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Best Hindi Story : जमाना बदल गया – क्या हुआ धवला के साथ

Best Hindi Story : खुद में खोई रहने वाली धवला की कहानी है यह. बला की खूबसूरत, बेइंतिहा अदाओं वाली धवला की कहानी. धवला… मातापिता ने शायद उस के दूधिया रंग की वजह से उस का नाम रखा होगा. रूई के फाहे के जैसा कोमल और मुलायम. उस का अंगप्रत्यंग जैसे कुदरत ने खास शौक से गढ़ा था. उस के जैसा तो कोई दूसरा हो ही नहीं सकता. सारा सोना उस के बालों में जड़ दिया था, शायद तभी तो सुनहरी उड़ती जुल्फें कयामत ढाती थीं.

संगमरमरी माथे पर जब सुनहरी लटें बलखाती थीं तो ऐसा लगता था मानों हिमालय के सीने पर सूरज पिघलने लगा हो और बेबसी ऐसी कि बस पिघलते जाओ, पिघलते जाओ, जब तक फना न हो जाओ.

सुर्ख गालों की लाली, तपते अंगारे और उन का करम इतना कि हरकोई चाहे कि उन की तपिश में अपने हाथ जला ले. ग़ुलाबी मुसकराते होंठों से झांकती दंतपंक्तियां और सुराहीदार गरदन जो देखने वालों की प्यास बढ़ा दें और वह चातक की तरह उस की एक बूंद को भी तरसे. कुदरत ने 1-1 अंग ऐसे तराश कर बनाया था कि अंजता की मूरत भी फीकी पड़ जाएं.

खूबसूरती, नजाकत और अदाओं की मलिका धवला अपने नैसर्गिक सौंदर्य के साथ ही तीक्ष्ण मस्तिष्क की स्वामिनी भी थी. स्कूल में हर क्लास में नंबर वन, कालेज में नंबर वन… इन सभी विशेषताओं के होते हुए भी उस में न तो घमंड था न ही वह बदतमीज थी. बहुत ही कूल नैचर था उस का. जिस से मिलती, बस उसे अपना बना लेती. सभी प्लस पौइंट थे उस में, सिर्फ एक माइनस पौइंट था, वह यही कि वह मनमौजी थी, वही करती जो उसे करना होता. सहीगलत कभी नहीं सोचती, बस उसे जो अच्छा लगा यानी वही सही.

धनाढ्य परिवार में जन्मीं धवला परिवार में भी सभी की प्रिय थी. पापामम्मी, दादादादी, चाचाचाची सभी की लाड़ली धवला जिस चीज पर हाथ रख देती, बस अगले पल वह उस के हाथों में होती. धवला का सब से अच्छा दोस्त उस का छोटा भाई रंजन था. दोनों भाईबहन एकदूसरे पर जान छिड़कते थे. सबकुछ अच्छा था, सबकुछ सामान्य था, लेकिन कुछ तो था जो अलग था धवला में.

कहने को तो मैं उस की मौसी थी लेकिन बचपन से धवला और मैं फ्रैंडली थे. उस का मौसी बोलना मन मोह लेता था. मुझे कभीकभी उस की बहुत फिकर होती थी. ऐसा लगता था कि मैं उसे जीवन की गहराई को समझाऊं, उसे बताऊं कि जिंदगी सिर्फ सपनों में खोए रहने का नाम नहीं है, जमीनी हकीकत से जब सामना होता है, तो खुद को संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है.

हां, उसे कभी भी कोई कांटा भी न चुभे, लेकिन अगर ऐसा हुआ तो न वह बरदाश्त कर पाएगी और न ही हम. लेकिन कभी मौका नहीं मिला या समझ में नहीं आया कि उसे जीवन की सचाई से कैसे रूबरू करवाऊं, क्योंकि वह तो जब भी मिली भोली सी मुसकान के साथ और साफ दिल से, बस गले लग जाती और सुना देती कोई नया स्वप्निल सा किस्सा. उस की दुनिया में तो सबकुछ हाईप्रोफाइल था. ब्रैंडेड शौपिंग, ब्रैंडेड ऐक्सेसरीज, मौल्स, हाईफाई लाइफस्टाइल, घूमनाफिरना, मौजमस्ती, हंसनाखिलखिलाना, इसी को वह दुनिया समझती थी.

यह तो वह खूब जानती थी कि कुदरत ने उसे बेइंतिहा खूबसूरत बनाया है. जब लोगों की निगाहें उस पर ठहरती थीं उस का दूधिया चेहरा गुलाबी हो जाता था. स्कूल के दिनों से ही कई लड़के उस के दीवाने थे, लेकिन धवला हर किसी को घास नहीं डालती थी. अपने स्टेटस से मैच करते हुए लड़के को सिलैक्ट करती, कुछ दिन उस के साथ मिलतीजुलती, लेकिन जल्द ही बोर हो जाती और फिर नया ब्रैंडेड बौयफ्रैंड चुन लेती. कपड़ों की तरह ही इन लड़कों को ज्यादा दिन झेल नहीं पाती और बदल देती.

“आशी, धवला की सगाई पक्की कर दी है, लड़का अपने शहर का ही है, परसों कार्यक्रम है, तुम कल ही आ जाओ,” धवला की मां शालिनी ने फोन पर मुझे शौर्ट नोटिस दिया.

“अरे दीदी, इतनी जल्दी में यह सब…धवला तैयार है न?” मैं ने पूछा.

“हां जी, तैयार है, खुश है, शौपिंग में लगी है. तुम कल सुबह ही तशरीफ ले आओ, तुम्हारी लाड़ली भांजी की सगाई है…”

“दीदी, वह तो है…मेरी क्या, वह तो हम सब की लाड़ली है, मैं सुबह आती हूं,” दीदी ने फोन रख दिया, पर मेरा दिमाग चकरा रहा था. ये लोग कुछ जल्दी तो नहीं कर रहे हैं? धवला को कहां अभी शादी की गहराई पता है? शादी को निभाना बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है, धवला बेशक बहुत प्यारी है, मेरी जान है लेकिन शादी…कल मैं खुद उस से बात करूंगी.

सुबह के 8 बजे थे. घर में चहलपहल शुरू हो चुकी थी, हरकोई अपनेअपने स्तर पर काम में व्यस्त था, रिश्तेदारों को फोन लगाए जा रहे थे, सभी जगह बुकिंग कर व्यवस्थाएं की जा रही थीं, लेकिन धवला अभी बेफिक्र सो ही रही थी.

“धवला, गुडमौर्निंग… उठो अभी तक सो रही हो, उठोउठो जल्दी से उठो डियर,” मैं ने धवला को जगाते हुए कहा.

“ओह… मौसी लव यू…वेरी गुडमौर्निंग,” वह मुझे देख कर एकदम खुशी से बोली और लिपट गई.

“बधाई हो, तुम ने तो सरप्राइज कर दिया, बताया भी नहीं और एकदम सगाई…” मैं बोली.

“क्या मौसी… मम्मापापा ने कहा, तो मैं ने सोचा यह ऐक्सपीरियंस कर के भी देख लें. आओ दिखाती हूं कल की ड्रैस और ज्वैलरीज, एकदम क्लास, बैस्ट बुटीक से लहंगा लिया है. मौसी, आई एम सो ऐक्साइटेड,” धवला मासूमियत से बोली.

“हां बेटू, आई नो वेरी वेल, बट लाइफ इछ नौट एन ऐक्साइटमैंट ओनली, इट इज वैरी बिग चेलैंज,” मैं ने धवला को कुछ समझाने का प्रयास किया.

“ओह… माई स्वीट मौसी, डोंट वरी, ट्राई करने मे क्या जाता है, सूट नहीं किया तो बायबाय…” धवला हंसती हुई बोली.

“नहीं बेटा, ऐसा नहीं होता, शादी बहुत बड़ा और गंभीर फैसला है, इसे मजाक में नहीं लिया जा सकता… और..”

“मौसी…आप भी न, बहुत स्वीट हो. अपनी इस मिडिल क्लास सोच को बदलो. ऐंजौय… लाइफ को ऐंजौय करो, इतना टैंशनफुल मत बनाओ,” धवला मुसकान बिखेरती हुई बोली.

“चलोचलो… नाश्ता लग गया है, आ जाओ टेबल पर,” तभी शालिनी कमरे में आते ही बोली.

“दीदी, सब अच्छे से पता कर लिया है न, सबकुछ धवला के हिसाब से है न,” मैं ने दीदी से पूछा.

“ओए… जिंदगी की प्रोफैसर, सबकुछ ठीक है, वे लोग हम से भी ज्यादा रईस हैं, नौकरचाकर किसी चीज की कमी नहीं. धवला वहां भी ऐसे ही रहेगी, जैसे यहां रहती है, चिंता मत कर,” शालिनी ने विश्वास दिलाया.

“मम्मा, मौसी भी न, कुछ ज्यादा ही सोचती हैं, कूल मौसी कूल…” धवला अपने बालों को समेटते हुए बोली.

“लव यू डियर, चल जल्दी से फ्रैश हो कर नाश्ते पर आ जा,” मैं ने धवला को चूमते हुए कहा.

“मौसी, मम्मी बुला रही हैं आप को,” तभी धवला के छोटे भाई रंजन ने आ कर कहा.

“हां आती हूं,” कह कर मैं डाइनिंगरूम की तरफ बढ़ गई. आलीशान पार्टी का इंतजाम था, धवला तो जैसे कोई परी की तरह लग रही थी, मासूमियत से भरी खूबसूरत बला. हर किसी की निगाहें उसी पर टिकी हुई थीं. धवला नजाकत से हर ऐंगल से अपने फोटो खिंचवाने मे तल्लीन थी, जैसे सगाई कोई त्योहार है और बढ़िया से तैयार हो कर खूब फोटो सैशन करना है.

लड़के ने धवला को डायमंड रिंग पहनाई, धवला फूली नहीं समा रही थी, फिर धवला ने भी लड़के को डायमंड रिंग पहनाई. आसमान से हेलीकौप्टर के द्वारा फूल बरसाए गए. अद्भुत स्वप्निल नजिरा था, धवला तो जैसे उड़ीउड़ी जा रही थी, उस की अपनी ख्वाबों की दुनिया में. सबकुछ बढ़िया से निबट गया. अगले दिन मैं भी धवला को ढेरों शुभकामनाएं दे कर घर लौट आई.

अभी 15 दिन ही बीते थे कि 1 दिन दीदी का फोन आया, “सुन, धवला कह रही है कि उसे शादी नहीं करनी, एमबीए करने बंगलुरू जाना है…”

“दीदी, क्या आप भी… उसे समझाइए, मुझे तो पहले से ही इस बात की चिंता थी, उस का नैचर ही ऐसा है. वह ज्यादा दिनों तक एकजैसा जीवन नहीं जी सकती, उसे नित नए ऐक्सपीरियंस करने होते हैं, लेकिन जीवन में ऐसा नहीं होता, मैं आऊं क्या उस को समझाने के लिए?”

“कोई फायदा नहीं, उस ने जो सोच लिया है वही करेगी, हम यह सगाई तोड़ रहे हैं, आज लड़के वालों को बता देंगे, अब क्या करें जब धवला का मन ही नहीं है,” शालिनी ने संयमित शब्दों में कहा.

“जैसा तुम लोग ठीक समझो,” मैं ने भारी मन से फोन रख दिया. धवला बंगलुरू चली गई. कुछ दिनों बाद पता चला कि वहां किसी के साथ लिवइन में रह रही है. उस का फोन आता रहता, वह अपनी बातें मुझ से शेयर करती रहती. मैं उसे समझाती तो मुझे प्यार से झिड़की दे कर फोन बंद कर देती. अब तो उस की लाइफ स्वच्छंद थी, हाईप्रोफाइल जौब भी था. पैसे से मांबाप का सौलिड सपोर्ट था, बस रोज पार्टियां, मौजमस्ती…  धवला को यह सब अच्छा लग रहा था.

2 सालों तक जौब करने के बाद  उस ने सूचित किया कि वह लिवइन पार्टनर से शादी कर रही है. कहीं कुछ सुकून मिला, यह सोच कर कि लिवइन में रह कर उस ने शादी का फैसला किया है तो शायद उसे उस का सच्चा साथी मिल गया है. सभी खुश थे. दीदी, जीजाजी ने एक गेटटूगेदर पार्टी भी दी, जिस में रिश्तेदारों और परिचितों को बुला कर इस शादी से अवगत करवाया. फंक्शन में मैं ने धवला के हसबैंड प्रथम से बातचीत की, लड़का सुलझे विचारों का था, संतोष हुआ कि चलो, वह धवला को अच्छी तरह समझता है और निभ जाएगा.

“जीजू, कुछ दिन यहीं रुकते न आप,” रंजन ने प्रथम से कहा.

“नहीं रुक सकते प्रथम, एक प्रोजैक्ट पर काम चल रहा है, तुम चलो हमारे साथ बंगलुरु,” प्रथम बोला.

“जीजू, मैं ने अभी अभी पापा का औफिस जौइन किया है, थोडा काम समझ लूं, फिर आता हूं न आप के पास,” रंजन हंसते हुए बोला.

“हां, अब इस की भी तो शादी करनी है, कब तक बचेगा बच्चू,” मैं ने हौले से रंजन के कान उमेठते हुए कहा.

“अरे अभी नहीं मौसी…” रंजन वहां से भाग लिया. लेकिन कब तक भागता, कुछ ही महिनों मे रंजन का रिश्ता भी पक्का हो गया. जीजाजी के फ्रैंड की बेटी शमिता को रंजन के लिए चुन लिया गया. शमिता के पिता शहर के नामी बिल्डर थे, बस दोनों परिवार एकदूसरे जानते थे, बात पक्की हो गई. विवाह के अवसर पर धवला और प्रथम भी आए थे. धवला कुछ उखड़ी सी लगी, मेरा माथा ठनका. मैं ने अकेले में धवला से पूछा, “सब ठीक है न…”

“नहीं, मौसी… अब यह प्रथम बच्चे के लिए जिद कर रहा है.”

“बेटा, वह तो नैचुरल है, शादी की है तो बच्चा भी तो चाहिए न…” ”

“मौसी, बच्चवच्चे के लिए मैं ने शादी नहीं की है, बट यू डोंट वरी, मैं प्रथम को समझा लूंगी…”

“क्या समझाओगी, बेटा मैं भी यही कहूंगी कि अब तुम्हें बच्चे के बारे में सोचना चाहिए…”

“आप कुछ मत कहो, आप तो कुछ समझतीं ही नहीं… मौसी, जिंदगी ऐंजौय का नाम है, यह सब टैंशन पालने का नहीं. एक तो मम्मा से भी आज लड़ाई हो गई. मौसी, वे मेरे लिए शमिता से हलका लहंगा लाईं. आप को तो पता है मैं हमेशा बैस्ट चीज ही पहनती हूं. मुझे नहीं पहनना उन का लाया हुआ लहंगा, मैं जो ड्रैस लाई हूं उसी में बैस्ट सिलेक्ट करूंगी, पर पहनूंगी तो बैस्ट ही…”

मुझे एक दूसरे युद्ध की आहट सुनाई पड़ रही थी, क्योंकि अब तक तो घर में धवला ही सर्वोपरि थी, लेकिन अब नई बहू आ रही थी, जो हैसियत में धवला से कम न थी. विवाह निबट गया, रंजन और शमिता हनीमून के लिए सिंगापुर चले गए, प्रथम भी अब धवला से चलने को कह रहा था. लेकिन धवला टाल रही थी,”मौसी, मैं कुछ दिन आप के साथ रहना चाहती हूं, चलूं आप के साथ?” धवला ने अचानक कहा.

“हांहां…चल न, प्रथम और तू दोनों कुछ दिन मेरे साथ रहो,” मैं ने खुशी से कहा.

“नहीं मौसी, प्रथम को तो कल जाना पड़ेगा, अर्जेंट काम है, मैं अकेली ही चलूंगी आप के घर…”

“ठीक है बेटा, जैसा तुम लोग ठीक समझो…” अगले दिन प्रथम बंगलुरू  चला गया और धवला मेरे साथ मेरे घर आ गई.

“तू बैठ, मैं कौफी बना कर लाती हूं…”

दोनों साथ बैठ कर कौफी पी रहे थे, तभी धवला बोली, “मौसी, आप कितनी लकी हो, आप ने शादी नहीं की, आराम से अपने हिसाब से जीती हो…”

“हां… मैं ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

“मौसी, वैसे आप ने शादी क्यों नहीं की?”

“बेटा, था कुछ ऐसा…”

“क्या था, प्लीज बताओ न?”

“धवला, मैं जिन से प्यार करती थी, मजबूरीवश उसे कहीं और शादी करनी पड़ी, पर मैं तो दिल से उसे ही सबकुछ मान बैठी थी, उस के अलावा किसी और से शादी करने का विचार भी कभी मन में नहीं आया…”

“क्या, एक ऐसा आदमी जिस ने आप को धोखा दिया, बीच मझदार छोड़ दिया उस के लिए आप ने अपनी सारी जिंदगी खत्म कर दी, क्या मिला आप को?”

“आत्मिक सुख, अपने प्यार के लिए सदैव समर्पित रहने का सुख…”

“वाह मौसी, यू आर ग्रेट…अब सुनो, मैं अब प्रथम के पास वापस नहीं जाऊंगी. उस की सोच मुझ से बिलकुल अलग है. मम्मापापा के घर अब मुझे वह अपनापन नहीं लगता. शमिता के आ जाने से उन में फर्क आ गया है. मौसी, मैं तुम्हारे पास रह सकती हूं न? कुछ दिनों में मेरी जौब लग जाएगी, तो मैं अलग घर ले लूंगी, चलेगा न मौसी,” धवला ने फैसला सुना दिया.

