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इस एक्ट्रेस को नहीं पता ‘रिटायरमेंट’ शब्द का अर्थ

मेहतन करने से ही हम अपने जीवन में आगे बढ़ते हैं और अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं. पर उम्र का एक ऐसा पड़ाव आता है कि उस उम्र में हमें काम से रिटायरमेंट लेना होता है.  लेकिन बौलीवुड में पिछले 40 वर्षो से एक्टिंग करने वाली 73 साल की एक्ट्रेस सुरेखा सीकरी रिटायरमेंट शब्द का अर्थ ही नहीं जानतीं.

वह इतने साल बाद भी एक्टिंग के मामले में हथियार डालने को तैयार नहीं हैं. उन्हें सुपरहिट फिल्म ‘बधाई हो’ में दकियानूसी दादी मां के किरदार में दर्शकों का काफी प्यार मिल रहा है. रिपोर्टस के मुताबिक उन्होंने कहा, ‘रिटायरमेंट? मैं इस शब्द को जानती तक नहीं हूं. इसका क्या अर्थ होता है.वें कहती हैं, यह एक बहुत ही पुराना हो चुका अंग्रेजी का सिद्धांत है कि आप कुछ करते हैं और फिर रिटायर हो जाते हैं. और यह ज्यादातर सरकारी नौकरी पर लागू होता है. सौभाग्य से मैं एक फ्रीलांसर हूं और रिटायर होने की मेरी कोई इच्छा नहीं है. मैं तो बस काम करते रहना चाहती हूं.

जब सुरेखा से पूछा गया कि फीमेल एक्ट्रर्स के लिए पुराने जमाने और आज के जमाने में क्या कुछ बदलाव आया है? तो उन्होंने कहा, आज ज्यादा खुलापन है. लोग किसी भी चीज को स्वीकारने और उस बारे में बात करने को तैयार हैं. पहले यदि हम बौलीवुड के बारे में बातें करते थे तो सिर्फ अच्छी-अच्छी ही बातें करते थे, और तय फौर्मूले पर चलते थे.

आपको बता दें छोटे पर्दे पर सुरेखा को खासतौर से ‘बालिका वधू’ में दादीसा के किरदार के अलावा ‘सात फेरे-सलोनी का सफर’, ‘एक था राजा एक थी रानी’, ‘परदेस में है मेरा दिल’ और ‘जस्ट मोहब्बत’ में उनके बेहतरीन अभिनय के लिए जाना जाता है. उन्होंने अपना फिल्मी सफर 1978 में आपातकाल के दौरान रिलीज हुई फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ से शुरू की थी, जो राजनीति पर आधारित थी. उसके बाद उन्होंने रंगमंच, टेलीविजन और फिल्मों  में काम कर मशहूर हुई. नेशनल अवार्ड विनर सुरेखा का कहना है कि  आज की चीजों को देखते हुए मैं अक्सर सोचती हूं कि मुझे 40-50 साल बाद पैदा होना चाहिए था. लेकिन कोई नहीं, मेरे जैसे लोगों के लिए यहां कई सारी भूमिकाएं हैं.

BCCI का खुलासा, क्यों लिया धोनी को टी-20 से बाहर रखने का फैसला ?

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को क्या सचमुच टी-20 से बाहर कर दिया गया है? या क्या वाकई उन्हें टीम से साइडलाइन कर दिया गया है? ऐसे कई सवाल हैं जो टी-20 से धोनी के बाहर होने पर क्रिकेट प्रेमियों के बीच सुर्खियों में बने हुए हैं. हालांकि सूत्रों को हवाले से पता चला है कि क्रिकेट टीम के चयनकर्ता धोनी को टीम से बाहर कर टी-20 वर्ल्ड कप की तैयारियों के लिए अन्य युवा खिलाड़ियों को मौका देना चाहते हैं.

जानकारी मिली हैं कि चयनकर्ताओं ने टीम मैनेजमेंट के जरिए धोनी को अपना फैसला बताया है. इसमें उनसे कहा गया कि अब वक्त आ गया है कि उनके आगे भी देखा जाए. चयनकर्ताओं को अब नहीं लगता कि धोनी औस्ट्रेलिया में होने वाले टी-20 वर्ल्ड कप का हिस्सा होंगे. इसलिए फैसला लिया गया कि टी-20 में उन्हें खिलाने का क्या मतलब. जहां तक अंतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय क्रिकेट में धोनी के भविष्य का सवाल है. इसपर फैसला लेने के लिए धोनी के विवेक पर छोड़ दिया गया है.

बीसीसीआई सूत्रों ने एक समाचार पत्र को बताया, ‘चयनकर्ताओं ने खिलाड़ियों के चयन के लिए होने वाली मीटिंग से पहले टीम मैनेजमेंट के जरिए धोनी को बता दिया था कि अब समय आ गया है कि क्रिकेट के छोटे से प्रारूप में युवा खिलाड़ियों को मौका दिया जाए. सभी जानते हैं कि 2020 के टी-20 वर्ल्ड कप तक धोनी नहीं चल सकते. इसलिए चयनकर्ताओं को महसूस हुआ कि धोनी की जगह अब दूसरे खिलाड़ी को खोजना शुरू कर देना चाहिए.’ वहीं अब यह देखना बाकी है कि धोनी अपने एक दिवसीय क्रिकेट पर क्या फैसला लेते हैं. इस मामले में बोर्ड के अधिकतर सदस्य मानते हैं कि अगले साल विश्व कप तक टीम में धोनी का होना जरुरी है, जबकि वो इस मामले में भी लगातार रनों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. चयनकर्ताओं का मानना है कि धोनी की विकेट कीपिंग और पूर्व में कप्तानी के अनुभव के चलते वह दबाव में कप्तान विराट कोहली की खासी मदद कर सकते हैं.

