यौनशोषण से आजिज आ कर पीडि़त महिलाओं ने हिम्मत दिखानी शुरू कर दी है. उन की इस हिम्मत को मी टू नाम दिया गया. मी टू यानी मैं भी. अमेरिका से शुरू हुए इस मी टू अभियान में अब भारत की पीडि़ताएं भी शामिल हो गई हैं.

यौनशोषण के किस्से, हालांकि भारत में धार्मिक कहानियों में भरे पड़े हैं. धर्म और पुरुषप्रधान समाज शोषण के लिए हमेशा नारी को ही जिम्मेदार मानता रहा है. शोषण की शिकार नारी को ही अपराधभाव से देखा जाता था. महिला अपने अपराधभाव से मुक्त होने के लिए पुरुष की शरण में जाने को मजबूर होती थी.

अहल्या जैसे उदाहरण तमाम हैं. मी टू अभियान यौनहिंसा का शिकार हो रही महिलाओं को पत्थर बनने से रोक सकता है. महिलाओं को पद, प्रभाव और बाहुबल से भले ही दबा लिया गया हो, लेकिन अब सोशल मीडिया पर उन की आवाज को समर्थन देने वालों की कमी नहीं है. यह बात और है कि इस से महिलाओं की तरक्की प्रभावित हो सकती है.

विदेशों से शुरू हुआ मी टू कैंपेन अब देश में लोगों की नींद उड़ा रहा है. फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर पर आरोप लगने के बाद मी टू कैंपेन के निशाने पर दूसरे लोग भी आ गए. इन में फिल्म जगत से आलोक नाथ, विकास बहल, साजिद खान, वरुण ग्रोवर, सुभाष घई, श्याम कौशल, कैलाश खेर और राजनीतिक हस्तियों में निर्वतमान विदेश राज्यमंत्री व पूर्व पत्रकार एम जे अकबर शामिल हैं.

कुछ के खिलाफ तो कईकई लोगों ने आरोप लगाए हैं. इस का कानूनी प्रभाव पडे़ न पडे़ पर सामाजिक प्रभाव तेजी से पड़ रहा है. कुछ संस्थाएं भी ऐसे मामलों को ले कर चर्चा में आ गईं.

महाराष्ट्र महिला आयोग और सिने ऐंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन यानी सिंटा ने नाना पाटेकर को अभिनेत्री तनुश्री दत्ता के आरोपों की जांच के लिए अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी कर दिया. अभिनेता नाना पाटेकर पर तनुश्री ने 10 साल पहले एक फिल्म की शूटिंग के दौरान यौनशोषण का आरोप लगाया है.

आलोक नाथ पर विंता नंदा और अभिनेत्री संध्या मृदुल समेत कई टीवी कलाकारों ने यौनशोषण का आरोप लगाया. ट्विटर पर अपनी लंबी पोस्ट में संध्या ने विस्तार से पूरी घटना को लिखा और अपनी बेबसी का जिक्र किया. गायक  कैलाश खेर पर सिंगर सोना महापात्रा ने ऐसे ही आरोप लगाए. सोना ने बताया कि कैलाश ने उन को गलत तरीके से छूने की कोशिश की.

फिल्मों के बारे में यह माना जाता था कि लोग प्रचार पाने के लिए ऐसी बातें कह देते हैं, लेकिन विख्यात पत्रकार  और मोदी सरकार में पूर्व विदेश राज्यमंत्री एम जे अकबर पर लगे आरोप सस्ती पब्लिसिटी के दायरे से बाहर के हैं. इस की अपनी वजह यह है कि एम जे अकबर पर लगे आरोप उस समय के हैं जब वे मीडिया हाउस में वरिष्ठ पत्रकार थे.

आखिरकार मी टू अभियान की यह मुहिम एम जे अकबर को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा गई. कोर्ट में सुनवाई होने से पहले ही उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.

मी टू कैंपेन के पक्ष और विपक्ष में लोग लामबंद होने लगे हैं. फिल्म अभिनेत्री ऐश्वर्या राय बच्चन और काजोल ने कहा कि लोगों की बातों से पता चलता है कि सोशल मीडिया के जमाने में अब यह पता चल गया कि किसी की आवाज को दबाया नहीं जा सकता. अच्छी बात यह है कि ऐसे कैंपेन को समाज महत्त्व दे रहा है. ऐसे कैंपेन से यौनशोषण के कलंक को दूर करने में मदद मिल रही है. लोग अब बिना हिचक अपनी बात कह रहे हैं.

