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रवि शास्त्री के साथ अफेयर की खबरों पर निमरत कौर ने तोड़ी चुप्पी

इस समय इंटरनेट पर आ रही रवि शास्त्री और निमरत कौर के अफेयर की खबरें सुर्खियों में हैं. अक्षय कुमार के साथ फिल्म एयरलिफ्ट में नजर आने वाली निमरत और शास्त्री के बीच बढ़ती नजदीकियों को लेकर एक अंग्रेजी अखबार ने खबर प्रकाशित की थी जिसमें बताया गया था कि निमरत कौर और रवि शास्त्री की पहली मुलाकात साल 2015 में एक जर्मन कार कंपनी की कार लौन्चिंग के दौरान हुई थी. जिसके बाद ये दोस्ती प्यार में बदल गई. और दोनों एक दूसरे को पिछले दो साल से डेट कर रहे हैं.

इन खबर ने इतना जोर पकड़ा कि शास्त्री और निमरत ट्विटर पर ट्रेंड होने लगे. सोशल मीडिया पर सोमवार सुबह से ही चल रही इस तरह की खबरों पर शाम होते-होते निमरत ने एक ट्वीट कर दिया.

अदाकारा निमरत कौर ने इन सभी खबरों को अफवाह बताते हुए ट्वीट किया- ‘फैक्ट यह है कि, मुझे रूट कनाल की जरूरत हो सकती है लेकिन आज मेरे बारे में छप रहीं सारी खबरें फिक्शन हैं. कुछ और फैक्ट: फिक्शन बहुत ज्यादा दर्द दे सकते हैं, मंडे ब्लूज एक्जिस्ट करते हैं और मुझे आइसक्रीम पसंद है.’

हालांकि इस बारे में भारतीय क्रिकेट टीम के कोच रवि शास्त्री का कोई बयान सामने नहीं आया है. शास्त्री फिलहाल भारत के इंग्लैंड दौरे में टीम इंडिया के साथ हैं. 56 साल के रवि शास्त्री ने 1990 में रितु सिंह से शादी की थी. रवि की एक बेटी भी है. रवि का नाम इससे पहले अमृता सिंह के साथ भी जुड़ चुका है. अमृता खुलेआम उन्हें स्टेडियम में चियर भी करती थीं. दोनों की नजदीकियां तब सुर्खियों में आईं जब एक मैगजीन के कवर पर दोनों साथ नजर आए.

युवकों की तरह अब युवतियों को भी चाहिए आजादी

युवतियों को बराबर की शिक्षा और रोजगार के बल पर लड़कों के समान सामाजिक और आर्थिक अवसर व ईनाम मिलने का कानूनन हक है. लेकिन जमीनी हकीकत इस से कोसों दूर है, फिर चाहे वह भारत में हो या फिर अफ्रीका में, हौलीवुड में हो या आस्ट्रेलिया की संसद में. इसी असमानता के कारण युवतियों को कई बार विरोध करना पड़ता है, अपने लिए आवाज उठानी पड़ती है. आज की युवती अपने लिए केवल शिक्षा और रोजगार ही नहीं, युवकों के बराबर आजादी भी मांग रही है.

नीति आयोग के अध्यक्ष का कहना है कि 10 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि के  लिए देश में ह्यूमन डैवलैपमैंट इंडैक्स में सुधार होना चाहिए जिस में भारत 180 देशों में  130वें स्थान पर है. इस इंडैक्स में बराबरी को भी एक मानक माना जाना है.

विश्वभर में यौन अधिकारों को मानवाधिकारों से जोड़ कर देखा जाता है. एक लड़की पहले एक मानव है और उस के भी बराबर के अधिकार हैं. कहने को तो हम कह देते हैं कि हमारे यहां युवतियां युवकों के बराबर हैं, लेकिन जब बात युवतियों को उन की पसंद, उन के अपने शरीर पर हक देने की आती है तो क्या उन को मनमरजी करने का अधिकार मिलता है? इस विषय की असलियत जानने के लिए समाज के अलगअलग पहलुओं से जुड़ीं कुछ महिलाओं के विचार जानने की कोशिश करते हैं.

महिला सशक्तीकरण की बात

पुणे की सिंबायोसिस इंटरनैशनल यूनिवर्सिटी की प्रोफैसर डा. सारिका शर्मा बताती हैं, ‘‘कहने को तो हम सब कहते हैं कि हमारे लिए बेटों और बेटियों में कोई फर्क नहीं है, लेकिन जब बात जमीनी सचाई की आती है तब युवकयुवतियों के लिए अलग नियम होते हैं. युवतियों के लिए अकसर कुछ अनकहे नियम होते हैं, जिन का उन्हें पालन करना होता है. जैसा कि फिल्म ‘पिंक’ में दिखाया गया कि युवकयुवतियों द्वारा किए गए एक ही काम के लिए समाज का नजरिया  बदल जाता है. उदाहरणस्वरूप, युवक सिगरेट पिएं तो सिर्फ उन के स्वास्थ्य की हानि की चिंता होती है, वहीं अगर युवती सिगरेट पिए तो उस के चालचलन तक बात पहुंच जाती है.’’

जहां तक सारिका का मां की हैसियत से प्रश्न है, वे बेटी को उस का कैरियर चुनने का, अपनी इच्छा के मुताबिक कपड़े पहनने का या फिर बाहर आनेजाने का पूरा अधिकार देती हैं. लेकिन यदि उन की बेटी उन्हें अपने बौयफ्रैंड से मिलवाए तो उस के लिए वे तैयार नहीं हैं.

वे मानती हैं कि महिला सशक्तीकरण के कई रास्ते हैं. आज युवतियां फौज में जा रही हैं, हवाईजहाज उड़ाने के साथसाथ सड़क पर ट्रक भी दौड़ा रही हैं और फाइटर जैट तक उड़ा रही हैं. लेकिन सैक्स की मनमानी का अधिकार देना उन की दृष्टि में आजादी नहीं है.

डा. सारिका कहती हैं, ‘‘अभी हमारा समाज इस स्तर तक नहीं पहुंचा है जहां युवतियों की शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति को हम सहज स्वीकार सकें. यदि इस समय हम अपनी बेटियों को ऐसी आजादी देंगे तो समाज में उन्हें कई मुसीबतें झेलनी पड़ सकती हैं.’’

नोएडा के एक स्कूल में अंगरेजी की अध्यापिका व फ्रीलांस क्विजीन ऐक्सपर्ट साक्षी शुक्ला बेबाकी से कहती हैं, ‘‘आज हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहां महिला सशक्तीकरण एक अहम मुद्दा है. ऐसे में युवतियों को सैक्स के बारे में जागरूक करना चाहिए. एक ओर सैक्स एजुकेशन की बात होती है, जबकि दूसरी तरफ घर के अंदर इस विषय पर बात करने में भी मातापिता हिचकिचाते हैं. परंतु यदि सच में समाज में बदलाव लाना है, तो युवतियों को उन के अपने शरीर पर अधिकार की अनुमति देनी होगी.

‘‘सैक्स एक कुदरती प्रक्रिया है. एक महिला का सम्मान, उस की इज्जत सिर्फ उस की सैक्सुऐलिटी में ही नहीं है. समय आ गया है कि समाज अपनी इज्जत महिला के जननांगों में नहीं, बल्कि उस के बौद्धिक विकास में ढूंढ़े, उस के फैसले लेने की क्षमता में खोजे.’’

साक्षी आचार्य चाणक्य से सहमत हैं कि 5 वर्षों तक बच्चों को लाड़ करो, किशोरावस्था तक उन पर कड़े नियम लगाओ और फिर उस के मित्र बन जाओ. साक्षी कहती हैं, ‘‘आज हमें ‘मेरा शरीर मेरे नियम’ जैसे कैंपेन का हिस्सा बनना चाहिए, क्योंकि यदि लोग खुद इस का हिस्सा नहीं बनेंगे तो बदलते हालात में युवतियां बागी होने को मजबूर हो जाएंगी.

‘‘किशोरावस्था में गर्भधारण और फिर गर्भपात, यौनशोषण या यौनउत्पीड़न आदि से युवतियों को सही समय पर यौन संबंधी जानकारी दे कर बचाया जा सकता है और इस का सही समय तभी आरंभ हो जाता है जब युवतियां किशोरावस्था में कदम रखती हैं.’’

बराबर के हों नियम

फिनलैंड की एक बहुद्देशीय कंपनी में कार्य कर चुकीं रिंपी नरूला कहती हैं, ‘‘महिला होने के नाते मैं यह अनुभव करती हूं कि हमारे समाज में युवकों की तुलना में युवतियों को कम आजादी मिलती है.

‘‘मातापिता को अपने घर की चारदीवारी के अंदर युवकयुवतियों में फर्क नहीं करना चाहिए. उन्हें दोनों के लिए समान नियम लागू करने चाहिए. यदि एक घर में युवक को देररात तक बाहर आनेजाने की इजाजत है तो युवती को भी होनी चाहिए. और यदि युवतियों की इज्जत को खतरा लगता है तो फिर युवकों को भी देररात बाहर नहीं निकलने दिया जाना चाहिए.

