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इस दिवाली खरीद रहे हैं कार-बाइक ? कम करें बीमे की लागत, होगा फायदा

इस समय पूरे देश में त्यौहारी सीजन की धूम मची हुई है. त्यौहारों में ज्यादातर नई गाड़ी, उपभोक्ता वस्तुएं और इलेक्ट्रोनिक गैजेट खरीदे जाते हैं. ऐसे में अखबार, टीवी और रेडियो के अलावा औनलाइन भी कई सारे औफर के विज्ञापन दिए जा रहे हैं. अगर आप दिवाली पर नई गाड़ी खरीदने की सोच रहे हैं तो बीमा पर ज्यादा पैसा खर्च करना होगा. हालांकि आप बीमा पर काफी कम पैसा खर्च कर सकते हैं, लेकिन अगर इन तरीकों को अपनाते हैं तो…

इस वक्त लांच होती हैं सबसे ज्यादा गाड़ियां

कार व बाइक कंपनियां भी इसी समय सबसे ज्यादा अपने वाहनों के नए माडल को लांच करती हैं. इस वक्त गाड़ी खरीदने पर आपको सबसे ज्यादा कैशबैक और छूट भी मिलती है. हालांकि वाहन बीमा का शुल्क 20 हजार से 50 हजार रुपये तक बढ़ने से गाड़ी खरीदना महंगा सौदा हो गया है.

खरीदें लंबी अवधि की पौलिसी

सभी नई गाड़ियों के लिए लंबी अवधि वाला थर्ड पार्टी कवर लेना जरूरी हो गया है. लेकिन इसके साथ ही अपने से हुए नुकसान कवर को आप सुविधानुसार 1 या फिर 3 साल के लिए ले सकते हैं. इससे आपका खर्चा बचेगा.

ट्रांसफर करें अपना नो क्लेम बोनस

नो क्लेम बोनस आपको तब मिलता है, जब आप पुरानी बीमा पौलिसी की अवधि के दौरान किसी तरह का क्लेम नहीं लेते हैं. यह क्लेम आपको अपनी पुरानी गाड़ी को बेचने और नई गाड़ी खरीदने पर मिल सकता है. हालांकि इसके लिए आपको नई गाड़ी खरीदते वक्त बीमा पौलिसी में अपना नाम ही देना होगा.

सावधानी से चुनिए ऐड औन कवर

बीमा कंपनियां गाड़ी का बीमा करते वक्त काफी सारे ऐड औन कवर भी बेचने का प्रयास करती हैं. इनमें जीरो डेपरिशिएसन के अलावा इंजन तक के लिए अलग से कवर होता है. यह सारे ऐड औन कवर आप सावधानी से चुनिए, क्योंकि फालतू कवर लेने पर आपको ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है.

न लें छोटे क्लेम

गाड़ी में होने वाली छोटी परेशानियों को सही कराते वक्त कभी भी क्लेम न करें. मान लीजिए आपको गाड़ी की सर्विस और थोड़ी बहुत डेंटिंग-पेंटिंग करानी है और इसके लिए 5 से आठ हजार रुपये का खर्च आ रहा है. इस खर्च को आप अपनी जेब से दें और क्लेम न लें. इससे आपको करीब 50 फीसदी की बचत हो सकती है.

अतिरिक्त सुरक्षा उपकरण

अगर आपकी गाड़ी में चोरी या दुघर्टना के वक्त नुकसान कम होने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपकरण लगे हैं तो फिर 5 फीसदी तक का डिस्काउंट प्रीमियम राशि पर मिल सकता है. आप इसके लिए बीमा सेवा देने वाली कंपनी को बोल सकते हैं. हालांकि इस तरह का डिस्काउंट लेने के लिए बिल की कौपी को देना पड़ेगा.

बैंक गए बिना एक घंटे में एक करोड़ का लोन

यह सुनने में जरूर अजीब लगता है कि सेवा प्रदान करने की हमारी लचर व्यवस्था में यह दावा किया जाए कि आप को कहीं गए बिना बैंक से आवेदन भरने के एक घंटे के भीतर एक करोड़ रुपए तक का कर्ज मिल जाएगा. लेकिन, भारत सरकार देश में छोटे व लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए इस तरह का प्रयोग कर रही है. वित्त मंत्रालय के सचिव का कहना है कि यह व्यवस्था अगले साल मार्च तक संभव हो जाएगी. इस के लिए सरकार ने एक पोर्टल शुरू किया है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस को लौंच करते हुए कहा था कि इस के जरिए नया कारोबार शुरू करने या अपना काम बढ़ाने के लिए लोगों को प्रेरित करने के वास्ते यह पोर्टल शुरू किया गया है. बैंक गए बिना आवेदक के खाते में आवेदन प्रक्रिया पूरी होने के एक घंटे के भीतर ऋण मंजूर कर दिया जाएगा. लघु उद्यमिता के प्रति लोगों को उत्साहित करने के लिए और बैंकों में ऋण के वास्ते चक्कर लगाते रहने के बजाय अपने कारोबार पर कारोबारी को ज्यादा फोकस करने के मकसद से यह पोर्टल शुरू किया गया है.

सरकार का दावा है कि इस पोर्टल से 59 मिनट के बीच ऋण की राशि मंजूर कर दी जाएगी. योजना के तहत कुछ शर्तों के साथ बिना गारंटी ऋण उपलब्ध कराने की भी व्यवस्था की गई है. सरकार की यह सचमुच क्रांतिकारी घोषणा है लेकिन असली चुनौती इसे हकीकत में बदलने की है.

इस तरह की योजनाएं और घोषणाएं सरकार अकसर करती है और देश का नागरिक ऐसी व्यवस्था की कल्पना कर रोमांचित होता है. लेकिन जब बात जमीनी हकीकत की आती है, आम आदमी की दशा जंगल में नाचते मोर की तरह होती है जो नृत्य के बाद अपने पांव की स्थिति देख कर रोने लगता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि यह क्रांतिकारी सोच हकीकत में बदलेगी.

#MeToo : खेल में भी मचाई सनसनी

बीसीसीआई यानी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राहुल जौहरी पर एक अज्ञात महिला लेखक ने यौनशोषण का आरोप लगाया है. अब प्रशासकों की समिति (सीओए) ने उन्हें सफाई देने के लिए कहा है. बता दें कि दुनिया के सब से अमीर क्रिकेट बोर्ड के सब से पावरफुल लोगों में से एक हैं राहुल जौहरी. बीसीसीआई में इस से पहले इस पद पर नियुक्ति की परंपरा नहीं थी, लेकिन लोढ़ा समिति की सिफारिशों के बाद ही सीईओ पद पर पहली बार नियुक्ति की गई.

माना जाता है कि राहुल जौहरी विनोद राय के खासमखास हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद विनोद राय की अगुआई में बनाई गई प्रशासकों की समिति में राहुल जौहरी का रोल बहुत बड़ा है. राहुल जौहरी और अधिकारियों के बीच कभी बनी नहीं. राहुल जौहरी की वेतन बढ़ोतरी और उन के खर्चों को ले कर भी कई अधिकारी सवाल उठा चुके हैं.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, राहुल जौहरी का सालाना वेतन 5 करोड़ रुपए से अधिक है. घर के किराए के लिए 50 लाख रुपए दिए जाते हैं और विदेश भ्रमण के लिए उन्हें 500 डौलर प्रतिदिन भत्ता दिया जाता है.

इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि राहुल जौहरी क्या बला है. राहुल जौहरी की नियुक्ति के बाद बीसीसीआई की कमाई में भी काफी बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि चाइनीज मोबाइल कंपनी के साथ रिकौर्ड कीमत में जर्सी की डील हुई, आईपीएल के मीडिया राइट्स को ले कर बड़ी डील हुई. इस तरह से राहुल जौहरी ने बीसीसीआई को और मालामाल कर दिया.

अब विनोद राय ने ही राहुल जौहरी से मी टू के आरोप लगने के बाद स्पष्टीकरण मांगा है. ऐसे में राहुल फिलहाल बुरे फंसे हुए हैं.

इसी तरह भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा ने एक ट्वीट में कहा है कि एक बैडमिंटन अधिकारी ने मेरे कैरियर और सपनों को चकनाचूर कर दिया. वे लिखती हैं कि मुझे मी टू कैंपेन के जरिए अपने साथ हुए मानसिक शोषण की बात करनी चाहिए.

अपनी पोजिशन का फायदा उठा कर यौनउत्पीड़न करने वाले मर्दों के खिलाफ चल रहा मी टू कैंपेन सोशल मीडिया पर जोरशोर से चल रहा है. संस्कार बांटने वाले, खबरें छापने वाले, भजन गाने वाले, खेल खिलवाने वाले सब इस के लपेटे में हैं. बड़ीबड़ी हस्तियां सकते में हैं. कोई अपने पद से इस्तीफा दे रहा है तो किसी से इस्तीफा लिया जा रहा है, तो कोई सफाई दे रहा है कि वह निर्दोष है तो कोई माफी मांग कर मामले को रफादफा कर देना चाह रहा है.

ऐसा नहीं है कि इस की शुरुआत अभी हुई है, यह तो बहुत पहले हो चुकी थी पर इस का असर नहीं हो रहा था. जब से राजनेता इस की चपेट में आए तो इस मामले ने तूल पकड़ लिया. इस कैंपेन में सब से अच्छी बात यह हुई कि महिलाएं अब खुल कर सामने आ रही हैं. वे डरीसहमी नहीं बल्कि निडर हो कर आगे आ रही हैं.

