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Nepotism : राजनीति में वंशवाद सही नहीं पर स्वाभाविक

Nepotism : राजनीति में परिवारवाद का होना पूरी तरह लोकतांत्रिक है क्योंकि परिवारवाद से राजनीति में आने वाले किसी भी व्यक्ति को मामूली चुनाव जीतने के लिए भी जनता के वोट की जरूरत होती है. अगर कोई व्यक्ति अपने पिता या किसी रिश्तेदार की राजनीतिक विरासत को संभाल रहा है तो इस में गलत क्या है?

बाप से बेटे को विरासत में बहुतकुछ मिलता है. बाप की बनाई गई तमाम जिंदगी की कमाई उस की औलादों को मिलती है. पिता अगर गरीब है तो उस का बेटा अपने पिता की गरीबी का वारिस बनता है और अगर अमीर है तो उस की धनदौलत का वारिस बनता है. यह प्रचलन सदियों से है. राजतंत्र के दौर में रियासतों या देशों के हुक्मरान वंश के आधार पर ही तय होते थे लेकिन जनतंत्र आने के बाद वंशवादी हुक्मरानों पर रोक लग गई.

शासक जनता द्वारा जनता के बीच से तय होने लगे. लोकतंत्र में वंशवाद के लिए कोई जगह नहीं बची लेकिन लोकतंत्र में भाग लेने वाले दलों में वंशवाद खत्म नहीं हुआ. लोकतंत्र में इस वंशवादी परंपरा पर लगातार सवाल उठते रहे हैं.

क्या राजनीति में वंशवाद लोकतंत्र के लिए खतरा है

परिवारवाद की राजनीति का अर्थ होता है जहां सर्वोच्च कमान एक ही परिवार के पास हो जैसे कांग्रेस. कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरू के बाद से लगातार पार्टी की सर्वोच्च कमान नेहरूजी के वंशजों के हाथों में रही है. नेहरू के बाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और अब नेहरू की चौथी पीढ़ी के राहुल और प्रियंका गांधी कांग्रेस की कमान संभाल रहे हैं.

उद्धव की शिवसेना, शरद पवार की एनसीपी, ममता बनर्जी की तृणमूल, शिबू सोरेन की झामुमो, लालू प्रसाद यादव की राजद और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी इन जैसे तमाम क्षेत्रीय दलों को भी वंशवाद के आरोपों का सामना करना पड़ता है. परिवारवाद का आरोप सब से ज्यादा कांग्रेस को झेलना पड़ता है. जब भी मौका मिलता है, कांग्रेस की विरोधी पार्टियां खासकर बीजेपी वंशवाद को ले कर कांग्रेस को घेरने की कोशिश करती हैं.

24 अक्तूबर, 2024 को केरल के वायनाड से लोकसभा उपचुनाव के लिए जब कांग्रेस नेता प्रियंका वाड्रा ने नामांकन किया था तब भारतीय जनता पार्टी ने प्रियंका के इस नामांकन को ‘वंशवादी राजनीति की जीत और योग्यता की हार’ करार दिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हर चुनाव में कांग्रेस पर वंशवादी होने का आरोप लगाते हुए नजर आते हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी और अखिलेश यादव को ‘शहजादे’ शब्द से संबोधित किया था.

हैरानी की बात तो यह है कि कांग्रेस भी बीजेपी और कई क्षेत्रीय दलों पर वंशवाद का आरोप लगाती रही है.

2018 और 2023 के विधानसभा चुनावों के दौरान तेलंगाना तत्कालीन सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के खिलाफ कांग्रेस पार्टी ने वंशवादी राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था. तत्कालीन मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने अपने बेटे के टी रामाराव और भतीजे हरीश राव दोनों को मंत्री नियुक्त किया था. इस के अलावा, उन की बेटी के कविता 2018 में मौजूदा सांसद और 2023 में एमएलसी थीं. राष्ट्रीय राजनीति में वंशवाद के आरोपों को झेल रहे राहुल गांधी ने तेलंगाना चुनाव में मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव पर परिवारवाद और वंशवाद का आरोप लगा कर इस मुद्दे को जम कर उछाला.

बीजेपी का परिवारवाद से नाता

कांग्रेस के वंशवाद और परिवारवाद को मुद्दा बना कर ही भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस मुक्त भारत का नैरेटिव सैट करती है. बीजेपी के अनुसार कांग्रेस एक सामंती पार्टी है. यानी, यह गांधी परिवार की राजनीतिक जागीर है.

2014 में नरेंद्र मोदी की जीत को मीडिया ने वंशवादी राजनीति के अंत की शुरुआत बताया था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में लोकसभा के आंकड़ों से पता चला है कि भाजपा के वंशवादी सांसदों की संख्या कांग्रेस के वंशवादी सांसदों की संख्या के करीब ही रही है. एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 2019 में कांग्रेस से चुने गए लोगों में वंशवादी राजनेता 12 फीसदी थे जबकि भाजपा में यह 11 फीसदी था और 2024 में कांग्रेस के लिए यह 8 फीसदी और भाजपा के लिए 6 फीसदी था.

यह सच है कि बीजेपी के नेतृत्व में या बीजेपी की संगठनात्मक व्यवस्था में परिवारवाद नहीं है. नरेंद्र मोदी, अमित शाह, जे पी नड्डा या जयशंकर जैसे बड़े नेता बीजेपी में अपनी योग्यताओं के बल पर ही शीर्ष तक पहुंचे हैं, इसलिए बीजेपी का कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाना पूरी तरह औचित्यपूर्ण दिखाई देता है. लेकिन सच तो यह है कि राजनीति में कुछ भी औचित्यपूर्ण नहीं होता. कांग्रेस के परिवारवाद की विरोधी बीजेपी सत्ता के लिए परिवारवाद के आगे घुटने टेक देती है और सहयोगी दलों के परिवारवाद को गले लगाती नजर आती है.

बिहार में भाजपा का गठबंधन लोक जनशक्ति पार्टी से है. इस के अध्यक्ष चिराग पासवान को यह पार्टी अपने पिता रामविलास पासवान से विरासत में मिली थी. चिराग पासवान अपने पिता की मृत्यु के बाद खाली हुई उन की लोकसभा सीट हाजीपुर से सांसद बने गए हैं और उन्होंने अपनी मौजूदा सीट (जमुई) से अपने जीजा को चुनाव लड़ाया. चिराग की बहन शांभवी भी चुनाव लड़ीं और चिराग पासवान के चाचा पशुपति नाथ पारस भी सांसद हैं.

मेघालय में भाजपा की सहयोगी नैशनल पीपल्स पार्टी है. राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री कोनराड संगमा पूर्व सीएम पी ए संगमा के बेटे हैं. उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ खुद ‘परिवारवादी राजनीति’ का परिणाम हैं. उन के चाचा अवैद्यनाथ गोरखनाथ पीठ के महंत थे. पीठ में हजारों संन्यासी होने के बावजूद उत्तराधिकारी चुनने का समय आया तो अवैद्यनाथ ने अपने भतीजे आदित्यनाथ को चुना. इस के 4 साल बाद जब सांसद अवैद्यनाथ ने अपनी पारंपरिक लोकसभा सीट छोड़ने का मन बनाया तो वहां से भी आदित्यनाथ को ही सांसद बनवाया.

आगे का अंश बौक्स क बाद 

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बीजेपी के लिए वंशवाद का विरोध सिर्फ दिखावा है. लोगों को यह बताने की कोशिश होती है कि बीजेपी पूरी तरह लोकतंत्र में भरोसा करती है, इसलिए वंशवादी राजनीति का विरोध करती है लेकिन सच्चाई यह नहीं है. भाजपा में वंशवाद भरा है. यहां तक कि जिन देवताओं को वे पूजते हैं सभी वंशवाद की देन हैं.

कांग्रेस में वंशवाद है, यह कांग्रेस की कड़वी सच्चाई है. कांग्रेस में हाईकमान एक ही परिवार का क्यों? इस सवाल का जवाब कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं को ढूंढ़ना होगा और हाईकमान को भी अपनी वंशवादी परंपरा को तोड़ कर इसे पूरी तरह लोकतांत्रिक बनाना होगा.
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कश्मीर में जिस पीडीपी के साथ मिल कर बीजेपी ने सरकार बनाई थी, उस की नेता महबूबा मुफ्ती को राजनीति अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद से विरासत में मिली थी.

भाजपा ने महाराष्ट्र में शरद पवार के भतीजे अजित पवार को डिप्टी सीएम बनाया. इस से पहले नरेंद्र मोदी अजीत पवार पर लगातार परिवारवाद का आरोप लगाते रहे हैं. पीएम मोदी एनसीपी को प्राइवेट लिमिटेड पार्टी, परिवार लिमिटेड पार्टी तक कहते थे. कर्नाटक में बीजेपी ने जेडीएस के साथ गठबंधन बनाया, जिस के नेता एचडी कुमारस्वामी हैं जो पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के बेटे हैं.

परिवारवाद से लोकतंत्र को नुकसान

लोकतंत्र में परिवारवाद के लिए कोई जगह नहीं होती और भारत को विश्व का सब से बड़ा लोकतांत्रिक देश माना जाता है, इसलिए भारतीय राजनीति में परिवारवाद का होना अच्छा संकेत तो नहीं है. राजशाही व्यवस्था में किसी एक परिवार का ही शासन होता था. नेतृत्व परिवार के हाथों में होता था लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवारवाद के लिए कोई जगह नहीं.

सवाल यह है कि क्या भारत की किसी राजनीतिक पार्टी में परिवारवाद या वंशवाद होने से भारतीय लोकतंत्र को खतरा हो सकता है? नहीं. भारत की हर राजनीतिक पार्टी भारत के संविधान के अनुरूप ही बनी है और पूरी तरह लोकतांत्रिक नियमों पर ही चलती है. इसलिए इन में मौजूद परिवारवाद से लोकतंत्र को कोई खतरा नहीं हो सकता.

कांग्रेस समेत वे तमाम दल जिन में वंशवाद चलता है वे भी पूरी तरह लोकतांत्रिक मूल्यों पर ही चलते हैं. किसी राजनीतिक दल की कमान संभाल रहा कोई व्यक्ति अपने पिता की राजनीतिक विरासत को संभाल रहा है तो इस में गलत क्या है? इतिहास के किसी बड़े मूवमैंट या किसी सामाजिक क्रांति से कई नेता सामने आए. उन्होंने अपने मूवमैंट को राजनीतिक दल के रूप में रूपांतरित किया और मरने के बाद उन के बेटे या बेटी ने उस राजनीतिक दल की कमान संभाली. इस में कुछ भी अलोकतांत्रिक नहीं है.

भारतीय राजनीति में परिवारवाद का होना पूरी तरह लोकतांत्रिक है क्योंकि परिवारवाद से राजनीति में आने वाले किसी भी व्यक्ति को मामूली चुनाव जीतने के लिए भी जनता के वोट की जरूरत होती है. किसी नेता को विधानसभा या संसद में भेजने का रास्ता जनता तय करती है, इसलिए परिवारवाद से राजनीति में आने वाले लोगों को ‘लोकतंत्र का दुश्मन’ मान लेना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ एक गलत नैरेटिव है.

कोई भी पौलिटिकल पार्टी अपनी निजी स्वायत्तता के साथ अस्तित्व में रह सकती है. निजी स्वायत्तता में उस पार्टी की संगठनात्मक व्यवस्था, उस की कोर कमेटी और पार्टी के नेताओं की भूमिका तय करने का अधिकार पार्टी नेतृत्व के पास होता है. ये सभी कवायदें चुनाव आयोग की गाइडलाइंस के तहत ही तय होती हैं. सभी राजनीतिक दलों को अपना अध्यक्ष चुनना होता है. अब ऐसे किसी चुनाव में यदि पार्टी के लोग सर्वसम्मति से अपना नेता पार्टी में वंशानुगत परंपरा से चले आ रहे किसी व्यक्ति को चुनते हैं तो इस में चुनाव आयोग को कोई आपत्ति नहीं क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं को खतरा नहीं है.

भाजपा का वंशवाद का विरोध भी सिर्फ चुनावी जुमला ही है. भाजपा जिन देवीदेवताओं के नाम पर वोट बटोर रही है, सभी वंशवाद के प्रतीक हैं. चाहे वे शंकर के पुत्र गणेश हों या दशरथ पुत्र राम. सभी पूजे जाने वाले भगवान अपने पिताओं के वंश से जुड़े हैं. सवाल यह है कि वंशवाद का विरोध करने वाली भाजपा क्या वंशवाद का विरोध करने के लिए इन देवताओं को छोड़ेगी?

USA : पतन की ओर अमेरिका

USA : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यह शिकायत तो वाजिब है कि दूसरे देश अमेरिकी उत्पादों पर भारी टैक्स लगाते हैं ताकि अमेरिकी कंपनियों का सामान महंगा हो कर उन देशों में बिके पर इस का मतलब यह नहीं कि उन देशों से आने वाले सामान पर वे मनमाना टैक्स, जिसे टैरिफ कहा जा रहा है, लगा दें.

अपनी गलती की सजा खुद को देना बेवकूफी है क्योंकि अमेरिका में दूसरे देशों से आयातित सामान और महंगा ही होगा. उस की खपत कहां होगी, इस की गारंटी नहीं है. अगर इस तरह के सामान पर सभी देशों से आयात करने पर ज्यादा टैरिफ अमेरिका में लगेगा तो अमेरिकियों की जेब ढीली होगी. अगर कुछ खपत कम होगी तो इस का मतलब है कि अमेरिकी जनता परेशान होगी.

अमेरिका को सामान निर्यात करने वालों को इस टैरिफ से फर्क इतना ही पड़ेगा कि उन्हें खरीदार दूसरे देशों में ढूंढ़ने होंगे जो आसानी से मिल भी जाएंगे. दूसरे देशों में अमेरिकी निर्यातक और आयातक दोनों नुकसान में रहेंगे.

डोनाल्ड ट्रंप ने इस तरह का कदम उठाया है तो यह बड़ी बात नहीं है. हर कट्टरपंथी ऐसा ही करता है. वह कोई न कोई सिरफिरा कदम उठाता है. हिटलर ने बेमतलब यहूदियों को मारने का प्रोग्राम तब बनाया जब वह यूरोप के दूसरे देशों पर हमला कर रहा था. बजाय अपना ध्यान सैनिकों की तैयारी में लगाने के, हिटलर की फौजें यहूदियों को लूटने में लग गई थीं.

