Download App

Best Hindi Story : चोट – आखिर कब तक वे बेइज्जती और जोरजुल्म सहन करती?

Best Hindi Story : आखिर कब तक सहन करती? कब तक बेइज्जती, जोरजुल्म सहती? इस आदमी ने, जब से मैं इस घर में शादी कर के आई हूं, डांटफटकार, उलाहनों तानों के अलावा कुछ नहीं दिया.

शादी के शुरुआती कुछ दिन… कुछ महीने… ज्यादा हुआ, तो एक साल तक प्यार से बात की. घुमानेफिराने ले जाते. सिनेमा दिखाते, मेला, प्रदर्शनी ले जाते. मीठीमीठी प्यारभरी बातें करते. यहां तक कि अपनी मां से भी बहस कर लेते.

अगर मेरी सास मुझे छोटीछोटी बातों पर टोकतीं, तो पतिदेव अपनी मां से कह देते, ‘‘क्यों छोटीछोटी बातों पर घर की शांति भंग कर रही हो? आप की लड़की के साथ ससुराल में यही सब हो तो क्या बीतेगी आप पर? यह इस घर की बहू है, नौकरानी नहीं.

‘‘यह तो कुछ नहीं कहती, लेकिन मैं ही इसे घुमाने ले जाता हूं. पढ़ीलिखी औरत है. बदलते समय के साथ आप नहीं बदल सकतीं, तो छोटीछोटी बातों पर टोकाटाकी कर के घर में अशांति तो न फैलाएं.’’

सास को लगता होगा कि जोरू का गुलाम है बेटा. वे गुस्से में कुछ दिन तक बात न करतीं. बात करतीं तो भी इस तरह, जैसे धीरेधीरे बातों से अपना गुस्सा निकाल रही हों.

‘‘मुझे क्या करना है? तुम खूब घूमोफिरो, लेकिन हद में. आसपड़ोस के घर में भी बहुएं हैं. यह क्या बात हुई कि जब जी आया मुंह उठा कर चल दिए.

न किसी से कुछ पूछना, न बता कर जाना. आखिर घर में बड़ेबुजुर्ग भी हैं. उन के मानसम्मान का भी ध्यान रखो.’’

एक साल बाद ही पति के बरताव में बदलाव आने लगा. शायद शादी की  खुमारी अब तक उतर चुकी थी. पहले ये बहुत ही कम टोकाटाकी करते, बाद में बातबात पर टोकने लगे. मेरी कोई बात इन्हें अच्छी ही नहीं लगती. हर बात में अपनी मां की तरफदारी करते. चाहे वह बात गलत हो या सही, मैं सुनती रही.

इस बीच 2 बच्चे भी हो गए. कहने को घरगृहस्थी तो ठीकठाक चल रही थी, लेकिन जिन पति से मैं प्यार करती थी, उन के बातबात पर डांटनेटोकने से मन उदास रहने लगा.

मैं अपनी तरफ से पति का, सास का, बच्चों का, घर का पूरा खयाल रखती, फिर भी इन की बातबात पर टोकने, डांटने की आदत नहीं जाती.

एक बार मैं ने गुस्से में जरा जोर से कहा भी था, ‘‘आखिर बात क्या है? आप मुझे इस तरह से बेइज्जत क्यों करते रहते हैं?’’

इन्होंने भी झुंझला कर जवाब दिया, ‘‘मैं मर्द हूं. घर का मुखिया हूं. गलत बात पर टोकूंगा नहीं, तो क्या लाड़ करूंगा? तुम 2 बच्चों की मां बन गई हो. तुम्हें घर की जिम्मेदारी समझनी चाहिए. गलती पर डांटता हूं, तो गलती को सुधारना चाहिए. इस में बुरा मानने वाली क्या बात है?’’

‘‘मैं ऐसी कौन सी गलती करती हूं? क्या मन भर गया है मुझ से?’’

‘‘मुझे तो सब को साथ ले कर चलना है. तुम्हारा भी अब तक मन भर जाना चाहिए. प्यारमुहब्बत की उम्र बीत चुकी. अब अपने फर्ज पर ध्यान दो.’’

‘‘आखिर मैं ने फर्ज निभाने में कौन सी कमी रखी है?’’

‘‘तुम फिर बहस करने लगीं. मुझे तुम्हारी यही बात अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘आप को मेरी कौन सी बात अच्छी लगती है आजकल?’’

‘‘औरत हो, औरत की तरह रहना सीखो. घर के कामकाज देखो. अम्मां की तबीयत ठीक नहीं रहती आजकल. उन की देखभाल करो.’’

‘‘करती तो हूं.’’

‘‘करती, तो अम्मां शिकायत नहीं करतीं.’’

‘‘अम्मां की तो आदत है मेरी शिकायत करने की. एक की चार लगा कर भड़काती हैं.’’

‘‘खबरदार, जो मेरी अम्मां के बारे में कुछ कहा,’’ इन्होंने इतनी जोर से डांटा कि मैं गुस्से में अपने कमरे में आ कर रोने लगी.

बैडरूम में तो ये बड़े प्यार से बात करते हैं. हालांकि अब यह होता है कि बैडरूम में मेरे आने तक ये सो जाते हैं. मुझे घर के काम निबटातेनिबटाते ही रात के 11-12 बज जाते हैं.

अब हमारे बीच संबंध बनने में भी काफी समय होने लगा था. मसरूफियत, जिम्मेदारी, बढ़ती उम्र के साथ ऐसा होता है. इस की कोई शिकायत नहीं. लेकिन आदमी दो बातें प्यार से कर ले, तो क्या बिगड़ जाएगा? लेकिन पता नहीं क्यों आजकल मुझे देख कर इन का पारा चढ़ जाता है, खासकर दूसरों के सामने.

ये दूसरों से तो अच्छी तरह बात करेंगे. अपनी अम्मां से, बच्चों से, पासपड़ोस के लोगों से, घर आए रिश्तेदारों से. दोस्तों से तो इस कदर प्यार से बातें करेंगे कि जैसे इन्हें गुस्सा आता ही न हो, मानो जबान पर चाशनी चिपक जाती हो.

लेकिन सुबह मैं थोड़ी देर से उठूं, तो चिल्लाते हैं, ‘‘तुम जल्दी नहीं उठ सकतीं. यह कोई समय है उठने का? अभी तक चाय नहीं बनी. चाय में चीनी कम है. कभी ज्यादा है. खाने में नमक नहीं है. यह सब्जी क्यों बनाई है? वही काम करती हो, जो मुझे पसंद नहीं आता. न घर में साफसफाई है, न बच्चों की तरफ ढंग से ध्यान देती हो.

‘‘अम्मां अब कितने दिनों की मेहमान हैं. कम से कम उन की देखभाल ही ठीक से कर लिया करो. तुम्हें कपड़े पहनने का सलीका नहीं आता है. तुम्हें मेहमानों से बात करने का ढंग नहीं है. तुम यह नहीं करती, तुम वह नहीं करती. तुम ऐसी हो, तुम वैसी हो. तुम्हें तो कुछ भी नहीं आता.’’

मैं ने तो अब बहस करना, इन की बातों पर ध्यान देना ही छोड़ दिया. जो कहना है, कहते रहो. मेरा काम सुनना है, सुनती रहती हूं. लेकिन आखिर कब तक? अकेले में कह दें तो सुन भी लूं. चार लोगों के बीच टोकना, डांटना घोर बेइज्जती है मेरी. मेरे औरत होने की. पत्नी हूं, नौकरानी नहीं.

एक दिन इन के 2-3 दोस्त खाने पर आए. इन के कहे मुताबिक ही खाना बनाया. मैं ने अच्छे से परोसा. लेकिन दोस्तों के सामने ही इन का चिल्लाना शुरू हो गया, ‘‘जरा अपने हाथपैर तेजी से चलाओ. यह जैट युग है, बैलगाड़ी की तरह काम मत करो…’’

फिर इन्होंने चीख कर कहा, ‘‘दही कहां है?’’

‘‘अभी लाई,’’ मैं ने अपनी रुलाई रोकते हुए कहा.

