Download App

मोहब्बत का लाल रंग : कुलदीप ने रंगे प्रेमिका के खून से हाथ

कानपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर एक कस्बा है बिल्हौर. इस कस्बे से सटा एक गांव है दासा निवादा, जहां छिद्दू का परिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी रमा के अलावा 2 बेटे सतीश, नेमचंद्र तथा 2 बेटियां विजयलक्ष्मी और पूनम थीं. विजयलक्ष्मी को ज्यादातर शबनम के नाम से जाना जाता था.

छिद्दू गरीब किसान था. उस के पास नाममात्र की जमीन थी. वह मेहनतमजदूरी कर के किसी तरह परिवार का भरणपोषण करता था. खेतीकिसानी में उस के दोनों बेटे भी सहयोग करते थे.

तीखे नैननक्श और गोरी रंगत वाली विजयलक्ष्मी उर्फ शबनम छिद्दू की संतानों में सब से सुंदर थी. समय के साथ जैसेजैसे उस की उम्र बढ़ रही थी, उस के सौंदर्य में भी निखार आता जा रहा था. उस का गोरा रंग, बड़ीबड़ी आंखें, तीखे नैननक्श, गुलाबी होंठ और कंधों तक लहराते बाल किसी को भी उस की ओर आकर्षित कर सकते थे. अपनी खूबसूरती पर शबनम को भी बहुत नाज था.

यही वजह थी कि जब कोई लड़का उसे चाहत भरी नजरों से देखता तो वह उसे इस तरह घूर कर देखती मानो खा जाएगी. उस की टेढ़ी नजरों से ही लड़के उस से डर जाते थे. लेकिन कुलदीप शबनम की टेढ़ी नजर से जरा भी नहीं डरा.

कुलदीप का घर शबनम के घर से कुछ ही दूरी पर था. उस के पिता देवी गुलाम खेतीबाड़ी करते थे. उन की 3 संतानों में कुलदीप सब से छोटा था. वह सिलाई का काम करता था. उस की कमाई ज्यादा अच्छी नहीं तो बुरी भी नहीं थी. अच्छे कपड़े पहनना और मोटरसाइकिल पर घूमना कुलदीप का शौक था.

शबनम तनमन से जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही वह पढ़नेलिखने में भी तेज थी. बिल्हौर के बाबा रघुनंदन दास इंटर कालेज से हाईस्कूल पास कर के उस ने 11वीं में दाखिला ले लिया था. अपने कामधाम और स्वभाव की वजह से वह अपने मांबाप की आंखों का तारा बनी हुई थी.

शबनम के कालेज आनेजाने में ही कुलदीप की निगाह शबनम पर पड़ी थी. पहली ही बार में वह उस की ओर आकर्षित हो गया था. वह उसे तब तक देखता रहता था, जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो जाती थी. ऐसा नहीं था कि कुलदीप ने शबनम को पहली बार देखा था. इस के पहले भी उस ने शबनम को कई बार देखा था. लेकिन तब और अब में जमीनआसमान का अंतर था.

शबनम कुलदीप के मन को भायी तो वह उस का दीवाना हो गया. उस के कालेज आनेजाने के समय वह रास्ते में खड़ा हो कर उस का इंतजार करने लगा. शबनम उसे दिखाई दे जाती तो वह उसे चाहत भरी नजरों से देखता रहता, लेकिन शबनम थी कि उसे भाव ही नहीं दे रही थी.

धीरेधीरे उस की बेचैनी बढ़ने लगी थी. हर पल उस के मन में शबनम ही छाई रहती. यहां तक कि उस का मन सिलाई के काम में भी नहीं लगता था. उस के मन की बेचैनी तब और बढ़ जाती, जब शबनम उसे दिखाई दे जाती.

जब कुलदीप के लिए शबनम के करीब पहुंचने की तड़प बरदाश्त से बाहर हो गई तो उस ने शबनम के भाई सतीश से दोस्ती कर ली और मिलने के बहाने उस के घर आनेजाने लगा. सतीश के घर पर कुलदीप बातें भले ही दूसरों से करता था लेकिन उस की नजरें शबनम पर ही जमी रहती थीं. जल्दी ही इस बात को शबनम ने भी भांप लिया.

कुलदीप की आंखों में अपने प्रति चाहत देख कर शबनम का मन भी विचलित हो उठा. वह भी अब कुलदीप के आने का इंतजार करने लगी. जब कुलदीप आता तो वह उस के पास ही मंडराती रहती.

दोनों ही एकदूसरे का सामीप्य पाने के लिए बेचैन रहने लगे. कुलदीप की चाहत भरी नजरें शबनम की नजरों से मिलतीं तो वह मुसकरा कर मुंह फेर लेती. कई बार वह तिरछी नजरों से देखते हुए कुलदीप के आगेपीछे चक्कर लगाती रहती.

शबनम की कातिल निगाहों और मुसकान से कुलदीप समझ गया कि जो बात उस के मन में है, वही शबनम के मन में भी है. फिर भी वह अपनी बात शबनम से नहीं कह पा रहा था, जबकि शबनम पहल करने से कतरा रही थी.

सोचविचार कर कुलदीप ऐसे मौके की तलाश में रहने लगा, जब वह शबनम से अपने दिल की बात कह सके. यह सच है कि चाह को राह मिल ही जाती है. आखिर एक दिन कुलदीप को मौका मिल ही गया. शबनम को घर में अकेली पा कर कुलदीप ने कहा, ‘‘शबनम, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं. अगर बुरा न मानो तो मैं अपने मन की बात कह दूं?’’

‘‘बात ही तो कहनी है. कह दो. इस में बुरा मानने की क्या बात है.’’ शबनम नजरें चुराते हुए बोली. शायद उसे अहसास था कि कुलदीप क्या कहने वाला है.

‘‘शबनम तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो, मुझे तुम्हारे अलावा कुछ सूझता ही नहीं है.’’ कुलदीप नजरें झुका कर बोला, ‘‘हर पल तुम्हारी सूरत मेरी नजरों के सामने घूमती रहती है.’’

कुलदीप की बात सुन कर शबनम के दिल में गुदगुदी सी होेने लगी. वह शरमाते हुए बोली, ‘‘कुलदीप, जो हाल तुम्हारा है, वही हाल मेरा भी है. तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो.’’

शबनम का जवाब सुन कर कुलदीप ने उसे बाहों में भर कर कहा, ‘‘तुम्हारे मुंह से यही बात सुनने के लिए मैं कब से इंतजार कर रहा था.’’

उस दिन के बाद दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. शबनम कालेज के लिए निकलती तो कुलदीप सड़क पर मोटरसाइकिल लिए उस का इंतजार करता मिलता. शबनम के आते ही वह उसे मोटरसाइकिल पर बिठा कर कालेज छोड़ आता. शबनम जब कुलदीप की मोटरसाइकिल पर बैठती तो उस के किशोर मन की कल्पना के घोड़े तेज रफ्तार से दौड़ने लगते.

उसे लगता जैसे कुलदीप ही उस के सपने का राजकुमार है और वह उस के साथ घोड़े पर सवार हो कर कहीं दूर सपनों की दुनिया में जा रही है. कुलदीप उसे बाइक से कालेज छोड़ने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ता था. शबनम को भी उस का साथ भाने लगा था. शबनम बाइक से उतर कर जब उसे थैंक्स कहती तो कुलदीप का दिल खुश हो जाता.

इश्क की आग दोनों ओर बराबर भड़क रही थी. धीरेधीरे कुलदीप और शबनम के बीच की दूरियां सिमटने लगी थीं. अकसर तन्हाइयों में होने वाली दोनों की मुलाकातें उन्हें और ज्यादा नजदीक लाने लगी थीं. कुलदीप अब शबनम को तोहफे भी देने लगा था.

 

एक रोज कुलदीप शबनम के लिए एक कीमती सलवार सूट ले कर आया. सलवार सूट देख कर शबनम खुशी से झूम उठी. उस ने चहकते हुए पूछा, ‘‘इतना महंगा सलवार सूट क्यों लाए?’’

‘‘कीमती आभूषण पर महंगा नगीना ही सजता है, शबनम.’’ कुलदीप ने उस के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे आगे इस सूट की कीमत कुछ भी नहीं है.’’ कुलदीप अपना चेहरा उस के एकदम करीब ले आया.

शबनम के होंठ कंपकंपाने लगे. निगाहें हया से झुक गईं. उस ने कांपते शब्दों में पूछा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए इतना मायने रखती हूं.’’

‘‘हां, शबनम.’’ कुलदीप की सांसें उस के चेहरे से टकराने लगीं, ‘‘तुम मेरे लिए मेरी सांसों से ज्यादा मायने रखती हो. मैं दिल हूं तुम धड़कन. मैं दीया, तुम बाती. तुम फूल मैं खूशबू.’’ कहने के साथ ही उस ने शबनम का चेहरा ऊपर उठाया.

शबनम उस की बातों से मदहोशी के आलम में आ चुकी थी. खुशियों भरी लज्जा से उस की आंखें बंद हो गई थीं.

कुलदीप ने चेहरा झुका कर शबनम के होंठों को चूम लिया. सांसों से सांसें मिलीं तो शबनम की मदहोशी बढ़ गई. उस ने कुलदीप को रोका नहीं, बल्कि उस से लिपट गई. फिर तो तन से तन मिलने में ज्यादा समय नहीं लगा. दोनों सारी मर्यादाएं तोड़ कर एकदूसरे की बांहों में समा गए.

एक बार दोनों ने वासना की दलदल में कदम रखा तो उन की भावनाएं, उन की चाहत, सामाजिक मर्यादाएं सब उस दलदल में डूबते गए. घर के बाहर जहां भी मौका मिलता वे शरीर की आग शांत करने लगे.

कुलदीप शबनम के प्यार में ऐसा दीवाना हुआ कि उस की हर डिमांड पूरी करने लगा. बात करने के लिए उस ने शबनम को महंगा मोबाइल फोन खरीद कर दे दिया. रिचार्ज का पैसा भी शबनम उसी से लेती थी. इस के अलावा, कपड़े, फीस और उस के अन्य खर्चे भी कुलदीप ही उठाने लगा.