भारत में जब गरीबी दूर करने का समय आया और औद्योगिकीकरण की जरूरत थी तो हमारे शासकों ने देश को मंदिरमसजिद विवाद में धकेल दिया है. भारत आज 85 करोड़ भूखे लोगों को मुफ्त खाना देने को मजबूर है तो दूसरी तरफ अरबोंखरबों रुपए धार्मिक यात्राओं, मसजिदों, वक्फों के विवादों में बहा रहा है.

अमेरिका में आर्थिक संकट आया है तो जरूरत इस बात की थी कि वह चीन के उत्पादन केंद्र बनने से उसे रोकने के लिए अपने यहां साइंस और टैक्नोलौजी को बढ़ावा दे न कि दूसरे देशों से टैरिफ लड़ाई में उल झ जाए. आज हर देश अमेरिका को दुश्मन मानने लगा है. वे देश जो 100-150 सालों से अमेरिका को मित्र से ज्यादा संरक्षक मानते रहे हैं, अब उसे भक्षक मान रहे हैं जो उन के कारखाने बंद कराना चाह रहा है, उन की जमीन हथियाना चाहता है, वहां बसे उन के नागरिकों को अमेरिका का दुश्मन बता रहा है.

पिछले राष्ट्रपतियों ने अमेरिका को जो प्रतिष्ठा दिलाई थी, डोनाल्ड ट्रंप ने 2 माह में नष्ट कर दी है और उन का वार बहुत ही गहरा है. टैरिफ के अलावा वे मैडिकल सुविधाएं बंद कर रहे हैं, स्कूलों को बंद करा रहे हैं, सुंदर प्राकृतिक जंगलों, पहाड़ों, नदियों को बेसहारा छोड़ रहे हैं. आज अमेरिका हर तरह की रिसर्च पर खर्च घटा रहा है जबकि पाखंडभरे चर्चों को प्रोत्साहित कर रहा है.

जो राष्ट्रपति देश को बाहरी व अंदरूनी दोनों स्तरों पर विवादों में डाल रहा हो उसे सिर्फ खब्ती और सनकी कहा जा सकता है. जो काम दुनिया के चीन, रूस जैसे देश और तालिबान नहीं कर पाए -अमेरिका को नष्ट करने का- वह आज के अमेरिकी राष्ट्रपति खुद कर रहे हैं.

Donald Trump : लोकतंत्र के साथ तानाशाही

Donald Trump : यह लोकतंत्र में नहीं होता, सिर्फ तानाशाही में होता है कि हर वह जना जिस पर कोई शक हो, अपना परिचयपत्र हमेशा, 24 घंटे, अपने साथ रखे. लेकिन अब यह लोकतंत्रों के रक्षक रहे अमेरिका में, चर्च के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) के राज में होने लगा है जिस की कमान डोनाल्ड ट्रंप के हाथ में है. डोनाल्ड ट्रंप ने आदेश दिया है कि हर गैरनागरिक हर समय अपना परिचयपत्र अपने साथ रखे.

जब गैरनागरिकों के कागज बिना वजह के चैक करने का भी अधिकार पुलिस के पास होगा तो वह हर जना, जो गोरा नहीं है मगर चाहे नागरिक क्यों न हो, के कागज चैक कर सकती है. यह पुलिस चैकिंग दफ्तरों, ट्रेनों, एयरपोर्टों, सिनेमाघरों, बाजारों, सड़कों पर कहीं भी हो सकती है और जब होती है तो उस शख्स को बेहद अपमानजनक लगता है. अगर भूले से भी गैरगोरा नागरिक अपना परिचयपत्र जेब में रखना भूल गया तो पुलिस उसे बंद कर सकती है. वह अकेला रह रहा हो तो घर या होटल से अपना परिचयपत्र आखिर कैसे ला पाएगा.

असल में यह साजिश है कि अमेरिका में कोई ब्लैक, लैटिनो, चीनी, जापानी, दक्षिणी एशियाई रहे ही न. अगर रहे भी तो हर समय डरासहमा रहे. एक बड़ी कंपनी का भारतीय मूल का सीईओ सड़क पर जौगिंग करते हुए रोका जा सकता है कि वह अपना परिचयपत्र दिखाए चाहे वह नागरिक क्यों न हो.

जो भारतीय मूल के लोग बड़ी शान से अमेरिका में रहे रहे हैं और वहां रह कर भी रिपब्लिकन पार्टी को अपनी ऊंची जाति के कारण सपोर्ट करते हैं, अब वे भी हमेशा डरेसहमे रहेंगे.

डिपार्टमैंट औफ इनलैंड सिक्योरिटी ने नए आदेश में हर सरकारी अफसर को हक दे दिया है कि वह किसी से भी कह सकता है कि ‘शो मी योर पेपर्स’. गोरों को छोड़ कर हर जना अब हर समय दुबकासहमा रहेगा जैसा हिटलर की जरमनी में रहता था, स्टालिन के सोवियत संघ में रहता था. इस का फर्क नहीं पड़ता कि वह भारतीय, चीनी, अफ्रीकी, जापानी मूल का जना 4-5 पीढि़यों से अमेरिका में रह रहा हो, अच्छी पोस्ट पर हो, पैसे वाला हो, बड़े मकान में रहता हो.

अमेरिका चर्च के नाम पर यह सब कर रहा है क्योंकि चर्च का काम होता है हरेक को हमेशा डरा कर रखना और यही डराने की आदत सदियों से राजाओं ने अपनाई. हर धर्म इसीलिए यह कहता है कि धर्म के चिह्न हर समय पहन कर चलो ताकि हर समय पता रहे कि कौन एकदूसरे से बात कर रहा है.

लोकतंत्रों ने इस भय को दूर किया. वोटरों ने सत्ता पा कर एक खुले राज का निर्माण किया जिस में न चर्च का डर था न सरकार का. अब सरकार और धर्म बहुत देशों- भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, अमेरिका, रूस, लैटिन अमेरिका- में एकदूसरे के गहरे दोस्त बन गए है और जनता फिर से 18वीं सदी की गुलाम बन गई है.

अमेरिका का विनाश दिख रहा है लेकिन उस से ज्यादा खतरनाक है लोकतंत्र का विनाश. पहले अमेरिका ने लोकतंत्रों को भरपूर समर्थन दिया था, अब वह कट्टरवादी रूस, उत्तरी कोरिया, भारत जैसे देशों के जैसे रहेगा जहां मूल जन्म, धर्म, जाति, रंग सर्वोपरि हैं.

Hindi Kahani : भूलना मत – नम्रता की जिंदगी में क्या था उस फोन कौल का राज?

Hindi Kahani : नम्रता ने फोन की घंटी सुन कर करवट बदल ली. कंबल ऊपर तक खींच कर कान बंद कर लिए. सोचा कोई और उठ कर फोन उठा लेगा पर सभी सोते रहे और फोन की घंटी बज कर बंद हो गई.

‘चलो अच्छा हुआ, मुसीबत टली. पता नहीं मुंहअंधेरे फोन करने का शौक किसे चर्राया,’ नम्रता ने स्वयं से ही कहा.

पर फोन फिर से बजने लगा तो नम्रता झुंझला गई, ‘‘लगता है घर में मेरे अलावा यह घंटी किसी को सुनाई ही नहीं देती,’’ उस ने उठने का उपक्रम किया पर उस के पहले ही अपने पिता शैलेंद्र बाबू की पदचाप सुन कर वह दोबारा सो गई. पिता ने फोन उठा लिया.

‘‘क्या? क्या कह रहे हो कार्तिक? मुझे तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं होता. पूरे देश में प्रथम स्थान? नहींनहीं, तुम ने कुछ गलत देखा होगा. क्या नैट पर समाचार है?’’

‘‘अब तो आप को मिठाई खिलानी ही पड़ेगी.’’

‘‘हां, है.’’

‘‘मिठाई?’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं, घर आओ तो, मिठाई क्या शानदार दावत मिलेगी तुम्हें,’’ शैलेंद्र बाबू फोन रखते ही उछल पड़े. थोड़ी देर पहले की मीठी नींद से उठने की खुमारी और बौखलाहट एक क्षण में उड़नछू हो गई.

‘‘सुचित्रा, नम्रता, अनिमेष, कहां हो तुम तीनों? देखो कितनी खुशी की बात है,’’ वे पूरी शक्ति लगा कर चीखे.

‘‘क्या है? क्यों सारा घर सिर पर उठा रखा है?’’ सुचित्रा पति की चीखपुकार सुन कर उठ आईं.

‘‘बात ही ऐसी है. सुनोगी तो उछल पड़ोगी.’’

‘‘अब कह भी डालो, भला कब तक पहेलियां बुझाते रहोगे.’’

‘‘तो सुनो, हमारी बेटी नम्रता भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रथम आई है.’’

‘‘क्या? मुझे तो विश्वास नहीं होता. किसी ने अवश्य तुम्हें मूर्ख बनाने का प्रयत्न किया है. किस का फोन था? अवश्य ही किसी ने मजाक किया होगा.’’

‘‘कार्तिक का फोन था और मैं उस की बात पर आंख मूंद कर विश्वास कर सकता हूं.’’

मातापिता की बातचीत सुन कर नम्रता और अनिमेष भी उठ कर आ गए.

‘‘मां ठीक कहती हैं, पापा. क्या पता किसी ने शरारत की हो. परीक्षा में सफल होना तो संभव है पर सर्वप्रथम आना…मैं जब तक अपनी आंखों से न देख लूं, विश्वास नहीं कर सकती,’’ नम्रता ने अपना मत प्रकट किया.

पर जब तक नम्रता कुछ और कहती अनिमेष कंप्यूटर पर ताजा समाचार देखने लगा जहां नम्रता के भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रथम आने का समाचार प्रमुखता से दिखाया जा रहा था. कुछ ही देर में समाचारपत्र भी आ गया और फोन पर बधाई देने वालों का तांता सा लग गया.

शैलेंद्र बाबू तो फोन पर बधाई स्वीकार करने और सब को विस्तार से नम्रता के आईएएस में प्रथम आने के बारे में बताते हुए इतने व्यस्त हो गए कि उन्हें नाश्ता तक करने का समय नहीं मिला.

दिनभर घर आनेजाने वालों से भरा रहा. नम्रता जहां स्थानीय समाचारपत्रों के प्रतिनिधियों व टीवी चैनलों को साक्षात्कार देने में व्यस्त थी, वहीं अनिमेष और सुचित्रा मेहमानों की खातिरदारी में.

शैलेंद्र बाबू के तो पांव खुशी के कारण जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. नम्रता ने एक ही झटके में पूरे परिवार को साधारण से असाधारण बना दिया था.

रात गहराने लगी तो अनेक परिचित विदा लेने लगे. पर दूर से आए संबंधियों के ठहरने, खानेपीने का प्रबंध तो करना ही था. सुचित्रा के तो हाथपैर फूल गए थे. तीन बुलाए तेरह आए तो सुना था उन्होंने पर यहां तो बिना बुलाए ही सब ने धावा बोल दिया था.

वे अनिमेष को बारबार बाजार भेज कर आवश्यकता की वस्तुएं मंगा रही थीं और स्वयं दिनभर रसोई में जुटी रहीं.

अतिथियों को खिलापिला व सुला कर जब पूरा परिवार साथ बैठा तो सभी को अपनी कहने और दूसरों की सुनने का अवसर मिला.

‘‘मुझ से नहीं होता इतने लोगों के खानेपीने का प्रबंध. कल ही एक रसोइए का प्रबंध करो,’’ सब से पहले सुचित्रा ने अपना दुखड़ा कह सुनाया.

‘‘क्यों नहीं, कल ही से रख लेते हैं. कुछ दिनों तक आनेजाने वालों का सिलसिला चलेगा ही,’’ शैलेंद्र बाबू ने कहा.

‘‘मां, घर में जो भी सामान मंगवाना हो उस की सूची बना लो. कल एकसाथ ला कर रख दूंगा. आज पूरे दिन आप ने मुझे एक टांग पर खड़ा रखा है,’’ अनिमेष बोला.

‘‘तुम लोगों को एक दिन थोड़ा सा काम करना पड़ जाए तो रोनापीटना शुरू कर देते हो. पर जो सब से महत्त्वपूर्ण बातें हैं उन की ओर तुम्हारा ध्यान ही नहीं जाता,’’ शैलेंद्र बाबू गंभीर स्वर में बोले.

‘‘ऐसी कौन सी महत्त्वपूर्ण बात है जिस की ओर हमारा ध्यान नहीं गया?’’ सुचित्रा ने मुंह बिचकाया.

‘‘कार्तिक…आज सुबह सब से पहले कार्तिक ने ही मुझे नम्रता की इस अभूतपूर्व सफलता की सूचना दी थी. पर मैं पूरे दिन प्रतीक्षा करता रहा और वह नहीं आया.’’

‘‘प्रतीक्षा केवल आप ही नहीं करते रहे, पापा, मैं ने तो उसे फोन भी किया था. जितना प्रयत्न और परिश्रम मैं ने किया उतना ही उस ने भी किया. उसे तो जैसे धुन सवार थी कि मुझे इस प्रतियोगिता में सफल करवा कर ही मानेगा. मेरी सफलता का श्रेय काफी हद तक कार्तिक को ही जाता है.’’

‘‘सब कहने की बात है. ऐसा ही है तो स्वयं क्यों नहीं दे दी आईएएस की प्रवेश परीक्षा?’’

‘‘क्योंकि वह चाहता ही नहीं, मां. उसे पढ़नेपढ़ाने में इतनी रुचि है कि वह व्याख्याता की नौकरी छोड़ना तो दूर, अर्थशास्त्र में पीएचडी करने की योजना बना रहा है.’’

‘‘तो अब मेरी बात ध्यान से सुनो. अब तक तो तुम दोनों की मित्रता ठीक थी पर अब तुम दोनों का मिलनाजुलना मुझे पसंद नहीं है. बड़ी अफसर बन जाओगी तुम. अपनी बराबरी का वर ढूंढ़ो तो मुझे खुशी होगी. भूल गईं, सुधीर और उस के परिवार ने हमारे साथ कैसा व्यवहार किया था?’’ सुचित्रा बोलीं.

