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कानून बदले बिना बदलीं कमिश्नर की सेवा शर्तें ?

भारतीय जनता पार्टी ने अदालत की अवमानना की तो उस के नेतृत्व की केंद्र सरकार ने एक मौजूदा कानून के उलट क़दम बढ़ा दिया. केरल के सबरीमाला मंदिर मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने लोगों को बरगलाया जो अदालत की अवमानना है. वहीं, देश की सत्ता पर काबिज़ भाजपा की सरकार ने वेतन, भत्ते, सेवा शर्तें बताए बिना मुख्य सूचना आयुक्त के पद के लिए योग्य उम्मीदवारों से आवेदन मंगाने का क़दम बढ़ा दिया जबकि मौजूदा कानून में ये सब बताना आवश्यक है.

राजनीतिक दलों और लोगों के सूचना अधिकार की मुहिम से जुड़े कार्यकर्ताओं के विरोध के बावजूद देश की सरकार सूचना के अधिकार कानून (राइट टू इन्फार्मेशन एक्ट – आरटीआई एक्ट) में विवादास्पद बदलाव करने पर अडी है.  उस का अड़यलपन यहाँ तक है कि अभी वह कानून में संसद से संशोधन नहीं करा पाई है, फिर भी उस ने अपना निजी क़दम बढ़ा दिया है.

सरकार ने केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य पद मुख्य सूचना आयुक्त के पद के लिए विज्ञापन जारी कर दिया है जिस में सेवा शर्तों या वेतन का ज़िक्र नहीं है.  यह विज्ञापन मौजूदा आरटीआई एक्ट में प्रस्तावित उस  संशोधन के मुताबिक़ है जिस पर संसद की मुहर लगवाने के लिए अभी उसे सदन में पेश तक नहीं किया गया है.

केंद्र सरकार के कार्मिक एवम प्रशिक्षण विभाग (डेपार्टमेन्ट ऑफ़ पर्सनल एंड ट्रेनिंग) ने यह विज्ञापन जारी कर मुख्य सूचना आयुक्त पद के लिए आवेदन मंगाए हैं.  मौजूदा मुख्य सूचना आयुक्त आर. के. माथुर का कार्यकाल 24 नवम्बर को समाप्त  हो रहा है.  विभाग के विज्ञापन में सेवा शर्तों का ज़िक्र नहीं है.  विज्ञापन में यह लिखा है कि मुख्य सूचना आयुक्त पद के लिए चुने गए उम्मीदवार को नियुक्ति के समय वेतन, भत्ते, सेवा सम्बन्धी नियम व शर्तों के बारे में बताया जाएगा.

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग का यह विज्ञापन मौजूदा आरटीआई कानून के हिसाब से नहीं है जिस की धारा 13 में साफ़ बताया गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष या आयुक्त के 65 वर्ष पूरे होने तक (जो भी पहले होगा) है.  कानून में यह भी साफ़ है कि मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन मुख्य चुनाव अधिकारी के बराबर होगा.

विभाग का यह विज्ञापन आरटीआई कानून में प्रस्तावित उस संशोधन के हिसाब से है जिसे संसद के मानसून सत्र के दौरान वितरित किया गया था.  उक्त प्रस्तावित संशोधन में मुख्य सूचना आयुक्त और राज्यों के सूचना आयुक्तों का 5 वर्ष का कार्यकाल ख़त्म कर दिया गया है और सूचना आयुक्त के पद की शर्तें, वेतन, भत्ते और दूसरी सेवा शर्तें तय करने का अधिकार केंद्र सरकार को होगा.  लेकिन चूंकि इस संशोधन को संसद में अभी पेश तक नहीं किया गया है, इसलिए सरकारी विभाग द्वारा ऐसा विज्ञापन जारी करने पर ऊंगली उठ रही है.

राजनीतिक दलों और लोगों के सूचना के अधिकार की राष्ट्रीय मुहिम से जुड़े कार्यकर्ताओं के चौतरफा विरोध के बावजूद सरकारी विभाग द्वारा ऐसा विज्ञापन जारी करने से सरकार की अड़ियल मंशा साफ़ नजार आ रही है. नेशनल कैंपेन फॉर पीपल्स राईट टू इनफार्मेशन के एक कार्यकर्त्ता का कहना है कि यह विज्ञापन सरकार की अड़ियल मंशा को साफ़ करता है.  राजनीतिक दलों और सिविल कार्यकर्ताओं की तरफ से उठाये गए मुद्दों को दरकिनार कर आरटीआई कानून में संशोधन किया जा रहा है.  इसीलिए विज्ञापन में पद से जुडी सेवा शर्तों का ज़िक्र नहीं किया गया है.

सूचना के अधिकार की मुहिम से जुड़े एक दूसरे कार्यकर्ता का कहना है कि वेतन, भत्ते और दूसरी शर्तें बताये बिना नियुक्ति करने के लिए आवेदन मंगाना मखौल उड़ाने जैसा है.  हालांकि, उच्च पद के लिए आवेदन आयेंगे, भले ही विज्ञापन में सेवा शर्तों और वेतन भत्तों का ज़िक्र न हो.  इस के पहले मुख्य सूचना आयुक्त और राज्यों के सूचना आयुक्तों के पदों के लिए पूर्व राजनयिकों और राजदूतों तक ने आवेदन किया था.