बीते शुक्रवार (26 अक्टूबर, 2018) को इंडियन बोर्ड चेयरमैन सिलेक्शन कमेटी के चीफ एमएसके प्रसाद ने साफ संकेत दिए कि भारतीय टीम दूसरे विकेटकीपर की तलाश में जुटी है, जो टी-20 खेल सके. उन्होंने ये जवाब धोनी के टीम से बाहर किए जाने के सवाल पर दिया. उन्होंने कहा, ‘वह (धोनी) छह टी-20 नहीं खेलेंगे, क्योंकि हम दूसरे विकेटकीपर की तलाश कर रहे हैं. ये रिषभ पंत या दिनेश कार्तिक हो सकते हैं, और इन्हें एक मौका मिलेगा.’ एक सूत्र ने दावा किया कि अब धोनी के लिए टी-20 खेलना बहुत असंभव है लेकिन वो एक दिवसीय क्रिकेट में भारत का हिस्सा बने रहेंगे. इसका मतलब यह है कि धोनी औस्ट्रेलिया दौरे पर जाएंगे.

हिंसा और अपराध रोकने के लिए धर्म का सहारा क्यों ?

केंद्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने एक बार फिर देश की जनता को अपना ज्ञान दिया है. पिछली बार सत्यपाल सिंह ने डार्विन के सिद्धांत को नकारते हुए कहा था कि हमारे पूर्वज बंदर नहीं थे. हम इंसान थे. इस बयान को ले कर मीडिया में उन की खूब छिछालेदर हुई.

अब फिर उन्होंने एक विवादित बयान दिया है. मंत्रीजी ने फरमाया है कि अगर हम चाहते हैं कि देश से आतंकवाद और अपराध का खात्मा करें तो हमें वैदिक सभ्यता की ओर लौटना होगा.

दिल्ली में आर्य समाज द्वारा आयोजित 4 दिवसीय आर्य महासम्मेल में सत्यपाल सिंह ने जनता से वैदिक युग में लौटने की सलाह देते हुए कहा कि आतंकवाद और अपराधों को वैदिक सभ्यता के मुताबिक चलने से मिटाया जा सकता है.

उन्होंने यह भी कहा कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति शपथ ग्रहण करते हैं तो उन के हाथों में बाईबल होती है. उसी तर्ज पर मैं यह उम्मीद रखता हूं कि आने वाले समय में जब हमारे देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री शपथ लेंगे तो उन के हाथों में वेद होंगे.

लगता है मंत्रीजी ने वेद पढना तो दूर, देखें ही नहीं होंगे. वेद हिंदुओं के सब से पुराने धार्मिक ग्रंथ माने गए हैं. वेद पढने वालों को पता है इन में हिंसा भरी पड़ी है फिर भी कहा गया है कि वेद हिंसा, हिंसा न भवति:.

यज्ञों में पशुओं की हिंसा, शत्रुओं को मारने के लिए हिंसा करते हुए कहा गया है कि यह हिंसा वेदोक्त है इसलिए इस में कोई दोष नहीं है.

अथर्ववेद में कहा गया है,

      दह दर्भ सपत्नान् मे दम पृतनायत.
      दह  मे सर्वान् दुर्हार्दों दह मे द्विषतो मणे.

अर्थात, हे दर्भ, मेरे शत्रुओं को जला डाल. मुझ पर सेना सहित आक्रमण करने वालों को जला डाल. मेरे सब अशुभ चिंतकों को जला डाल. हे मणि, मेरे सब दुश्मनों को जला डाल.

वेदों में लाखों मलेच्छों, कालों को मारने की बात कही गई है. इंसानों को ही नहीं, वेदों में पशुओं को मारने का वर्णन बाकायदा विधान सहित बताया गया है. इन में मांसाहार का वर्णन है, गायों को काटने का विवरण दिया गया है. यज्ञों में पशुबलि अनिवार्य थी.

वेदों में सिर्फ ब्राह्मण पर हिंसा का निषेध बताया गया है. लाखों, करोड़ों विधर्मियों और कालों की हत्या के बेशुमार श्लोक रचे हुए हैं.

अथर्ववेद में लिखा है,

      उग्रो राजा मन्यमानो ब्राह्मणं यो जिघत्सति,
      परा तत् सिच्यते राष्ट्रं ब्राह्मणो यत्र जीयते.

अर्थात, जो राजा अपनेआप को उग्र मानता हुआ ब्राह्मण की हत्या करता है एवं ब्राह्मण जिस राज्य में दुखी रहता है, वह राजा और राष्ट्र दोनों समाप्त हो जाते हैं.

      तद् वै राष्ट्रमा स्त्रवति नावं भिन्नामिवोदकम्,
       ब्रह्माणं यत्र हिंसतिं तद् राष्ट्रं हंति दुच्छुना.

   अथर्ववेद-सूक्त 19,8

अर्थात, जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की हिंसा होती है, उस राष्ट्र का ब्रह्मरूपी पाप उसे छेद वाली नौका के साथ डुबा देता है. ब्राह्मण पर डाली  गई विपत्ति ही उस राष्ट्र को  डुबा देती है.

ऋग्वेद में हिंसा की बातें भरी हुई है. एक जगह कहा है,

हे इंद्र, तुम ऐश्वर्यवान, शत्रुविजयी और शत्रुभयंकर हो. तुम ने अकेले ही वृत्र आदि राक्षसों का नाश किया है. तुम्हारा अश्वयुक्त रथ शत्रुओं की ओर बढे और वज्र शत्रुओं की ओर बढे और वज्र शत्रु ओं को मारे.