‘‘आखिर युवकों के कारण ही तो युवतियों की इज्जत को खतरा होता है न. यदि नियम हों तो बराबर के हों. कुछ लोगों की ऐसी सोच होती है कि यदि युवतियों को पूरी आजादी दे दी जाएगी तो वे बिगड़ जाएंगी, यह सोच गलत है.

‘‘युवतियों पर भरोसा रखें, उन्हें संस्कार के साथ प्यार, विश्वास और इज्जत दें. उन में आत्मविश्वास जगाएं और फिर नतीजा देखें. युवतियों को घरेलू संस्कार देना हर परिवार अपना कर्तव्य समझता है, क्योंकि उन्हें गृहस्थी संभालनी होती है. लेकिन एक युवती की कुछ अपनी इच्छाएं भी हो सकती हैं. तो वह भी परिवार की जिम्मेदारी है कि वह युवतियों को अपनी ऐसी इच्छाओं को सुरक्षा के साथ कैसे पूरा करना है, यह सिखाए.

‘‘आजादी देने से युवतियां बिगड़ जाएंगी, यह जरूरी नहीं है. हां, वे अपनी सोच को अंजाम जरूर देंगी और इस के लिए जैसे समाज युवकों को स्वीकारता है वैसे ही उसे युवतियों को भी स्वीकारना होगा.’’

जिम्मेदारीभरी आजादी

मुंबई के टिस्स (टाटा इंस्ट्टियूट औफ सोशल साइंसैस) की मनोवैज्ञानिक मोना उपाध्याय अपने बेटाबेटी में पूरी तरह बराबरी रखती हैं. ऐसा वे एक सजग मां होने के नाते करती हैं. जब उन का बेटा कालेज में पढ़ने गया तब, और फिर जब बेटी दूसरे शहर कालेज गई तब उन्होंने अपने दोनों बच्चों से निजी वार्त्तालाप किया जिस में उन्होंने दबेढके रूप से यह बात उठाई कि दूसरी जगह, परिवार से दूर रहने पर, उम्र की इस दहलीज पर हो सकता है कि बच्चों के दिल को कोई भा जाए और उन के कदम बहक जाएं.

ऐसे में उन्हें यह यकीन होना चाहिए कि उन का परिवार उन के फैसले में साथ रहेगा, लेकिन साथ ही उन्हें यह एहसास भी होना चाहिए कि उन के जीवन के प्रति उन का कर्तव्य है कि वे सही फैसला लें. जो भी फैसला वे लेंगे उस का खमियाजा उन्हें खुद अपने जीवन में भुगतना होगा. उस के लिए परिवार के सदस्य उन की कोई सहायता नहीं कर सकेंगे.

मोना यह जानने को भी आतुर हैं कि यदि कदम आगे बढ़े तो उस की वजह क्या रही? एक मनोवैज्ञानिक होने के नाते वे मानती हैं कि सैक्स एक कुदरती प्रक्रिया है और उसे भावनात्मक बनाना जरूरी नहीं है. फि र भी दिल टूटता है तो उसे जोड़ना खुद ही होता है. वे अपनी बेटी को टूटे दिल को संभालने के गुर जरूर सिखाना चाहेंगी. दिल टूटने का मतलब जीवन का अंत नहीं.

मोना अपनी बेटी को बेटे के समान आजादी देने के पक्ष में हैं. साथ ही, वे यह भी चाहती हैं कि बेटी अपने जीवन में भावनाओं में बह कर कोई गलत फैसला न ले. इस से निबटने का हथियार है बच्चों से बातचीत. यदि परिवार में बातचीत है तो कोई ठोस कदम उठाने से पहले बच्चे मातापिता से अपने दिल की बात कहने में हिचकिचाएंगे नहीं. परिवार की महिला का यह कर्तव्य है कि वह पूरे परिवार में खुली बातचीत का माहौल कायम करे. फिर चाहे वह बेटी को पीरिएड्स में पैड्स की जरूरत की बात हो या अपने दिल का हाल सुनाने की.

डेल कंपनी की सीनियर कंसल्टैंट पल्लवी बताती हैं, ‘‘विदेशों में बेटे की गर्लफ्रैंड हो या बेटी का बौयफ्रैंड, दोनों को घर आने की आजादी होती है. अंतर्राष्ट्रीय महिला स्वास्थ्य संगठन सैक्सुअल अधिकार को मानवाधिकार के रूप में देखता है. सैक्स हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा है, लेकिन इतना भी महत्त्वूपर्ण नहीं कि सारी जिंदगी उस के आसपास ही डोलें और न इतना हलका होता है कि उस के बारे में सोचा भी न जाए.’’

सैक्सुअल अधिकार अपने शरीर पर अधिकार की एक खास भावना है. पल्लवी अपने बच्चों को उन के शरीर पर अधिकार देने के पक्ष में हैं. अपने शरीर पर अपना अधिकार एक बड़ा कौंसैप्ट है जो जितनी जल्दी समझ में आए उतना ही बेहतर है. यह जीवन में आगे चल कर बच्चों को भावनात्मक रूप से ताकतवर बनाता है और इस के चलते वे जिंदगी के कई अहम फैसले लेने में सक्षम होते हैं जो उन्हें शारीरिक व मानसिक तौर पर प्रभावित करते हैं.

जागरूक बेटियों को दें आजादी

दिल्ली के द्वारका कोर्ट में पारिवारिक मामलों की वकालत कर रहीं रजनी रानी पुरी कहती हैं, ‘‘कैसे दोहरे मापदंड हैं हमारे समाज में, जहां युवतियों को बौयफ्रैंड रखने पर बदचलन कहा जाता है जबकि युवकों को गर्लफ्रैंड रखने पर मर्द कहा जाता है. मेरी सहेली के बेटे की गर्लफ्रैंड घर आती है, कमरे का दरवाजा बंद कर वे दोनों घंटों बिता देते हैं और घर वाले हंस कर छेड़ते हैं कि चाय की जरूरत है क्या. लेकिन उसी सहेली की बेटी ने जब अपने बौयफ्रैंड को परिवार से मिलवाना चाहा तो हंगामा मच गया.

‘‘उस सहेली से जब मैं ने इस दोहरे मापदंड पर सवाल किया तो उस के पास एक ही सवाल था, लड़की के साथ घर की इज्जत जुड़ी होती है. माना कि कुदरती रूप से युवती सैक्स के मामले में कमजोर है, क्योंकि उस की बात पकड़ में आ सकती है जबकि युवक आसानी से बच जाता है, लेकिन इस से बचने के लिए हमें अपनी बेटियों को यौनशिक्षा देनी चाहिए, उन्हें उन के यौन अधिकारों से परिचित करवाना चाहिए.

‘‘हमारा पुरुषप्रधान समाज युवकों को शौर्ट्स पहनने पर कूल कहता है जबकि युवतियों को चरित्रहीन. उन्नति की ओर बढ़ते हमारे समाज की करनी और कथनी में बहुत अंतर है. समाज की कट्टर सोच को ध्यान में रखते हुए युवतियों को समान अधिकार पाने के लिए बहुत होशियारी के साथ जीवन के फैसले लेने होंगे. इस के लिए उन्हें बचपन से ही जागरूक करना मातापिता की जिम्मेदारी है.’’

समाज बदल रहा है और युवतियों को आजादी मिलने लगी है, कहीं कम तो कहीं ज्यादा. लेकिन आजादी मुफ्त नहीं होती, उस की कीमत अदा करनी पड़ती है और वह कीमत होती है जिम्मेदारी. केवल आजादी के नारे लगाने से आजादी नहीं मिल सकती. जिन्हें आजादी की गुहार लगानी आती है, उन्हें आजादी मिलने से पहले अपनी जिम्मेदारी भी निभानी होगी. यह जिम्मेदारी है अपने जीवन के प्रति, अपने परिवार की खुशियों और ख्वाहिशों के प्रति, ताकि आगे चल कर समाज को अपने बदलने पर कोई पछतावा न हो.

क्या आप भी तकिए के पास मोबाइल रखकर सोते हैं?

अक्सर यूजर्स फोन को चार्जिंग पर लगाकर अपने तकिए के पास सिरहाने रख लेते है. ताकि कोई जरूरी कॉल या मैसेज मिस न हो जाए. आपकी ये नॉर्मल आदत आपके लिए बहुत महंगी साबित हो सकती है. मोबाइल से निकलने वाली विकिरणें आपके मस्तिष्क पर बुरा असर डाल सकती है.

इतना ही नहीं चार्जिंग पर फोन लगाकर उसे अपने पास रखकर सोना आपके लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है. ऐसी ही एक घटना फिनलैंड में हुई. जहां एक महिला ने अपने फोन को चार्ज पर लगाकर छोड़ दिया और सो गई, तभी मोबाइल फोन की बैटरी फट गई और फोन में आग लग गई. इसके कारण वहां गद्दे और चादर जल गए. प्राप्त खबरों के अनुसार, थोड़ी देर पहले महिला का बेटा उस मोबाइल से खेल रहा था. दुर्घटना होने के बाद महिला ने बताया कि हम एक बहुत बड़ी दुर्घटना से बच गए.