दोनों ने जोर देते हुए कहा कि मी टू कैंपेन ने लोगों को खुल कर बोलने की हिम्मत दी है. पहले यह माना जाता था कि खुल कर बोलने से बदनामी का खतरा होता है. ऐसे में महिलाएं चुप रहेंगी. अब यह धारणा टूट रही है. सैक्स और उस से जुडे़ शोषण पर लड़कियां खामोश रह जाती थीं. लेकिन अब उन का डर निकल जाएगा. दूसरी ओर, जो पुरुष यह सोचते थे कि महिला अपनी बदनामी के डर से चुप रह जाएगी, वे भी थोड़ा डरेंगे. यह बात सच है कि लड़कियां यौनशोषण का शिकार होती रही हैं. पद और प्रभाव का प्रयोग भारत में सब से अधिक होता है. ऐसे प्रभावशाली लोगों को भले ही कोर्ट से सजा न मिले पर अब सोशल मीडिया के प्लेटफौर्म पर मामला उठने से उन के मन में डर बैठ गया है.

कुछ लोग मानते हैं कि मी टू कैंपेन से स्त्रीपुरुष के बीच की दूरियां बढे़ंगी जिस से कार्यस्थल पर एकसाथ काम करना मुश्किल होगा. ऐसे विवाद अभी भले कोर्टकचहरी से दूर लग रहे हों पर भविष्य में ये वहां भी  पहुंचने लगेंगे. ऐसे में सामाजिक स्तर पर नए बदलाव शुरू हो सकते हैं. भारत जैसे देश में जहां बातबात पर नैतिकता की दुहाई दी जाती है, वहां पर ऐसे आरोप किसी का कैरियर या साख समाप्त करने के लिए काफी होते हैं. कोर्टकचहरी में सफाई देने में तो सालों गुजर जाएंगे. ऐसे में तब तक बदनामी का यह दाग चरित्र पर चिपका रहेगा.

विदेशी मुहिम का असर

औस्कर अवार्ड विजेता निर्माता हार्वे विंस्टीन ने जब यह स्वीकार किया कि एक अभिनेत्री द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं तब बहुत सारी दूसरी औरतें मी टू यानी मैं भी कहने के लिए खड़ी हो गईं. अमेरिकी समाज में महिलाओं ने भले ही यह स्वीकार कर खुलेआम इस अभियान को चलाया हो पर भारत में अभी भी ज्यादातर महिलाएं इस विषय पर खुल कर बात नहीं करना चाहतीं. भारत में मी टू कैंपेन को चलाने वाली महिलाओं की संख्या कम और औफ द रिकौर्ड बात करने वाली महिलाओं की संख्या अधिक है.

फिल्म और फैशन की दुनिया में बात करने पर पता चलता है कि यहां के हालात बहुत ज्यादा गंभीर हैं. यहां मी टू को मुद्दा बनाना आसान नहीं है. यह कई तरह की बाधाएं खड़ी करने वाला कैंपेन हो सकता है. शायद यही वजह है कि भारत में इस कैंपेन को लोगों ने पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है.

मी टू के जरिए समाज की पोल खुल रही है. सफल महिलाएं बता रही हैं कि उन्हें भी कभी न कभी यौनशोषण का शिकार होना पड़ा. मी टू का मतलब छेड़छाड़ जैसी घटनाओं से जुड़ा है. पहले इन बातों को लोग छिपाते थे, अब बताने लगे हैं. कहा यह जा रहा है कि मी टू कैंपेन के चलते महिलाओं से छेड़छाड़ की घटनाएं रुकेंगी.

अमेरिका जैसे देश में जहां छेड़छाड़ को छिपाया नहीं जाता, वहां भी ये घटनाएं घट रही हैं. भारत से ले कर अमेरिका तक मी टू अभियान में ज्यादातर मामले फिल्मी दुनिया के ही आ रहे हैं. कुछ मामले महिला खिलाडि़यों के हैं. हार्वे विंस्टीन के खिलाफ महिलाओं के यौन उत्पीड़न का मामला सुर्खियों में है. बताया जाता है कि विंस्टीन फिल्म अभिनेत्रियों को यौनशोषण के लिए मजबूर करते थे.