इन के एक दोस्त ने कहा, ‘‘क्या दबदबा बना कर रखा है यार? मैं अगर अपनी पत्नी से इतना कह दूं, तो घर में मुसीबत खड़ी हो जाए.’’

दूसरे दोस्त ने इन की हिम्मत बढ़ाते हुए कहा, ‘‘वाकई सही माने में तुम हो असली मर्द. औरतों को ज्यादा सिर पर नहीं चढ़ाना चाहिए.’’

मैं अंदर रसोई में से सब सुन रही थी. जी तो चाहता था कि सारा सामान उठा कर फेंक दूं. इन्हें और इन के दोस्तों को जम कर लताड़ लगाऊं, लेकिन चुप ही रही. पर मैं ने भी मन ही मन तय कर लिया था कि अपनी बेइज्जती का बदला तो ले कर रहूंगी. लेकिन बहस से, चीखचिल्ला कर घर का माहौल बिगाड़ कर नहीं. इन्हें बताऊंगी कि औरत कैसे शर्मिंदा कर सकती है. कैसे हरा सकती है. कैसे तुम्हारे मर्द होने का अहंकार तोड़ सकती है.

खाना खा रहे दोस्तों के बीच मैं दही रखने गई, तभी दोनों बच्चे वहां आ गए खेलते हुए.

‘‘बाहर निकालो इन्हें कमरे से. तुम बच्चों का ध्यान नहीं रख सकतीं…’’ वे जोर से चिल्लाए.

मैं दोनों बच्चों को जबरदस्ती घसीटते हुए कमरे से बाहर ले गई.

इन के किसी दोस्त की आवाज कानों में आई, ‘‘खाना तो लजीज बना है.’’

इन्होंने मुंह बिचकाते हुए जवाब दिया, ‘‘खाना तो सुमन बनाती थी. पहले मेरी उसी से शादी होने वाली थी. सगाई तक हो गई थी उस से. कई बार मैं सुमन के घर भी गया. ऐसा स्वादिष्ठ खाना मुझे आज तक नसीब नहीं हुआ.’’

इन की सगाई टूटने की बात मुझे पता थी, लेकिन सुमन के खाने की तारीफ और मेरे खाने को सुमन के मुकाबले कमतर बताना मुझे अखर गया.

ये मर्द थे, तो मैं औरत थी. इन्हें अपने मर्द होने का घमंड था, तो मुझे क्यों न हो अपने औरत होने पर गर्व? अब इन्हें बताना जरूरी था कि औरत क्या होती है.

मर्द की सौ सुनार की और औरत की एक लुहार की कहावत को सच साबित करने का समय आ गया था. इन का यह जुमला कि मर्द बने रहने के लिए औरत को दुत्कारते रहना जरूरी है, तभी घर भी घर बना रहता है. तभी सब ठीक रहते हैं.

अम्मांजी ने इन से एक बार कहा भी था, ‘‘बेटा, मर्द को मर्द की तरह रहना चाहिए. औरत को हमेशा सिर पर चढ़ा कर नहीं रखना चाहिए. उसे डांटडपट, फटकार लगाना जरूरी है.’’

इन्होंने अम्मांजी की बातों को इस तरह स्वीकार किया कि मेरा पूरा वजूद ही बिखरने लगा.

दोनों बच्चे अकसर दादी के पास ही सोया करते थे. वे आज भी वहीं सो रहे थे. ये भी बिस्तर पर लेटेलेटे किताब पढ़ रहे थे.

आज मैं जरा जल्दी ही कमरे में पहुंच गई थी. मैं गाउन पहन कर सोती थी और कपड़े बाथरूम में ही बदलती थी. लेकिन आज मैं ने कमरे में जा कर साड़ी उतारी.

मैं ने तिरछी नजरों से इन की तरफ देखा. साड़ी बदलते ही इन का ध्यान मेरी तरफ गया. नहीं… नहीं, मेरे बदन की तरफ. पहले तो इन्होंने आदत के मुताबिक मुझे टोका, ‘‘यह जगह है क्या कपड़े बदलने की?’’

मैं ने भी कह दिया, ‘‘यहां पर आप के अलावा और कौन हैं? आप से कैसी परदादारी?’’

ये कुछ कहते, इस से पहले ही मैं ने अपने बाकी कपड़े भी उतार दिए. अब मैं छोटे कपड़ों में थी, टूपीस भी कह सकते हैं.

मैं ने पहनने के लिए गाउन उठाया. लेकिन इन के सब्र का पैमाना छलक चुका था. इन्होंने प्यार से मुझे अपनी ओर खींचते हुए कहा, ‘‘बहुत दिन हो गए तुम्हें प्यार किए हुए. आज इस रूप में देख कर सब्र नहीं होता.’’

इस के बाद कमरे में हम दोनों एक हो गए. अलग होते ही मैं मुंह बिचका कर एक तरफ मुंह फेर कर लेट गई.

मैं ने कहा, ‘‘किसी वैद्यहकीम को दिखाओ. इतने सारे तो इश्तिहार आते हैं, कोई गोली ले लिया करो.’’

ये दुम दबाते पालतू कुत्ते की तरह आ कर कूंकूं की आवाज में बोले, ‘‘क्यों, खुश नहीं हुईं क्या तुम? कुछ कमी रह गई क्या?’’

इन की हालत देख कर बड़ी मुश्किल से मैं ने अपनी हंसी रोकते हुए कहा, ‘‘नहीं, कोई ऐसी बात नहीं है. कभीकभी होता है ऐसा.’’

इन का उदास, हताश, हारा हुआ चेहरा देख कर मुझे अपनी जीत का एहसास हुआ. एक ही वार से इन के अंदर की मर्दानगी और बाहर का मर्द दोनों मुरदा पड़े हुए थे, जैसे दुनिया के सब से तुच्छ, कमजोर इनसान हों.

उस के बाद इन की टोकाटाकी, डांटफटकार तो बंद हुई ही, साथ ही साथ मेरी तरफ जब भी ये देखते, तो ऐसा लगता कि इन के देखने में डर और शर्मिंदा का भाव हो. अकसर चोरीछिपे जिस्मानी ताकत बढ़ाने के इश्तिहार पढ़ते भी नजर आते.

Best Hindi Story : नो बौल विद फ्री हिट – समीर और अनामिका की प्रेम कहानी

Best Hindi Story : कोलकाता से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर समीर ने कुछ  ही दिन पहले नौकरी जौइन की थी. वह वहां के गार्डन रीच वर्कशौप में ट्रेनिंग ले रहा था जो रक्षा मंत्रालय के अधीन भारत सरकार का एक उद्यम है. वहां जहाज निर्माण से ले कर उन के रखरखाव की भी सुविधा है.

कोलकाता के मटियाबुर्ज महल्ला में स्थित गार्डन रीच वर्कशौप देश का जहाज बनाने का प्रमुख कारखाना है. यह मुख्य शहर से दूर है. समीर झारखंड के धनबाद शहर का रहने वाला है, जिसे कोल कैपिटल औफ इंडिया भी कहा जाता है. यही उस की एक साल की ट्रेनिंग थी. कोलकाता में वह धर्मतल्ला में एक कमरे के फ्लैट में एक अन्य युवक के साथ शेयर कर के रहता था.

मटियाबुर्ज धर्मतल्ला से लगभग 13 किलोमीटर दूर है. इस का भी एक इतिहास है, अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने अंगरेजों के चंगुल से भाग कर यहीं आ कर शरण ली थी. मटियाबुर्ज बहुत गंदा इलाका था और वहां मुख्यता: अनस्किल्ड लेबर ही रहते थे. ज्यादातर मजदूर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आते हैं.

समीर वर्कशौप जाने के लिए फ्लैट से थोड़ी दूर पैदल चल कर धर्मतल्ला बस स्टौप से सुबह 8 बजे की बस पकड़ता था. 9 बजे तक उसे औफिस पहुंचना होता था. उस के फ्लैट से कुछ दूरी पर स्थित एक फ्लैट से एक युवती भी रोज उसी बस को पकड़ती थी.