हे इंद्र, हम समीपवर्ती शत्रुओं का भयंकर शब्द सुन रहे हैं. तुम अपने संतापकारी वज्र का इन पर प्रयोग कर के इन्हें मारो. इन शत्रुओं को जड़ से समाप्त करो. इन्हें विशेषरूप से बाधा पहुंचाओ तथा पराजित करो. हे इंद्र, पहले राक्षसों को मारो. इस के बाद इस यज्ञ को पूरा करो.

आगे लिखा है, हे अग्नि, जैसे शिकारी जाल फैलाता है, वैसे ही तुम भी अपना भयनाशक तेज फैलाओ. अपने तेज से तुम राक्षसों का नाश करो. हे अग्नि, तुम अपनी ज्वालाओं, चिंगारियों और उल्काओं को सब ओर फैलाओ और शत्रुओं को जलाओ.

कहने का अर्थ यह है कि क्या दलितों, किसानों, वंचितों पर हिंसा होती है तो उसे हिंसा नहीं माना जाए क्योंकि यह शास्त्रोक्त है.

वेदों में तो हिंसा की वकालत है. वेदों के रास्ते पर चलते से अपराध और हिंसा कैसे रुक सकती है. ये बातें बेतुकी और तर्कविहीन हैं. यह सत्यपाल सिंह ही बता सकते हैं कि हिंसा को रोकने के लिए उन की क्या थ्योरी है.

तौबा यह गुस्सा

उत्तम नगर में रहने वाला एक शख्स अपनी पत्नी को पीट रहा था.  पड़ोस में रहने वाले कुलदीप तनेजा ने मना किया तो वह शख्स कुछ अन्य लोगों के साथ मिल कर कुलदीप के घर पहुंचा और उसे पीट डाला. उस ने कुलदीप के बेटे की भी इतनी  बुरी तरह पिटाई की कि वह आईसीयू में पहुंच गया.

27 अक्टूबर को दिल्ली के इब्राहिमपुर एक्सटेंशन में सुमित कुमार और उन के पिता रामपाल सिंह को  उस के पड़ोस में रहने वाले युवक ने पीटपीट कर अधमरा कर दिया.  वजह सिर्फ  इतनी थी कि सुमित कुमार ने उस युवक को अपने घर के सामने से गाड़ियां हटाने को कहा जो उस ने लगा रखी थी.  इसी बात पर दोनों के बीच कहासुनी हुई और बात यहां तक पहुंच गई.

27 अक्टूबर को ही शाहबाद डेरी इलाके के मेट्रो विहार फेस टू में रहने वाले 15 वर्षीय रोहन की उस के दोस्तों ने पीटपीट कर सिर्फ  इस वजह से हत्या कर दी क्यों कि रोहन के साथ किसी बात को ले कर उन का झगड़ा हुआथा.

आए दिन होने वाली इस तरह की घटनाएं इस बात का एहसास दिलाती है कि आज के समय में लोगों के दिलों में प्यार और मोहब्बत के  बजाए गुस्सा, चिढ़न और क्रोध  कुछ इस तरह भरा हुआ है कि छोटी सी बात पर लोग एक दूसरे की जान लेने को उतारू हो जाते हैं . रिश्तों का खात्मा कर डालते हैं.

थोड़े समय के आवेश और क्रोध की वजह से किसी की जान लेने का प्रयास सामने वाले को तो तबाह करता ही है साथ ही ऐसा करने वाले की जिंदगी भी  नरक  बना देता है.  उस की बाकी की जिंदगी जेल में या फिर खुद  को जेल जाने से बचाने के प्रयास में गुजर जाती है. इस तरह दोनों ही आफत में फंसते चले जाते हैं. वैसे भी गुस्सा या क्रोध शरीर में पहुंच कर जहर की तरह काम करता है और शारीरिकमानसिक दृष्टि से नुकसान पहुंचाने के साथ ही  जिंदगी का सुखचैन सब लूट लेता है.

जिंदगी में ऐसी बहुत सी परिस्थितियां आती है जब हम अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख पाते. यह वह वक्त होता है जब हम कमजोर पड़ जाते हैं. हमारे अंदर की ताकत धीमी हो जाती है. बेहतर है कि अपने आवेग पर नियंत्रण रखा जाए. दिमाग शांत रख कर गुस्से पर काबू पाया जाए.

स्टॉप तकनीक अपनाएं

एस यानी स्टॉप, टी यानी टेक ए ब्रीड,  ओ यानी ऑब्जर्ब और पी यानी प्रोसीड. मान लीजिए किसी शख्स ने  आप  के साथ गलत किया है तो तुरंत आवेग में प्रतिक्रिया देने के बजाय रुकिए,  फिर कुछ लंबी सांसे लेते हुए सोचिए कि आप नाराज क्यों हैं. आसपास की  परिस्थितियों पर नजर रखते हुए समझने का प्रयास करें कि वास्तविकता क्या है  और फिर अपनी आगे की प्रतिक्रिया तय करें. आप देखेंगे कि ज्यादातर मामलों में आप की नाराजगी की मूल वजह ही गायब हो जाएगी और आप ज्यादा बेहतर जिंदगी जी सकेंगे.

गुस्सा करने से पहले सोचिए

न्यूयौर्क  की साइकोथैरेपिस्ट मेग जोसेफसन कहती हैं कि जब भी मुझे गुस्सा आता है तो मैं 1 से 3  तक की गिनती करती हूं.  इस दौरान मैं  वास्तविक परिस्थितियों और तथ्यों को समझने का प्रयास करते हुए सोचती हूं कि क्या मेरा गुस्सा करना जायज है. फिर मैं सोचती हूं कि कैसे मेरा गुस्सा दूसरे को प्रभावित करेगा और अंततः ऐसा कुछ भी बोलने से बचती हूं जो हमारे रिश्ते को नुकसान पहुंचा सकता है.