एक रोज शबनम ने कुलदीप से एक अजीब पेशकश की. उस ने प्यार के क्षणों में कहा, ‘‘कुलदीप मुझे बाइक चलाना सिखा दो. मैं भी तुम्हारी तरह फर्राटे भर कर बाइक चलाना चाहती हूं.’’

‘‘बाइक मर्द चलाते हैं, औरतें नहीं.’’ कुलदीप ने शबनम को समझाया, लेकिन वह जिद पर अड़ गई. अंतत: कुलदीप को शबनम की बात माननी पड़ी. वह उसे बाइक चलाना सिखाने लगा.

कुलदीप की मेहनत और शबनम की लगन काम आई, कुछ ही दिनों में वह सचमुच फर्राटे भरते हुए मोटरसाइकिल चलाने लगी. उस ने लाइसेंस भी बनवा लिया था. इस के बाद उस ने कुलदीप के सहयोग से एक पुरानी मोटरसाइकिल खरीद ली और उसी से कालेज आनेजाने लगी.

अब तक कुलदीप और शबनम के प्यार के चर्चे पूरे गांव में होने लगे थे. उड़तेउड़ते यह खबर शबनम के मांबाप के कानों में पड़ी तो सुन कर रमा और छिद्दू सन्न रह गए. उस दिन शबनम घर आई तो रमा उसे अलग कमरे में ले जा कर बोली, ‘‘शबनम, तुम पर मैं बहुत भरोसा करती थी, लेकिन तुम ने अभी से अपना खेल दिखाना शुरू कर दिया. बता कुलदीप के साथ तेरा क्या चक्कर है?’’

‘‘मां अगर जानना चाहती हो तो सुनो. कुलदीप और मैं एकदूसरे से प्यार करते हैं. हम दोनों शादी कर के अपना घर बसाना चाहते हैं.’’ शबनम ने विस्फोट किया तो छिद्दू और रमा समझ गए कि शबनम बेलगाम हो गई है. उसे समझाना आसान नहीं होगा.

चूंकि सवाल इज्जत का था, सो शबनम के दो टूक जवाब देने के बावजूद रमा ने उसे समझाया. छिद्दू भी कुलदीप के पिता देवी गुलाम के घर गया और इज्जत की दुहाई दे कर कुलदीप को समझाने के लिए कहा. देवी गुलाम ने आश्वासन दिया कि वह कुलदीप को समझाएगा. देवी गुलाम ने कुलदीप को समझाया भी, लेकिन उस ने पिता की बात एक कान से सुनी और दूसरे से निकाल दी.

परिवार वालों का विरोध बढ़ा तो शबनम अपने भविष्य को ले कर चिंतित हो उठी. उस ने अपनी चिंता से कुलदीप को भी अवगत करा दिया था. उस ने आश्वासन दिया कि वह किसी भी हाल में उस का साथ नहीं छोड़ेगा. समय आने पर उस की मांग में सिंदूर भरेगा. वह उसे भगा कर नहीं ले जाएगा, बल्कि गांव में ही उस के साथ सामाजिक रीतिरिवाज से विवाह कर के घर बसाएगा.

शबनम को विश्वास दिलाने के लिए वह उसे मंदिर में ले गया और भगवान को साक्षी मान कर उस के साथ विवाह कर लिया. इस बात की जानकारी न तो शबनम के घर वालों को हुई और न ही कुलदीप के घर वालों को.

कुलदीप को अब घर से पैसा मिलना बंद हो गया था. सिलाई की दुकान से उसे इतनी आमदनी नहीं थी कि वह अपना और शबनम का खर्च बरदाश्त कर पाता. इसलिए ज्यादा पैसा कमाने के लिए उस ने दिल्ली जाने का निश्चय कर लिया.

इस बाबत उस ने शबनम से बात की तो उस ने सहमति दे दी. दरअसल शबनम को कुलदीप से ज्यादा पैसे से प्यार था. बिना पैसे के उस का काम नहीं चल सकता था.

दिल्ली के लक्ष्मीनगर में कुलदीप का दोस्त अमर रेडीमेड कपड़ों के कारखाने में सिलाई का काम करता था. कुलदीप ने उस से बात की तो उस ने उसे दिल्ली बुला लिया.

दिल्ली आ कर कुलदीप कारखाने में ज्यादा से ज्यादा सिलाई का काम करने लगा ताकि प्रेमिका के लिए पैसा जुटा सके. कुलदीप और शबनम में ज्यादा बातें रात में होती थीं.

शबनम कुलदीप से प्यार भरी बातें तो करती थी, लेकिन अपनी डिमांड पूरी करने का दबाव भी बनाती थी. कुलदीप यथाशक्ति उस की डिमांड पूरी करने का प्रयास करता था. जो डिमांड अधूरी रह जाती उसे वह छुट्टी पर घर आ कर पूरी करता था.

कुलदीप को 2-4 दिन की ही छुट्टी मिलती थी. वह छुट्टी पर घर आता तो शबनम को हर तरह से खुश रखता. उस की डिमांड पूरी करता और शारीरिक सुख प्राप्त कर के वापस चला जाता.

समय बीतता रहा. शबनम अब तक इंटरमीडिएट पास कर चुकी थी और बीटेक की डिग्री के लिए उस ने कृष्णा इंजीनियरिंग कालेज, कानपुर में दाखिल ले लिया था. वह मोटरसाइकिल से ही कालेज आतीजाती थी.

20 वर्षीय शबनम तेजतर्रार युवती थी. वह न किसी से दबती थी और न किसी के सामने झुकती थी. कभी कोई युवक उस पर फब्तियां कसता तो वह बाइक रोक कर उसे सबक सिखा देती थी. उस के गांव के लोग तो उस की छाया तक से डरते थे.

बीटेक की पढ़ाई के दौरान शबनम के आंतरिक संबंध बीटेक के कुछ छात्रों से बन गए थे. वह उन के साथ घूमतीफिरती और मौजमस्ती करती. दोपहर को वह एक युवक के साथ होटल या रेस्टोरेंट जाती तो शाम को किसी दूसरे के साथ.

जल्दी ही उस के चाहने वालों की फौज तैयार हो गई. चाहत के ऐसे ही फौजियों से उस की आर्थिक व शारीरिक दोनों तरह की पूर्ति होने लगी.

दरअसल, कुलदीप के बाहर चले जाने के बाद वह पुरुष संसर्ग से वंचित रहने लगी थी. साथ ही उसे आर्थिक परेशानी से भी जूझना पड़ता था. इन्हीं आवश्यकताओं की वजह से उस के कदम बहक गए थे.

शबनम ने जम कर मौजमस्ती की तो उस की पढ़ाई में बाधा पड़ने लगी. इस का परिणाम यह निकला कि उस के 2 पेपर में बैक आ गई. खिन्न हो कर शबनम ने बीटेक की पढ़ाई अधूरी छोड़ दी. इस के बाद उस ने तांतियागंज स्थित विशंभरनाथ डिग्री कालेज से बीकौम करने के लिए दाखिल ले लिया.

शबनम पर घर वालों का कोई नियंत्रण नहीं था. वह अपनी मरजी से घर आती थी और मरजी से जाती थी. उस की भाभी दया अगर कभी उस से मजाक करती तो वह उसे करारा जवाब देती, ‘‘भाभी, पहले तुम बताओ मायके में कितने यार छोड़ कर आई हो, फिर मैं बताऊंगी.’’

शबनम भले ही गरीबी में पली थी, लेकिन उस के सपने आसमान छूने वाले थे. वह पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी, अपने सपने पूरे करना चाहती थी. वह तेजतर्रार ही नहीं शरीर से भी हृष्टपुष्ट थी.

इसी के मद्देनजर वह पुलिस विभाग में नौकरी करने की इच्छुक थी. इस के लिए उस ने प्रयास भी शुरू कर दिया था. सिपाही भरती में उस ने आवेदन भी किया था, लेकिन यह परीक्षा निरस्त हो गई थी.

इधर शबनम ने जब नए दोस्त बना लिए और वह उन के साथ मौजमस्ती करने लगी तो उस ने कुलदीप को दिल से ही निकाल दिया. अब उस का मन कुलदीप से ऊबने लगा था. प्रेमिका की यह फितरत कुलदीप समझ नहीं पाया. वह तो सपनों की दुनिया में जी रहा था. शबनम ने अब मोबाइल पर भी कुलदीप से बात करनी करीबकरीब बंद कर दी थी.

कुलदीप शबनम से बात करने की कोशिश करता तो वह उस का फोन रिसीव नहीं करती थी, कभी झुंझला कर रिसीव भी करती तो कोई न कोई बहाना बना देती.

कभी कालेज में होने का बहाना बनाती तो कभी रात अधिक होने या सिरदर्द का बहाना कर फोन बंद कर देती. कुलदीप की समझ में नहीं आ रहा था कि शबनम बेवफाई क्यों कर रही है.

कुलदीप, शबनम से बेइंतहा प्यार करता था. उस के बिना वह खुद को अधूरा महसूस करता था. जब शबनम ने उस से बातचीत करनी बंद कर दी तो वह परेशान रहने लगा. कारण जानने के लिए वह दिल्ली से अपने गांव आ गया.

गांव में उस ने गुप्त रूप से शबनम की बेरुखी के बारे में पता किया तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे पता चला कि शबनम ने कई नए दोस्त बना लिए हैं, जिन के साथ वह मौजमस्ती करती है.

कुलदीप ने इन नए दोस्तों के बारे में शबनम से पूछा तो वह तुनक कर बोली, ‘‘कुलदीप, अब मैं कालेज में पढ़ती हूं. कालेज में लड़केलड़कियां साथ में पढ़ते हैं. उन से मेलजोल स्वाभाविक है. तुम व्यर्थ में शक कर रहे हो. मैं तुम से उतना ही प्यार करती हूं जितना पहले किया करती थी.’’

‘‘तो फिर मोबाइल पर बातचीत करनी क्यों बंद कर दी?’’ कुलदीप ने शिकायत की, तो शबनम बोली, ‘‘तुम वक्त बेवक्त फोन करते हो. कभी मैं कालेज में क्लास में होती हूं तो कभी रात को घर वाले कान लगाए रहते हैं. लेकिन अब तुम्हें शिकायत नहीं होगी. मैं तुम से बात करती रहूंगी.’’