खेल, बौलीवुड, हौलीवुड, राजनीति, मीडिया आदि पर हमेशा से पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है. और पुरुष स्वभाव से ही लंपट कह लें या फिर यों कहें कि उस की आंखों में वासना तैरती रहती है. वह किसी भी तरह औरत के शरीर को हासिल करना चाहता है, उसे भोग लेना चाहता है. उसे लगता है कि वह जिस पद पर काबिज है वह यह सब कर सकता है और पद का दुरुपयोग करते हुए वह करता भी है.

कई सारी महिलाएं या कैरियर बनाने वाली लड़कियां भी कम समय में तरक्की पाना चाहती हैं और इसी सनक के कारण वे यह रास्ता अख्तियार करती है या फिर उन्हें मजबूर किया जाता है. पर सभी महिलाएं ऐसी नहीं होतीं और यौनशोषण का डट कर मुकाबला करती हैं. पर इस मी टू कैंपेन में जो मामले सामने आए हैं वे काफी पुराने हैं. ऐसे में अदालत के सामने सुबूत दे पाना मुश्किल होगा. और अदालती मामले में सुबूत के बिना कुछ भी होना संभव नहीं होता. यदि सुबूत इकट्ठा कर लें तो शोषण करने वाले को सजा मिलनी तय है. अगर सुबूत न भी मिले तो कम से कम मर्दों को यौनशोषण करने से एक नहीं, दस बार सोचना होगा.

धर्म अपने आप में एक धंधा है

धर्म अपनेआप में एक धंधा है और ऐसा धंधा है जिस में बचपन से ही ग्राहकों को जीवनभर के लिए लौयल्टी प्रोग्राम के लिए सदस्य बना लिया जाता है और बहुत सी सेवाएं उसी धर्म की लेनी पड़ती हैं. धंधे की तरह हर सेवा की कीमत देनी पड़ती है. कुछ भी मुफ्त नहीं है. क्रैडिट कार्डों के लौयल्टी प्रोग्रामों की तरह धर्म की लौयल्टी में भी हजारों नियमउपनियम होते हैं. शुरू में हर धंधे की तरह हर धर्म बड़े सपने दिखाता है पर जब ग्राहक पक्का हो जाए तो आंखें तरेरने लगता है.

जिन्होंने क्रैडिट कार्ड या बैंकों में खाते ले रखे हैं वे जानते हैं कि धर्म के रीतिरिवाजों की तरह बैंकों और क्रैडिट कार्ड कंपनियों के भी रीतिरिवाज हैं. जैसे आजकल बड़ेबड़े मंदिरों में लंबी लाइनों में धक्केमुक्की के बाद पैसे दे कर सेवा मिलती है वैसे ही खातेदारों और क्रैडिट कार्ड होल्डरों को कठिनाई होने पर अपने ईश्वर को पाने के लिए घंटों, दिनों लगाने होते हैं.

क्रैडिट कार्ड बेचने से पहले, खाता खुलवाने या एअरलाइंस के प्रोग्राम के सदस्य बनने या फिर होटल चेन की विशेष सुविधा पाने के लिए पहले बड़े सपने दिखाए जाते हैं पर एक बार फंसे नहीं और पैसा दिया नहीं कि आप गुलाम बन गए. धर्म की तरह आप को पुरोहितों के रूप में लौयल्टी मैनेजर या रिलेशनशिप मैनेजर मिलेंगे जो पैसे वसूलने के लिए होते हैं, भक्त को सेवा देने के लिए नहीं.

हर धर्म अपने भक्तों से कहता है कि उन का उद्धार वही करेगा. वही पापों को समाप्त करेगा, पैसा ले कर. वह बीमारियां दूर कर देगा, अर्थ संकट समाप्त हो जाएगा. धर्म की शरण में आओ तो सही. यही 40 पर्यटन स्थलों पर होटल बनाए रखने वाली चेन कहेगी कि आओ एक बार पैसा दे दो, फिर जीवनभर कभी कहीं कभी कहीं के मजे लूटो.

ब्रोशरों में सुंदर जगह कमरे दिखेंगे. जब सदस्य बन जाओ, बंध जाओ तो कोई सुनने वाला नहीं. धर्म के मंदिर की तरह कीचड़ से गुजर कर मूर्ति तक पहुंचों और भिखारियों की तरह प्रसाद पा कर धन्य होओ.

क्रैडिट कार्ड कंपनियां कहेंगी कि लो अब खजाना हाथ में आ गया. जो चाहे मरजी खरीदो. ईएमआई भी है. चिंता न करना, हम हैं न. यह तो पहले माह ही पता चलता है कि न केवल 4 दिन की देर से चपत लग जाती है, क्रैडिट कार्ड भी बंद. धर्म संसद का आदेश कि भक्त प्रायश्चित्त करे, 40 पंडों को भोज कराए, सिर मुंडाए तब ईश्वर की सेवा चालू होगी. होटल लौयल्टी प्रोग्राम के पौइंट्स ऐक्सपायर्ड हो गए, अब कुछ नहीं हो सकता. जो फ्री देने की बात थी वह तो वादा फ्री का था, बाद में भुगतान ही करना था.

अब धर्म के नाम पर दाल, चीनी, घी, तेल का व्यापार शुरू हो गया है. धर्म से जुड़े बाबाओं ने भक्तों के लौयल्टी प्रोग्राम को चौतरफा तरीकों से लाभ उठाना शुरू कर दिया. यहां शिकायत की गुंजाइश ही नहीं, क्योंकि यह तो जनसेवा है और जनसेवा में कमी है, तो पाने वाले की गलती है. न धर्म कभी गलती पर होता है, न धर्म के आका. केवल भक्त गलत होते हैं.

अगर आप धर्म और व्यापारों के प्रोग्रामों के सदस्य हैं तो चुपचाप सहते रहें. जो सुविधा मिल गई उस के गुण गाते रहिए, असुविधा पर रोने से लाभ नहीं.

जब किसी को घर बुलाएं तो निभाएं भी

हमारे एक परिचित के बेटे की शादी थी. 3-4 महीने पहले से ही फोन आने शुरू हो गए कि रिजर्वेशन करा लो, आप को जरूर आना है. हमें घर में काफी काम था. बेटी की प्रतियोगी परीक्षाएं भी हो रही थीं, लेकिन शादी की तारीख आतेआते उन लोगों से इतनी दफा बात हुई कि हम टाल नहीं सके, तो जाने का प्रोग्राम बना ही लिया.

10 घंटे का सफर तय कर विवाहस्थल पर पहुंचे. उन्होंने बाहर से आए सभी मेहमानों को होटल में ठहराया था. बातोंबातों में 1-2 बार हमारे परिचित ने बता भी दिया कि काफी अच्छे होटल में आप लोगों के ठहरने का इंतजाम किया है ताकि किसी को परेशानी न हो.

चूंकि बरात चलने का समय हो रहा था, इसलिए फटाफट तैयार हो कर हम शादी में शामिल होने के लिए निकल पड़े. अगली सुबह परिचित ने बहू को विदा करवाया, फिर सभी मेहमानों से मिल कर घर चले गए क्योंकि वहां भी रस्म होनी थी. हम लोग वापस होटल आ गए क्योंकि तैयार हो कर, नाश्ता वगैरा कर निकलना भी था. लेकिन यह क्या? होटल में न तो तैयार होने के लिए कमरा बुक था, न ही नाश्ते का कोई इंतजाम.

होटल मैनेजर से पूछने पर उन्होंने कहा, ‘‘हमारे पास केवल कल की ही बुकिंग थी, बताया गया था कि मेहमान शायद ही रुकें, विदा होने तक सभी चले ही जाते हैं. सुबह तक शायद ही कोई रहेगा.’’

अब क्या किया जाए, यह सोचने की बात थी? जो मेहमान दूरदराज से आते हैं वे अपनी ट्रेन या साधन के समयानुसार ही तो जाएंगे. ऐसे में नाश्ते व खाने का इंतजाम तो करना ही चाहिए था. अनजान शहर में मेहमान क्या खाएंगे, क्या रास्ते के लिए साथ ले जाएंगे. खैर, गरमी के मौसम में बिना तैयार हुए, बिना खाएपिए सफर तय करने में जो परेशानी आई, वह आज भी याद आ जाती है.

कहने का मतलब यह है कि यदि आप ने अपनों को आमंत्रित किया है, उन्हें मानसम्मान से बुलाया है तो उन के आने से उन के जाने तक खानेपीने व रहने की पूरी व्यवस्था पर ध्यान देना आप की जिम्मेदारी है.

यह कैसी मेजबानी है

रिश्ते में हमारे एक देवर हैं, उन की शादी की 25वीं सालगिरह थी जिसे वे काफी जोरशोर से मनाना चाहते थे. उन्होंने काफी रिश्तेदारों को बुला लिया. हम से भी बड़े प्यारमनुहार से दोनों पतिपत्नी को आने के लिए कह रहे थे. हम मना नहीं कर सके. 8 घंटे का सफर तय कर हम प्रोग्राम में पहुंचे.

शहर के एक नामी होटल में पार्टी रखी गई थी. अच्छा इंतजाम था. खानेपीने के तरहतरह के स्टौल लगे थे. डांसगाने का भी प्रोग्राम था. प्रोग्राम रात के 12 बजे तक चला. अब जो लोग उसी शहर या आसपास के थे, वे तो चले गए पर हमारे जैसे दूर से आए दोचार लोगों को तो वहीं ठहरना पड़ा. रात को जाने के लिए न तो कोई साधन था, न ही समझदारी, इसलिए रात को वहीं रुकने में हम ने भलाई समझी.