शुरू में तो समीर को उस में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन लगातार एक ही स्टैंड से रोज बस पकड़ने, एक ही बस में आनेजाने से समीर का उस युवती के प्रति खासा आकर्षण हो गया था.

वैसे, दोनों में कभी कोई बातचीत नहीं हुई थी, पर कभीकभी नजरें चुरा कर समीर उसे देख लेता था. वह गेहुएं रंग के चेहरे वाली भोलीभाली युवती थी. कभीकभी भीड़ के कारण यदि उसे सीट नहीं मिलती तो वह उस युवती के बगल वाली लेडीज सीट पर जा बैठता था. तब वह युवती थोड़ा और सिमट कर खिड़की से बाहर देखने लगती थी. कभी वह उसे देखती तो समीर झट से अपनी आंखें दूसरी ओर फेर लेता.

समीर उस से बातचीत करना चाहता था पर खुद पहल न कर पाया. उस युवती ने भी उस से आगे बढ़ कर कभी हायहैलो तक न की.

एक दिन अचानक बसों की हड़ताल हो गई. सुबह तो समीर और उस युवती को बस मिल गई थी, पर लौटते वक्त बसें नहीं चल रही थीं. तो समीर अपने बौस की कार से घर आ रहा था.

कंपनी की गाड़ी थी, ड्राइवर चला रहा था. कार में पीछे की सीट पर समीर अपने बौस और कंपनी के एक और अफसर के साथ बैठा था तभी समीर ने खिद्दीरपुर बस स्टौप पर उस युवती को देखा. पहले तो उसे संकोच हुआ पर उस ने साहस कर बौस से उस युवती को लिफ्ट देने की विनती की.

बौस ने हंसते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, कोई चक्कर चल रहा है क्या?’’

समीर बोला, ‘‘नो सर, मैं तो उस का नाम भी नहीं जानता. बस, काफी दिनों से हम दोनों एक ही बस पकड़ते हैं. आज तो उसे बस मिलने से रही और टैक्सी की भी डिमांड इतनी ज्यादा है कि वह भी उसे शायद न मिले.’’

ड्राइवर ने कार रोक कर हौर्न बजाया पर युवती ने उन की ओर देखा ही नहीं. तभी समीर ने खिड़की से बाहर सिर निकाल कर आवाज दी. ‘‘हैलो मैडम, आप ही को बोल रहा हूं. आज कोई बस नहीं मिलने वाली और टैक्सी की भी किल्लत है. हमारी कार में बैठ जाएं, बौस हमें धर्मतल्ला स्टौप पर ड्रौप कर देंगे.’’

पहले तो वह संकोच कर रही थी, पर बाद में समीर के कहने पर वह आ कर ड्राइवर की बगल वाली सीट पर थैंक्स कह कर बैठ गई. पिछली सीट पर तो 3 लोग पहले से ही बैठे थे.

धर्मतल्ला स्टौप पर उतर कर समीर और उस युवती ने बौस को थैंक्स कहा. समीर का भी थैंक्स करते हुए वह अपने घर की ओर चल दी.

समीर सोच रहा था कि आज वह थैंक्स के अलावा और कुछ भी बात करेगी, पर ऐसा नहीं हुआ. समीर मन ही मन चिढ़ गया और उस ने भी आगे कुछ नहीं कहा. दोनों अपनेअपने घर की ओर चल दिए.

लेकिन अगले दिन बस स्टौप पर समीर ने उस युवती से गुडमौर्निंग कहा तो उस ने होंठों ही होंठों में कुछ कहा और मुसकरा कर सिर झुका कर बस का इंतजार करने लगी. इसी तरह कुछ दिनों तक समीर गुडमौर्निंग कहता और वह होंठ फड़फड़ा कर धीरे से गुडमौर्निंग का जवाब दे देती.

एक बार 2 दिनों से वह युवती बस स्टौप पर नहीं मिली तो समीर का मन बेताब हो गया.

तीसरे दिन जब वह मिली तो समीर ने अपने पुराने अंदाज में गुडमौर्निंग कहा. युवती आज खुल कर मुसकराई और उस ने धीरे से गुडमौर्निंग कहा. बस आई और दोनों बस में चढ़े, लेकिन युवती से कोई बात नहीं हो पाई.

अगले दिन जब समीर को युवती की बगल वाली सीट पर बैठने का मौका मिला तो वह उस से पूछ बैठा, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है? आप इधर बीच में 2 दिन नहीं आई थीं.’’

‘‘ऐसे ही, घर में कुछ काम था,’’ युवती ने जवाब दिया.

समीर बोला, ‘‘अच्छा, अपना नाम तो बताएं. मेरा नाम समीर है.’’

फिर दोनों हंस पड़े.

दरअसल, समीर की शर्ट की जेब पर उस का आईडी कार्ड टंगा था, जिसे युवती ने पहले ही देख लिया था.

अगले दिन बस स्टौप पर समीर ने फिर उस का नाम पूछा तो वह बोली, ‘‘समझ लें, जिस का कोई नाम नहीं होता उसे क्या कहते हैं…’’

‘‘उसे तो अनामिका कहते हैं,’’ समीर बोला. इस बीच कोई लेडी पैसेंजर आ गई और समीर को सीट छोड़नी पड़ी. उस ने खड़ा होते हुए कहा, ‘‘तब तो तुम्हारा नाम अनामिका होना चाहिए.’’

अब दोनों में थोड़ीबहुत बातचीत होने लगी थी और कुछ मेलजोल भी बढ़ गया था. कुछ हफ्ते बाद एक दिन औफिस से समीर को जल्दी छुट्टी मिली तो वह बस से लौट रहा था कि रास्ते से अनामिका भी उसी बस में चढ़ी.

दोपहर में बस में उतनी भीड़ नहीं थी तो वह भी समीर के बगल वाली सीट पर बैठ गई और पूछा, ‘‘आज का दिन वर्कशौप में कैसा रहा? इस समय तो कभी तुम्हें लौटते देखा नहीं है.’’

समीर बोला, ‘‘आज तो बौस ने मुझे सरप्राइज दिया है. उन्होंने कहा कि बाकी 2 महीने की ट्रेनिंग रांची के मैरिन इंजन प्लांट में लेनी है. कंपनी की एक फैक्टरी वहां भी है और टे्रनिंग के बाद मेरी पोस्टिंग भी उसी फैक्टरी में होगी. 3-4 दिनों में जाना होगा.’’

अनामिका बोली, ‘‘चलो, अच्छी बात है. तुम्हारी ट्रेनिंग पूरी होने जा रही है. यहां मेरे औफिस में भी मेरे ट्रांसफर की बात चल रही है.’’

अगले दिन समीर को वर्कशौप नहीं जाना था, फिर भी वह रोज की तरह बस स्टौप पर अनामिका से मिलने पहुंच गया. पर आज वह नहीं आई थी. दूसरे दिन वह समीर को उसी स्टौप पर मिली तो उस ने पूछा, ‘‘क्या बात है, मैं कल भी यहां आया था पर तुम नहीं मिलीं?’’

अनामिका बोली, ‘‘कल लड़के वाले मुझे देखने आए थे, इसलिए औफिस नहीं जा सकी थी.’’ समीर ने निराश होते हुए बस ‘ओह’ कहा और चुप हो गया.

अनामिका ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

समीर के ‘कुछ नहीं’ कहते ही बस आ गई और अनामिका चढ़ते हुए बोली, ‘‘शाम को 4 बजे वाली बस से लौटूंगी.’’

हालांकि अनामिका ने उसे शाम को स्टौप पर मिलने को नहीं कहा था, पर समीर वहां मौजूद था. शायद अनामिका की भी यही इच्छा रही होगी. उस के बस से उतरते ही समीर बोला, ‘‘चलो, आज बगल वाले कौफी हाउस में बैठ कर कौफी पीते हैं.’’

अनामिका सहर्ष तैयार हो गई. दोनों ने साथ बैठ कर कौफी पी. वहां समीर ने पूछा, ‘‘कल तुम्हें लड़के वाले देखने आए थे न? तो मेरा विकेट तो डाउन हो गया न. मैं क्लीन बोल्ड हो गया.’’