शबनम ने अपनी चपल चाल से कुलदीप को संतुष्ट कर दिया. उस ने 1-2 दिन कुलदीप के साथ मौजमस्ती की और अपनी जरूरत की चीजों की खरीदारी भी. इस के बाद कुलदीप वापस दिल्ली चला गया. लेकिन इस बार दिल्ली में उस का मन नहीं लग रहा था. वह रात दिन शबनम के फोन का इंतजार करता रहता. पर शबनम फोन नहीं करती. कुलदीप फोन मिलाता तो वह रिसीव नहीं करती थी.

शबनम से बात न हो पाने से कुलदीप परेशान हो गया. उस का दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गई. कुलदीप समझ गया कि शबनम बेवफा हो गई है. उस ने नए यार बना लिए हैं, जिन की वजह से उस ने उसे भुला दिया है. उस ने सोच लिया कि अगर शबनम उस की नहीं हुई तो वह उसे दूसरों की बांहों में भी नहीं झूलने देगा.

24 जून, 2018 को कुलदीप दिल्ली से अपने गांव दासानिवादा आ गया. यहां उस ने शिवराजपुर कस्बे के एक अपराधी से संपर्क किया और उस से 315 बोर का तमंचा व 6 कारतूस खरीद लिए. उस ने तमंचा लोड कर के सुरक्षित रख लिया. कुलदीप ने शबनम से मिल कर बात करने का काफी प्रयास किया, लेकिन शबनम नहीं मिली.

27 जून को कुलदीप को शबनम के चचेरे भाई से पता चला कि वह कालेज गई है. यह जानने के बाद कुलदीप बाइक ले कर राधन लिंक रोड पर पहुंच गया और शबनम के वापस लौटने का इंतजार करने लगा.

इसी लिंक रोड से गांव आनेजाने का रास्ता जुड़ा था. कुलदीप को मालूम था कि गांव जाने के लिए शबनम इसी लिंक रोड से हो कर गुजरेगी.

इस बीच कुलदीप ने अपने मोबाइल से शबनम से बात करने की कोशिश की. लेकिन शबनम ने उस का फोन रिसीव नहीं किया. इस पर कुलदीप ने शबनम के फोन पर ‘काल मी’ मैसेज भेजा पर शबनम ने उसे फोन नहीं किया.

लगभग 12 बजे कुलदीप को शबनम बाइक से आती दिखी. नजदीक आते ही उस ने शबनम को रोेक लिया. दोनों में फोन पर बात न करने को ले कर तकरार होने लगी. कुलदीप ने शबनम से कहा, ‘‘मैं तुम्हारी हर जरूरत पूरी करता हूं. फिर भी तुम बेवफा बन गईं, मुझे भूल कर यारों के साथ गुलछर्रे उड़ाने लगीं.’’

कुलदीप के इस आरोप से शबनम तिलमिला गई. वह कुलदीप को मां की गाली देते हुए बोली, ‘‘तू अपना खर्चा पूरा कर नहीं पाता, मेरा कैसे करेगा. चल भाग, नामर्द कहीं का.’’

एक तो मां की गाली, ऊपर से नामर्द कहना, कुलदीप को नागवार लगा. उस का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने कमर में खोसा हुआ तमंचा निकाला और शबनम की कनपटी पर लगाते हुए बोला, ‘‘बेवफा, बदजुबान, आज मैं तुझे सबक सिखा कर रहूंगा.’’

शबनम कुछ सोच पाती इस से पहले ही कुलदीप ने ट्रिगर दबा दिया. धांय की आवाज के साथ शबनम का भेजा उड़ गया. खून से लथपथ हो कर वह सड़क पर गिर गई. थोड़ी देर में उस ने दम तोड़ दिया.

गोली चलने की आवाज सुन कर खेतों में काम कर रहे लोग उस ओर दौड़े तो कुलदीप बाइक से भाग निकला. कुछ ही देर में वहां भीड़ जुट गई. इसी बीच किसी ने एक युवती की हत्या किए जाने की खबर थाना बिल्हौर की पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही बिल्हौर थानाप्रभारी ज्ञान सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल आ गए.

उन्होंने यह सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी. कुछ देर बाद ही एसपी (ग्रामीण) प्रद्युम्न सिंह, सीओ (बिल्हौर) आर.के. चतुर्वेदी, फोरेंसिक टीम के साथ आ गए.

इसी बीच दासानिवादा निवासी छिद्दू और उस के दोनों बेटे सतीश व नेमचंद आए और युवती के शव को देख कर बिलख पड़े. छिद्दू ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि लाश उस की बेटी शबनम उर्फ विजयलक्ष्मी की है.

लाश की पहचान हो गई तो पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. शबनम की कनपटी में सटा कर गोली मारी गई थी. जो आरपार हो गई थी. उस का भेजा उड़ चुका था.

मौके पर पुलिस को मृतका का मोबाइल फोन मिला, जिसे जाब्ते की काररवाई में शामिल कर लिया गया. मृतका की बाइक भी पुलिस ने थाने भिजवा दी. फोरेंसिक टीम ने भी साक्ष्य जुटाए. इस के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय भेज दिया.

शबनम की हत्या के संबंध में एसपी (ग्रामीण) प्रद्युम्न सिंह ने छिद्दू और उस के बेटे से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि शबनम की हत्या गांव के ही कुलदीप ने की है. दोनों के बीच अवैध संबंध थे.

यह पता चलते ही थानाप्रभारी ज्ञान सिंह ने मृतका के भाई सतीश को वादी बना कर भादंवि की धारा 302 के तहत कुलदीप के खिलाफ रिपार्ट दर्ज कर ली और उस की तलाश में जुट गए. उस के घर पर छापा मारा गया पर वह फरार हो गया था.

कुलदीप को पकड़ने के लिए एसपी (गामीण) प्रद्युम्न सिंह ने एक पुलिस टीम गठित की. इस टीम में बिल्हौर थानाप्रभारी ज्ञान सिंह, एसआई बहादुर सिंह, शिवप्रताप तथा सिपाही उमेश रामवीर, जुनेंद्र व अफरोज को शामिल किया गया. पुलिस टीम ने कुलदीप के पिता देवी गुलाम से उस के ठिकानों के संबंध में जानकारी हासिल की.

इस के बाद कुलदीप के मोबाइल की लोकेशन के आधार पर उसे चरखी, दादरी, लक्ष्मी नगर (दिल्ली), बीकानेर (राजस्थान), गोहना (हरियाणा) तथा नोएडा की संभावित जगहों पर खोजा गया. लेकिन कुलदीप हाथ नहीं लगा. आखिर पुलिस ने उस की तलाश में मुखबिर लगा दिए.

पुलिस टीम ने घटनास्थल से मिला मृतका का फोन खंगाला तो उस में कई दरजन नंबर सेव थे. ये नंबर थे तो लड़कों के, लेकिन फोन में लड़कियों के नाम से सेव किए गए थे. मृतका के मोबाइल पर आखिरी काल 3 मिनट की थी. इसी नंबर से ‘काल मी’ का मैसेज भी था. जांच से पता चला कि वह नंबर कुलदीप का था.

13 जुलाई, 2018 की सुबह 10 बजे थानाप्रभारी ज्ञान सिंह को मुखबिर ने खबर दी कि हत्यारोपी कुलदीप इस वक्त उत्तरीपुरा रेलवे फाटक के पास मौजूद है, अगर तुरंत एक्शन लिया जाए तो उसे पकड़ा जा सकता है.

सूचना महत्त्वपूर्ण थी. ज्ञान सिंह ने पुलिस टीम के साथ छापा मार कर कुलदीप को रेलवे फाटक के पास स्थित होटल से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उस से शबनम की हत्या के संबंध में पूछा गया तो उस ने बड़ी आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने कहा कि उसे शबनम की हत्या का कोई गम नहीं है. उस की बेवफाई ने उसे गुनाह करने को मजबूर कर दिया था.

कुलदीप के पास से 315 बोर का तमंचा तथा 3 जीवित कारतूस भी मिले. पुलिस ने इस के लिए उस के खिलाफ आर्म्स एक्ट का मुकदमा अलग से दर्ज किया. यह वही तमंचा था, जिस से उस ने शबनम की हत्या की थी.

दिनांक 14 जुलाई, 2018 को थाना बिल्हौर पुलिस ने अभियुक्त कुलदीप को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

प्राइवेट नौकरियों ने बढ़ाए लड़कियों के रोजगार

लड़कियां पढ़ाई में तेजी से आगे आ रही हैं. ऐसे में अब उन के लिए नौकरियों के मौके बढ़ रहे हैं. वे सरकारी नौकरियों के साथसाथ प्राइवेट नौकरियां भी करने लगी हैं. उन्हें प्राइवेट नौकरियां इसलिए भी लुभा रही हैं, क्योंकि शादी के बाद नौकरी छोड़ना आसान होता है.

सरकारी नौकरियों की आस छोड़ कर लड़कियों ने जब से प्राइवेट नौकरियों की तरफ रुख करना शुरू किया है तब से उन के लिए रोजगार के मौके बढ़ गए हैं. छोटेबड़े शहरों में बहुत तेजी से प्राइवेट स्कूल, नर्सिंगहोम, शौपिंग माल और तमाम तरह के संस्थान खुल रहे हैं. इन में टीचर, नर्स, सेल्सगर्ल वगैरह के रूप में लड़कियों को नौकरियां मिल रही हैं.

इस के लिए जरूरी है कि वे टीचर टे्रनिंग कोर्स, नर्सिंग कोर्स और पर्सनैलिटी निखारने के लिए कोर्स कर लें. जिस लड़की को टीचर बनना है, वह अगर बीऐड कर ले तो पढ़ाने की नौकरी मिलना आसान हो जाता है.

इस में छोटे से छोटा स्कूल भी शुरुआत से ही 4,000 से 5,000 रुपए हर महीने देने लगता है, जबकि अच्छा स्कूल 10,000 से ऊपर तनख्वाह देना शुरू करता है.