परंतु यह हमारा भ्रम निकला, क्योंकि जाने से भी ज्यादा हमें वहां रुकने में परेशानी आई. ठहरने का उन लोगों ने न तो घर पर, न ही होटल में कोई इंतजाम किया था. खैर, सभी मेहमानों को घर लाया गया. किसी तरह स्टोररूम से बक्से में रखे 3-4 गद्दे बिछा कर सोने की व्यवस्था की गई. किंतु काफी समय से इस्तेमाल न होने के कारण गद्दों की हालत बहुत खराब थी, वे बिछाने लायक नहीं थे. पर हमारी मजबूरी थी. सो, जमीन पर गद्दे बिछाए गए और जैसेतैसे उन पर लेटे.

कमरे में साफसफाई नहीं थी, बाथरूम भी साफ नहीं थे और मच्छरों के काटने से रातभर नींद भी नहीं आई. सुबह उठे तो जमीन पर लेटने से कमर अकड़ गई थी. नींद पूरी न होने से थकान भी महसूस हो रही थी. किसी तरह तैयार हुए तो मेजबान ने आ कर अपना कर्तव्य निभा दिया कि चाय तो आप लोगों ने पी ली होगी. पर यह कहते हुए उन्होंने न तो नाश्ते का और न ही रास्ते के लिए कुछ खाने का सामान साथ रखने का जिक्र किया. फंक्शन में तो मेहमानों की खासी तादाद दिखी, रौनक हो गई, इस के बाद मेहमान रुकें या जाएं उस से कोई मतलब नहीं. उन्होंने न तो इस बारे में सोचा, न ही अपनी जिम्मेदारी समझी.

कितने भी बड़े फाइवस्टार होटल में या फिर बड़े से बड़ा कार्यक्रम कर लें किंतु वह सफल और अच्छा तभी माना जाता है जब आमंत्रित मेहमानों के लिए हर सुविधा का ध्यान रखा जाए. जैसा आराम आप अपने लिए चाहते हैं वैसा ही सब के लिए सोचा जाए और इस के लिए कोशिश भी की जाए.

मेहमानों के लिए करें व्यवस्था

आज की भागदौड़भरी जिंदगी में जहां अपने लिए सुकून से बिताने को दो पल नहीं हैं, अपने में सभी व्यस्त होते जा रहे हैं, ऐसे में कहीं आनाजाना, रिश्तेदारी निभाना मुश्किल ही होता जा रहा है. उस पर यदि आप के द्वारा बुलाए जाने पर आप के ही मेहमानों को न तो आप की तरफ से रहनेठहरने का आराम तथा पूरी व्यवस्था मिले, न ही मानसम्मान, तो कौन, कहां व कितना आना पसंद करेगा? धीरेधीरे नातेरिश्ते कम होते जाएंगे, एकदूसरे के यहां आनाजाना कम होने लगेगा. फिर जब अपने ही न होंगे तो कैसा फंक्शन, कैसी रौनक.

जिन्हें भी पारिवारिक उत्सव में बुलाया जाए, वे सब आप के पास आएं तो वापस लौटते हुए खुश हो कर व अपनत्व ले कर ही जाएं. एकसाथ मिलजुल कर रहना व एकसाथ समय बिताना जहां तनावमुक्त करता है वहीं दिल को आनंदित भी रखता है. इसलिए, अपनों का ध्यान दिल से रखें, न कि मजबूरी समझ कर.

दीवाली विशेष : कैसी हो दीवाली पार्टी की थीम

दीवाली खुशियों का त्योहार है और इस दिन हर कोई अपने घर को खास ढंग से सजाने की कोशिश करता है. इस दिन को परिवार, दोस्त और जानपहचान के सभी लोग आनंद व उल्लास के साथ मनाना पसंद करते हैं. इस अवसर पर अगर आप को पार्टी करनी हो तो हाउस गार्डन, नजदीक के पार्क, क्लब हाउस और आप का घर सब से अधिक उपयुक्त होते हैं.

मुंबई की 7 वचन की फाउंडर मिन्नत लालपुरिया बताती हैं कि सब से अधिक जरूरी होता है बजट पर ध्यान देना. आप जितना खर्च करना चाहती हैं उस की एक लिस्ट बना लें. फिर उस के हिसाब से पार्टी थीम बनाएं, मसलन बौलीवुड रैट्रो थीम, गार्डन पार्टी थीम, एथनिक थीम, डांडिया थीम, कलर थीम आदि.

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बौलीवुड रैट्रो थीम

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि इस में बौलीवुड के पसंदीदा चरित्र के अनुसार परिवारजन या दोस्त ड्रैस पहन कर पार्टी में शामिल हो सकते हैं. इसे आप बौलीवुड के 70, 80 या 90 के दशकों की फिल्मों को ले कर डैकोरेशन कर सकती हैं. वाल पेंटिंग्स और फोटो भी उसी समय की होनी चाहिए. इस में गाने भी बौैलीवुड रैट्रो के ही होने चाहिए. इस का आनंद सभी अपने हिसाब से ले सकते हैं.

गार्डन थीम पार्टी

गार्डन थीम पार्टी घर से बाहर करनी पड़ती है. इस में हाई टी के साथ डिनर का आयोजन करना पड़ता है. इस के लिए गार्डन के सभी पेड़पौधों को लाइट्स व दीयों से सजाएं. वहां जाने वाले रास्ते के दोनों किनारों को पाम या चाइनीज प्लांट्स से सजाएं और एक फ्रैश लुक को क्रिएट करें. गार्डन पार्टी को क्रिएट करते वक्त ग्रीनरी और स्वच्छ वातावरण का खयाल जरूर रखें.

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एथनिक थीम

इस थीम में पार्टी में आने वाले सब के परिधान एथनिक रखें. यह सजावट घर के अंदर होती है, इसलिए घर की दीवार पर एथनिक पेंटिंग्स और फोटोज से सजावट करें. लाइटिंग के लिए दीये या हलकी रोशनी का सहारा लें. एक अच्छी रंगोली और फूलों की सजावट घर की खाली पड़ी जगहों पर करें. खाने में एथनिक फूड ही सर्व करें.

डांडिया थीम

डांडिया थीम की पार्टी को एक बड़े हौल या घर के बाहर आयोजित किया जा सकता है. इस में आकर्षक रंगोली के साथसाथ सब के परिधान और बजाई जाने वाली धुन डांडिया की होनी चाहिए. दीये और रोशनी के इस उत्सव में ये थीम सब के लिए मनोरंजक होती है. इस थीम पार्टी में आने वाली सभी महिलाओं का स्वागत कलरफुल डांडिया, रंगबिरंगी चुनरी और लाल चूडि़यों से करें, जबकि पुरुषों का स्वागत कलरफुल डांडिया और पगड़ी से करें. इस थीम को ओरिजिनल बनाने के लिए ट्रैडिशनल फूड को ट्रैडिशनल पत्तल पर ही सर्व करें.

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कलर थीम

इस थीम में कोई खास कलर या फंकी कलर ड्रैस रखें और पार्टी में आने वाले सभी का स्वागत उस रंग के फूलों से करें. इस के अलावा, उस रंग से मैच करते हुए फूलों और रंगोली से सजावट करें. याद रखें कि दीये, कैंडिल और बल्ब की रोशनी भी रंग के साथ मैच करती हुई ही रखें.

रंगोली खास होती है, जिसे आप अलगअलग रंगों के फूल और दीये से अच्छी तरह फर्श के हर कोने पर बना सकती हैं. इस में अधिकतर मोर या ज्यामितीय डिजाइन अच्छी होती है. दीवाली के डैकोरेशन में रात को कलरफुल लैंटर्न्स और लाइट्स, डिनर टेबल के आसपास करीब से लगे हुए दीये, रंगोली के आसपास वाले रेलिंग्स और कैंडल्स सब मिल कर इस त्योहार को आकर्षक बनाते हैं. दीवाली पार्टी की प्लानिंग 15 दिनों पहले कर लेनी चाहिए ताकि आप मनमुताबिक थीम के लिए जरूरी सामान जुटा सकें.

 #MeToo का हंगामा और सकते में हस्तियां  

यौनशोषण से आजिज आ कर पीडि़त महिलाओं ने हिम्मत दिखानी शुरू कर दी है. उन की इस हिम्मत को मी टू नाम दिया गया. मी टू यानी मैं भी. अमेरिका से शुरू हुए इस मी टू अभियान में अब भारत की पीडि़ताएं भी शामिल हो गई हैं.

यौनशोषण के किस्से, हालांकि भारत में धार्मिक कहानियों में भरे पड़े हैं. धर्म और पुरुषप्रधान समाज शोषण के लिए हमेशा नारी को ही जिम्मेदार मानता रहा है. शोषण की शिकार नारी को ही अपराधभाव से देखा जाता था. महिला अपने अपराधभाव से मुक्त होने के लिए पुरुष की शरण में जाने को मजबूर होती थी.

अहल्या जैसे उदाहरण तमाम हैं. मी टू अभियान यौनहिंसा का शिकार हो रही महिलाओं को पत्थर बनने से रोक सकता है. महिलाओं को पद, प्रभाव और बाहुबल से भले ही दबा लिया गया हो, लेकिन अब सोशल मीडिया पर उन की आवाज को समर्थन देने वालों की कमी नहीं है. यह बात और है कि इस से महिलाओं की तरक्की प्रभावित हो सकती है.

विदेशों से शुरू हुआ मी टू कैंपेन अब देश में लोगों की नींद उड़ा रहा है. फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर पर आरोप लगने के बाद मी टू कैंपेन के निशाने पर दूसरे लोग भी आ गए. इन में फिल्म जगत से आलोक नाथ, विकास बहल, साजिद खान, वरुण ग्रोवर, सुभाष घई, श्याम कौशल, कैलाश खेर और राजनीतिक हस्तियों में निर्वतमान विदेश राज्यमंत्री व पूर्व पत्रकार एम जे अकबर शामिल हैं.