खबरों के अनुसार, महिला ने इस हादसे के लिए मोबाइल या इंश्योरेंस कंपनी से कोई संपर्क नहीं साधा लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसा अक्सर दूसरे चार्जर से बैटरी चार्ज करने के कारण होता है या फिर स्मार्टफोन का पुराना होना भी ऐसी घटनाएं होने का बड़ा कारण बनता है.

प्राणप्रतिष्ठा : स्वार्थ साधने का पाखंडी तरीका

कभी न कभी हम सभी ने प्राणप्रतिष्ठा शब्द सुना ही है. नवनिर्मित मंदिरों में मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है. जानेमाने और प्रकांड पंडित राहुल शर्मा के अनुसार, किसी भी मंदिर में मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा से मतलब है कि मूर्ति को मंदिर में विशेष स्थान पर स्थापित करना. स्थापित करने से पहले विशिष्ट स्थान और मूर्ति दोनों को ही विभिन्न मंत्रोच्चारों द्वारा पवित्र किया जाता है.

धर्मग्रंथों में मानवजीवन के 16 संस्कार माने गए हैं और उन सभी संस्कारों का अपना विशिष्ट महत्त्व है. धार्मिक मान्यतानुसार, जिस तरह मनुष्य के लिए 16 संस्कारों का किया जाना जरूरी होता है उसी तरह पाषाण मूर्ति स्वरूप भगवान के 15 संस्कारों को विभिन्न धार्मिक मंत्रों द्वारा संपादित किया जाता है. 16वां मरण संस्कार भगवान का किया जाना धार्मिक ग्रंथों में मना है क्योंकि ईश्वर सर्वव्यापी और अजरअमर है.

किन मूर्तियों की होती है प्राणप्रतिष्ठा

जब किसी मंदिर में मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है तो मूर्ति को गाजेबाजे के साथ शिल्पकार की दुकान से लाया जाता है. एक मंदिर के पुजारी का कहना है कि हर मूर्ति को प्राणप्रतिष्ठा की जरूरत नहीं होती. केवल 12 अंगुल से बड़ी मूर्तियों की ही प्राणप्रतिष्ठा की जाती है. घरों के मंदिरों में रखी जाने वाली मूर्तियों को प्राणप्रतिष्ठा की जरूरत नहीं होती. केवल अचल और स्थायी मूर्तियों की ही स्थापना की जाती है यानी एक बार किसी स्थान पर प्राणप्रतिष्ठा की गई मूर्तियों को उन के स्थान से हिलायाडुलाया नहीं जा सकता. आमतौर पर इस तरह की प्राणप्रतिष्ठा मंदिरों में ही की जाती है.

कैसे की जाती है प्राणप्रतिष्ठा

पंडित राहुल शर्र्मा के अनुसार प्राणप्रतिष्ठा का काम करने में 3 से 5 दिन लगते हैं और कम से कम 5 पंडित इस काम को करते हैं. किसी भी मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा करवाए जाने से पहले

84 कुंभ या घड़े भरे जाते हैं जिन में पंचगव्य, सप्तधान, औषधियां, पंचामृत, अक्षत जैसी कई वस्तुएं होती हैं. मूर्ति को स्नान करवाने के लिए हजार छेद वाला कलश लिया जाता है. दूध, दही, घी, पंचामृत आदि से मूर्ति को स्नान करवाने के बाद नए वस्त्र पहनाए जाते हैं. उस के बाद खुले वाहन पर बैठा कर मूर्ति को नगरभ्रमण करवाया जाता है.

जिस स्थान पर मूर्ति को स्थापित किया जाता है वहां पर जमीन में सोना, मुद्रा, अन्न आदि को रख कर मूर्ति के लिए पाट बनाया जाता है. जिस भगवान की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है, विभिन्न मंत्रों के उच्चारण द्वारा उन का आह्वान किया जाता है ताकि वे उस मूर्ति में जीवंतस्वरूप में प्रविष्ट हो जाएं, पाषाण मूर्ति में जान डालने की न्याय प्रक्रिया कहा जाता है. मूर्ति के स्थापित हो जाने के बाद भगवान की आरती और पूजा की जाती है. प्राणप्रतिष्ठा के आयोजन को समारोहपूर्वक संपन्न कराने में शहर या गांव के नामीगिरामी लोगों के साथसाथ आम जनता को भी इकट्ठा किया जाता है.

प्राणप्रतिष्ठा का मतलब

सवाल है कि प्राणप्रतिष्ठा का आखिर मतलब क्या है? क्या किसी भी बेजान पाषाण प्रतिमा में किसी मंत्र या उपक्रम द्वारा जान फूंकी जा सकती है? और इस से लाभ किसे है? हर जगह मौजूद और अदृश्य ईश्वर को एक मूर्ति के अंदर कैसे समाहित किया जा सकता है? एक आम इंसान, फिर चाहे वह पंडित ही क्यों न हो, मूर्ति के अंदर प्राण कैसे फूंक सकता है या किसी मूर्ति को जीवंतस्वरूप किस तरह दिया जा सकता है.

मूर्ति में प्राण आने के बाद तो वह बोलने लगती होगी, चलने लगती होगी, भक्तों से बातें तो जरूर करती होगी. फिर तो भक्तों को कोई दुख, समस्या रहनी ही नहीं चाहिए. वास्तव में यदि गहराई और तर्क के साथ विचार किया जाए तो प्राणप्रतिष्ठा महज एक ढोंग और अंधविश्वास के अलावा कुछ नहीं है. जिस का इस्तेमाल आम जनता को मूर्ख बनाने में किया जाता है. प्राणप्रतिष्ठा के समय ही आम जनता द्वारा नवस्थापित मूर्ति पर जम कर चढ़ावा चढ़ाया जाता है. जिस पर पूरा अधिकार प्राणप्रतिष्ठा करवाने वाले पंडितों का होता है. इस के अलावा समाज के जिस वर्ग द्वारा मंदिर में मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा करवाई जाती है उस के द्वारा भी पंडितों को जम कर दानदक्षिणा दी जाती है.

दरअसल, यह देश के पंडेपुजारियों द्वारा देश की धर्मभीरू जनता की भावनाओं का फायदा उठा कर किया जाने वाला एक थोथा उपक्रम है, जिस से चढ़ावे के जरिए वे अपनी आजीविका चलाते हैं. भारतीय पूजापाठ में चढ़ावा एक मजबूत जरिया है जिस में सोनाचांदी से ले कर हजारोंलाखों रुपए चढ़ाए जाते हैं. भारत के बड़ेबड़े मंदिरों में करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाया जाता है. इस प्रकार की प्राणप्रतिष्ठा केवल चढ़ावे का पाखंड है जिस के जरिए आम जनता को बेवकूफ बनाया जाता है.

धर्मग्रंथों में है इस का विधान

मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा का विधान वेदों से ले कर बाद में रचे कर्मकांड की किताबों तक में लिखा गया है. बाजार में प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा को ले कर कई पुस्तकें खूब बिक रही हैं. कर्मकांड भास्कर, कर्मकांड प्रदीप, प्रतिष्ठा मयूख, बृहत कर्मकांडसमुच्चय प्रमुख किताबें हैं.

अथर्ववेद में प्राणप्रतिष्ठा को महिमामंडित करते हुए लिखा गया है,

प्राणाय नमो यस्य सर्वमिंद वशे.

यो भूत: सर्वस्येश्वरी यस्मिन्त्सर्वं

प्रतिष्ठितम््.

-अथर्ववेद-11-6/1

अर्थात, इस प्राण के लिए नमस्कार है, जिस के वश में यह समस्त चराचर जगत है. यह प्राण सब का ईश्वर है और इसी में सारा जगत स्थित है.

प्राणमाहुर्मातरिश्वानं,

वातो ह प्राण उच्चते.

प्राणे ह भूतं भव्यं च,

प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्.

-अथर्ववेद-11-6/15

अर्थात प्राण को मातरिखा अंतरिक्ष का स्वामी वायु कहा गया है. इसी वायु को प्राण कहा जाता है. उन दोनों में केवल नाम का भेद है. जगत के आधार पर बने हुए उस प्राण में भूतकाल से संबंधित और भविष्यकाल में उत्पन्न होने वाला जगत आश्रित रहता है. इस प्रकार प्राणों में ही सब प्रतिष्ठित है.

आगे लिखा है,

अस्यै प्राणा: प्रतिष्ठंतु,

अस्यै प्राणा: क्षरंतु च.

अस्यै देवत्वमचर्यायैमामहेति

च कश्चन.

अर्थात इस देव प्रतिमा के प्राण यहां प्रतिष्ठित हों, इस में निरंतर दिव्य प्राणों का संचार होता रहे. अर्चना के लिए इस के देवत्व की महानता को कोई सामान्य न समझे.

प्रतिमा के प्राण के लिए आह्वान

ऊं ही क्रो यं लं वं शं,

षं सं हं क्षं हं सं.