‘‘तो आप चाहती हैं कि मैं भी कार्तिक के साथ वही करूं जो सुधीर ने मेरे साथ किया था.’’

‘‘हां, तुम लोगों ने अपनी व्यस्तता में देखा नहीं, कार्तिक आया था, मैं ने ही उसे समझा दिया कि अब नम्रता उस से कहीं आगे निकल गई है तो किसी से बिना मिले मुंह छिपा कर चला गया,’’ सुचित्रा बोलीं.

‘‘क्या? आप ने मुझे बताया तक नहीं? कार्तिक जैसे मित्र बड़ी मुश्किल से मिलते हैं. हम दोनों तो जीवनसाथी बनने का निर्णय ले चुके हैं,’’ यह बोलते हुए नम्रता रो पड़ी.

‘‘मैं तुम से पूरी तरह सहमत हूं, बेटी. कार्तिक हीरा है, हीरा. उसे हाथ से मत जाने देना,’’ शैलेंद्रजी ने नम्रता को ढाढ़स बंधाया.

एकांत मिलते ही नम्रता ने कार्तिक का नंबर मिलाया. पर बहुत पहले की एक फोन कौल उस के मानसपटल पर हथौड़े की चोट करने लगी थी.

उस दिन भी फोन उस के पिता ने ही उठाया था.

‘नमस्ते शैलेंद्र बाबू. कहिए, विवाह की सब तैयारियां हो गईं?’ फोन पर धीर शाह का स्वर सुन कर शैलेंद्र बाबू चौंक गए थे.

‘सब आप की कृपा है. हम सब तो कल की तैयारी में ही व्यस्त हैं.’

इधरउधर की औपचारिक बातों के बाद धीर बाबू काम की बात पर आ गए.

‘ऐसा है शैलेंद्र बाबू, मैं ने तो लाख समझाया पर रमा, मेरी पत्नी तो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं. बस, एक ही जिद पर अड़ी है. उसे तो तिलक में 10 लाख नकद चाहिए. वह अपने मन की सारी साध पूरी करेगी.’’

‘क्या कह रहे हैं आप, धीर बाबू? तिलक में तो लेनेदेने की बात तय नहीं हुई थी. अब एक दिन में 10 लाख का प्रबंध कहां से करूंगा मैं?’ शैलेंद्र बाबू का सिर चकराने लगा. आवाज भर्रा गई.

‘क्या कहूं, मैं तो आदर्शवादी व्यक्ति हूं. दहेज को समाज का अभिशाप मानता हूं. पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है. रमा ने तो जिद ही पकड़ ली है. वैसे गलती उस की भी नहीं है. आप के यहां संबंध होने के बाद भी लोग दरवाजे पर कतार बांधे खड़े हैं.’

सोचने व समझ पाने के लिए शैलेंद्र ने कहा, ‘मेरे विचार से ऐसे गंभीर विचारविमर्श फोन पर करना ठीक नहीं रहेगा. मैं अपनी पत्नी सुचित्रा के साथ आप के घर आ रहा हूं. वहीं मिलबैठ कर सब मसले सुलझा लेंगे.’

नम्रता ने शैलेंद्र बाबू और धीर शाह के बीच होने वाली बातचीत को सुन लिया था और किसी अशुभ की आशंका से वह कांप उठी थी.

शैलेंद्र बाबू और सुचित्रा जब धीर बाबू के घर गए तो उन्होंने 10 लाख की मांग को दोहराया, जिस से शैलेंद्र बाबू निराश हो गए.

जब नम्रता से सुधीर का संबंध हुआ था तब सुधीर डिगरी कालेज में साधारण सा व्याख्याता था पर अब वह भारतीय प्रशासनिक सेवा का अफसर बन गया था. इसी कारण वर का भाव भी बढ़ गया. अफसर बनते ही सुधीर का दुनिया के प्रति नजरिया भी बदल गया.

शैलेंद्र और सुचित्रा उठ खड़े हुए. घर आ कर बात साफ कर दी गई.

‘यह विवाह नहीं होगा. लगता है और कोई मोटा आसामी मिल गया है धीर बाबू को,’ शैलेंद्र बाबू ने सुचित्रा से कहा.

सुधीर और नम्रता ने कालेज की पढ़ाई साथ पूरी की थी. दोनों के प्रेम के किस्से हर आम और खास व्यक्ति की जबान पर थे. एमफिल करते ही जब दोनों को अपने ही कालेज में व्याख्याता के पद प्राप्त हो गए तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. उन के प्यार की दास्तान सुन कर दोनों ही पक्षों के मातापिता ने उन के विवाह की स्वीकृति दे दी थी.

नम्रता से विवाह तय होते ही जब सुधीर का आईएएस में चयन हो गया तो सुचित्रा और शैलेंद्र बाबू भी खुशी से झूम उठे. वे मित्रों, संबंधियों और परिचितों को यह बताते नहीं थकते थे कि उन की बेटी नम्रता का संबंध एक आईएएस अफसर से हुआ है.

नम्रता स्वयं भी कुछ ऐसा ही सोचने लगी थी. वह जब भी सुधीर से मिलती तो गर्व महसूस करती थी. पर आज सबकुछ बदला हुआ नजर आ रहा था.

सुधीर और उस का प्रेमप्रसंग तो पिछले 5 वर्षों से चल रहा था. सुधीर तो दहेज के सख्त खिलाफ था. फिर आज अचानक इतनी बड़ी मांग? वह छटपटा कर रह गई.

उस ने तुरंत सुधीर को फोन मिलाया. उसे अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि सुधीर और उस का परिवार तिलक से ठीक पहले ऐसी मांग रख देंगे. वह सुधीर से बात कर के सब साफसाफ पूछ लेना चाहती थी. उन दोनों के प्यार के बीच में यह पैसा कहां से आ गया था.

‘हैलो, सुधीर, मैं नम्रता बोल रही हूं.’

‘हां, कहो नम्रता, कैसी हो? कल की सब तैयारी हो गई क्या?’

‘यही तो मैं तुम से पूछ रही हूं. यह एक दिन पहले क्या 10 लाख की रट लगा रखी है? मेरे पापा कहां से लाएंगे इतना पैसा?’

‘शांत, नम्रता शांत. इतने सारे प्रश्न पूछोगी तो मैं उन के उत्तर कैसे दे सकूंगा.’

‘बनो मत, तुम्हें सब पता है. तुम्हारी स्वीकृति के बिना वे ऐसी मांग कभी नहीं करते,’ नम्रता क्रोधित स्वर में बोली.

‘तो तुम भी सुन लो, क्या गलत कर रहे हैं मेरे मातापिता? लोग करोड़ों देने को तैयार हैं. कहां मिलेगा तुम्हें और तुम्हारे पिता को आईएएस वर? तुम लोग इस छोटी सी मांग को सुनते ही बौखला गए,’ सुधीर का बदला सुर सुनते ही स्तब्ध रह गई नम्रता. हाथपैर कांप रहे थे. वह वहीं कुरसी पर बैठ कर देर तक रोती रही.

अनिमेष सो रहा था. वह किसी प्रकार लड़खड़ाती हुई अपने कक्ष में गई और कुंडी चढ़ा ली.

शैलेंद्र और सुचित्रा घर पहुंचे तो देर तक घंटी बजाने और द्वार पीटने के बाद जब अनिमेष ने द्वार खोला तो शैलेंद्र बाबू उस पर ही बरस पड़े.

‘यहां जान पर बनी है और तुम लोग घोड़े बेच कर सो रहे हो.’

‘बहुत थक गया था. मैं ने सोचा था कि नम्रता दीदी द्वार खोल देंगी. वैसे भी उन की नींद जल्दी टूट जाती है,’ अनिमेष उनींदे स्वर में बोला.

‘नम्रता? हां, कहां है नम्रता?’ शैलेंद्र बाबू ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘अपने कमरे में सो रही हैं,’ अनिमेष बोला और फिर सो गया.

पर शैलेंद्र और सुचित्रा को कुछ असामान्य सा लग रहा था. मातापिता की चिंता से अवगत थी नम्रता. ऐसे में उसे नींद आ गई, यह सोच कर ही घबरा गए थे दोनों.

सुचित्रा ने तो नम्रता के कक्ष का द्वार ही पीट डाला. पर कोई उत्तर न पा कर वे रो पड़ीं. अब तो अनिमेष की नींद भी उड़ चुकी थी. शैलेंद्र बाबू और अनिमेष ने मिल कर द्वार ही तोड़ डाला.

उन का भय निर्मूल नहीं था. अंदर खून से लथपथ नम्रता बेसुध पड़ी थी. उस ने अपनी कलाई की नस काट ली थी.

अब अगले दिन के तिलक की बात दिमाग से निकल गई थी. वर पक्ष की मांग और उन के द्वारा किए गए अपमान की बात भुला कर वे नम्रता को ले कर अस्पताल की ओर भागे थे.

समाचार सुनते ही नम्रता के मित्र और सहकर्मी आ पहुंचे थे. सुचित्रा और अनिमेष का रोरो कर बुरा हाल था. शैलेंद्र बाबू अस्पताल में प्रस्तर मूर्ति की भांति शून्य में ताकते बैठे थे. कार्तिक ने न केवल उन्हें सांत्वना दी थी बल्कि भागदौड़ कर के सुचित्रा की देखभाल भी की थी.

कार्तिक रातभर नम्रता के होश में आने की प्रतीक्षा करता रहा था पर नम्रता तो होश में आते ही बिफर उठी थी.

‘कौन लाया मुझे यहां? मर क्यों नहीं जाने दिया मुझे? मैं जीना नहीं चाहती,’ वह प्रलाप करने लगी थी.

‘चुप करो, यह बकवास करने का समय नहीं है. तुम ऐसा कायरतापूर्ण कार्य करोगी, मैं सोच भी नहीं सकता था.’

‘मैं अपने मातापिता को और दुख देना नहीं चाहती.’

‘तुम ने उन्हें कितना दुख दिया है, देखना चाहोगी. तुम्हारी मां रोरो कर दीवार से अपना सिर टकरा रही थीं. बड़ी कठिनाई से अनिमेष उन्हें घर ले गया है. तुम्हारे पिता तुम्हारे कक्ष के बाहर बैंच पर बेहोश पड़े हैं.’

‘ऐसी परिस्थिति में मैं और कर भी क्या सकती थी?’

‘तुम पहली युवती नहीं हो जिस का विवाह टूटा है, कारण कोई भी रहा हो. दुख का पहाड़ तो पूरे परिवार पर टूटा था पर तुम बड़ी स्वार्थी निकलीं. केवल अपने दुख का सोचा तुम ने. तुम्हें तो उन्हें ढाढ़स बंधाना चाहिए था.’

नम्रता चुप रह गई. कार्तिक उस का अच्छा मित्र था. उस ने और कार्तिक ने एकसाथ कालेज में व्याख्याता के रूप में प्रवेश किया था. पर सुधीर के कालेज में आते ही नम्रता उस के लटकोंझटकों पर रीझ गई थी.

नम्रता स्वस्थ हो कर घर आ गई थी पर कार्तिक के सहारे ही वह सामान्य हो सकी थी. ‘स्वयं को पहचानो नम्रता,’ वह बारबार कहता. उस के प्रोत्साहित करने पर ही नम्रता ने आईएएस की तैयारी प्रारंभ की थी. उस की तैयारी में कार्तिक ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. पर आज न जाने उस पर क्या बीती होगी.

‘‘हैलो कार्तिक,’’ फोन मिलते ही नम्रता ने कार्तिक का स्वर पहचान लिया था.

‘‘कहो नम्रता, कैसी हो?’’

‘‘मैं कैसी हूं अब पूछ रहे हो तुम? सुबह से कहां थे?’’

‘‘मैं तो तुम से मिलने आया था पर तुम बहुत व्यस्त थीं.’’

‘‘और तुम बिना मिले चले गए? यह भी भूल गए कि तुम ने तो सुखदुख में साथ निभाने का वादा किया है.’’

‘‘आज के संसार में इन वादों का क्या मूल्य है?’’

‘‘मेरे लिए ये वादे अनमोल हैं, कार्तिक. हम कल ही मिल रहे हैं. बहुत सी बातें करनी हैं, बहुत से फैसले करने हैं. ठीक है न?’’ नम्रता ने व्यग्रता से पूछा था.

‘‘ठीक है, नम्रता. तुम भी मेरे लिए अनमोल हो. यह कभी मत भूलना.’’

कार्तिक ने अपने एक वाक्य में अपना हृदय ही उड़ेल दिया था. नम्रता की आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे थे. तृप्ति व खुशी के आंसू.

Family Story : मां तो आने से मना ही करेगी न

Family Story : “मैं सिर्फ आप की पत्नी ही नहीं, किसी की बेटी भी हूं.”

“एक बार फिरसे दोहराना.”

“मैं सिर्फ आप की पत्नी ही नहीं, किसी की बेटी भी हूं. यह क्या बचपना लगा रखा है, अभिनव? ट्रेन का समय होने वाला है, आप अब उतर जाइए.”

“मैं तुम्हें यही समझाना चाहता हूं कि तुम्हारी शादी हो  गई, इस का मतलब यह बिलकुल भी नहीं कि तुम्हारी अपने घर से जिम्मेदारी खत्म. वहां तुम्हारे मम्मीपापा का शरीर बुखार से तप रहा है, तुम्हारा कर्तव्य बनता है कि तुम दोनों घरपरिवार का बराबर ध्यान रखो,” ट्रेन की सीट पर तनाव से भरी पत्नी शीतल का हाथ नजाकत से सहलाते हुए अभिनव ने कहा.

“जी, समझ गई. अब उतर जाएं वरना मेरे साथसाथ आप भी रायपुर पहुंच जाएंगे. फिर मेरी बेटी का ध्यान कौन रखेगा. देखिए, गाड़ी चलने लगी है.”

अचानक अपने मातापिता की तबीयत खराब हो जाने से परेशान शीतल चंद मिनटों में अपने मायके के लिए रवाना होने वाली है. उन की 5 साल की बेटी परी इतने दिन बिना उस के पहली बार अकेले रहेगी. यह सोच उस का कलेजा पहले से ही छटपटा रहा था.

“तुम निश्चित हो कर जाओ, यहां की चिंता मत करना, मैं सब संभाल लूंगा.” अभिनव पलपल चलती ट्रेन के साथ कहतेकहते शीतल का हौसला बढ़ाते चले गए.