कुछ के खिलाफ तो कईकई लोगों ने आरोप लगाए हैं. इस का कानूनी प्रभाव पडे़ न पडे़ पर सामाजिक प्रभाव तेजी से पड़ रहा है. कुछ संस्थाएं भी ऐसे मामलों को ले कर चर्चा में आ गईं.

महाराष्ट्र महिला आयोग और सिने ऐंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन यानी सिंटा ने नाना पाटेकर को अभिनेत्री तनुश्री दत्ता के आरोपों की जांच के लिए अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी कर दिया. अभिनेता नाना पाटेकर पर तनुश्री ने 10 साल पहले एक फिल्म की शूटिंग के दौरान यौनशोषण का आरोप लगाया है.

आलोक नाथ पर विंता नंदा और अभिनेत्री संध्या मृदुल समेत कई टीवी कलाकारों ने यौनशोषण का आरोप लगाया. ट्विटर पर अपनी लंबी पोस्ट में संध्या ने विस्तार से पूरी घटना को लिखा और अपनी बेबसी का जिक्र किया. गायक  कैलाश खेर पर सिंगर सोना महापात्रा ने ऐसे ही आरोप लगाए. सोना ने बताया कि कैलाश ने उन को गलत तरीके से छूने की कोशिश की.

फिल्मों के बारे में यह माना जाता था कि लोग प्रचार पाने के लिए ऐसी बातें कह देते हैं, लेकिन विख्यात पत्रकार  और मोदी सरकार में पूर्व विदेश राज्यमंत्री एम जे अकबर पर लगे आरोप सस्ती पब्लिसिटी के दायरे से बाहर के हैं. इस की अपनी वजह यह है कि एम जे अकबर पर लगे आरोप उस समय के हैं जब वे मीडिया हाउस में वरिष्ठ पत्रकार थे.

आखिरकार मी टू अभियान की यह मुहिम एम जे अकबर को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा गई. कोर्ट में सुनवाई होने से पहले ही उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.

मी टू कैंपेन के पक्ष और विपक्ष में लोग लामबंद होने लगे हैं. फिल्म अभिनेत्री ऐश्वर्या राय बच्चन और काजोल ने कहा कि लोगों की बातों से पता चलता है कि सोशल मीडिया के जमाने में अब यह पता चल गया कि किसी की आवाज को दबाया नहीं जा सकता. अच्छी बात यह है कि ऐसे कैंपेन को समाज महत्त्व दे रहा है. ऐसे कैंपेन से यौनशोषण के कलंक को दूर करने में मदद मिल रही है. लोग अब बिना हिचक अपनी बात कह रहे हैं.

दोनों ने जोर देते हुए कहा कि मी टू कैंपेन ने लोगों को खुल कर बोलने की हिम्मत दी है. पहले यह माना जाता था कि खुल कर बोलने से बदनामी का खतरा होता है. ऐसे में महिलाएं चुप रहेंगी. अब यह धारणा टूट रही है. सैक्स और उस से जुडे़ शोषण पर लड़कियां खामोश रह जाती थीं. लेकिन अब उन का डर निकल जाएगा. दूसरी ओर, जो पुरुष यह सोचते थे कि महिला अपनी बदनामी के डर से चुप रह जाएगी, वे भी थोड़ा डरेंगे. यह बात सच है कि लड़कियां यौनशोषण का शिकार होती रही हैं. पद और प्रभाव का प्रयोग भारत में सब से अधिक होता है. ऐसे प्रभावशाली लोगों को भले ही कोर्ट से सजा न मिले पर अब सोशल मीडिया के प्लेटफौर्म पर मामला उठने से उन के मन में डर बैठ गया है.

कुछ लोग मानते हैं कि मी टू कैंपेन से स्त्रीपुरुष के बीच की दूरियां बढे़ंगी जिस से कार्यस्थल पर एकसाथ काम करना मुश्किल होगा. ऐसे विवाद अभी भले कोर्टकचहरी से दूर लग रहे हों पर भविष्य में ये वहां भी  पहुंचने लगेंगे. ऐसे में सामाजिक स्तर पर नए बदलाव शुरू हो सकते हैं. भारत जैसे देश में जहां बातबात पर नैतिकता की दुहाई दी जाती है, वहां पर ऐसे आरोप किसी का कैरियर या साख समाप्त करने के लिए काफी होते हैं. कोर्टकचहरी में सफाई देने में तो सालों गुजर जाएंगे. ऐसे में तब तक बदनामी का यह दाग चरित्र पर चिपका रहेगा.

विदेशी मुहिम का असर

औस्कर अवार्ड विजेता निर्माता हार्वे विंस्टीन ने जब यह स्वीकार किया कि एक अभिनेत्री द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं तब बहुत सारी दूसरी औरतें मी टू यानी मैं भी कहने के लिए खड़ी हो गईं. अमेरिकी समाज में महिलाओं ने भले ही यह स्वीकार कर खुलेआम इस अभियान को चलाया हो पर भारत में अभी भी ज्यादातर महिलाएं इस विषय पर खुल कर बात नहीं करना चाहतीं. भारत में मी टू कैंपेन को चलाने वाली महिलाओं की संख्या कम और औफ द रिकौर्ड बात करने वाली महिलाओं की संख्या अधिक है.

फिल्म और फैशन की दुनिया में बात करने पर पता चलता है कि यहां के हालात बहुत ज्यादा गंभीर हैं. यहां मी टू को मुद्दा बनाना आसान नहीं है. यह कई तरह की बाधाएं खड़ी करने वाला कैंपेन हो सकता है. शायद यही वजह है कि भारत में इस कैंपेन को लोगों ने पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है.

मी टू के जरिए समाज की पोल खुल रही है. सफल महिलाएं बता रही हैं कि उन्हें भी कभी न कभी यौनशोषण का शिकार होना पड़ा. मी टू का मतलब छेड़छाड़ जैसी घटनाओं से जुड़ा है. पहले इन बातों को लोग छिपाते थे, अब बताने लगे हैं. कहा यह जा रहा है कि मी टू कैंपेन के चलते महिलाओं से छेड़छाड़ की घटनाएं रुकेंगी.

अमेरिका जैसे देश में जहां छेड़छाड़ को छिपाया नहीं जाता, वहां भी ये घटनाएं घट रही हैं. भारत से ले कर अमेरिका तक मी टू अभियान में ज्यादातर मामले फिल्मी दुनिया के ही आ रहे हैं. कुछ मामले महिला खिलाडि़यों के हैं. हार्वे विंस्टीन के खिलाफ महिलाओं के यौन उत्पीड़न का मामला सुर्खियों में है. बताया जाता है कि विंस्टीन फिल्म अभिनेत्रियों को यौनशोषण के लिए मजबूर करते थे.

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जज ने अपने बयान में कहा कि उन के 50 से अधिक महिलाओं से संबंध रहे हैं. जज बिल ओ नील ने यह फेसबुक पर शेयर किया था. नील गवर्नर पद के लिए डैमोक्रेटिक उम्मीदवार थे. नील ने फेसबुक पर लिखा कि वे गवर्नर पद के उम्मीदवार के तौर पर अपने विरोधियों का रिसर्च टाइम कम कर देना चाहते हैं.

नील ने बताया कि उन के पिछले 50 सालों में 50 बेहद सुंदर महिलाओं से यौन संबंध रहे हैं. 70 साल के जज नील ने 2 महिलाओं के नाम लिख कर इस बात का जिक्र किया था.

नील ने लिखा कि इन खूबसूरत 50 महिलाओं में निजी सचिव से ले कर सीनेटर तक शामिल हैं. नील ने एक सीनेटर को अपना पहला और सच्चा प्यार बताया. नील के इस बयान की बाद में आलोचना भी हुई. तब नील ने माफी भी मांगी.

कैंपेन से उजागर हुआ सच

अमेरिका में पिछले दिनों यौनशोषण के कई मामले सामने आए. इन में कई जानेमाने लोग शामिल थे. भारत में कई अभिनेत्रियों ने इस मुहिम का हिस्सा बनते हुए बताया कि वे मी टू की शिकार हुई हैं. असल में भारत में इस का केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए प्रयोग नहीं किया गया बल्कि यहां भी वर्कप्लेस पर ऐसी घटनाएं घटी हैं. देश में इन का रूप बदला हुआ है. यही वजह है कि इसे छेड़छाड़ तक ही सीमित रखा गया.

फिल्मी दुनिया से ले कर राजनीति और दूसरे हल्कों में ऐसे किस्से दबीजबान कहेसुने जाते रहे हैं. फिल्मी दुनिया में इसे कास्ंिटग काउच और कंप्रोमाइज का नाम दिया गया. यहां हीरो ही नहीं, फिल्म निर्माता और निर्देशकों पर भी ऐसे आरोप लगे जिस में फिल्मों में काम देने के बहाने यौन संबंधों के लिए दबाव बनाया गया.मी टू कैंपेन के बहाने ऐसे आरोप अब खुल कर सामने आ रहे हैं.

देश में इस तरह की घटनाएं तब सामने आती हैं जब कोई घटना घट जाए. केवल फिल्मों में ही नहीं, राजनीति में भी ऐसी घटनाओं की लंबी फेहरिस्त है. यौनशोषण से शुरू हुई घटनाएं हत्या जैसे जघन्य अपराधों में बदल गईं. उत्तर प्रदेश में मधुमिता और कविता चौधरी हत्याकांड इस के प्रत्यक्ष उदाहरण रहे हैं. कई दूसरे नेताओं के महिला नेताओं से संबंध चर्चा का विषय रहे हैं. यह बात और है कि हमारे देश में इसे खुल कर स्वीकार नहीं किया जाता.