6 दिसंबर: जब ‘राम’ के नाम पर ‘रावण’ बने लोग

6 दिसंबर देश के इतिहास का वो काला दिन है जिसकी टीस आज तक लोगों के दिलों में नासूर बन के चुभ रहा है. हजारों ने राम और अल्लाह के नाम पर रावण और हैवान का रूप धरा और लोगों ने अपनों को खो दिया. 1947 को देश आजाद हुआ. 1976 में संविधान की प्रस्तावना में 42वें संशोधन के साथ ये साफ कर दिया गया कि भारत एक पंथनिर्पेक्ष राज्य है. पर शायद इसका अर्थ केवल स्कूलों के नैतिक ज्ञान की किताबों में एक अध्याय को जोड़ने भर का था. हम 200 सालों से ज्यादा की गुलामी के खिलाफ जिस ‘एक हिंदुस्तान’ के भाव से लड़े, शायद 45 सालों बाद 1992 तक वो ठंडा पड़ चुका था और हमें विभाजन के लिए एक और मुद्दे की जरूरत आ पड़ी थी.

धर्म के नाम पर 1940 के दशक में देश जिस हिंसा का गवाह बना उसने देश के हर कोने में खून की झेलम, चेनाब और गंगा बहा दी थी. शायद उस वक्त मिट्टी में समाए खून की गर्मी खत्म नहीं हुई थी. उसके आग की तपन से एक नई पीढ़ी को गढ़ा जा रहा था, जिसे फिर से खून को स्याही बना धर्म, देश और राष्ट्रभक्ति की नई परिभाषा रचनी थी.
सभी कानूनी प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय को वचनबद्ध करने के बावजूद, जब 6 दिसंबर 1992 को 1,50,000 लोग अयोध्या की सड़कों पर निकले तो रैली किस कदर हिंसक हो उठी, इसका अंदाज़ा हजारों की संख्या में सड़कों पर पसरी लाशों को देख के लगाया जा सकता था. हर ओर बिखरी खून की लाली इंसान की सस्ती हो चुकी जान की गवाही दे रही थी. नेताओं के आवाह्न पर सैकड़ों ने अपनी जान दे दी.
कई हिंदू संगठनों का दावा रहा है कि, ‘श्रीराम’ का जन्म ठीक उस स्थान पर हुआ था जहां बाबरी मस्जिद थी. इसी दावे ने उन्हें बाबरी मस्जिद के विध्वंस और उस ऐतिहासिक हिंसा के लिए प्रेरित किया था.

अयोध्या काण्ड को हुए 25 साल बीत चुके हैं, पर आज भी इस घटना की गूंज देश के राजनैतिक गलियारों में सुनाई देती है. आज भी ये घटना राजनैतिक दलों के मैनिफेस्टो और नेताओं के भाषणों को ओजस्वी, तेजस्वी और धारदार बनाने का काम करती है.

लंबे वक्त में देश ने न जाने कितने दंगों को झेला, न जाने कितनों के लिए वो टीस आदत बन चुकी है. पर जिन आवाजों ने लोगों को कुर्बानी का हौसला दिया, आज वो संसद में गूंज रही हैं और देश को  समरसता और पंथनिर्पेक्षता का पाठ पढ़ा रही हैं. आज, 25 सालों बाद भी मामला सर्वोच्च न्यायालय की सीढ़ियों पर न्याय की गुहार लगा रहा है. पर लड़ाई आज भी खून को इंसाफ दिलाने की नहीं, बल्कि इस बात की है कि “कौन” उस जमीन पर माथा टेकेगा.

 

बिच्छू, मोदी, शिवलिंग और आरएसएस

मोदी आरएसएस के लिए शिवलिंग पर बैठे उस बिच्छू की तरह हैं जिसे न हाथ से हटाया जा सकता है और न ही चप्पल से मारा जा सकता है. अगर हाथ से हटाया तो बुरी तरह काट लेगा.

यह बात कहने को तो पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेसी नेता शशि थरूर ने कही लेकिन उनकी ही मानें तो दरअसल में यह सूक्ति वाक्य श्रुति और स्मृति परम्परा के तहत उनसे एक पत्रकार ने कही थी और उस पत्रकार से भी यह बात आरएसएस के एक सदस्य ने कही थी. यानि असल तकलीफ जो भी है संघ की है इसके लिए शशि थरूर को ही क्यों चुना गया यह बात जरूर काबिले गौर है. बेंगलुरु में अपनी ही एक किताब के बारे में चर्चा करते करते शशि थरूर मोदी जी की तरफ इस दिलचस्प तरीके से मुड़े तो बात इत्तेफाक की तो कतई नहीं लगती.

इस खुलासे का सार जो पिछले कुछ दिनों से गरमा रहा है वह इतना भर है कि अब नरेंद्र मोदी और संघ की केमेस्ट्री गड़बड़ाने लगी है. आम चुनाव सर पर हैं और भाजपा के पास उपलब्धियों के नाम पर कुछ खास है नहीं जिन्हें बताकर दोबारा सत्ता हथियाई जा सके. ऐसे में आरएसएस को अगर राम मंदिर की चिंता होने लगी है और वह कट्टर हिंदूवादी छवि वाले उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को आगे ला रहा है तो यह न केवल राजनीति में बल्कि देश भर में भी उथल पुथल के संकेत हैं.