मैं ऐसे ही किसी फैसले के लिए पहले से तैयार थी इसलिए ज्यादा हैरानी नहीं हुई. अब कमरे में 2 शख्स बैठे थे, एक जिस ने प्यार के खातिर अकेलापन अपनाया था और एक वह जो प्यार का मतलब ही समझ नहीं पाई थी. मैं अपनी पुरानी यादों में खोई थी और धवला फेसबुक पर नई फ्रैंड रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट कर रही थी. जमाना वाकई बहुत बदल गया है.

Hindi Kahani : दबी हुई परतें – जीजा जी के जाने के बाद क्या हुआ दीदी के साथ

Hindi Kahani : हमारे संयुक्त परिवार में संजना दी सब से बड़ी थीं. बड़ी होने के साथ लीडरशिप की भावना उन में कूटकूट कर भरी थी. इसीलिए हम सब भाईबहन उन के आगेपीछे घूमते रहते थे और वे निर्देश देतीं कि अब क्या करना है. वे जो कह दें, वही हम सब के लिए एक आदर्श वाक्य होता था. सब से पहले उन्होंने साइकिल चलानी सीखी, फिर हम सब को एकएक कर के सिखाया. वैसे भी, चाहे खेल का मैदान हो या पढ़ाईलिखाई या स्कूल की अन्य गतिविधियां, दीदी सब में अव्वल ही रहती थीं. इसी वजह से हमेशा अपनी कक्षा की मौनीटर भी वही रहीं.

हां, घरेलू कामकाज जैसे खाना बनाना या सिलाईबुनाई में दीदी को जरा भी दिलचस्पी नहीं थी, इसीलिए उन की मां यानी मेरी ताईजी की डांट उन पर अकसर पड़ती रहती थी. पर इस डांटडपट का कोई असर उन पर होता नहीं था.

मुझ से तो 8-10 साल बड़ी थीं वे, इसीलिए मैं तो एक प्रकार से उन की चमची ही थी. मुझ से वे लाड़ भी बहुत करती थीं. कभीकभी तो मेरा होमवर्क तक कर देती थीं, कहतीं, ‘चल तू थक गई होगी रितु, तेरा क्लासवर्क मैं कर देती हूं, फिर तू भी खेलने चलना.’

बस, मैं तो निहाल हो जाती. इस बात की भी चिंता नहीं रहती कि स्कूल में टीचर, दीदी की हैंडराइटिंग देख कर मुझे डांटेगीं. पर उस उम्र में इतनी समझ भी कहां थी.

हंसतेखेलते हम भाईबहन बड़े हो रहे थे. दीदी तब कालेज में बीए कर रही थीं कि ताऊजी को उन के विवाह की फिक्र होने लगी. ताऊजी व दादाजी की इच्छा थी कि सही उम्र में विवाह हो जाना चाहिए. लड़कियों को अधिक पढ़ाने से क्या फायदा, फिर अभी इस उम्र में तो सब लड़कियां अच्छी लगती ही हैं, इसलिए लड़का भी आसानी से मिल जाएगा. वैसे, दीदी थी तो स्मार्ट पर रंग थोड़ा दबा होने की वजह से 2 जगहों से रिश्ते वापस हो चुके थे.

दीदी का मन अभी आगे पढ़ने का था. पर बड़ों के आगे उन की एक न चली. एक अच्छा वर देख कर दादाजी ने उन का संबंध तय कर ही दिया. सुनील जीजाजी अच्छी सरकारी नौकरी में थे. संपन्न परिवार था. बस, ताऊजी और दादाजी को और क्या चाहिए था.

दीदी बीए का इम्तिहान भी नहीं दे पाई थीं कि उन का विवाह हो गया. घर में पहली शादी थी तो खूब धूमधाम रही. गानाबजाना, दावतें सब चलीं और आखिरकार दीदी विदा हो गईं.

सब से अधिक दुख दीदी से बिछुड़ने का मुझे था. मैं जैसे एकदम अकेली हो गई थी. फिर कुछ दिनों बाद चाचा के बेटे रोहित को विदेश में स्कौलरशिप मिली थी बाहर जा कर पढ़ाई करने की, तो घर में एक बड़ा समारोह आयोजित किया गया. दीदी को भी ससुराल से लाने के लिए भैया को भेजा गया पर ससुराल वालों ने कह दिया कि ऐसे छोटेमोटे समारोह के लिए बहू को नहीं भेजेंगे और अभीअभी तो आई ही है.

हम लोग मायूस तो थे ही, ऊपर से भैया ने जो उन की ससुराल का वर्णन किया उस से और भी दुखी हो गए. अरे, हमारी संजना दी को ताऊजी ने पता नहीं कैसे घर में ब्याह दिया. हमारी दी जो फर्राटे से शहरभर में स्कूटर पर घूम आती थीं, वो वहां घूंघट में कैद हैं. इतना बड़ा घर, ढेर सारे लोग, मैं तो खुल कर दीदी से बात भी नहीं कर पाया.

अच्छा तो क्या सभी ससुरालें ऐसी ही होती हैं? मेरे सपनों को जैसे एक आघात लगा था. मैं तो सोच रही थी कि वहां ताईजी, मां जैसे डांटने वाले या टोकने वाले लोग तो होंगे नहीं, आराम से जीजाजी के साथ घूमतीफिरती होंगी. खूब मजे होंगे. मन हुआ कि जल्दी ही दीदी से मिलूं और पूछूं कि आप तो परदे, घूंघट सब के इतने खिलाफ थीं, इतने लैक्चर देती रहती थीं, अब क्या हुआ?

फिर कुछ ही दिनों बाद जीजाजी को किसी ट्रेनिंग के सिलसिले में महीनेभर के लिए बेंगलुरु जाना था तो दीदी जिद कर के मायके आ गई थीं.  मैं तो उन्हें देखते ही चौंक गई थी, इतनी दुबली और काली लगने लगी थीं.

मां ने तो कह भी दिया था, ‘अरे संजना बेटा, लड़कियां तो ससुराल जा कर अच्छी सेहत बना कर आती हैं. पर तुझे क्या हुआ?’ पर धीरेधीरे पता चला कि ससुराल वाले उन से खुश नहीं हैं. सास तो अकसर ताना देती रहती हैं कि पता नहीं कैसे मांबाप हैं इस के कि घर के कामकाज तक नहीं सिखाए, 4 लोगों का खाना तक नहीं बना सकती ये बहू, अब इस की पढ़ाई को क्या हम चाटें.

‘मां, मैं अब ससुराल नहीं जाऊंगी, मेरा वहां दम घुटता है. सास के साथ ये भी हरदम डांटते रहते हैं और मेरी कमियां निकालते हैं.’ एक दिन रोते हुए वे ताईजी से कह रही थीं तो मैं ने भी सुन लिया. पर ताईजी ने उलटा उन्हें ही डांटा. ‘पागल हो गई है क्या? ससुराल छोड़ कर यहां रहेगी, समाज में हमारी थूथू कराने आई है. अरे, हमें अभी अपनी और लड़कियां भी ब्याहनी है, कौन ब्याहेगा फिर रंजना और वंदना को, बता?’

इधर मां ने भी दीदी को समझाया, ‘देख बेटा, हम तो पहले ही कहते थे कि घर के कामकाज सीख ले. ससुराल में सब से पहले यही देखा जाता है. पर कोई बात नहीं, अभी कौन सी उम्र निकल गई है. अब सिखाए देते हैं. अच्छा खाना बनाएगी, सलीके से घर रखेगी तो सास भी खुश होगी और हमारे जमाईजी भी.’

दीदी के नानुकुर करने पर भी मां उन्हें जबरन चौके में ले जातीं और तरहतरह के व्यंजन, अचार आदि बनाने की शिक्षा देतीं. हम लोग सोचते ही रह जाते कि कब दीदी को समय मिलेगा और हम लोगों के साथ हंसेगी, खेलेंगी, बोलेंगी.

एक महीना कब निकल गया, मालूम ही नहीं पड़ा था. जीजाजी आ कर दीदी को विदा करा के ले गए. मैं फिर सोचती, पता नहीं हमारी दीदी के साथ ससुराल में कैसा सुलूक होता होगा.

फिर पढ़ाई का बोझ दिनोंदिन बढ़ता गया और दीदी की यादें कुछ कम हो गईं.

2 वर्षों बाद भैया की शादी में दीदी और जीजाजी भी आए थे. पर अब दीदी का हुलिया ही बदल हुआ लगा. वैसे, सेहत पहले से बेहतर हो गई थी पर वे हर समय साड़ी में सिर ढके रहतीं?

‘‘दीदी, ये तुम्हारी ससुराल थोड़े ही है, जो चाहे, वह पहनो,’’ मुझ से रहा नहीं गया और कह दिया.

‘‘देख रितु, तेरे जीजाजी को जो पसंद है वही तो करना चाहिए न मुझे. अब अगर इन्हें पसंद है कि मैं साड़ी पहनूं, सिर ढक कर रहूं, तो वही सही.’’

‘‘अच्छा, इतनी आज्ञाकारिणी कब से हो गई हो?’’ मैं ने चिढ़ कर कहा.

‘‘होना पड़ता है बहना, घर की सुखशांति बनाए रखने के लिए अपनेआप को बदलना भी पड़ता है. ये सब बातें तुम तब समझोगी, जब तेरी शादी हो जाएगी,’’ कह कर दीदी ने बात बदल दी.

पर मैं देख रही थी कि दीदी हर समय जीजाजी के ही कामों में लगी रहतीं. उन के लिए अलग से चाय खुद बनातीं. खाना बनता तो गरम रोटी सिंकते ही पहले जीजाजी की थाली खुद ही लगा कर ले जातीं. कभी उन के लिए गरम नाश्ता बना रही होतीं तो कभी उन के कपड़े निकाल रही होतीं.

एक प्रकार से जैसे वे पति के प्रति पूर्ण समर्पित  गई थीं. जीजाजी भी हर काम के लिए उन्हें ही आवाज देते.

‘‘संजू, मेरी फलां चीज कहां हैं, ये कहां है, वो कहां है.’’

मां, ताईजी तो बहुत खुश थीं कि हमारी संजना ने आखिरकार ससुराल में अपना स्थान बना ही लिया.

मैं अब अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गई थी. 2 वर्षों के लिए जिद कर के होस्टल में रहने चली गई थी. बीच में दीदी मायके आई होंगी पर मेरा उन से मिलना हो नहीं पाया.

एक बार फिर छुट्टियों में मैं उन की ससुराल जा कर ही उन से मिली थी. अब तो दीदी के दोनों जेठों ने अलग घर बना लिए थे. सास बड़े जेठ के पास रहती थीं. इतने बड़े घर में दीदी, जीजाजी और उन के दोनों बच्चे ही थे.

‘‘दीदी, अब तो आप आराम से अपने हिसाब से जी सकती हो और अपने शौक भी पूरे कर सकती हो,’’ मैं ने उन्हें इस बार भी हरदम सिर ढके देख कर कह ही दिया.

‘‘देख रितु, मैं अब अच्छी तरह समझ गई हूं कि अगर मुझे इस घर में शांति बनाए रखनी है तो मुझे तेरे जीजाजी के हिसाब से ही अपनेआप को ढालना होगा. तभी ये मुझे से खुश रह सकते हैं. ये एक परंपरागत परिवार से जुडे़ रहे हैं तो जाहिर है कि सोच भी उसी प्रकार की है.’’

यह सच भी था कि दीदी ने अपनेआप को जीजाजी की रुचि के अनुसार ढाल लिया था. वैसे, घर में काफी नौकरचाकर थे पर चूंकि जीजाजी किसी के हाथ का बना खाना खाते नहीं थे इसलिए दीदी स्वयं ही दोनों समय का खाना यहां तक कि नाश्ता तक  स्वयं बनातीं. और तो और, पूरा घर भी जीजाजी की रुचि के अनुसार ही सजा हुआ था. घर में ढेरों पुस्तकें, कई महापुरुषों के फोटो हर कमरे में थे. अब तो आसपास के लोग भी इस जोड़े को आदर्श जोड़े का नाम देने लगे थे.

शादी के बाद मैं पति के साथ अमेरिका चली गई. देश की धरती से दूर. साल 2 साल में कभी कुछ दिनों के लिए भारत आती तो भी दीदी से कभी 2-4 दिनों के लिए ही मिलना हुआ और कभी नहीं.

हां, यह अवश्य था कि अगर मैं कभी अपने पति सुभाष की कोई शिकायत मां से करती तो वे फौरन कहतीं, ‘अपनी संजना दीदी को देख, कैसे बदला है उस ने अपनेआप को. कैसे सुनीलजी लट्टू हैं उन पर. अरे, तुझे तो सारी सुविधाएं मिली हुई हैं, आजादी के माहौल में रह रही है, फिर भी शिकायतें.’

मैं सोचती कि भले ही मैं अमेरिका में हूं पर पुरुष मानसिकता जो भारत में है वही इन की अमेरिका में भी है. अब मैं कहां तक अपनेआप को बदलूं. आखिर इन्हें भी तो कुछ बदलना चाहिए.

बस, ऐसे ही खट्टीमीठी यादों के साथ जिंदगी चल रही थी. फिर अचानक ही दुखद समाचार मिला सुनील जीजाजी के निधन का. मैं तो हतप्रभ रह गई. दीदी की शक्ल जैसे मेरी आंखों के सामने से हट ही नहीं पा रही थी. कैसे संभाला होगा उन्होंने अपनेआप को. वे तो पूरी तरह से पति की अनुगामिनी बन चुकी थीं. भारत में होती तो अभी उन के पास पहुंच जाती. फिर किसी प्रकार 6 महीने बाद आने का प्रोग्राम बना. सोचा कि पहले कोलकाता जाऊंगी दीदी के पास. बाद में भोपाल अपनी ससुराल और फिर ग्वालियर अपने मायके.

दीदी को फोन पर मैं ने अपने आने की सूचना भी दे दी और कह भी दिया था कि आप चिंता न करें, मैं टैक्सी ले कर घर पहुंच जाऊंगी. अब अकेले आनेजाने का अच्छा अभ्यास है मुझे.

‘ठीक है रितु,’ दीदी ने कहा था.

पर रास्तेभर मैं यही सोचती रही कि दीदी का सामना कैसे करूंगी. सांत्वना के तो शब्द ही नहीं मिल रहे थे मुझे. वे तो इतनी अधिक पति के प्रति समर्पित रही हैं कि क्या उन के बिना जी पाएंगी. जितना मैं सोचती उतना ही मन बेचैन होता रहा था.

पर कोलकाता एयरपोर्ट पर पहुंच कर तो मैं चौंक ही गई. दीदी खड़ी थीं. सामने ड्राइवर हेमराज के साथ और उन का रूप इतना बदला हुआ था. कहां मैं कल्पना कर रही थी कि वे साड़ी से सिर ढके उदास सी मिलेंगी पर यहां तो आकर्षक सलवार सूट में थीं. बाल करीने से पीछे बंधे हुए थे. माथे पर छोटी सी बिंदी भी थी. उम्र से 10 साल छोटी लग रही थीं.

‘‘दीदी, आप? आप क्यों आईं, मैं पहुंच जाती.’’

मैं कह ही रही थी कि हेमराज ने टोक दिया, ‘‘अरे, ये तो अकेली आ रही थीं, कार चलाना जो सीख लिया है. मैं तो जिद कर के साथ आया कि लंबा रास्ता है और रात का टाइम है.’’

‘‘अच्छा.’’

मुझे तो लग रहा था कि जैसे मैं दीदी से पिछड़ गई हूं. इतने साल अमेरिका में रह कर भी मुझे अभी तक गाड़ी चलाने में झिझक होती है और दीदी हैं…लग भी कितनी स्मार्ट रही हैं. रास्तेभर वे हंसतीबोलती रहीं, यहां तक कि जीजाजी के बारे में कोई खास बात नहीं की उन्होंने. मैं ने ही 2-4 बार जिक्र किया तो टाल गई थीं.

घर पहुंच कर मैं ने देखा कि अब तो पूरा घर दीदी की रुचि के अनुसार ही सजा हुआ है. उन की पसंद की पुस्तकें सामने शीशे की अलमारी में नजर आ रही थीं. कई संस्थाओं के फोटो भी लगे हुए थे. पता चला कि अब चूंकि पर्याप्त समय था उन के पास, इसलिए अब कई सामाजिक संस्थाओं से भी वे जुड़ गई थीं और अपनी पसंद के कार्य कर रही थीं.

अब तो खाना बनाने के लिए भी एक अलग नौकर सूरज था उन के पास. सुबह ब्रैकफास्ट में भी पूरी टेबल सजी रहती. फलजूस और कोई गरम नाश्ता. लंच में भी पूरी डाइट रहती थी. भले ही उन का अकेले का खाना बना हो पर वे पूरी रुचि और सुघड़ता से ही सब कार्य करवाती थीं. ड्राइवर रोज शाम को आ जाता. अगर कहीं मिलने नहीं भी जाना हो, तो वे खुद ड्राइविंग करतीं लेकिन ड्राइवर साथ रहता.