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जज ने अपने बयान में कहा कि उन के 50 से अधिक महिलाओं से संबंध रहे हैं. जज बिल ओ नील ने यह फेसबुक पर शेयर किया था. नील गवर्नर पद के लिए डैमोक्रेटिक उम्मीदवार थे. नील ने फेसबुक पर लिखा कि वे गवर्नर पद के उम्मीदवार के तौर पर अपने विरोधियों का रिसर्च टाइम कम कर देना चाहते हैं.

नील ने बताया कि उन के पिछले 50 सालों में 50 बेहद सुंदर महिलाओं से यौन संबंध रहे हैं. 70 साल के जज नील ने 2 महिलाओं के नाम लिख कर इस बात का जिक्र किया था.

नील ने लिखा कि इन खूबसूरत 50 महिलाओं में निजी सचिव से ले कर सीनेटर तक शामिल हैं. नील ने एक सीनेटर को अपना पहला और सच्चा प्यार बताया. नील के इस बयान की बाद में आलोचना भी हुई. तब नील ने माफी भी मांगी.

कैंपेन से उजागर हुआ सच

अमेरिका में पिछले दिनों यौनशोषण के कई मामले सामने आए. इन में कई जानेमाने लोग शामिल थे. भारत में कई अभिनेत्रियों ने इस मुहिम का हिस्सा बनते हुए बताया कि वे मी टू की शिकार हुई हैं. असल में भारत में इस का केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए प्रयोग नहीं किया गया बल्कि यहां भी वर्कप्लेस पर ऐसी घटनाएं घटी हैं. देश में इन का रूप बदला हुआ है. यही वजह है कि इसे छेड़छाड़ तक ही सीमित रखा गया.

फिल्मी दुनिया से ले कर राजनीति और दूसरे हल्कों में ऐसे किस्से दबीजबान कहेसुने जाते रहे हैं. फिल्मी दुनिया में इसे कास्ंिटग काउच और कंप्रोमाइज का नाम दिया गया. यहां हीरो ही नहीं, फिल्म निर्माता और निर्देशकों पर भी ऐसे आरोप लगे जिस में फिल्मों में काम देने के बहाने यौन संबंधों के लिए दबाव बनाया गया.मी टू कैंपेन के बहाने ऐसे आरोप अब खुल कर सामने आ रहे हैं.

देश में इस तरह की घटनाएं तब सामने आती हैं जब कोई घटना घट जाए. केवल फिल्मों में ही नहीं, राजनीति में भी ऐसी घटनाओं की लंबी फेहरिस्त है. यौनशोषण से शुरू हुई घटनाएं हत्या जैसे जघन्य अपराधों में बदल गईं. उत्तर प्रदेश में मधुमिता और कविता चौधरी हत्याकांड इस के प्रत्यक्ष उदाहरण रहे हैं. कई दूसरे नेताओं के महिला नेताओं से संबंध चर्चा का विषय रहे हैं. यह बात और है कि हमारे देश में इसे खुल कर स्वीकार नहीं किया जाता.

देश में जब सोशल मीडिया पर मी टू अभियान की शुरुआत हुई तो बहुत सारी महिलाएं सामने आईं, 2006 में शुरू हुए इस अभियान को 15 अक्तूबर, 2017 को अलाइशा मिलानो ने फिर से चर्चा में ला दिया. इस की चर्चा एम जे अकबर, नाना पाटेकर और आलोक नाथ पर आरोप लगने के बाद तेजी से शुरू हुई.

धर्म का असर

मी टू कैंपेन के पहले भी इस तरह की घटनाएं होती रही हैं. यह बात और है कि इन की चर्चा नहीं होती थी. भारतीय समाज में पुरुषवादी मानसिकता हावी है. हमारे धर्मग्रंथों में बताया गया है कि पुरुष का कोई दोष नहीं होता. हमारे जीवन पर धार्मिक कहानियों का बड़ा असर है. इन कहानियों में गौतम की पत्नी अहल्या से छल करने वाले इंद्र की जगह पर अहल्या को ही दोषी करार दिया जाता है. उसे ही पत्थर बनना पड़ा था. आज भी पुरुष का कोई दोष नहीं माना जाता है.

अहल्या ही नहीं, सीता की भी यही दशा रही. सीता का अग्निपरीक्षा के बाद भी सामाजिक बहिष्कार किया गया. ये कहानियां आज भी हमारे दिलोदिमाग पर हावी हैं. इसी वजह से शोषण का शिकार होने के बाद भी कोई महिला अपना मुंह नहीं खोलना चाहती. उसे इस बात का डर रहता है कि ऐसे मामले सामने आने के बाद लोग काम देना बंद कर देते हैं. बलात्कार या छेड़छाड़ की शिकार महिला को थाने से ले कर कचहरी तक शक की नजरों से देखा जाता है.