अनामिका बोली, ‘‘नहीं. वह नो बौल थी. तुम आउट होने से बच गए.’’

‘‘क्या मतलब?’’ कहते हुए समीर के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई.

‘‘उन्होंने मुझे रिजैक्ट कर दिया,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर ऐसा क्यों किया. जो भी हो, मेरे लिए तो अच्छा ही है. मुझे नो बौल पर एक और चांस तो मिला.’’

अनामिका बोली, ‘‘एक और चांस नहीं, फ्री हिट का मौका भी मिला है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ समीर ने पूछा तो वह बैग से एक लिफाफा निकाल कर समीर की ओर बढ़ाती हुई बोली, ‘‘यह देखो, आज मुझे भी ट्रांसफर और्डर मिला है. मेरी पोस्टिंग भी रांची में हुई है, हुआ न नो बौल विद फ्री हिट.’’ और दोनों हंसते हुए कौफी हाउस से निकल पड़े.

Hindi Kahani : ये कैसी बेबसी – लोकल ट्रेन में सफर कर रही औरते अचानक क्यों चिल्लाने लगी

Hindi Kahani : मुंबई की लोकल ट्रेन जैसे ही प्लेटफौर्म पर रुकी तो फर्स्ट क्लास के डब्बे में फर्स्ट क्लास वाले आदमी चढ़ गए. फर्स्ट क्लास वाली औरतें भी अपने डब्बे में चढ़ गईं. तभी एक नंगधड़ंग आदमी फर्स्ट क्लास लेडीज डब्बे में चढ़ गया. वह खुश दिख रहा था. उस के दांत और आंखें चमक रही थीं. शेष पूरा बदन काला था.

वह जैसे ही चढ़ा, औरतों ने चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘यह फर्स्ट क्लास का डब्बा है. उतरो नीचे,’’ मगर उस को तो जैसे कुछ फर्क ही नहीं पड़ रहा था. वह अब भी हंस रहा था. औरतों की आवाजें सुन कर फर्स्ट क्लास वाले पुरुष भी चिल्लाने लगे, ‘‘अरे, क्या कर रहा है? देखता नहीं, वह लेडीज डब्बा है?’’ मगर वह तो हंसे ही जा रहा था. लोग चिल्ला रहे थे. औरतें चिल्ला रही थीं. मगर उसे कुछ फर्क नहीं पड़ रहा था. और वह उतरने को तैयार ही नहीं था.

अब तो ट्रेन भी चल पड़ी थी. मुंबई की लोकल ट्रेन कुछ सैकंड्स के बाद किसी का इंतजार नहीं करती. चाहे कोई नंगधड़ंग आदमी फर्स्ट क्लास लेडीज डब्बे में ही क्यों न चढ़ जाए. लोग चिल्लाए जा रहे थे, ‘‘उतर, उतर जा…’’

अब तो उतर भी नहीं सकता है. एक बार को तो मुड़ा कि उतर जाए मगर ट्रेन चल दी थी. तभी एक फर्स्ट क्लास वाले भाई साहब को कुछ ज्यादा ही जोश आ गया और वे चेन खींच कर ट्रेन को रोक देना चाहते थे और उस नंगधड़ंग आदमी को लेडीज डब्बे से उतार देना चाहते थे, जिसे सब लोग थोड़ी ही देर में समझ गए कि वह पागल है.

उसे किसी की बात का कोई असर नहीं हो रहा था. लोग चिल्लाए जा रहे थे. औरतें चिल्लाए जा रही थीं और वह हंस रहा था. तभी किसी ने कहा, ‘‘अब तो ट्रेन चल दी. अब उतरेगा भी तो कैसे?’’ और यह सुन कर जो हाथ चेन खींचने ही वाले थे, पता नहीं क्या सोच कर रुक गए.

अब सब की सांसें तेज हो गई थीं. वह पागल लेडीज डब्बे में सफर कर रहा था. वह भी फर्स्ट क्लास में, और बिना टिकट के. उस के पास तो पहनने को कपड़े भी नहीं थे और कपड़े नहीं थे तो जेब भी नहीं थे और जेब ही नहीं, टिकट का वह क्या करता? उस का काला शरीर सब को डराए जा रहा था.

फिर वह थोड़ा सा लेडीज की ओर बढ़ा, फिर औरतों ने और चिल्लाना शुरू कर दिया. फर्स्ट क्लास में सफर कर रहे लोग फिर से खड़े हो गए. वह तो लेडीज और जैंट्स के बीच में एक दीवार है वरना इतने में तो जाने कितने लोग लेडीज डब्बे में पहुंच चुके होते अब तक. तभी एक भाई साहब बोले, ‘‘पता नहीं कहां से आया है?’’ यह सवाल वाकई सोचने लायक है. कहां से आया होगा वह? उमर होगी करीब 25 साल. आंखें अंदर धंसी हुईं. गाल पिचके हुए. बदन पर एक भी कपड़ा नहीं. कहां से आया होगा वह?

अब जब ट्रेन चल दी और उस के उतरने का कोई सवाल नहीं है, तब लोगों ने कहना शुरू कर दिया, ‘‘अगले स्टेशन पर उतर जाना,’’ वह यह कहने वालों की ओर देख कर ऐसे हंस रहा था जैसे कहने वाला कोई बंदर हो और वह एक बच्चे की तरह कोई बंदर देख कर खुश हो रहा हो.

हंसते हुए उस के दांत दिखाई देते थे. उस के दांत एकदम साफ थे, बल्कि चमक रहे थे. इस से पता चलता है कि वह कसरत से अपने दांतों को साफ करता रहा होगा या बहुत दिनों से उस ने कुछ खाया नहीं होगा. उस की हालत कुछ ऐसी थी जैसे उस का सब कुछ जल्दी ही में छिन गया हो, वह कोई बड़ा सदमा बरदाश्त नहीं कर पाया  और पागल हो गया.

उस ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए तो औरतें और भी डर गईं, पता नहीं क्या करेगा? मगर उस ने ट्रेन में खड़े होने वाले लोगों के लिए बने हैंडिल को पकड़ लिया. ट्रेन चल रही थी तो वह भी हिल रहा था. गिर न जाए, इसलिए उस ने हैंडिल पकड़ लिया.

अब सब फर्स्ट क्लास वाले आदमी और औरतें बेसब्री से इंतजार कर रहे थे कि अगला स्टेशन आए और यह बला उतरे और तब सब की जान में जान आएगी.

बारिश भी तेज हो रही थी. पूरी मुंबई में पानी भरा हुआ था. अंधेरा भी गहरा चुका था. वह पागल अगले स्टेशन पर भी उतर कर जाएगा कहां? उस के पास जब कपड़े नहीं हैं, तो घर भी नहीं होगा, जाहिर सी बात है. और ऊपर से ये फर्स्ट क्लास वाले लोग जल्दी मचाए हुए हैं कि उतर…उतर…ये लेडीज डब्बा है…फर्स्ट क्लास है…

काला बदन. बदन पर कपडे़ नहीं. नंगधड़ंग. दिमागी तौर पर लाचार. औरतें उसे ऐसे घूर रही थीं कि उतर जा…नहीं तो चलती ट्रेन से बाहर फेंक देंगे. और वह है कि हंसे जा रहा था. पता नहीं, किस पर हंस रहा था वह?

बहरहाल, सब की राहत के लिए अगला स्टेशन करीब आ गया और एक बार फिर सब की आवाजें गूंजने लगीं, ‘‘उतर जा, स्टेशन आ गया, अगले डब्बे में चला जा.’’

वह हंसते हुए इस तरह मुंडी हिलाता था जैसे बच्चों के साथ कोई खेल खेल रहा हो और उस से मुंडी हिलाने के लिए कहा गया हो.

अगला स्टेशन आ गया और वह पागल हंसतेहंसते उतर ही गया. किस पर हंस रहा था वह? उस का कौन सा क्लास था…? उस के उतरते ही पूरे डब्बे में सन्नाटा छा गया जैसे सब लोग कुछ सोचने के लिए मजबूर हो गए हों, माना वह पागल था लेकिन वे सब…वे तो समझदार लोग थे…क्या यही थी उन की समझदारी?