टीचिंग का कैरियर लड़कियों के लिए पहले से ही बहुत अच्छा रहा है और अब तो इस में आगे बढ़ने के मौके भी खूब हो गए हैं.

नर्स बनने के लिए नर्सिंग की टे्रनिंग करना जरूरी होता है. अब तो इस के लिए कई प्राइवेट संस्थान भी खुल गए हैं. अगर कोई लड़की किसी संस्थान से ट्रेनिंग नहीं ले सकती है तो वह किसी अच्छे नर्सिंगहोम में भी इस काम को सीख सकती है. वहां वह जो सीखती है उसी के आधार पर उसे अच्छी तनख्वाह मिल सकती है.

छोटेबड़े शहरों और कसबों में रोज खुल रहे शौपिंग माल, शोरूम और मल्टीप्लैक्स भी रोजगार का एक अच्छा साधन बन गए हैं. वहां पर खूबसूरत और पढ़ीलिखी लड़कियों को सेल्सगर्ल और असिस्टैंट की नौकरियां मिल जाती हैं.

देह से मजबूत कम पढ़ीलिखी लड़कियों को सिक्योरिटी गार्ड वगैरह की नौकरी मिलने के मौके बढ़ रहे हैं. अगर कोई लड़की खिलाड़ी है या उस ने एनसीसी वगैरह की ट्रेनिंग ले रखी है, तो उसे ऐसी नौकरी में प्राथमिकता मिलती है.

शौपिंग माल में ऐंट्री गेट पर औरतों की तलाशी लेने के लिए लड़कियों को बतौर सिक्योरिटी गार्ड खूब नौकरियां दी जा रही हैं.

आज पर्यटन उद्योग भी बढ़ रहा है. इस के चलते शहरों में बड़े होटल तेजी से खुल रहे हैं. उन में भी लड़कियों को नौकरियां मिलने लगी हैं. होटल में वेटर, रिसैप्शनिस्ट और असिस्टैंट के रूप में लड़कियां नौकरी कर रही हैं. इस के लिए कोर्स भी कराया जाता है.

आज के दौर में होटलों में नौकरियों को अच्छा माना जाता है. लड़कियों के लिए यह कैरियर बहुत इज्जत का माना जाता है. पर्यटन उद्योग बढ़ने से हैल्थ क्लब भी बड़ी तेजी से खुल रहे हैं. ब्यूटीशियन, डाइटीशियन, योग टीचर और जिम ट्रेनर के रूप में भी उन्हें अच्छी नौकरियां मिल रही हैं.

‘मिस यूपी’ रह चुकी खुशबू गुप्ता कहती हैं, ‘‘मैं ने जिम ट्रेनर के रूप में नौकरी शुरू की थी. तब मुझे बहुत अच्छा लगा था.’’

क्षेत्रीय फिल्मों के बनने और फैशन शो के बढ़ते दायरे ने मौडलिंग, डांस, ऐक्टिंग सीखने वाली लड़कियों के लिए भी रोजगार के रास्ते खोल दिए हैं. मास कम्यूनिकेशन करने वाली लड़कियों के लिए प्रिंट मीडिया और इलैक्ट्रौनिक मीडिया में नौकरी करने के मौके बहुत ज्यादा हैं.

प्रचार अधिकारी के रूप में प्राइवेट कंपनियां भी उन्हें नौकरी दे देती हैं. अगर नौकरी न भी करनी हो तो भी फ्रीलांस लेखन कर के पैसा कमाया जा सकता है.

जब से स्कूलों में डांस, कंप्यूटर वगैरह की पढ़ाई को अनिवार्य कर दिया गया है तब से डांस या कंप्यूटर सीख चुकी लड़कियों के लिए रोजगार के मौके बढ़ गए हैं.

शहरों में फैशन डिजाइनिंग सिखाने वाले स्कूल भी तेजी से बढ़ रहे हैं. जिन लड़कियों ने फैशन डिजाइनिंग सीखी है, वे वहां पर नौकरी तो कर ही रही हैं, पर अगर वे नौकरी नहीं करना चाहें तो अपना खुद का बुटीक खोल कर कमाई कर सकती हैं.

नौकरी के मामले में इस बात का ध्यान रखें कि जिस संस्थान में आप नौकरी करने जा रही हैं, वह कैसा है, उस का मालिक कैसा है, आप को जो तनख्वाह दी जा रही है, वह कितनी है. कुछ लड़कियां मेहनत के बजाय दूसरे गलत रास्तों से कामयाबी हासिल करना चाहती हैं. इस से बचना चाहिए और अपने काम से ही काम रखना चाहिए.

क्या यह बात सच है कि जो लड़कियां शादी से पहले अपना पेट गिरवा चुकी होती हैं, शादी के बाद उन के बच्चे गूंगेबहरे पैदा होते हैं.

सवाल
क्या यह बात सच है कि जो लड़कियां शादी से पहले अपना पेट गिरवा चुकी होती हैं, शादी के बाद उन के बच्चे गूंगेबहरे पैदा होते हैं? इस की पूरी जानकारी दें?

जवाब
यह बात पूरी तरह से झूठी है कि गर्भपात कराने से अगले बच्चे में कुछ कंजेनिटल गड़बडि़यां आ सकती हैं. इन गड़बडि़यों का पता जन्म से पहले भ्रूण में लगाया जा सकता है जिस के लिए एक उपाय सैलेक्टिव गर्भपात है. गर्भपात अब भी बहुत ज्यादा विवादित और नैतिकता से जुड़ा मामला है, जिसे ले कर आमतौर पर भ्रूण के जीवन जीने की स्वतंत्रता और चयन करने के औरतों के अधिकार के बीच की लड़ाई को ले कर बहस होती रहती है.

ये भी पढ़ें…

गर्भपात के साइड इफैक्ट्स

कई वजहों से किसी महिला को गर्भपात कराना पड़ जाता है. कई बार अनचाहे गर्भधारण के कारण भी ऐसा कदम उठाना पड़ता है, जबकि कई बार भ्रूण की कुदरती खामियों या गर्भधारण से जुड़ी घातक स्वास्थ्य स्थितियों के कारण दंपती गर्भ गिराने का फैसला लेते हैं. वजह चाहे जो भी हो, गर्भपात कराने से महिला पर मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से असर पड़ता है. गर्भपात किसी भी लिहाज से सुरक्षित नहीं है. कुछ शोध बताते हैं कि कुछ महिलाएं गर्भपात कराने के बाद राहत महसूस करती हैं, जबकि कुछ अनचाहे गर्भपात या मिसकैरिज के कारण अवसादग्रस्त हो जाती हैं. महिलाओं में राहत और अवसाद की वजह भी अलगअलग होती है.

गर्भपात कराने के बाद जितने शारीरिक साइड इफैक्ट्स होते हैं, उतने ही मानसिक साइड इफैक्ट्स भी होते हैं. गर्भपात कराने के बाद शारीरिक इफैक्ट्स से कहीं ज्यादा भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक असर देखा गया है और इस में मामूली खेद से ले कर अवसाद जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं. गर्भपात कराने के बाद किसी ऐसे अनुभवी प्रोफैशनल से सभी खतरों के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा कर लेना बहुत जरूरी है जो आप के सभी सवालों और उन से जुड़ी आशंकाओं का जवाब दे सके.

नकारात्मक, भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक असर से जुड़ा एक सब से महत्त्वपूर्ण फैक्टर यह है कि आप को यही लगता है कि आप के अंदर अभी भी बच्चा पल रहा है. कुछ महिलाओं में नकारात्मक भावनात्मक परिणाम विकसित होने की संभावना कम रहती है, क्योंकि गर्भधारण को ले कर उन का नजरिया बिलकुल अलग रहता है और वे समझती हैं कि भ्रूण एक अविकसित जीव है. हालांकि कुछ महिलाएं गर्भधारण के प्रति कुछ ज्यादा ही भावनात्मक लगाव पाल लेती हैं और अपने अंदर पल रहे बच्चे को जीव मान लेती हैं. ऐसी महिलाओं पर गर्भपात या मिसकैरिज के बाद कुछ ज्यादा ही नकारात्मक असर पड़ता है.

गर्भपात कराने के बाद निम्नलिखित संभावित भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक खतरे हो सकते हैं. अलगअलग व्यक्तियों पर इन नकारात्मक प्रभावों की अवधि और तीव्रता अलगअलग होती है. संभावित साइड इफैक्ट्स में ये शामिल हैं:

खानपान में डिसऔर्डर, बेचैनी, खेद, गुस्सा, अपराधबोध, शर्म, आपसी संबंध की समस्याएं, अकेलापन या अलगथलग रहने का एहसास, आत्मविश्वास में कमी, अनिद्रा या दु:स्वप्न, आत्महत्या का विचार, अवसाद.

गर्भपात कराने के बाद संभव है कि किसी को भी अनापेक्षित भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक साइड इफैक्ट का अनुभव हो. हालांकि अकसर देखा गया है कि कुछ महिलाएं कुछ खास प्रकार के भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक जद्दोजहद की चपेट में जल्दी आ जाती हैं. जिन महिलाओं पर नकारात्मक, भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक साइड इफैक्ट पड़ने की संभावना अधिक रहती है, उन में ये शामिल हैं:

– जो महिलाएं गर्भधारण के बहुत बाद की अवस्था में गर्भपात कराती हैं.

– जो महिलाएं पहले से किसी भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक परेशानी से जूझ रही होती हैं.

– जो महिलाएं गर्भपात कराने के लिए अभिशप्त, बाध्य या बहकाई गई हों.

– गर्भपात को ले कर जिन महिलाओं की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हों.

– जिन महिलाओं को लगता है कि गर्भपात कराना अनैतिक है.

– जिन महिलाओं को इस के लिए अपने परिजनों या पार्टनर का सहयोग नहीं मिल रहा हो.

– जो महिलाएं आनुवंशिक या भू्रण संबंधी गड़बडि़यों के कारण गर्भपात करा रही हों.