स्पेस दें

आप को अपने इमोशंस और रिएक्शन के बीच स्पेस देना होगा . जब भी आप खुद को आवेश और क्रोध में पाते हैं तुरंत नाक से गहरी और लंबी सांसे लेना शुरू करें और मुंह से हवा छोड़े. यह  आप के  दिमाग के रसायन में परिवर्तन लाएगा और आप ‘झगड़े’ के बजाए ‘जाने दो’ की स्थिति में आने लगेंगे. जब बहुत अधिक गुस्सा आए तो बेहतर है कि आप घर से बाहर निकल जाएं और ताजा सांसें अंदर ले. अपनी एग्रेसिव और नेगेटिव एनर्जी बाहर निकालें. इस से आप की बॉडी और नर्वस शांत होने लगेंगे.

भड़ास  निकाल दें

गुस्से को अपने अंदर दबा कर रखने के बजाय उसे निकाल दें. क्यों कि दबी हुई भावनाएं कभी मरती नहीं जो आप के मानसिक सेहत के लिए हानिकारक साबित हो सकती  है. आप काल्पनिक रूप से गुस्सा बाहर निकालने का रास्ता चुनें. उदाहरण के लिए कल्पना करें कि आप उस व्यक्ति पर चिल्ला रहे हैं जिस ने आप को रियल में  परेशान किया है या फिर कमरे में बंद हो कर या खाली पार्क में जा कर उस व्यक्ति को सामने महसूस करते हुए जी भर कर भड़ास निकाल ले. आप का मन शांत हो जाएगा .

म्यूजिक और डांसिंग बदल देगा मूड

कुछ लोग  गुस्सा आने पर सामान फेंकने लगते हैं. चीखतेचिल्लाते हैं और दूसरों/स्वयं  को नुक्सान पहुंचाते हैं. इस के बजाय जब आप को गुस्सा आए तो उस जगह से  दूर चले जाएं. जिम जाए , म्यूजिक सुने या फिर किसी अच्छे गाने पर जी भर कर  डांस करें. दूध/ पानी पिए या कोई पसंदीदा मीठी चीज खा ले. इस से आप तुरंत फ्रस्टेशन और एंगर की फीलिंग से बाहर निकल आएंगे.

सामने वाले को समझने का प्रयास करें

कई  दफा हम दूसरों के प्रति जजमेंटल हो जाते हैं या कल्पना कर लेते हैं कि सामने वाले ने जानबूझ कर हमें चोट पहुंचाई है. मगर कई दफा स्थिति इस के विपरीत भी हो सकती है.

उदाहरण के लिए आप इस बात पर नाराज हो सकते हैं  कि किसी ने आप को अपनी गाड़ी से चोट पहुंचा दी पर हो सकता है कि वह व्यक्ति  अपने किसी बीमार प्रियजन को देखने की हड़बड़ी में अस्पताल जा रहा हो और खराब माइंडसेट की वजह से गलती से उस की गाड़ी आप को लग गई हो. बाद में पछतावा करने से बेहतर है कि हम समय रहते ही अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखने का प्रयास करें.

तार्किक ज्ञान की पाठ्यपुस्तकों पर पुराने विचारों की दीमक

ज्ञानविज्ञान और तर्कशक्ति के विकास तथा वैचारिक बहस के केंद्र विश्वविद्यालयों को प्रगतिशीलता की बजाय मेंढकों का कुआं बनाया जा रहा है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालयों में पिछले कुछ समय से पुरानी विचारधारा थोपने की कोशिशों के बीच अब दिल्ली विश्वविद्यालय में इस तरह के प्रयास किए जा रहे हैं.

दिल्ली विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर स्तर के राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम से दलित लेखक कांचा इलैया की 3 किताबों को हटाया जा रहा है. इलैया की 3 पुस्तकें बुद्धा चैलेंज टू ब्राह्मनिस्म, व्हाय आई एम नोट हिंदू और पोस्ट हिंदू इंडिया [रेफरेंस बुक] हैं. इन पुस्तकों को हटाने को ले कर शिक्षक संगठन एकेडेमिक फोर एक्शन एंड डेवलपमेंट विरोध कर रहा है.

एकेडेमिक काउंसिल एवं शैक्षिक मामलों की स्टैंडिंग कमेटी ने अपनी बैठक में इन किताबों को हटाने को ले कर आपत्ति जताई है. कहा गया है कि शैक्षिक मामलों की स्टैंडिंग कमेटी जैसे वैधानिक निकाय को राजनीतिक योग्यता और प्रासंगिकता के आधार पर ऐसे मामलों पर फैसला करना चाहिए. केवल विवादित शीर्षक या लेखक की पुस्तक होने से उसे हटाया नहीं जा सकता.

एकेडेमिक काउंसिल का कहना है कि स्टैंडिंग कमेटी के पास विशेषज्ञों के समूह द्वारा तैयार किए गए पाठ्यक्रम से पुस्तकों को हटाने का कोई अधिकार नहीं है. कांचा इलैया एक प्रतिष्ठित विद्वान और विचारक हैं. उन की दार्शनिक आलोचना को गलत नहीं ठहराया जा सकता.

पिछले समय से केंद्र सरकार विश्वविद्यालयों में संघी विचारधारा थोपने का प्रयास कर रही है. प्रगतिशील माने जाने वाले विश्वविद्यालयों में सरकार द्वारा अपने कुलपति, उपकुलपति नियुक्त कर दिए. यहां धर्म, योगा, आयुर्वेद, गीता, वेद जैसे प्राचीन और अंधविश्वासों को बढावा देने वाले विषय पढ़ाने पर जोर दिया गया. विज्ञान, तर्क संबंधित विषयों को हाशिए पर किया जाने लगा.