देश में जब सोशल मीडिया पर मी टू अभियान की शुरुआत हुई तो बहुत सारी महिलाएं सामने आईं, 2006 में शुरू हुए इस अभियान को 15 अक्तूबर, 2017 को अलाइशा मिलानो ने फिर से चर्चा में ला दिया. इस की चर्चा एम जे अकबर, नाना पाटेकर और आलोक नाथ पर आरोप लगने के बाद तेजी से शुरू हुई.

धर्म का असर

मी टू कैंपेन के पहले भी इस तरह की घटनाएं होती रही हैं. यह बात और है कि इन की चर्चा नहीं होती थी. भारतीय समाज में पुरुषवादी मानसिकता हावी है. हमारे धर्मग्रंथों में बताया गया है कि पुरुष का कोई दोष नहीं होता. हमारे जीवन पर धार्मिक कहानियों का बड़ा असर है. इन कहानियों में गौतम की पत्नी अहल्या से छल करने वाले इंद्र की जगह पर अहल्या को ही दोषी करार दिया जाता है. उसे ही पत्थर बनना पड़ा था. आज भी पुरुष का कोई दोष नहीं माना जाता है.

अहल्या ही नहीं, सीता की भी यही दशा रही. सीता का अग्निपरीक्षा के बाद भी सामाजिक बहिष्कार किया गया. ये कहानियां आज भी हमारे दिलोदिमाग पर हावी हैं. इसी वजह से शोषण का शिकार होने के बाद भी कोई महिला अपना मुंह नहीं खोलना चाहती. उसे इस बात का डर रहता है कि ऐसे मामले सामने आने के बाद लोग काम देना बंद कर देते हैं. बलात्कार या छेड़छाड़ की शिकार महिला को थाने से ले कर कचहरी तक शक की नजरों से देखा जाता है.

उस पर आरोप लगते हैं कि कपडे़ ठीक से नहीं पहने होंगे? अपनी ओर से पहल की होगी? देररात घूमने निकली होगी? सोशल मीडिया और फिल्म देखने से बिगड़ गई होगी? देश में छेड़छाड़ की बात तो जाने दीजिए, बलात्कार जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करवाना आसान नहीं होता है. जब लड़की को यह पता चलता है कि शिकायत के बाद उसे ही गलत समझा जाएगा तो वह हर शोषण सहने लगती है.

मी टू कैंपेन से लड़की में यह साहस आएगा कि वह भी अपनी बात कह सकती है. आज संध्या मृदुल, सोना महापात्रा, तनुश्री दत्ता और उन जैसी जो महिलाएं मी टू कैंपेन चर्चा में लाईं. उन के पास कुछ साल पहले ऐसा कोई प्लेटफौर्म नहीं था जहां वे अपनी बात रख सकें.

फिल्म अभिनेता जीतेंद्र पर आरोप लगाने वाली महिला ने कहा कि उस ने अपने मातापिता के मरने का इंतजार किया, क्योंकि उस की शिकायत से उन का सामाजिक जीवन प्रभावित हो सकता था. ऐसे में उस ने इतनेसाल मानसिक यातना में गुजार दिए. इन घटनाओं से समझा जा सकता है कि भारत में महिलाओं को अपनी बात कहने की आजादी नहीं है, खासकर यौनशोषण जैसे मुद्दे पर तो एकदम ही नहीं.

महिला मतलब शोषण का अधिकार

लड़की को देखते ही यह समझ लिया जाता है कि जैसे यह शोषित होने के लिए ही आई है. फिल्म और टीवी तो बदनाम हैं ही, स्कूलकालेज और औफिस तक में इस तरह की घटनाएं तेजी से घट रही हैं. लखनऊ की एक लड़की अभिनेत्री बनने व टीवी सीरियलों में काम करने के लिए मुंबई गई. वहां उस के सामने ऐसे प्रस्ताव आने लगे कि जब तक वह कंप्रोमाइज नहीं करोगी, उसे रोल नहीं मिलेंगे. वह कहती है, ‘‘प्रोड्यूसर से ले कर हीरो तक इस चाहत में रहते हैं. वे ऐसी अभिनेत्रियों की ही सिफारिश करते हैं जो उन के साथ संबंध बनाने को राजी हो.’’

हिंदी सिनेमा में यह कोई चर्चा का विषय नहीं रह गया है. मी टू कैंपेन के बाद ऐसे हालात वहां भी थम सकते हैं. अभी तक न्याय मिलना आसान नहीं था, अब सोशल मीडिया में चर्चा से लोगों में डर बैठ रहा है.

भोजपुरी फिल्म उद्योग की हालत सब से अधिक खराब है. वहां छोटेछोटे शहरों की लड़कियां काम करने को जाती हैं. पैसे से वे मजबूत नहीं होतीं और परिवार के लोग उन का साथ नहीं देते हैं. ऐसे में काम करना उन की मजबूरी हो जाती है. भोजपुरी फिल्मों में हीरो अपनी जोड़ी बना कर काम करते हैं. जो लड़की समझौता करती है उस की सिफारिश की जाती है. जो लड़की समझौते के लिए तैयार नहीं होती उस के साथ काम करने से मना कर दिया जाता है. इस बारे में आवाज उठाने वाली लड़कियों के लिए काम करने के रास्ते बंद हो जाते हैं.

बढेंगी दूरी

मी टू कैंपेन से आपस में दूरियां बढ़ने का खतरा भी बढ़ रहा है. ऐसे में महिलापुरुष के बीच आपसी व्यवहार में बदलाव आएगा. अभी तक इस तरह की घटनाएं सामने आई हैं कि जब अपनी आवाज उठाने वाली महिलाओं को हाशिए पर रखा जाने लगा.

एक लड़की बताती है, ‘‘मैं एक शौप पर काम करती थी. वहां मेरे साथ छेड़छाड़ की घटना हुई. मैं ने जब यह बात वहां के मालिक को बताई तो वे बात को दबाने में लग गए. मैं ने उन की बात को न मानते हुए पुलिस में रिपोर्ट कर दी. जब यह बात शौप के मालिक को पता चली तो मुझे मेरा बकाया वेतन दे दिया गया और न आने के लिए कह दिया गया. जब मैं ने इस बारे में पूछा तो बहाना बनाया गया, कोई सही कारण नहीं बताया गया. वहां काम करने वाली दूसरी लड़कियों ने मुझे बताया कि मेरी रिपोर्ट के बाद शौप की इमेज खराब होने के खतरे के चलते मुझे हटाया गया है.’’

बलात्कार की शिकार एक लड़की ने ब्यूटीपार्लर चलाने के लिए शौप किराए पर ली. कुछ दिनों बाद मकानमालिक को जैसे ही इस बात का पता चला कि वह लड़की बलात्कार पीडि़त है, उस ने दुकान खाली कराने को कहा. हमारे समाज में लोग ऐसी लड़कियों से दूर रहना चाहते हैं जो शोषण जैसी घटनाओं का शिकार होती हैं. लड़कियों को ही गलत माना जाता है. यही वजह है कि समाज में बहुत सारी घटनाओं के होनेके बाद भी महिलाएं सामने आ कर कहने से बचती हैं. मी टू कैंपेन से ऐसी पीडि़ताओं का साहस बढे़गा.

यह बात केवल आम लोगों की नहीं है. संसद में जब महिला सुरक्षा बिल पास हो रहा था, कई नेताओं ने इस बात के तर्क दिए कि इस तरह का बिल आने के बाद लड़कियों को काम मिलने के अवसर कम हो जाएंगे. यह चिंता गलत नहीं थी. कौर्पोरेट वर्ल्ड में अघोषित पौलिसी बन गई जिस में लड़कियों की नौकरी औफिसवर्क के लिए रहेगी, टूरिंग जौब से उन को दूर रखा जाएगा.

कैरियर का संकट

एक कंपनी की एचआर मैनेजर ने बताया कि टूर के दौरान अगर लड़के हैं तो वे एक रूम में रह लेंगे. काम के समय देरी को ले कर कोई परेशानी भी नहीं होगी. लेकिन लड़कियों के होने से कंपनी को काम से ज्यादा चिंता लड़कियों की रखनी पड़ती है. उन की शिकायत पर कंपनी की छवि तो खराब होती ही है, कानूनी दांवपेंच में भी उसे फंसना पड़ता है. ऐसे में एचआर का प्रयास रहता है कि लड़कियों की जगह पर लड़कों को ही काम पर रखा जाए. इस से लड़कियों के सामने कैरियर के औप्शंस कम होते जा रहे हैं.

महिला अधिकारों को ले कर कडे़ कानून देश में बन रहे हैं. ऐसे में लोगों के अंदर यह भय बैठ गया है कि अगर वे महिलाओं के शोषण को ले कर कानूनी दांवपेंच में फंस गए तो परेशानी होगी. ऐसे में वे लड़की से दूरी बनाने की सोचेंगे. इस से एकसाथ बराबरी का दर्जा हासिल कर के काम करना मुश्किल हो जाएगा.

भारत में न्याय मिलने में लंबा समय लगता है. ऐसे में एक बार किसी के शोषण में फंसने का मतलब कैरियर खत्म हो जाना होता है. इस से लोग स्वाभाविक तौर पर विपरीतलिंगी से दूरी बनाने को मजबूर हो सकते हैं. ऐसे में मी टू के कारण कहीं न कहीं लड़कियों की तरक्की में बाधा आएगी.