कुछ सुझाव

मदद लें: अनियोजित गर्भधारण की समस्या से निबटने के लिए संभवतया सब से जरूरी चीज होती है ऐसे प्रशिक्षित प्रोफैशनल से सलाह लेना, जो आप के सवालों के जवाब दे सके और आप की व्यक्तिगत स्थितियों पर चर्चा कर सके.

एकांत में रहने से बचें: यदि आप अनियोजित गर्भधारण की समस्या से जूझ रही हैं तो हो सकता है कि आप इस समस्या को गोपनीय रखने के लिए दूसरों से कटने लगेंगी या अकेली ही इस समस्या का सामना करने की सोचेंगी. हालांकि यह मुश्किल हो सकता है, लेकिन इस बारे में अपने परिजनों और मित्रों को बताने की कोशिश करें जो आप को सहयोग कर सकें.

अपनी स्थितियों का आकलन करें: उन महिलाओं की व्यक्तिगत समस्याओं पर गौर करें जिन्हें साइड इफैक्ट्स का अनुभव हुआ हो.

तनाव से बचें: ऐसे लोगों से बचें जो आप पर इस तरह का दबाव बना रहे हों कि वे जो सोचते हैं, वही सब से अच्छा है. आप चाहे मां बनना चाहें, बच्चे गोद लेना चाहें या गर्भपात कराना, आप अपनी पसंद के साथ जीने के लिए स्वतंत्र हैं. यानी कोई भी फैसला 100% आप का अपना ही होना चाहिए.

गर्भपात के बाद महिलाओं में अलगअलग शारीरिक साइड इफैक्ट्स हो सकते हैं. गर्भपात के बाद संभावित विस्तृत साइड इफैक्ट्स के बारे में किसी अनुभवी हैल्थ प्रोफैशनल से जानकारी पाना जरूरी है. यह भी जरूरी है कि गर्भपात के 4 से

6 हफ्ते बाद आप की मासिक क्रिया सुचारु हो जाए और गर्भपात कराने के बाद आप दोबारा मां बनने लायक हो जाएं. संक्रमण से बचने के लिए अपने डाक्टर के परामर्श के मुताबिक ही दवा का सेवन करना चाहिए

सतर्कता जरूरी

गर्भपात कराने के बाद निम्न शारीरिक साइड इफैक्ट्स उभर सकते हैं और इन का असर 2 से 4 हफ्तों तक बना रह सकता है: पेट दर्द और मरोड़, दाग और रक्तस्राव.

करीब 5 से 10% महिलाएं तत्काल किसी न किसी समस्या से ग्रस्त हो जाती हैं. अत: निम्नलिखित खतरों से सतर्क रहें:

– लगातार रक्तस्राव.

– संक्रमण या सेप्सिस/पीआईडी/ऐंडोमैट्रियोसिस.

– गर्भाशय को नुकसान.

– गर्भाशय वाले हिस्से पर दाग.

मेरी आंखों के नीचे काले घेरे हो गए हैं. उन्हें दूर करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए.

सवाल
मेरी आंखों के नीचे काले घेरे हो गए हैं. उन्हें दूर करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब
आंखों के नीचे काले घेरों के लिए 1 टमाटर, 1 चम्मच नीबू का रस, चुटकी भर बेसन और हलदी ले कर पेस्ट तैयार कर लें. अब इस गाढ़े पेस्ट को अपनी आंखों के चारों और लगाएं. 15 मिनट के बाद चेहरे को धो लें. ऐसा हफ्ते में 3 बार करें.

ये भी पढ़ें…

डार्क सर्कल्स से परेशान हैं? अपनाएं ये 5 उपाय

डार्क सर्कल यानी आंखों के नीचे काले घेरे एक ऐसी समस्या है जिससे हर महिला छुटकारा पाना चाहती है. आंखों के नीचे काले घेरे होने के कई कारण हैं- जैसे- शरीर में किसी विटामिन या अन्य किसी पोशक तत्व की कमी का होना, नींद न आना, मानसिक तनाव या फिर कोई आनुवांशिक कारण. वजह चाहे जो भी हो लेकिन अगर आप इस समस्या से जल्द से जल्द निजात पाना चाहती हैं तो ये 5 उपाय आपकी मदद करेंगे.

हर्बल पैक

डार्क सर्कल से छुटकारा पाने के लिए हर्बल पैक अपनाएं. इसके लिए 50 ग्राम तुलसी, नीम और पुदीने के पत्तों को गुलाबजल में मिक्स कर के पीस लें. इस रस में थोड़ा हल्दी पाउडर डालकर पेस्ट बना लें और इस पेस्ट को काले घेरों पर लगाएं, ऐसा करने से आपको काफी हद तक राहत मिलेगी.

बादाम तेल से मालिश

रात को सोने से पहले आधा चम्मच रोगन बादाम, तीन बूंद प्योर आरेंज आयल और दो बूंद शहद एक साथ मिक्स कर लें. इस मिश्रण को तर्जनी उंगली में लेकर आंखों के चारों तरफ हल्के हाथ से गोलाई में मालिश करें. ऐसा रोजाना करने से आपको कुछ ही हफ्तों में राहत दिखने लगेगा.

कुकुम्बर थैरेपी

इस समस्या से राहत पाने के लिए आप कुकुम्बर थैरेपी का इस्तेमाल भी कर सकती हैं. इसके लिए खीरे के टुकड़े को आंखों के ऊपर रखें. कुछ देर तक आंख बंद रखने के बाद डार्क एरिया पर इसे हल्के-हल्के से घुमाएं.

टी-बैग्स

डार्क सर्कल्स को दूर करने के लिए टी-बैग्स का इस्तेमाल करें. इसमें मौजूद तत्व, टैनिन आंखों के आसपास की सूजन और डार्कनेस को कम करता है.

भरपूर नींद

हमारी त्वचा खुद को अधिकतर रात के समय ही रेजुनवेट करती है इसलिए चेहरे की खूबसूरती बरकरार रखने के लिए भरपूर नींद लेना बहुत जरूरी है. इससे आप दिन भर खिला खिला तो महसूस करेंगी ही साथ ही त्वचा को भी काफी राहत मिलेगी. चेहरे पर चमक आएगी और आंखो के काले घेरे भी धीरे धीरे कम होने लगेंगे.

परिवारवाद पर टिकी पार्टियां कलह के कगार पर

कलह, अलगाव परिवारों में ही नहीं, परिवारवाद के दम पर टिके राजनीतिक दलों में भी जगजाहिर हो रहा है. परिवारों में भाइयों के बीच बंटवारे की तरह अब राजनीतिक दल भी भाइयों में बंटने के कगार पर आ गए हैं.

हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल में इस वक्त कलह का साया गहराया हुआ है. पिछले समय से चौटाला परिवार में राजनीतिक वर्चस्व को ले कर कलह छिड़ी हुई है. चौटाला परिवार दो दलों में बंटने के लिए पूरी तरह तैयार है.

हरियाणा में चौधरी देवीलाल की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए उन के पुत्र ओमप्रकाश चौटाला आए. वे राज्य के मुख्यमंत्री रहे. मुख्यमंत्री रहते शिक्षक भर्ती मामले में उन्हें जेल की सजा हुई. फिलहाल वह जेल की सजा काट रहे हैं. ओमप्रकाश चौटाला के बड़े पुत्र और पूर्व सांसद अजय सिंह भी जेल में हैं.

असल में अजय सिंह के बड़े पुत्र हिसार से सांसद दुष्यंत सिंह चौटाला और उन के चाचा अभय सिंह चौटाला के बीच ठनी हुई है. दुष्यंत सिंह और उन का छोटा भाई दिग्विजय सिंह एक साथ हैं जबकि ओमप्रकाश चौटाला अभय सिंह का साथ दे रहे हैं.

हाल ही में इंडियन नेशलन लोकदल की गोहाना में हुई रैली के बाद परिवार में कलह ज्यादा उभर कर सामने आई. अभी ओमप्रकाश चौटाला पैरोल पर जेल से बाहर आए हुए हैं. उन्होंने अपने पौत्र व सांसद दुष्यंत सिंह और उन के भाई दिग्विजय सिंह को पार्टी से निलंबित कर दिया है. साथ ही युवा इकाई को भी भंग कर दिया. दिग्विजय इस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

अभय सिंह भी दुष्यंत और दिग्विजय सिंह तथा उन के समर्थकों को पार्टी से बाहर देखना चाहते हैं. हरियाणा के लगभग आधा जिलों के जिलाध्यक्ष अभय सिंह के पक्ष में हैं. अभय सिंह ने ओमप्रकाश चौटाला के जेल जाने के बाद पार्टी को संभाला है.

दुष्यंत और दिग्विजय सिंह को निकालने के बाद दिग्विजय सिंह ने बागी तेवर दिखाने शुरू कर दिए. दिग्विजय ने कहा कि इकाई को भंग करने का अधिकार केवल अजय सिंह चौटाला या 26 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पास है.

एक समय था जब चौधरी देवीलाल की तूती बोलती थी. 1977 और 1989 में देवीलाल का विपक्ष को एकजुट कर सत्ता परिवर्तन में अहम योगदान रहा था लेकिन कलह ने परिवार को दो फाड़ कर दिया है.

राजनीतिक परिवार का यह झगड़ा नया नहीं है. बिहार में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव परिवार में भी उन के दोनों बेटों के बीच मनमुटाव की खबरें आती रही हैं. लालू प्रसाद भी इस वक्त जेल में हैं. उन के पुत्र तेजस्वी यादव और तेजप्रताप सिंह के बीच सत्ता संघर्ष की खबरें भी आती रही हैं.

उधर समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव, उन के बेटे अखिलेश और मुलायम सिंह के भाई शिवपाल सिंह और रामगोपाल यादव के बीच तलवारें खिंची हुई हैं.

2016 में उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी जब सत्ता में थी तब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उन के चाचा शिवपाल सिंह के बीच विवाद सुर्खियों में आए थे. इन दोनों की तनातनी में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव अपने अपने भाई शिवपाल सिंह के साथ खड़े हुए फिर बेटे अखिलेश के साथ. यहां इस परिवार के बीच कलह की मूल जड़ अमरसिंह को माना गया था.