इस की वजह से विश्वविद्यालय लड़ाईझगड़े के अड्डे बने दिखने लगे. छात्र और शिक्षक प्रगतिशील और पुरानी विचारधारा में बंट गए.

कांचा इलैया दलित लेखक व विचारक हैं. वह उस्मानिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे हैं. कुछ समय से उन के लेखन को ले कर कट्टर हिंदूवादियों ने उन पर हमले किए. वह भारतीय जातिव्यवस्था के खिलाफ रहे हैं.
कांचा इलैया की किताब ‘बुद्धा चैलेंज टू ब्राह्मनिस्म’ का सार यह है कि हिंदू धर्म में हमेशा हिंसा के रूप का इस्तेमाल किया गया. हिंदू धर्म में संघर्ष का समाधान केवल हत्या कर के होता है. बहस नहीं है. दुश्मन को खत्म करना है जबकि बुद्ध ने तर्क, बहस और भाषण में विश्वास किया है और इसे ही संघर्ष का हल बताया है.

‘व्हाई आईएम नोट हिंदू’ को भारत समेत कई विदेशी विश्वविद्यालयों में पढाया जा रहा है. कोलंबिया विश्वविद्यालय सहित कई देशों में हिंदू सेना इस पुस्तक का विरोध कर रही है जबकि एलिजा केंट, लुईस मैककेन, लिंडा हेस जैसे विद्वान विचारकों ने इस पुस्तक को हिंदू धर्म पर परिचय के स्तर पर पढ़ने की सिफारिश करते हैं.

ये किताबें दलितों और पिछड़े वर्गों की ज्ञानपद्धति के अनुभवों के बारे में हैं लेकिन इन का विरोध करने वाले लोग भेदभाव वाली पुरानी सामाजिक, सांस्कृतिक व्यवस्था की निरंतरता चाहते हैं.

कांचा इलैया की किताबें हटाए जाने के प्रस्ताव पर वह कहते हैं कि यह एंटी अकादमिक प्रयास है जो संघ- भाजपा के एजेंडे का हिस्सा है ताकि विश्वविद्यालयों में छात्रों को अलगअलग विचारों को न पढाया जाए.
उन के अनुसार किताबों को हटाने की मांग करने वाले शिक्षाविदों का कहना है कि हिंदू धर्म की उन की समझ गलत है और उन की समझ को स्थापित करने के लिए कोई अनुभव डेटा नहीं है. ऐसा कह कर उन्होंने अपनी किताबें पढ़ने की बुनियादी शैक्षणिक नैतिकता नहीं दिखाई है.

कांचा इलैया ने सवाल किया है कि सावरकर की किताब ‘हिंदुत्व, एक हिंदू कौन है?’ और गोलवरकर की पुस्तक ‘बंच औफ थौट्स’ को विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है. क्या इन पुस्तकों का संदर्भ है? क्या इन पुस्तकों में अनुभवजन्य डेटा है?

असल में विश्वविद्यालय ज्ञानविज्ञान, तर्क और विचारधाराओं पर बहस के प्रमुख केंद्र रहे हैं. अगर इन्हें खत्म कर दिया गया तो छात्रों में ज्ञानविज्ञान और तार्किक शक्ति का विकास रुक जाएगा. आज के छात्रों और प्राचीन गुरुकुल के छात्रों में कोई अंतर नहीं रह जाएगा.

विश्वविद्यालय विभिन्न विचारों, अवधारणाओं को पढ़ाने और बहस के लिए हैं. सैंकड़ों विचारों को वहां जानने समझने की शैक्षिक आजादी होनी चाहिए. विश्वविद्यालय धार्मिक संस्थान नहीं हैं जहां केवल धार्मिक विचार सिखाए जाते हैं. जो छात्र सीखना चाहते हैं उन के लिए पढनेसीखने का अधिकार उन की अकादमिक आजादी का हिस्सा है.

कोई भी समाज अलगअलग विचारों को जानने, समझने से ही आगे बढता है. विचारों को दबाने, कुचलने से नुकसान समाज को ही है. आप किसी विचार से सहमत नहीं है तो भले ना हों पर परस्पर विरोधी विचारों का सम्मान जरूरी है तभी समाज, देश आगे बढ सकता है.

पोस्ट औफिस में ऐसे करें निवेश, मिलेगा बैंक से बेहतर ब्याज

आपके लिए बैंक में निवेश के क्या मायने हैं? केवल बचत या फायदा भी? आम तौर पर लेन देन और बचत के लिहाज से लोगों का रुझान बैंको की ओर होता है. पर कामगर आबादी के लिए दायरा बचत से बढ़ कर ब्याज दर तक पहुंचता है. इस खबर में हम आपको बताएंगे कि ब्याज से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए आपके पास बैंक से बेदतर विकल्प कौन हैं.

यहां बात करेंगे स्मौल सेविंग स्कीम आरडी (RD) यानी Recurring Deposit की. असल में पोस्ट औफिस के साथ साथ कई बैंकों में भी आरडी स्कीम है. लेकिन ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम नहीं होगा कि पोस्ट औफिस में दूसरे बैंकों की तुलना में ज्यादा ब्याज मिल रहा है. कई बड़े बैंक, जैसे एसबीआई, देना बैंक, बैंक औफ बड़ौदा, केनरा बैंक, इलाहाबाद बैंक और आंध्रा बैंक 1 साल से 5 साल की आरडी पर 5.50 फीसदी से 7 फीसदी तक ब्याज दे रहे हैं. वहीं, पोस्ट औफिस की 1 साल से 5 साल की आरडी स्कीम पर 7.3 फीसदी सालाना ब्याज मिलता है.