बदलेगा समाज

मी टू का लब्बोलुआब यह है कि एक के बाद एक महिलाओं द्वारा यौनशोषण के बारे में खुल कर आरोप लगाने और नामी पुरुषों का उन आरोपों को नकारने से एक बात तय है कि कभी महिलाओं को डराता पुरुष अब उन से खुद डरने लगेगा. इस डर के नतीजे में पुरुष द्वारा महिलाओं को छेड़ने, डराने, यौनशोषण करने की घटनाओं में अब काफी कमी आएगी. महिलाओं के प्रति वे कुछ करने से पहले उस करतूत के अंजाम के बारे में बारबार सोचेंगे. ऐसे में समाज में यकीनन अच्छा माहौल बनेगा लेकिन स्त्री व पुरुष के बीच दूरियां भी पनप सकती हैं.

दीवाली विशेष : जुए की संस्कृति, पैसा किस्मत से नहीं मेहनत से आता है

भारतीय रेलवे ने इस साल भी अपने कर्मचारियों को खासा दीवाली बोनस दिया है पर शायद ही कोई कर्मचारी मानेगा कि यह बोनस उस का भाग्य नहीं कर्र्म यानी उन ड्यूटियों का पुरस्कार था जो उस ने मौसमों की परवा न करते हुए सालभर दिनरात एक कर के की थीं. बोनस एक तरह की कमाई ही है जो हर किसी को अलगअलग तरह से मिलती है. बोनस उन लोगों को नहीं मिलता जो कहीं काम न करते हों. हां, काम का स्तर छोटाबड़ा किसी भी वजह से हो सकता है. दो टूक कहा जाए तो भिखारी भी कर्म की खाता है, किस्मत की नहीं यानी यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है कि सोते हुए शेर के मुंह में शिकार खुद नहीं आता, उस के लिए शेर को भी मेहनत यानी शिकार करना पड़ता है.

दीवाली का त्योहार, दरअसल, अर्थप्रधान है और लगभग व्यापारियों का है जो सालभर का हिसाबकिताब लगाते नफानुकसान देखते हैं व मुनाफे की ज्यादा से ज्यादा गुंजाइशों व aतौरतरीकों पर गौर करते हैं. इस सच का दूसरा चिंतनीय व खतरनाक पहलू किस्मत नाम का प्रचलित शब्द है जिसे दीवाली की रात लगभग 50 फीसदी लोग आजमाते हैं. उन का मकसद यह जानना रहता है कि अगले साल पैसों के मामले में उन की स्थिति यानी किस्मत कैसी होगी. इसी आजमाइश में कई लोग आदतन जुआरी भी बन जाते हैं. ये वे लोग हैं जो कर्म से ज्यादा भाग्य में भरोसा करते हैं. इस भाग्य का सार यह है कि जो ऊपर वाले ने लिख दिया है वही भाग्य है. इसे कोई बदल नहीं सकता. इस बाबत ऐसेऐसे तर्क दिए जाते हैं कि अच्छेअच्छे लोग चकरा जाते हैं कि बात तो सही है कि एक झटके में राजा नल जैसा चक्रवर्ती सम्राट जब कंगाल हो सकता है और उस की पूरी कहानी महाभारत में मौजूद है, तो कुछ तो होता ही होगा.

मूर्खता और अंधविश्वास राजा नल जुआ खेलता था लेकिन राजपाट उस ने अपने पराक्रम व युद्ध कौशल से हासिल किया था. भाग्यवादी लोग यह सोचने की जहमत नहीं उठाते कि जुए में सिर्फ कमाया हुआ धन गंवाया जा सकता है, कमाया नहीं जा सकता, क्योंकि यह कोई उद्योग या व्यापार नहीं है. दीवाली पर जुआ खेलना एक ऐसा ही घातक रिवाज है जो हर साल कई घर उजाड़ देता है और अच्छीखासी जिंदगी जी रहे लोगों को कंगाल बना देता है. ये लोगबाद में सालभर कर्ज और उधारी ले कर अभावों की जिंदगी जीते हैं और हर समय अफसोस करते नजर आते हैं कि अगर किस्मत आजमाने या शगुन करने के लिए जुए की फड़ पर नहीं बैठे होते, तो मुंह छिपा कर जीने के ये दिन नहीं देखने पड़ते.

महाभारत के इन राजा नलों पर ज्यादा तरस उस वक्त आता है जब वे फिर किस्मत आजमाने के चक्कर में दीवाली की रात जुए की फड़ पर नजर आते हैं यह सोचते हुए कि शायद इस साल जीत जाएं. इन का वह जीतने वाला साल कभी नहीं आता तो वाकई इन के हौसले की दाद देनी पड़ेगी. यह जुआ, दीवाली का शगुन या फिर कह लें कि दांव लगा ले… वाली मानसिकता आखिर आई कहां से? इस सवाल का जवाब साफ है कि यह लत या ऐब कुछ भी कह लें, धर्म की देन है. इसलिए भी लोग बेखौफ हो कर जुआ खेलते हैं. कहा जाता है कि शंकर ने अपनी पत्नी पार्वती के साथ जुआ खेला था. तभी से दीवाली पर जुआ खेलना एक रिवाज बन गया. ऐसे और भी काल्पनिक उदाहरण पौराणिक ग्रंथों में इफरात से मिलते हैं जिन में सब से प्रचलित महाभारत काल का है कि पांडव अपनी पत्नी तक जुए में हार गए थे और खुद भी राजपाट सहित दांव पर लग गए थे. पर इस कहानी से लोग बजाय सबक लेने के, प्रेरणा लेते हैं. सो, इसे क्या कहा जाए?

पौराणिक काल में ताश के पत्ते ईजाद नहीं हुए थे, इसलिए जुआ पासों से या कौडि़यों से खेला जाता था. जितने भी जुए इन धर्मग्रंथों में वर्णित हैं वे बड़े दिलचस्प हैं कि आप चाहें तो जुए में सबकुछ हार सकते हैं और किस्मत अच्छी हो तो सबकुछ फिर से वापस भी मिल जाता है. धर्मग्रंथ रचने वाले कितने चालाक रहे होंगे, यह इन उदाहरणों से सहज समझा जा सकता है कि पैसा आता तो मेहनत से है, लेकिन जाता (र्दु)भाग्य से है यानी हर साल दीवाली पर फड़ों पर बैठे लोग भाग्य नहीं बल्कि दुर्भाग्य आजमा रहे होते हैं.

सालभर की अपनी मेहनत की कमाई भाग्य के नाम पर ताश के पत्तों के जरिए दूसरों को सौंप देना किस्मत की नहीं, बल्कि बेवकूफी की बात है. यही बेवकूफी करने को धर्मग्रंथों ने लोगों को इस तरह उकसाया व बरगलाया है कि वे आज भी नहीं सुधर रहे. पर सुधरना चाहें तो… लोग सुधर इसलिए नहीं पा रहे क्योंकि वे भाग्यवादी मानसिकता से पिंड खुद ही नहीं छुड़ाना चाहते. कितनी अजीब बात है कि महज भाग्यवादी बने रहने के लिए लोग लुटने तक को तैयार हैं, पर सुधरने को नहीं. कमाई यानी पैसों के प्रति उत्सुकता निहायत ही स्वाभाविक बात है लेकिन क्या ऐसा होता है कि आप कुछ न करें और रातोंरात अंबानी की तरह रईस बन जाएं.

यह बात भी जुए में किस्मत आजमा रहे लोग नहीं समझना चाहते कि धीरूभाई अंबानी एक बुद्धिमान व मेहनती कारोबारी थे. अब उन के बेटे मुकेश और अनिल भी उन के नक्शेकदम पर चल रहे हैं. सदियों से दीवाली पर लोग लक्ष्मीपूजन कर रहे हैं पर हालत उन्हीं की सुधरी है जिन्होंने मेहनत का दामन नहीं छोड़ा. पैतृक संपत्ति मिल जाना या करोड़ों की लौटरी खुल जाना जैसी अपवाद बातों की बकवास भी लोग नहीं समझते कि लौटरी भी एक जुआ ही है जिस में लाखों लोगों का रुपया किसी एक के पास चला जाता है. इसी लालच में लोग जुए की फड़ पर बैठते हैं जो कभी पूरा नहीं होता. पैतृक संपत्ति तो अधिकार है जिसे आप चाहें तो बनाए रखें या फिर एक रात में जुए की फड़ पर उड़ा दें, यह आप की मरजी और समझ की बात है. उड़ा देंगे तो फिर कभी हासिल नहीं कर पाएंगे, क्योंकि आप राजा नल या पांडवों जैसे पौराणिक पात्र नहीं हैं जिन की कहानी कोई वेद व्यास लिख रहा हो. आप की कहानी तो आप की मेहनत लिखती है जिस के लेखक आप खुद हैं.

सुधरना कोई मुश्किल काम भी नहीं, बशर्ते, यह बात समझ ली जाए कि किस्मत एक कोरा लफ्ज भर है और मेहनत एक ऐसी हकीकत है जो रोजरोज पलपल आप के पास होती है और आप को चलायमान रखने के साथ जीवन के तमाम सुकून, सुख और मिठास देती है. और भी हैं नुकसान जैसे होली पर खुदबखुद फूहड़ हंसीमजाक की इच्छा होने लगती है वैसे ही दीवाली पर अगर आप के भीतर का जुआरी यानी भाग्य का पुजारी सिर उठाए तो उसे तुरंत कुचल दें वरना वह आप को आर्थिक रूप से कुचल देगा. इस के लिए पहली अहम बात यह समझनी है कि पैसा कभी किस्मत से नहीं आता.

