसलिए वह अब संजीदा हो कर कमेटियां बना कर कानून वजूद में ला रही है कि कहीं ऐसा न हो कि कल को जेबकतरों और कौलगर्ल्स को भी भीड़ पीटपीट कर मारने लगे. वे सभी तो मुसलमान या दलित नहीं होते, यानी इंसाफ सिर्फ  बीफ और गौ तस्करी तक सिमटा रहता, तो ही काम का था.

पैसे का फेर : इन धांधलियों से क्या सबक सीखेगी जनता

पोटली में गहने रखो, 2 घंटे में दोगुने हो जाएंगे, इस फरेब का अरसे से कम पढ़ीलिखी महिलाएं शिकार होती रही हैं. अब कंप्यूटरसैवी और खुद को बहुत होशियार समझने वाले, जमाने पर पकड़ रखने का दावा करने वाले भी फरेबियों के शिकार हो रहे हैं. आप के पैसों को जल्द ही 2-3 गुना करने वाले मिल ही जाते हैं. रिपल कौइन खरीद कर बिटकौइन की तरह फायदा कमाने का लालच देने वाली एक वैबसाइट ने 200 लोगों के 100 करोड़ रुपए ठग लिए.

नवंबर 2017 में शुरू हुई वैबसाइट पर इस इंटरनैशनल कौइन का व्यापार शुरू हुआ और लोगों ने टैस्ट करने के लिए शुरुआत में अपनी छोटी रकमों को निवेश किया. बदले में अच्छा रिटर्न मिलने पर लोग धड़ाधड़ पैसा लगाने लगे और कुछ ने तो 50 से 80 लाख रुपए तक लगा दिए.

जैसा स्वाभाविक है, शुरू में कुछ लोगों को फायदा हुआ पर बाद में अचानक वैबसाइट बंद हो गई और कर्ताधर्ता गायब हो गए. अनुमान है कि लोगों को 100 करोड़ रुपए की चपत तो लग ही गई. यह रकम शायद काली नहीं थी यानी ब्लैक मनी नहीं थी क्योंकि बैंक द्वारा ट्रांजैक्शंस बाकायदा अकाउंट नंबर दे कर किए गए.

तुरंत पैसा कमाने की पौंजी स्कीमें दुनियाभर में चलती रहती हैं. शुरू में कुछ को मोटा कमाने का लालच दिया जाता है और फिर जमा हो रहे पैसों से कुछ को मोटा लाभ भी दे दिया जाता है. वहीं, कुछ को टरका दिया जाता है. कुछ हालात में यह व्यापार वर्षों चल जाता है. इस से हवाई जहाज, अखबार, होटल, स्कूल तक बना लिए जाते हैं. ऐसी स्कीमों में कुछ का काला कुछ का सफेद धन लगता है. उन में से कुछ को फायदा दे दिया जाता है और बहुतों को लूट लिया जाता है.

इस मामले में कानून, पुलिस और अदालतें कुछ ज्यादा नहीं कर सकतीं. सुप्रीम कोर्ट ने सहारा के सुब्रत राय को डेढ़ साल तक बंद रखा पर न पैसे मिले और न रहस्य खुला कि किनकिन का पैसा गायब हुआ. पैसा आया जोकि कमाया नहीं गया, यह मालूम होते हुए भी अपराध साबित न हो सका.

देशभर में ऐसा व्यापार जम कर चल रहा है, क्योंकि यहां तो धारणा ही यह है कि पैसा मेहनत से नहीं, पूजापाठ से बनता है. यहां बौलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन और सब से बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी तक मंदिरों की यात्राएं विधिवत, नियमित करते हैं. लोगों को यह लगता नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि लक्ष्मी तो पूजा से प्राप्त होती है. रिपल कौइन में पैसा लगाना और गंवाना इसी का ही नतीजा है. देश में भविष्य में कुछ बदलेगा और लोग इन धांधलियों से सबक सीखेंगे, यह भूल जाइए.

भूल गए हैं फोन का पासवर्ड तो सिर्फ 10 सेकेंड में ऐसे करें अनलौक

हम अपने फोन की सुरक्षा के लिए उसके होम स्क्रीन पर पासवर्ड का इस्तेमाल करते हैं. आजकल फेस अनलौक का भी इस्तेमाल खूब हो रहा है. एक्सपर्ट का मानना है कि पिन या पैटर्न दोनों पासवर्ड कठिन होना चाहिए ताकि कोई आपके फोन को आसानी से अनलौक ना कर सके. ऐसे में हो सकता है कि हम फोन का पासवर्ड भूल भी जाए, ऐसे में फोन को अनलौक करने में काफी समस्या आ सकती है. तो चलिए आज हम आपको लौक एंड्रायड स्मार्टफोन को अनलौक करने का तरीका बताते हैं.