सुरक्षित निवेश के लिए बैंक एफडी भी एक महत्वपूर्ण जरिया है. इसमें आपको ज्‍यादा ब्याज तो मिलता है, पर मुश्किल ये है कि आपको बड़ी राशि एक साथ लंबे समय के लिए जमा करनी पड़ती है. वहीं आरडी में आप छोटी जमा राशि को हर महीने जमा कर एफडी जितना ब्‍याज पा सकते हैं. ऐसे में बचत खाते पर दोगुना ब्‍याज हासिल करने का आसान तरीका है रेकरिंग डिपौजिट.

  • ऐसे आएगा अंतर  

फर्ज करिए कि हर महीने आप अपने सेविंग अकाउंट में 10 हजार रूपये जमा कर रहे हैं. तो ऐसे में आपको एक साल में 1,20,000 रुपए जमा करने होंगे. वहीं, सालाना 3.5 फीसदी मिलने वाले ब्याज के हिसाब से एक साल में आपका 1,24,420 रुपए हो जाएगा. यानी आपको साल में 4420 रुपये का फायदा होगा.

वहीं, आरडी में हर महीने 10 हजार रुपए तक जमा करते हैं तो साल में 1,20,000 रुपए जमा करने होंगे. वहीं, आपको पोस्ट औफिस आरडी पर सालाना 7.30 फीसदी ब्याज देता है. जिस लिहाज से आपके पैसे एक साल में 1,24,852 रुपए हो जाएंगे. यहां आपको 4,852 रुपये का शुद्ध मुनाफा होगा. किसी भी बैंक या पोस्ट औफिस में कैश या चेक से आप आरडी खाता खोल सकते हैं.

अर्जुन रामपाल की मां का निधन, लंबे समय से जूझ रही थीं कैंसर से

बौलीवुड अभिनेता अर्जुन रामपाल की मां (67 वर्ष) का रविवार को निधन हो गया है. बता दें कि अर्जुन की मां ग्वेन रामपाल पिछले कई वक्त से ब्रेस्ट कैंसर से जूझ रही थीं. रिपोर्ट के मुताबिक अर्जुन रामपाल की मां को ट्रिपल निगेटिव ब्रेस्ट कैंसर डिटेक्ट हुआ था, जिसका पता उन्हें 4 साल पहले चला था.

इसी साल जुलाई में अर्जुन ने ट्विट कर अपनी मां के कैंसर की इस लड़ाई में जीत जाने की बात कही थी, लेकिन रविवार सुबह उनका निधन हो गया.

ग्विन रामपाल की अंतिम यात्रा शाम को न्यू वर्ली से निकाली गई. उनकी अंतिम शव यात्रा में बौलीवुड के कई दिग्गज सितारे नजर आए. उनकी गर्लफ्रेंड गैबरीला डेमेट्रिएडस और पूर्व पत्नी मेहर जेसिया भी वहां मौजूद थीं. अर्जुन रामपाल की दोनों बेटियां अपनी दादी के बेहद करीब हैं. यही वजह है कि अपनी दादी के अंतिम संस्कार में अर्जुन की दोनों बेटियां पहुंचीं.

गौरतलब है कि इसी साल मई महीने में अर्जुन और मेहर ने अपने 20 साल पुराने रिश्ते को खत्म कर लिया था. इस दुख की घड़ी में अर्जुन रामपाल की गर्लफ्रेंड गैबरीला हर पल उनके साथ नजर आईं.

शरीर मेरा, हक मेरा

उत्तेजक, झीने कपड़ों में डांस करना एक पेशा हो सकता है पर इस का अर्थ यह कतई नहीं हो सकता कि कोई डांसर 1 नहीं 4-4 आदमियों को गनपौइंट पर अपने बदन से खिलवाड़ करने की इजाजत भी दे रही है. औरतों का अपना शरीर दिखाने या उसे चला कर मोहित कर देने का हक वैसा ही है जैसा एक पहलवान का कुश्ती में दांवपेंचों को दिखाना या एक प्रवचनकर्ता का लाखों की भीड़ को मुग्ध कर देना.

लखनऊ में एक कंपनी ने अपने किसी उत्सव में एक डांसर को भी मनोरंजन के लिए बुलाया पर बाद में 4 लोगों ने उसे कमरे में बुला कर बलात्कार कर डाला. मामला तो बन गया और सजा होगी या नहीं यह पता नहीं पर मुख्य सवाल यह है कि डांसर से साथ सोने की पेशकश करना ही कैसे संभव है?

औरत का शरीर बिकाऊ नहीं है. सैक्स बेचने की नहीं प्रेम की चीज है. जिसे डांस करना आता है वह सैक्स बेच कर वैसे भी पैसा नहीं कमाएगी. जो औरतें शरीर बेचती हैं वे दरअसल, कोठा मालकिनों, दलालों, माफिया की गुलाम होती हैं. सैक्स में प्रेम आवश्यक है और पैसा प्रेम का केवल प्रतीक भर है.

यह खेद की बात है कि दुनिया भर का लोकतंत्र देहव्यापार को रोक नहीं पाया है. औरतों को बताया जाता है कि वे देह बेच कर भी पैसा बना सकती हैं और पुरुषों को सिखाया जाता है कि खरीदी हुई देह भी प्रेम का प्रतीक है जबकि दोनों वहशीपन, जंगलीपन और पशुता के प्रतीक हैं.