उस पर आरोप लगते हैं कि कपडे़ ठीक से नहीं पहने होंगे? अपनी ओर से पहल की होगी? देररात घूमने निकली होगी? सोशल मीडिया और फिल्म देखने से बिगड़ गई होगी? देश में छेड़छाड़ की बात तो जाने दीजिए, बलात्कार जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करवाना आसान नहीं होता है. जब लड़की को यह पता चलता है कि शिकायत के बाद उसे ही गलत समझा जाएगा तो वह हर शोषण सहने लगती है.

मी टू कैंपेन से लड़की में यह साहस आएगा कि वह भी अपनी बात कह सकती है. आज संध्या मृदुल, सोना महापात्रा, तनुश्री दत्ता और उन जैसी जो महिलाएं मी टू कैंपेन चर्चा में लाईं. उन के पास कुछ साल पहले ऐसा कोई प्लेटफौर्म नहीं था जहां वे अपनी बात रख सकें.

फिल्म अभिनेता जीतेंद्र पर आरोप लगाने वाली महिला ने कहा कि उस ने अपने मातापिता के मरने का इंतजार किया, क्योंकि उस की शिकायत से उन का सामाजिक जीवन प्रभावित हो सकता था. ऐसे में उस ने इतनेसाल मानसिक यातना में गुजार दिए. इन घटनाओं से समझा जा सकता है कि भारत में महिलाओं को अपनी बात कहने की आजादी नहीं है, खासकर यौनशोषण जैसे मुद्दे पर तो एकदम ही नहीं.

महिला मतलब शोषण का अधिकार

लड़की को देखते ही यह समझ लिया जाता है कि जैसे यह शोषित होने के लिए ही आई है. फिल्म और टीवी तो बदनाम हैं ही, स्कूलकालेज और औफिस तक में इस तरह की घटनाएं तेजी से घट रही हैं. लखनऊ की एक लड़की अभिनेत्री बनने व टीवी सीरियलों में काम करने के लिए मुंबई गई. वहां उस के सामने ऐसे प्रस्ताव आने लगे कि जब तक वह कंप्रोमाइज नहीं करोगी, उसे रोल नहीं मिलेंगे. वह कहती है, ‘‘प्रोड्यूसर से ले कर हीरो तक इस चाहत में रहते हैं. वे ऐसी अभिनेत्रियों की ही सिफारिश करते हैं जो उन के साथ संबंध बनाने को राजी हो.’’

हिंदी सिनेमा में यह कोई चर्चा का विषय नहीं रह गया है. मी टू कैंपेन के बाद ऐसे हालात वहां भी थम सकते हैं. अभी तक न्याय मिलना आसान नहीं था, अब सोशल मीडिया में चर्चा से लोगों में डर बैठ रहा है.

भोजपुरी फिल्म उद्योग की हालत सब से अधिक खराब है. वहां छोटेछोटे शहरों की लड़कियां काम करने को जाती हैं. पैसे से वे मजबूत नहीं होतीं और परिवार के लोग उन का साथ नहीं देते हैं. ऐसे में काम करना उन की मजबूरी हो जाती है. भोजपुरी फिल्मों में हीरो अपनी जोड़ी बना कर काम करते हैं. जो लड़की समझौता करती है उस की सिफारिश की जाती है. जो लड़की समझौते के लिए तैयार नहीं होती उस के साथ काम करने से मना कर दिया जाता है. इस बारे में आवाज उठाने वाली लड़कियों के लिए काम करने के रास्ते बंद हो जाते हैं.

बढेंगी दूरी

मी टू कैंपेन से आपस में दूरियां बढ़ने का खतरा भी बढ़ रहा है. ऐसे में महिलापुरुष के बीच आपसी व्यवहार में बदलाव आएगा. अभी तक इस तरह की घटनाएं सामने आई हैं कि जब अपनी आवाज उठाने वाली महिलाओं को हाशिए पर रखा जाने लगा.