अस्या प्रतिमाया जीव इह स्थित:

ऊं आं हृं क्रो यं रं लं वं शं,

षं सं हं लं क्षं हं सं.

अस्या: प्रतिमाया: सर्वेंद्रियाणि

वांग्ड मनस्त्वक चक्षु:

क्षोत्रजिव्हा घ्राणपाणिपादपायूपस्थानि

इहैवोगत्य सुखं चिरं तिष्ठंतु स्वाहा.

अर्थात हम उपरोक्त मंत्रों द्वारा इस प्रतिमा में आप के प्राणों की, जीव की तथा समस्त इंद्रियों की प्रतिष्ठा करते हैं. आप यहां उपस्थित हो कर चिरकाल तक सुखपूर्वक निवास करें. हम आप का यजन करते हैं.

कर्मकांड भास्कर के अनुसार, प्राणप्रतिष्ठा करने से पहले षट्कर्म कराया जाता है. जिस प्रतिमा की प्राणप्रतिष्ठा करनी है, उसे परदे के बाहर आसन पर बैठा कर पहले षट्कर्म करा दिया जाए, शुद्धि सिंचन यज्ञ के कलशों का जल अनेक पात्रों में निकाल कर रखा जाए. यह मंत्र, ‘ऊं आपोहिष्ठा मयोभुव:, ता न अ ऊर्जे दधानत महेरणाय चक्षसे,’ पढ़ते हुए साथसाथ उस जल का सिंचन, उपस्थित व्यक्तियों, पूजन सामग्री, मंदिर और मूर्तियों पर किया जाए.

शुरू में मूर्ति को 10 स्नान कराए जाते हैं. मूर्ति जिस पत्थर या धातु की बनी है उस में सन्निहित कुसंस्कारों के निवारण तथा वांछित संस्कारों की स्थापना के लिए यह कराया जाता है. इस के बाद ही प्रतिमा सत्ता की प्रतीक बनने योग्य होती है.

प्रथम 4 स्नान भस्म, गोबर, मिट्टी और गोमूत्र से होते हैं. ये अवांछनीय संस्कारों के निवारण के लिए होते हैं. शेष 6 पदार्थों में दही, दूध, घी, सर्वोषधि, कुशोधक और शहद का प्रयोग इसी प्रकार किया जाए. अंत में शुद्ध जल से स्नान करा दिया जाना चाहिए. प्राणप्रतिष्ठा के बाद प्रतिमा को वस्त्र, आभूषण पहनाए जाएं.

कर्मकांड भास्कर, युग निर्माण योजना, प्रैस मथुरा के प्राणप्रतिष्ठा विधान में लिखा है,

अस्य श्रीप्राण प्रतिष्ठा मंत्रस्य

ब्रह्मा, विष्णु महेश्वरा : ऋ षय :,

ऋ ग्यजु सामानि छंदांसि.

क्रियामय वपु: प्राण शक्ति देवता.

ऐं बीजम्, हृं शक्ति : क्रीं कीलम.

प्राण प्रतिष्ठाने विनियोग :

इस प्रकार, पत्थर की मूर्तियों में प्राण डालने का ढोंग धर्म की पुस्तकों में इसलिए लिखा गया है ताकि प्रतिमाओं में शक्ति के नाम पर भोलेभाले धर्मांध लोगों को बेवकूफ बना कर अपना स्वार्थ साधा जाए.

नोटबंदी के बाद अब नैटबंदी, क्या जनता को मिलेगा फायदा

जुलाई 2018 के दूसरे पखवाड़े की शुरुआत में राजस्थान में वसुंधरा राजे सरकार ने 2 दिनों तक राज्य में इंटरनैट सेवाएं 20 घंटे तक बंद रखीं. चालू वर्ष के शुरुआती 7 महीने में ही राजस्थान में इंटरनैट पर यह पाबंदी 9वीं बार लगाई गई थी. राज्य में ऐसा पहली बार हुआ जब सिर्फ किसी परीक्षा के लिए पूरे प्रदेश में साइबर कर्फ्यू लगा दिया गया. राजस्थान में पुलिस कौंस्टेबल भरती की 4 घंटे की लिखित परीक्षा का आयोजन था, जिस में नकल की रोकथाम के लिए पूरे प्रदेश में इटरनैट इमरजैंसी लगा दी गई. डिजिटल इंडिया के गूंजते नारे के बीच राजस्थान सरकार ने ऐसा कारनामा कर दिखाया जिस के कारण 20 घंटे इंटरनैट नहीं चलने से 15 हजार से ज्यादा रेल टिकटों की औनलाइन बुकिंग नहीं हुई, 4,500 से ज्यादा ई चालान नहीं हुए, बिजली कंपनियों में 10 लाख रुपए की औनलाइन बिलिंग नहीं हुई और

30 करोड़ रुपए के मोबाइल ट्रांजैक्शंस प्रभावित हुए. सब से गंभीर बात यह रही कि इंटरनैट के रूप में आम जनता को जो ताकत मिली है, वह ताकत एक आदेश से एक झटके में निलंबित हो गई. जीएसटी के ई वे बिल नहीं निकले. जिस फाइलिंग को देर से करने पर फाइन लगता है, वह इस दौरान चालू रहा. राजस्थान में नैटबंदी जारी थी तो केंद्र सरकार दूसरे झमेलों को ले कर चिंतित थी. उस की चिंता के केंद्र में आम लोगों की सोशल मीडिया पर की जाने वाली और उसे चुभने वाली टीकाटिप्पणियां थीं. साथ में सीमापार से आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली हरकतों में इंटरनैट के इस्तेमाल ने उस की चिंता बढ़ा रखी है.

केंद्र सरकार में गृह सचिव राजीव गाबा की अध्यक्षता में जून 2018 में हुई एक बैठक में यह भी खुलासा हुआ कि कश्मीर घाटी में गिरफ्तार किए गए जैशे मुहम्मद के आतंकी ने नैटबंदी के दौरान भी ऐसी सेवाओं के जारी रहने की जानकारी दी थी. उस के मुताबिक, वर्ष 2016 में नगरौटा में मिलिट्री कैंप पर हुए हमले के दौरान आतंकियों को सीमापार पाकिस्तानी कब्जे वाले इलाके से लगातार सिग्नल मिल रहे थे, जबकि उस दौरान भारतीय इलाके में इंटरनैट सेवाएं बंद कर दी गई थीं. इस से सुरक्षाबलों को कार्यवाही करने में काफी कठिनाई हुई, क्योंकि वे अपने शीर्ष अधिकारियों से संपर्क नहीं साध पाए, जबकि आतंकी अपने आकाओं से मिलने वाले संदेशों के बल पर बच निकलने में कामयाब रहे. साफ है कि जिस मकसद से सरकार देश के विभिन्न इलाकों में साइबर कर्फ्यू लगाती रही है, उस में उसे बुरी तरह असफलता मिली है. ऐसे में सवाल है कि वह आखिर क्यों, कब और कैसे साइबर कर्फ्यू लगाती है और क्यों इस का कोई और विकल्प नहीं मिल पा रहा है?

कभी कश्मीर, कभी मेघालय इंटरनैट पर अफवाहों के प्रसार को देखते हुए अगस्त 2017 में केंद्र सरकार ने टैलीग्राम एक्ट में एक अध्यादेश में संशोधन कर राज्य और केंद्र सरकार को यह हक प्रदान किया था कि किसी भी आपातस्थिति में जनता की सुरक्षा के लिए अस्थायी तौर पर इंटरनैट शटडाउन किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार ने व्हाट्सऐप आदि इंटरनैट सेवा प्रदाताओं को अफवाहों के प्रसार में इंटरनैट के इस्तेमाल की रोकथाम के उपाय करने को कहा है. इस के लिए नैट पर परोसी जाने वाली सामग्री की छानबीन और जरूरी लगे, तो इंटरनैट सेवाएं ही निलंबित करने का विकल्प खुला हुआ है.

इस से पहले सरकारें, धारा 144 के तहत ही इंटरनैट शटडाउन को जायज ठहराती रही हैं. इसी कायदे के तहत जम्मूकश्मीर तो इंटरनैट बैन के मामले में तीर्थ ही बन गया है. वहां नैटबंदी के लिए सरकारप्रशासन को ज्यादा बहाने खोजने की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में ऐसा हो, तो हैरानी होती है. अब तो ऐसी स्थितियां बन गई हैं कि कहीं भी हालात जरा से बेकाबू होते दिखाई देते हैं, वहां प्रशासन पहला काम नैटबंदी करने का ही करता है. जैसे इस साल जून की शुरुआत में मेघालय की राजधानी शिलौंग में सिखों और स्थानीय खासी जनजाति के लोगों के बीच मामूली बात पर एक विवाद पैदा हुआ. इस से पहले कि वहां हालात सुधारने के लिए कर्फ्यू लगाया जाता, लेकिन स्थानीय सरकार व प्रशासन ने साइबर कर्फ्यू लगा दिया और दावा किया गया कि इस से हालात सुधर जाएंगे, सांप्रदायिक झगड़ेझंझट की नौबत नहीं आएगी, लेकिन असल में वहां हालात तभी संभले, जब वास्तविक कर्फ्यू लगाया गया.