बात जहां तक शशि थरूर के बयान की है तो उसमें कुछ तकनीकी खामियां तो हैं मसलन शिवलिंग पर बिच्छू नहीं बल्कि सांप विराजता है, वह भी पूरे ठाठ से और लोग उसकी पूजा भी करते हैं. उसे जूता चप्पल नहीं दिखाते. दूसरे अगर बिच्छू शिवलिंग पर चढ़ ही गया है तो उसे हटाने दूसरे कई तरीके भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं. इनमें सबसे अच्छा और सुरक्षित है हाथों में दास्ताने पहनकर उसे हटाना. शिवलिंग की पवित्रता बनाए रखने दास्ताने गंगा जल से धोये जा सकते हैं.

वैसे भी यह सरदर्द अगर है तो आरएसएस का है जिसकी चिंता करने के बजाय शशि थरूर को अपनी पत्नी सुनंदा की संदिग्ध मौत के मामले की करनी चाहिए. जिसमें वे शक के दायरे में हैं. कोई शिवलिंग सांप या बिच्छू इसमें उनकी मदद नहीं कर सकता. मोदी संघ से ऊपर हो जाएं या नीचे रहें कांग्रेसियों को इसका तनाव सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला क्योंकि राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला मामूली आदमी भी यह जानता है और यह भी समझता है कि नागपुर में कई ऐसे जानकार बैठे हैं जिनका काम ही सांप बिच्छुओं का जहर उतारना है. यह भी जरूरी नहीं कि हर बिच्छू जहरीला होता हो हां इतना जरूर है कि बिच्छू डंक मार दे तो दर्द बहुत होता है.

 

सीबीआई बनाम सीबीआई : देश की शीर्ष जांच एजेंसी पर उठे सवाल

देश की शीर्ष जांच एजेंसी सीबीआई यानी केंद्रीय जांच ब्यूरो खुद जांच के दायरे में आ गया है. उस के दो सीनियर अफसरों निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना दोनों ही एकदूसरे पर रिश्वतखोरी का आरोप लगा कर संस्था की साख पर बट्टा लगा रहे हैं. अदालत का निर्णय जो भी हो पर एक बात तय है कि इस विवाद ने पहले से ही विवादित सीबीआई पर कलंक लगा दिया है. इसे मिटाने के लिए देश की इस शीर्ष संस्था को काफी समय लगेगा. इस प्रमुख संस्थान के शीर्षस्थ अधिकारियों में लड़ाई के बाद का घटनाक्रम खासा खेदजनक है. घमासान से साबित होता है कि इस में किसी विशेष साख और प्रतिबद्धता के अधिकारी नहीं हैं. यह पहला मौका है जब सीबीआई को अपने दफ्तर पर छापा मारना पड़ा. संस्था में छिड़ी नंबर एक और नंबर दो के बीच की जंग खुल कर सामने आई है और अंतत: मुख्य सतर्कता आयोग की पहल पर इन दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया गया है. यहां तक कि इन के मातहतों का भी इधरउधर ट्रांसफर कर दिया गया है और दफ्तर सील कर दिया गया है. सीबीआई की कमान अब वरिष्ठतम संयुक्त निदेशक नागेश्वर राव के हाथ में है, लेकिन खुदा उन का दामन भी पाकसाफ नहीं है. सिर्फ राव ही नहीं सीबीआई की नकेल थमाने वाले सतर्कता आयुक्त तक खुद दूध के धुले नहीं हैं. देश की इस सब से बड़ी जांच एजेंसी की आंतरिक लड़ाई चौराहे पर आ जाने से देश की छवि भी प्रभावित हुई.

हंगामा क्यों बरपा

यह बड़ा हास्यास्पद है कि देश की आला खुफिया एजेंसी जोकि दूसरों के भ्रष्टाचार की जांच करती है वह खुद ही भ्रष्टाचार के दलदल में फंस गई है. अगर रक्षक ही भक्षक बन जाए तो फिर किस पर भरोसा किया जाए. इस से बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि सीबीआई निदेशक अपने ही स्पैशल निदेशक पर एक मीट कारोबारी से 3 करोड़ रुपए की रिश्वत लेने का खुलेआम आरोप लगा कर एफआईआर करे और विशेष निदेशक, सतर्कता आयोग और कैबिनेट सचिव को पत्र लिख कर बताए कि निदेशक ने इसी मामले में 2 करोड़ रुपए की रिश्वत ली है. विडंबना की बात यह भी है कि एफआईआर के बावजूद विशेष निदेशक को गिरफ्तार नहीं किया गया, जबकि सीबीआई यदि किसी लोकसेवक के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दायर करती है तो गैरजमानती मामला बनता है और उसे गिरफ्तार तो किया ही जाता है. कई पुलिस अधिकारी और सिपाही तो सौ रुपए की रिश्वत लेते ही पकड़ लिए जाते हैं.