तात्पर्य यह कि वे अपने सभी शौक पूरे कर रही थीं. फिर भी अकेलापन तो था ही, इसीलिए मैं ने कह ही दिया, ‘‘दीदी, यहां इतने बड़े मकान में, इस महानगर में अकेली रह रही हो, बेटे के पास जमशेदपुर…’’

‘‘नहीं रितु, अब कुछ साल मरजी से, अपनी खुशी के लिए. अभी तक तो सब के हिसाब से जीती रही, अब कुछ साल तो जिऊं अपने लिए, सिर्फ अपने लिए.’’ मैं अवाक हो कर उन का मुंह ताक रही थी.

Love Story : पीली दीवारें – क्या पति की गलतियों की सजा खुद को देगी आभा?

Love Story : “तुम कोई भी काम ठीक से कर सकती हो या नहीं? सब्जी में नमक कम है, दूध में चीनी ज्यादा है और रोटियां तो ऐसी लग रही हैं जैसे 2 दिन पहले की बनी हों,’’ अजय इतनी जोर से चिल्लाया कि रसोई में काम कर रही उस की पत्नी आभा के हाथ से बरतन गिर गए. बरतनों के गिरते ही अजय का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

‘‘जाहिल औरत, किसी भी काम को करने का सलीका नहीं है. कहने को एमए पास है, नौकरी करती है, पर है एकदम गंवार.’’

‘‘कभी अपने अंदर भी झांक कर देखो कि तुम कैसे हो. हर समय झगड़ा करते रहते हो. बात करने तक का सलीका तुम में नहीं है. माना मैं बुरी हूं पर अपने 10 साल पुराने दोस्त विक्रम से किस तरह रूठे हुए हो, यह सोचा है कभी. वह 6 बार घर आ चुका है, पर उस से बात करना तो दूर तुम उस से मिले तक नहीं. ऐसे नहीं निबाहे जाते रिश्ते, उन के लिए त्याग करना ही पड़ता है,’’ आभा औफिस जाने के लिए तैयार होते हुए बोली.

उन की शादी को 2 साल हो गए थे, पर एक भी दिन ऐसा नहीं गया था जब अजय ने झगड़ा न किया हो.

‘‘मुझ से ज्यादा बकवास करने की जरूरत नहीं है. मुझे किसी की परवाह नहीं है. तुम अपनेआप को समझती क्या हो? यह भाषण देना बंद करो.’’

‘‘मैं भाषण नहीं दे रही हूं अजय, सिर्फ तुम्हें समझाने की कोशिश कर रही हूं कि हमेशा अकड़े रहने से कुछ हासिल नहीं होता. ऐसा कर के तो तुम हर किसी को अपने से

दूर कर लोगे. इंसान को अपनी गलती भी माननी चाहिए.’’

‘‘बड़ी आई मुझे समझाने वाली. मुझे सीख मत दो. मैं कभी कोई गलती नहीं करता और अगर तुम्हें इतनी ही दिक्कत हो रही है

तो तुम भी जा सकती हो. मुझे किसी की परवाह नहीं,’’ बड़बड़ाते हुए वह घर से बाहर निकल गया.

आभा सकते में आ गई. क्या कह गया था अजय. वह 2 वर्षों से उसे बरदाश्त कर रही थी, क्योंकि उसे उम्मीद थी कि अजय के स्वभाव में कभी तो बदलाव आएगा और वह रिश्तों की कद्र करना सीख जाएगा. लेकिन अजय था कि हर किसी से लड़ाई करने को तैयार रहता था. कोई भी बात अगर उस के मन की नहीं होती थी तो वह भड़क उठता था. लेकिन आज तो हद ही हो गई थी. आखिर वह कहना क्या चाहता था? आभा कुछ देर तक खड़ी सोचती रही और फिर उस ने निर्णय करने में पल भर की भी देर नहीं की.

अजय औफिस से फिल्म देखने चला गया. फिर रात को देर से घर लौटा तो घर उस समय अंधेरे में डूबा हुआ था. यह देख उसे झल्लाहट हुई.

‘‘पता नहीं क्या समझती है अपनेआप को. मेरे आने से पहले ही सो गई. कम से कम बालकनी की ही लाइट जला कर छोड़ देती,’’ अपनी आदत के अनुसार अजय बड़बड़ाया. फिर काफी देर तक कालबैल बजाने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला तो उस ने डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोला. आभा घर पर नहीं थी. हर तरफ एक सन्नाटा बिखरा हुआ था. ऐसा पहली बार हुआ था कि आभा उस के आने के समय घर पर न हो. तो क्या आभा सचमुच घर छोड़ कर चली गई है? पल भर को उसे अजीब लगा, लेकिन फिर वह सामान्य हो गया, ‘‘हुंह,

जाती है तो जाए, मैं उस के नखरे तो उठाने से रहा. अपनेआप 1-2 दिन में वापस आ जाएगी,’’ वह बड़बड़ाया और उस रात भूखा ही सो गया.

दिन, हफ्ते और फिर महीने बीतते गए पर आभा नहीं लौटी, न ही अजय ने उसे बुलाने की कोशिश की. इस बीच उस ने विक्रम को कई बार फोन किया, पर उस ने बिना बात किए ही फोन काट दिया. औफिस के अपने एक सहयोगी से जब उस ने विक्रम के व्यवहार के बारे में जिक्र किया तो वह मुसकराया और अपनी सीट पर जा कर बैठ गया. जब दूसरे सहयोगी ने उस के मुसकराने का कारण पूछा तो वह बोला, ‘‘हमारे अजय को यह नहीं पता कि अपने जीवन से दोस्त को तो एकबारगी हटाना आसान है, पर अगर पत्नी ही चली जाए तो फिर दोस्त ही क्या किसी भी रिश्ते को संभाल कर रखना मुश्किल हो जाता है. अब देखना हर कोई इस से मुंह मोड़ लेगा.’’

आभा के जाने के बाद शुरूशुरू में तो अजय को अपनी आजादी बहुत अच्छी लगी. जब दिल करता घर आता, होटल में खाना खाता और सुबह देर तक सोता. लेकिन धीरेधीरे उसे घुटन सी होने लगी. रात को अंधेरे और सन्नाटे में डूबे घर में लौटना, खुद कच्चापक्का बनाना और अकेले बैठे टीवी देखते रहना. अब आभा तो थी नहीं, जिस पर वह अपनी झुंझलाहट उतारता, इसलिए कामवाली पर ही अपनी खीज उतारता. कभी उस के देर से आने पर तो कभी घर ठीक से साफ न करने पर.

कामवाली मालकिन के जाने के बाद अकेले साहब के लिए काम करने से कतरा रही थी. उस ने एक दिन यह कह कर काम छोड़ दिया कि घर में कोई औरत नहीं है, इसलिए मेरे मर्द ने यहां काम करने से मना कर दिया है.

क्या करता अजय, उस ने एक लड़का नौकर रखा जो सारा दिन घर पर रहता था. लेकिन वह जितना सामान लाता था, वह कम पड़ने लगा. आज यह नहीं है, वह नहीं है, कह कर वह अजय की जान खाए रहता. उस के पड़ोसी उसे 1-2 बार चेतावनी भी दे चुके थे कि तुम्हारा नौकर दिन में अपने जानपहचान वालों को यहां बैठाए रखता है, पर अजय को लगा था कि उस पड़ोसी को उस के नौकर रखने से शायद जलन हो रही है.

एक दिन तबीयत खराब होने की वजह से अचानक अजय घर आया तो देखा कि उस के बैडरूम में नौकर एक लड़की के साथ है. यह देखते ही वह क्रोध से भड़क उठा और उस ने नौकर को घर से बाहर निकाल दिया.

अकेलापन उस पर हावी होने लगा था. उस ने कई बार अपनी मां से कहा कि वे उस के पास आ कर रह लें, पर उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, मेरी तबीयत खराब रहती है, उस पर से बहू भी नहीं है. कौन देखभाल करेगा मेरी? बेकार में मेरे आने से तेरा काम बढ़ जाएगा.’’

यहां तक कि अजय की बहनें, जो भाभी के होने पर महीने में 2-3 बार चक्कर लगा जाती थीं, उन्होंने भी आना छोड़ दिया. वे कहतीं कि भैया, अपनी ही गृहस्थी से फुरसत नहीं मिलती, अब वहां आ कर भी खाना बनाओ, यह बस में नहीं. भाभी थीं तो आराम था, सब कुछ तैयार मिलता था और हम भी मायके में 2-4 दिन चैन से बिता लेते थे. अजय उन की बातें सुन कर चिढ़ जाता था और उन्हें भी खरीखोटी सुना देता था, लेकिन अकेलेपन और नीरसता के समुद्र में डुबकी लगाने के कारण वह खामोशी से उन की बातें सुन लेता. उस का दिल रोने को होता.

आभा ने कैसे कुशलता और प्यार से सारे रिश्तों को जोड़ा हुआ था. तभी तो उस के जाने के बाद उस के अपनों ने ऐसे मुंह मोड़ा मानो वे आभा के रिश्तेदार हों. कुछ घंटों के लिए बहुत आग्रह करने पर बूआ आईं तो बहुत उदास होते हुए बोलीं, ‘‘अब मन नहीं करता तेरे घर आने को. मेरी बातें तुझे बुरी लग रही होंगी पर सच तो यह है कि तेरा लटका हुआ मुंह देखने को कौन आएगा? आभा थी तो कितनी आवभगत करती थी.

चाहे कितनी भी थकी हुई हो, पर कभी मुंह नहीं बनाती थी. औरत से ही घर होता है बेटा. वह नहीं तो जीवन बेकार हो जाता है. यारदोस्त, रिश्तेदार, सगेसंबंधी कब तक और कितना साथ देंगे? साथ तो पत्नी ही अंत तक निभाती है. पतिपत्नी की आपस में चाहे कितनी भी लड़ाई क्यों न हो जाए, पर वही ऐसा संबंध है, जो जीवन भर कायम रहता है.’’

क्या कहता अजय और कैसे रोकता उन्हें. उसे लगा कि बूआ सचमुच उसे आईना दिखा गई हैं. पिछले 6 महीनों में वह इतनी तकलीफ सह चुका था कि उस की अकड़ हवा हो चुकी थी.

होटल का खाना खातेखाते वह तंग आ चुका था और नौकर कोई घर पर टिकता नहीं था. उस ने यह सोच कर अपने दोस्त पीयूष को फोन किया कि आज रात उस के घर खाना खा लेगा. पर उस ने कहा, ‘‘यार, मेरे पिता की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए आज तो संभव नहीं हो पाएगा. मैं तुझे खुद फोन कर के बुलाऊंगा किसी दिन.’’

क्या करता अजय, रेस्तरां में ही खाने गया. वहां देखा कि पीयूष अपने परिवार के साथ आया हुआ है. एक कसक सी उठी उस के मन में कि उस के दोस्त भी उसे घर नहीं बुलाना चाहते.

पीयूष ने भी उसे देख लिया था, इसलिए अगले दिन फोन कर के उस से बोला, ‘‘यार, क्या करूं, तेरी भाभी कहती है कि अजय अकेला आ कर क्या करेगा. उसे भी बहुत अनकंफर्टेबल फील होता है. आभा थी तो उसे कंपनी मिल जाती थी. ट्राई टू अंडरस्टैंड, फैमिली वाले घर में अकेले आदमी का आना जरा अखरता है. आई होप तू माइंड नहीं करेगा.’’

अब वह पहले वाला अजय तो रहा नहीं था, जो बुरा मानता. अकेलापन, दिनरात का तनाव और ठीक से खाना न मिल पाने के कारण उस की सेहत लगातार गिरती जा रही थी. आए दिन उसे बुखार हो जाता. उसे महसूस हो रहा था कि थकावट उस के शरीर में डेरा डाल कर बैठ गई है.

बाहर का खाना खाने और पानी पीने से उस के लिवर पर असर हो गया था. अब हालत यह थी कि वह कुछ भी खाता तो उसे उलटी हो जाती या फिर पेट दर्द से वह कराहने लगता. डाक्टर का कहना था कि उसे जौंडिस हो सकता है. तब से उसे लगने लगा  था कि उस की जिंदगी की तरह जैसे हर चीज पीली और मटमैली सी हो गई है.

उस की हालत पर तरस खा कर एक दिन पीयूष अपनी बीवी सहित उस से मिलने आया. उस की बीवी चाय बनाने रसोई में गई तो देखा हर चीज अस्तव्यस्त है. बदबू से परेशान वह चाय की पत्ती ढूंढ़ती रही. हार कर अजय को ही उठ कर चाय बनानी पड़ी. फुसफुसाते हुए वह पीयूष से बोली, ‘‘यहां मैं और एक पल के लिए भी नहीं ठहर सकती. घर है या कूड़े का ढेर.’’

अजय ने सुना तो मनमसोस कर निढाल हो कर पलंग पर लेट गया. किस से शिकायत करता, गलती तो उस की ही थी. आभा को कब उस ने मान दिया था. हर समय उसे दुत्कारता ही तो रहता था. उस के जाने के बाद हर किसी ने उस से मुंह मोड़ लिया था. आखिर क्यों कोई उसे बरदाश्त करे. एक वही थी, जो उस की हर ज्यादती को सह कर भी उस की परवाह करती थी. हर काम उसे परफैक्ट ढंग से किया मिलता था. पर तब वह कमियां ढूंढ़ता रहता था.

उस का गला सूख रहा था. जैसेतैसे उठा तो सामने लगे शीशे पर उस की नजर गई. आंखें अंदर धंस गई थीं, दाढ़ी बढ़ गई थी और दुर्बल शरीर से निकली हड्डियां जैसे उस की बेबसी का उपहास उड़ा रही थीं. पसीने से नहा उठा वह. सारी खिड़कियां खोल दीं और पानी पीने के लिए फ्रिज खोला. खाली फ्रिज उस का मुंह चिढ़ा रहा था. उस की रोशनी को देख डर से उस ने आंखें बंद कर लीं.

उसे याद आया आज सुबह उस ने पीने का पानी भरा ही नहीं था. कांटे उस के गले में चुभने लगे और वह उस चुभन के साथ रसोई में खड़ा पीली हो गई दीवारों को देखने लगा. यह पीलापन उसे धीरेधीरे अपने शरीर और मन पर हावी होता महसूस हुआ. उसे लगा उस की बोझिल पलकों पर मानो पीली दीवारें कतराकतरा उतर रही थीं.

Hindi Story : पहला निवाला – घनश्याम क्यों ढाबे से खाना लाता था?

Hindi Story : घनश्याम शुक्ला बिहार के छपरा जिले में शिवनगरी गांव का रहने वाला 45 वर्षीय अधेड़ उम्र का आदमी था. 15 साल पहले घनश्याम गांव में पंडिताई का काम करता था. रुकरुक कर उस की थोड़ीबहुत कमाई हो जाया करती थी, लेकिन बंधा हुआ पैसा हाथ नहीं रहता था.

जैसेजैसे परिवार बढ़ता गया, वैसेवैसे घनश्याम को पंडिताई के पेशे की कमाई नाकाफी लगने लगी. इस मारे घनश्याम गांव से दिल्ली शहर काम के लिए रवाना हो गया. लेकिन शहर आने के बाद भी घनश्याम ने पंडिताई का काम नहीं छोड़ा.

दिल्ली के आनंद पर्वत इंडस्ट्रियल इलाके में लोहे की फैक्टरी में घनश्याम की नौकरी लगी थी. वह दिन में फैक्टरी में काम करता और जब भी पंडिताई का काम आता तो शाम का प्लान बना लगे हाथ उसे भी कर लिया करता.

आसपास के रहने वाले लोगों को भी घनश्याम सस्ता पंडित पड़ता था, तो मुंडन, बरसी, गृह प्रवेश इत्यादि में बुला लिया करते थे. और फिर घनश्याम के लिए यह काम मानो रेगिस्तान में पानी के जैसे था तो अच्छा तो लगना ही था, और अच्छा लगेगा भी क्यों नहीं, इस में साइड से पैसे भी बनने लग गए थे.

घनश्याम का पूरा परिवार गांव में रहता था. 5-6 साल पहले तक तो घनश्याम की पत्नी उस के कहने पर बीचबीच में शहर आ जाया करती थी, लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं थी.

जो किराए का कमरा पहले पत्नी के आने से हिलौरे पैदा करता था और बड़ा लगता था, अब ढलती जवानी के साथ कमरे का आकार भी छोटा लगने लगा था. ऊपर से बूढ़े मांबाप के कारण घनश्याम की नैतिकता पत्नी को शहर लाने से रोक रही थी.

शहर में काम करते घनश्याम ने खुद के लिए कुछ उसूल बनाए थे. वह न तो किसी का दिया हुआ खाना खाता, न बाकी मजदूरों की तरह रात को ढाबे से खाना लाता, बल्कि जितनी थकान क्यों न हो, वह खुद कमरे में अपने हाथों से खाना बनाता था चाहे फैक्टरी से आने में रात के 9 ही क्यों न बज जाएं.

घनश्याम की दिनचर्या काफी टाइट थी. वह आदतन शौचालय जाने से पहले जनेऊ कान में लपेट लेता, सर्दी हो या गरमी सुबह ही नहा लेता. विशेष तौर पर गांव से चंदन का प्रबंध किया रहता था तो धूपबत्ती जला पूजा करने के बाद टीका जरूर लगाता.