सबसे पहले किसी दूसरे फोन या कंप्यूटर से https://myaccount.google.com/find-your-phone-guide यूआरएल टाइप करें और फिर ओके करें. इसके बाद अपनी उस जीमेल अकाउंट से लौगिन करें तो आपके उस फोन में है जिसका आप लौक खोलना चाहते हैं.

लौगिन करने के बाद आपके उन सभी स्मार्टफोन की लिस्ट मिल जाएगी जिनमें आपका जीमेल अकाउंट लौगिन है. इसके बाद उस फोन को सेलेक्ट करें जिसे आप अनलौक करना चाहते हैं या लौक खोलना चाहते हैं.

अब आपकी स्क्रीन पर लौक योर फोन का विकल्प मिलेगा. उस पर क्लिक करें और अब नया पासवर्ड पिन या पैटर्न के रूप में डालें. इसके बाद आपके स्मार्टफोन की होम स्क्रीन का पासवर्ड बदल जाएगा और आपका फोन अनलौक हो जाएगा. हालांकि इस तरीके के लिए जिस फोन को अनलौक करना है उसमें इंटरनेट का कनेक्शन होना जरूरी है.

दूसरा तरीका गूगल असिस्टेंट की मदद से है. अगर आपने अपना गूगल असिस्टेंट पहले से सेट किया है और अपनी वायस रिकौर्ड की है और साथ ही ‘Unlock with voice’ के विकल्प पर क्लिक किया है तो आप सिर्फ ‘Ok Google’ कहकर अपना स्मार्टफोन अनलौक कर सकते हैं.

बैन कर दिया सेरेना विलियम्स का काला सूट, सेक्सिज्म बनी वजह?

क्या काले को कमतर मानना ठीक है? क्या काला बुरा है? क्या काली महिलाओं की बौडी को दूसरी नजरों से नहीं देखा जाता? ये सवाल पुराने हैं, लेकिन एक बार फिर बहस के केंद्र में हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि जानी मानी अमेरिकी टेनिस खिलाड़ी सेरेना विलियम्स के काले सूट को फ्रेंच ओपन में पहनने से बैन कर दिया गया है. फ्रेंच टेनिस फेडरेशन ने ये फैसला लिया है क्योंकि उन्हें लगता था कि इस सूट से खेल का असम्मान हो रहा है.

सेरेना को ग्लोबल हीरोइन माना जाता है. उन्होंने न सिर्फ टेनिस में शानदार प्रदर्शन किया है, बल्कि सेक्सिजम और रेसिजम के खिलाफ भी लड़ती रही हैं. बताया जा रहा है कि सेरेना ने अपने इस सूट को मेडिकल वजहों से तैयार करवाया था. ब्लड क्लाट की समस्या से उन्हें इस सूट ने राहत दिलाई थी. सेरेना ने यह भी कहा था कि ये कैटसूट पहनने पर उन्हें सुपरहीरो जैसा महसूस होता है.

अमेरिका में महिला अधिकारों पर काम कर रहे सिमन हेडलिन ने लिखा- एन्ने व्हाइट ने 1985 में कैटसूट पहना था, सेरेना 2019 में नहीं पहन सकती. एक्ट्रेस एलिजाबेथ बैंक्स ने लिखा कि पुरुष महिलाओं को कंट्रोल करना चाहते हैं, यह उसी का नमूना है. सेरेना महान हैं. प्रोड्यूसर तारीक नसीद ने लिखा-  ड्रेसकोड के नाम पर यह रेसिजम का एक मामला है.

कई आलोचकों ने इस मुद्दे पर लेख लिखे हैं और कहा है कि प्रोफेशनल टेनिस के इतिहास में पुरुषों और गोरों का बोलबाला रहा है. और जब सेरेना ने अपनी ब्लैक, फीमेल बौडी के साथ शानदार प्रदर्शन किया तो बहुत लोगों को यह नागवार गुजरा. और नया बैन उसी की एक कड़ी है.

इस सूट को तैयार करने वाली कंपनी नाइक ने ट्वीट करके कहा- आप एक सुपरहीरो को उसके कौस्ट्यूम से बाहर कर सकते हैं, लेकिन उसकी सुपरपावर को नहीं छीन सकते.

इन 6 कारोबार से घर बैठे महिलाएं करें मोटी कमाई

क्या आप भी खुद को आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं, अगर हां तो ये खबर हम खास आपके लिए ही लेकर आएं हैं. आज के इस खबर में महिला उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिए हम बता रहे हैं कुछ लोकप्रिय बिजनेस आइडियाज. जिन्हें महिलाएं काफी आराम से कर सकती हैं और साथ ही इन बिजनेस से उन्हें अच्छी कमाई भी हो सकती है.