जांच के नाम पर हो रही थी उगाही

उगाही और रिश्वतखोरी के आरोपों में अस्थाना के भरोसेमंद डीएसपी देवेंद्र कुमार को न्यायिक जेल भेज दिया गया. और उन के खिलाफ जांच करने वाली टीम को दरबदर कर दिया गया. इस घमासान में रौ और आईबी अफसरों की संलिप्ता भी नजर आई. यह पहला मौका है जब देश की तीनों सर्वोच्च गुप्तचर जांच एजेंसियां एकसाथ आरोपों में फंसी हैं. हालत यह है कि सीबीआई ही सीबीआई की जांच कर रही है. सवाल यह है कि सीबीआई के भीतर से पटाखों की तरह फूटने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों की पहले जांच होनी चाहिए या बाहरी व्यक्तियों और संस्थाओं की. अपराध पकड़ने वाला यदि खुद ही अपराधी हो तो वह कैसे अपराधी तक पहुंचेगा और उस के द्वारा की गई जांच पर किसे भरोसा होगा.

एक आम नागरिक चाहे वह औरत हो या मर्द, हिंदू हो या मुसलमान, सवर्ण हो या दलित जिस ढांचे की तरफ भरोसे से देख इंसाफ की जंग के लिए साहस जुटाता है अब कहां जाएगा? यह सीबीआई बनाम सीबीआई नहीं सीबीआई बनाम देश के विश्वास की लड़ाई है.

यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टूजी और कोयला घोटाले की जांच के समय सीबीआई पर तंज कसा था कि यह तो पिंजरे में बंद तोता है जिसे मालिक जैसा रटाएगा यह वैसी ही भाषा बोलेगा. लेकिन आज तो पिंजरे में बैठे ये तोता आपस में ही एकदूसरे को चोंच मारकर लहूलुहान कर रहे हैं. उन्हें मालिक का खयाल ही नहीं है या उन में से एक खुद को मालिक के ज्यादा करीब समझता है तो दूसरे को अपनी ताकत के इस्तेमाल की पड़ी है. हाल इतना बेहाल है कि सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को उगाही गिरोह का सरगना बता रहे हैं.

मोइन कुरैशी : सीबीआई अफसरों से सांठगांठ

आला खुफिया एजेंसी के 2 वरिष्ठ अधिकारियों के उठे विवाद के तार मांस निर्यातक मोइन कुरैशी से जुड़े हैं. सीबीआई में नंबर 2 की हैसियत रखने वाले विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने राहत पहुंचाने के लिए कुरैशी के करीबी कारोबारी सतीश बाबू सना से 3 करोड़ रुपए की घूस ली. इसी मामले में राकेश अस्थाना ने सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा पर भी सना से 2 करोड़ रुपए घूस लेने का आरोप लगाया. इन दोनों अधिकारियों में छिड़ी इस घमासान से सीबीआई की खूब छिछालेदर हुई.

मोइन कुरैशी उत्तर प्रदेश के रामपुर का निवासी है वह देश का सब से बड़ा मीट कारोबारी है. वह 2014 में तब सुर्खियों में आया था जब आयकर विभाग ने दिल्ली रामपुर समेत उस की कई संपत्तियों पर छापे मारे थे. कांग्रेस के कई बड़े नेताओं से भी कुरैशी के करीबी रिश्ते रहे हैं. इतना ही नहीं, सीबीआई के पूर्व प्रमुख एपी सिंह और रंजीत सिन्हा से भी उस की नजदीकियां रही थीं.

सीबीआई में सफाई

देश की शीर्ष जांच एजेंसी के सीनियर अफसर जिस तरह एकदूसरे को कटघरे में खड़ा कर शाह और मात का खेल खेल रहे थे उस के चलते दोनों को छुट्टी पर भेजने के अलावा कोई चारा नहीं था. यह इसलिए भी जरूरी हो गया था कि इस खेल में सीबीआई की बचीखुची साख भी मिट्टी में मिल रही थी. इस जंग में सीबीआई ही नहीं निष्पक्षता और स्वायत्तता जैसे शब्द भी बेसाख हुए हैं जिन में आम लोगों की जान अटकी है. लोकतंत्र में तथ्यों के विपरीत छवि निर्माण का अपना महत्त्व है, जो आम नागरिकों को अपनी चुनौतियों से जूझने की ऊर्जा देता है. इन दोनों की जांच के बाद फैसलों से अगर इन की कलह शांत नहीं होती तो सीबीआई की साख बहाल करना मुश्किल होता. कहना मुश्किल है कि अदालतों का हस्तक्षेप वैसी परिस्थितियां पैदा करता है या नहीं जैसी सरकार चाह रही है अगर ऐसा नहीं होता तो उस के लिए वांछित फैसला लेने में दिक्कत आ सकती है. सीबीआई में छिड़ी शर्मनाक रार से यह साफ हो गया है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग अपनी भूमिका का निर्वाह सही से तरीके से नहीं कर सका. ऐजेंसी और सरकार ने समय रहते अगर इस पर हस्तक्षेप किया होता तो यह नौबत नहीं आती. आखिर इतना बेहतरीन ढांचा नाकाम क्यों साबित हो रहा है. सवाल है कि हमें सीबीआई जैसी संस्था को देश में कानून के राज को मजबूत करने के लिए रखना है या राजनीतिक बदले की भावना से काम करने के लिए.

सच तो यह है कि सरकार को सीबीआई के ढांचे और प्रणाली में भी आमूलचूल परिवर्तन पर भी विचार करना चाहिए, ताकि भविष्य में दोबारा ऐसी स्थिति पैदा न हो, जिस से एजेंसी की छीछालेदर हो. यह फौरी जरूरत है कि इसे शक से परे किया जाए. तंत्र में लोक का भरोसा बनाए रखने के लिए इस की लाज बचनी जरूरी है.