दावा किया जा रहा है कि असली कर्फ्यू की तरह साइबर कर्फ्यू का उद्देश्य भी यही है कि किसी भी अशांत जगह पर अमनचैन लौटे और कानूनव्यवस्था कायम हो. लेकिन बीते कुछ बरसों से साइबर कर्फ्यू ज्यादा जोर पकड़ रहा है, बल्कि स्थिति यह बनी है कि असली कर्फ्यू लगे या नहीं, साइबर कर्फ्यू जरूर लगा दिया जाता है. जब पढ़ाई, खरीदारी, बैंकिंग, रिजर्वेशन, औनलाइन खबरें पढ़ने, वीडियो फिल्में देखने से ले कर तमाम तरह का ज्ञान इंटरनैट के जरिए बांटा और हासिल किया जा रहा हो, ऐसी स्थिति में अगर साइबर कर्फ्यू लगा दिया जाए तो क्या हालत होती होगी. इस से शायद ही कोई अनजान हो कि इंटरनैट बैन कर दिया जाए तो किस तरह नैटसंचालित सारी चीजों का आवागमन रुक जाता है. लेकिन सरकार कहती है कि उसे जीवन रोक देने वाली इन चीजों से ज्यादा चिंता इस की है कि अफवाहें न फैलें, आतंकी अपने मंसूबों में सफल न होने पाएं.

वैसे हाल की घटनाओं पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि जम्मूकश्मीर के बाहर मेघालय में सिखों और स्थानीय खासी जनजाति के बीच टकराहट के मौके पर, हरियाणा में जाट आरक्षण के दौरान, गुजरात में पटेल आंदोलन के दौरान, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में अलगअलग मौकों पर इंटरनैट बैन किया गया. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में सांप्रदायिक तनाव के दिनों में इंटरनैट सेवाएं बाधित की गईं, तो वर्ष 2017 में जम्मूकश्मीर में आतंकी बुरहान बानी के एनकाउंटर के बाद लगातार 17 दिनों तक इंटरनैट सेवाएं बंद रखी गई थीं. कुछ ऐसा ही हाल 2017 में मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों पर हुई फायरिंग के बाद 3 जिलों में साइबर कर्फ्यू के रूप में हुआ और चौबीस परगना जिले में भड़काऊ फेसबुक पोस्ट के बाद पश्चिम बंगाल में इंटरनैट बंद रखने के रूप में दिखा.

सब से आगे होंगे हिंदुस्तानी जून 2018 में यूनेस्को और इंटरनैशनल फैडरेशन औफ जर्नलिस्ट्स की ओर से जारी ‘साउथ एशिया प्रैस फ्रीडम रिपोर्ट 2017-18’ पर नजर दौड़ाने से पता चलता है कि मई 2017 से अप्रैल 2018 के बीच की अवधि में पूरे दक्षिण एशिया में इंटरनैट शटडाउन की जो 97 घटनाएं रिकौर्ड हुईं, उन में से 82 घटनाएं अकेले भारत में हुईं.

यहां तक पड़ोसी पाकिस्तान और अफगानिस्तान इस मामले में हम से बेहतर स्थिति में हैं, क्योंकि समान अवधि में पाकिस्तान में सिर्फ 12 बार इंटरनैट शटडाउन किया गया, जबकि अफगानिस्तान और श्रीलंका में मात्र एकएक घटना दर्ज की गई. अफगानिस्तान में तो कहा जा सकता है कि ज्यादा लोगों तक इंटरनैट की पहुंच नहीं है, लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं है. इसलिए भारत में इंटरनैट बैन का मामला थोड़ा पेचीदा लगता है. इसीलिए यहां सवाल पैदा होता है कि हमारी सरकार को इंटरनैट रोकना इतना जरूरी क्यों लगता है? क्या बोले सरकार

सरकार से पूछें तो इस का जवाब यह है कि अकसर कानून व्यवस्था को खतरे की आशंका होने पर इंटरनैट शटडाउन के आदेश दिए जाते हैं. जिस समाज में चोटीकटवा का आतंक सोशल मीडिया पर सवार हो कर पूरे उत्तर भारत को महीनों तक परेशान कर सकता है, जिस देश में क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद और इसी किस्म की समाज को विभाजित करने वाली अफवाह फेसबुकव्हाट्सऐप के माध्यम से जंगल की आग की तरह फैलाई जा सकती है, वहां इंटरनैट शटडाउन सरकार का एक जरूरी उपाय लगता है. यह कई बार साबित हुआ है कि जो सूचनाएं या खबरें सोशल मीडिया पर फैलाई गईं उन के पीछे कुछ उपद्रवी तत्त्व थे और इन सूचनाओं के कारण सामाजिक सद्भाव खतरे में पड़ गया.

यही नहीं, बाद में यह साबित भी हुआ कि ऐसी ज्यादातर सूचनाएं फर्जी निकलीं और उन के पीछे शरारती तत्त्वों की भूमिका थी, लेकिन इस का दूसरा पहलू भी है. जैसा कि यूनेस्को की रिपार्ट बताती है कि सूचनाओं को बाधित करने वाले साइबर कर्फ्यू से एक तरफ लोगों का स्वतंत्र रूप से सूचना हासिल करने का अधिकार बाधित होता है, वहीं दूसरी तरफ मीडिया के लिए अपना काम करना कठिन हो जाता है. घरदफ्तर के अनगिनत काम साइबर कर्फ्यू से प्रभावित होते हैं, इस का अंदाजा तो आज की इंटरनैट पर निर्भर दुनिया को देख कर आसानी से लगाया ही जा सकता है. पाबंदी से अरबों का नुकसान

इंटरनैट शटडाउन अब काफी ज्यादा आर्थिक नुकसान का सबब भी बन रहा है. यह नुकसान कितना है, इस का एक अनुमान हाल में इंडियन काउंसिल फौर रिसर्च औन इंटरनैशनल इकोनौमिक रिलेशंस (आईसीआईईआर) ने लगाया है. मई 2018 में जारी अपनी रिपोर्ट में आईसीआईईआर ने कहा कि पिछले 5 वर्षों में भारत में अलगअलग जगहों पर करीब 16 हजार घंटों के लिए इंटरनैट शटडाउन रखा गया, जिस से भारतीय अर्थव्यवस्था को मोटेतौर पर 3 अरब डौलर की चपत लगी. यह नुकसान इंटरनैट कंपनियों और सरकारी कामकाज में पैदा हुए व्यवधान का है, अगर इस में आम लोगों को हुई क्षति को जोड़ा जाए, तो यह मामला शायद कई सौ अरब डौलर की हानि का बनेगा.

यही नहीं, एक सिविल सोसायटी संगठन एक्सेस नाऊ ने शटडाउन ट्रैकर औप्टिमाइजेशन प्रोजैक्ट चला कर हासिल किए गए आंकड़ों के आधार पर दावा किया कि साल 2017 में भारत में इंटरनैट शटडाउन की 54 घटनाएं हुईं जो 30 देशों की लिस्ट में सब से ज्यादा हैं. सरकार की ओर से लगाई ऐसी बंदिशों का क्या औचित्य है और क्या ऐसी बातों की जरूरत सरकारी दायरों से बाहर नहीं है. ये सारे सवाल इस कोशिश के साथ ही उठते हैं और इन के हल भी खोजने की जरूरत बनती है. उल्लेखनीय है कि दुनिया के अन्य विकसित और विकासशील देशों की तरह ही भारत में भी साइबरस्पेस का दायरा तेजी से बढ़ रहा है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में ही हमारे देश में वायरलैस दूरसंचार सुविधाओं (जिन में इंटरनैट का हिस्सा सब से ज्यादा है) का घनत्व 5 प्रतिशत से बढ़ कर 85 प्रतिशत हो गया और इंटरनैट की पहुंच 10 लाख से भी कम यूजर्स से बढ़ कर 40-45 करोड़ यूजर्स तक पहुंच गई है.

इस से साबित होता है कि इंटरनैट के जरिए हमारे काम करने और एकदूसरे से संपर्क व संवाद करने के तौरतरीकों में पिछले 10 सालों में भारी तबदीली आई है. आज बैंकिंग और वित्त ही नहीं, परिवहन, संचार, रक्षा और इंडस्ट्री के विभिन्न क्षेत्रों का कामकाज काफी हद तक साइबर दुनिया पर निर्भर है. सैटेलाइटों के जरिए सूचना और मनोरंजन के कार्यक्रमों के प्रसारण से ले कर देश की सुरक्षा जैसे अति महत्त्वपूर्ण कार्य भी इसी साइबर स्पेस पर आश्रित हैं. दुरुपयोग का खतरा

इस निर्भरता का एक बड़ा पहलू यह है कि जितना यह सुगम है, उतना ही इस के पलक झपकते ही छिन्नभिन्न होने और इस के दुरुपयोग किए जाने का खतरा है. दुनिया में कहीं भी बैठे हैकर हमारी महत्त्वपूर्ण सूचनाएं चुरा सकते हैं, उन का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं और हमारी बैकिंग, परिवहन, सैटेलाइट्स सेवाओं को बाधित करने के अलावा सरकारी व सैन्य सेवाओं पर आभासी कब्जा जमा सकते हैं. चूंकि ये सारे संदेह सही लगते हैं, ऐसे में इंटरनैट पर बैन की जो पहलें सरकार की तरफ से हो रही हैं. उन के अपने अर्थ बताए जाते हैं. लेकिन इस के बावजूद इंटरनैट शटडाउन की अधिकता हमारी सरकार की कट्टरता पर भी सवाल उठाती है. पर इस से यह पता चलता है कि एक समाज के रूप में हम जागरूक नहीं हैं. हम न तो खबरों और अफवाहों में फर्क कर पाते हैं, न ही अफवाहों के खुद पर असर को नियंत्रित कर पाते हैं.