“आप के भरोसे मांजी, बाबूजी की जिम्मेदारी छोड़े जा रही हूं, उन्हें मेरी अनुपस्थिति में कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए,” मुरझाया चेहरा लिए शीतल बेबसी से अभिनव की ओर देखते हुए कहने लगी.

“तुम परेशान मत हो, पहुंच कर फोन करना,” अभिनव के पैर अब तेज रफ्तार पकड़ती ट्रेन के सामने कमजोर पड़ने लगे और वह वहीं थम कर उसे अपना हाथ दिखा, विदा करने लगा.

” ठीक है, आप अपना ख़याल रखना.”

भरी आंखों से शीतल अभिनव के ओझिल होते तक उसे निहारती रही.

वापस अपनी सीट पर बैठ मन ही मन वह प्रकृति को धन्यवाद देने लगी. क्या यह उन्हीं का आशीर्वाद है कि कुल 4 बहनें होने पर भी आज उसे अपने परिवार में एक बेटा न होने की कमी नहीं खल रही थी. उसे उन क्षण बचपन से सुनते आए अपने मांपिता को वो चुभनभरे ताने एकाएक याद आने लगे.

“बिना बेटेबहू के आप का बुढ़ापा कैसे बीतेगा?” ये बेटियां तो अपनीअपनी ससुराल में व्यस्त हो जाएंगी. आप की जरूरत के समय उन से आप के साथ खड़े रहने की उम्मीद लगाना बेकार की बात है. वे अपने ससुराल का ध्यान रखेंगी या अपने मायके का? सासससुर, पति, बच्चों की जिम्मेदारी से खाली होंगी तब तो आ पाएंगी. अगर ससुराल वाले ही मना कर देंगे तो क्या घर में महाभारत रचा कर उन का आना मुमकिन होगा. आप अपनी दूसरी व्यवस्था कर के रखिएगा वरना आगे चल कर बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ेगा.”

पर आज अभिनव का ऐसा रूप देख कर उस का मन भर आया. शुरुआत में वे छोटीमोटी बात पर मायके जाने की उस की जिद्द को नज़रअंदाज कर दिया करते थे.

उसे भी महसूस हुआ कि बाकी जीजू की तरह, अभिनव को भी उस का मायके बारबार जाना पसंद नहीं. फिर धीरेधीरे शीतल ने ही उन से कहना बंद कर दिया. अब मुश्किल से केवल साल में एक बार जाने का मौका मिल पाता था.

आज घरवालों की इस कठिन परिस्थिति में भी उन के पास कोई भी बहन मौजूद नहीं हो पा रही थी. सब अपनीअपनी समस्याओं में उलझी हुई थीं. यह बताने पर कि, उस के मांपिता ने अपनी कामवाली बाई को पूरे दिन के लिए रख लिया है, तो अभिनव को यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी. उन्होंने तुरंत कहा कि, “बेटा हो या बेटी, अगर जरूरत पड़ने पर उन के खुद के बच्चे सहारा ना बन सके तो फिर किस काम के?”

उसे बिना बताए तुरंत उस के अकेले का टिकट कटा कर अगले ही दिन भेजने का फ़ैसला कर लिया. यह देख उसे बहुत आश्चर्य हुआ. अगर उसे आज अभिनव और अपने सासससुर का साथ न मिलता तो शायद वह भी न उन के पास पहुंच पाती.

उन्हीं की जिद्द थी कि वह मायके जा कर उन का तसल्ली से इलाजपानी करवा कर ही लौटे. उस ने जब सास, ससुर, उन की और परी का हवाला दिया तो अभिनव कहते हैं,

“तुम्हें इस घड़ी में उन के साथ होना चाहिए. मैं मानता हूं कि तुम्हारे बिना कुछ दिन मुश्किल होगी, पर फिर सब मैनेज हो जाएगा.”

यह कहना उन के लिए शायद आसान होगा पर जब करेंगे तब समझ पाएंगे कि इस कभी न खत्म होने वाली जंग में दो पल का चैन नहीं मिलता कि अगली जंग फिर सामने आ खड़ी होती है.

इतना भी सोचविचार नहीं किया कि अकेले सब कैसे संभाल पाएंगे. वह बखूबी जानती थी कि उस की गैरमौजूदगी में सब को कितनी तकलीफ उठानी पड़ेगी. बेटी के हज़ार खाने के नखरे, सासससुर की डायबिटीज और ब्लडप्रैशर की समय पर दवाई की याद, सब का फरमाइशी खानापीना, घर का राशन, बाई का काम देखना आदिआदि इन सब के बाद उन्हें औफिस का काम भी करना होगा.

ट्रेन की खिड़की के बाहर, सीट में अपनी गरदन टिकाए वह खुले आसमान में बादलों को अठखेलियां करते हुए देख यह सब सोच कर यही मनाती रही कि मांपापा जल्दी ठीक हो जाएं और वह अपनी ससुराल समय से वापस लौट आए.

यह विचार करते उस की रात गुजरती रही और अगली सुबह स्टेशन पर उतरते ही औटो पकड़ अपने घर के लिए रवाना हो गई. उस ने अपने घर में आने की जानकारी नहीं दी थी वरना वे लोग उसे आने के लिए मना कर देते. घर पहुंची नहीं कि उसे देख मां ने सवाल पर सवाल बिछा दिए.

“शीतल तुम्हें आने की क्या जरूरत थी? और परी कहां है?”

“मम्मी, मैं अकेले आई हूं. अभिनव उसे संभाल रहे हैं.”

“आसपड़ोस के लोग और बाई भी है. तुम अपनी गृहस्थी क्यों बिगाड़ कर आई हो. वहां तुम्हारे सासससुर हैं, उन का ध्यान कौन रखेगा?”

“मां, तुम चिंता मत करो. अभिनव हैं न, वे सब देख लेंगे.”

“एक मर्द से घर संभालने की उम्मीद करना…मैं तो न कर सकती.”

“अब आ गई है तो तुम्हें खुश होना चाहिए. बेटी, आज हम दोनों को कई डाक्टरों को दिखाना है. यहां से वहां अकेले ऐसी हालत में तुम्हारी मां और खुद को ले कर कहांकहां भटकता, अच्छा किया जो सही समय पर आ गईं.”

“आप नहीं समझेंगे. मां तो आने के लिए मना ही करेगी”

शीतल को भीतर से लगा कि उस ने यहां आ कर एक नेक काम किया. कुछ देर आज उसे क्याक्या करना है, उन दोनों के साथ प्लान कर वह अभिनव को फोन लगाने लगी.

“हेलो, मैं आराम से पहुंच गई थी. तुम कैसे हो? मांजी, बाबूजी और परी सब कैसे हैं?”

“सब ठीक है. तुम यहां की चिंता मत करो. मैं औफिस के लिए थोड़ी देर में निकल रहा हूं. सभी ने अपना खाना खुद निकाल कर खा लिया है. मां ने बाई से सारा काम करवा लिया. बाबूजी खुद दोनों की दवाई निकाल कर समय से खाने की याद रख रहे हैं. और परी, तुम जैसा करती हो, हम सब को अगली चीज करने की याद दिला रही है.”

“हमारी बच्ची इतनी समझदार हो गई है, यकीन नहीं होता,” शीतल मुसकराती हुई आश्चर्य से कहने लगी.

“तुम न जातीं तो पता ही न चलता कि यह लड़की बिना कुछ कहे या टोके अपने सभी काम खुद से कर सकती है. और तुम विश्वास नहीं करोगी, आज उस ने बिना नखरे किए कद्दू की सब्जी अपने हाथों से खाई है.”

“जो सुधार मैं महीनों से नहीं कर पाई वह आप ने एक दिन में ही कर दिखाया. मान गई आप को.”

“तुम्हारा धन्यवाद. मैं ने कहा था न, सब मैनेज हो जाएगा. अब तुम जब वापस आओगी तो सब की आदतें बिलकुल ऐसे ही रहने देना. तभी अपना टीचिंग जौब वापस चालू करने की सोच सकती हो.”

“आप ने सही कहा. सब ऐसा ही चलता रहा तो जल्द शुरू कर पाऊंगी.”

“चलो, तुम ध्यान रखो वहां. मुझे औफिस के लिए देर हो जाएगी.”

“ठीक है.”

अभिनव की बातें सुन कर मानो उस के मन से बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो, वहां सब अपने पति को अच्छे से संभाला हुआ पा कर वह अपनेआप निश्चिंत होने लगी. आज अपने पति के प्रति अलग सा प्यार और झुकाव होते उसे महसूस हुआ.

सभी डाक्टरों को दिखा कर रात हो गई. यह अच्छा रहा कि कुछ बड़ी बात नहीं निकली. बस 2 हफ्ते की दवाइयां और आराम भर से उन के जल्दी ठीक हो जाने का आश्वासन पा कर वे सब बहुत खुश हुए.

वहां कुल 10 दिन बिताने के बीच शीतल को अपने बचपन के वो सभी क्षण याद आ रहे थे जब कभी वे बहनें बीमार पड़तीं या चोटिल होती थीं और कैसे उन की मां दिनरात सेवा में लगी रहतीं. पिता नियम से काम पर जाने से पहले उन्हें कड़वी दवाई के घूंट बड़े प्यार से पिला कर जाया करते थे.

तब उन्हें उन के साथ और प्यार की कितनी जरूरत थी. उन के बिना वे जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे.

वहीं, वे शीतल को एकाएक अपने समक्ष पा कर और इतने संवेदनशील दिल का दामाद पा कर बहुत खुश महसूस कर रहे थे.

यह बात तो पक्की थी कि बिना उन के सहयोग व आश्वासन के बगैर कोई भी बेटी अपना घरबार इतने दिन ऐसे छोड़ कर आने की हिम्मत नहीं जुटा सकती थी.

कुछ दिनों बाद उन की तबीयत सुन आसपास के रिश्तेदार और समाज के लोग एक के बाद एक उन से मिलने घर आने लगे. शीतल को बिना बिटिया के मुसकराते हुए देख उन के साथ हर पल साए की तरह मौजूद पा कर सब हतप्रभ रह गए. सब उस से तरहतरह की पूछताछ करते नहीं थक रहे थे.

सभी सवालों की झड़ी के जवाब दे दे कर उसे पता नहीं क्यों भीतर ही भीतर ऐसा पति पा कर सम्मानित महसूस हो रहा था. क्या एक पति का ऐसा ह्रदय दिखाना क्या इतनी बड़ी बात है.

वैसे, देखा जाए तो पीढ़ियों से यही काम एक बहू आजीवन बड़ी निष्ठा से करती आ रही है, क्या तब भी औरों के लिए एक औरत का इतना त्याग करना इतना ही आदरकारी कार्य माना जाता है? खैर.

मातापिता ने हर किसी के सामने प्रफुल्लित हो अपने दामाद की प्रशंसा करते हुए कहने लगे, “उन्होंने ही जिद्द कर शीतल को हमारे पास अकेले यहां भेजा और अगली ही ट्रेन से. इतने दिनों के लिए हमारे पास निश्चिंत हो हमारा ख़याल रख रही है.

तो फिर क्या था. सब ने केवल एक बात दोहराई, “भई, दामाद हो तो ऐसा.”

“भई दामाद हो तो ऐसा.”

जब एक लड़की की शादी हो जाती है तो उसे, बस, घर की बहू के रूप में ही क्यों देखा जाता है?

जिन्होंने उसे जन्म दिया, पालापोसा, पढ़ायालिखाया, अपने कलेजे का टुकड़ा समझा, हर सुखदुख में चट्टान की तरह साथ दिया. इतने संस्कार और सामंजस्य की घुट्टी पिलाई कि वह ससुराल जा कर एक आदर्श बहू की उपाधि प्राप्त कर सके.

फिर ऐसा क्यों होता है कि किसी मुश्किल घड़ी में या बुरा वक्त आने पर उसे उस के ही जन्मदाता से पराए की तरह बरताव करने के लिए दबाव डाला जाता है. इस बात को क्यों अहमियत नहीं दी जाती कि वह एक पत्नी-बहू-मां के साथसाथ किसी की बेटी भी है.

Romantic Story : नजराना – क्या हुआ था जारा के साथ

Romantic Story : याद एक ऐसा शब्द, जिसे सोचते ही मन मानो कहीं गुम सा हो जाता है. कितनी अनोखी और अनूठी होती हैं ये यादें. कभी होंठों पर मुसकराहट ले आती हैं तो कभी आंखों को आंसुओं से नवाज देती हैं. कुछ पलों को याद कर हम हंस पड़ते हैं, तो कुछ पलों के जिक्र से ही आंखों से आंसुओं की लड़ी बह जाती है. लेकिन कुछ यादें हमारी जिंदगी में हमारे साए की तरह हमारे साथ हर पल रहती हैं.

यादों के कुछ ऐसे ही भंवर में उलझी जारा जब अपनी बड़ी सी काली गाड़ी से उतरी तो अचानक उस की आंखें डबडबा आईं. उस की आंखों के आगे वो सपने तैरने लगे, जो तकरीबन 15 साल पहले उस ने इस मंदिर जैसे स्कूल में बिताए थे. उस के मन में भावनाओं का बवंडर उठ रहा था. अनचाहे ही वह अतीत की उन गलियों में खोती जा रही थी, जिन से वह 15 साल पहले गुजर चुकी थी.

आज वह उस महरून रंग की इमारत के सामने खड़ी थी, जिस की बड़ी सी दीवार पर एक तरफ बड़ी ही खूबसूरती से लिखा गया था, ‘भारतीय विद्या भवन’ और दूसरी तरफ स्टील से बना उभरा हुआ स्कूल का ‘लोगो’ जड़ा हुआ था.

इमारत के चारों तरफ हरेभरे पेड़पौधे बिलकुल वैसे ही लगे हुए थे जैसे उस ने 15 साल पहले इस स्कूल को छोड़ते समय थे. यहां इस जगह की हवा में ही मानो गुलाब की खुशबू घुली हुई हो.