खरीदने जा रहे हैं स्मार्ट टीवी तो स्क्रीन साइज का रखें ध्यान

पिछले कई सालों से स्मार्ट टीवी का चलन काफी बढ़ गया है. अब लोग बौक्स वाले टीवी की जगह एलसीडी या एलईडी वाल टीवी लगाना पसंद करते हैं. स्मार्ट टीवी आपको छोटे स्क्रीन साइज से लेकर बड़े स्क्रीन साइज में मिल जाती है.

जब हम टीवी खरीदने जाते हैं तो हमारे दिमाग में बस एक ही बात चलती है कि कमरे में किस स्क्रीन साइज का टीवी लगाना बेहतर होगा. कई बार तो ऐसा होता है, हम जरूरत से ज्यादा छोटे स्क्रीन साइज का टीवी खरिद लेते हैं और कई बार बड़े साइज की टीवी लाते हैं. जो देखने में अटपटा सा लगता है.

आइए आपको अलग-अलग स्क्रीन साइज की टीवी के बारे में बताते हैं ताकि स्मार्ट टीवी  खरीदने से पहले आप अपने टीवी की स्क्रीन साइज का ध्यान रख सकें.

  • बड़ी स्क्रीन साइज वाली टीवी

इस साइज की टीवी पर आपको बेहतर स्पोर्ट्स का आनंद मिल सकेगा. इसके साथ ही, इस स्क्रीन साइज की टीवी का रिजोल्यूशन ज्यादा होता है. इस साइज के टीवी आपके रूम के वाल को पूरा कवर कर सकते हैं. इसकी कीमत 60 हजार से लेकर 3 लाख तक हो सकती है.

  • छोटे साइज वाले टीवी

इस स्क्रीन साइज वाले टीवी का प्रयोग कंप्यूटर मौनिटर के लिए किया जाता है. इस साइज के टीवी की कीमत तो कम होती ही है साथ ही इसे आप छोटे रूम में भी लगा सकते हैं. इस साइज के टीवी आपके वाल का स्पेस भी कम लेता है और देखने में भी अच्छा लगता है. आजकल लौन्च होने वाले इस साइज वाले स्मार्ट टेलिविजन में 4K क्वालिटी की वीडियो देख सकते हैं. इस साइज वाले टीवी की कीमत 20-40 हजार रुपये तक हो सकती है.

  • मीडियम साइज वाले टीवी

इस साइज के टीवी को सबसे बेहतर माना जाता है, क्योंकि इन स्मार्ट टीवी का साइज न तो ज्यादा बड़ा होता है न ही ज्यादा छोटा. साथ ही इस साइज के टीवी में आप मूवीज से लेकर स्पोर्ट्स का बेहतर लुफ्त ले सकते हैं. अगर आपके रूम में अच्छा स्पेस है तो इस साइज वाले टीवी आपके लिए एक बेहतर विकल्प हो सकता है. इसकी कीमत 40-60 हजार तक हो सकती है.

मोदी शिवलिंग पर बैठे बिच्छू जैसे : शशि थरूर ने दिया ‘कारवां’ की खबर का हवाला

कांग्रेस सांसद शशि थरूर की एक टिप्पणी पर भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर कांग्रेस पर टूट पड़ी है. थरूर अपनी टिप्पणी से विवादों में घिर गए हैं. बेंगलुरू लिटरेचर फेस्टिवल में संघ के एक नेता का हवाला दे कर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना शिवलिंग पर बैठे बिच्छू से कर दी थी. उन्होंने कहा था आरएसएस के एक अनाम सूत्र ने एक पत्रकार से बातचीत में बेहद विचित्र तुलना की थी. कहा था कि मोदी शिवलिंग पर बैठे बिच्छू जैसे हैं, जिसे आप न हाथ से  हटा सकते हैं और न ही चप्पल से मार सकते हैं.

शशि थरूर ने अपने बयान में संघ के एक अनाम सूत्र द्वारा एक पत्रकार के समक्ष की गई टिप्पणी का जिक्र किया है. विवाद बढ़ने पर उन्होंने उस लेख का लिंक भी ट्वीटर पर शेयर किया. हालांकि विवाद बढ़ने पर उन्होंने कहा कि यह टिप्पणी 6 साल से पब्लिक डोमेन में है.

मालूम हो कि शशि थरूर ने जिस लेख का हवाला दिया है वह दिल्ली प्रेस की कारवां पत्रिका में मार्च, 2012 में ‘द एंपरर अनक्राउंड’ नाम से पत्रिका की वेबसाइट पर छपा था.

लंबे लेख के आखिरी पैराग्राफ में लिखा है, मेरे गुजरात छोड़ने से पहले आरएसएस के एक नेता ने कटुता के साथ कहा, शिवलिंग में बिच्छू बैठा है. ना उस को हाथ से उतार सकते हो, ना उस को जूता मार सकते हो.

थरूर की टिप्पणी पर आपत्ति जताते हुए भाजपा ने कांग्रस अध्यक्ष राहुल गांधी से माफी मांगने को कहा है. पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद सिंह ने कहा कि राहुल गांधी खुद को शिव भक्त कहते हैं और उन के नेता शिवलिंग पर चप्पल फेंकने की बात कहते हैं. क्या यह भगवान शिव का अपमान नहीं है?