फैशन डिजाइनिंग: फैशन, कपड़े और गहने महिलाओं की पसंदीदा चीजें हैं, जिनमें बिजनेस करना महिलाओं को पसंद है और इन सेक्टर में इन्वेस्टमेंट भी कम चाहिए होता है. आप अकेले ही अपना बिजनेस शुरू कर सकती हैं अपने दोस्तों को अपनी चीजें खरीदने के लिए कह सकती हैं और साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफार्म और ई-कौमर्स पोर्टल्स का इस्तेमाल भी कमाई के लिए कर सकती हैं.

ट्यूशन और शिक्षा: हमारे देश में शिक्षा सेे संबंधित सेवाओं की काफी जरूरत है. इसी वजह से इस बिजनेस को उभरता हुआ बिजनेस माना जाता है. अब महिलाएं विडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए कहीं भी रह कर स्टूडेंट्स को पढ़ा सकती हैं. औनलाइन टीचिंग एक ऐसा सेक्टर है जो काफी उभर चुका है और इसके जरिए अच्छी कमाई भी की जा सकती है.

कंसल्टिंग: शहरी क्षेत्रों में महिलाएं शिक्षा के मामले में प्रतिद्वंद्वी पुरुषों को कड़ी टक्कर दे रही हैं. पढ़ी-लिखी महिलाएं कंसल्टिंग का बिजनेस शुरू कर सकती हैं, वे अपने पसंदीदा फील्ड की जानकारी दूसरों के साथ शेयर कर के उनके भविष्य को बनाने में उनकी मदद कर सकती हैं. कंसल्टेशन बिजनेस एक उभरता हुआ बिजनेस सेक्टर है जिसके बारे में कम लोगों को जानकारी है.

इवेंट मैनेजमेंट: इवेंट मैनेजमेंट एक ऐसा क्षेत्र है, जहां महिलाएं खूब पैसा कमा सकती हैं. आजकल इवेंट्स और पार्टियों का मैनेजमेंट कोई छोटा काम नहीं है, इसलिए लोग इवेंट मैनेजरों को हायर करने लगे हैं. जन्मदिन की पार्टियों, कौरपोरेट इवेंट्स, फेस्टिवल इवेंट्स आदि आयोजित करने में महिलाएं की स्किल्स की काफी सराहना की जाती है.

कुकिंग: ज्यादातर महिलाओं को खाना पकाने में रुचि होती है और खाने का कारोबार शुरू करने में उनकी काफी रुचि भी होती है. आजकल लड़कियां खाना बनाने की क्लासेज लेती हैं. महिलाएं कुकिंग क्लासेज देने के अलावा अपने खाने को बेच भी सकती हैं. वे टिफिन का बिजनेस शुरू कर सकती हैं. वह औनलाइन फूड डिलीवरी पोर्टल का यूज कर अपने खाने को बेच सकती हैं.

हेल्थ और फिटनेस: हेल्थ, फिटनेस और वैलनेस का उद्योग भारत में तेजी से बढ़ रहा है. बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता के साथ, हेल्थ स्टूडियो की मांग में भी तेजी से वृद्धि हो रही है. योग, Pilates, जुम्बा, एरोबिक्स क्लासेज लेने के लिए इंस्टिट्यूट जौइन कर रहे हैं. इस बिजनेस में इन्वेस्टमेंट काफी कम है, इसके लिए आपको इन स्किल्स में महारथी होना जरूरी है और एक बड़ा हाल जहां आप लोगों को ये सिखा सकें.

आधार को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने का औचित्य

आधार कार्ड यानी विशिष्ठ पहचानपत्र की गोपनीयता को ले कर पिछले दिनों सड़क से ले कर संसद तक खलबली मची रही. आधार की गोपनीयता के खुलासे यानी निजी जानकारी के सार्वजनिक होने का मामला लगातार आशंकित करता रहा है और राजनीतिक दल इस से जुड़ी संवेदनशीलता को ले कर बयानबाजी करते रहे हैं. इस से सभी पक्षों में स्वाभाविक तौर पर चिंता होनी लाजमी थी.