Hindi Story : एक और बलात्कारी – रूपा के जिस्म को भेदने लगीं सुमेर सिंह की निगाहें

Hindi Story : रूपा पगडंडी के रास्ते से हो कर अपने घर की ओर लौट रही थी. उस के सिर पर घास का एक बड़ा गट्ठर भी था. उस के पैरों की पायल की ‘छनछन’ दूर खड़े बिरजू के कानों में गूंजी, तो वह पेड़ की छाया छोड़ उस पगडंडी को देखने लगा.

रूपा को पास आता देख बिरजू के दिल की धड़कनें तेज हो गईं और उस का दिल उस से मिलने को मचलने लगा. जब रूपा उस के पास आई, तो वह चट्टान की तरह उस के रास्ते में आ कर खड़ा हो गया.

‘‘बिरजू, हट मेरे रास्ते से. गाय को चारा देना है,’’ रूपा ने बिरजू को रास्ते से हटाते हुए कहा. ‘‘गाय को तो तू रोज चारा डालती है, पर मुझे तो तू घास तक नहीं डालती. तेरे बापू किसी ऐरेगैरे से शादी कर देंगे, इस से अच्छा है कि तू मुझ से शादी कर ले. रानी बना कर रखूंगा तुझे. तू सारा दिन काम करती रहती है, मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘गांव में और भी कई लड़कियां हैं, तू उन से अपनी शादी की बात क्यों नहीं करता?’’ ‘‘तू इतना भी नहीं समझती, मैं तो तुझ से प्यार करता हूं. फिर और किसी से अपनी शादी की बात क्यों करूं?’’

‘‘ये प्यारव्यार की बातें छोड़ो और मेरे रास्ते से हट जाओ, वरना घास का गट्ठर तुम्हारे ऊपर फेंक दूंगी,’’ इतना सुनते ही बिरजू एक तरफ हो लिया और रूपा अपने रास्ते बढ़ चली. शाम को जब सुमेर सिंह की हवेली से रामदीन अपने घर लौट रहा था, तो वह अपने होश में नहीं था. गांव वालों ने रूपा को बताया कि उस का बापू नहर के पास शराब के नशे में चूर पड़ा है.

‘‘इस ने तो मेरा जीना हराम कर दिया है. मैं अभी इसे ठीक करती हूं,’’ रूपा की मां बड़बड़ाते हुए गई और थोड़ी देर में रामदीन को घर ला कर टूटीफूटी चारपाई पर पटक दिया और पास में ही चटाई बिछा कर सो गई. सुबह होते ही रूपा की मां रामदीन पर भड़क उठी, ‘‘रोज शराब के नशे में चूर रहते हो. सारा दिन सुमेर सिंह की मजदूरी करते हो और शाम होते ही शराब में डूब जाते हो. आखिर यह सब कब तक चलता रहेगा? रूपा भी सयानी होती जा रही है, उस की भी कोई चिंता है कि नहीं?’’

रामदीन चुपचाप उस की बातें सुनता रहा, फिर मुंह फेर कर लेट गया. रामदीन कई महीनों से सुमेर सिंह के पास मजदूरी का काम करता था. खेतों की रखवाली करना और बागबगीचों में पानी देना उस का रोज का काम था.

दरअसल, कुछ महीने पहले रामदीन का छोटा बेटा निमोनिया का शिकार हो गया था. पूरा शरीर पीला पड़ चुका था. गरीबी और तंगहाली के चलते वह उस का सही इलाज नहीं करा पा रहा था. एक दिन उस के छोटे बेटे को दौरा पड़ा, तो रामदीन फौरन उसे अस्पताल ले गया. डाक्टर ने उस से कहा कि बच्चे के शरीर में खून व पानी की कमी हो गई है. इस का तुरंत इलाज करना होगा. इस में 10 हजार रुपए तक का खर्चा आ सकता है. किसी तरह उसे अस्पताल में भरती करा कर रामदीन पैसे जुटाने में लग गया. पासपड़ोस से मदद मांगी, पर किसी ने उस की मदद नहीं की.

आखिरकार वह सुमेर सिंह के पास पहुंचा और उस से मदद मांगी, ‘‘हुजूर, मेरा छोटा बेटा बहुत बीमार है. उसे निमोनिया हो गया था. मुझे अभी 10 हजार रुपए की जरूरत है. मैं मजदूरी कर के आप की पाईपाई चुका दूंगा. बस, आप मुझे अभी रुपए दे दीजिए.’’ ‘‘मैं तुम्हें अभी रुपए दिए दे देता हूं, लेकिन अगर समय पर रुपए नहीं लौटा सके, तो मजदूरी की एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा. बोलो, मंजूर है?’’

‘‘हां हुजूर, मुझे सब मंजूर है,’’ अपने बच्चे की जान की खातिर उस ने सबकुछ कबूल कर लिया. पहले तो रामदीन कभीकभार ही अपनी थकावट दूर करने के लिए शराब पीता था, लेकिन सुमेर सिंह उसे रोज शराब के अड्डे पर ले जाता था और उसे मुफ्त में शराब पिलाता था. लेकिन अब तो शराब पीना एक आदत सी बन गई थी. शराब तो उसे मुफ्त में मिल जाती थी, लेकिन उस की मेहनत के पैसे सुमेर सिंह हजम कर जाता था. इस से उस के घर में गरीबी और तंगहाली और भी बढ़ती गई.

रामदीन शराब के नशे में यह भी भूल जाता था कि उस के ऊपर कितनी जिम्मेदारियां हैं. दिन पर दिन उस पर कर्ज भी बढ़ता जा रहा था. इस तरह कई महीने बीत गए. जब रामदीन ज्यादा नशे में होता, तो रूपा ही सुमेर सिंह का काम निबटा देती. एक सुबह रामदीन सुमेर सिंह के पास पहुंचा, तो सुमेर सिंह ने हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कहा, ‘‘रामदीन, आज तुम हमारे पास बैठो. हमें तुम से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

‘‘हुजूर, आज कुछ खास काम है क्या?’’ रामदीन कहते हुए उस के पास बैठ गए. ‘‘देखो रामदीन, आज मैं तुम से घुमाफिरा कर बात नहीं करूंगा. तुम ने मुझ से जो कर्जा लिया है, वह तुम मुझे कब तक लौटा रहे हो? दिन पर दिन ब्याज भी तो बढ़ता जा रहा है. कुलमिला कर अब तक 15 हजार रुपए से भी ज्यादा हो गए हैं.’’

‘‘मेरी माली हालत तो बदतर है. आप की ही गुलामी करता हूं हुजूर, आप ही बताइए कि मैं क्या करूं?’’ सुमेर सिंह हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कुछ सोचने लगा. फिर बोला, ‘‘देख रामदीन, तू जितनी मेरी मजदूरी करता है, उस से कहीं ज्यादा शराब पी जाता है. फिर बीचबीच में तुझे राशनपानी देता ही रहता हूं. इस तरह तो तुम जिंदगीभर मेरा कर्जा उतार नहीं पाओगे, इसलिए मैं ने फैसला किया है कि अब अपनी जोरू को भी काम पर भेजना शुरू कर दे.’’

‘‘लेकिन हुजूर, मेरी जोरू यहां आ कर करेगी क्या?’’ रामदीन ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘मुझे एक नौकरानी की जरूरत है. सुबहशाम यहां झाड़ूपोंछा करेगी. घर के कपड़ेलत्ते साफ करेगी. उस के महीने के हजार रुपए दूंगा. उस में से 5 सौ रुपए काट कर हर महीने तेरा कर्जा वसूल करूंगा. ‘‘अगर तुम यह भी न कर सके, तो तुम मुझे जानते ही हो कि मैं जोरू और जमीन सबकुछ अपने कब्जे में ले लूंगा.’’