रविशंकर प्रसाद ने चेतावनी भी दी कि हिंदू देवीदेवताओं का ऐसा अपमान यह देश सहन नहीं करेगा. उन्होंने सोनिया गांधी और राहुल गांधी से पूछा है कि क्या वह शिवलिंग पर चप्पल फेंकने वाले थरूर के बयान का समर्थन करते हैं.

एक और केंद्रीय मंत्री गिरीराज सिंह ने कहा कि अगर पाकिस्तान होता तो शशि थरूर की जुबान को चुप कर दिया गया होता. उन्होंने प्रधानमंत्री का अपमान नहीं किया, करोड़ों हिंदुओं और भगवान शिव को अपमानित किया है.

पिछले कुछ समय से भाजपा नेता बातबात पर देवीदेवताओं पर अपमान को ले कर आवाज उठाने लगते हैं. 4-5 सालों से नेताओं द्वारा आपस में की गई टीकाटिप्पणियों, मानहानि, भावनाओं को ठेस के आरोपों के मामले अदालतों में बड़ी तादाद में पहुंचे हैं.

नेताओं पर परस्पर टिप्पणियों से पार्टियां आमनेसामने आ जाती है. राजनीतिक पार्टियों में जरा भी सहनशक्ति दिखाई नहीं देती. वह हर बयान, टिप्पणी को राजनीतिक नफानुकसान से तोलती है. बातबात पर देवीदेवताओं के अपमान, धार्मिक भावनाओं को ठेस की बात को बीच में ले आती है. खासतौर से संघभाजपा के नेताओं की भावना बहुत जल्दी आहत होती है.

यह स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा ही है और लोकतंत्र का मूल आधार है. लोकतंत्र में जनता के मौलिक अधिकारों की बहुत अहमियत है लेकिन राजनीति में असहमति घटती जा रही है और आपसी टकराव बढ़ रहे हैं. यह देश, समाज के लिए अच्छे संकेत नहीं है.

कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं चाहती उस के नेता और उस के कामकाज पर सवाल खड़े हो. विपक्ष के विचारों और प्रतिकूल टिप्पणियों या किसी नेता के खिलाफ बयानों का स्वागत करना तथा बदलाव के लिए तत्पर रहना किसी भी देश की जनता के सुखशांति एवं प्रगति के लिए आवश्यक है.

सरकार और राजनीतिक पार्टिंयां कभीकभी सामाजिक अधिकारों की बात करने वाले लोगों या सत्ता के विरुद्घ आवाज उठाने वाले लोगों को इस का हवाला दे कर उन पर कठोर कारवाई पर उतारू दिखती है.

तानाशाही प्रवृत्तियां हमेशा विरोधी आवाज को दबाने के प्रयास करती आई हैं. राजशाही और तानाशाही शासनों में विरोधियों की आवाजों को हमेशा कुचला गया. लोकतंत्र ने अभिव्यक्ति की यह आजादी प्रदान की है.

पर स्वतंत्रता का अर्थ यह भी नहीं है कि कुछ भी बोल कर या लिख कर उस का दुरुपयोग किया जाए. उसे कानून द्वारा परिभाषित दायरे में रह कर बोलता पड़ता है. उल्लंघन किए जाने पर दंडित किए जाने का प्रावधान भी है.

समाज के समग्र विकास के लिए अभिव्यक्ति की आजादी उतनी ही जरूरी है जितना जीने का अधिकार है. तभी सही मायने में देश विकास की राह में आगे बढ़ेगा.

बैंक में एफडी खुलवाने से पहले पढ़ें ये बातें, मिलेगा फायदा

बचत के लिए एफडी (फिक्स्ड डिपाजिट) एक अच्छा विकल्प माना जाता है. अगर आप एफडी खुलवाना चाहते हैं तो हम खास आपके लिए यह खबर लेकर आए हैं. एफडी खुलवाने से पहले आप इस खबर को पढ़ें और कुछ छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखें, इससे आपको बड़ा फायदा निलेगा.

एक से ज्यादा जगहों पर एफडी रखें

बड़ी रकम की एक एफडी रखने की बजाय छोटी-छोटी रकम वाली ज्यादा एफडी रखें. इससे जरूरत पड़ने पर आप कोई एक एफडी तोड़कर अपनी जरूरत पूरी कर सकते हैं और आपकी बाकी एफडी चलती रहेगी. साथ ही आप अलग-अलग जगहों पर एफडी पर ब्याज की अलग-अलग दरों का फायदा उठा सकते हैं.

एफडी की अवधि और ब्याज दर

अधिकतर लोग 6 महीने, एक साल, 2 साल या 5 साल की अवधि के लिए एफडी करवाते हैं. कई बैंकों में इस अवधि से थोड़े कम या ज्यादा दिनों के लिए एफडी खुलवाने पर अलग-अलग ब्याज दरें होती हैं. इसलिए एफडी करवाने से पहले बैंक में एफडी की अवधि और उनस पर मिलने वाले ब्याज की दरों के बारे में जानकारी जरूर लें. हो सकता है कि निश्चित अवधि से कम या ज्यादा दिनों की एफडी करवाने पर आपको ज्यादा ब्याज मिल जाए. इसके अलावा एफडी में मासिक, तिमाही या छमाही में ब्याज ले सकते हैं.