जारा ने लंबी सांस ली तो ये खुशबू उस के जेहन में घुल गई. जारा को मानो कई सालों बाद ऐसा सुकून मिला हो. लेकिन सुकून के साथ वो तमाम यादें भी उस के जेहन में उतर गईं, जिन्हें भुलाने की वो हजार मरतबा नाकाम कोशिशें कर चुकी थी. अब तो मानो वह हिम्मत ही हार चुकी थी या यों कहो कि समझ चुकी थी कि ये यादें उस का साया बन हमेशा उस के साथ चलती रहेंगी. पर इस बार आसपास के माहौल को समझते हुए उस ने अपनेआप को संभाला और अपनी नीले रंग की चिकन की कढ़ाई वाली साड़ी जिस पर जहीन कारीगरी की गई थी, उसे उस के सब से अजीज दोस्त सिद्धार्थ ने दी थी. ये उस का पसंदीदा रंग था. उसे ठीक करते हुए वह आगे बढ़ी और चलतेचलते स्कूल की दहलीज तक पहुंच गई. अंदर जाते हुए उस ने महसूस किया कि इतने सालों में वहां कुछ भी तो नहीं बदला था. वही खुशबू, वही सजावट और सब से बड़ी बात वही रीतिरिवाज.

दरअसल, आज यहां एक अंतर्राष्ट्रीय समारोह था, जिस के मुख्य अतिथि के रूप में जारा को आमंत्रित किया गया था, क्योंकि वह आईपीएस अफसर थी. वैसे तो यह उस के लिए गर्व का समय था, पर आज वह थोड़ी दुखी थी. उसे दुख इस बात का था कि ये सपना जिस का था आज वो ही वहां नहीं था. ये सिद्धार्थ का सपना था, उस सिद्धार्थ का, जिस ने कभी उसे किसी मोड़ पर अकेला नहीं छोड़ा था. जो हमेशा उस का सब से अच्छा दोस्त था. इतना अच्छा कि वक्त आने पर उस के लिए वो किया, जो शायद कोई सगा भी नहीं करता, लेकिन आज वह ही उस के साथ नहीं था.

आज उस दहलीज पर खड़े हुए उस पर फूल बरसाए जा रहे थे और स्कूल की हेड गर्ल द्वारा उस के माथे पर तिलक लगाया जा रहा था, यह देख कर… एक बार फिर वो 25 साल पहले की यादों में गुम हो गई, जब वह भी कभी इस स्कूल की हेड गर्ल हुआ करती थी और बिलकुल इस तरह से ही आईपीएस अफसर को तिलक लगाया करती थी…

उसे याद था कि तब सिद्धार्थ गंभीर स्वर में कहता था, तू देखना एक दिन मैं भी आईपीएस अफसर बनूंगा और मुझे भी ऐसे ही सम्मान दिया जाएगा.

उस ने यह कह तो दिया, पर शायद तकदीर को कुछ और ही मंजूर था…

आज उसे फिर याद आ रहा था कि कैसे वो मस्त, मगन हो कर इस स्कूल में पढ़ने के साथसाथ टेनिस कोर्ट में पूरापूरा दिन खेलती थी और सिद्धार्थ से झगड़ा भी करती थी… पर यहां इस जगह से सिर्फ खुशियों के लम्हे ही नहीं जुड़े थे, बल्कि कुछ ऐसे अंधेरे पल भी थे, जिन्होंने उस की जिंदगी का रुख ही मोड़ दिया.

आज जैसेजैसे वो इस जगह का दौरा कर रही थी, उसे हर मोड़ पर कुछ न कुछ तो याद आ ही जाता. जैसे – कैसे वह हर बार जल्दीजल्दी में उन सीढ़ियों से ऊपर जाती, जिन से जाने के लिए अर्चना मैडम, पीटी टीचर ने मना किया होता था… और कैसे वह 8वीं कक्षा में लंच ब्रेक से पहले ही पीरियड में लास्ट बेंच पर बैठ कर टिफिन खा लिया करती थी.

ये सब सोच कर उस के होंठों पर एक मुसकान तैर गई थी…

लेकिन फिर एक मोड़ ऐसा भी आया, जहां वह स्तब्ध सी खड़ी रही. यह वह मोड़ था, जहां वो लम्हा गुजरा था, जिस ने उस से हमेशाहमेशा के लिए उस का सब से अच्छा दोस्त छीन लेने की तैयारी शुरू कर दी थी. उस की आंखों के आगे उस अंधियारे दिन का दृश्य झिलमिला आया, जब सुबह से ही बादल कड़क रहे थे और चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ था… बारिश थी कि थमने का नाम ही नहीं ले रही थी. मां तो ऐसा भयानक मौसम देख कर पहले ही मना कर रही थी, “जारा, आज छुट्टी कर ले…” पर उस ने ही मां को समझा दिया और स्कूल चली गई.

उस दिन हम सब का फेयरवेल था और सब में उत्साह की एक लहर दौड़ रही थी, पर… कौन जानता था कि इस दिन की याद एक काला सच बन कर रह जाएगी…

हम सब स्कूल के औडिटोरियम में थे कि तभी गोली चलने की आवाज कानों में गूंज गई और हाल में भगदड़ मच गई… पर हम ने हिम्मत से फैसला लेने की सोची और शांत हो कर वहीं खड़े रहे. सब डरे हुए थे, पर फोन की लाइट से अंधेरे में रास्ता ढूंढ़ते हुए सब तो किसी तरह बाहर निकल गए, पर खुद मैं ही पीछे… न जाने कैसे मेरा दुपट्टा किसी जगह अटक गया. मैं हड़बड़ा कर उसे निकालने की कोशिश करने लगी, पर अचानक एक गोली चलने की आवाज आई और फिर महसूस हुआ कि वह गोली तो मेरे ही माथे से छू कर गुजर गई थी… एक पल में अंधेरे में भी आंखों के आगे अंधेरा छा गया था.

मैं नहीं जानती कि उस के बाद क्या हुआ… कैसे मैं उस हाल से बाहर निकली… कैसे मैं अस्पताल पहुंची…? बस जानती हूं तो इतना कि जब होश आया तो महसूस हुआ कि मेरी जिंदगी का रुख इस आंधी ने बुरी तरह से मोड़ दिया.

सिद्धार्थ ने मुझे बताया था कि उन गुंडों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था… वो क्यों आए, ये तो उस ने नहीं बताया. ये भी तब बताया था, जब मैं पूरी तरह से होश में नहीं थी… जब होश में आई तो महसूस हुआ कि चारों तरफ अंधेरा था. पहले तो लगा कि वहम है, या सपना है, पर नहीं… यह हकीकत थी… एक कड़वा सच, जिसे वो चाह कर भी अपना नहीं पा रही थी. मैं अपनी आंखों की रोशनी खो बैठी थी… काफी मुश्किलों से उस ने अपने बिखरते अस्तित्व को संभाला था.

लेकिन, कहते हैं न, हर अंधेरी रात अपने साथ नई सुनहरी सुबह भी लाती है… वैसे ही जारा ने भी उम्मीद के साथ अपनेआप को जिंदगी के इस नए ढांचे में ढाल लिया और अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया और बिलकुल सहज तरीके से जीना शुरू कर दिया. उधर उस के मां, पापा और बाकी सभी रिश्तेदारों ने उस के लिए एक ‘डोनर’ की तलाश शुरू कर दी थी… आखिर कब तक वे अपनी लाड़ली बेटी को इस हालत में देखते.

समय कब किसी के लिए रुका था, जो अब रुक जाता. जनवरी से अप्रैल कब निकल गया, किसी को पता ही नहीं चला. पूरे 5 महीने हो गए थे उस हादसे को. अब तो जारा को भी मानो इस अंधेरी रात की आदत सी हो गई थी. उस ने हादसे के बाद भी बोर्ड की परीक्षा अच्छी तरह पूरी मेहनत और लगन के साथ दी थी.

आज 24 अप्रैल था, उस का बर्थडे… एक ऐसा दिन, जब उसे तोहफे में सब का प्यारदुलार और सुंदरसुंदर उपहार मिलते हैं… इस बार भी वह खुश थी… पर कहां जानती थी कि आज ही उस की बेरंग जिंदगी में एक नया मोड़ आने वाला था… आज हमेशा की तरह सिद्धार्थ घर आया. उस के आने की आहट और उस के वही परफ्यूम की महक, जो मेरे आसपास को महका देती थी, जारा को उस के आने का पता चल गया. उस के आने से ही मानो जारा खुश हो गई, क्योंकि उसे पता था कि इस बार भी उस का गिफ्ट सब से हट कर होगा… वो आया और उस के पास बैठ गया.

उस ने उसे बताया कि वो शहर से बाहर थोड़े दिन के लिए कहीं दूर, छुट्टियों पर जाना चाहता था…

उस की यह बात सुन कर थोड़ी सी हैरानी तो हुई थी उसे, पर फिर सोचा कि 12वीं की परीक्षा है, जिस के बाद थोड़े दिनों के लिए कहीं जा रहा होगा… वो ये सब सोच ही रही थी कि तभी उस ने उस के हाथ में एक लिफाफा पकड़ा दिया और कहा कि इस में बहुत ही कीमती चीज है, जिसे वो उसे सौंप रहा था… लेकिन उस ने उसे वो खोलने नहीं दिया और चुपचाप बिना कुछ कहे ही वहां से चला गया.

जब उस का भाई आया, तो जारा ने उसे वो लिफाफा दिया और खोलने को कहा. उस को खोलने पर पता चला कि उस में एक फोटोफ्रेम था, जिस में उन दोनों के फोटो थे और साथ ही एक चिट्ठी भी थी, जिस में कुछ लिखा था… जिसे पढ़ कर उस की आंखों से आंसुओं की बूंदें लुढ़क आईं. सिद्धार्थ को लास्ट स्टेज कैंसर था और उस का ट्रीटमेंट भी अब नहीं हो सकता था. जातेजाते उस ने अपनी आंखें जारा के नाम कर दी थीं.

ये सब सुन कर उस की आंखें नम हो गईं… वैसे तो उसे खुश होना चाहिए था कि उसे उस की अंधेरी दुनिया में एक बार फिर एक रोशनी की किरण कहीं किसी कोने से आती काले बादलों को हटा रही थी. पर आज वो खुश नहीं, बल्कि दुखी थी इस बात से कि वो कैसे इतनी खुदगर्ज हो गई कि वह उस दोस्त का साथ न दे सकी, जिस ने जिंदगी के हर मोड़ पर उस का साथ दिया था. सिद्धार्थ ने कभी भी उस को ऐसा फील ही नहीं होने दिया कि वह कमजोर है, बल्कि वह तो हमेशा की तरह उस को हिम्मत देता रहा और उसे जिंदगी से डट कर लड़ना सिखाता रहा.

पत्र में उस ने लिखा था, सिर्फ अपनी आंखें ही नहीं, उन से देखे सपने भी तुम्हें सौंप कर जा रहा हूं. अब उन्हें पूरा करना तुम्हारा काम… वह खुद तो चला गया, पर मुझे एक नई जिंदगी दे गया… ऐसी जिंदगी, जिस में रंग भी थे और जीने का एक मकसद भी.

सिद्धार्थ के जाने के बाद मानो मैं ने ठान लिया कि उस के सपने को मैं पूरा कर के ही रहूंगी और शायद इस वजह से ही आज मैं इस मुकाम तक पहुंच पाई थी… सिद्दार्थ का आईपीएस बनने का सपना उस ने पूरा किया. उस की आंखों के सपने को उस ने अपनी मेहनत और लगन से पूरा कर दिखाया था.

जारा इतनी गुम थी उन गलियों में कि उसे पता ही नहीं चला कि कब फंक्शन खत्म हुआ और वह कब अपनी गाड़ी में बैठ गई थी. लेकिन जब होश आया तो वह घर नहीं गई, बल्कि उस गार्डन की ओर चल दी जहां कभी सिद्धार्थ को आना पसंद था.

अपने खत में उस ने यह भी लिखा था कि कहीं कभी जिंदगी के किसी मोड़ पर मेरी याद आए तो आ जाना उस जगह, जहां हवाओं में घुले हों मेरे ख्वाब और जुड़ी हुई हैं हमारी अनगिनत यादें… वो अच्छी तरह समझ गई थी कि वो जगह और कोई नहीं, रोज गार्डन ही थी, जहां सिद्धार्थ सपने देखा करता था. सुंदर और रंगीन सपने, बिलकुल वहां लगे फूलों की तरह.

आज इतने सालों के बाद उस जगह में बैठे हुए उसे सिद्धार्थ के होने का अहसास साफ महसूस हो रहा था. वह मानो उस की यादों से बाहर निकल आज उस जगह जारा के बिलकुल पास बैठा हो उस से बात करता हुआ. उस के होने के एहसास भर से उसे 15 सालों की थकान से आराम मिल गया हो. उसे समझ आया कि ऊपर वाले ने उस को सब से बहुमूल्य नजराना दिया था, उस का दोस्त… उस का साथी… सिद्धार्थ… और सिद्धार्थ का नायाब नजराना था उस की आंखें… जातेजाते भी उस ने अपना सब से हट कर, सब से कीमती, सब से प्यारा तोहफा देने का सिलसिला कायम रखा था.

अब तो ऐसा लगता है मानो वो कोई फरिश्ता था, जो दूर कहीं से बस उसे एक नायाब नजराना देने आया था. वो आया… जारा की जिंदगी का अटूट हिस्सा बन गया… और गया तो अपने पीछे जिंदगी में हजारों रंग भर गया… और छोड़ गया वो सपने, जो उस ने देखे थे. जारा उठी और बढ़ चली अपने सिद्धार्थ के सपनों को हासिल करने.

Writer- सावी मंगला

Hindi Story : भूली-सी पीर – कमला अपनी मालकिन को क्या समझाने की कोशिश कर रही थी

Hindi Story : सब्जी की दुकान में न जाने कहाँ से इतनी भीड़ टूट पड़ी थी .“कमला तुम झोला लेकर ज़रा मेरे आगे-आगे चलना .मैंने अपनी गृह सहायिका को बोला ही था कि एक सज्जन ने मुझे घूरते हुए कहा “मैडम सुना नहीं आपने, अपना काम अब खुद करने की आदत डाल लीजिए .क्यों भई? मैंने उनसे पूछा .“कोरोना का आदेश है बहन जी .अपना काम स्वयं करो, नहीं तो मरो .कहते हुए उन्होंने ठठा कर हँस दिया .बेवक्त की हँसी ने मेरे मन को झुंझलाहट से भर दिया था .फिर भी मैंने आहिस्ता से उनसे कहा, “हाँ भई हाँ ! जानती हूँ .“वैसे आपको बता दूँ कमला मेरे परिवार की सदस्य जैसी ही है .बचपन से मेरे साथ जो रहती आ रही  है .”