‘‘लेकिन हुजूर, मेरी जोरू पेट से है और उस की कमर में भी हमेशा दर्द रहता है.’’ ‘‘बच्चे पैदा करना नहीं भूलते, पर मेरे पैसे देना जरूर भूल जाते हो. ठीक है, जोरू न सही, तू अपनी बड़ी बेटी रूपा को ही भेज देना.

‘‘रूपा सुबहशाम यहां झाड़ूपोंछा करेगी और दोपहर को हमारे खेतों से जानवरों के लिए चारा लाएगी. घर जा कर उसे सारे काम समझा देना. फिर दोबारा तुझे ऐसा मौका नहीं दूंगा.’’ अब रामदीन को ऐसा लगने लगा था, जैसे वह उस के भंवर में धंसता चला जा रहा है. सुमेर सिंह की शर्त न मानने के अलावा उस के पास कोई चारा भी नहीं बचा था.

शाम को रामदीन अपने घर लौटा, तो उस ने सुमेर सिंह की सारी बातें अपने बीवीबच्चों को सुनाईं. यह सुन कर बीवी भड़क उठी, ‘‘रूपा सुमेर सिंह की हवेली पर बिलकुल नहीं जाएगी. आप तो जानते ही हैं. वह पहले भी कई औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर चुका है. मैं खुद सुमेर सिंह की हवेली पर जाऊंगी.’’

‘‘नहीं मां, तुम ऐसी हालत में कहीं नहीं जाओगी. जिंदगीभर की गुलामी से अच्छा है कि कुछ महीने उस की गुलामी कर के सारे कर्ज उतार दूं,’’ रूपा ने अपनी बेचैनी दिखाई. दूसरे दिन से ही रूपा ने सुमेर सिंह की हवेली पर काम करना शुरू कर दिया. वह सुबहशाम उस की हवेली पर झाड़ूपोंछा करती और दोपहर में

जानवरों के लिए चारा लाने चली जाती. अब सुमेर सिंह की तिरछी निगाहें हमेशा रूपा पर ही होती थीं. उस की मदहोश कर देनी वाली जवानी सुमेर सिंह के सोए हुए शैतान को जगा रही थी. रूपा के सामने तो उस की अपनी बीवी उसे फीकी लगने लगी थी.

सुमेर सिंह की हवेली पर सारा दिन लोगों का जमावड़ा लगा रहता था, लेकिन शाम को उस की निगाहें रूपा पर ही टिकी होती थीं. रूपा के जिस्म में गजब की फुरती थी. शाम को जल्दीजल्दी सारे काम निबटा कर अपने घर जाने के लिए तैयार रहती थी. लेकिन सुमेर सिंह देर शाम तक कुछ और छोटेमोटे कामों में उसे हमेशा उलझाए रखता था.

एक दोपहर जब रूपा पगडंडी के रास्ते अपने गांव की ओर बढ़ रही थी, तभी उस के सामने बिरजू आ धमका. उसे देखते ही रूपा ने अपना मुंह फेर लिया. बिरजू उस से कहने लगा, ‘‘मैं जब भी तेरे सामने आता हूं, तू अपना मुंह क्यों फेर लेती है?’’

‘‘तो मैं क्या करूं? तुम्हें सीने से लगा लूं? मैं तुम जैसे आवारागर्दों के मुंह नहीं लगना चाहती,’’ रूपा ने दोटूक जवाब दिया.

‘‘देख रूपा, तू भले ही मुझ से नफरत कर ले, लेकिन मैं तो तुझ को प्यार करता ही रहूंगा. आजकल तो मैं ने सुना है, तू ने सुमेर सिंह की हवेली पर काम करना शुरू कर दिया है. शायद तुझे सुमेर सिंह की हैवानियत के बारे में पता नहीं. वह बिलकुल अजगर की तरह है. वह कब शिकारी को अपने चंगुल में फंसा कर निगल जाए, यह किसी को पता नहीं. ‘‘मुझे तो अब यह भी डर सताने लगा है कि कहीं वह तुम्हें नौकरानी से रखैल न बना ले, इसलिए अभी भी कहता हूं, तू मुझ से शादी कर ले.’’

यह सुन कर रूपा का मन हुआ कि वह बिरजू को 2-4 झापड़ जड़ दे, पर फिर लगा कि कहीं न कहीं इस की बातों में सचाई भी हो सकती है. रूपा पहले भी कई लोगों से सुमेर सिंह की हैवानियत के बारे में सुन चुकी थी. इस के बावजूद वह सुमेर सिंह की गुलामी के अलावा कर भी क्या सकती थी. इधर सुमेर सिंह रूपा की जवानी का रसपान करने के लिए बेचैन हो रहा था, लेकिन रूपा उस के झांसे में आसानी से आने वाली नहीं थी.

सुमेर सिंह के लिए रूपा कोई बड़ी मछली नहीं थी, जिस के लिए उसे जाल बुनना पड़े. एक दिन सुमेर सिंह ने रूपा को अपने पास बुलाया और कहा, ‘‘देखो रूपा, तुम कई दिनों से मेरे यहां काम कर रही हो, लेकिन महीने के 5 सौ रुपए से मेरा कर्जा इतनी जल्दी उतरने वाला नहीं है, जितना तुम सोच रही हो. इस में तो कई साल लग सकते हैं.

‘‘मेरे पास एक सुझाव है. तुम अगर चाहो, तो कुछ ही दिनों में मेरा सारा कर्जा उतार सकती हो. तेरी उम्र अभी पढ़नेलिखने और कुछ करने की है, मेरी गुलामी करने की नहीं,’’ सुमेर सिंह के शब्दों में जैसे एक मीठा जहर था. ‘‘मैं आप की बात समझी नहीं?’’ रूपा ने सवालिया नजरों से उसे देखा.

सुमेर सिंह की निगाहें रूपा के जिस्म को भेदने लगीं. फिर वह कुछ सोच कर बोला, ‘‘मैं तुम से घुमाफिरा कर बात नहीं करूंगा. तुम्हें आज ही एक सौदा करना होगा. अगर तुम्हें मेरा सौदा मंजूर होगा, तो मैं तुम्हारा सारा कर्जा माफ कर दूंगा और इतना ही नहीं, तेरी शादी तक का खर्चा मैं ही दूंगा.’’ रूपा बोली, ‘‘मुझे क्या सौदा करना होगा?’’

‘‘बस, तू कुछ दिनों तक अपनी जवानी का रसपान मुझे करा दे. अगर तुम ने मेरी इच्छा पूरी की, तो मैं भी अपना वादा जरूर निभाऊंगा,’’ सुमेर सिंह के तीखे शब्दों ने जैसे रूपा के जिस्म में आग लगा दी थी. ‘‘आप को मेरे साथ ऐसी गंदी बातें करते हुए शर्म नहीं आई,’’ रूपा गुस्से में आते हुए बोली.

‘‘शर्म की बातें छोड़ और मेरा कहा मान ले. तू क्या समझती है, तेरा बापू तेरी शादी धूमधाम से कर पाएगा? कतई नहीं, क्योंकि तेरी शादी के लिए वह मुझ से ही उधार लेगा. ‘‘इस बार तो मैं तेरे पूरे परिवार को गुलाम बनाऊंगा. अगर ब्याह के बाद तू मदद के लिए दोबारा मेरे पास आई भी तो मैं तुझे रखैल तक नहीं बनाऊंगा. अच्छी तरह सोच ले. मैं तुझे इस बारे में सोचने के लिए कुछ दिन की मुहलत भी देता हूं. अगर इस के बावजूद भी तू ने मेरी बात नहीं मानी, तो मुझे दूसरा रास्ता भी अपनाना आता है.’’

सुमेर सिंह की कही गई हर बात रूपा के जिस्म में कांटों की तरह चुभती चली गई. सुमेर सिंह की नीयत का आभास तो उसे पहले से ही था, लेकिन वह इतना बदमाश भी हो सकता है, यह उसे बिलकुल नहीं पता था.

रूपा को अब बिरजू की बातें याद आने लगीं. अब उस के मन में बिरजू के लिए कोई शिकायत नहीं थी. रूपा ने यह बात किसी को बताना ठीक नहीं समझा. रात को तो वह बिलकुल सो नहीं पाई. सारी रात अपने वजूद के बारे में ही वह सोचती रही.