एफडी पर मिलता है लोन

आप अपनी एफडी पर लोन भी ले सकते हैं. इसे ओवरड्राफ्ट फैसिलिटी कहा जाता है. इसके तहत आपको एक तय अवधि में ब्याज दर के साथ अमाउंट चुकाना होता है. आप चाहे तो यह राशि एकमुश्त या किस्तों में चुका सकते हैं. इसके अलावा अगर आप तय समय से पहले पेमेंट करते हैं तो आपको प्रीपेमेंट चार्ज नहीं देना पड़ेगा. इसका मतलब यह हुआ कि आपको सिर्फ उतने दिन का ब्याज देना है जितने दिन रकम आपके पास रही.

ब्याज पर कटता है टैक्स

नियमों के मुताबिक, अगर किसी बचत में सालाना ब्याज 10 हजार से ज्यादा है तो वह टैक्स के दायरे में आएगा. अगर एफडी से मिलने वाले ब्याज की रकम 10 हजार रुपये से ज्यादा है तो बैंक 10 फीसद टीडीएस काटते हैं. अगर एक से ज्यादा बैंकों में आपकी एफडी है तो ब्याज की गणना सारी एफडी के ब्याज को मिलाकर होगी. आप इस टैक्स को क्लैम कर सकते हैं. अगर आप चाहते हैं कि बैंक टीडीएस ना काटें तो इसके लिए आपको 15G /15H फौर्म भरना होगा.

बीच में ब्याज दरों में बदलाव का असर नहीं

आपने जिस ब्याज दर अपनी एफडी खुलवाई थी, उसके टेन्योर पूरा होने पर उसी दर से आपको ब्याज मिलेगा. अगर बीच में ब्याज दरों में बदलाव होता है तो आपकी एफडी की दरों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

सैमसंग लाया अनोखा स्मार्टफोन, डिस्प्ले में ही होगा कैमरा

सैमसंग इन दिनों अपने ग्राहकों के लिए नए नए स्मार्टफोन लौंच कर रहा है. जी हां, चार और तीन रियर कैमरे के साथ स्मार्टफोन लांच करने के बाद आब सैमसंग नए धमाके की तैयारी में लग गया है. सैमसंग अब एक ऐसा स्मार्टफोन लांच करने वाला है जिसकी डिस्प्ले ही फ्रंट कैमरा है, हम बात कर रहे हैं सैमसंग के नए स्मार्टफोन Galaxy A8s की. इस फोन की डिस्प्ले में नौच की जगह सिर्फ एक छेद होगा जिसमें कैमरा होगा. कैमरे के साथ ही इसी छेद में एम्बिएंट लाइट सेंसर और प्रौक्सिमिटी सेंसर भी होंगे.

इसकी झलक सैमसंग ने हाल ही में चीन में हुए एक इवेंट में दिखाई है. ऐसें में आपको सैमसंग गैलेक्सी ए8एस में फुल डिस्प्ले मिलेगी. सैमसंग ने कहा है कि इस स्मार्टफोन में पहली बार फर्स्ट टाइम एडाप्शन (first-time adoption) टेक्नोलौजी का इस्तेमाल हुआ है. इस फोन के अन्य फीचर्स के बारे में अभी जानकारी नहीं मिली है.

गौरतलब है कि अभी हाल ही में सैमसंग ने गैलेक्सी ए9 2018 लांच किया है जिसमें 4 रियर कैमरे हैं. वहीं इससे पहले सितंबर में कंपनी ने तीन रियर कैमरे के साथ गैलेक्सी ए7 2018 को लांच किया है. गैलेक्सी ए9 2018 में डुअल सिम सपोर्ट के साथ एंड्रायड ओरियो 8.1 है.

फोन में 6.3 इंच की फुल एचडी प्लस सुपर एमोलेड डिस्प्ले है जिसका रिजाल्यूशन 1080×2280 पिक्सल है. इसके अलावा इस फोन में क्वालकौम का स्नैपड्रैगन 660 प्रोसेसर, 8 जीबी तक रैम और 128 जीबी तक की स्टोरेज मिलेगी जिसे 512 जीबी तक मेमोरी कार्ड की मदद से बढ़ाया जा सकेगा.

एशियन चैम्पियंस ट्रौफी : फाइनल में थे भारत पाक, ट्रौफी उसे मिली जो जीता टौस

मस्कट में हुए एशियन चैम्पियन ट्रौफी के हौकी के फाइनल मैच में दर्शकों को निराशा हाथ लगी. भारत पाक के बीच खेले जाने वाला ये मैच खराब मौसम के भेंट चढ़ गया. इसके बाद दोनों टीमों को संयुक्त विजेता घोषित किया गया. हालांकि ट्रौफी देने के लिए टौस का सहारा लेना पड़ा. टौस में भाग्य ने भारत का साथ दिया.

इससे पहले मलेशिया ने जापान को शूटआउट में 3-2 से हराकर कांस्य पदक पर कब्जा किया. गौरतलब है कि इस टूर्नामेंट के लीग चरण में भारत ने पाकिस्तान को 3-1 से हराया था. अब तक भारत और पाकिस्तान के बीच 176 मैच खेले गए हैं. इनमें से भारत ने 62, पाकिस्तान ने 82 जीते हैं, जबकि 32 मुकाबले ड्रा रहे.