दक्षिण भारत में द्रमुक में एम करुणानिधि के परिवार के सदस्यों एमके स्टालिन और अलागिरी के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही है.

असल में इन राजनीतिक परिवारों के सदस्यों के बीच राजनीतिक वर्चस्व को ले कर जंग है. इन परिवारों की कलह में कांग्रेस और भाजपा को अपनेअपने फायदे दिख रहे हैं. अब इस समय जब विपक्षी दलों के बीच गठबंधन की कवायद चल रही है, ऐसे में परिवार पर टिके क्षेत्रीय दलों में व्याप्त फूट विपक्षी एकता के लिए ही नहीं, स्वयं इन दलों की मजबूती भी खतरे में है.

2019 का चुनावी गणित : अर्द्व कुंभ बन गया कुंभ

इलाहाबाद में कुंभ के महत्व को देखें तो हर 6 साल के बाद अर्द्वकुंभ और 12 साल के बाद कुंभ का आयोजन यहां होता रहा है. पिछला कुंभ 2013 में हुआ था. इस हिसाब से 2019 में अर्द्व कुंभ और 2025 में कुंभ का आयोजन होना है. 2019 के अर्द्व कुंभ के समय ही लोकसभा के आम चुनाव होने हैं. भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने कुंभ को चुनाव में धर्मिक मुददा बनाने के लिये अर्द्व कुंभ को ही कुंभ का नाम दे दिया है.

यही नहीं सरकार इसके प्रचार प्रसार में भी कोई कसर नहीं छोड़ रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्यपाल राम नाइक के साथ यहां की तैयारियों को देखा. इस मौके पर ‘इलाहाबाद’ के नाम को बदल कर ‘प्रयागराज’ करने की घोषणा भी कर दी है. जनवरी 2019 में कुंभ स्नान के पहले प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी के यहां आने की तैयारी है.

दिसम्बर माह में यहां प्रधनमंत्री का दौरा प्रस्तावित है. वह कुंभ से जुड़ी तमाम योजनाओं का शिलान्यास कर कुंभ के आयोजन को भव्य रूप प्रदान करेंगे.

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं ‘राजा हर्षवर्ध्न ने अपने दान से ‘प्रयाग कुंभ’ का नामकरण किया था. आज सरकार केवल ‘प्रयागराज’ का नाम बदल कर अपना काम दिखा रही है. इन्होंने तो ‘अर्ध कुंभ’ का नाम बदल कर ‘कुंभ’ कर दिया. यह परंपरा और आस्था के साथ् खिलवाड़ है.’ अखिलेश यादव की बात में दम है. भाजपा आस्था और परंपरा की बात बात पर दुहाई देती है. जिस तरह से लोकसभा चुनाव में लाभ के लिये ‘अर्ध् कुंभ’ को ‘कुंभ’ का दर्जा दे दिया गया उससे संगम नगरी के इस आयोजन को ठेस लगी है. सवाल उठने लगे हैं कि क्या चुनावी लाभ के लिये इस तरह से धर्म का सहारा लेना उचित है?

निशाने पर इलाहाबाद

भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में काशी यानि वाराणसी को अपने चुनावी प्रचार के केन्द्र बिन्दू में रखा था. उस समय भाजपा ने वाराणसी को क्योटो जैसा शानदार बनाने और गंगा की सफाई को चुनावी मुददा बना दिया था. उस समय प्रधनमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी ने खुद को गंगा मां का बेटा बताया था. सरकार बनने के बाद गंगा से किया वादा केन्द्र की सरकार पूरा नहीं कर पाई. गंगा की सफाई और उसके स्वरूप को बचाने की दिशा में कोई काम नहीं हुआ. इसका विरोध करते हरिद्वार में स्वामी सदानंद की जान गई. इस घटना ने मोदी सरकार की निष्क्रियता और गंगा नदी के प्रति उनकी नियति की पोल खोल दी. ऐसे में 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा वाराणसी की जगह पर इलाहाबाद को मुद्दा बना रही है.

इलाहाबाद को चुनावी मुद्दा बनाने के बाद सबसे पहले ‘अर्ध कुंभ’ को ‘कुंभ’ का दर्जा दे दिया गया. इसके बाद ‘इलाहाबाद’ का नाम बदल कर ‘प्रयाग’ करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया. अब कुंभ के प्रचार के बहाने भाजपा अपने धार्मिक चेहरे का प्रचार करेगी और लोकसभा चुनाव को धार्मिक रंग में रंगने का काम शुरू होगा. कुंभ की शुरूआत जनवरी 2019 में होगी. कुंभ का असर करीब 2 माह तक शिवरात्री और होली तक रहता है. अप्रैल-मई में आम चुनाव होने हैं ऐसे में तब तक इसका असर बना रहेगा. धर्म के इस आयोजन में प्रचार की भूमिका में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रा योगी आदित्यनाथ की अहम भूमिका होगी. धर्म के इसी पक्ष का लाभ लेने के लिये भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया है.

यह भी तय है कि अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को आपेक्षित सफलता नहीं मिली तो योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाया भी जा सकता है.

कांग्रेस की पहचान मिटाने का प्रयास

इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयाग करने के पीछे धार्मिक वजह के साथ ही साथ एक राजनीतिक वजह भी है. इलाहाबाद का नाम आजादी की लड़ाई के साथ ही साथ कांग्रेस से भी जुड़ा रहा है. कांग्रेस के नेता और देश के पहले प्रधनमंत्री जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी का यह पैत्रक आवास इलाहाबाद में है.

इलाहाबाद का नाम बदलने से कांग्रेस के साथ उसका लगाव खत्म हो जायेगा. इलाहाबाद के ही स्वराज भवन में कांग्रेस नेता इंदिरा गांधी का जन्म हुआ था. यही से लगे स्वराज भवन में इंदिरा गांधी की शादी हुई थी. इलाहाबाद से कांग्रेस का लगाव पुराना है. जवाहरलाल की पत्नी कमला नेहरू के नाम पर यहां पर कमला नेहरू कैंसर अस्पताल है. कमला नेहरू की मौत होने पर यह अस्पताल उनके नाम पर बनाया गया है. इसका संचालन ट्रस्ट बनाकर किया जा रहा है.

आजादी की लड़ाई के समय आनंद भवन और स्वराज भवन में महात्मा गांधी की बाकी लोगों के साथ मीटिंग होती थी. आजादी की लड़ाई में इन दोनों जगहों का अपना बड़ा योगदान रहा है. यहां से ही आजादी की गतिविधियां चलती थीं. आज भी यहां पर लाइट एंड सांउड शो के जरीये आजादी की लड़ाई की घटनाओं को याद किया जाता है. देश की आजादी की लड़ाई में इलाहाबाद का नाम सबसे अहम स्थान पर है. अब इसको बदल कर प्रयाग करने से आजादी की लड़ाई की इस पहचान को खत्म करने का प्रयास हो रहा है. अब इस शहर की धार्मिक पहचान बनाने का काम हो रहा है.

इलाहाबाद शहर की ऐतिहासिक पहचान खत्म होने से कांग्रेस के साथ इसके रिश्ते को धुंधला करने का काम हो रहा है. भाजपा के लिये धर्मिक मुद्दे पर चुनाव लड़ना सरल होता है. इसके लिये वह हर काम में धर्म को आगे करना चाहती है. इससे उसे जातीय वोट बैंक को साधना सरल होगा. भाजपा के लिये सबसे कठिन काम दलित वोट बैंक को साधना है. इसके साथ ही साथ अति पिछड़ी जातियों का भी भाजपा से मोहभंग हो रहा है. भाजपा चाहती है कि कुंभ के बहाने वह स्नान करने आने वालों को खुश कर सकती है. कुंभ ऐसा स्नान होता है जिसमें हर वर्ग के लोग वहां आते है. ऐसे में अगर कुंभ का आयोजन और प्रचार सफल हो गया तो भाजपा सरकार को अपनी छवि निखारने में मदद मिल सकेगी. यही वजह है कि सरकार कुंभ के आयोजन को भव्य बनाना चाहती है. इस क्रम में ही उसने ‘अर्ध कुंभ’ को ‘कुंभ’ बना दिया है.

फिल्मों में मानवीय मूल्यों को रेखांकित करने की जरुरत है : सुरेखा सीकरी

सिनेमा में बदलाव की बहुत बातें हो रही हैं. मगर आज भी बौलीवुड में बुजुर्ग महिला कलाकारों के लिए किरदार नहीं लिखे जा रहे हैं. इतना ही नही अब तो फिल्मों से परिवार भी गायब हो गए हैं. मगर 19 अक्टूबर को प्रदर्शित हो रही ‘जंगली पिक्चर्स’ और ‘क्रोम पिक्चर्स’ निर्मित तथा अमित रवींद्रनाथ शर्मा निर्देशित फिल्म ‘‘बधाई हो’’ में दादी के साथ ही पूरा परिवार व रिश्ते मौजूद है. जबकि यह फिल्म अधेड़ उम्र में युवा व टीनएजर बेटे की मौजूदगी में तीसरी बार मां बनने पर समाज द्वारा कसे जाने वाले तानों के इर्द गिर्द घूमती है. इस फिल्म में दादी की भूमिका में सुरेखा सीकरी है, जिन्होने आठ साल तक टीवी पर प्रसारित सीरियल ‘‘बालिका वधू’’ में दबंग व परंपरागत दादी के किरदार में नजर आती रही हैं.

आप जैसी लोकप्रिय अभिनेत्री को भी फिल्मों में काम करने के कम अवसर मिल रहे हैं?

फिल्म और फिल्म की पटकथा से वर्तमान समाज का संकेत मिलता है. समाज पुरूष प्रधान है, इसलिए फिल्मों में भी पुरूष प्रधान किरदार ही अहमियत रखते हैं. परिणामतः बुजुर्ग महिला कलाकारों के लिए किरदार ही नहीं लिखे जाते. जबकि ऐसा नही होना चाहिए. तीन वर्ष पहले तक फिल्मों में हमारी उम्र की महिलाओं के किरदार में महज फर्नीचर होते थे. दादी के किरदार भी स्टीरियो टाइप होते थे. किरदारो में कोई रोचकता नही होती थी. जबकि मैने हमेशा अच्छे किरदारों को अहमियत दी. पर अब हालात बदल रहे हैं. अब फिल्मों में महिला किरदारों को अहमियत दी जा रही है. इसी बदलाव के चलते फिल्म ‘‘बधाई हो’’ में मुझे दादी के अहम किरदार को निभाने का अवसर मिला. यह किरदार महज शो पीस नही है.