उन सज्जन को थोड़ा शांत करते हुए मैंने कमली से पूछा .“अब बता, घर में कौन-सी सब्ज़ी की जरूरत है?” ”आप ही देख लो जिज्जी जो आप को अच्छा लगे उसी की जरूरत बन जाएगी .कमला की ओर मैंने मुड़कर देखा, वह मंद-मंद मुस्कुरा रही थी .“अच्छा, तू मेरा मजाक बना रही है न!” सुनते ही कमला बोली  “राम राम जिज्जी आपकी मजाक बनाऊं तो मेरी जुबान ही कट जाए .“अच्छा ठीक है, बातें मत बना, झोला ठीक से सम्हाल .

“सब्ज़ी खरीदने का काम तुझे ही मुबारक हो कमली .

“ तो फिर जिज्जी आप बाहर चली जाओ,मैं ख़रीद लेती हूँ .

कमला को शायद मेरे ऊपर तरस आ रहा था .“कोई बात नहीं आज तो मैं ही ….मैंने उससे कह तो दिया लेकिन चारों ओर तरह-तरह की सब्जियाँ-फल और ऊपर से सड़ी-गली सब्जियों का ढेर .थोड़ी देर में मेरा मन उकताने-सा लगा था लेकिन समय जब कान खींचता है तब हम शिकायत करने योग्य नहीं बचते हैं .

टमाटर उठाते हुए मैंनेबगल वाली डलिया में झाँका चुआ हरे बंदगोभी मेरी ओर ही टकटकी लगाये देखे जा रहे थे .शायद वे मुझसे कुछ कहना चाहते थे .जब मैंने ये सोचा तो थोड़ा और उनकी ओर झुक गई .वे फुसफुसाकर बोले, “मुझे ख़रीदना मत भूलना .आज सुबह से किसी ने मुझे छुआ तक नहीं है .मैंने झट से एक बड़ा-सा बंदगोभी उठा लिया .अभी मैं उसको घुमा-फिरा कर देख ही रही थी कि बगल में खड़ी बहन जी ने हड़बड़ाते लगभग मेरे ऊपर गिरते कहा…… “छोडो इसे .और याद से इसको कभी मत लेना .“क्यों इसको क्या हुआ है?” मैंने कहा .“अरे, आपने सुना नहीं व्हाट्सएप पर इसकी बड़ी चर्चा और निंदा हो रही है .उन्होंने समझदारी की पलकें मेरी ओर झपकाते हुए कहा .मैंने भी बेफिक्री में कह दिया .“बहन जी, वहाँ बंदगोभीकी चर्चा नहीं,कोरोनावाइरस की चर्चा और चीन की निंदा हो रही है .बहन जी भय से काँपते हुए बोलीं .“अरे! हँसो नहीं मैडम,इसमें “कोरोनावाइरस” के तत्व हैं .अरेss! थकान से भरे मेरे मन ने बस इतना ही बोल पाया .लेकिन बंदगोभी अभी भी मेरे हाथ में मुस्कुरा रहा था .मैं उसको रखने के लिए सोचा ही था कि कमला बोल पड़ी .“जिज्जी इसे झोले में डाल दो, ऐसे तो आप आप थक जाओगी .“कमला, थोड़ा धनिया उठा लाओ और बस चलो,अब घर चलते हैं .”

गाड़ी में पीछे की सीट पर सब्जी का झोला रख कमला भी वहीँबैठने लगी .मैंने उससे कहा “तू पीछे नहीं आगे आकर बैठ .अक्सर मेरे इस “प्रपोजल” से वह चहक उठती थी लेकिन आज उसपर कुछ असर ही नहीं हुआ .कमला क्या हुआ ? “कुछ नहीं जिज्जी.“रियरब्यूमिरर” में झाँक कर वह बोली .“तो फिर तू इतनी उदास क्यों है ?” छोडोन ! जिज्जी.कमली जो बात मन को भारी बना दे उसको कह देने में ही भलाई है .मैंने उससे मनुहार करते हुए कहा तो वह मान गई .”जिज्जी एक बात पूछूँ .“हाँ पूछ न! उसमें इजाज़तलेने की क्या बात है .गाड़ी का स्टेयरिंग घुमाते हुए मैंने कहा .“आप बुरा नमनोतो कहें जिज्जी. आपने बंदगोभी क्यों नहीं खरीदा ? आज तो आप “चाऊमीन” बनवाने वाली थीं .“अच्छा, तो तुम अभी तक बंदगोभी में ही बंद पड़ी हो .“नहीं हँसी बात नहीं जिज्जीसही बताओ न ! अरे कमली, सुना नहीं तूने, उसमें “कोरोनावाइरस” का असर है .“आप भी जिज्जी!” कहते हुए कमला अचानक गहरी उदासी में डूब गई .“तुझे क्या हुआ ? तू इतनी परेशान क्यों दिख रही है.”

“कुछ नहीं जिज्जी.”

“नहीं, अब तो तुझे बताना ही पड़ेगा .मैंने कहा .

मेरे बहुत कहने पर कमला बोली – “अब देखो न जिज्जी ये लोग भी किसी के सगे नहीं  होते , जिससे चाहते हैं अपने मतलब भर काम निकाल कर लोगों को लतिया देते हैं .उस पर मोबाइल और वहाट्सएप, सोने पे सुहागा.“कमला तू पहेलियाँ मत बुझा सीधे-सीधे मुद्दे पर आ और बता, मुझे बात क्या है.”

दुपट्टे से गाल पर लुढ़के आँसुओं को पोंछते हुए वह बोली .“अभी कुछ समय पहले ही तो एक बुखार चला था, दिमाग़ीबुख़ार.“हाँ तो . “तो क्या जिज्जी, उसका जिम्मा भी इसी तरकारी पर आया था और अब “किरोनाबाइस” की जिम्मेवारी भी ………. बेचारा ग़रीब बंदगोभी, अब समझ लो इसके लदने के दिन आ गए .कहते हुए कमला ने निगाहें पैरों पर गढ़ा लीं .“कमला अभी भी कुछ कहने को बाकी है उसे भी कह डाल तुझे सुकून मिलेगा.मैंने गाड़ी सड़क के किनारे लगाते हुए कहा.

जिज्जी!, हाँ बोल न ! कमला क्या हुआ ? कमला हमारी सीट की ओर झुक आई.

“जिज्जीउन मजदूरों का क्या होगा जो पोटली भर गृहस्थी लेकर अपने घरों की ओर चल पड़े हैं ?” “तूने उनको कहाँ देखा ?”अपनी बबिताबेबीमोबाइल में देख रही थी, तभी .कमला की बात सुनकर उत्तर न सूझ रहा था .लेकिन कमला की आँखों से पलायन का दर्द आँसू बनकर एक साथ झरझरा पड़ा था .“तू तो सात बरस की थी कमली जब मुंबई से………तुझे याद है क्या ?”वो कुछ कहती उसके पहले मैंने उसकी धडकनों को अपनी धडकनोंसे मिला लिया था .

लेखिका : कल्पना मनोरमा

Best Hindi Story : सजा – मीता के पति ने उसके साथ क्या किया?

Best Hindi Story : आज होलिका दहन हो रहा था. मेरी बेटी सोनू मेरे पास बैठी होलिका दहन देख रही थी. अचानक सोनू ने कहा,”मम्मी, कल कालेज में हमारी कक्षा में सब बात कर रहे थे कि कालेज की एक लड़की का कुछ दिन पहले बलात्कार हुआ था, अब वह पागल हो गई है. ”
“वास्तव में बेटा यह ऐसा घिनौना सच है कि जब कोई इस से रूबरू होता है, उस के बाद अगर वह मानसिक रूप से कमज़ोर होता है तो सामाजिक बरताव के कारण अपना दिमागी संतुलन खो बैठता है.”
सोनू थोड़ी देर बात कर के अंदर चली गई, पर मेरा मन जैसे अतीत में चला गयाऔर मेरा नासूर बना दर्द वापस जाग्रत हो गया.
होली का दिन था. सब होली खेल कर अपने घर जा चुके थे. शाम होने को आ गई, मेरे पति हमेशा की तरह आज भी अभी तक नहीं आए थे. शराब पी कर कहीं बैठे होंगे. अचानक बारिश शुरू हो गई। बिजली चमक रही थी और बादल गरज रहे थे. मैं और मेरी बेटी सोनू इन का इंतजार कर रहे थे.
रात 12 बजे दरवाजे पर घंटी बजी. मुझे लगा कि मेरे पति आ गए, मैं ने दरवाजा खोला तो अजय खड़ा था. अजय विजय 2 भाई थे, हमारे घर के सामने रहते थे. जब ये दोनों 2 साल के थे तब से मैं इन को जानती थी. आज दोनों 20 साल के हो गए थे. जब भी मेरे पति शराब पी कर किसी नाले के पास पड़े होते थे, तो मैं इन दोनों भाइयों में से किसी एक के साथ जा कर उन्हें लाया करती थी. आज भी अजय जब बुलाने आया तब मुझे कुछ भी अलग नहीं लगा. अजय ने भी शराब पी रखी थी, पूछने पर उस ने कहा, “आंटी, मैं अंकल के साथ ही था, पर अंकल ने इतनी ज्यादा पी ली है कि वे वहीं लेट गए हैं, इसलिए मैं आप को बुलाने आया हूं।”
मैं हर बार उस के साथ हमेशा बिना किसी डर के चली जाती थी, पता नहीं इस बार क्यों किसी अनहोनी होने का अंदेशा होने के कारण मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था. पर मैं ने किसी तरह हिम्मत जुटाई और उस के साथ जाने को तैयार हो गई पर साथ ही अपनी बेटी सोनू का खयाल आया। मैं ने उसे अपनी दोस्त मीता के यहां छोड़ने का फैसला लिया. मैं मीता के पास गई और उसे इतनी रात में जगाया.
मैं ने कहा, “मीता, मैं सोनू को तुम्हारे पास छोड़ रही हूं और मैं अजय के साथ सोनू के पापा को लेने जा रही हूं.”
मैं पहले भी अजय के साथ जा चुकी हूं इसलिए किसी को कुछ अजीब नहीं लगा. मैं अपनी बेटी की तरफ से निश्चिंत हो कर अजय के साथ चली गई.
अजय और मैं नाले की ओर चले गए, जहां अजय ने बताया था कि मेरे पति हैं. वास्तव में वह मुझे गलत जगह ले गया क्योंकि उस की नियत उस दिन खराब थी. वह मेरी बेटी के साथ गलत हरकत करना चाहता था पर जब मैं ने मेरी बेटी को सुरक्षित कर दिया तो वह बौखला गया. उस ने उस बौखलाहट में मेरे ऊपर वार करने शुरू कर दिए और कहने लगा, “मैं तो तेरी बेटी की इज्जत लूटना चाहता था पर उसे तो मैं हासिल नहीं कर सका, इसलिए उस का बदला तुझ से लूंगा।”
मैं ने अपनेआप को बचाने के लिए उसे खूब मारा, उस के बाल भी खींचे पर आखिर में उस ने मेरे सिर पर जोर से टौर्च मार दी और मैं घायल हो गई। उस ने धक्का मार कर मुझे नीचे गिरा दिया और अपना बदला ले लिया.
मैं ने अपनेआप को उठाने की कोशिश की तब तक वह वहां से भाग चुका था. मैं बदहवास सी घर आई, मेरे सिर से खून बह रहा था। पड़ोसियों ने मुझे अस्पताल में भरती करवाया, मैं अंदर से पूरी तरह टूट गई थी. अपनी इज्जत लूटने का गम, विश्वास टूटने का दुख मुझे सामान्य नहीं होने दे रहा था. मेरे पति का नशा जब उतरा और घर आ कर उन्हें इस हादसे का पता चला तो उन्होंने पुलिसथाने में शिकायत दर्ज कराई. पूरे मोहल्ले में हल्ला मच गया था. अजय विजय के घर पर लोगों ने तोड़फोड़ मचा दी थी. पुलिस अजय को ढूंढ़ने लगी, लोगों ने भी अजय को चप्पाचप्पा, गलीगली ढूंढ़ा. आखिर में अजय लोगों की पकड़ में आ गया, लोगों ने पूरे रास्ते उसे जूतेचप्पलों से मारा और पीटते हुए ही मोहल्ले में ले कर आए. उस का मुंह काला कर के सब जगह उसे घुमाया गया फिर उसे पुलिस को सौंप दिया. अजय को जेल हो गई थी.
भले ही दुष्कर्म करने वाले को सजा मिल जाए (कभीकभी तो वह भी नहीं मिलती) पर इस का दर्द इतना गहरा होता है कि पीड़िता को उबरने में सालों लग जाते हैं. कभीकभी वो दर्द नासूर बन जाता है.
इस घटना के बाद सोनू जब विद्यालय जाती, उस समय वह 10वीं कक्षा में पढ़ती थी, उपहास का पात्र बनती थी.  ऐसा लगता था कि उस की मां ने गलती की है. वह घर आ कर घंटों रोती थी. उस ने विद्यालय जाने से मना कर दिया था. इधर मेरा मानसिक संतुलन भी हिल गया था. मुझे लोगों की नजरों के तीर नश्तर की तरह चुभते थे.
मेरे पति ने शराब को हाथ लगाना बंद कर दिया, वह पूरी तरह परिवार के लिए समर्पित हो गए. मुझे समझाते और कहते थे, “इस में तुम्हारा दोष नहीं है, अपराधी तो मैं हूं. न मैं शराब पीता, न यह सब होता.”
मेरे पति मेरा बहुत ध्यान रखते थे, पर मुझे सहानुभूति भी बहुत चुभती थी. अगर मेरे पति गलती से भी मुझ पर हाथ लगाते, तो मैं पागलों की तरह चिल्लाने लगती. मेरे पति भी उस मोहल्ले में असहज महसूस करते थे.
हमारे समाज की विडंबना यही है कि औरत का दोष नहीं हो तब भी अपराधी की दृष्टि से देखा जाता है.  इन सब से बचने के लिए हम ने स्थान परिवर्तन कर लिया ताकि सामाजिक ताने हमें आहत न कर सकें. मैं ने भी अपनेआपको मानसिक रूप से सशक्त बनाने की पहल कर दी थी, जिस से हम सामान्य जीवनयापन कर सकें.