भारत पाकिस्तान के बीच मुकाबला काफी रोचक होता है. कल के मैच में भारत और पाकिस्तान 30वीं बार फाइनल में आमने सामने थे. हालांकि यह पहली बार हुआ कि दोनों को संयुक्त रूप से विजता घोषित किया गया. एशियन चैम्पियंस ट्रॉफी में दोनों टीमों का यह चौथा फाइनल था. इस साल के नतीजे को मिलाकर भारत और पाक दोनों ने तीन तीन बार खिताब पर अपना कब्जा जमाया है.

मुक्केबाजी से हुए दूर, कोई चाय तो कोई कुल्फी बेचने को मजबूर

सुना है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बचपन में चाय बेचा करते थे और आज वे देश संभाल रहे हैं. पर अगर कोई मुक्केबाज अपनी गरीबी के चलते भरी जवानी में चाय बेचने या पिता के कर्ज और बुरे हालात के चलते कुल्फी बेचने पर मजबूर हो जाए तो इस में किसे कुसूरवार माना जाएगा?

सब से पहले उस ‘अर्जुन अवार्ड’ विजेता मुक्केबाज की बात करते हैं जिन्होंने कभी मुक्केबाजी में भारत का नाम ऊंचा किया था और आज वे ठेले पर कुल्फी बेचने को मजबूर हैं.

हरियाणा के भिवानी के मुक्केबाज दिनेश कुमार ने अपने कैरियर में इंटरनैशनल और नैशनल लेवल पर 17 गोल्ड, 1 सिल्वर और 5 ब्रॉन्ज मेडल जीते हैं. इन उपलब्धियों के लिए उन्हें ‘अर्जुन अवॉर्ड’ भी मिल चुका है.

लेकिन आज हालात इतने बुरे हैं कि दिनेश कुमार अपना घर चलाने और पिता के सिर से कर्ज का बोझ उतारने के लिए पिता के साथ कुल्फी बेचने को मजबूर हैं.

दरअसल, 30 साल के दिनेश कुमार कुछ साल पहले एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए थे. उन के इलाज के लिए पिता को लोन लेना पड़ा था. इतना ही नहीं, इस चोट के बाद दिनेश के मुक्केबाजी कैरियर का भी अंत हो गया. वैसे, इस कर्ज से पहले उन के पिता ने अपने बेटे की मुक्केबाजी की ट्रेनिंग के लिए भी कर्ज लिया था.

दिनेश कुमार ने कई बार सरकार से गुहार लगाई है कि उन्हें कोई नौकरी मिल जाए, ताकि वे अपने परिवार का पेट पाल सकें पर अभी तक उन की कोई मदद की गई है. जब कहीं से कोई आस नहीं बंधी तो दिनेश कुमार को पिता के साथ कुल्फी बेचने पर मजबूर होना पड़ा.

इस मसले पर दिनेश कुमार के कोच विष्णु भगवान कहते हैं, “दिनेश फुर्तीला मुक्केबाज था. उस ने जूनियर और सीनियर लेवल पर कई मेडल जीते हैं. लेकिन एक दुर्घटना के चलते आज वह कुल्फी बेचने को मजबूर है. अगर सरकार उस की मदद करे, तो उस के सिर से कर्ज उतर सकता है.”

दिनेश कुमार जैसा ही हाल भारत के एक प्रोफेशनल मुक्केबाज राजेश कसाना का है जो आज चाय बेचने को मजबूर है.

लाइटवेट कैटेगिरी में भारत के नंबर वन मुक्केबाज राजेश कसाना भी भिवानी से हैं और भारत की शान कहे जाने वाले मुक्केबाज विजेंदर सिंह के घर से कुछ ही दूर रहते हैं. पर अब वे चाय बेचने को मजबूर हैं.

एक अख़बार को दिए अपने इंटरव्यू में उन्होंने बताया, “मैं 10 रुपये की एक चाय और थोड़ा खाने का सामान बेचता हूं. इसी से गुजारा कर रहा हूं.”

अपने गांव में ‘लुका’ नाम से मशहूर राजेश कसाना सुबह 5 बजे से दोपहर 1 बजे तक चाय की दुकान चलाते हैं. इस के बाद दुकान पर उन का भाई रहता है और वे थोड़ा आराम करने के बाद शाम लगभग 6 बजे से प्रैक्टिस शुरू करते हैं.

राजेश कसाना के मुक्केबाजी के लेवल का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि वे लाइटवेट कैटिगरी में भारत के नंबर वन मुक्केबाज हैं, जबकि वर्ल्ड बॉक्सिंग काउंसिल की रैंकिंग में उन का नंबर 221वां है.

24 साल के राजेश कसाना के पिता पेशे से ड्राइवर थे और जब राजेश स्कूल में थे तभी उन की कैंसर से मौत हो गई थी. इस के बाद सारी जिम्मेदारियां राजेश पर आ गईं.

देश के 2 होनहार मुक्केबाजों की ऐसी बदहाली खेल जगत के लिए अच्छी बात नहीं है क्योंकि इस तरह के उदाहरणों से नए खिलाड़ियों के मनोबल पर नकारात्मक असर पड़ता है.

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