एक लड़की बताती है, ‘‘मैं एक शौप पर काम करती थी. वहां मेरे साथ छेड़छाड़ की घटना हुई. मैं ने जब यह बात वहां के मालिक को बताई तो वे बात को दबाने में लग गए. मैं ने उन की बात को न मानते हुए पुलिस में रिपोर्ट कर दी. जब यह बात शौप के मालिक को पता चली तो मुझे मेरा बकाया वेतन दे दिया गया और न आने के लिए कह दिया गया. जब मैं ने इस बारे में पूछा तो बहाना बनाया गया, कोई सही कारण नहीं बताया गया. वहां काम करने वाली दूसरी लड़कियों ने मुझे बताया कि मेरी रिपोर्ट के बाद शौप की इमेज खराब होने के खतरे के चलते मुझे हटाया गया है.’’

बलात्कार की शिकार एक लड़की ने ब्यूटीपार्लर चलाने के लिए शौप किराए पर ली. कुछ दिनों बाद मकानमालिक को जैसे ही इस बात का पता चला कि वह लड़की बलात्कार पीडि़त है, उस ने दुकान खाली कराने को कहा. हमारे समाज में लोग ऐसी लड़कियों से दूर रहना चाहते हैं जो शोषण जैसी घटनाओं का शिकार होती हैं. लड़कियों को ही गलत माना जाता है. यही वजह है कि समाज में बहुत सारी घटनाओं के होनेके बाद भी महिलाएं सामने आ कर कहने से बचती हैं. मी टू कैंपेन से ऐसी पीडि़ताओं का साहस बढे़गा.

यह बात केवल आम लोगों की नहीं है. संसद में जब महिला सुरक्षा बिल पास हो रहा था, कई नेताओं ने इस बात के तर्क दिए कि इस तरह का बिल आने के बाद लड़कियों को काम मिलने के अवसर कम हो जाएंगे. यह चिंता गलत नहीं थी. कौर्पोरेट वर्ल्ड में अघोषित पौलिसी बन गई जिस में लड़कियों की नौकरी औफिसवर्क के लिए रहेगी, टूरिंग जौब से उन को दूर रखा जाएगा.

कैरियर का संकट

एक कंपनी की एचआर मैनेजर ने बताया कि टूर के दौरान अगर लड़के हैं तो वे एक रूम में रह लेंगे. काम के समय देरी को ले कर कोई परेशानी भी नहीं होगी. लेकिन लड़कियों के होने से कंपनी को काम से ज्यादा चिंता लड़कियों की रखनी पड़ती है. उन की शिकायत पर कंपनी की छवि तो खराब होती ही है, कानूनी दांवपेंच में भी उसे फंसना पड़ता है. ऐसे में एचआर का प्रयास रहता है कि लड़कियों की जगह पर लड़कों को ही काम पर रखा जाए. इस से लड़कियों के सामने कैरियर के औप्शंस कम होते जा रहे हैं.

महिला अधिकारों को ले कर कडे़ कानून देश में बन रहे हैं. ऐसे में लोगों के अंदर यह भय बैठ गया है कि अगर वे महिलाओं के शोषण को ले कर कानूनी दांवपेंच में फंस गए तो परेशानी होगी. ऐसे में वे लड़की से दूरी बनाने की सोचेंगे. इस से एकसाथ बराबरी का दर्जा हासिल कर के काम करना मुश्किल हो जाएगा.

भारत में न्याय मिलने में लंबा समय लगता है. ऐसे में एक बार किसी के शोषण में फंसने का मतलब कैरियर खत्म हो जाना होता है. इस से लोग स्वाभाविक तौर पर विपरीतलिंगी से दूरी बनाने को मजबूर हो सकते हैं. ऐसे में मी टू के कारण कहीं न कहीं लड़कियों की तरक्की में बाधा आएगी.

बदलेगा समाज

मी टू का लब्बोलुआब यह है कि एक के बाद एक महिलाओं द्वारा यौनशोषण के बारे में खुल कर आरोप लगाने और नामी पुरुषों का उन आरोपों को नकारने से एक बात तय है कि कभी महिलाओं को डराता पुरुष अब उन से खुद डरने लगेगा. इस डर के नतीजे में पुरुष द्वारा महिलाओं को छेड़ने, डराने, यौनशोषण करने की घटनाओं में अब काफी कमी आएगी. महिलाओं के प्रति वे कुछ करने से पहले उस करतूत के अंजाम के बारे में बारबार सोचेंगे. ऐसे में समाज में यकीनन अच्छा माहौल बनेगा लेकिन स्त्री व पुरुष के बीच दूरियां भी पनप सकती हैं.

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