Love Story : होटल ऐवरेस्ट – आखिर क्यों दूर हुए विजय और काम्या?

Love Story : चित्रा के साथ शादी के 9 सालों का हिसाब कुछ इस तरह है: शुरू के 4 साल तो यह समझने में लग गए कि अब हमारा रिश्ता लिव इन रिलेशन वाले बौयफ्रैंडगर्लफ्रैंड का नहीं है. 1 साल में यह अनुभव हुआ कि शादी का लड्डू हजम नहीं हुआ और बाकी के 4 साल शादी से बाहर निकलने की कोशिशों में लग गए. कुल मिला कर कहा जाए तो मेरे और चित्रा के रिश्ते में लड़ाईझगड़ा जैसा कुछ नहीं था. बस आगे बढ़ने की एक लालसा थी और उसी लालसा ने हमें फिर से अलगअलग जिंदगी की डोर थामे 2 राही बना कर छोड़ दिया. हमारे तलाक के बाद समझौता यह हुआ कि मुझे अदालत से अनुमति मिल गई कि मैं अपने बेटे शिवम को 3 महीने में 1 बार सप्ताह भर के लिए अपने साथ ले जा सकता हूं. तय प्रोग्राम के मुताबिक चित्रा लंदन में अपनी कौन्फ्रैंस में जाने से पहले शिवम को मेरे घर छोड़ गई.

‘‘मम्मी ने कहा है मुझे आप की देखभाल करनी है,’’ नन्हा शिवम बोला. उस की लंबाई से दोगुनी लंबाई का एक बैग भी उस के साथ में था.

‘‘हम दोनों एकदूसरे का ध्यान रखेंगे,’’ मैं ने शरारती अंदाज में उस की ओर आंख मारते हुए कहा. ऐसा नहीं था कि वह पहले मेरे साथ कहीं अकेला नहीं गया था पर उस समय चित्रा और मैं साथसाथ थे. पर आज मुझ में ज्यादा जिम्मेदारी वाली भावना प्रबल हो रही थी. सिंगल पेरैंटिंग के कई फायदे हैं, लेकिन एकल जिम्मेदारी निभाना आसान नहीं होता.

मैं ने गोवा में होटल की औनलाइन बुकिंग अपनी सेक्रेटरी से कह कर पहले ही करवा दी थी. होटल में चैकइन करते ही काउंटर पर खड़ी रिसैप्शनिस्ट ने सुइट की चाबियां पकड़ाते हुए दुखी स्वर में कहा, ‘‘सर, अभी आप पूल में नहीं जा पाएंगे. वहां अभी मौडल्स का स्विम सूट में शूट चल रहा है.’’

मन ही मन खुश होते हुए मैं ने नाटकीय असंतोष जताया और पूछा, ‘‘यह शूट कब तक चलेगा?’’

‘‘सर, पूरे वीक चलेगा, लेकिन मौर्निंग में बस 2 घंटे स्विमिंग पूल में जाने की मनाही है.’’

तभी एक मौडल, जिस ने गाउन पहन रखा था मेरी ओर काउंटर पर आई. वह मौडल, जिसे फ्लाइट में मैगजीन के कवर पर देखा हो, साक्षात सामने आ गई तो मुझे आश्चर्य और आनंद की मिलीजुली अनुभूति हुई. कंधे तक लटके बरगंडी रंग के बाल और हलके श्याम वर्ण पर दमकती हुई त्वचा के मिश्रण से वह बहुत सुंदर लग रही थी. उस ने शिवम के सिर पर हाथ फेरा और उसे प्यार से हैलो कहा. शिवम को उस की शोखी बिलकुल भी प्रभावित नहीं कर सकी. ‘काश मैं भी बच्चा होता’ मैं ने मन ही मन सोचा.

‘‘डैडी, मुझे पूल में जाना है,’’ शिवम बोला.

‘‘पूल का पानी बहुत अच्छा है. देखते ही मन करता है कपड़े उतारो और सीधे छलांग लगा दो,’’ मौडल बोली. फिर उस ने काउंटर से अपने रूम की चाबी ली और चल दी. लिफ्ट के पास जा कर उस ने मुझे देख कर एक नौटी स्माइल दी.

थोड़ी देर पूल में व्यतीत करने और डिनर के बाद मैं शिवम के साथ अपने सुइट में आ गया.

अगली सुबह शिवम बहुत जल्दी उठ गया. हम जब पूल में तैर रहे थे तो वह तैरते हुए पूरे शरीर की फिरकी ले कर अजीब सी कलाबाजी दिखा रहा था. मेरी आंखों के सामने कितना रहा है फिर भी मैं नहीं जानता कि वह क्याक्या कर सकता है. मुझे अपने बेटे के अजीब तरह के वाटर स्ट्रोक्स पर नाज हो रहा था. नाश्ते में मैं ने मूसली कौंफ्लैक्स व ब्लैक कौफी ली और उस ने चौकलेट सैंडविच लिया.

10 बजतेबजते सभी मौडल्स पूल एरिया के आसपास मंडराने लगीं. मैं ने वीवीआईपी पास ले कर शूट देखने की परमिशन ले ली. फिर जब तक मौडल्स पूल में नहीं उतरीं, तब तक मैं ने तैराकी के अलगअलग स्ट्रोक्स लगा कर उन्हें इंप्रैस करने की खूब कोशिश की. अपने एब्स और बाई सैप्स का भी बेशर्मी के साथ प्रदर्शन किया.

पूल में सारी अदाएं दिखाने के बाद भी आकर्षण का केंद्र शिवम ही रहा. कभी वह पैडल स्विमिंग करता, कभी जोर से पानी को स्प्लैश करता, तो कभी अपनी ईजाद की गई फिरकी दिखाता. नतीजा यह हुआ कि 4-5 खूबसूरत मौडल्स उसे तब तक हमेशा घेरे रहतीं जब तक वह पूल में रहता. वह तो असीमित ऊर्जा और शैतानी का भंडार था और उस की कार्टून कैरेक्टर्स की रहस्यमयी जानकारी ने तो मौडल्स को रोमांचित कर हैरत में डाल दिया. अगले 2 दिनों में मैं छुट्टी के आलस्य में रम गया और शिवम एक छोटे चुबंक की तरह मौडल्स और अन्य लोगों को आकर्षित करता रहा. मुझे भी अब कोई ऐक्शन दिखाना पड़ेगा, इसी सोच के साथ मैं ने मौडल्स से थोड़ीबहुत बातचीत करना शुरू कर दिया. मुझे पता चला कि वह सांवलीसलोनी मौडल, जो पहली बार रिसैप्शनिस्ट के काउंटर पर मिली थी, शिवम की फ्रैंड बन चुकी है और उस का नाम काम्या है. थोड़ी हिम्मत जुटा मैं ने उसे शाम को कौफी के लिए औफर दिया.

‘‘जरूर,’’ उस ने हंसते हुए कहा और अपने बालों में उंगलियां फेरने लगी.

‘‘मुझे भी यहां एक अच्छी कंपनी की जरूरत है,’’ मैं ने कहा.

हम ने शाम को 8 बजे मैन बार में मिलना तय किया. शादी से आजाद होने के बाद मैं  पहली बार किसी कम उम्र की लड़की से दोस्ती कर रहा था, इसलिए मन में रोमांच और हिचक दोनों ही भावों का मिलाजुला असर था.

‘‘बेटा, एक रात तुम्हें अकेले ही सोना है,’’ मैं ने शिवम को समझाते हुए कहा, ‘‘मैं ने होटल से बेबी सिटर की व्यवस्था भी कर दी. वह तुम्हें पूरी कौमिक्स पढ़ कर सुनाएगी,’’ उस के बारे में मैं ने बताया.

होटल की बेबी सिटर एक 16 साल की लड़की निकली और वह इस जौब से बहुत रोमांचित जान पड़ी, क्योंकि उसे रात में कार्टून्स देखने और कौमिक्स पढ़ने के क्व5 हजार जो मिल रहे थे. इसलिए जितना मैं काम्या से मिलने के लिए लालायित था उस से ज्यादा बेबी सिटर को शिवम के साथ धमाल मचाने की खुशी थी. मैं ने जाते वक्त शिवम की ओर देखा तो उस ने दुखी हो कर कहा, ‘‘बाय डैडी, जल्दी आना.’’

उस मासूम को अकेला छोड़ने में मुझे दुख हो रहा था. अपनी जिम्मेदारी दिखाते हुए मैं ने बेबी सिटर को एक बार फिर से निर्देश दिए और सुइट से बाहर आ गया.

रैस्टोरैंट तक पहुंचतेपहुंचते मुझे साढ़े 8 बज गए. काम्या रैस्टोरैंट में बाहर की ओर निकले लाउंज में एक कुरसी पर बैठी आसमान में निकले चांद को देख रही थी. समुद्र की ओर से आने वाली हवा से उस के बाल धीरेधीरे उड़ रहे थे. शायद अनचाहे ही वह गिलास में बची पैप्सी को लगातार हिला रही थी. वह एक शानदार पोज दे रही थी और मेरा मन किया कि जाते ही मैं उसे बांहों में भर लूं.

मैं आहिस्ता से उस के पास गया और बोला, ‘‘सौरी, आई एम लेट.’’

मेरी आवाज सुन वह चौंक गई और बोली, ‘‘नोनो ईट्स फाइन. मैं तो बस नजारों का मजा ले रही थी. देखो वह समुद्र में क्या फिशिंग बोट है,’’ उस ने उंगली से इशारा करते हुए कहा. बोट हो या हवाईजहाज मेरी बला से, फिर भी मैं ने अनुमान लगाने का नाटक किया. तभी वेटर हमारा और्डर लेने आ गया.

‘‘तुम एक और पैप्सी लोगी?’’ मैं उस के गिलास की ओर देखते हुए बोला.

‘‘वर्जिन मोजितो,’’ उस ने कहा.

मैं ने वेटर को 2 जूस और वर्जिन मोजितो लाने के को कहा.

‘‘शिवम कहां है, सो गया?’’ मेरी ओर देखते हुए काम्या ने पूछा.

‘‘सौरी, उसी वजह से मैं लेट हो गया. उसे अकेले रहना पसंद नहीं है. वैसे वह बिलकुल अकेला भी नहीं है. एक बेबी सिटर है उस के पास. मैं ने पूरी कोशिश की कि वह मुझे कहीं से भी एक गैरजिम्मेदार पिता नहीं समझे.’’

‘‘क्या वह उस के लिए कौमिक्स पढ़ रही है? कहीं वह उसे परेशान तो नहीं कर रही होगी? आप कहें तो हम एक बार जा कर देख सकते हैं.’’

‘‘नहीं,’’ मैं ने जल्दी से मना किया, ‘‘मेरा मतलब है अब तक वह सो गया होगा? तुम परेशान मत हो.’’ फिर मैं ने बात पलटी, ‘‘और तुम्हारा शूट कैसा रहा है?’’

‘‘लगता है अब उन्हें मनचाही फोटोज मिल गई हैं. आज का दिन बड़ा बोरिंग था, मैं ने पूरी किताब पढ़ ली,’’ काम्या के हाथ में शेक्सपियर का हेमलेट था. एक मौडल के हाथ में कोर लिट्रेचर की किताब देख कर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ.

‘‘मैं औनर्स फाइनल इयर की स्टूडैंट भी हूं,’’ उस ने मुसकराते हुए कहा. तभी वेटर हमारी ड्रिंक्स ले आया. वह आगे बोली, ‘‘मैं केवल छुट्टियों में मौडलिंग करती हूं.’’

मैं कुछ कहने के लिए शब्द ढूंढ़ने लगा. फिर बोला, ‘‘मुझे लगा कि तुम एक फुल टाइम मौडल होगी.’’

‘‘मैं खाली समय कुछ न कुछ करती रहती हूं,’’ उस ने एक घूंट जूस गले से नीचे उतारा और कहा, ‘‘कुछ समय मैं ने थिएटर भी किया फिर जरमनी में नर्सरी के बच्चों को पढ़ाया.’’

‘‘तभी तुम्हारी पर्सनैलिटी इतनी लाजवाब है,’’ मैं ने उस की खुशामद करने के अदांज में कहा. उस ने हंसते हुए अपना गिलास खत्म किया और पूछने लगी, ‘‘और आप क्या करते हो, आई मीन वर्क?’’

‘‘मैं बैंकर हूं. बैंकिंग सैक्टर को मुनाफा कमाने के तरीके बताता हूं.’’

‘‘इंटरैस्टिंग,’’ वह थोड़ा मेरी ओर झुकी और बोली, ‘‘मुझे इकोनौमिक्स में बहुत इंटरैस्ट था.’’

मुझे तो अभी उस की बायोलौजी लुभा रही थी. शाम को वह और भी दिलकश लग रही थी. उस के होंठ मेरे होंठों से केवल एक हाथ की दूरी पर थे और उस के परफ्यूम की हलकीहलकी खुशबू मुझे मदहोश कर रही थी.

अचानक उस ने बोला, ‘‘क्या आप को भूख लगी है?’’

मैं ने सी फूड और्डर किया और डिनर के बाद ठंडी रेत पर चलने का प्रस्ताव रखा. हम दोनों ने अपनेअपने सैंडल्स और स्लीपर्स हाथ में ले लिए और मुलायम रेत पर चलने लगे. उस ने एक हाथ से मेरे कंधे का सहारा ले लिया. रेत हलकी गरम थी और समुद्र का ठंडा पानी बीच में हमारे पैरों से टकराता और चला जाता. हम दोनों ऐसे ही चुपचाप चलते रहे और बहुत दूर तक निकल आए. होटल की चमकती रोशनी बहुत मद्धम पड़ गई. सामने एक बड़ी सी चट्टान मानो इशारा कर रही थी कि बस इस से आगे मत जाओ. मैं चाहता था कि ऐसे ही चलता चलूं, रात भर. मैं ने काम्या के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसे चूम लिया. उस ने मेरा हाथ पकड़ा और चट्टान के और पास ले गई. हम ने एकदूसरे को फिर चूमा और काम्या मेरी कमर धीरे से सहलाने लगी. थोड़ी देर बाद वह अचानक रुकी और बोली, ‘‘मुझे शिवम की चिंता हो रही है.’’ मैं उस पर झुका हुआ था, वह मेरे सिर को पीछे धकेलने लगी. मैं ने उस के हाथ को अपने हाथ में लिया और चूमा. वह जवाब में हंसने लगी.