यदि एक पैसे वाली कंपनी अपने किसी उत्सव के लिए कर्मचारियों के लिए डांस का प्रोग्राम रख सकती है तो स्पष्ट है कि वहां काम करने वाले गंवार, गुंडे तो नहीं होंगे. सभ्य, शिक्षित और सफल औरतों के प्रति ऐसे विचार रखें कि जिसे नचाया जा सकता है उसे जबरन बिस्तर पर ले जाना सभ्यता और शिक्षा पर कलंक है.

विरोध सैक्स की आजादी का नहीं, सैक्स को जबरन पाने की सोच का होना चाहिए और यह नियम ठीक उस तरह होना चाहिए जैसे सड़क पर चलते हुए लोग गाड़ी बाईं ओर ही चलाते हैं. यह जीवन का अंग होना चाहिए कि औरत का शरीर, पुरुष के शरीर की तरह उस की अपनी संपत्ति है और वह अपना सर्वस्व किसी को सौंपती है तो वह प्रेम का प्रतीक है चाहे 1 साल का हो या जीवन भर का.

औरत का शरीर उस का व्यक्तित्व है और उस की गरिमा का आदर करना समाज का कर्तव्य है. वह जमाना नहीं रहा जब औरत लूटी जाती थी, खरीदी जाती थी, दान में दी जाती थी. अब औरतों को हर काम करने की इजाजत है, देह दिखाने और सैक्स बेचने की भी पर अपनी शर्तों पर, जोरजबरदस्ती से नहीं. समाज व कानून को यह मानना होगा. इस में कंप्रोमाइज नहीं हो सकता. हक तो हक है. बराबर का, पहलवान का भी और प्रधानमंत्री का भी.

कैसे आएंगे अच्छे दिन?

दो करोड़ युवाओं को हर वर्ष रोज़गार देने का वादा कर देश की सर्वोत्तम राजनीतिक कुर्सी पर विराजे नरेंद्र मोदी ने ऐसी नीतियां बनाईं कि जिन से देशवासियों की नौकरियां छिनीं, व्यापारियों के कारोबार ठप हुए और कम इनकम के चलते कम्पनियां अपने कर्मचारियों को कम करने पर मजबूर हुईं. मोदी सरकार का कार्यकाल पूरा होने वाला है, वादे के अनुसार, उसे 5 वर्ष के अपने कार्यकाल में 10 करोड़ बेरोजगारों को रोज़गार देना है, जो अब नामुमकिन हो चुका है.

फिलहाल देश के सूचना प्रौद्योगिकी यानी इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) प्रोफेशनल्स के लिए अच्छी खबर है लेकिन डायमंड उद्योग से जुड़े लोगों के लिए बुरी सूचना है.  आईटी प्रोफेशनल्स के लिए जो अच्छी खबर है वह कंपनियों की दरियादिली है जबकि डायमंड उद्योग से जुड़े लोगों के लिए जो बुरी सूचना है वह मोदी सरकार की दोषपूर्ण नीति के चलते है.

कई महीनों की सुस्ती के बाद आईटी सेक्टर में नियुक्तियां रफ़्तार पकड़ने वाली हैं. एक सर्वे के मुताबिक़, नवम्बर से शुरू होने वाली नियुक्तियों के मार्च 2019 तक जारी रहने की उम्मीद है.  सर्वे में देशभर के 550 आईटी नियोक्ता (एम्प्लोयेर्स) शामिल थे.

वर्तमान में नान-आईटी कम्पनियां डिजिटल होने के लिए अपने यहां टीम बना रही हैं.  उन की तरफ से तकनीकी प्रोफेशनल्स की ज्यादा मांग रहेगी. सभी सेक्टर्स की नौन-आईटी कम्पनियां डिजिटल होने की तैयारी कर रही हैं.

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई), ब्लाकचेन और साइबर सिक्यूरिटी जैसी नई तकनीकें परम्परागत स्किल की जगह ले रही हैं.  सर्वे का कहना है कि एआई का तकनीकी के तकरीबन सभी रूपों में थोडाबहुत इस्तेमाल होने वाला है. यह (एआई) अब सभी नए प्लेटफार्मों, डिवाईसेस या एप्स में ज्यादा देखने को मिलेगी.

सर्वे की रिपोर्ट कहती है कि अभी भी आटोमेशन प्रोफेशनल्स की सब से ज्यादा मांग है.  कम्पनियाँ ऐसे पेशेवर रखना चाहती हैं जो इस तकनीक को पूरी तरह सीखसमझ सकें. वे खासकर 1-5 साल के अनुभव वाले उम्मीदवारों को तरजीह दे रही हैं.  कंपनियों का ध्यान ऐसे प्रोफेशनल्स पर है जो इन्टरनेट आफ किंग्स, एआई, वर्चुअल जैसी एडवांस टेक्नोलौजी को अपने समकक्षों के मुकाबले तेजी से सीख सकें.

उधर, नवम्बर से मार्च 2019 तक देश में हीरे के व्यापार (डायमंड ट्रेड) से जुड़े हर 5 में से 1 शख्स के बेरोजगार होने का डर है.  कट और पोलिश्ड डायमंड पर सरकार द्वारा इम्पोर्ट ड्यूटी (आयात शुल्क) बढाए जाने से री-कटिंग और री-डिजाइन का कारोबार चीन और थाईलैंड जैसी प्रतिस्पर्धी बाजारों में शिफ्ट हो रहा है.

जेम एंड ज्वेलरी एक्स्पोर्ट प्रमोशन कौंसिल का कहना है कि ड्यूटी बढ़ने, कारोबारी मुश्किलों और नकदी की कमी के चलते तकरीबन 1 लाख लोगों की नौकरियां जाने का खतरा है.  पहले जो डायमंड री-कटिंग के लिए आते थे, वे अब चीन और थाईलैंड जा रहे  हैं. देश में करीब 5 लाख लोग डायमंड ट्रेड से जुड़े हैं.
गौरतलब है कि सरकार ने करेंट अकाउंट डेफिसिट (सीएडी) कम करने के लिए गैरज़रूरी उत्पादों पर आयात शुल्क बढाने का फैसला किया था और 26 सितम्बर को कट और पोलिश्ड डायमंड्स पर आयात शुल्क 5 से बढ़ा कर 7.5 फीसदी कर दिया था.