जिस दिन समाज यह अंतर करने में सफल हो जाएगा, इंटरनैट पर प्रतिबंधों की संख्या उतनी ही सीमित होती चली जाएगी. स्पष्ट है कि सरकार और समाज दोनों को इस मोरचे पर मिल कर काम करना पड़ेगा.

नोटबंदी और जीएसटी : नरेंद्र मोदी के तुगलकी फैसले

अब रिजर्व बैंक ने भी मान लिया है कि नरेंद्र मोदी के तुगलकी नोटबंदी का और जीएसटी लागू करने के फैसलों से छोटे और मझोले उद्योगों को बेहद असर पड़ा है. आज लाखों गृहिणियां परेशान हैं कि 36 व्यापारों के उद्योगों को चलाने वाले उन के पति हर समय चिंतित और तनाव में रहते हैं. इन दोनों बेवकूफी भरे फैसलों से व्यापारों की रेलगाडि़यों को पटरियों से उतरना पड़ गया. सैकड़ों तरह के व्यापार ही बंद हो गए हैं और सैकड़ों को अपने व्यापार के सारे गुर अपने ही कर्मचारियों या टैक्स कंसलटैंटों को बताने पड़े हैं. बाजार में पूंजी की कमी हो गई है और बहुतों पर कर एकत्र करने का बोझ भी आ गया है.

हिंदू धर्म की सुरक्षा के नाम पर जमा की गई वोटों से बनी सरकार ने अपने ही मुल्यों को एक छोटे से दौर में बारबार प्रहार कर इतना कमजोर कर दिया कि लाखों लोगों का जोश उन किसानों की तरह हो गया जो कभी सूखे की मार सहते हैं तो कभी बाढ़. अगर पति का व्यापार ठीक न चले पत्नियों के लिए आफत होता है क्योंकि घर का रंगढंग महीनों में बदल जाता है.

इस सरकार का मानना है कि हर जना टैक्स चोर है. ठीक वैसे ही जैसे हर धर्म मानता है कि उस का हर अनुयायी पापा है. धर्म पाप के प्रायश्चित के लिए कृत, त्याग, दान, कष्ठ की बात करता है तो धार्मिक सरकार भी ऐसे ही कानून बना रही है कि चोरों को पकड़ने के लिए सभी हर मुकदमा लगा दो. हरेक अपनी सफाई देता रहे कि माई बाप मैं ने कुछ नहीं किया, ले दे कर मुझे बख्श दो. चूंकि धर्म ने उसे यह आदत डाल रखी है, उसे यह करने में कुछ अजीब भी नहीं लगता.

6.3 करोड़ इकाइयों में लगे 11 करोड़ लोगों के इस सरकारी धर्म टैक्स और पापबंदी से बेहद नुकसान हुआ है.

हल्ला इसलिए नहीं मच रहा कि लोग जाओ और समझते हैं कि उन्होंने ही आगे बढ़चढ़ कर हिंदू धर्म की रक्षा के नाम पर सरकार को भरमार जीत दिलाई थी कि एक बार राम राज आया नहीं कि उन का उद्धार होगा. उन्हें शायद मालूम नहीं कि  राम राज के बाद सीता को बेघर होना पड़ा, लक्ष्मण को आत्महत्या करनी पड़ी थी. महाभारत युद्ध के बाद कौरब तो मरे ही पांडव भी खुश नहीं रख पाए थे.

सदियों तक सभी समाजों में धर्म पर आधारित सरकारें रही हैं और इन सभी में आम नागरिकों को गुलामी सी सहने पड़ी थी. यह केवल पिछले 500 सालों में हुआ कि सरकार और धर्म अलग हुए थे. यूरोप, अमेरिका, जापान, कोरिया, चीन ने इस का लाभ उठाया और वहां औरतें भी बराबर का सम्मान पा सकीं हैं और व्यापार भी चमके.

इस्लामी देशों में सब से बुरी हालत हैं क्योंकि वहां धर्म लोगों को 7वीं सदी से आगे निकलने ही नहीं दे रहा. नोटबंदी और जीएसटी हमारे यहां सरकारी यज्ञों में मेहनत और सूझबूझ की आहूतियों के लिए कराए गए थे. मौज तो या तो सरकारी पुरोहितों की है या फिर पुरोहितों को पालने वाले राज्यनुमा सेठों की.

‘जलेबी’ का पोस्टर हुआ रिलीज, महेश भट्ट पर लगा आइडिया चुराने का आरोप

महेश भट्ट और विशेष फिल्म्स ने अपनी फिल्म ‘जलेबी: द एवरलास्टिंग टेस्ट औफ लव’ का फर्स्ट लुक रिलीज किया है. आप इस पोस्टर में देख सकते हैं कि ट्रेन की आपातकालीन खिड़की से लटकी हुई रिया चक्रवर्ती अपने बौयफ्रेंड वरुण मित्रा को लिप किस करती नजर आ रही हैं.वरुण मित्रा ने रिया को हाथों से पकड़कर संभाला हुआ है. दोनों को इस तरह किस करता देख ट्रेन में बैठे यात्री हैरान हैं. दोनों के इस हौट लिप किस को देखकर लगता है फिल्म में दोनों का रोमांस खूब जलेबियां बनाने वाला है.

‘जलेबी’ के मेकर्स ने फिल्म के फर्स्ट पोस्टर को सोशल मीडिया पर भी शेयर किया है. उन्होंने पोस्टर को शेयर करते हुए लिखा, ‘इस पल-पल बदलती दुनिया में पुरानी कहानियां तो खत्म हो रही हैं लेकिन उनकी जगह कोई नई कहानी उभर कर नहीं आ रही. ऐसे में इन कहानियों की जगह लेने के लिए आई है एक नई कहानी जिसका प्यार कभी खत्म नहीं होगा.

इस पोस्टर के रिलीज होते ही ट्विटर यूजर्स ने महेश भट्ट पर पोस्टर के लिए आइडिया चुराने का आरोप लगाते हुए ऐसी ही कई और तस्वीरें पोस्ट कर दीं. कुछ लोगों को यह इसलिए पसंद नहीं आ रहा कि उन्होंने इसे कोरियन वार के समय ली गई तस्वीर की कौपी बताई है. एक ट्विटर यूजर ने ऐसी ही तस्वीर पोस्ट की जो कोरियन वार के समय की बताई गई है. इस तस्वीर को पोस्ट करते हुए ट्विटर यूजर ने लिखा है, ‘ये बौलीवुड वाले एक पोस्टर भी खुद की नहीं निकाल सकते.’ इसके बाद एक और यूजर ने झट से किसी टौलीवुड फिल्म की पोस्टर भी पोस्ट कर दी, फर्क सिर्फ इतना है कि यहां ट्रेन की जगह बस है.

हालांकि वहीं दूसरी तरफ करण जौहर ने इस फिल्म की तारीफ में ट्वीट कर कहा, ‘मैंने जलेबी का सारा सौन्ग सुना और मैं यह पक्के तौर पर कहूंगा कि मैं मंत्रमुग्ध हो गया हूं. यह जादुई अंदाज फिर से बिखेरने के लिए मुकेश भट्ट और महेश भट्ट तारीफ के काबिल हैं.’

बता दें कि फिल्म ‘जलेबी’ में रिया चक्रवर्ती भी नजर आएंगी. यह फिल्म 12 अक्टूबर को रिलीज होने जा रही है. महेश भट्ट की इस फिल्म से टीवी ऐक्ट्रेस दिगांगना सूर्यवंशी बौलीवुड में डेब्यू करने जा रही हैं. दिगांगना टीवी शोज ‘कुबूल है’, ‘वीरा’ और रिऐलिटी शो ‘बिग बौस’में भी नजर आ चुकी हैं.

सोशल एक्टिविस्टों की गिरफ्तारी असहमति को कुचलने की कोशिश

महाराष्ट्र पुलिस द्वारा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तारी से देश में बड़े पैमाने पर मानवाधिकार और बुद्घिजीवियों ने नाराजगी जताई है. भीमा कोरेगांव मामले के नाम पर पुलिस ने 3 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था जबकि 2 की गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी.