पैसा तो मेहनत से ही आता है. इस के अलावा भी दीवाली पर जुआ खेलने के कई और नुकसान हैं जिन्हें समझेंगे तो पता चलेगा कि आप अकेले खुद के नहीं, बल्कि कइयों के गुनाहगार हैं. उन में से पहले वे लोग हैं जो दीवाली पर जुए की फड़ सजाने के तमाम इंतजाम करते हैं. उन्हें शह देना किसी अपराध से कम नहीं कहा जा सकता. घंटों बैठे प्राकृतिक वेगों को रोकना कई बीमारियों को आमंत्रण देता है और हर कोई जानता है कि जुए के दौरान लोग कई व्यसनों का शिकार हो जाते हैं या जुआ खेलते वक्त इन्हें ज्यादा करते हैं, मसलन बीड़ी, सिगरेट, खैनी और तंबाकू के अलावा शराब का भी सेवन करना. हंसीखुशी, उल्लास और रोशनी का त्योहार अगर अपने परिवार के बजाय जुआरियों के साथ बिताया तो यह अपनों के साथ ज्यादती ही है. दीवाली पर कई फड़ोें पर पुलिस छापे पड़ते हैं और लोग जेल की हवा भी खाते हैं.

क्या आप उन में शामिल होना चाहते हैं? जाहिर है नहीं, क्योंकि कोई अदालत यह नहीं मानेगी कि चूंकि शिव और पार्वती भी जुआ खेलते थे, इसलिए हमें भी छूट दी जाए यानी किस्मत को आजमाने के शौक की सजा आप के पूरे परिवार को भुगतनी पड़ेगी. उस पत्नी की हालत किसी द्रौपदी से कमतर तो नहीं मानी जा सकती जो दीवाली के दूसरे दिन सुबह किसी थाने में खड़ी अपने पति की जमानत के लिए भागादौड़ी कर रही हो. यही बात भाइयों, मातापिता और बच्चों पर भी लागू होती है. जुए की तमाम फड़ों पर क्यों इतनी सहूलियतें दी जाती हैं कि कई जगह पर तंबाकू थूकने के लिए पीकदान तक रखे जाते हैं, सिर्फ इसलिए कि वहां बेईमानी होती है. जो लोग इस काम को अंजाम देते हैं, सुबह आप उन्हीं से घर जाने के लिए पैसे मांगते हैं. इसे भाग्य कहें तो शौक से कहें और फिर यह कतई हर्ज की बात नहीं. लेकिन पेयर, को ‘ट्रेल’ और ‘कच्ची’ को ‘पक्की सीक्वेंस’ बनाने में माहिर लोग घंटों आप की सालभर की बचत हड़प लेते हैं और आप मुंह ताकते रह जाते हैं.

पौराणिक किस्सेकहानियों में यही बताया गया है कि पांडव राजा नल और कृष्ण का बड़ा भाई बलदेव बेईमानी की वजह से हारे थे. दरअसल, जुआ और बेईमानी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. यह वही बचत या कमाई होती है जो आप ने सालभर मेहनत कर व्यापार या नौकरी से बनाई होती है. इसे हासिल करने के लिए कितनी मेहनत आप को करना पड़ी थी, यह एक बार सोच पाएं तो शायद किस्मत नाम की बेवकूफी पर से आप का यकीन उठ जाएगा, यानी गलतफहमी दूर हो जाएगी. अपशगुन बनता शगुन जुए की मानसिकता अब नएनए तरीकों से भी सामने आने लगी है जो और ज्यादा चिंता की बात है कि अब लोग घरों में बैठ कर शगुन करने लगे हैं. इन अस्थायी घरेलू फड़ों पर महिलाएं भी बैठी नजर आने लगी हैं. चूंकि औरतें कमाने लगी हैं, इसलिए उन्हें भी लुटने का हक दिया जाने लगा है. वे विरोध न करें, इसलिए उन्हें भी जुए में शामिल किया जाने लगा है. भोपाल के एक ऐसे ही संपन्न परिवार के मुखिया से जब इस बारे में बात की गई तो वे बड़ी शान से बोले कि इस में हर्ज क्या है अगर सभी लोग, घनिष्ठ दोस्त या रिश्तेदार जुआ खेलें. इस से फायदा यह होता है कि पैसा घर में ही रहता है और शौक या शगुन कुछ भी कह लें, पूरा हो जाता है. इन महाशय को कौन बताए कि वे बच्चों को तो आईएएस, डाक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं पर दरअसल जुआरी बनने की कोचिंग दे रहे हैं. अब अगर यही आदर्श नई पीढ़ी को देना है तो उन्हें कुछ बनने के लिए किस्मत के भरोसे छोड़ देना ज्यादा सटीक होगा. इन सज्जन को जब यह बताया गया कि इसी साल 2 छापों में पुलिस ने महिलाओं को भी जुआ खेलते हुए गिरफ्तार किया है, वे भी बड़े घरों की थीं, तो वे सोचने को मजबूर हो गए कि लत तो लत है, और अकसर घर से ही लगती है, जैसे उन्हें लगी थी. घंटों सांस रोक कर एक अनिश्चितता में बैठने की जुआरी मानसिकता में आ रहीं घर की लक्ष्मियों को जुआरिनें कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं.

यह अगर आधुनिकता है तो जल्द ही वे थाने व हवालात में नजर आएंगी. इसलिए इस मानसिकता, शौक या लत से बचें और अपनी मेहनत की खुद इज्जत करें. ऐसा करेंगे तो आप कई झंझटों से बच जाएंगे. इस दीवाली प्रण कर लें कि अपनी किस्मत मेहनत से बनाएंगे, जुआ खेल कर उसे बिगाड़ेंगे नहीं. द्

दीवाली विशेष : त्योहारों पर धर्म का कब्जा, पूजा के बहाने पंडों की मौज

हिंदुओं का त्योहार, मुसलमानों का त्योहार, ईसाइयों का त्योहार और सिखों का त्योहार. त्योहार धर्मों में बंटे हुए हैं. हर धर्म के त्योहार अलगअलग हैं. एक धर्म को मानने वाले लोग दूसरे के त्योहार को नहीं मानते. धर्मों की बात तो अलग, एक धर्म में ही इतने विभाजन हैं कि एक धर्म वाले सभी उत्सव एकसाथ मिल कर नहीं मनाते. एक ही धर्म में अलगअलग वर्गों और जातियों के छोटेमोटे उत्सव भी बंटे हुए हैं.

हिंदुओं के त्योहार मुसलमान, ईसाई ही नहीं, नीचे करार दिए गए हिंदू ही मनाने से परहेज करते हैं. मुसलमानों में शिया अलग, सुन्नी अलग, ईसाइयों में कैथोलिक और प्रोटेस्टैंट की अलग धुन है. हर धर्म में भेदभाव, ऊंचनीच है. श्रेष्ठता और छोटेबड़े की भावना है. यह हमारे त्योहारों के विभाजन की सचाई है यानी त्योहारों पर धर्म ने पूरी तरह कब्जा कर लिया है.

होलीदीवाली जैसे त्योहारों पर धर्र्म की इस कदर पैठ है कि त्योहारों के मूल स्वरूप ही बदल गए हैं. त्योहारों में धर्म के पाखंडी कर्मकांड, दिखावा, नफरत, भेदभाव और हिंसा हावी हो रही है. धर्म ने उत्सवों को कटुता का पर्याय बना दिया है, अलगअलग समुदायों में विभाजित समाज के बीच पाखंडों को अपनाने की होड़ पैदा कर दी है. त्योहारों की मिठास धर्म के वर्चस्व से खट्टेपन में बदल गई है.

त्योहारों पर धर्म के कब्जे ने सामाजिक मेलमिलाप, एकता और समरसता की खाई पाटने के बजाय और चौड़ी कर दी है. एकता, समन्वय और आपस में जुड़ने का संदेश देने वाले त्योहारों के बीच मनुष्यों को बांट दिया गया है. इस विभाजन की वजह से त्योहार अब सामाजिक मिलन के वास्तविक पर्व सिद्ध नहीं हो पा रहे हैं. त्योहार के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक महत्त्व को भूल कर धार्मिक, सांस्कृतिक पहलों को सर्वोपरि मान लिया गया है.

धार्मिक पात्रों को त्योहारों से जोड़ कर कहानियां बना दी गई हैं. दीवाली को लक्ष्मीपूजा से, पांडवों के जुआ खेलने और राम के लंका जीत कर आने पर खुशी मनाने के तौर पर कहानियां प्रचलित हैं. इसी तरह होली का त्योहार प्रह्लाद और होलिका से जोड़ दिया गया.

धनतेरस, गोवर्धन पूजा, कृष्ण जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, नवरात्र, दुर्गापूजा, छठपूजा, ये सब धर्म से जुड़े हुए हैं. रक्षाबंधन का किसी देवीदेवता से संबंध नहीं है, फिर भी पंडों ने राखी बांधने का शुभमुहूर्त बताने का सर्वाधिकार अपने पास सुरक्षित रख लिया ताकि लोग उन के पास पवित्र मुहूर्त पूछने जाएं और साथ में उन के लिए फलफूल, मिठाई, वस्त्र और नकद दानदक्षिणा ले जाना न भूलें.

दीवाली पर जुआ खेलना अनिवार्य करार दिया गया है. धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए कहा गया है कि दीवाली की रात कौरवपांडवों ने जुआ खेला था.

त्योहार अब धर्म के कारोबारियों के औजार बन गए हैं. जाहिर है कि विद्वेष, भेदभाव की जड़वत मान्यताओं को त्योहारों के जरिए और मजबूत किया जा रहा है.

धर्म की खाने वालों ने इन पर कर्मकांड की ऐसी चाशनी लपेट दी है कि लोग बगैर शुभ घड़ी, मुहूर्त, विधि जाने त्योहार मनाने की भूल नहीं कर सकते. त्योहारों पर पूजापाठ, हवनयज्ञ जैसे कर्मकांड जरूरी कर दिए गए ताकि पंडों की जरूरत पड़े और दानदक्षिणा के नाम पर उन की दुकानदारी चलती रहे.