‘‘सौरी’’ काम्या बोली, ‘‘मुझे चूमते वक्त आप का चेहरा बिलकुल शिवम जैसा बन गया था. कुछकुछ वैसा जब वह ध्यान से पानी में फिरकी लेता है.’’

प्यार करते वक्त अपने बेटे के बारे में सोचने से मेरी कामुकता हवा हो गई. मैं दोनों चीजों को एकसाथ नहीं मिला सकता.

‘‘विजय, क्या आप परेशान हैं?’’ वह मेरे कंधे पर अपना सिर रखते हुए बोली, ‘‘मुझे लगा कि हम यहां मजे कर रहे हैं और मासूम शिवम कमरे में अकेला होगा, इसलिए मुझे थोड़ी चिंता हो गई.’’

‘‘हां, पर उस के लिए बेबी सिटर है.’’

‘‘पर आप ने कहा था न कि उसे अकेला रहना पसंद नहीं,’’ काम्या होंठों को काटते हुए बोली, ‘‘क्या हम एक बार उसे देख आएं?’’

‘‘बेबी सिटर उस की देखभाल कर रही होगी और कोई परेशानी हुई तो वह मुझे रिंग कर देगी. मेरा मोबाइल नंबर है उस के पास,’’ कहते हुए मैं ने जेब में हाथ डाला तो पाया कि मोबाइल मेरी जेब में नहीं था. या तो रेत में कहीं गिर गया था या मैं उसे सुइट में भूल आया था.

‘‘चलो, चल कर देखते हैं,’’ काम्या बोली.

वक्त मेरा साथ नहीं दे रहा था. एक तरफ एक खूबसूरत मौडल बांहें पसारे रेत पर लेटी थी और दूसरी ओर मेरा बेटा होटल के सुइट में आराम कर रहा था. उस पर परेशानी यह कि मौडल को मेरे बेटे की चिंता ज्यादा थी. अब तो चलना ही पड़ेगा.

‘‘चलो चलते हैं,’’ कहते हुए मैं उठा. हम दोनों जब होटल पहुंचे तो मैं ने उसे लाउंज में इंतजार करने को कहा और बेटे को देखने कमरे में चला गया. शिवम मस्ती से सो रहा था और बेबी सिटर टैलीविजन को म्यूट कर के कोई मूवी देख रही थी.

‘‘सब ठीकठाक है? मेरा मोबाइल यहां रह गया था, इसलिए मैं आया,’’ मैं ने दरवाजे को खोलते हुए कहा.

बेबी सिटर ने स्टडी टेबल पर रखा मोबाइल मुझे पकड़ाया तो मैं जल्दी से लिफ्ट की ओर लपका. लाउंज में बैठी काम्या फिर आसमान में देख रही थी. वह बहुत सुंदर लग रही थी पर थोड़ी थकी हुई जान पड़ी. उस ने कहा कि वह थकी है और सोने जाना चाहती थी.

यह सुन कर मेरा मुंह लटक गया, ‘‘मुझे आज रात का अफसोस है,’’ मैं ने दुखी स्वर में कहा, ‘‘मैं तो बस चाहता था कि…’’ मैं कहने के लिए शब्द ढूंढ़ने लगा.‘‘मुझ से प्यार करना?’’ वह मेरी आंखों में देखते हुए बोली.

‘‘नहीं, वह…’’ मैं हकलाने लगा.

‘‘शेक्सपियर का हेमलेट डिस्कस करना?’’ वह हंसते हुए बोली. ठंडी हवाओं की मस्ती अब शोर लग रही थी. ‘‘मुश्किल होता है जब बेटा साथ हो तो प्यार करना और आप एक अच्छे पिता हो,’’ वह बोली.

‘‘नहींनहीं मैं नहीं हूं,’’ मैं ने उखड़ते हुए स्वर में कहा.

‘‘आज जो हुआ उस के लिए आप परेशान न हों. आप जिस तरह से शिवम के साथ पूल में खेल रहे थे और उस के साथ जो हंसीमजाक करते हो वह हर पिता अपने बच्चे से नहीं कर पाता. आप वैसे पिता नहीं हो कि बेटे के लिए महंगे गिफ्ट ले लिए और बात खत्म. आप दोनों में एक स्पैशल बौंडिंग है,’’ काम्या बोली.

‘‘मैं आज रात तुम्हारे साथ बिताना चाहता था.’’

‘‘मुझे भी आप की कंपनी अच्छी लग रही थी पर मैं पितापुत्र के बीच नहीं आना चाहती.’’

‘‘पर तुम…’’ मैं ने कुछ कहने की कोशिश की पर काम्या ने मेरे होंठों पर उंगली रख दी और बोली, ‘‘कल मैं जा रही हूं, पर लंच तक यहीं हूं.’’

‘‘मैं और शिवम तुम से कल मिलने आएंगे,’’ मैं ने कहा.

‘‘आप लकी हैं कि शिवम जैसा बेटा आप को मिला,’’ काम्या बोली.

जवाब में मैं ने केवल अपना सिर हिलाया और फिर अपने सुइट में लौट आया.

Men’s Fashion : पुरुषों में बढ़ता फैशन सेंस

Men’s Fashion : सौंदर्य का मसला अब सिर्फ औरतों से सम्बंधित नहीं रह गया है. मीडिया कंपनियों, प्राइवेट फर्म्स, मल्टीनैशनल कंपनियों ने स्मार्ट लुक वाले पुरुषों को नौकरी में प्राथमिकता दे कर पुरुषों को भी खुद पर खर्च करने के लिए मजबूर किया है, तो वहीं बाजार ने भी पुरुषों को सौंदर्य प्रसाधनों का गुलाम बना दिया है.

श्यामली एक कंपनी में सेल्स मैनेजर के पद पर कार्यरत है. उस का पति अंकुर भी एक कंपनी में सीनियर मैनेजर है. दोनों ही काफी अपटूडेट रहते हैं. अपने लुक्स और कपड़ों को ले कर अंकुर श्यामली से ज्यादा टाइम और पैसा खर्च करता है. श्यामली जब शौपिंग के लिए जाती है तो 10-12 हजार रुपए में उस की कई मौर्डर्न ड्रैसेस आ जाती हैं. 5-6 हजार रुपए वह महीने दो महीने में ब्यूटीपार्लर, फुटवियर, पर्स आदि पर खर्च कर देती है. मगर अंकुर जब भी अपने लिए शौपिंग करता है 25-30 हजार रुपए किसी मौल में ब्रांडेड कपड़ों की खरीदारी में ही फूंक आता है. फिर उस के ब्रांडेड जूते, सैलून का खर्च, ब्रांडेड परफ्यूम-पाउडर आदि का खर्च अलग. हर पांच छह महीने में वह अपना लैपटौप बैग भी बदल देता है. बौडी शेप में रखने के लिए वह रोज सुबह जिम जाता है, जिस का खर्च अलग होता है.

इस खर्च को ले कर कई बार दोनों में कहासुनी भी हो जाती है. श्यामली कहती है, “औरतों पर बेकार ही आरोप लगते हैं कि वे अपने पतियों की कमाई लुटाती हैं, मगर यहां तो उलटा है. तुम जितना पैसा खुद को सजाने संवारने में लगाते हो उतना तो तीन औरतें मिल कर नहीं उड़ातीं हैं. अगर मैं नौकरी ना करूं तो तुम्हारी अकेले की सैलरी में तो घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाए.”

अंकुर हिसाब लगाता है तो श्यामली की बात ठीक भी लगती है मगर क्या करे औफिस और आएदिन होने वाली औफिस की मीटिंग-पार्टियों में स्मार्ट दिखना भी जरूरी है. इस के लिए जब तक ब्रांडेड कपड़े न हों, ब्रांडेड जूते, ब्रांडेड पर्स आदि न हों, परफैक्ट लुक ही नहीं आता है. अब ब्रांडेड चीजें तन पर हों तो चेहरा और फिजीक भी तो अच्छा दिखना चाहिए इसलिए सैलून में जा कर सिर्फ हेयर-कट करा लेने से बात नहीं बनती, चेहरे पर ब्लीच-फेशियल, हेयर स्पा, हेयर कलर, मेनिक्योर-पेडीक्योर भी बहुत जरूरी होता है. स्वस्थ रहने के लिए जिम जाना भी जरूरी लगता है. न जाए तो वजन बढ़ने लगता है.

आज की उपभोक्तावादी संस्कृति में पुरुष भी फैशन के मामले में पीछे नहीं है. आज फैशन का परिदृश्य काफी बदल गया है. पहले के दिनों में पुरुषों के लिए फैशन सिर्फ सादे शर्टपैंट तक सीमित था, लेकिन अब वे अपने स्टाइल और लुक के प्रति बहुत जागरूक हो गए हैं. इस में बुराई भी नहीं है. पुरुषों में फैशन सेंस का बढ़ता चलन एक सकारात्मक बदलाव है. यह पुरुषों को अपनी व्यक्तिगत शैली विकसित करने और अपने व्यक्तित्व को व्यक्त करने का अवसर भी प्रदान करता है.

सौंदर्य का मसला अब सिर्फ औरतों से सम्बंधित नहीं रह गया है. मीडिया कंपनियों, प्राइवेट फर्म्स, मल्टीनैशनल कंपनियों ने स्मार्ट लुक वाले पुरुषों को नौकरी में प्राथमिकता दे कर पुरुषों को भी खुद पर खर्च करने के लिए मजबूर किया है, तो वहीं बाजार ने भी पुरुषों को सौंदर्य प्रसाधनों का गुलाम बना दिया है. बड़ीबड़ी कंपनियों के सौंदर्य उत्पाद का प्रचार जब शाहरुख खान या अक्षय कुमार जैसे बड़ेबड़े अभिनेता छोटेबड़े परदे पर करते हैं, तो हर पुरुष चाहता है कि वह ब्रांड उस की अलमारी में भी हो.

वैसे अच्छे कपड़े पहनने और स्मार्ट दिखने से इंसान का खुद पर कान्फिडेंस भी बढ़ता है. इस से कार्यक्षमता भी बढ़ती है. स्मार्ट लुक वाले पुरुषों से सभी मेलजोल बढ़ाना चाहते हैं, बात करना चाहते हैं. औफिस में चुस्त और स्मार्ट वर्कर को प्रमोशन आसानी से मिल जाता है. वह बौस की नजरों में भी रहता है. यदि औफिस के किसी काम से या किसी से डील करने के लिए बौस किसी कर्मचारी को भेजना चाहे तो वह सब से पहले यह देखता है कि कौन ज्यादा स्मार्ट और अच्छे कपड़े पहने है. तो आज के समय में पुरुष यदि खुद को बेहतर दिखाने के लिए पैसे खर्च कर रहे हैं, तो इस में बुराई नहीं है.

हाल ही में एक सर्वे में पाया गया है कि आजकल औरतों से ज्यादा पुरुष खुद को संवारने, देखभाल करने और सोने व जिम करने में वक्त और पैसा खर्च करते हैं. पुरुष अपने मनोरंजन के लिए भी काफी समय निकाल लेता है. वह टीवी, वीडियो गेम, खेलकूद, जिम आदि में समय व्यतीत करता है और खुद को तनावमुक्त रखने में सफल होता है, जबकि औरत यदि नौकरीपेशा है तो उसे इन चीजों को करने के लिए वक़्त ही नहीं मिलता है. क्योंकि औफिस जाने से पहले का तमाम समय और औफिस से लौटने के बाद का पूरा समय उसका किचन में ही बीतता है. इस काम में ज्यादातर पुरुष अपनी पत्नियों की कोई मदद नहीं करते हैं. यहां तक कि जिन घरों में बच्चे हैं वहां बच्चों की पढ़ाई और अन्य क्रियाकलापों की भी पूरी जिम्मेदारी औरत के कंधे पर होती हैं. ऐसे में उसे अपनी साजसंवार के लिए कोई ख़ास समय भी नहीं मिलता है.

अब रफ-एंड-टफ वाला समय नहीं रहा. घर पर भी लड़के अब कुर्ते पायजामे में नहीं दिखते बल्कि ट्रैक सूट, बरमूडा-टी-शर्ट में नजर आते हैं. कुर्ते पायजामे वाला लुक उन को ज्यादा गंभीर और प्रौढ़ बनाता है जबकि बरमूडा जवान और चुस्त लुक देता है. आज किशोरावस्था से ही पुरुष स्मार्ट लुक पाने के लिए प्रयासरत हो जाता है. सैलून में जा कर बालों को कलर करवाना, नईनई हेयर कटिंग ट्राय करना, फेशियल आदि करवाना तो कम आय वाले निम्न तबके के पुरुषों के लिए भी आम बात होती जा रही है, फिर मध्यम और उच्च वर्ग की बात क्या कहें.

जवान ही नहीं अब तो 50 पार के प्रौढ़ और 70 पार के बूढ़े भी दो दशक पहले पहने जा रहे परिधानों को त्याग चुके हैं. 40-50 की उम्र में पैंटशर्ट की जगह टाइट जींस और टीशर्ट पहन कर खुद को 30-35 का महसूस करते और फिर उसी चुस्ती फुर्ती से काम करते लोग बड़ीबड़ी कम्पनीज में खूब दिखते हैं. अब सुबह की सैर पर जाते बूढ़ों पर निगाह डालिए. कुरता पायजामा पहने शायद ही कोई नजर आता हो. अधिकतर बूढ़े ट्रैक सूट, बरमूडा या हाफ पैंट टीशर्ट में ही दिखेंगे. पैरों में स्पोर्ट्स शूज और आंखों पर गौगल्स चढ़ाए पार्क में टहलते बुजुर्गों को देख कर ख़ुशी होती है कि बुढ़ापे की नीरसता त्याग कर जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी वे जोश से ओतप्रोत हैं. शायद यही वजह है कि अब इंसान की उम्र भी बढ़ रही है. पहले जहाँ पचास साल के आदमी के चेहरे पर बुजुर्गियत के भाव झलकने लगते थे और साठ के करीब आतेआते वह बीमार सा नजर आने लगता था, अब 80 साल की उम्र में भी चुस्त दुरुस्त दिखता है. ऐसे में पुरुष का खुद पर पैसे खर्च करना और खुद की साजसंवार पर ज्यादा समय लगाना अच्छा ही है. औरतों को इस पर सवाल नहीं उठाना चाहिए.

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