रूपा को सुमेर सिंह की बातों पर तनिक भी भरोसा नहीं था. उसे इस बात की ज्यादा चिंता होने लगी थी कि अगर अपना तन उसे सौंप भी दिया, तो क्या वह भी अपना वादा पूरा करेगा? अगर ऐसा नहीं हुआ, तो अपना सबकुछ गंवा कर भी बदनामी के अलावा उसे कुछ नहीं मिलेगा. इधर सुमेर सिंह भी रूपा की जवानी का रसपान करने के लिए उतावला हो रहा था. उसे तो बस रूपा की हां का इंतजार था. धीरेधीरे वक्त गुजर रहा था. लेकिन रूपा ने उसे अब तक कोई संकेत नहीं दिया था. सुमेर सिंह ने मन ही मन कुछ और सोच लिया था.

यह सोच कर रूपा की भी बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उसे खुद को सुमेर सिंह से बचा पाना मुश्किल लग रहा था. एक दोपहर जब रूपा सुमेर सिंह के खेतों में जानवरों के लिए चारा लाने गई, तो सब से पहले उस की निगाहें बिरजू को तलाशने लगीं, पर बिरजू का कोई अतापता नहीं था. फिर वह अपने काम में लग गई. तभी किसी ने उस के मुंह पर पीछे से हाथ रख दिया.

रूपा को लगा शायद बिरजू होगा, लेकिन जब वह पीछे की ओर मुड़ी, तो दंग रह गई. वह कोई और नहीं, बल्कि सुमेर सिंह था. उस की आंखों में वासना की भूख नजर आ रही थी. तभी सुमेर सिंह ने रूपा को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ते हुए कहा, ‘‘हुं, आज तुझे मुझ से कोई बचाने वाला नहीं है. अब तेरा इंतजार भी करना बेकार है.’’

‘‘मैं तो बस आज रात आप के पास आने ही वाली थी. अभी आप मुझे छोड़ दीजिए, वरना मैं शोर मचाऊंगी,’’ रूपा ने उस के चंगुल से छूटने की नाकाम कोशिश की. पर सुमेर सिंह के हौसले बुलंद थे. उस ने रूपा की एक न सुनी और घास की झाड़ी में उसे पूरी तरह से दबोच लिया.

रूपा ने उस से छूटने की भरपूर कोशिश की, पर रूपा की नाजुक कलाइयां उस के सामने कुछ खास कमाल न कर सकीं. अब सुमेर सिंह का भारीभरकम बदन रूपा के जिस्म पर लोट रहा था, फिर धीरेधीरे उस ने रूपा के कपड़े फाड़ने शुरू किए.

जब रूपा ने शोर मचाने की कोशिश की, तो उस ने उस का मुंह उसी के दुपट्टे से बांध दिया, ताकि वह शोर भी न मचा सके. अब तो रूपा पूरी तरह से सुमेर सिंह के शिकंजे में थी. वह आदमखोर की तरह उस पर झपट पड़ा. इस से पहले वह रूपा को अपनी हवस का शिकार बना पाता, तभी किसी ने उस के सिर पर किसी मजबूत डंडे से ताबड़तोड़ वार करना शुरू कर दिया. कुछ ही देर में वह ढेर हो गया.

रूपा ने जब गौर से देखा, तो वह कोई और नहीं, बल्कि बिरजू था. तभी वह उठ खड़ी हुई और बिरजू से लिपट गई. उस की आंखों में एक जीत नजर आ रही थी. बिरजू ने उसे हौसला दिया और कहा, ‘‘तुम्हें अब डरने की कोई जरूरत नहीं है. मैं इसी तरह तेरी हिफाजत जिंदगीभर करता रहूंगा.’’

रूपा ने बिरजू का हाथ थाम लिया और अपने गांव की ओर चल दी.

Best Hindi Story : मैं विधवा हूं – समाज विधवा स्त्री के बारे में क्या सोचता है

Best Hindi Story : हां, मैं विधवा हूं 21वीं सदी की. मेरी तरह कई विधवाएं होंगी जो अभीअभी हुई हों या जिन्हें 20-30 साल हो गए हों. कुछ को घर वालों ने घर से निकाल कर वृद्धाश्रम पहुंचा दिया, कुछ स्वाभिमान की मारी स्वयं पहुंच गईं तो कुछ को काशी यानी बनारस, वृंदावन में छोड़ दिया गया. वहीं, कुछ सुहृदय बच्चों ने उन्हें यह महसूस ही नहीं होने दिया कि वे त्याज्य हैं. उन्हें पहले की तरह ही गले लगाए रखा. उन के सम्मान में कोई कमी नहीं आई. उन का जीवन धन्य हो गया. और जो निराश्रित हो गईं वे नारकीय जीवन जीने को विवश हो गईं.

आज का समाज पढ़ालिखा, समझदार तो है लेकिन उस की सोच पुरानी ही है. विधवा स्त्री को कोई अधिकार नहीं देता. समाज इतनी घटिया सोच रखता है, इस का मुझे अंदाजा भी न था. मैं तो अपने हिसाब से अपना जीवन जी रही थी. पति की मृत्यु को अभी 3 महीने ही हुए हैं. इन 3 महीनों में मैं ने स्वयं को संभाला. उसी हिम्मत और जोश के साथ फिर उठ खड़ी हुई क्योंकि मैं अपने घर में अकेली हूं और जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए मुझे घर से बाहर निकलना ही था.

जो काम अभी तक पति के नाम से हो रहे थे वहां उन का नाम हटवा कर अपना नाम कराना था. कभी अकाउंट खोलने के लिए बैंक भागती, कभी एफिडेविट बनवाने के लिए कचहरी. कभी गैस कनैक्शन पर नाम बदलवाने, राशन कार्ड पर भी अपना नाम अंकित कराने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाती. मुझे जल्दी न थी, लेकिन जब बिना नाम बदलवाए राशन और गैस मिलनी बंद हो गई तो दौड़ लगानी ही पड़ी. सभी जानते हैं कि एक बार जाने से काम नहीं होता. चक्कर लगाने के साथसाथ ‘बेचारी’ का ठप्पा और लग जाता है. किसी रिश्तेदार या परिचित ने यह नहीं कहा कि आप घर बैठो, यह काम हम करा देंगे. वैसे भी मैं शुरू से स्वाभिमानी रही हूं और अपना काम खुद करना चाहती हूं. मेरा उसूल है जब तक विशेष आवश्यकता न पड़े, किसी को तकलीफ मत दो.

तभी मेरे जेहन में एक सवाल उभरा. गैस कनैक्शन और राशनकार्ड दोनों ही सरकारी हैं. फिर सरकार दोनों नंबर पतिपत्नी दोनों के नाम से क्यों नहीं देती. यदि गैस बुक और राशनकार्ड में आइदर और ‘सरवाइवर’ कौलम के साथ पत्नी का नाम भी दर्ज हो तो पति की अचानक मृत्यु पर पत्नी को दफ्तरदफ्तर खाक छाननी नहीं पड़ेगी.

खैर, पति की बीमारी के दौरान जब मैं उन्हें ले कर शहरशहर डाक्टरों को दिखाती घूम रही थी, रातदिन उन की सेवाटहल में लगी रहती थी, लोग मेरे साहस की प्रशंसा कर मेरा मनोबल बढ़ाते थे. मुझे लगता, मेरे अपने मेरे करीब हैं. समयसमय पर हालचाल पूछने आते रहते या मोबाइल से संपर्क बनाए रखते. आश्वासन भी देते कि पैसे की कमी हो तो बताना. कोई परेशानी हो तो कहना, हम आधी रात को भी तैयार हैं. मुझे अपने रिश्तेदारों पर गर्व होता क्योंकि वे सब मेरे दुख में मेरे साथ खड़े थे.