हांलाकि गरमी और पसीने से टीका एक समय के बाद माथे पर टिकता नहीं था. लेकिन टीका लगाने की आदत घनघोर थी. आमतौर पर चंदन का टीका लोगों को आकर्षित करता था, जिस से लगे हाथ उन के पंडित होने का ही प्रचार होता और उसे इस का फायदा हो जाया करता.

एक दिन धनश्याम को अचानक सुनने में आया कि पूरे देश में कोरोना महामारी के कारण प्रधानमंत्री ने 21 दिन की तालाबंदी कर दी है. वह थोड़ा हैरान तो हुआ, लेकिन 21 दिन तक अपने खानेपीने का खर्चा उठा सकता था, तो उसे खास चिंता नहीं हुई. और फिर घनश्याम ने राष्ट्र समर्पण की भावना से खुद को तालाबंदी के लिए तैयार कर लिया था. लेकिन इस तालाबंदी में उस के बहुत से उसूल बिगड़ने लगे थे.

पूरा दिन घर में खाली होने के कारण वह पहले सूर्योदय से पहले नहा लिया करता था, पर अब 8 बजे तक सो कर उठने लगा था. तब तक सूर्य आंखों के सामने चमकने लगता था.

हां, पूजापाठ नियमित तौर पर किया करता, लेकिन धूपबत्ती जलाने से परहेज करने लगा. जो चंदन का टीका घनश्याम के माथे की शान हुआ करता था, पर उसे अब इस की जरूरत नहीं महसूस हुई. ऊपर से चंदन महंगा था तो लगाने से वह बचता भी रहा.

तालाबंदी  खत्म होने के साथसाथ घनश्याम की जमापूंजी खत्म होने लगी थी. लेकिन वह इस बात को ले कर निश्चिंत था कि तालाबंदी खुलते ही उस की रुकी हुई गाड़ी फिर से पटरी पर आने लगेगी. लेकिन यह क्या, प्रधानमंत्री ने फिर से 3 हफ्ते की तालाबंदी पूरे देश में कर दी.

अब तो घनश्याम के माथे पर शिकन आने लगी थी. उस की हालत पतली होने लगी थी. घरगांव में रोज फोन पर बात होती तो थी, लेकिन अब घनश्याम को दूसरे तालाबंदी के कारण इतने दिनों बाद पहली बार लगा कि वह यहां फंस चुका है. उस के दिमाग में दिनरात परिवार और घरगांव की बातें घूमने लगी थीं.

घनश्याम इस तालाबंदी से परेशान हो चला था. सरकार के इस फैसले से मन ही मन गाली देने का जी तो करता, लेकिन फैसले को देशहित में समझ द्वंद्व की स्थिति में रहता. उस ने कच्चे राशन के लिए सरकारी ई कूपन का फार्म भरा था, उसे थोड़ाबहुत कच्चा राशन मिल गया.

हां, राशन के लिए उसे कई दिनों तक पहले कूपन के लिए, फिर राशन के लिए 8-9 दिन रोज घंटों लाइन में लगना पड़ा था, लेकिन जैसेतैसे कड़ी मशक्कत के बाद राशन पा लिया.

भूख से तो घनश्याम जंग जीत गया, लेकिन समस्या उसे इस बात की थी कि अगर यही हालत रही तो फैक्टरी न जाने कब तक खुलेगी और ऊपर से कमरे के किराए का बोझ भी सिर पर पड़ रहा था. वह इतना जानता था कि सरकार ऊपर हवाहवाई जो कहे नीचे जमीन पर हकीकत अलग ही रहती है. इसलिए वह समझता था कि अब उस की अपने गांव जाने में ही भलाई है.

जैसेतैसे दूसरे तालाबंदी के दिन बीतने को आए थे. एक दिन पड़ोस के मदन ने आवाज़ लगाई, “शुक्लाजी तुम्हें पता चला कि सरकार गांव जाने के लिए ट्रेन चला रही है? तो क्या सोच रहे हो जी, चलोगे गांव?”

मदन घनश्याम की जानपहचान का था. मदन वही था, जिस के भरोसे घनश्याम गांव से शहर आया था. मदन घनश्याम को शुक्लाजी कह कर पुकारता था. यहां तक कि गांव में भी घनश्याम को शुक्लाजी के नाम से ही पुकारा जाता था.

“हां, चलना तो है. यहां शहर में रहने का अब कोई मतलब नहीं है. न काम बचा है, न कमाई. ऊपर से किराया भरो अलग से. मैं ने तो अपने गांव में प्रधान से बात कर के गांव जाने के लिए सरकारी फार्म भी भर दिया है. कुछ दिनों बाद मैं चलता बनूंगा यहां से,” घनश्याम ने जवाब दिया.

कुछ दिन बाद घनश्याम सरकार के द्वारा चलाई गई स्पेशल ट्रेन से अपने गांव छपरा को निकल पड़ा. सरकारी आदेशानुसार गांव पहुंचते ही उसे क्वारंटाइन कर दिया गया.

गांव आ कर उसे पता चला कि बाहर से आने वालों को गांव के पंचायत हाल में क्वारंटाइन किया गया था, जिस में रहने और खानेपीने की भी व्यवस्था की गई थी.

घनश्याम पंचायत हाल में पहुंचते ही सामान रख पाखाने की ओर भागता है. वह जैसे वहां पहुंचता है, तो उसे सामने पाखाने से भोलाराम निकलते हुए दिखता है.

भोलाराम शिवनगरी गांव में चमार जाति से था. गांव में लोग टोले के हिसाब से बंटे हुए थे. घनश्याम गांव के जिस तरफ था, उसे बामन टोला कहा जाता था और भोलाराम का घर गांव के जिस तरफ था, वह गांव के अंत में चमार टोले में पड़ता था. वह घनश्याम से कुछ दिन पहले ही मुंबई से साइकिल चला कर लौटा था.

घनश्याम का माथा घूम जाता है. “यह डोमबा यहां क्या कर रहा है?” वह पास खड़े एक आदमी से पूछता है.

“यह भी हमारे साथ यहीं क्वारंटाइन हुआ है.”

“तो क्या यहां साथ में ही खानापीना होता है?” घनश्याम पूछता है.

“हां, कुछ ऐसा ही समझ लो.”

घनश्याम फिर कहता है, “यहां तो हमारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा. हम एक पल भी यहां नहीं ठहर सकते, या तो हमें इस डोम से अलग कर दे या उसे हम से दूर.”

घनश्याम किसी व्यक्ति को कह कर गांव के प्रधानजी को उन से मिलने आने को कहते हैं.

गांव के प्रधानजी बुद्धि से चतुर और जाति के ब्राह्मण थे. उन का 15 साल लगातार प्रधान बने रहने का रिकॉर्ड था. लेकिन पिछले साल शिवनगरी गांव की प्रधान सीट महिला आरक्षित कर दी गई थी. इस के कारण प्रधानजी चुनाव नहीं लड़ पाए थे. उन्होंने अपनी चतुर बुद्धि का प्रयोग कर इस सीट पर अपनी पत्नी को चुनाव के लिए खड़ा कर दिया. बस फिर क्या था, प्रधानजी की पत्नी चुनाव जीत गईं और प्रधानजी बन गए प्रधानपति.

वैसे तो प्रधानजी बड़े ही घपलेबाज़ आदमी थे, लेकिन इस बार घपले के बारे में सोच भी नहीं सकते थे.

प्रधानजी अगले भोर घनश्याम से मिलने आए और बोले, “बताओ शुक्लाजी का आफत आन पड़ी?”

“प्रधानजी ई सब का चल रहा है?”

प्रधानजी सोचते हुए बोले, “का चल रहा है?”

“मतलब, हमें काहे उस डोमबा भोलाराम के साथ रखे हैं?”

“का बताएं शुक्लाजी, यह तो आगे से और्डर आया है तो बस वही कर रहे हैं.”

“लेकिन, हमरा तो धर्म भ्रष्ट हो जाएगा, प्रधानजी आप तो जानते ही हैं.”

“देखो शुक्लाजी ई सब हमरा बस में नाही हैं और अगर ई बात बाहर फैली तो समझो बवाल हो जाई. डीएम साहेब खुदे नजर रखे हुए हैं क्वारंटाइन सेंटर पर.”

“प्रधानजी आप तो खुदई ब्राह्मण हैं. भला आप ही जरा सोची कि हम यहां कैसे रही? पूरा दिन हमरे आसपास उ डोमबा मंडरात रही, ऊपर से एकई बरतन में खाना बनी. एकई साथ बैठ के खाई. आज ऊ बरतन मा डोमबा खावत रही कल हम. अब ई घोर पाप करिएगा हमरे साथ?”

“बात के समझा. ई तोहर घर नाहि के जो तू जइसे चाही वइसे होई. एक तो सरकार पईसा कम देत है ऊपर से तोहरा अलग रखी, हम तोहरा के पागल दिखेत बाणी?” इतना कह कर प्रधानजी वहां से निकल जाते हैं.

घनश्याम निश्चय कर चुका था कि वह जब तक इस झंझट से निकल नहीं जाता, तब तक अन्न का एक दाना नहीं खाएगा.

वैसे तो धनश्याम शहर में अकसर फैक्टरी के भीतर साथ में काम करने वाले बाकी मजदूरों के साथ बिना जाति पूछे बैठ कर खाना खा लिया करता था, किंतु गांव की हवा में जादू ही कुछ और होता है, एकदम से अर्श से फर्श ले ही आता है. शहर में जो आदमी कबूतरखाने में रह कर खुद को लाचार महसूस कर रहा था, वह एकाएक अपनी चालढाल बदल लेता है. गांव आते ही आदमी जातियों में बंटने ही लगता है.

घनश्याम बचपन से भोलाराम से दूरी बनाए रखा था. लगभग हमउम्र होने के बावजूद कभी भी दोनों ने साथ में खेला नहीं था. खाना, पीना, रहना सब दूरदूर था. तो अब साथ कैसे रह सकता था. गांव में घनश्याम अकसर भोलाराम को जाति के पाठ पढ़ाया करता था कि, “बामन टोला के आसपास न भटका करो, वरना कूट दिए जाओगे.”

इसी अहम में पहले दिन घनश्याम भूखे पेट ही सो जाता है. अगले दिन की सुबह उसे जोर की भूख लगती है. लेकिन जैसे ही उस के सामने से भोलाराम दिखता है, उसे देख वह अपनी भूख को काबू में रख संकल्प मजबूत कर लेता है.

दोपहर में खाने का समय होने वाला ही था कि घनश्याम के पेट में गैस बननी शुरू हो गई. वह जोरजोर से पादे जा रहा था. पेट में धीरेधीरे दर्द शुरू हो रहा था. एक पल के लिए लगा कि घनश्याम का संकल्प टूट जाएगा. लेकिन भोलाराम के बारे में सोचते ही दोपहर का खाना भी नहीं खाया.

रात के भोजन में भी घनश्याम खाने के लिए खड़ा नहीं हुआ. लेकिन उस का पेट जवाब दे रहा था. पेट में जोरजोर की गुड़गुड़ की आवाज आने लगी थी और भूख भीतर कुचोड़ने लगी थी मानो चूहे पेट के भीतर कुश्ती कर रहे हों.

आधी रात हो चली थी. घनश्याम को मारे भूख के नींद नहीं आ रही थी. पेट में भूख से दर्द उठने लगा था. उस की नजर उस के लिए बचाए खाने पर पड़ी.

भूख का चुम्बक उसे खाने की तरफ मानो खींच रहा था. जैसे ही घनश्याम बिस्तर से उठा, धीरे से खाने की तरफ बढ़ा और अपने लिए रखा खाने का डोंगा ज्यों ही वहाथ में लिया, तभी एक आवाज पीछे से आती है.

“और दिन के मुकाबले आज खाना ठीकठाक है, खा लीजिए.”

यह सुनते ही घनश्याम की आंखों में आंसू आने लगते हैं और वह पहला निवाला अपने मुंह में डाल देता है.

Family Story : नीर का नीड़ – पुलकित किस पिंजड़े के अंदर जाते ही शांत हो जाता था?

Family Story : सुबह. नीले आकाश में उड़ रही चिडि़या. आजाद. लोहे का बड़ा वाला फाटक  बंद है. ताकि बच्चों के अभिभावक स्कूटरबाइक ले कर स्कूल के अंदर तक न चले आएं. दाहिने, पिंजड़े के दरवाजे की तरह एक छोटा सा पल्ला खुला है. बगल में खाकी वरदी में रामवृक्ष दरबान खड़ा है. सभी मैडम गंभीर मुद्रा में अपनाअपना सिर तान कर या झुका कर छोटे वाले गेट से अंदर दाखिल हो रही हैं. छोटे बच्चे तो उछलतेकूदते पिंजड़े के भीतर घुसे जा रहे हैं. मगर दरजा 6-7 के 2-4 बच्चों का सिर अंदर जाते समय दरवाजे के फ्रेम से टकरा गया, आउच, हिंदीकोश में एक नया अव्यय.

फिर भी वे खुश हो गए, ‘पंकज देख, मेरी हाइट कितनी हो गई है. तू तो ठिगना का ठिगना ही रह गया.’ स्कूल के सामने स्कूटर और बाइक की जमघट. दोएक रिकशा भी आ कर सवारी उतार कर चलते बन रहे हैं. कोई बच्चा पापा से पितृकर वसूल रहा है चिप्स खाने के लिए, तो किसी के पिताश्री जेब से कंघी निकाल कर बच्चे के बाल संवार रहे हैं.

प्रयाग ने अपनी बाइक एक किनारे खड़ी कर दी. बेटे को गोद में ले कर पिछली सीट से उसे नीचे उतारते, इस के पहले ही पुलकित बाइक से कूद गया.‘‘अरे रे रे बेटा, इतनी भी जल्दी क्या है, कहीं गिर गया तो? तेरी मम्मी मुझे ही डांटेगी,’’ प्रयाग कहते रह गए.

अभी तो हफ्ताभर भी नहीं हुआ उस का एडमिशन हुए. पुलकित है तो चंचल. दिनभर घर में दादा और चाचा को दौड़ाता रहता है. पर स्कूल नाम केइस पिंजड़े के अंदर जाते ही वह एकदम शांत हो जाता है. यहां वह बिलकुल अकेला जो है. अभी दोस्तों से घुलमिल जो नहीं पाया.  प्रयाग ने सोचा, बेटे को स्वनिर्भर बनाना है. यह क्या कि रोज डैडी का हाथ थाम कर स्कूल के दरवाजे तक जाए. स्कूलबैग तो पुलकित की पीठ पर था ही. उन्होंने बाइक की हैंडिल से वाटर बौटल निकाल कर उस के हाथ में थमा दिया, ‘‘टाटा बेटा. मम्मी ने कहा था न कि आज से तुम अकेले ही स्कूल के अंदर चले जाओगे?’’

उन की ओर देख कर पुलकित हलका सा मुसकरा दिया, ‘‘बाय डैडी.’’

‘‘वह देखो, रामवृक्ष अंकल है, वह तुम्हें अंदर कर देगा. मेरा बहादुर बेटा, टाटा.’’

सीमा पर जाने वाले जवानों की तरह पुलकित आगे बढ़ता है. प्रयाग बाइक के पास ही खड़े हैं. एक बार सोचा कि मुंह दूसरी ओर कर लें. मगर फिर मन में स्नेह का उफान- आज इतना ही ठीक है. कल से दूसरी ओर ताका करेंगे. मेरे पुलकित को अपने पैरों पर खड़ा होना है. दुनिया बहुत जालिम है. उसे जीना है तो लड़ना होगा. जीवन का दूसरा नाम ही है संघर्ष. जीवन संघर्ष.

‘‘आओ भैया,’’ दरवाजे पर खड़ा रामवृक्ष उसे हाथ पकड़ कर अंदर भेजने लगा, ‘‘आज अकेले आ गए? वाह, मेरे बहादुर बच्चे.’’

छोटे वाले गेट से अंदर जाते समय पुलकित ने एकबार पीछे मुड़ कर देखा, डैडी कहां हैं? ‘‘अरे चलो बेटा, और बच्चों को आने दो.’’ रामवृक्ष उसे हलका सा धकेल कर अंदर कर देता है.

‘क्या मैं भी चला जाऊं? पुलकित तो अंदर पहुंच ही गया,’ प्रयाग इसी ऊहापोह में बाइक के पास खड़ा था.

पुलकित अंदर जा कर बंद गेट के पास आ गया. चेहरे को लोहे की सीखचों से सटा कर वह देखने का प्रयास करने लगा. डैडी, डैडी कहां हैं? दिख नहीं रहे हैं? बस, एक बार टाटा कह देता. बस, एक बार… तब तक सामने एक रिकशा आ गया. उस पर से 2 मैडम उतर आईं. उधर पिं्रसिपल मैडम की कार आ गई. रामवृक्ष चिल्लाने लगा, ‘‘सारे बच्चों, अंदर हो जाओ. गेट खोलना है. यहां कोई खड़े मत रहना. वरना मैडम डांटेंगी.’’

अफरातफरी. बड़े बच्चे बीच में से कार गुजरने लायक जगह छोड़ कर एकतरफ हो गए. अंदर जाते हुए एक मैडम ने पुलकित का हाथ पकड़ लिया, ‘चलो, क्लास में चलो.’ ‘गुड…गुड मौर्निंग टीचर,’ किसी तरह बेचारा वह कह पाया. जातेजाते वह पीछे मुड़ कर देखने लगा, डैडी नहीं दिखेंगे? एक बार भी नहीं? चले गए? डैडी घर वापस चले गए?