फिल्म ‘‘बधाई हो’’ क्या है?

फिल्म ‘‘बधाई हो’’ में उस मुद्दे पर बात की गयी, जिसे समाज धब्बा समझता है. पर फिल्म मनोरंजक है. इसमें अधेड़ उम्र में एक औरत के मां बनने पर पारिवारिक रिश्तेदारों व समाज द्वारा कसे जाने वाले ताना का चित्रण है. यह फिल्म कहती है कि बड़ी उम्र के दंपति में प्यार होना अच्छी बात है.

आप बड़ी उम्र में मां बनने को किस तरह से देखती हैं?

मेरी राय में यदि 40 और 50 साल की उम्र पार कर चुके दंपति के दिल में कवि हृदय है,तो बहुत अच्छी बात है. मैं तो कवि हृदय की तारीफ करती हूं. यह तो अच्छी बात है. मुझे इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती.

आपके अनुसार बदले हुए वक्त में किन विषयों पर फिल्में बननी चाहिए?

मानवीय मूल्यों को रेखांकित करने वाले विषयों पर फिल्में व सीरियल बनने चाहिए. मै महसूस करती हूं कि वर्तमान समय में लोग सेल्फिश होते जा रहे हैं. अब यह उनकी मजबूरी है या जिंदगी जीना इतना मुश्किल हो गया है कि उनके अंदर हमदर्दी कम हो गयी है. इसलिए इस वक्त ऐसी फिल्मों का बनना आवश्यक है, जिससे लोग मानवता के प्रति जागरूक हो और लोग अमानवीय न हो. अफसोस की दुनिया में हर इंसान अमानवीय होता जा रहा है. इन दिनों इतनी समस्याओं से इंसान जूझ रहा है कि वह सिर्फ अपने बारे में सोचने लगा है और फिर दूसरे के प्रति हमदर्दी खत्म हो जाती है.

नीना गुप्ता व गजराज राव के साथ आपके कैसे इक्वेशन रहे?

इनके साथ काम करके मुझे बडा मजा आया. देखिए,प्रोफेशनल कलाकारों के साथ काम करने का तो अपना ही मजा होता है. फिर नीना गुप्ता और गजराज राव संस्कारी लोग हैं. इन्होंने सेट पर मुझे बड़ी इज्जत दी. निर्देशक अमित शर्मा भी बेहतरीन और सुलझे हुए हैं.

पिछली बार आपने बताया था कि आपको लिखना अच्छा लगता है. तो कुछ नया लिख रही हैं?

हां! मुझे लिखना अच्छा लगता है. पर मैंने कभी फिल्म स्क्रिप्ट लिखने के बारे में सोचा नहीं. मैं कविताएं लिखती रहती हूं. कभी कभी मुझे कोई स्क्रिप्ट मिल जाती है, तो उन्हें मैं थोड़ा सा अपने हिसाब से बदल लेती हूं. बहुत ज्यादा नही. अपने हिसाब से मोड़ लेती हूं. मगर मुझे शब्दों के साथ खेलना अच्छा लगता है.

आपके लिए अभिनय क्या है?

अभिनय मेरा पैशन है. अभिनय के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं होता. मेने सीखा है कि अभिनय में श्रृद्धा और अनुशासन बहुत जरुरी है. मैने अपने जीवन व करियर में इसी को अपनाया है. सीखने का क्रम तो अभी भी जारी है.

धर्म का नया टोटका : चुनरी यात्रा

देश भर में बीते तीन चार सालों से शुरू हुआ चुनरी यात्रा का चलन अब शबाब पर है और इतने शबाब पर है कि चुनरी यात्राओं पर हेलीकाप्टर से फूल बरसाए जाने लगे हैं जिससे भक्तों का दिल बहलता रहे और धर्म की दुकानदारी और फले फूले. नवरात्रि के दिनों में तो चुनरी यात्रा धार्मिक प्रदर्शन और पैसा कमाने  में किस तरह काम में आती है इसका एक नजारा मध्यप्रदेश के छोटे से जिले रायसेन में देखने में आया जहां चुनरी यात्रा पर हवाई पुष्प वर्षा की गई. लाखों रुपये इस काम पर खर्चे गए तो जाहिर है करोड़ों इससे कमाए भी गए होंगे.

हजारों मीटर लंबी चुनरी यात्राएं अब हर कहीं निकलते देखी जा सकती हैं. इन यात्राओं में देवी माता की चुनरी औरतें ही सर पर रखकर ढोती हैं. कोई हजार दो हजार औरतें लाइन लगाकर एक के पीछे एक कर चलती हैं और देवी दुर्गा के जयकारे लगाती रहती हैं. रास्ते में इनके स्वागत के लिए जगह जगह पांडाल लगाए जाते हैं जिनमें चाय पानी और फलाहार आदि के इंतजाम रहते हैं .

दुकानदारी का सच

भोपाल में एक ऐसी ही चुनरी यात्रा का मुआयना जब इस प्रतिनिधि ने किया तो पता चला इस चुनरी यात्रा में 10 से 12 साल की लड़कियों से लेकर बूढ़ी औरतें तक चुनरी सर पर लटकाए चल रहीं थीं. दोपहर की तीखी धूप से तो इनके गले सूख ही रहे साथ ही ये लोग पैरों में चप्पल तक नहीं पहने थीं. पूछने पर पता चला कि अव्वल तो नौ दिन चलने वाले उपवास के दिन नंगे पैर ही रहा जाता है और जो कुछ औरतें किसी वजह से चप्पल पहन भी लेती हैं वे भी चुनरी यात्रा में नंगे पांव ही चलती हैं फिर भले ही तलुवों मे फफोले पड़ जाएं इनका जोश बनाए रखने को मर्द भी आगे आगे चलते हैं .

और गहराई से पड़ताल करने पर पता चला कि चुनरी यात्रा में शामिल औरतों में से अधिकतर पिछड़ी जाति की हैं. पिछड़ी और छोटी जाति की औरतें मेहनती होती हैं और उनमें धरम करम के काम करने का जज्बा और जुनून भी ज्यादा रहता है इसलिए उन्हें ही चुनरी यात्रा की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है. कई कई किलोमीटर तक पैदल चल रहीं इन भूखी प्यासी महिलाओं को इतने कष्ट और तकलीफ़ें देना कौन सी स्त्री पूजा है और इससे किसे क्या हासिल होता है इस सवाल का जवाब भी बेहद साफ है कि यह सारे ड्रामे पंडे पुजारी और ऊंची जाति वाले करवाते हैं जिनकी खुद की औरतें इत्मिनान से घरों में आराम फरमाती फलाहार के नाम पर फल फ्रूट और मावे मिष्ठान फांकती रहती हैं और गरीब औरतें धर्म के इस तमाशे का हिस्सा बनती हैं.

चुनरी यात्रा में शामिल लड़कियां स्कूल छोड़ कर आईं थीं और बड़ी उम्र की औरतों में से अधिकतर को चुनरी यात्रा वाले दिन मेहनत मजदूरी के अपने काम से छुट्टी लेना पड़ी थी जिससे उनकी एक दिन की कमाई मारी गई थी लेकिन इसके बाद भी वे खुश थीं क्योकि उन्हें धरम करम का मौका मिला था. चुनरी यात्रा के आयोजक हिन्दूवादी संगठन या फिर धार्मिक समितियों के करता धरता होते हैं जो कई मीटर या किलोमीटर लंबी चुनरी यात्रा किसी देवी मंदिर से शुरू करवाते हैं और मोहल्ले बस्तियों की औरतों को इसमें शामिल होने का न्योता देकर उन्हें उकसाते हैं. यात्रा के शुभारंभ पर खूब ढोल ढमाके बजाए जाते हैं और डी जे पर भजन बजाए जाते हैं. यात्रा में शामिल औरतों को बताया जाता है कि इससे देवी माता खुश होकर उनके मन्नत मुरादें पूरी करेगी .

चुनरी यात्रा जब सड़कों से होकर गुजरती है तो देखने वालों की भीड़ इकट्ठा हो जाती है और ट्रैफिक भी जाम होता है. आम लोग वक्त पर दफ्तर और मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे हैं परन्तु इससे चुनरी यात्रा के आयोजकों को कोई सरोकार नहीं रहता उल्टे वे तो यह मानते खुश होते रहते हैं कि जितना ट्रैफिक जाम होगा और जितनी परेशानी लोग उठाएंगे उतनी ही चुनरी यात्रा सफल मानी जाएगी .

यात्रा के समापन पर औरतों को फलाहार के नाम पर साबुदाने और आलू की खिचड़ी एक दोने में थमा दी जाती है और थोड़ा सा प्रसाद भी दे दिया जाता है जिसे दिन भर की मजदूरी या मेहनताना कहना ज्यादा बेहतर होगा .

दरअसल में चुनरी यात्राएं ऊंची जाति और पैसों वालों का नया शिगूफ़ा है जिसमें मेहनतकश औरतें मोहरे की तरह इस्तेमाल की जाती हैं. इन यात्राओं से धर्म की चमक दमक भी दिखती रहती है और नए अंधविश्वासियों की एक बड़ी फौज भी तैयार होती जाती है जिसका इस्तेमाल धर्म के नाम पर कभी भी मनचाहे ढंग से किया जाता है. पैसे वाले और ऊंची जाति वाले तो अपने मनोरंजन के लिए कुछ पैसा इसमें लगाते हैं जिससे धर्म की अहमियत दिखती रहे और पिछड़ी और छोटी जाति वाले इनसे दबे रहें.