28 अगस्त को सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वेरवान गोंजाल्विस, अरुण फरेरा और वरवर राव की गिरफ्तारी के साथ स्टैन स्वामी, सुजैन  अब्राहम और आनंद तेलतुम्बडे के घरों पर एक साथ छापेमारी की गई. पुणे पुलिस का दावा है कि इन लोगों का नक्सलियों से संपर्क है और ये देश के लिए खतरा है. इन पर यह आरोप भी लगाया गया कि इन्होंने प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रची है.

इन गिरफ्तारियों को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनौती दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए मामला 5 जजों की पीठ को सौंप दिया. दोनों पक्षों की दलीलों के बाद सुनवाई 6 सितंबर को तय की थी पर तब तक के लिए आदेश दिया गया कि पुलिस इन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकेगी और इन्हें घर में ही नजरबंद रखा जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट को यह भी कहना पड़ा कि असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वाल्व है अगर आप इसकी इजाजत नहीं देंगे तो यह सेफ्टी वाल्व फट जाएगा. असल में पुणे के पास भीमा कोरेगांव में दलितों के शौर्य का जश्न मनाने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम के बाद उन पर जो हिंसा हुई थी, पुलिस को उस की जांच करनी थी. भीमा कोरेगांव में हर साल दलित शौर्य के नाम पर कार्यक्रम का आयोजन किया जाता हैं.

इस साल जनवरी में 200वीं वर्षगांठ होने पर कोरेगांव में लाखों की संख्या में दलित जुटे थे. उन का मानना है कि 200 साल पहले पेशवाओं के साथ युद्घ में अंगरेजों की जो जीत हुई थी, वह दलित सैनिकों की वजह से मिली थी. पेशवा सेना का नेतृत्व बाजीराव द्वितीय कर रहे थे. दलित इस लड़ाई में अपनी जीत मानते हैं. उन के मुताबिक इस लड़ाई में दलितों के खिलाफ अत्याचार करने वाले पेशवा की हार हुई थी.

इस कारण दलित यहां विजय स्तंभ के सामने अपना सम्मान प्रकट करते हैं. यह विजय स्तंभ ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1818 के युद्घ में शामिल होने वाले लोगों की याद में बनाया था. इस स्तंभ पर युद्घ में शामिल होने वाले महान योद्घाओं के नाम अंकित हैं.

इस बार यहां दलित समुदाय के लोगों ने एल्गार परिषद के नाम से शनिवार वाड़ा में जनसभाएं की थीं. जनसभा में कई दलित, मानवाधिकार नेताओं, बुद्घिजीवियों ने  भाषण दिए थे. जनसभा में मुद्दे हिंदुत्व राजनीति के खिलाफ थे. इस कार्यक्रम का अखिल भारतीय ब्राह्मण सभा समेत कई संगठनों ने राष्ट्रविरोधी बता कर विरोध किया था और हिंसा छिड़ गई. हिंसा में एक आदमी मारा गया और कई घायल हो गए थे.

मामले में कार्यक्रम के दौरान भड़काऊ भाषण देने वालों के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज हुई थीं. आरोप लगाया गया था कि उन्होंने समुदायों के बीच नफरत पैदा कर शांति भंग की. महाराष्ट्र पुलिस ने इस में दूसरी एफआईआर में अधिक दिलचस्पी दिखाई. इस के कार्यक्रम को माओवादियों की साजिश बताया गया था.

इसी आधार पर 6 जून को मुंबई के वकील सुरेंद्र गाडलिंग, प्रोफेसर शोमा सेन, दलित लेखक सुधीर धवले और कैदियों के लिए काम करने वाली रोना विल्सन को गिरफ्तार किया गया था. उधर दलित संगठनों ने हिंसा के लिए हिंदू कट्टरपंथी संगठनों को जिम्मेदार ठहराया था. उन का कहना था कि समस्त हिंदू अगाडी संगठन के मिलिंद एकबोटे और शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान के संभाजी भिडे ने हिंसा की साजिश रची थी. पुलिस ने इन के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी. पुलिस खोजबीन में मिलिंद एकबोटे तो पकड़ा गया पर संभाजी भिडे खुलेआम आजाद घूम रहा है.

इन बुद्घिजीवियों ने दलितों के पक्ष में आ कर हिंसा का विरोध किया था. मामले में पुलिस में जो एफआईआर दर्ज हुई उस में इन लोगों के नाम नहीं थे. भीमा कोरेगांव में हिंसा की जब जांच शुरू हुई तो अप्रैल माह में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रोना विल्सन के घर से पुलिस को एक चिट्ठी मिली थी. कहा गया कि इस चिट्ठी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तरह मारने की बात सामने आई. रोना विल्सन को भीमा कोरेगांव आंदोलन के दौरान हिंसा भड़काने और देश में उत्पात मचाने के लिए नक्सली आतंकवादियों  से मिल कर साजिश के आरोप में पुलिस ने पकड़ा था.

जिन लोगों पर आरोप लगाया गया है उन में सुधा भारद्वाज नेशनल ला यूनिवर्सिटी, दिल्ली में विजिटिंग प्रोफेसर हैं. वह छत्तीसगढ मुक्ति मोरचा की संस्थापक सदस्य हैं और आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम कर रही हैं. वह पीपुल्स यूनियन फोर सिविल लिबर्टीज [पीयूसीएल] की संस्थापक भी हैं.

दरअसल भाजपा सरकार का माउथपीस माने जाने वाले रिपब्लिक टीवी चैनल ने हाल ही में सुधा भारद्वाज के बारे में एक खबर प्रसारित की थी कि उन्होंने कामरेड प्रकाश को पत्र लिख कर छत्तीसगढ के हालात कश्मीर जैसा बनाने को कहा था. इस चैनल ने माओवादियों से पैसा लेने का आरोप भी लगाया था. इस पर सुधा भारद्वाज ने रिपब्लिक टीवी पर व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाते हुए कानूनी नोटिस भेजा था.

इधर एक और आरोपी गौतम नवलखा इकोनोमिक एंड पोलिटिकल विकली के सलाहकार संपादक हैं. वह पीपुल्स यूनियन फोर डेमाक्रेटिक राइट के सचिव भी हैं. नवलखा भी छत्तीसगढ के आदिवासी इलाकों में काम कर रहे हैं. अरुण फरेरा मुंबई हाईकोर्ट में वकालत करते हैं और दलित अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहे हैं. वरवर राव क्रांतिकारी कवि माने जाते हैं. वरनान गोंजाल्विस लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.

ये लोग देश के वंचितों, गरीबों, आदिवासियों को कानून के जरिए उन का हक दिलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं पर पुलिस को अब साबित करना होगा कि ये लोग किस तरह और कैसे देश के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं और प्रधानमंत्री को इन लोगों से कैसे जान का खतरा है.

असल में इन दिनों सरकार बुरी तरह घिरी हुई है. मौब लिंचिंग, राफेल घोटाला, नोटबंदी, जीएसटी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मामलों पर विपक्ष और बुद्घिजीवियों ने सरकार को निशाने पर ले रखा है. बेरोजगारी, किसानी के मोरचे पर भी युवा और किसान सरकार से नाराजगी प्रगट कर रहे हैं.

आरक्षण के मुद्दे पर दलित और पिछड़े सरकार की मंशा को संदेह की नजर से देख रहे हैं इसलिए जो लेखक, बुद्घिजीवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता खिलाफत कर रहे हैं उन से निपटने के लिए सरकार दमन की काररवाई कर आवाज को दबाना चाह रही है क्योंकि इस तरह के मुद्दों से सरकार खुद को असुरक्षित महसूस कर रही है. लिहाजा तर्कवादी लेखकों, उदारवादियों, मानवाधिकारवादियों को सरकार की नाकामी के मुद्दों पर बोलना भारी पड़ रहा है.

ऐसे में सरकार घबरा कर अपनी असुरक्षा से उपजी छटपटाहट में इन लोगों के दमन पर उतरी दिखाई दे रही है. ऐसा हर तानाशाह सरकार करती आई है. उन्हें आलोचना पसंद नहीं है. इस साल देश के 4 प्रमुख राज्यों में विधानसभा और अगले साल लोकसभा के चुनाव है इसलिए अपने खिलाफ उठ रही आवाज को दबाने के प्रयास किए जा रहे हैं.

बढ़त के बाद विपक्षी टीम को मौका नहीं देना चाहिए : विराट

इंग्लैंड में 18 में से 15वीं टेस्ट सीरीज हारने वाली भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली ने कहा कि इंग्लैंड ने बहुत अच्छा खेल दिखाया. उन्होंने हमें बड़ा लक्ष्य दिया. जिस तरह की पिच थी और गेंद स्पिन कर रही थी उससे हमें दिक्कत हुई. शनिवार की रात को हमारे दिमाग में था कि हम मैच में हैं, लेकिन रविवार की सुबह हमें अच्छी शुरुआत नहीं मिली. उन्होंने गेंद से हम पर निरंतर दबाव डाला. उन्होंने अच्छी गेंदबाजी की. जीत का श्रेय इंग्लैंड को जाता है.