पुलकित को कुछ नहीं दिख रहा है. पानी के घर की खिड़कियां यानी पलकें बंद हैं. क्या दिखे? कैसे दिखे? मम्मी याद आ रही है. दादा, दादी, चाचू…चाचू ने कल मुझे साइकिल पर नहीं बिठाया था. भाग गया. कुट्टी, कुट्टी, कुट्टी… ‘‘तुम तो न्यू ऐडमिशन हो, कौन सा क्लास है तुम्हारा?’’ हाथ पकड़ने वाली मैडम पूछती हैं.

पुलकित उंगली से ऊपर की ओर दिखाता है.

‘‘जाओ, क्लास में बैग रख कर नीचे आ जाओ. अभी प्रेयर की घंटी बजेगी.’’

भारी कदमों से पुलकित सीढ़ी चढ़ता है. इतने में घंटी बजती है टनटनटन… आपाधापी, भागदौड़…उसे रौलकौल ग्राउंड में पहुंचना है.

फिर…

एक हवा चली. चलती गई. जिंदगी के कलैंडर के पन्ने उड़ते जा रहे हैं. पलटते जा रहे हैं. फरफरफर… जीवन की हवा के झोंकों ने आज पुलकित को नेताजी सुभाषचंद्र बोस इंटरनैशनल एयरपोर्ट के सामने ला कर खड़ा कर दिया है. पुलकित टैक्सी से अपना सामान उतार रहा है. प्रयाग और पुलकित की मां टैक्सी से उतर कर बगल में खड़े हैं. बेटा जरमनी जा रहा है. उसे जरमनी की डीएएडी स्कौलरशिप मिली है.

पुलकित वहां कालोन के मैक्स प्लैंक इंस्टिट्यूट से प्लैंट बायोटैक्नोलौजी में पीएचडी करने जा रहा है. 2-2 परीक्षाएं पास करना, स्काइप पर सीधे वहां के डा. केनेची से रूबरू हो कर इंटरव्यू देना, अपनी थीसिस के लिए प्रारूप तैयार करना, फिर दिल्ली जा कर मैक्स प्लैंक के बोर्ड के सामने इंटरव्यू देना, लोहे के चने चबाना और किसे कहते हैं? सारे हिंदुस्तान से केवल 15-16 लोगों का सिलैक्शन हो सका. उन में भी वह अकेला है जिसे पूरी पीएचडी वहां से करनी है. बाकी लोग तो एकाध साल के लिए ट्रेनिंग पर या सैंडविच कोर्स के लिए ही जा रहे हैं. अपनी यूनिवर्सिटी, अपने प्रदेश से वह अकेला ही है.

जब 15 दिनों की जरमन भाषा शिक्षा के लिए उसे दिल्ली जाना पड़ा तो उस ने मोबाइल पर मां से कहा था, ‘मां, मुझे तो अभी तक विश्वास ही नहीं हो रहा है कि सचमुच मेरा सिलैक्शन हो गया है.’ मां ने हंस कर समझाया, ‘बस बेटा, मन लगा कर काम करना. तुझे अपना प्रदेश अपने देश का नाम ऊंचा जो करना है, क्यों?’

‘हां, मां.’

फिर तो और ढेर सारी बातें. भारतसेवाश्रम यात्री निवास से मैक्समूलर भवन के लिए निकलने के पहले पुलकित मां से बात कर लेता. फिर बीच में ब्रेक में. अंत में रात में दिनभर की दास्तान…

मां हर रोज वही सवाल, ‘आज तू ने क्या खाया?’ बेटा नाराज हो जाता, ‘हर समय सिर्फ खाने की बात मत पूछा करो. मैं कोई बच्चा हूं क्या?’

‘नहीं, अब तो तू मेरा डैडी बन गया है. मैं ही तेरी बेटी हूं.’

उधर से प्रयाग रूठे हुए बच्चे की तरह कहते, ‘मुझ से तो कोई बात ही नहीं करना चाहता. अब तो इन के लिए मम्मी ही सबकुछ है.’ ‘ले, अपने पापा से बात कर ले. वे रूठ गए हैं.’ पुलकित की मां प्रयाग को मोबाइल थमा देतीं.

‘क्या पापा, आप भी न…मैं तो आप से ही बात करना चाहता हूं. मम्मी तो बस वही दालभातसब्जी की ही बातें करेंगी.’

‘झूठा कहीं का. तेरी दीदी भी फोन करती है तो तेरी मां को. क्यों मैं घर में नहीं हूं? तू ने मुझे फिर मोबाइल खरीद के दिया ही क्यों? उस में भी तो वह फोन कर सकती है.’

ऐसी ही बातें, रूठना, मनाना, हंसना, रोना. जिंदगी का पलपल, क्षणक्षण, चुस्की लगाते हुए पी जाना…

प्रयाग को निहायत औपचारिक बातों से चिढ़ होती है. शादी के बाद शुरूशुरू में बेटी ने पूछा था, ‘डैडी, आप कैसे हैं?’

‘क्यों, मुझे क्या हुआ है?’ यह हाऊ आर यू वाला फौरमल सवाल उन्हें पसंद नहीं. देशदुनिया की ढेर सारी बातें हैं, वो नहीं पूछी जा सकतीं? क्रिकेट से ले कर उत्तराखंड में आए जल प्लावन, काजीरंगा की बाढ़ में फंसे गैंडे, राष्ट्रीय उद्यान में ट्रेन से कट कर हाथियों का मारा जाना, बस्तर में आदिवासियों के साथ छल, क्रांति के छद्म नकाब पहन कर ट्रेन की पटरी उड़ा कर सैकड़ों परिवारों का सर्वनाश करना, दादरी में बेगुनाह मुसलमान की हत्या, प्रयाग बच्चों से तरहतरह की बातें किया करते थेऔर आज भी वही सुनना चाहते हैं. वे पुलकित की मां से भुनभुनाते, ‘मैं क्या कोई बूढ़ा हो गया हूं कि मेरी तबीयत के बारे में पूछताछ की जाए?’

खैर, सभी खुश हैं कि इतने दिनों बाद बेटे की मेहनत रंग लाई. आज अगर पुलकित के दादाजी होते, तो कितना खुश होते. ईमेल में सिलैक्शन की बात पढ़ कर जब पुलकित ने दौड़ कर मां को सीने में जकड़ लिया था, तो सबकुछ सुन कर मारे खुशी के दादी अपनी आंखें पोंछने बैठ गईं. शाम को घर वापस आ कर जब चाचू ने सुना तो उछल पड़े, ‘जिओ, मेरे शेर. आखिर भतीजा किस का है? मैं ने कहा था न, डौंट वरी, देर है, अंधेर नहीं.’ फिर भी प्याला और होंठों के बीच फासला बहुत होता है. नाव किनारे लगतेलगते भी कई बार जाने किनकिन थपेड़ों से किनारे से दूर जाने लगी. पुलकित के पासपोर्ट और हैल्थ सर्टिफिकेट को ले कर मामला फंसने लगा. प्रयाग ने इंटर के बाद ही बेटे का पासपोर्ट बनवा दिया था. उस फोटो में पुलकित की मूछें थीं, और कंपीटिशन के लिए नाम लिखी हुई तख्ती वह छाती के सामने पकड़े हुए था. तो उस फोटो को देख कर जरमन एंबैसी के एक भारतीय औफिसर ने कहा था, ‘यह फोटो तो तुम से एकदम मेल नहीं खाती. अरे भाई, यह तो कैदी जैसा है.’ फोटो में टीशर्ट धारीदार जो थी.

जरमन अधिकारी ने भी कहा, ‘नया पासपोर्ट बना कर लाओ, हम 3 दिनों के अंदर तुम्हें वीजा दे देंगे.’

तो फिर भागदौड़…

उधर यूनिवर्सिटी हैल्थ सैंटर से डीएएडी के प्रारूप पर हैल्थ सर्टिफिकेट लेते समय डाक्टर ने पूछा था, ‘कभी जौंडिस वगैरा कुछ हुआ था?’

पुलकित ने सिर हिलाया, ‘बचपन में एक बार हुआ था.’

डाक्टर ने उस कौलम के आगे ‘नो’ के बजाय ‘यस’ लिख दिया. अब उस सत्यवादी हरिश्चंद्र के कारण वह सर्टिफिकेट जरमनी से ईमेल के जरिए लौटा दिया गया कि उसी डाक्टर से यह लिखवाओ कि ‘तुम्हें अब किसी इलाज की जरूरत नहीं है. तुम बिलकुल स्वस्थ हो.’लो, फिर से एडि़यां रगड़ो. उनींदी रात गुजारो. पापामम्मी दोनों उदास. अब आगे क्या होगा? खैर, भागदौड़ का यह हिस्सा भी खत्म हुआ.

तो, एक ट्रौली पर सामान रख कर पुलकित लगेज चैकिंग वाले काउंटर की ओर जा रहा है. जाने के पहले उस ने डैडी के पैर छुए. मां से देर तक लिपटा रहा. मां की आंखें, तो बस, पानी का बसेरा, पंछी है निगाहें. प्रयाग काफी देर तक उसे सीने से लगाए रहे. अब तो सालभर बाद ही बेटे से मिलना होगा. पुलकित ने उन को कई बार मना किया था, ‘डैडी, मेरी फ्लाइट रात ढाई बजे की है. मुझे 3-4 घंटे पहलेही चैक-इन करना पड़ेगा. आप लोग मेरे साथ दिल्ली के एयरपोर्ट तक जा कर क्या कीजिएगा? आप घर ही पर रहिए न.’

मगर उस की मम्मी ने कहा था, ‘नहीं, हमें तुझे सी औफ करने जाना है.’

दादी और चाचा ने भी वही बात दोहराई, ‘अरे वहां तक तो साथ रहने दे.’ एयरपोर्ट सिक्योरिटी औफिसर ने पुलकित का सामान एक कैरियर बैल्ट पर रख दिया. मैटल डिटैक्टर से हर चीज की चैकिंग होगी. शीशे के दरवाजे के अंदर जा कर उसे अपना सामान ले कर बोर्डिंग पास लेना है. फिर तो घंटों की प्रतीक्षा. जब तकफ्लाइट की घोषणा न हो जाए.

पुलकित हाथ हिलाते हुए शीशे के दरवाजे के अंदर दाखिल हो जाता है. प्रयाग अपनी पत्नी के साथ बाहर खड़े हैं. सामान की चैकिंग हो गई. फिर से ट्रौली पर उन्हें रख कर पुलकित आगे जा रहा है. इधर मुड़मुड़ कर देख रहा है. हाथ हिला रहा है. सामने से किसी फ्लाइट से उतरने वाले यात्रियों की भीड़ चली आ रही है. पुलकित इन की आंखों से ओझल हो गया. प्रयाग बस एक बार बेटे को देख लेने के लिए बाहर लाउंज पर दौड़ रहे हैं.

‘अरे, यह आप क्या कर रहे हैं?’’ पुलकित की मां उन्हें रोकना चाहती है.

कितने सारे लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं. हाथों में भारीभरकम सूटकेस या पीठ पर टूरिस्ट बैग, यूरोपियन, जापानी, अफ्रीकी, हज से लौटने वाले या बुद्धिस्ट- और दूसरे शहरों के यात्री भी.

‘‘वो रहा पुलकित,’’ प्रयाग सामने देखे बिना चले जा रहे हैं. जैसे बचपन में स्कूलगेट के अंदर जाते समय नन्हा पुलकित बारबार पीछे मुड़ कर देखता था. कांच की दीवार के इस पार किसी पिंजड़े में बंद पंछी की तरह प्रयाग इधर से उधर दौड़ रहे हैं.

‘‘अरे रे रे, सर, जरा देख कर चलिए. अभी टक्कर हो जाती,’’ एयरपोर्ट का एक कर्मचारी कई ट्रौलियों को एकसाथ धकेलते हुए एक किनारे लगा रहा था. घरघर की तेज आवाज हो रही थी. प्रयाग उन्हीं से जा टकराए. उस आदमी ने संभाल लिया, वरना… पुलकित की मां दौड़ कर आ पहुंची, ‘‘अभी कुछ हो जाता तो? अब उसे कैसे देख पाइएगा?’’

प्रयाग ने किसी की कोई बात नहीं सुनी. शीशे की दीवार के पार उन की निगाहें पुलकित को बस एक बार और देख लेने को आतुर थीं. मगर वे पुलकित को देखते भी तो कैसे? निगाहें कैद हैं पानी के घर में. आंखों की यह कैसी बेवफाई?

Romantic Story : आंसू – आखिर कौन था वह अजनबी जिसने सुनीता की मदद की ?

Romantic Story : ‘‘कुमारी सुनीता, आप की पूरी फीस जमा है. आप को फीस जमा करने की आवश्यकता नहीं है,’’ बुकिंग क्लर्क अपना रेकौर्ड चैक कर के बोला.

‘‘मगर मेरी फीस किस ने जमा कराई है. वह भी पूरे 50 हजार रुपए,’’ सुनीता हैरानी से पूछ रही थी.

‘‘मैडम, आप की फीस औनलाइन जमा की गई है,’’ क्लर्क का संक्षिप्त सा उत्तर था.

वह हैरानपरेशान कालेज से वापस लौट आई. उस की मां बेटी का परेशान चेहरा देख कर पूछ बैठी, ‘‘क्या बात है बेटी?’’

‘‘मां, किसी व्यक्ति ने मेरी पूरी फीस जमा करा दी है,’’ वह हैरानी से बोली.

‘‘किस ने और क्यों जमा कराई?’’ सुनीता की मां भी परेशान हो उठी.

‘‘पता नहीं मां, कौन है और बदले में हम से क्या चाहता है?’’ बेटी की परेशानी इन शब्दों में टपक रही थी.

उस की मां सोच में पड़ गई. आजकल मांगने के बाद भी मुश्किल से 5-10 हजार रुपए कोई देता है वह भी लाख एहसान जताने के बाद. इधर ऐसा कौन है जिस ने बिना मांगे 50 हजार रुपए जमा करा दिए. आखिर, बदले में उस की शर्त क्या है?

‘‘खैर, जाने दो जो भी होगा दोचार दिनों में खुद सामने आ जाएगा,’’ मां ने बात को समाप्त करते कहा.

दोनों मांबेटी खाना खा कर लेट गईं. सुनीता की मां एक प्राइवेट हौस्पिटल में 4 हजार रुपए मासिक पर दाई की नौकरी करती है. आज से 15 साल पहले एक रेल ऐक्सिडैंट में वह पति को खो चुकी थीं. तब सुनीता मुश्किल से 5-6 साल की रही होगी. तब से आज तक दोनों एकदूसरे का सहारा बन जी रही हैं. सुनीता को पढ़ाना उस का एक फर्ज है. बेटी बीए कर रही थी.

सुनीता ने अपने पिता को इतनी कम उम्र में देखा था कि उसे उन का चेहरा तक ठीक से याद नहीं है. कोई नातेरिश्तेदार इन से मिलने नहीं आता था. ऐसे में यह कौन है जो उस की फीस भर गया?

दोनों मांबेटी की आंखों में यह प्रश्न तैर रहा था. पिता के नाम के स्थान पर दिवंगत रामनारायण मिश्रा लिखा था मगर वे कौन थे और कैसे थे, इस की चर्चा घर में कभी नहीं होती थी. मगर आज…

सुनीता के चाचा, मामा, मौसा या किसी दूसरे रिश्तेदार ने आज तक कभी एक रुपए की मदद नहीं की, ऐसी स्थिति में इतनी बड़ी रकम की मदद किस ने की.

बहरहाल, सुनीता उत्साह के साथ पढ़ाई में जुट गई. दोचार वर्षों में वह बैंक, रेलवे या कहीं भी नौकरी कर के घर की गरीबी दूर कर देगी. वह मां को इस तरह खटने  नहीं  देगी. मां ने विधवा की जिंदगी में काफी कष्ट झेला है.

सुनीता उस दिन अचकचा गई जब उस के प्राचार्य  ने उसे एक खत दिया. और कहा, ‘‘बेटी, आप के नाम यह पत्र एक सज्जन छोड़ गए हैं, आप चाहें तो इस पते पर उन से संपर्क कर सकती हैं या फोन पर बात कर सकती हैं.’’

‘‘जी, धन्यवाद सर,’’ कह कर वह उन के कैबिन से बाहर आ गई और सीधा घर जा कर खत पढ़ा. उस में लिखा था, ‘‘बेटी, आप की फीस मैं ने भरी है, बदले में मुझे तुम से कुछ भी नहीं चाहिए, न ही तुम्हें यह पैसा लौटाना है.’’ नीचे उन के हस्ताक्षर और मोबाइल नंबर था.

सुनीता की मां ने जब वह नंबर डायल किया तो तुरंत जवाब मिला, ‘‘जी, आप सुनीता या उस की मां?’’

‘‘मैं उस की मां बोल रही हूं. आप ने मेरी बेटी की फीस क्यों भरी?’’

‘‘जी, इसलिए कि मुझे इन के पिता का कर्ज चुकाना था.’’ वह संक्षिप्त उत्तर दे कर चुप हो गया.

‘‘ऐसा कीजिए आप मेरे घर आ जाइए.‘‘

‘‘ठीक है, रविवार को दोपहर 1 बजे मैं आप के घर आऊंगा,’’ कह कर उस व्यक्ति ने फोन काट दिया.