दीवाली पर लक्ष्मीपूजन के नाम पर पंडों की मौज रहती है. लक्ष्मी अर्थात धनसंपत्ति के आगमन के लिए पूजापाठ, मंत्रसिद्धि जैसे प्रपंच रच दिए गए हैं. मंदिर जा कर देवदर्शन करना, पूजा का मुहूर्त, विधिविधान जानना अनिवार्य बना दिया गया है, इसलिए लोगों का पंडित के पास जाना जरूरी हो जाता है.

दीवाली मिलन और एकता का संदेश देने वाला सब से प्रमुख त्योहार है. यह सामूहिक उत्सव है. यह व्यक्तिगत तौर पर नहीं, सामूहिक रूप से मनाया जाता है.

हर त्योहार की खुशियों में अंधविश्वास का अंधेरा भर दिया गया है. त्योहारों में जुआ खेलना, नशाखोरी, ध्वनि व वायु प्रदूषण और धार्मिक, जातीय उन्माद पैदा करने जैसी विकृतियां धर्म की घुसपैठ की वजह से ही हैं. इन बुराइयों को धर्म ही प्रश्रय देता है.

धन के आगमन और समृद्धि की उम्मीदों के तौर पर मनाए जाने वाले दीवाली उत्सव का महत्त्व धन से नहीं है, इस का संबंध सारे समाज की एकता, प्रेम, सामंजस्य, मिलन के भाव से है.

समाज को बांटता धर्म

पर्वों पर धर्म के कब्जे से समाज बंट गया है. दीवाली वैश्यों, विजयदशमी क्षत्रियों, रक्षाबंधन ब्राह्मणों और होली शूद्रों में बांट दी गई है.

त्योहारों को संकीर्ण धार्मिक मान्यताओं के दायरे में समेट कर संपूर्ण समाज की एकता में धर्म, जाति, वर्ग की बाधाएं खड़ी कर दी गई हैं, इसलिए जरूरी नहीं कि एक ही धर्म के सभी लोग उस त्योहार को मनाएं ही. त्योहारों की रौनक पर प्रेम, भाईचारे में आई कमी का कुप्रभाव पड़ा है.

जरूरी नहीं है कि किसी त्योहार के बारे में गढ़ी हुई मान्यताओं में हर कोई यकीन करे. अगर किसी को किसी मान्यता, परंपरा में यकीन नहीं है, तो निश्चित ही तकरार होगी. दीवाली को लंका पर विजय के बाद राम के अयोध्या आगमन की खुशी का प्रतीक माना जाता है तो कुछ जगहों पर रावण के पूजक भी हैं जो राम को अपना आदर्श नहीं मानते.

त्योहारों पर गढ़ी गई मान्यताओं को धर्र्म से जोड़ने से समाज के सभी वर्गों के लोग एकसाथ परस्पर जुड़ा हुआ महसूस नहीं करते. कहने को धर्म को कितना ही प्रेम, शांति, करुणा का प्रतीक कहा जाए पर हकीकत में धर्म ने सामाजिक भेदभाव, बैर, नफरत, हिंसा को बढ़ाया है.

त्योहार जीवन में सुखद परिवर्तन लाते हैं, हर्षोल्लास व नवीनता का संचार करते हैं. दीवाली पर परिवार के साथ स्वादिष्ठ पकवान और रोशनी के आनंद के साथसाथ मित्रों, रिश्तेदारों से अपने संबंधों को नई ऊर्जा प्रदान करें.

उत्सव सामूहिक होने चाहिए. धर्म समाज को बांटता है, इसलिए त्योहारों पर धर्म का कब्जा होने से सामूहिक  एकता नहीं रहती. त्योहारों को सभी वर्गों के साथ मनाने से सामाजिक एकता में प्रगाढ़ता आती है.

त्योहारों में मिलजुल कर खुशी मनाने के भाव होते हैं. इन अवसरों के कारण हम अपने मित्रों, परिवारजनों, शुभचिंतकों से भेंट कर प्रेम, स्नेह का आनंद अनुभव करते हैं, उत्साहित होते हैं. और चिंताओं, दबावों को भूल कर एक नई चेतना, उमंग, उल्लास पा कर अपने भीतर एक नई ऊर्जा का एहसास करते हैं.

हर दौर में त्योहार हमें वह अवसर देते हैं कि हम अपने जीवन में सुधार कर प्रसन्नता से सराबोर हो सकें, कुछ समय सादगी के साथ अपनों के साथ बिता सकें ताकि हमें शारीरिक व मानसिक आनंद प्राप्त हो सके. त्योहार मनुष्य के जीवन में उत्साह का संचार करते हैं. यह उत्साह उस के मन में सदैव कायम रहता है. जीवन में गति आती है. लोग जीवन में सकारात्मक रवैया रखते हैं. उत्सव की यही खुशबू जीवनभर खुशी प्रदान करती है.

पर्वों को मानवीय मिलन का प्रतीक माना गया है. यह किसी धर्म की संकीर्ण बंदिशों में बंध कर भेदभाव की दीवार खड़ी करने का जरिया नहीं है. उत्सवों का प्रचलन निश्चित रूप से आपसी प्रेम, सौहार्द, मिलन  और एकता के लिए ही हुआ था.

धर्म की घुसपैठ ने त्योहारों की सामूहिक एकता को तोड़ने का काम किया है. क्या हमें सोचना नहीं होगा कि सामाजिक, पारिवारिक विघटन क्यों हो रहा है, धर्मों में विद्वेष क्यों फैल रहा है, त्योहार सौहार्द के विकास में सहयोग क्यों नहीं कर रहे हैं?

त्योहार का उद्देश्य अंधकार दूर करना होना चाहिए. जब घरपरिवार, समाज में प्रेम, सद्भाव ही नहीं रहेगा तो कैसा उत्सव?

लीरा द सोलमेट : बेहतरीन वीएफएक्स से सजी अंतरिक्ष की प्रेम कहानी

प्यार किसी भी तरह की सीमाओं को नहीं मानता. वह अपनी जिंदगी के प्यार की तलाश में एक अंतरिक्ष से दूसरे अंतरिक्ष तक की यात्रा करता है. इसी बात को चित्रित करने वाली अंतरिक्ष की प्रेम कहानी वाली फिल्म है – ‘‘लीरा द सोलमेट’’. यह भारत की पहली सौ प्रतिशत वीएफएक्स फिल्म है. इसे आईटीएम यूनिवर्सिटी द्वारा ‘‘सर्वश्रेष्ठ वीएफएक्स’’ के लिए पुरस्कृत किया जा चुका है.

यह कहानी है आकाशगंगा में विचरते तमाम ग्रहों, उपग्रहों की पृष्ठभूमि में कहानी चलती है. यह कहानी है अंतरिक्ष शोधकर्ता लीरा (लीरा कालजय) की. भारतीय संस्कृति में पली बढ़ी और भारतीय संस्कृति में आकंठ डूबी लीरा को पता चलता है कि उसका सोलमेट लीरा नामक अंतरिक्ष में रहता है. तब लीरा अंतरिक्ष शोधकर्ता के रूप में अंतरिक्ष यात्री बनकर लीरा नामक ग्रह पर पहुंचती है. और वह अपने सोलमेट (मेहुल आडवाणी) को ढूढ़ने में कामयाब होती है. क्योकि सोलमेट में कई समानताएं होती हैं.

इसी तरह लीरा और उसके सोलमेट में समानता है कि दोनों की जीभ उनकी नाक तक पहुंचती है. मजेदार बात यह है कि अंतरिक्ष यात्री लीरा और लीरा ग्रह पर मौजूद पुरुष की जीभ उनकी नाक तक पहुंचती है. दोनों भारतीय संस्कृति में यकीन करते हैं. दोनों का स्वभाव भी एक जैसा है. यानी कि दो प्लानेट के लोगों की प्रेम गाथा है. पूरी कहानी अंतरिक्ष मे प्रेम को दर्शाती है. यह अंतर्मन के प्यार की बात करती है.

दो प्लानेट यानी कि अंतरिक्ष के प्रेमियों का मिलन, आपस में  संवाद करना, प्रेम गीत गाना आदि को शानदार ढंग से परदे पर उभारने में वीएफएक्स का बहुत सही ढंग से उपयोग किया गया है.

फिल्म में प्रेम कहानी के साथ रोमांचक पल भी हैं. भावनात्मक दृश्य आकर्षित करते हैं. फिल्म में सोलमेट को परिभाषित करने वाले संवाद भी हैं. मसलन-यूनिवर्स में जिस किसी की भी जीभ उसकी नाक तक पहुंचेगी, वो मेरा सोलमेट तो नहीं हो सकता न?

जहां तक अभिनय का सवाल है तो लीरा कालजय और मेहुल अडवाणी दोनों ने अपने किरदारों के साथ पूर्णरूपेण न्याय किया है. फिल्म का हर दृश्य लाजवाब व शानदार है. फिल्म में अद्भुत रोमांस भी है. फिल्म की कहानी कभी गुदगुदाती है तो कभी अचंभित करती है.

Leera the Soulmate film review

फिल्म का गीत संगीत आकर्षित करता है. फिल्म का शीर्ष गीत ‘‘तुम्ही तो मेरी सोलमेट हो, गौड की भेंट हो मेरे लिए..’’ काफी पसंद किया जा रहा है.

बौलीवुड की पहली वीएफएक्स फिल्म ‘‘लीरा द सोलमेट’’ के निर्माता व निर्देशक डां. सुमनेश श्री कालजय, कौंसेप्ट ऊषा कालजय, गीत व संवाद लेखक ऊषा कालजय हैं. तथा कलाकार हैं-  लीरा कालजय, मेहुल आडवाणी व दो सौ कलाकार.

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