इस बीच, भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी ट्राई के प्रमुख आर एस शर्मा ने आधार के जरिए पूरी निजी जानकारी के सार्वजनिक होने का खुलासा किया. कहा गया कि आर एस शर्मा का नाम, फोन नंबर, घर का पता, जन्मतिथि आदि सबकुछ सार्वजनिक हुआ है. इस खुलासे के बाद हड़कंप मच गया. मामला संसद में उठा. सदस्यों ने चिंता जताई कि जब ट्राई प्रमुख जैसे लोगों की निजता इस तरह से सार्वजनिक हो रही है तो जनसामान्य की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है. उस खलबली के बाद विशिष्ट पहचानपत्र प्राधिकरण यानी यूआईडीएआई सामने आया और प्राधिकरण ने लोगों को सोशल मीडिया पर आधार नंबर पोस्ट नहीं करने की सलाह दी.

यूआईडीएआई का कहना है कि सोशल मीडिया पर आधार के आने से आप की निजता को खतरा हो सकता है. इसलिए इस नंबर की गोपनीयता बनाए रखें. यह महत्त्वपूर्ण सलाह है और लोगों को अपनी निजी जानकारी का इस तरह से प्रदर्शन नहीं करना चाहिए.

कुछ लोग बेवजह फेसबुक, व्हाट्सऐप आदि पर आधार के साथ अपनी फोटो पोस्ट करते हैं जैसे उन्हें पहचान के साथ ही सोशल मीडिया में आने की हिदायत दी गई हो. इस तरह का उत्साह और उस का प्रदर्शन बेवजह नहीं किया जाना चाहिए बल्कि इस से बचने की हिदायत का पालन लोगों को खुद के हित में करना चाहिए.

जैविक खेती की मुहिम में लगा एक इंजीनियर

इंजीनियर की नौकरी छोड़ कर संकेत कुमार जैविक खाद बनाने और उस के प्रति किसानों को जागरूक करने की मुहिम चला रहे हैं. उन की सलाह पर सैकड़ों किसान जैविक खाद का इस्तेमाल करने लगे हैं. रासायनिक खादों से खेत और खेती को होने वाले नुकसान और जैविक खाद के फायदे बताने के लिए वे किसानों के बीच लगातार गोष्ठी, बैठक और जागरूकता शिविरों का आयोजन करते रहते हैं. बिहार के समस्तीपुर जिले के मुस्तफापुर पंचायत के रहने वाले युवा संकेत कुमार ‘ग्रीन वसुधा’ संगठन और जैविक प्रसार केंद्र बना कर किसानों के बीच जैविक खाद का प्रचारप्रसार कर रहे हैं.

संकेत बताते हैं कि इंजीनियर की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने भारत सरकार के ‘सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय’ से ट्रेनिंग ली और उस के बाद जैविक खाद को बनाने और किसानों को जैविक खाद के फायदे बताने की मुहिम में लग गए. तालाबों और नदियों में बेकार पड़ी जलकुंभियों, इनसानों की सेहत के लिए घातक सिद्ध हो रही गाजर घास (पार्थेनियम), दुधारू मवेशियों के गोबर, पेड़ों के पत्तों, खरपतवारों आदि से जैविक खाद बना रहे संकेत कहते हैं कि जैविक खाद आज समूची दुनिया के लिए जरूरी हो गई है. रासायनिक खादों से मिट्टी की उर्वरा शक्ति जहां लगातार कम होती जा रही है, वहीं कैमिकल खादों से उपजाए गई फसलें इनसानों की सेहत के लिए भी नुकसानदेह साबित हो चुकी हैं. इसी वजह से जैविक उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है.

जैविक खाद के साथसाथ गाय के मूत्र, धतूरा, नीम, वर्मीवाश आदि से वे जैविक कीटनाशक भी बना रहे हैं. जैविक खाद और कीटनाशक बनाने के साथ ही वे किसानों को ये चीजें बनाने की ट्रेनिंग भी दे रहे हैं. 6 एकड़ में फैले जैविक प्रसार केंद्र में वे केला, अनार, अमरूद, पपीता, जामुन, बेल, अंगूर आदि फलों के अलावा कई तरह के फूलों व सब्जियों की जैविक खेती कर रहे हैं.

संकेत बताते हैं कि उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी तो कर ली, पर नौकरी में उन का मन नहीं लगता था और वे खुद का कोई कारोबार शुरू करना चाहते थे. कृषि के क्षेत्र में भारी संभावनाओं को देखते हुए उन्होंने कृषि सेमिनारों में भाग लेना शुरू कर दिया. उसी दौरान पटना में उन की मुलाकात कृषि वैज्ञानिक बीके चौधरी से हुई. उन से कृषि उद्योगों और उन की संभावनाओं के बारे में जानकारी हासिल की. उस के बाद ही संकेत ने अपने गांव मुस्तफापुर में जैविक प्रसार केंद्र की शुरुआत की. उस में जैविक खाद उत्पादन करने के अलावा समेकित मछलीपालन, जलसंरक्षण और सिंचाई की समस्या से निबटने के लिए 2 बीघे खेत को तालाब में तब्दील कर डाला.