रविवार को वह समय पर हाजिर हो गया. करीब 28-30 वर्ष का वह नौजवान आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था. वह बाइक से आया और सुनीता की मां को मिठाई का डब्बा दे कर नमस्कार किया.

सुनीता ने भी उसे नमस्कार किया और पास में बैठते हुए अपना प्रश्न दोहराया.

‘‘मैं ने फोन पर बताया तो था कि आप का ऋण चुकता किया है,’’ वह सरल स्वर में बोला था.

‘‘कैसा ऋण? दोनों मांबेटी चौंकी थीं.

‘‘ऐसा है कि रामनारायणजी ने मेरे पिताजी की 3 हजार रुपए की मदद की थी. उस के बाद मेरे पिताजी जब तक वह पैसा लौटाते तब तक रामनारायणजी गुजर चुके थे. परिवार का कोई ठिकाना नहीं था. मेरे पिताजी ने आप लोगों को बहुत ढूंढ़ा पर खोज नहीं पाए,’’ वह स्पष्ट स्वर में जवाब दे रहा था, मैं पढ़लिख कर नौकरी में आ गया और स्टेट बैंक की उसी शाखा में आ गया जहां आप लोगों का खाता है. साथ ही, वहीं सुनीता के कालेज का भी खाता है. मुझे यहीं आप का परिचय और आप की माली हालत का पता चला. मैं ने आप की मदद का निश्चय किया और फीस भर दी.’’

‘‘मगर आप अपनेआप को छिपा कर क्यों रखना चाहते थे,’’ यह सुनीता का प्रश्न था.

‘‘वह इसलिए कि मुझे बदले में कुछ भी नहीं चाहिए था और जमाने को देखते हुए मुझे चलना था.’’

‘‘फिर सामने क्यों आए?’’ यह सुनीता की मां का प्रश्न था.

‘‘जब आप लोगों को परेशान देखा, खास कर आप का यह डर की पता नहीं इस आदमी की छिपी शर्त क्या है? मैं ने आप का ऋण चुकाया था, डराना मेरा पेशा नहीं है. सो, सामने आ गया.’’

अब उस के इस जवाब से वे दोनों मांबेटी, आश्चर्य से भर उठीं.

‘‘मैं अब निकलना चाहूंगा. आप लोग चिंता न करें. मैं ने अपने पिताजी का ऋण चुकाया है,’’ वह उठते ही बोला.

‘‘ऐसे कैसे? वह भी 3 हजार के 50 हजार रुपए?’’ अभी भी सुनीता की मां समझ नहीं पा रही थी.

‘‘3 हजार रुपए नहीं, उन 3 हजार रुपए से मेरे पिता ने मेरी जान बचाई, मेरा इलाज कराया. मैं जीवित हूं, तभी आज बैंक में काम कर रहा हूं. गरीबी की हालत में मेरे पिताजी की रामनारायणजी ने मदद की थी. आज मेरे पास सबकुछ है, बस, पिताजी नहीं हैं,’’ वह भावुक हो कर बोल रहा था.

‘‘फिर तुम यह पैसा वापस क्यों नहीं लेना चाहते?’’ यह सुनीता की मां का प्रश्न था.

‘‘उपकार के बदले प्रत्युपकार हो गया. सो कैसा पैसा?’’ वह स्पष्ट बोला.

‘‘फिर भी…’’ सुनीता की मां समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे?

‘‘कुछ नहीं आंटीजी, आप ज्यादा न सोचें. अब मुझे इजाजत दें,’’ इतना कह कर वह चल दिया.

दोनों मांबेटी उसे जाता देख रही थीं. इन की आंखों से खुशी के आंसू झर रहे थे.

‘‘मां, आज भी ऐसे लोग हैं,’’ सुनीता बोली.

‘‘हां, तभी तो वह हमारी मदद कर गया.’’

‘‘मैं नौकरी कर के उन का पैसा वापस कर दूंगी,’’ वह भावुक हो कर बोली.

‘‘बेटी, ऐसे लोग बस देना जानते हैं, लेना नहीं. सो, फीस की बात भूल जाओ. हां, बैंक में मेरा परिचय हो गया है, काम जल्दी हो जाएगा,’’ मां के बोल दुनियादारी भरे थे.

दोनों मांबेटी की आंखों में आंसू थे जो एक ही वक्त में 2 अलग सोच पैदा कर रहे थे. मां जहां पति को याद कर रो रही थी जिन के दम पर आज 50 हजार रुपए की मदद मिली, वहीं बेटी को यह व्यक्ति फरिश्ता नजर आ रहा था. काश, वह भी किसी की मदद कर पाती. 50 हजार रुपए कम नहीं होते.

अब बस, दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे.

Democracy : लोकतंत्र पर हावी होता कट्टरपंथ

Democracy : कट्टरपंथियों के सत्ता में आने से धर्म मजबूत होता है और लोकतंत्र हाशिए पर चला जाता है. धर्म और सत्ता के इस गठजोड़ का शिकार अल्पसंख्यक समाज, औरतें और वे लोग होते हैं जो लोकतंत्र को मजबूत देखना चाहते हैं. लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह जरूरी है कि लोकतंत्र में विरोधी विचारों का भी सम्मान हो और इस के लिए जरूरी है कि सत्ता को धर्म से अलग रखा जाए.

दुनियाभर में कट्टरपंथ का दौर चल रहा है. भारत, पाकिस्तान, अ फगानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार और बांग्लादेश जैसे एशियाई देशों में धार्मिक कट्टरता उफान पर है तो डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद अमेरिका में भी धार्मिक कट्टरपंथ तेजी से बढ़ रहा है. कट्टरपंथी जहां भी सत्ता पर काबिज होते हैं धर्म और राष्ट्रवाद को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं. सरकार का काम धर्म चलाना नहीं बल्कि धार्मिक कट्टरवाद से आम आदमी की सुरक्षा करना होना चाहिए लेकिन पूरी दुनिया में दक्षिणपंथ उभर रहा है. दक्षिणपंथ के सहारे धर्म ने डैमोक्रेसी में सेंधमारी कर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है जिस से लोकतंत्र खतरे में दिखाई पड़ने लगा है.

डोनाल्ड ट्रंप की मेहरबानी से कट्टरपंथ की ओर बढ़ता अमेरिका

अमेरिका एक लोकतांत्रिक देश है. ईसाई धर्म के मानने वालों के बहुसंख्यक में होने के बावजूद अमेरिका में धार्मिक कट्टरता के लिए कोई जगह नहीं है. अमेरिका का आम आदमी धर्म से ईसाई होने से पहले अमेरिकन होता है. आम अमेरिकन के लिए धर्म कभी उस की आइडैंटिटी नहीं बना. यही कारण है कि अमेरिका के 94 प्रतिशत चर्च खाली पड़े हैं. ईस्टर या क्रिसमस के मौके पर भी चर्चों में भीड़ नहीं होती. धर्म के नाम पर अमेरिका में कभी फसाद नहीं हुए लेकिन अब डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने से हालात तेजी से बदल रहे हैं.

1979 में खुमैनी ने ईरानी क्रांति के नाम पर ईरान की सत्ता को कब्जाया और ईरान को कट्टरपंथ के रास्ते पर धकेल दिया जिस का खामियाजा ईरान की जनता आज तक भुगत रही है.

1978 में जियाउल हक ने सैक्युलर पाकिस्तान को इस्लामिक कट्टरपंथ के हवाले कर दिया जिस से पाकिस्तान आज तक उबर नहीं पाया. अब अमेरिका भी ईरान और पाकिस्तान के रास्ते पर चल पड़ा है.

अमेरिका में ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों की आबादी लगभग 63 फीसदी है. इन में प्रोटेस्टैंट ईसाई 40 पर्सेंट के साथ बहुमत में हैं. अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रोटेस्टैंट ईसाई हैं और अपने पूरे राजनैतिक प्रचार में उन्होंने धर्म का जम कर इस्तेमाल किया. 2020 से 2024 के दौरान वे बाइबिल हाथों में लिए खुद को ईसाइयत का सब से बड़ा रक्षक घोषित करते नजर आए.

ट्रंप ने अपने 2024 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान में नास्तिकों और मार्क्सवादियों के खिलाफ धर्मयुद्ध की घोषणा की थी साथ ही उन्होंने कहा था कि “अमेरिका आस्तिकों का राष्ट्र है और वे अमेरिका को स्वतंत्रता और न्याय के साथ ईश्वर के अधीन एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं.”

ट्रंप अपनी चुनावी रैलियों में अकसर ईसाई राष्ट्रवाद पर बयानबाजी करते नजर आए और अपने आलोचकों को ईसाइयत का दुश्मन और देशद्रोही साबित करते रहे. 21 जनवरी, 2025 को एक उदघाटन समारोह के मौके पर जहां डोनाल्ड ट्रंप भी मौजूद थे बिशप मैरिएन बुडे ने ट्रंप से अप्रवासियों, शरणार्थियों और एलजीबीटीक्यू के प्रति दया दिखाने के लिए कहा.

इस कार्यक्रम के बाद ट्रंप ने बुडे को एक “देशद्रोही, वामपंथी और ट्रंप से नफरत करने वाला” कह कर अपमानित किया था. पेंसिल्वेनिया में जब डोनाल्ड ट्रंप के कान में गोली लगी थी तब ट्रंप ने कहा था, “ईश्वर ने मेरी जान बचाई है.”

2004 तक अमेरिकी चर्चों में सामूहिक प्रार्थनाओं में लोगों की उपस्थिति लगातार कम होती जा रही थी. चर्च लीडर्स वेबसाइट के अनुसार, “1990 में, 20.4 लोग ही वीकेंड पर चर्च में जाते थे. 2000 में, यह प्रतिशत घट कर 18.7 रह गया और 2004 तक 17.7 प्रतिशत रह गया.” लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद यह आंकड़ा उलट गया है. नियमित रूप से चर्च जाने वालों की तादाद में हैरतअंगेज ढंग से बढ़ोतरी हुई है. 2024 में 22.7 प्रतिशत लोग वीकेंड पर चर्च जाने लगे हैं.

2004 में अमेरिका के 94 प्रतिशत चर्च खाली पड़े थे. इमारतें जर्जर हो चुकी थीं. इन चर्चों में कोई पादरी तक नहीं होता था लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. अब अमेरिका के 19 प्रतिशत चर्च में नियमित प्रार्थनाएं होने लगी हैं. ट्रंप के लौट आने से पादरियों के दिन भी लौट आए हैं. ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान बाइबिल का खूब प्रदर्शन और प्रचार किया जिस से अमेरिका में बाइबिल की बिक्री में 17.9 प्रतिशत की रिकार्ड बढ़ोतरी हुई है.

ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से ही अमेरिका के सभी रिपब्लिकन प्रभुत्व वाले राज्यों में बाइबिल को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है. टेक्सस, लुइसियाना और ओक्लाहोमा के सरकारी हाई स्कूलों के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रकाशित बाइबिल की प्रतियां मंगवाई जा रही हैं. यह अमेरिका जैसे सैक्युलर और डैमोक्रेटिक देश के कट्टरपंथ की दिशा में बढ़ने की शुरुआत है.

दक्षिण एशिया में कट्टरपंथ

धर्म हमेशा लोकतंत्र का विरोधी रहा है इसलिए जहां भी और जब भी धार्मिकता बढ़ती है लोकतंत्र कमजोर ही होता है. कुछ समय से दक्षिण एशिया के सभी देशों में धार्मिक कट्टरता तेजी से बढ़ी है. गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, बीमारी और पिछड़ापन दक्षिण एशिया की हकीकत है. यह समस्याएं लोकतंत्र से ही दूर हो सकती हैं लेकिन दक्षिण एशिया में धार्मिक कट्टरता बढ़ने से लोकतंत्र ही खतरे में पड़ गया है.

नेपाल में एक लंबे संघर्ष के बाद जनता ने राजशाही का अंत किया और अपने लिए एक लोकतांत्रिक व्यवस्था चुनी. लेकिन अब देश के कई बड़े राजनीतिक दल नेपाल को एक हिंदू राज्य में बदलने की कोशिश कर रहे हैं और भारत की आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदूवादी दल इस में मदद कर रहे हैं.

श्रीलंका में बौद्धों और मुसलमानों के बीच का संघर्ष तेज हो गया है. अहिंसा में विश्वास रखने वाले बौद्ध भिक्षुओं ने मुसलमानों के खिलाफ आंदोलन चला रखा है. मुसलमानों के धार्मिक स्थलों और उन की बस्तियों पर हमले किए जाते हैं.

बांग्लादेश में एक अर्से से मुसलिम कट्टरपंथी संगठन जोर पकड़ रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में धर्म के नाम पर कई प्रमुख आतंकवादी संगठन अस्तित्व में आए हैं. देश के हिंदू अल्पसंख्यक संकट में है. धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव और शोषण के मामले धीरेधीरे बढ़ते जा रहे हैं. हर साल हजारों हिंदू बंग्लादेश छोड़ कर भारत में शरण ले रहे हैं.

कुछ दशकों में पाकिस्तान के हालात बदतर ही हुए हैं. तहरीके लब्बैक जैसे सुन्नी कट्टरपंथी संगठनों ने पाकिस्तान को अफगानिस्तान जैसा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. पाकिस्तान में इस वक्त बेहद गंभीर हालात पैदा हो चुके हैं. औरतों और अल्पसंख्यकों के लिए पाकिस्तान सब से खतरनाक देश बनता जा रहा है. धार्मिक कट्टरपंथ बढ़ने से पाकिस्तान की लोकतांत्रिक संस्थानों का औचित्य भी खतरे में पड़ गया है.

यूरोप में हैं अभी बेहतर हालात

यूरोप में हालात उतने बुरे नहीं हैं बल्कि धार्मिक कट्टरता के मामले में यूरोप अभी बेहतर स्थिति में है. यूरोप में ईसाई धर्म लगभग खतम हो चुका है. यूरोप के एक दर्जन देशों के ज्यादातर युवा किसी धर्म का पालन नहीं करते हैं. यूके में 70 प्रतिशत युवा किसी धर्म से खुद को नहीं जोड़ते हैं और 59 प्रतिशत कभी धार्मिक आयोजनों में शामिल नहीं होते हैं.

कैथोलिक हेराल्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार यूरोप में पारंपरिक ईसाई संप्रदायों में गिरावट आई है और चर्च में ईसाइयों की उपस्थिति लगातार कम हो रही है.

यूरोप के 200 साल पुराने चर्च लगभग खतम हो चुके हैं. नए बने चर्च भी खाली पड़े हैं. बुजुर्गों में ईसाइयत के प्रति रुझान बढ़ा है लेकिन वयस्कों के बीच चर्च का आकर्षण खत्म हो चुका है. यही कारण है कि यूरोपियन देशों में डैमोक्रेसी अपनी मजबूत स्थिति को बरकरार रखे हुए हैं.

भारत में धार्मिक कट्टरता और उस के दुष्परिणाम

भारत में पहले से ही जाति, नस्ल, भाषा और धर्म कि सैंकड़ों घेराबंदियां मौजूद थीं लेकिन भारतीय संविधान ने इसे विविधता माना और इस विविधता के बीच एकता कैसे कायम हो इस का उपाय भी किया.

देश की आजादी के बाद समयसमय पर नस्ल जाति भाषा और धर्म के नाम पर हिंसा होती रही लेकिन यह घटनाएं कभी राष्ट्र कि अस्मिता पर भारी न हो पाई. संविधान ने हर मसले को न्यायपूर्ण तरीके से हल किया क्योंकि तब लोकतंत्र पर न्याय और सरकारों पर संविधान हावी रहा लेकिन आज हालात बदल चुके हैं. आज लोकतंत्र पर राजनीति और संविधान पर सरकार हावी हो चुकी है और जिस कबीलाई सोच को खत्म करने की खातिर संविधान बना था वह उद्देश्य अब मरता हुआ सा नजर आ रहा है.

धर्म की मानसिकता वर्तमान राजनीति का हिस्सा है. लोकतंत्र पर धर्म हावी हो चुका है. विविधता से भरे इस देश की अस्मिता को बहुसंख्यकवाद की राजनीति लगातार रौंद रही है जिस का खतरनाक परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा. नस्ल, जाति, भाषा या धर्म कि लकीरें जहां इंसानियत से ऊपर होती हैं वहां लोगों की सोच में एवोल्यूशन और सोसाइटी में रेवोलुशन रुक जाता है. नस्ल बड़ी और इंसानियत छोटी हो जाती है.

डैमोक्रेसी, सेकुलरिज्म और एजुकेशन कि छत्रछाया में ही कोई भी समाज या देश तरक्की करता है लेकिन जब राजनीति पर धर्म हावी हो जाए तब सेक्युलरिज्म कि मौत हो जाती है डैमोक्रेसी बस नाम की रह जाती है एजुकेशन के नाम पर जहालत का प्रसार होने लगता है. लोकतंत्र, भीड़तंत्र बन जाता है और राष्ट्र सदियों पीछे कबीलाई युग मे पहुंच कर पूरी तरह फेल हो जाता है.

नस्ल, जाति, भाषा और धर्म के नाम पर भीड़तंत्र खड़ा किया जा सकता है और ऐसे भीड़तंत्र से सत्ता भी हासिल की जा सकती है लेकिन भीड़तंत्र कि बदौलत विकसित और संपन्न समाज का निर्माण नहीं हो सकता. कट्टरता के नाम पर पैदा की गई भीड़ कि खुराक नफरत होती है और ऐसी व्यवस्था का परिणाम तबाही के सिवा और कुछ नहीं होता.