मैच में पकड़ बनाने के बावजूद हारने पर उन्होंने कहा कि हमने इस पर बात की है. हमें बढ़त बनाने के बाद विपक्षी टीम को हम पर हावी होने का मौका नहीं देना चाहिए. हमने नॉटिंघम में ऐसा किया था. यहां भी तीन दिन हम आगे थे. एक ग्रुप के तौर पर हमें और निरंतर होने की जरूरत है. एक बड़ी सीरीज में खास तौर पर, जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा था क्योंकि इसमें वापसी की संभावना होती है. हमें नहीं लगता कि हमें किसी को कुछ साबित करना है. जब हम घर में खेलते हैं तो अधिकतर टीमें हमारे आसपास भी नहीं होती हैं.

सीरीज में 1-3 से पीछे होने पर उन्होंने कहा कि क्रिकेट पत्रकार और क्रिकेटर के तौर पर हमें पता है कि स्कोर बोर्ड क्रिकेट को परिभाषित नहीं करता. हो सकता है कि आप सीरीज में 3-0 से आगे हों और विपक्षी आखिरी दो मैच जीत जाए और कहा जाए कि सीरीज काफी करीबी रही, लेकिन वास्तव में यह करीबी नहीं है. यह तब होता है जब हर मैच ऊपर-नीचे झूलता है. लॉर्डस को छोड़कर यह सीरीज कांटे की रही. मैच के बाद जो रूट ने भी यह माना है. सीरीज को सिर्फ जीत और हार में परिभाषित नहीं किया जा सकता. यह बहुत कठिन सीरीज रही है और हमने इसका आनंद लिया.

रहाणे के साथ अपनी साझेदारी पर विराट ने कहा कि हम दोनों साझेदारी करना चाहते थे. हमारे दिमाग में एक समय में एक गेंद थी. जब हम साझेदारी कर रहे थे तो हमने उसका मजा लिया लेकिन मेजबान गेंदबाजों ने वापस खींच लिया और यही टेस्ट क्रिकेट की खूबसूरती है. इस मैच में हार के कई कारण थे. हम पहली पारी के आधार पर बड़ी बढ़त ले सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हम अगले टेस्ट में सकारात्मक होकर जाएंगे. इंग्लैंड के निचले क्रम के बल्लेबाजों के रन बनाने पर उन्होंने कहा कि इस पोजीशन पर जो अच्छे से गेंद हिट करते हैं उन्हें रन मिलते हैं. आप अच्छी साझेदारी करके विपक्षी टीम को नुकसान पहुंचा सकते हैं. वह कठिन परिस्थितियों में हम से ज्यादा जीदार निकले. निचले क्रम से रन आना बहुत महत्वपूर्ण होता है. मैं सैम कुर्रन को बधाई देना चाहता हूं. वह शानदार खिलाड़ी है.

इस सीरीज में अगर लॉर्डस टेस्ट को छोड़ दें तो ऐसा कोई मैच नहीं जिसमें हम मुकाबले से बाहर रहे हों. हम ओवल जाएंगे और इसी ताकत से दोबारा वापस आएंगे.

पूरी सीरीज में कुर्रन ने कमाल किया : रूट

इंग्लैंड के कप्तान जो रूट ने टीम के 20 वर्षीय युवा ऑलराउंडर सैम कुर्रन की जमकर तारीफ की. उन्होंने कहा कि इस मैच में ही नहीं, बल्कि पूरी सीरीज में इस युवा ने प्रभावित किया है. सीरीज जीतने पर उन्होंने कहा कि यह बहुत आनंददायक है. इसका पूरा श्रेय टीम को जाता है. कोहली-रहाणे की साझेदारी पर उन्होंने कहा कि जब यह दोनों थे तो इंग्लैंड के तेज गेंदबाज जितनी तेजी से गेंद को पिच पर पटक सकते थे उतनी तेजी से पटक रहे थे.

उन्होंने कहा कि हम रक्षात्मक की जगह जितना आक्रामक हो सकते थे उतना थे. हमें पता था कि एक गेंद खेल बदल देगी. हमें अपनी प्रक्रिया पर भरोसा था और यह असाधारण रहा. उन्होंने कहा कि हम इसका उपयोग आगे कर सकते हैं और इसे आगे बढ़ा सकते हैं. यह हमें अच्छी स्थिति में खड़ा कर देगा. मैन ऑफ द मैच मोइन अली की तारीफ करते हुए रूट ने कहा कि वह कुछ मैचों में टीम से दूर रहे, लेकिन आइपीएल और काउंटी में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद उन्होंने अच्छी वापसी की. इंग्लैंड के लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजी की. यही टीम की ताकत है.

भारतीय खिलाड़ियों ने जगाई भविष्य की सुनहरी उम्मीद

पिछले दो हफ्तों में भारत ने दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मल्टी स्पोर्टिंग आयोजन में जो कुछ भी हासिल किया उसने देश की अपेक्षाओं को पूरा किया और भविष्य के लिए एक नई उम्मीद जगाई. पिछले कॉमनवेल्थ गेम्स में अच्छे प्रदर्शन के बाद भारत ने इंडोनेशिया में एशियन गेम्स के इतिहास में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया.

खेलों के क्षेत्र में उत्कृष्टता की खोज में भारत ने महाद्वीप में कभी इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था जिसे ओलंपिक के बाद दूसरा सबसे बड़ा आयोजन माना जाता है. यहां तक कि भारत के पदक विजेताओं की यह उपलब्धि क्रिकेट प्रेमियों के देश में नया उत्साह भरेगी.

एथलेटिक्स : ट्रैक एंड फील्ड में भारत ने सबसे ज्यादा सफलताएं हासिल कीं, क्योंकि 15 स्वर्ण में से सात स्वर्ण एथलेटिक्स में ही आए. वह तेजिंदर पाल सिंह तूर थे जिन्होंने 20.75 मीटर तक गोला फेंककर रिकॉर्ड प्रदर्शन के साथ भारत को एथलेटिक्स में इस आयोजन का पहला स्वर्ण पदक दिलाया. इसके बाद पैरों में 12 अंगुलियों वाली स्वप्ना बर्मन हेप्टाथलन में देश को सुनहरी सफलता दिलाने वाली पहली भारतीय एथलीट बनीं. अनुभवी दुति चंद धमाकेदार प्रदर्शन के साथ ट्रैक पर लौटीं और पिछले 20 वर्षों में एशियन गेम्स की इस स्पर्धा में पदक जीतने वाली पहली भारतीय एथलीट बनीं. नीरज चोपड़ा भाला फेंक में स्वर्ण जीतने वाले पहले भारतीय बने और भारत की उम्मीदों पर खरे उतरे. मंजीत सिंह और जिंसन जॉनसन ने भी अपने साहसी खेल के साथ कुछ आंकड़े बदल दिए.

बैडमिंटन : साइना नेहवाल और पीवी सिंधू ने अपने अच्छे प्रदर्शन को एशियाड में भी जारी रखा और देश के 36 वर्षो से चले आ रहे व्यक्तिगत पदक के इंतजार को खत्म किया. सिंधू का रजत और साइना का कांस्य पदक भारतीय बैडमिंटन दल की उपलब्धियां रहीं.

टेबल टेनिस : टेबल टेनिस में भी भारत ने दो ऐतिहासिक कांस्य पदक हासिल किए. यकीनन मनिका बत्र गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की सबसे सफल खिलाड़ी रही थीं लेकिन एशियन गेम्स में चीन और जापान जैसे धुरंधर टीमों की मौजूदगी में टीम स्पर्धा में भारत का दो कांस्य पदक जीतना बड़ी कामयाबी रही. बत्र, शरत कमल, जी साथियान और हरमीत देसाई उनके प्रयास के लिए तारीफ के पात्र हैं.

निशानेबाजी : पालेमबैंग में 16 वर्षीय सौरभ चौधरी और 15 वर्षीय शादरुल विहान ने दिखाया कि भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन युवा मनु भाकर और अनीश भानवाला पदक नहीं जीत पाने से जरूर निराश होंगे. राही सरनोबत के साथ सौरभ स्वर्ण पदक विजेता रहे, जबकि शादरुल ने रजत पदक जीता.

कुश्ती : बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट ने मैट पर राज किया. दोनों ने पुरुष और महिला वर्ग की अपनी स्पर्धाओं में दमदार प्रदर्शन के साथ स्वर्ण पदक जीता. हालांकि, दोहरे ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार और रियो ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता साक्षी मलिक ने निराश किया.

ब्रिज : दो दोस्त प्रणव बर्धन और शिवनाथ सरकार की जोड़ी ने स्वर्ण पदक जीतकर इस खेल की ओर सबका ध्यान खींचा और समझाने की कोशिश की कि ब्रिज जुआ नहीं, बल्कि एक खेल है जिसमें काफी दिमाग लगता है.

मुक्केबाजी : अमित पंघाल ने मुक्केबाजी में भी देश को सुनहरी सफलता दिलाई. सेना के इस जवान ने ओलंपिक चैंपियन को हराकर भारत को स्वर्ण पदक दिलाया. विकास कृष्णन ने भी एशियाड में लगातार तीसरा पदक जीतकर बड़ी उपलब्धि हासिल की.

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