27 साल के संकेत कहते हैं कि उन के जिले समस्तीपुर में कभी सब्जियों का भरपूर उत्पादन होता था और समस्तीपुर ‘सब्जी का कटोरा’ के नाम से मशहूर था. वहां की सब्जियां दिल्ली, पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश में काफी पसंद की जाती थीं. इस के अलावा वहां धान, गेहूं, मक्का, दलहन, तिलहन व मसालों का भी काफी उत्पादन होता था, लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान जिले में फसलों और सब्जियों के उत्पादन में भारी गिरावट आई है. रासायनिक खादों के बेइंतहा इस्तेमाल की वजह से खेत बंजर हो चुके हैं. खेती और किसानों की इसी खस्ता हालत को देख कर उन्हें जैविक खाद बनाने और जैविक खाद के प्रति किसानों को जगाने की मुहिम शुरू करने की प्रेरणा मिली.

जैविक खाद और खेती में कामयाबी पाने के बाद अब वे मौडल डेरी फार्म बनाने की तैयारियों में लग गए हैं. 100 गायों के लिए शेड बनाने का काम शुरू हो चुका है. फिलहाल उन के डेरी फार्म में 36 गायें हैं. संकेत का मानना है कि गांव में ही कारोबार करने और कमाई की भरपूर संभावनाएं हैं, लेकिन गांव के युवा छोटीमोटी नौकरी के लिए शहरों की ओर भाग रहे हैं. पिछले कुछ सालों से गांवों के माहौल में बदलाव आने लगा है और कई युवा अच्छीखासी नौकरियों को छोड़ कर खेती कर रहे हैं या खेती से जुड़े उद्योग लगा रहे हैं. इस से अगले 10 सालों में गांवों का चेहरा बदल जाएगा.

एक आंख से क्रिकेट खेलता था यह भारतीय कप्तान

70 के दशक में भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान थे दिग्गज खिलाड़ी नवाब पटौदी. भारत के बेहतरीन क्रिकेटरों में से एक रहे नवाब पटौदी ने भारतीय टीम की ओर से 1963 से 1975 तक क्रिकेट खेला और इस दौरान उन्होंने कई परेशानियों का भी सामना किया, लेकिन इन सबके बावजूद उन्होंने क्रिकेट में अपना योगदान जारी रखा.

अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर की शुरुआत में ही पटौदी का भीषण रोड एक्सीडेंट हो गया था जिसमें उनकी एक आंख लगभग चली गई थी, लेकिन इन सब कठिनाइयों से वह कैसे उबरे, इसका जिक्र उन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी में किया है. यह बात साल 1961 की है, जब नवाब पटौदी ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की ओर से क्रिकेट खेला करते थे.

01 जुलाई, 1961 को सुसेक्स के खिलाफ मैच में उन्होंने अपनी टीम के साथ मैदान में काफी मशक्कत की. दिन का खेल खत्म होने के बाद वह अपनी टीम के चार अन्य खिलाड़ियों के साथ ब्रिजटाउन में डिनर करने गए थे. वह एक शानदार शाम थी.

डिनर के बाद पटौदी के कुछ दोस्त वॉक पर चले गए तो नहीं नवाब अपने दोस्त रॉबिन के साथ कार में सवार होकर घर के लिए निकल पड़े. इसी बीच उनके कार के सामने एक बड़ी कार आ गई और उससे जोर से धक्का लगने से नवाब पटौदी बुरी तरह से घायल हो गए.

अपने ऑटोबायोग्राफी में वह लिखते हैं, ‘मुझे इस बात पर शक होने लगा कि मैं विश्वविद्यालय के मैच में खेल पाऊंगा की नहीं. उस समय तक मुझे यह नहीं पता था कि मेरी आंख में चोट आई है, क्योंकि मुझे दर्द महसूस नहीं हो रहा था. जब मेरी ब्रिटेन अस्पताल में आंख खुली तो मुझे बताया गया कि मेरी दाईं आंख का ऑपरेशन होना है. यह जानकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. एक्सीडेंट के दौरान विंडस्क्रीन से टूटकर निकला हुआ एक कांच का टुकड़ा मेरी आंख में घुस गया था और इसको निकालने के लिए ऑपरेशन करना बेहद जरूरी था. इसी बीच उस शहर के फेमस डॉक्टर को एक इमरजेंसी ऑपरेशन करने के लिए उनके घर से बुलवाया गया. उन्होंने अपनी ओर से पूरी कोशिश की और अपना काम बढ़िया तरीके से निभाया लेकिन कुछ दिनों के बाद मुझे पता चला कि उस आंख का मेरा लेंस काम नहीं कर रहा है. उस समय तक विज्ञान उतना विकसित नहीं हुआ था इसलिए मुझे अपनी एक आंख से हाथ धोना पड़ा. लेकिन एक आंख विशेषज्ञ ने मुझे कॉन्टेक्ट लेंस के सहारे क्रिकेट खेलने की सलाह दी, जिसकी सहायता से मैं 90 प्रतिशत विजन को प्राप्त कर पाया. सिर्फ एक चीज में मुझे समस्या आती थी कि इस लेंस के माध्यम से एक नहीं बल्कि दो-दो वस्तुएं नजर आती थी.’

लेकिन इन सबके बावजूद नवाब ने क्रिकेट खेलने के अपने प्यार और जुनून को जारी रखा. उन्होंने अपने आपको इस बात को अपनाने से मना कर दिया कि उनका क्रिकेट करियर खत्म हो चुका हूं. आंख खोने से ज्यादा उन्हें इस बात का बहुत दुख हुआ कि वह अपनी चोट की वजह से उस साल ऑक्सफोर्ड की ओर से नहीं खेल पाए.

नवाब ने अपने इस चोट को कभी भी अपने उपर हावी नहीं होने दिया. और एक बार फिर वह अभ्यास के लिए निकल पड़े.

अपनी चोट के छह महीने बाद पटौदी ने भारत की ओर से इंग्लैंड के खिलाफ साल 1961 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पर्दापण किया और मद्रास में खेले गए तीसरे टेस्ट मैच में शतक जड़ा. इस तरह भारत ने इंग्लैंड के खिलाफ पहली सीरीज जीती.

दाहिने हाथ के बेहतरीन बल्लेबाज नवाब पटौदी ने इसके बाद फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा और टीम इंडिया के कप्तान बनने के बाद उन्होंने भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाईयों तक पहुंचाया. उन्होंने अपने पूरे क्रिकेट करियर के दौरान 46 टेस्ट मैच खेले और 34.91 की औसत से 2,793 रन बनाए. इस दौरान उन्होंने 6 शतक लगाए. उनका उच्चतम स्कोर 203* नाबाद रहा.

साल 2011 में लंग इंन्फेक्शन के कारण नवाब पटौदी की दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में मृत्यु हो गई. उनके बेहतरीन खेल को देखते हुए उन्हें साल 1964 में अर्जुन अवॉर्ड और साल 1966 में पद्म श्री अवॉर्ड से नवाजा गया था.

दाढ़ी कटवाने की बजाय सोनू सूद ने छोड़ी ‘‘मणिकर्णिका’’

निडर व बेफिक्र कंगना रनौत का जवाब नहीं. वह वही करती हैं, जो उनके मन में हो. कंगना रनौत के साथ काम करना लोगों के लिए सैदव मुश्किल होता है. सर्वविदित है कि पहले केतन मेहता के निर्देशन में बनने वाली झांसी की रानी की बायोपिक फिल्म में कंगना रनौत काम करने वाली थीं. उन्होंने दो वर्ष इसके लिए तैयारी की. मगर ऐन वक्त पर उन्होंने केतन मेहता को ठेंगा दिखाते हुए दक्षिण के फिल्मकार कृष के साथ झांसी की रानी की बायोपिक फिल्म ‘‘मणिकर्णिका’’ करने लगी. जिसमें सोनू सूद ने भी अहम किरदार निभाया है.

वास्तव में सोनू सूद को फिल्म की पटकथा और अपना किरदार काफी अच्छा लगा था. इसके अलावा उन्हें निर्देशक कृष के विजन में यकीन था, इसलिए उन्होंने इस फिल्म में अभिनय करना स्वीकार किया था. फिल्म की शूटिंग पूरी होने के बाद सोनू सूद ने दाढ़ी बढ़ाकर फिल्म ‘‘सिम्बा’’ की शूटिंग करनी शुरु कर दी. इस बीच ‘मणिकर्णिका’ में बड़ा बदलाव हो गया. सूत्रों के अनुसार फिल्म के पटकथा लेखक व सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी का वरद हस्त हासिल कर कंगना रनौत ने अचानक फिल्म की पटकथा मे कुछ बदलाव कर कुछ दृश्य पुनः फिल्माने के लिए कहा, तो निर्देशक कृष ने फिल्म छोड़ दी. कंगना तुरंत इस फिल्म की निर्देशक भी बन गयीं.

फिल्म के निर्देशक कृष को हटाकर कंगना रनौत ने अब निर्देशक की जिम्मेदारी खुद ही संभाल ली है और पटकथा में परिवर्तन के बाद वह फिल्म के कुछ हिस्से पुनः फिल्माने जा रही हैं. सूत्रों के अनुसार अब कंगना ने फिल्म के कुछ दृश्य पुनः फिल्माने के लिए सोनू सूद को बुलाया. सोनू सूद ने कहा कि वह ‘सिम्बा’ की शूटिंग कर रहे हैं और उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई है. इसलिए कुछ दिन रूक जाएं. पर फिल्म की प्रोडक्शन टीम से सोनू को संदेश दिया गया कि वह सब कुछ छोड़कर दाढ़ी कटवाकर पहले ‘मणिकर्णिका’ के लिए शूटिंग करे. बात इतनी आगे बढ़ गयी कि सोनू सूद ने ‘मणिकर्णिका’ को शुभ कामनाएं देते हुए फिल्म छोड़ दी.

इस खबर के बाहर आते ही कंगना रनौत ने तुरंत ऐलान कर दिया कि सोनू सूद द्वारा निभाए गए किरदार में मोहम्मद जीशान अयूब को लेकर पुनः शूटिंग करने जा रही हैं. इतना ही नही कंगना रनौत ने सोनू सूद पर हमला करने में भी कोई देरी नही की. कंगना रनौत ने कहा है- ‘‘सोनू सूद एक महिला निर्देशक के साथ काम नहीं करना चाहते. उन्होंने मुझसे मिलना भी उचित नहीं समझा. अब सोनू सूद की जगह मोहम्मद जीशान अयूब को लेकर रिशूटिंग कर रही हूं.’’

इसके बाद कंगना रनौत ने ट्वीटर पर एक और सफाई देते हुए पोस्ट किया है कि फिल्म ‘‘मणिकर्णिका” के निर्देशक कृष ही हैं और वही रहेंगे. वह तो उनकी व्यस्तता के चलते कुछ दृश्यों की रिशूटिंग के वक्त निर्देशन दे रही हैं. क्लैप बोर्ड पर निर्देशक के रूप में अपने नाम पर उन्होंने लिखा है कि ऐसा किसी तरह की गलतफहमी से बचने के लिए किया गया है.

धार्मिक अवसाद का शिकार युवा विपक्ष

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की बारह दिवसीय कैलाश मानसरोवर यात्रा उनके उत्साह या धार्मिक आस्था की नहीं बल्कि एक हताशा का प्रतीक है.  मुमकिन है यह दिखावा या पाखंड ही हो जैसा कि भाजपा आरोप लगा रही है लेकिन यह जो भी है उससे खुद राहुल गांधी, कांग्रेस या देश का भला होने वाला नहीं बल्कि इससे कई नुकसान जरूर हैं जो शायद ही राहुल गांधी को दिखें. अंधी श्रद्धा ज्यादा आत्मघाती होती है या दिखावटी यानि राजनैतिक श्रद्धा यह तय कर पाना कोई आसान काम नहीं लेकिन यह जरूर साफ दिख रहा है कि जिस तरह महंगा सूट और बूट पहनकर नरेंद्र मोदी जवाहर लाल नेहरू नहीं हो गए, उसी तरह मंदिर मंदिर जाकर राहुल मोदी यानि प्रधानमंत्री नहीं हो जाने वाले.

सरकार पर हमला बोलने और उसे तथ्यों पर घेरने यह सुनहरी वक्त था. दो अहम मुद्दों पर विपक्ष सरकार को कठघरे में खड़ा कर उसकी हकीकत जोरदार तरीके से जनता के सामने रख सकता था. पहला नोटबंदी पर रिजर्व बैंक की यह रिपोर्ट कि कोई काला धन देश में नहीं था जिसके लिए आम लोगों को मवेशियों की तरह दौड़ने मजबूर किया गया था और दूसरा उन पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी जो मुद्दत से दलितों आदिवासियों और शोषितों के हक में लड़ाई बिना किसी होहल्ले के लड़ रहे थे.

ये पांचों कभी रोते गाते या फिर कोई मन्नत लेकर किसी धर्मस्थल में नहीं गए थे कि हे प्रभु दलितों और मजदूरों की बदहाली सुधार दो तो हम तीर्थ यात्रा करेंगे, इतने रुपए का प्रसाद चढ़ाएंगे या फिर निराहारी निर्जला व्रत रखेंगे. ये लोग बेहतर जानते और समझते हैं कि तमाम बदहालियों  के जिम्मेदार धर्म के ठेकेदार, फुटकर दुकानदार और उनकी बनाई वर्ण व्यवस्था और कर्मफल का धार्मिक सिद्धान्त है जिससे सदियों से समाज के कमजोर तबके का खून चूसा जा रहा है. देश में लोकतन्त्र भी अब रसूखदारों की कनीज बनकर रह गया है, इसलिए लड़ाई कानून के जरिये लड़ी जाये और अधिकारों से नावाकिफ लोगों को जगाया जाये. यह प्रक्रिया बिलाशक लंबी है लेकिन इसके अलावा कोई और रास्ता है भी नहीं.

इन्हें लेकर बजाय सड़कों पर आने के राहुल गांधी कैलाश पर्वत चढ़ कर कौन सी मिसाल या आदर्श गढ़ रहे हैं यह तो वही जानें लेकिन लोगों में जो उत्साह उन्हें लेकर खासतौर से उत्तर प्रदेश लोकसभा उपचुनावों और कर्नाटक विधानसभा नतीजों के बाद आया था वह काफूर हो चला है. देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में तो राहुल अखिलेश और मायावती की तिकड़ी को लेकर तो इतना उत्साह था कि लोग धर्म के नाम पर हो रही गुंडागर्दी के खात्मे को लेकर आशान्वित हो उठे थे कि गलती सुधारने का मौका एकजुट हो चले विपक्ष के चलते है.

इन उम्मीदों पर अब पानी फिरता नजर आ रहा है क्योंकि सपा प्रमुख अखिलेश यादव अब भव्य विष्णु मंदिर के निर्माण का राग अलापने लगे हैं. राहुल को शंकर तो अखिलेश को विष्णु में भविष्य दिख रहा है. दूसरे बड़े और अहम राज्य बिहार में लालू पुत्र तेजस्स्वी यादव कृष्ण की बांसुरी बजाते रहते हैं. जरूरत पड़ने यानि ज्यादा परेशानियां होने पर वे तंत्र मंत्र का भी सहारा लेने लगते हैं.

इन तीनों विपक्षी युवाओं को लगता है कि कुर्सी जनता के समर्थन और वोट से या मुद्दों की लड़ाई पर नहीं बल्कि पूजा पाठ से मिलनी है या मिलती है तो भाजपा को फिक्र करने की जरूरत नहीं उसके बिछाए जाल में विपक्ष खास तौर से युवा फंस चुका है कोई शंकर की शरण में मन्नत पूरी करने जा रहा है तो कोई पाताल लोक के राजा की पनाह में सत्ता के लिए मन्नतें मांग रहा है.

ये होनहार युवा नेता खुद साबित कर रहे हैं कि वे अभी नरेंद्र मोदी को चुनौती देने काबिल नहीं हुये हैं, जिनहोने 2014 में दिन रात एक कर जनता को सम्मोहित सा कर दिया था, तब भीड़ मोदी मोदी का नारा इसलिए बुलंद नहीं करती थी कि वे कोई आसमान से उतरे फरिश्ते लगते थे या भगवान भरोसे भारत यात्रा पर निकल पड़े थे, बल्कि मोदी ने कांग्रेस की बखिया तकनीकी तौर पर उधेड़ कर रख दी थी. अब वे अपने वादों और इरादों से मुकर रहे हैं तो बारी राहुल गांधी की है कि वे 2019 में ताबड़तोड़ दौरे देश के करें और जनता को मोदी और भाजपा की हकीकत बताएं पर हो उल्टा रहा है राहुल गांधी पहाड़ों की हवा खाते ॐ नमः शिवाय का मंत्र जप रहे हैं.

यह इन युवाओं का अवसाद ही है जो वे बजाय मैदानों की खाक छानने के पूजा पाठ के जरिये सफलता का रास्ता तलाश रहे हैं. कैलाश मानसरोवर से लौटने के बाद जब राहुल गांधी मध्य प्रदेश से चुनावी बिगुल फूंकेगे तो वे सबसे पहले किसी मंदिर में ही मत्था टेकेंगे, जिसके बाबत एक कांग्रेसी नेता का कहना है कि अभी इस बात पर मंथन चल रहा है कि उन्हें पहले उज्जैन के महाकाल मंदिर ले जाया जाये या फिर विदिशा के रंगई स्थित हनुमान मंदिर ले जाया जाये जिसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बनवाया है.

लगता नहीं कि धार्मिक अवसाद से ग्रस्त राहुल गांधी की सत्ता की मन्नत इन पुराने टोटकों से दूर होगी, जिसमें भाजपाइयों को महारथ हासिल है और वे चाहते भी यही हैं कि चुनावी लड़ाई सरकार की नाकामयाबियों पर नहीं बल्कि धरम करम पर लड़ी जाये, जिससे जनता का ध्यान इस तरफ जाये ही नहीं कि सरकार ने उसके लिए उतना किया भी है या नहीं जितना कि वह गिना रही है.

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