धर्म अपनेआप में एक धंधा है और ऐसा धंधा है जिस में बचपन से ही ग्राहकों को जीवनभर के लिए लौयल्टी प्रोग्राम के लिए सदस्य बना लिया जाता है और बहुत सी सेवाएं उसी धर्म की लेनी पड़ती हैं. धंधे की तरह हर सेवा की कीमत देनी पड़ती है. कुछ भी मुफ्त नहीं है. क्रैडिट कार्डों के लौयल्टी प्रोग्रामों की तरह धर्म की लौयल्टी में भी हजारों नियमउपनियम होते हैं. शुरू में हर धंधे की तरह हर धर्म बड़े सपने दिखाता है पर जब ग्राहक पक्का हो जाए तो आंखें तरेरने लगता है.

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