कुल मिलाकर देश में लगातार बढ़ते बेरोजगारों में से गिनती के कुछ प्रोफेशनल्स को रोज़ी मिलेगी तो उस से कहीं ज्यादा रोजगारों की रोज़ी छिन जाएगी.  यानी, बेरोजगारों की संख्या और बढ़ेगी.  सो, अच्छे दिन कब आएँगे, इस के लिए आम चुनावों तक इंतज़ार करना पडेगा जब नेता नारा लगाएंगे.

पाकिस्तान विश्व के लिए खतरा, बना सबसे बड़ा आतंकी देश

कट्टरपंथ की जहरीली हवा में जी रहा पाकिस्तान विश्व का सब से बड़ा खतरा और खतरनाक आतंकी देश बन गया है. पहले से ही दिवालिया होने के कगार पर खड़ा पाकिस्तान के लिए यह एक करारा झटका है.

रिपोर्ट में हुआ खुलासा

एसएफजी द्वारा मानवता पर जोखिम, वैश्विक आतंक संकेतक यानी जीटीटीआई को ले कर एक रिपोर्ट जारी की गई है. रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान को सीरिया से भी अधिक खतरनाक देश बताया गया है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान आतंक का घर, आतंकवाद का समर्थक और आतंकवाद फैलाने वाला देश है, जो सीरिया से 3 गुणा ज्यादा खतरनाक देश है.

विश्व के लिए बड़ा खतरा

रिपोर्ट में माना गया है कि अंतराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सब से बड़ा खतरा बना पाकिस्तान आतंकवादियों का सब से बड़ा पनाहगाह देश है और तालिबान, लश्कर ए तैयबा जैसे खतरनाक आतंकी संगठनों ने पूरे विश्व में मानवता के खिलाफ काम किया है.

पाकिस्तान को खतरनाक आतंकी अड्डों व आतंकवादियों के लिए सुरक्षित देशों की सूची में भी रखा गया है.

आतंकवादियों का पनाहगार

रिपोर्ट के अनुसार, “यदि हम तथ्यों और आंकड़ों के लिहाज से सब से खतरनाक आतंकवादी समूहों को देखें तो पाकिस्तान उन में से अधिकतर आतंकी संगठनों का या तो मेजबान है या फिर उन की सहायता करता है. अफगानिस्तान में आतंकवादी समूहों की बड़ी संख्या पाकिस्तान के समर्थन से संचालित होती है.”

रिपोर्ट में पाकिस्तान, सीरिया, अफगानिस्तान, यमन जैसे देशों से जुड़ी खतरनाक आतंकी संगठनों की सूची भी जारी की गई है. इस में कहा गया है कि अकेले पाकिस्तान में सब से अधिक आतंकी संगठन है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी

इस से पहले 26 अक्तूबर को अफगानिस्तान के उप रक्षा मंत्री हिलालुद्दीन हेलल ने बीजिंग जियांगशान फोरम में यह कह कर सब को चौंका दिया था कि अफगानिस्तान में 21 आतंकवादी संगठनों के 50,000 आतंकवादियों में 70 फीसदी पाकिस्तान के हैं.

भारत भी शुरू से ही यह कहता रहा है कि कश्मीर सहित देश के कई हिस्सों के आतंकी गतिविधियों में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों का हाथ होता है.

पहचान खो चुका है पाकिस्तान

कुदरती रूप से खूबसूरत पर आतंकवाद की वजह से बदसूरत देश बन चुका पाकिस्तान आज बदहाली में जी रहा है. वहां की सरकार सेना के हाथों की कठपुतली है और सेना के इशारे पर काम करती है. जिस किसी ने कभी सेना के खिलाफ जा कर काम किया तुरंत तख्तापलट कर दिया गया और उस पर देशद्रोह का मुकदमा लगा कर उसे फांसी की सजा दे दी गई.

पाकिस्तान में दिनदाहाडे गोलियां चलना, खुलेआम हथियार ले कर घूमना आम बात है. देश धार्मिक कट्टरता में जी रहा है और देश की आर्थिक स्थिति दिवालियापन होने के कगार पर है.

इमरान सरकार से भी कोई उम्मीद नहीं

हाल ही में निर्वाचित नई सरकार इमरान खान के नेतृत्व में कट्टरपंथ को रोकने और देश की तरक्की में सहायक होगी, ऐसा लगता नहीं. क्रिकेटर से नेता और प्रधानमंत्री की कुरसी तक जा पहुंचे इमरान खान को चुनाव में आतंकी संगठनों और सेना का समर्थन हासिल था. ऐसे में वे आतंकी संगठनों पर लगाम लगाएंगे ऐसा संभव नहीं.

पाकिस्तान की हालत भस्मासुर जैसी है. कभी आतंक को बढावा देने वाला पाकिस्तान आज खुद भी आतंकवाद से ग्रस्त है. देश भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, आतंक से जूझ रहा है. विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने के कगार पर है.

बंदूकों के साए में रहने वाला पाकिस्तान तब तक विकास नहीं कर सकता जब तक वहां धार्मिक कट्टरता, आतंकवाद पूरी तरह खत्म न हो जाए. पर जहां सियासत ही धार्मिक कट्टरता के इशारों पर काम करे, वह देश कभी तरक्की कर सकता है भला?

 

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