Bihar Elections : क्या भाजपा देगी नीतीश को झटका

Bihar Elections : नीतीश कुमार की साख भी अब पहले जैसे नहीं रही है. एक तो उन की राजनीतिक निष्ठा पासे की तरह पलटती रहती है और दूसरे उन के खराब स्वास्थ्य और सरकार की कार्यशैली के कारण उन के प्रति विश्वास में कमी आई है. नीतीश कुमार वैसे भी अब 74 साल के हो गए हैं. ऐसे में उन के नेतृत्व को ले कर अभी से सवाल उठ रहे हैं.

बिहार विधानसभा चुनाव की सरगर्मी बढ़ने लगी है और चुनावी समीकरण आकार ले रहे हैं. बिहार की वर्तमान नीतीश सरकार का कार्यकाल 23 नवंबर 2020 से शुरू हुआ था, जिस का कार्यकाल 22 नवंबर 2025 तक है. जाहिर है कि इस से पहले चुनाव होंगे. माना जा रहा है कि सितंबर से अक्तूबर के बीच बिहार में आचार संहिता लग जाएगी.

बिहार में एक बार फिर से चुनावी गठबंधन की बात जोरशोर से उठ रही है. बिहार का चुनाव इस बार कई मायनों में बहुत अलग होने जा रहा है. बिहार की राजनीति सीधे केंद्र की राजनीति पर असर डालती है. इसलिए केंद्र की मोदी सरकार के लिए बिहार का समीकरण भी काफी अहम है. इस बार बिहार का चुनाव एक बार फिर नीतीश कुमार के इर्दगिर्द बुना जा रहा है.

गौरतलब है कि बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में 243 सीटों की विधानसभा में भाजपा 110 सीटों पर और जेडीयू 115 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. इस बार सीटों के बंटवारे को ले कर रस्साकशी और सौदेबाजी देखने को मिल सकती है क्योंकि पिछली बार जेडीयू मात्र 43 सीटें ही जीत पाई थी.

भाजपा ने वैसे तो नीतीश की जनता दल यूनाइटेड के नेतृत्व में चुनाव लड़ना स्वीकार किया है मगर इरादा उस का यही है कि किसी तरह नीतीश के पैरों के नीचे से सत्ता की कालीन खींच ली जाए. ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि अब की बिहार चुनाव नीतीश के राजनीतिक भविष्य की दिशा भी तय कर देगा. राजनीति में अनिश्चितता तो रहती है, लेकिन बिहार में भाजपा अभी तो यही कह रही है कि एनडीए विधानसभा का चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ेगा.

दूसरी तरफ तेजस्वी यादव विरोधी दल के नेता के रूप में काफी मुखर हैं. राहुल गांधी कांग्रेस के लिए जमीन तलाशने में पूरा जोर लगा रहे हैं तो उधर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी को भी उम्मीद है कि उन की पार्टी बिहार में अच्छा प्रदर्शन करेगी.

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान बिहार के अगले ‘नीतीश’ बनने के फेर में हैं. चिराग पासवान की राजनीति इन दिनों बिहार के सीएम नीतीश कुमार के ही इर्दगिर्द घूम रही है. कभी पक्षधरता के साथ तो कभी विरोध के साथ. वह भी नीतीश कुमार के अंदाज में यानी जब मौका मिला तो यह दोहरा देना कि बिहार मुझे बुला रहा है. या केंद्र की राजनीति में नहीं रहूंगा और बिहार ही मेरी राजनीति का अब केंद्र होगा. इन बदले हुए अंदाज में चिराग पासवान चाहे जो चाहते हों, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे माना जा रहा है कि खुद को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर उस समय का इंतजार कर रहे हैं जहां मजबूरी के सीएम की जरूरत हो.

चुनाव के मद्देनजर अब बिहार में नेताओं के भाषणों में कसैलापन और कड़वाहट बढ़ गई है. बजट सत्र में ही इस की झलक दिख चुकी है. तेजस्वी यादव हों या फिर नीतीश कुमार दोनों ही व्यक्तिगत हमला कर रहे हैं. एनडीए हो या फिर इंडिया गठबंधन दोनों तरफ से व्यक्तिगत हमले हो रहे हैं. नीतीश कुमार सदन में तेजस्वी को बच्चा कह कर बात करते हैं. इस तरीके से वह उन के कद को कम करने का प्रयास करते हैं. नीतीश का कहना है कि उन्होंने तेजस्वी के पिता लालू यादव के साथ राजनीति की है. ऐसे में वह उन्हें क्या सिखाएंगे? राजद नेता तेजस्वी यादव इस समय नीतीश कुमार के साथ ही उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का भी राजनीतिक हमला झेल रहे हैं. इस के साथ ही अन्य नेता भी तेजस्वी पर हमलावर हैं.

बिहार की चुनावी राजनीति में जाति का वर्चस्व एक अहम फैक्टर है और यह बात भगवा पार्टी के नेताओं के दिमाग में पहले से ही है. इस बार के चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग की बड़ी भूमिका देखने को मिलेगी. जमीन पर उतरने वाले नेता लोगों को केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की नीतीश कुमार सरकार की जनकल्याण के लिए किए गए कार्यों का बढ़चढ़ कर बखान करेंगे.

उस के आगे क्या होगा? चुनाव के बाद क्या परिणाम आते हैं? कैसी परिस्थितियां होंगी? राजद का प्रदर्शन कैसा होगा? अगर राजद के पास सीटें अच्छी आती हैं तो नीतीश कुमार के पास राजद के साथ जाने का विकल्प होगा. पलटूराम कभी भी पलटी मार सकते हैं. पिछली बार जेडीयू का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा था. इस के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री इसलिए बनाया गया क्योंकि उन के पास दूसरा विकल्प मौजूद था. इस समय जेडीयू और राजद के रिश्ते खराब हैं. ऐसे में भाजपा और जेडीयू का चुनाव में साथ आना मजबूरी है.

इधर मोदी सरकार ने अचानक ही देश में जाति जनगणना कराने का ऐलान कर दिया है. मोदी कैबिनेट के इस फैसले के बाद आगामी बिहार चुनाव में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव को बड़ा झटका लगा है. भाजपा को घेरने के लिए जाति जनगणना का मुद्दा विपक्ष का बहुत मजबूत हथियार था जिसे मोदी कैबिनेट के फैसले ने भोथरा कर दिया है.

हाल के वर्षों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी जाति जनगणना कराने की मांग संसद के अंदर और बाहर करते रहे हैं. बिहार चुनाव से पहले मोदी कैबिनेट के इस फैसले ने राहुल गांधी के तरकश से एक धारदार तीर छीन लिया है. बिहार में जाति आधारित वोट-बैंक हमेशा से निर्णायक रहा है. भाजपा के इस कदम ने विपक्षी नेताओं, खासकर कांग्रेस के राहुल गांधी और राजद के तेजस्वी यादव को रणनीतिक रूप से बैकफुट पर ला दिया है, जो लंबे समय से जाति जनगणना की मांग को अपना प्रमुख मुद्दा बनाए हुए थे. विपक्ष हक्का बक्का तो है, मगर खिसियानी हंसी के साथ अब इस बात का श्रेय लेने की होड़ में लग गया है कि जाति जनगणना की मांग तो वे ही पहले कर रहे थे. हर पार्टी ये दावा कर रही है कि उन के दबाव में ही मोदी सरकार को ऐसा फैसला लेना पड़ा है.

आखिर जाति जनगणना का विरोध करने वाली भाजपा ने अचानक इसे कराने का ऐलान कैसे कर दिया? दरअसल 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के कारण मोदी सरकार देश की सुरक्षा को ले कर सवालों के कटघरे में है. अभी तक हुए आतंकी हमलों में आतंकी ज्यादातर सेना और पुलिस के जवानों पर ही हमले करते आए हैं, मगर पहली बार दहशतगर्दों ने देशभर से कश्मीर घूमने आए पर्यटकों को उन का धर्म पूछ कर अपनी गोलियों का शिकार बनाया. एक ऐसे पर्यटक स्थल बैसरन पर जहां हर दिन कोई दो हजार पर्यटक घूमने आते हों, वहां राज्य सरकार और केंद्र सरकार की ओर से सुरक्षा का कोई इंतजाम न होना, दूरदूर तक कोई सुरक्षाकर्मी न होना और खुफिया तंत्र को हथियारबंद आतंकियों का वहां तक आराम से पहुंचने और 25 मिनट तक गोलीबारी कर 26 पर्यटकों की जान ले कर आराम से निकल जाने की कोई खबर न होना, बहुत बड़ी सुरक्षा चूक है, जिस की जिम्मेदार केंद्र सरकार है.

फिर जिस दिन यह घटना हुई प्रधानमंत्री मोदी जद्दा के दो दिन के टूर पर थे. घटना की खबर सुन कर वे टूर रद्द कर देश वापस तो लौटे मगर बजाए घटनास्थल पर पहुंचने के, वे सीधे बिहार पहुंच गए, जहां चुनावी सरगर्मियां तेज हैं और वहां से उन्होंने रैली को सम्बोधित करते हुए पहलगाम की घटना पर शोक जताया. इस बात को ले कर भी सोशल मीडिया पर भाजपा की काफी किरकिरी हो रही है. ऐसे में कुछ तो ऐसा करना था जिस से यह कलंक कुछ मद्धम पड़े. तो यही दांव मोदी सरकार को जंचा कि जाति जनगणना का ऐलान कर के एक तीर से दो शिकार कर लिए जाए. विपक्ष को भी पटखनी मिल जाए और टीवी चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया पर जारी चर्चाओं में पहलगाम की घटना की जगह जातीय जनगणना ले ले.

मोदी कैबिनेट का यह फैसला बिहार में ओबीसी और ईबीसी वोटरों को साधने की रणनीति का हिस्सा भी है. पिछले दो दशकों में भाजपा ने सामाजिक इंजीनियरिंग के जरिए यादव मुसलिम समीकरण से इतर अति पिछड़ा वर्ग में अपनी पैठ बनाई है. जाति जनगणना का वादा इन वोटरों को यह संदेश देता है कि केंद्र सरकार उन की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है. लेकिन यह कब तक सुनिश्चित होगा इस की कोई निश्चित तारीख नहीं घोषित की गई है.

खैर, मोदी सरकार का यह दांव विपक्ष के लिए काफी उलझन पैदा कर रहा है. खासकर बिहार में, जहां विधानसभा चुनाव सिर पर हैं. राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में ‘जितनी आबादी, उतनी भागीदारी’ का नारा दिया था. अब वे इस मुद्दे पर भाजपा को श्रेय लेने से रोकने के लिए नई रणनीति तलाश रहे हैं. तेजस्वी यादव, जिन्होंने 2023 के सर्वे का श्रेय लिया था, अब यह दावा नहीं कर पाएंगे कि केवल उन की पार्टी ही पिछड़ों की हितैषी है.

विश्लेषकों का मानना है कि अगर भाजपा इस जनगणना को प्रभावी ढंग से लागू करती है, तो महागठबंधन का ओबीसी-मुसलिम गठजोड़ कमजोर पड़ सकता है. कुल मिला कर बिहार के आगामी चुनाव में जाति जनगणना कराने का ऐलान भाजपा के लिए काफी मददगार साबित हो सकता है. मोदी के इस मास्टर स्ट्रोक ने बिहार के चुनावी समीकरण को और जटिल बना दिया है.

नीतीश कुमार की साख भी अब पहले जैसे नहीं रही है. एक तो उन की राजनीतिक निष्ठा पासे की तरह पलटती रहती है और दूसरे उन के खराब स्वास्थ्य और सरकार की कार्यशैली के कारण उन के प्रति विश्वास में कमी आई है. नीतीश कुमार वैसे भी अब 74 साल के हो गए हैं. ऐसे में उन के नेतृत्व को ले कर अभी से सवाल उठ रहे हैं. नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को ले कर पूरी की पूरी रणनीति तैयार की जा रही है.

साल 2005 में जब नीतीश ने सत्ता संभाली थी तो यह कहा जाता था कि बहुत अच्छे शब्द बोलने वाले व्यक्ति के पास सत्ता आई है. इस से इतर पिछले दिनों में उन का भाषण देखें, उन का स्टाइल देखें, वह कैसे गुस्सा हो जा रहे हैं. सभी महसूस कर रहे हैं कि उन का स्वास्थ्य अब अच्छा नहीं है. हालांकि अभी भी वे खुद को काफी सक्रिय दिखाते हैं और ऐसी स्थिति नहीं आई है कि भाजपा उन से पल्ला झाड़ कर अकेले दम पर चुनाव में उतर जाए. नीतीश कुमार के पास 14 प्रतिशत वोट है और भाजपा भी इस बात को मानती है. यह वजह है कि नीतीश कुमार जिस तरफ जाते हैं, जीत उसी की होती है.

भाजपा बिहार में इस बात को ले कर आश्वस्त ही नहीं है कि वह अकेले चुनाव लड़ कर चुनाव जीत सकती है. वैसे कुछ राजनितिक विश्लेषक यह मानते हैं कि यदि भाजपा अकेले चुनाव लड़ जाए तो शायद वहां सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरे, लेकिन भाजपा फिलहाल नीतीश कुमार को चुनाव तक साथ रखना चाहती है. भाजपा अभी बहुत संभल कर राजनीति कर रही है, जिस से नीतीश कुमार दूर भी न जाएं और वह अपने पैरों पर खड़ी भी हो जाए. बिहार में नीतीश कुमार भाजपा की जरूरत है. उन के बिना भाजपा चुनाव नहीं जीत सकती है. दोनों ही इस रिश्ते से खुश नहीं हैं लेकिन इसे निभाया जा रहा है. नीतीश कुमार को ले कर भाजपा नेताओं में बेचैनी भी बहुत है. चुनाव के बाद यह बेचैनी और ज्यादा बढ़ेगी. चुनाव में सीट जीतने का अनुपात अगर पिछली बार की तरह ही रहा तो इस बार बिहार में महाराष्ट्र जैसी राजनीति देखने को मिलेगी.

उत्तर प्रदेश में जिस तरह मुलायम सिंह यादव ने अपने पूरे परिवार को राजनीति में दक्ष किया. बेटों और भाइयों को ही नहीं बल्कि घर की बहुओं को भी राजनीति के गुण सिखाए, वहीं नीतीश कुमार ने अपने बाद दूसरी पंक्ति का कोई नेता उभरने नहीं दिया. बीते 23 साल से पूरी जेडीयू उन के ही इर्दगिर्द घूम रही है. अब जब उन की उम्र ढल रही है तब उन्होंने अपने बेटे निशांत कुमार को कुछ आगे किया है. मगर 40 साल की उम्र पार कर रहा व्यक्ति क्या नीतीश की राजनीतिक विरासत को संभाल पाएगा?

बिहार के नेताओं का मानना है कि नीतीश कुमार के बाद जेडीयू का अस्तित्व मुश्किल में लगता है. उन्होंने अपने बेटे को राजनीति में उस तरह से नहीं बड़ा किया, जिस तरह से बाल ठाकरे ने किया था. वहां यह बात स्पष्ट थी कि उद्धव ठाकरे को बाल ठाकरे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर रहे हैं. मगर नीतीश की राजनीति उन्हीं पर केंद्रित रही है. उन के बेटे निशांत कुमार ने सक्रिय राजनीति में भाग नहीं लिया है. ऐसे में उन के पास ज्यादा अवसर नहीं है. जेडीयू कार्यकर्ताओं की पार्टी नहीं, जातिगत आधार पर खड़ी पार्टी है. नीतीश ने जातिगत आधार पर उपेंद्र कुशवाहा को आगे बढ़ाया था, लेकिन फिर आगे जाने नहीं दिया. प्रशांत किशोर भी एक समय नीतीश के बहुत करीबी थे लेकिन उन के करीब जो भी रहा है वह ज्यादा समय तक उन के साथ नहीं रहा. बिहार की राजनीति में यह भी चर्चा होती है कि जो नेता जेडीयू में नीतीश के बहुत करीब हैं. वह भाजपा के भी उतने की करीब हैं. ऐसे में नीतीश कुमार के बाद जेडीयू का क्या भविष्य होगा, कुछ भी कहा नहीं जा सकता है.

Family Story : राहुल बड़ा हो गया है – राहुल की तीमारदारी ने कैसे बदली मां की सोच

Family Story : अमित से मैं अकसर इस बात पर उलझ पड़ती हूं कि राहुल अभी छोटा है. वह कभी हंस देते हैं, कभी झुंझला उठते हैं कि इतना छोटा भी नहीं है जितना तुम समझती हो.

अमित कहते हैं, ‘‘14 साल पूरे करने वाला है और तुम उसे छोटा ही कहती हो. मैं तो समझता हूं कि कल को उस के बच्चे भी हो जाएंगे तब भी राहुल तुम्हें छोटा ही लगेगा.’’

मैं इस तरह की बातें अनसुनी करती रहती हूं. बेटी मिनी, जो 16 की हुई है, वह भी अपने पापा के सुर में सुर मिलाए रखती है. वह भी यही कहती है, ‘‘छोटा है, हुंह, स्कूल में इस की मस्ती देखो तो आप को पता चलेगा कि यह कितना छोटा है.’’