गूगल स्ट्रीट व्यू में झांक, हो जाएगा तलाक

ज्यादा समय नहीं हुआ जब भारत में गूगल की टीम अपने 360 डिग्री कैमरों, भारी भरकम मैपिंग एंड स्ट्रीट व्यू एक्विपमेंट्स के साथ यह सोचकर आई थी कि कि गूगल मैप की तरह गूगल स्ट्रीट व्यू को भी यहां लांच कर दिया जाएगा. लेकिन भारत के संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को लगा कि इससे लोगों की निजता भंग होगी. लिहाजा उसने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं दी और गूगल अपना डिजिटल बोरिया बिस्तर लेकर उन देशों की तरफ चल पड़ा जिन्हें अपनी प्राइवेसी के भंग होने और इस फीचर से ऐतराज नहीं था.
बहरहाल अगर यह फीचर हमारे यहां भी होता तो शायद हम भी बाकी देशों की तरह हजारों मील दूर बैठकर एक क्लिक कर अपने गांव, घर की तंग और संकरी गलियों के लाइव दर्शन कर लेते और वहीं से बैठे-बैठे बता देते कि हमारे घर के छत पर कितने कौवे कांवकांव कर रहे हैं या फिर नुक्कड़ पर किसका लौंडा कोचिंग से बंक मारकर सिगरेट फूंक रहा है या किसकी लड़की को स्कूटी पर घुमा रहा है. लेकिन यह हो न सका.

google-street-view-technology-curse-or-blessing

बिगड़ा घर का मैप

खैर, आपको भी इस फीचर की कमी खल रही हो तो यह खबर पढ़ लीजिए. शायद कुछ राहत मिल सके. तो हुआ यूं कि दक्षिण अमेरीका के पेरू शहर में एक साहब गूगल मैप के जरिए कहीं का ट्रैफिक ट्रैक तलाश रहे थे. जब रास्ता बहुत क्लियर नहीं दिखा तो उन्होंने जरा हाईटेक होते हुए गूगल स्ट्रीट व्यू फीचर का इस्तेमाल करना मुनासिब समझा. इस बात से बेखबर कि यह फीचर उनके घर का मैप बिगाड़ने वाला है उन्होंने स्मार्टफोन पर उंगलियां दौड़ा दीं.

google-street-view-technology-curse-or-blessing

बेचारे गलियों का वर्चुअल टूर करते करते एक ऐसी जगह जा पहुंचे जहां गली के किनारे एक बेंच पर एक कपल जरा रोमांटिक मूड में था और प्रेमकीड़ा में मसरूफ भी. खैर, वे इस मनोरम दृश्य को आम दृश्य समझकर आगे बढ़ने ही वाले थे कि उन्हें अचानक याद आया कि वो महिला तो बिलकुल उनके वाइफ जैसी ड्रेस में है. उत्सुकतावश जरा ज़ूम मारा तो पता चला कि सिर्फ ड्रेस ही सेम टू सेम नहीं बल्कि महिला उन ही की धर्मपत्नी हैं. गूगल ने उनकी आंखों पर पड़ा पर्दा हटा दिया था. जब महिला घर पहुंची तो उसने पति महोदय के आरोप को सिरे से खारिज कर दिया. लेकिन जब पति ने वह तस्वीर दिखाई जिसमें पत्नी किसी और मर्द के साथ बैठी थी और वह शख्स उसके बालों में अपनी उंगलियां घूमा रहा था. तो मैडम को दिव्यज्ञान हुआ कि अब गूगल महाराज ने पति पर अपनी कृपा बरसा दी है. अब झूठ बोलने से काम नहीं चलेगा. और इस तरह पति महोदय ने बड़ी इज्जत से पत्नी को तलाक दे दिया.

टेक्नोलौजी से तलाक का कनेक्शन है पुराना

एक तरफ जहां तकनीक ने बैंकिंग, शौपिंग और कई मामलों में लोगों की मुश्किलें हल की हैं वहीं ये कई समस्याओं का कारण भी बनती है. जहां इस मामले में पति और पत्नी का तलाक हुआ वहीं लगातार फोन पर बिजी रहने वाले पति से तंग आकर कई महिलाएं अपने पतियों को तलाक दे चुकी हैं. उनका कहना होता है कि पति को बीवी से ज्यादा स्मार्टफोन के साथ वक़्त बिताना अच्छा लगता है. इस बाबत एक और दिलचस्प वाकया सुनने को मिला था जब पहला आईफोन बनाने पर काम करने वाले पूर्व एप्पल इंजीनियर ऐंडी ग्रिग्रौन ने अपने तलाक का कारण आईफोन को माना था. यह खुलासा उन्होंने आईफोन के ओरिजिन पर आधारित किताब ‘द वन डिवाइस’ में भी किया था.

व्‍हाट्सएप पर तलाक

इस से एक कदम आगे बढ़ते हुए हैदराबाद के एक शख्‍स ने अपने से आधी उम्र की पत्‍नी को व्‍हाट्सएप पर ही तलाक दे डाला था. परेशान महिला 29 साल की हुमा सायरा थी. उसने अपने से करीब दोगुने उम्र के 62 वर्षीय शख्‍स के साथ निकाह किया था जो ओमान का नागरिक था. व्‍हाट्सएप पर तलाक मिलने के बाद उसने इसकी शिकायत विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज से भी की थी.

आधे अधूरे हैं टेक्नोलौजी के सहारे

इस तरह के कई मामले आएदिन सुनने और पढ़ने को मिलते रहते हैं जहां तकनीक रिश्तों के पेंच उलझा रही है, शादियां तोड़ रही है, निजता पर हमला कर रही है और आजकल तो सरकारी चाबुक भी बन रही है. दोस्ती और प्यार भी अब फेसबुक, इन्स्टा और व्‍हाट्सएप में कैद होकर रह गए हैं. वीडियो कौल का फीचर है तो लोग मिलना-जुलना भी भूलते जा रहे हैं. मेल, ई कार्ड और एनीमेटेड क्लिप्स रिश्तों को मशीनी बना रहे हैं. युवाओं के पास इंटरनेट पर पढ़ने और जानने के लिए कुछ सटीक और गंभीर कंटेंट तो नहीं है उल्टा पोर्न, फिल्म और अफवाहों का कचरा उन्हें भरमा जरूर रहा है.

तकनीक सही और काम की चीज है लेकिन तब तक, जब तक उसका इस्तेमाल हम करें, लेकिन जब वह हमारा इस्तेमाल करने लगे तो उस से जरा दूरी बना लेनी चाहिए.

गिरता रुपया, बढ़ता टैक्स : एफपीआई पर दोहरी मार

केंद्र सरकार देश की अर्थव्यवस्था को संभाल नहीं पा रही है. उस की दोषपूर्ण आर्थिक नीति के चलते रुपया गिरने का रिकार्ड बना रहा है. हालत यह हो गई है कि भारतीय रुपया अब सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली एशियाई करेंसी बन गया है. रुपये के गिरते रहने से देशवासी चिंतित हैं. जो भारतीय स्टूडेंट्स पढ़ाई के लिए विदेश जाने की सोच रहे हैं उन पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है चूंकि वहां की फीस का भुगतान डौलर में करना पढ़ता है.

कभी 48-50 रुपए के बीच झूलने वाला डौलर आज 70 रुपये के ऊपर दौड़ रहा है.  वहीं, रुपए के रिकॉर्ड लो लेवल (निचले स्तर) पर आने से फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (एफपीआई) को दोहरा झटका लगा है.  एक तो इस से उन के पोर्टफोलियो की वैल्यू डौलर में कम हुई, दूसरे सरकार ने बजट में विदेशियों को रुपए में मिलने वाले रिटर्न पर कैपिटल गेन्स टैक्स लगाने की बात कही थी. इस से उन की परेशानी अब दोहरी हो गयी है.

दरअसल,  पिछले वित्त वर्ष तक विदेशी निवेशक डौलर रिटर्न पर कैपिटल गेन्स (सीजी) टैक्स चुकाते थे. सरकार ने इस साल के बजट में चुपचाप इसे वापस ले लिया और इस की जगह पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (एल टी सी जी) टैक्स लगा दिया. उस वक्त विदेशी निवेशकों ने सरकार के इस कदम का विरोध नहीं किया था क्योंकि तब रुपया मज़बूत था.  लेकिन, वित्त वर्ष 2018  में अब डौलर के मुकाबले रुपये में 16 फीसदी की गिरावट आ चुकी है. इस से रुपये में हुए मुनाफे पर उन्हें अधिक टैक्स चुकाना पड़ेगा.

मनी मार्केट के जानकारों का मानना है कि रुपये में रिकोर्ड लो लेवल से रिकवरी, वह भी थोड़ी बहुत, हो सकती है लेकिन वह टिकाऊ नहीं होगी. कच्चे तेल के दाम में तेजी और रुपये की रिकार्ड गिरावट के भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर को लेकर निवेशक आशंकित हैं.

नतीजतन, विदेशी निवेशकों ने सितंबर में 1.3 अरब डौलर की रकम निकली थी, जबकि अक्टूबर में अब तक वे 1.8 अरब डौलर के अपने शेयर बेच चुके हैं. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि अगर क नाम के विदेशी निवेशक ने सालभर पहले रिलांयस के 10 हजार शेयर 1,200 रुपये प्रति शेयर खरीदे थे तो उन की लागत 1.2 करोड़ रुपये थी. उस समय एक डौलर में 64 रुपये मिल रहे थे. डौलर में उन की लागत 1.87 लाख थी. वहीं, आज रिलायंस का एक शेयर अगर 2044 रुपये में मिल रहा है तो 10 हजार शेयर बेचने से निवेशक को 2.04 करोड़ रुपये मिलेंगे, लेकिन डौलर में यह रकम 2,75,992 ही होगी.

ऐसे में 88,992 डौलर के प्रौफिट पर 10 फीसदी यानी 8,899 डौलर का टैक्स बनता अगर विदेश करेंसी में इस का भुगतान करना होता. नए नियम के चलते उक्त क नाम के विदेशी निवेशक को 84 लाख रुपये के प्रॉफिट पर 8.4 लाख रुपये यानी 11,342 डौलर का टैक्स चुकाना होगा.  इस तरह विदेशी निवेशक को दोहरी मार पड़ रही है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें