भारतीय रेलवे ने इस साल भी अपने कर्मचारियों को खासा दीवाली बोनस दिया है पर शायद ही कोई कर्मचारी मानेगा कि यह बोनस उस का भाग्य नहीं कर्र्म यानी उन ड्यूटियों का पुरस्कार था जो उस ने मौसमों की परवा न करते हुए सालभर दिनरात एक कर के की थीं. बोनस एक तरह की कमाई ही है जो हर किसी को अलगअलग तरह से मिलती है. बोनस उन लोगों को नहीं मिलता जो कहीं काम न करते हों. हां, काम का स्तर छोटाबड़ा किसी भी वजह से हो सकता है. दो टूक कहा जाए तो भिखारी भी कर्म की खाता है, किस्मत की नहीं यानी यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है कि सोते हुए शेर के मुंह में शिकार खुद नहीं आता, उस के लिए शेर को भी मेहनत यानी शिकार करना पड़ता है.

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