मैं कहती हूं, ‘‘तो क्या हुआ, छोटा है तो मस्ती तो करेगा ही,’’ मतलब मेरे पास इन दोनों की हर बात का यही जवाब होता है कि राहुल अभी छोटा है. यह तो शुक्र है कि राहुल ने बहुत तेज दिमाग पाया है. कक्षा में हमेशा प्रथम स्थान प्राप्त करता है. खेलकूद में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेता है. जिस में भाग लेता है उसी में प्रथम स्थान प्राप्त करता है. यहीं पर अमित उस से बहुत खुश हो जाते हैं नहीं तो उसे मेरा छोटा कहना दोनों बापबेटी के लिए अच्छाखासा मनोरंजन का विषय रहता है. अब मैं क्या करूं, अगर वह मुझे छोटा लगता है. वैसे भी सुना है कि मां के लिए बच्चे हमेशा छोटे ही रहते हैं.

ठीक है, उस का कद मुझे पार कर गया है. मैं जो अच्छीखासी लंबी हूं, राहुल के कंधे पर आने लगी हूं. उस की हर समय खेलकूद की बातें, उस के चेहरे पर रहने वाली भोली सी मुसकराहट, बस, मुझे कुछ दिखाई नहीं देता, न घर में सब को पार करता उस का कद, न उस के होंठों के ऊपर हलकी सी उभरती मूंछों की कालिमा.

अभी एक हफ्ते पहले मैं ने राहुल का एक दूसरा ही रूप देखा जिसे देख कर मैं ने भी महसूस किया कि राहुल बड़ा हो गया है.

मेरी तबीयत अकसर ठीक नहीं रहती है. कभी कुछ, कभी कुछ, लगा ही रहता है. पिछले हफ्ते की बात है. एक दिन घर का सामान लेने बाजार जाना था. मेरी तबीयत सुबह से ही कुछ सुस्त थी. अमित टूर पर थे, मिनी की परीक्षाएं चल रही थीं. सामान जरूरी था, अत: राहुल और मैं शाम को 4 बजे के आसपास बाजार चले गए. यहां मुंबई में किसी भी दिन किसी भी समय कहीं भी चले जाइए भीड़ ही भीड़, लोग ही लोग. कोई कोना खाली नहीं दिखता.

मुंबई आए 7 साल होने को हैं लेकिन आज भी बाहर निकलती हूं तो हर तरफ भीड़ देख कर जी घबरा जाता है. साधारण हाउसवाइफ हूं, बाहर अकेले कम ही निकलती हूं.

खैर, उस दिन बाजार में सामान लेतेलेते एक जगह सिर बहुत भारी लगने लगा. अचानक ही मुझे तेज चक्कर आया और मैं पसीनेपसीने हो उठी. साथ ही पेट के अंदर कमर के पास तेज दर्द शुरू हो गया. राहुल मेरी हालत देख कर घबरा उठा. मैं ने उसे अपना पर्स व सामान थमाया और इतना ही कहा, ‘‘राहुल, तुरंत डाक्टर के पास चलो.’’

राहुल ने तुरंत आटो बुलाया और मुझे उस में बैठा कर मेरे फैमिली डाक्टर के नर्सिंग होम पहुंचा. रास्ते में मैं ने उसे मिनी को फोन कर के बताने को कहा. डाक्टर ने पहुंचते ही मेरा चेकअप किया और बताया, ‘‘ब्लडप्रेशर बहुत हाई है. मुझे कुछ टेस्ट करने हैं. दर्द के लिए इंजेक्शन दे रहा हूं, आज आप को यहां भरती होना पड़ेगा.’’

मैं यह सोच कर परेशान हो गई कि अमित शहर में नहीं हैं और परीक्षा की तैयारी में व्यस्त मिनी घर पर अकेली है.

मैं अपनी परेशान हालत में कुछ और सोचती इस से पहले ही राहुल बोल उठा, ‘‘अंकल, मम्मी आज यहीं रुक जाएंगी. मैं सब देख लूंगा,’’ आगे मुझ से बोला, ‘‘आप बिलकुल किसी बात की चिंता मत करो, मम्मी. मैं यहीं हूं, मैं हर बात का ध्यान रखूंगा.’’

दर्द से तड़पती मैं उस हाल में भी गर्वित हो उठी यह सोच कर कि मेरा छोटा सा बेटा कैसे मेरी देखभाल के लिए तैयार है. दर्द से मेरी जान निकल रही थी. शायद इंजेक्शन से थोड़ी देर में मुझे नींद भी आ गई. इस बीच राहुल ने मिनी को फोन कर के कुछ पैसे और मेरे लिए खाने को कुछ लाने के लिए कहा.

रात 8 बजे मेरी आंख खुली, तो देखा, दोनों बच्चे मेरे सामने चुपचाप उदास बैठे थे. मन हुआ उठ कर दोनों को अपने सीने से लगा लूं. दर्द खत्म हो चुका था, कमजोरी बहुत महसूस हो रही थी.

मैं बच्चों से बोली, ‘‘अब मैं ठीक हूं. तुम लोग अब घर चले जाओ, रात हो गई है.’’

मैं ने अपनी 2-3 सहेलियों के नाम ले कर कहा, ‘‘उन लोगों को बता दो, उन में से कोई एक यहां रुक जाएगा रात को.’’

मैं आगे कुछ और कहती, इस से पहले ही राहुल बोल उठा, ‘‘नहीं, मम्मी, जब मैं यहां हूं और किसी को बुलाने की जरूरत नहीं है. आप देखना, मैं आप का अच्छी तरह ध्यान रखूंगा. मिनी दीदी, आप जाओ, आप के पेपर हैं. मम्मी और मैं सुबह आ जाएंगे.’’

राहुल आगे बोला, ‘‘हां, एक बात और मम्मी, हम पापा को नहीं बताएंगे. वह टूर पर हैं, परेशान हो जाएंगे. वैसे भी 2 दिन बाद तो वह आ ही जाएंगे.’’

मैं अपने छोटे से बेटे का यह रूप देख कर हैरान थी. मिनी को हम ने समझा कर घर भेज दिया. वैसे भी वह एक समझदार लड़की है. राहुल ने अपने हाथों से मुझे थोड़ा खाना खिलाया और कुछ खुद भी खाया. मेरे राहुल ने कितनी देर से कुछ भी नहीं खाया था, सोच कर मैं लेटेलेटे दुखी सी हो गई.

कुछ दवाइयों का असर था शायद मैं फिर सो गई लेकिन रात को मैं ने जितनी बार आंखें खोलीं, राहुल को बराबर के बेड पर जागते ही पाया. सुबह मुझे पता चला कि किडनी में पथरी का दर्द था. खैर, उस का इलाज तो बाद में होना था. ब्लडप्रेशर सामान्य था.

अब मैं डाक्टर की हिदायतों के बाद घर जाने को तैयार थी. डाक्टर से दवाई समझता, सब बिल चुकाता, एक हाथ से मेरा हाथ, दूसरे में मेरा पर्स और बैग थामता राहुल आज मुझे सच में बड़ा लग रहा था. अस्पताल से निकलते हुए मैं यही सोच रही थी कि अमित और मिनी ठीक कहते हैं राहुल बड़ा हो गया है.

Hindi Kahani : चाय की दुकान – हमारे खबरीलाल बादो चाचा

Hindi Kahani : चाय की दुकान, जहां दुनिया से जुड़ी हर खबर मिल जाएगी आप को. भले हम डिजिटल युग में जी रहे हैं जहां कोई भी खबर सिर्फ उंगलियों को घुमाने से मिल जाती है पर उस से भी तेज खबर मिलेगी आप को चाय की दुकान पर.

किस के बेटे ने मूंछें मुंड़वा लीं, किस की बीवी झगड़ कर मायके चली गई, किस के घर में क्या पका है, किस की बकरी दूसरे का खेत चर गई… हर तरह की खबरें बगैर किसी फीस के  न कोई इंटरनैट और न ही कोई टैलीविजन या रेडियो, पर खबरें बिलकुल टैलीविजन के जैसी मसालेदार.

सब से मजेदार बात तो यह है कि वहां पर पुरानी से पुरानी खबरें सुनाने वाले भी आप को हमेशा मिल जाएंगे, भले ही वे आप के जन्म से पहले की ही क्यों न हों, जैसे कि वे उन के मैमोरी कार्ड में सेव हों.

इन्हीं खबरीलाल में से एक हैं बादो चाचा. उन के पास तो समय ही समय है. कोई भी घटना वे ऐसे सुनाते हैं मानो आंखों देखी बता रहे हों.

गांव के हर गलीनुक्कड़, चौकचौराहे पर मिल जाएंगे. आप उन से इस नुक्कड़ पर मिल कर जाएं और अगले नुक्कड़ पर आप से पहले वे पहुंचे रहते हैं. वे किस रास्ते से जाते हैं आज तक कोई नहीं जान पाया.

इमरान ने जब से होश संभाला है तब से उन्हें वैसा का वैसा ही देख रहा है. बाल तो उन के 20 साल पहले ही पक चुके थे, पर उन की शारीरिक बनावट में आज भी कोई बदलाव या बुढ़ापेपन की झलक नहीं दिखती है, मानो उन के लिए समय रुक गया हो. कोई कह नहीं सकता कि वे नातीपोते वाले हैं.

सुबहसुबह रघु चाचा की चाय की दुकान पर चाय प्रेमियों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया. यह ठीक उसी तरह होता है जिस तरह शहर के किसी रैस्टौरैंट में. वहां व्यंजन पसंद करने में कम से कम आधा घंटा लगता है, और्डर को सर्व होने में कम से कम आधा घंटा लगेगा, यह तो मेनू कार्ड में खुद लिखा होता है और फिर उस के बाद कोई समय सीमा नहीं. आप जब तक खाएं और जब तक बैठें आप की मरजी. खाएं या न खाएं, पर सैल्फी ले कर लोगों को बताएं जरूर कि सोनू विद मोनू ऐंड थर्टी फाइव अदर्स एट ओस्मानी रैस्टौरैंट.

यहां भी कुछ ऐसा ही नजारा रहता है. 5 रुपए की चाय पी कर लोग साढ़े 3 रुपए का अखबार पढ़ते हैं और फिर देशदुनिया के साथ पूरे गांव और आसपास के गांवों की कहानियां चलती हैं बगैर किसी समय सीमा के. सब को पता होता है कि घर के बुजुर्ग चाय की दुकान पर मिल जाएंगे, विद अदर्स.

हमेशा की तरह बादो चाचा की आकाशवाणी जारी थी, ‘‘यह हरी को भी क्या हो गया है, बड़ीबड़ी बच्चियों को पढ़ने के लिए ट्रेन से भेजता है. वे अभी साइकिल से स्टेशन जाएंगी और फिर वहां से लड़कों की तरह ट्रेन पकड़ कर बाजार…

‘‘पढ़लिख कर क्या करेंगी? कलक्टर बनेंगी क्या? कुछ तो गांव की मानमर्यादा का खयाल रखता. मैट्रिक कर ली, अब कोई आसान सा विषय दे कर घर से पढ़ा लेता.’’

इसी के साथ शुरू हो गई गरमागरम चाय के साथ ताजा विषय पर परिचर्चा. सब लोगों ने एकसाथ हरी चाचा पर ताने मारने में हिस्सा लिया.

कोई कहता कि खुद तो अंगूठाछाप है, अब चला है भैया बेटियों को पढ़ाने, तो कोई कहता कि पढ़ कर वही चूल्हाचौका ही संभालेंगी, इंदिरा गांधी थोड़े न बन जाएंगी.

अगले दिन बादो चाचा चाय की दुकान पर नहीं दिखे, पता चला कि पोती को जो स्कूल में सरकारी साइकिल के पैसे मिलने वाले हैं, उसी की रसीद लाने गए हैं.

इमरान को कल हरी चाचा पर मारे गए ताने याद आ गए. जब वह बचपन में साइकिल चलाना सीखता था तो उस समय उस की ही उम्र की कुछ लड़कियां भी साइकिल चलाना सीखती थीं और यही बादो चाचा और गांव के कुछ दूसरे बुजुर्ग उन पर ताने मारते नहीं थकते थे और आज वे अपनी ही पोती के लिए साइकिल के पैसे के लिए रसीद लाने गए हैं.

अगले दिन इमरान ने पूछा, ‘‘कल आप आए नहीं बादो चाचा?’’

वे कहने लगे, ‘‘क्या बताऊं बेटा, जगमला… मेरी पोती 9वीं जमात में चली गई है. उसी को साइकिल मिलने वाली है. उसी की रसीद लाने गया था. परेशान हो गया बेटा. कोई साइकिल का दुकानदार रसीद देने को तैयार ही नहीं था. सब को कमीशन चाहिए. पहले ही अगर चैक मिल जाए तो इतनी परेशानी न हो.

‘‘यह सरकार भी न, पहले रसीद स्कूल में जमा करो, फिर जा कर आप को चैक मिलेगा. जब साइकिल के पैसे देने ही हैं तो दे दो, रसीद क्यों मांगते हो? उन पैसों का कोई भोज थोड़े न कर लेगा, साइकिल ही लाएगा. आजकल के बच्चेबच्चियों को भी पता है कि सरकार उन्हें पैसे देती है वे खरीदवा कर ही दम लेते हैं, चैन से थोड़े न रहने देते हैं.’’

‘‘हां चाचा, पर जगमला तो लड़की है. वह साइकिल चलाए, यह शोभा थोड़े न देगा,’’ इमरान ने ताना मारा.

‘‘अरे नहीं बेटा, उस का स्कूल बहुत दूर है. नन्ही सी जान कितना पैदल चलेगी. स्कूलट्यूशन सब करना पड़ता है, साइकिल रहने से थोड़ी आसानी होगी. और देखो, आजकल जमाना कहां से कहां पहुंच गया है. पढ़ेगी नहीं तो अच्छे रिश्ते भी नहीं मिलेंगे.’’

‘‘पर, आप ही तो कल हरी चाचा की बेटी के बारे में कह रहे थे कि पढ़ कर कलक्टर बनेगी क्या?’’ इमराने ने फिर ताना मारा. इस बार बादो चाचा ने कोई जवाब नहीं दिया.

इमरान ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘चाचा, जैसा आप अपनी पोती के बारे में सोचते हो, वैसा ही दूसरों की बेटियों के बारे में भी सोचा करो. याद है, मेरे बचपन में आप ताने मारते थे जब मेरे साथ गांव की कुछ लड़कियां भी साइकिल चलाना सीखती थीं और आज खुद अपनी पोती की साइकिल खरीदने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हो.

‘‘समय बदल रहा है चाचा, अपनी सोच भी बदलो. गांव में अगर साधन हों तो बच्चियां ट्रेन से पढ़ने क्यों जाएंगी? मजबूरी है तभी तो जा रही हैं. अभी ताने मारते हो और भविष्य में जब खुद पर आएगी तो उसी को फिर सराहोगे.

‘‘क्या पता हरी चाचा की बेटी सच में कलक्टर बन जाए. और नहीं तो कम से कम गांव में ही कोचिंग सैंटर खोल ले, तब शायद आप की जगमला को इस तरह बाजार न जाना पड़े…’’

तभी बीच में सत्तो चाचा कहने लगे, ‘‘लड़कियों की पढ़ाईलिखाई तो सिर्फ इसलिए है बेटा कि शादी के लिए कोई अच्छा सा रिश्ता मिल जाए, हमें कौन सा डाक्टरइंजीनियर बनाना है या नौकरी करवानी है.

‘‘आजकल जिस को देखो, अपनी बहूबेटियों को मास्टर बनाने में लगा हुआ है. उस के लिए आसानआसान तरीके ढूंढ़ रहा है. नौकरी करेंगी, मर्दों के साथ उठनाबैठना होगा, घर का सारा संस्कार स्वाहा हो जाएगा. यह सब लड़कियों को शोभा नहीं देता.’’

इमरान ने कहा, ‘‘चाचा, अगर सब आप की तरह सोचने लगे तो अपनी बहूबेटियों के लिए जो लेडीज डाक्टर ढूंढ़ते हो, वे कहां से लाओगे? घर की औरतें खेतों में जा कर मजदूरी करें, बकरियां चराएं, चारा लाएं, जलावनचुन कर लाएं, यह शोभा देता है आप को…

‘‘ऐसी औरतें आप लोगों की नजरों में एकदम मेहनती और आज्ञाकारी होती हैं पर पढ़ीलिखी, डाक्टरइंजीनियर या नौकरी करने वाली लड़कियां संस्कारहीन हैं.

‘‘क्या खेतखलिहानों में सिर्फ औरतें ही काम करती हैं? वहां भी तो मर्द रहते हैं. बचपन से देख रहा हूं कि चाची ही चाय की दुकान संभालती हैं. रघु चाचा की तो रात वाली उतरी भी नहीं होगी अभी तक. यहां भी तो सिर्फ मर्द ही रहते हैं और यहां पर कितनी संस्कार की बातें होती हैं, यह तो आप सब भी जानते हो.’’

यह सुन कर सब चुप. किसी ने कोई सवालजवाब नहीं किया. इमरान वहां से चला गया.

2 दिन बाद जब इमरान सुबहसुबह ट्रेन पकड़ने जा रहा था तो उस ने देखा कि स्टेशन जाने के रास्ते में जो मैदान पड़ता था वहां बादो चाचा अपनी पोती को साइकिल चलाना सिखा रहे थे.

चाचा की नजरें इमरान से मिलीं और वे मुसकरा दिए. चाय की दुकान पर कही गई इमरान की बातें उन पर असर कर गई थीं.

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