अफसोस यह कि पति की मृत्यु के बाद पूरा ही परिदृश्य बदल गया. पहले तो लोगों ने यह जानने की कोशिश की कि वे क्याक्या छोड़ गए हैं. कुछ ने फुसफुसा कर चेताया कि संभलसंभल कर चलना. यह कांटों भरी डगर है. सबकुछ अपने बेटे को मत सौंप देना वरना तुम्हारी दुर्गति हो जाएगी. आजकल वृद्धावस्था में पुत्रों का सहारा नहीं मिलता. मैं, मौन सब की सुनती रहती. मुझे क्या फैसला लेना है, यह मेरा निजी मामला है. मुझे कोई जल्दी नहीं थी. मैं अपनी सोच को दुरुस्त  करना चाहती थी.

सब ने सोचा, पति के जाने के बाद मैं खाली हो गई हूं. मेरे पास कोई काम नहीं है. क्योंकि उन की सेवाटहल और डाक्टरों के यहां आनेजाने का काम निबट गया था. लेकिन मेरे पास ढेरों काम बाहर के बढ़ गए थे जो कभी मेरे पति ही करते रहे थे. लोग मुझ से सवाल करते, सारा दिन क्या करती रहती हो, आजकल तो खूब आराम रहता होगा?

यह सुन कर मैं तिलमिला उठती और उलटा ही उत्तर देती, मैं खाली नहीं हूं. पहले भी व्यस्त थी, अब भी हूं. लोग किसी न किसी बहाने आ कर देखना चाहते, मैं उन्हें नम्रता से टरका देती और कह देती कि आज फलां काम के लिए फलां जगह जाना है. वे हमदर्दी जता कर अपना महत्त्व प्रदर्शित करते. मैं समझ रही थी कि जीवन का यह रूप भी इतना आसान नहीं है. औरत को जाने कितने रूपों में अपनेआप को एडजस्ट करना पड़ता है.

एक परिवर्तन और भी मैं ने महसूस किया. जो पड़ोसिनें पहले मुझ से बोलने के लिए लालायित रहती थीं, अब वे मुझे अनदेखा कर निकल जातीं. सड़क के दूसरी ओर मुंह घुमा कर चलतीं. एकाध बार मैं ने बात करने की कोशिश भी की तो सुन कर अनसुना कर दिया. अकसर शाम को पहले भी और अब भी बाहर लौन में निकल आती और गेट खोल कर खड़ी हो जाती. शाम की ताजी हवा के साथसाथ पड़ोस के मंदिर से लौटती महिलाओं से थोड़ी गपशप हो जाती. पति के जाने के बाद वे मेरी छाया से भी बचने लगीं. मेरा वैधव्य अपशकुनी हो गया.

हाई ब्लडप्रैशर की पेशेंट मैं पहले से ही थी, अब और भी बढ़ गया. डाक्टर ने सलाह दी कि सुबहसुबह ताजी हवा में टहलने पार्क जाया करो. 2-4 परिचित लोगों में बैठोगीउठोगी तो मन बहलेगा, स्वयं को ठीक भी लगेगा. मैं ने डाक्टर की बात पर अमल करते हुए पार्क में टहलने जाना शुरू कर दिया. अभी 2-4 दिन ही गुजरे थे कि कानों में पीछे से आवाज पड़ी-

‘रांडों से घर में नहीं बैठा जाता. सुबहसुबह शक्ल देख लो तो सारा दिन खराब निकलता है.’ मैं ने पीछे मुड़ कर देखा. मन हुआ कि कहने वाले का मुंह नोच लूं और पूछूं, ‘तेरे घर में कोई रांड नहीं है क्या?’

खून का सा घूंट पी कर घर लौट आई. मैं ने घूमने जाने की दिशा बदल दी. माथे पर छोटी सी बिंदी लगानी शुरू कर दी, जिस से किसी की निगाह एकदम सूने माथे पर न पड़े. लोग एकाएक विधवा समझ कर नफरत न करें. अभी 5-10 दिन ही गुजरे थे कि फिर आवाज गूंजी-

‘फांस लिया होगा किसी यार को. रंडुआ तो बहुतेरे सो जाएं, रांडें सोने दें तब न.’

4-5 लोग ये कहते हुए मेरे पास से गुजर गए. मुझे पागलपन का दौरा पड़े या किसी से कुछ कह बैठूं, मैं ने घूमने जाना ही बंद कर दिया. जितना होता, अपने लौन में ही घूम लेती.

अब हुआ शुरू शादियों का सीजन. कहीं गोद भरी जा रही थी और कहीं रिश्ते पक्के हो रहे थे. 3-4 घरों से मेरे यहां भी मिठाई आई. शुरू में मैं ने गौर नहीं किया, लेकिन बाद में नोट किया कि मिठाई या फल के केवल 3 पीस ही मेरे यहां भेजे जाते. ऐसा क्यों? ये 3 का अंक मुझे भी भारी पड़ने लगा. मुझे पलपल एहसास कराया जाता कि मैं विधवा हूं. जिन्होंने मिठाई के 3-3 पीस रखे, उन के शादी के निमंत्रण पत्र लेने से मैं ने इनकार कर दिया.

वे लोग जो अपने यहां उत्सव में आने के लिए बारबार कहते थे, अब बिना कुछ भी कहे निमंत्रणपत्र पकड़ा कर चल देते. मैं समझती हूं वे बुलाना नहीं चाहते. निमंत्रणपत्र देना उन की मजबूरी है. कभी जो महिलाएं अपने घर आने का बारबार इसरार करती थीं, अब एक बार भूले से भी नहीं कहतीं. क्या मैं उन के पतियों को छीन लाऊंगी या वे मेरी छाया पड़ने से मेरी तरह हो जाएंगी? यह दंश केवल मेरा ही नहीं है, मेरी जैसी जाने कितनी विधवाओं का है. अभी तो जाने क्याक्या झेलना है और अपने दर्द को शब्दों में पिरोना है.

तुम्हारे जाने के बाद मानसिक धरातल पर जोजो भोग रही हूं उस का एकएक शब्द कलमबद्ध करने बैठ गई हूं. मैं तुम्हारी पत्नी और सुहागिन थी. किसी की निगाह में अपशकुनी नहीं थी. तुम ठीक कहते थे, ‘मेरे न रहने पर तुम याद करोगी.’ सच है कि सामने रहते व्यक्ति को कहां याद किया जाता है. जब आदमी सामने नहीं रहता तभी याद किया जाता है. पर सच यह भी है मुझे कभी नहीं लगता कि तुम्हारे बिना रह रही हूं.

अभी भी लगता है तुम यों ही चुपचाप सोफे पर बैठे हो. मैं अखबार की मुख्य खबरें बोलबोल कर तुम्हें सुनाती रहती हूं. तुम्हारे समय पर ही तुम्हारी पसंद का खाना डाइनिंग टेबल पर लगाती हूं और तुम से कहती हूं, ‘भोजन ग्रहण करो.’ पहले भी कभी तुम ने नहीं कहा कि अपना भी खाना लगा लो, साथसाथ खाएंगे. मैं एकएक फुलका गरमगरम सेंक कर देती रहती. अब भी कोई कहने वाला नहीं है. गले में कुछ अटकतेअटकते रह जाता है.

शाम को तुम चुपचाप टीवी देखते रहते. मैं भी चुप बैठी रहती. आज भी चुप बैठ कर देखती हूं. पहले भी तुम सालों दीवान पर सोते रहे और मैं अकेली डबल बैड पर. तुम पास रह कर भी दूर रहे पर नजरों के सामने रहे. आज नजरों के सामने नहीं हो, सिर्फ इसी फर्क ने जीने का अंदाज बदल दिया.

मुझे दुख पहुंचा कर तुम्हें सुकून मिलता था न. अब भी मिल रहा होगा. मेरा जीवन ही दुख का नाम है. दुख के जाने कितने रंग बदलेंगे. तुम हमेशा मुझ से 10-15 कदम आगे चले और अब भी आगे निकल गए. मैं तुम्हारे पदचिह्न देखती पीछे रह गई. क्यों कभी तुम से आगे नहीं चल पाई. साथ तुम चले नहीं. लगता नहीं कि तुम्हें साथ छोड़े इतना वक्त हो गया. लगता है अभी कल की ही बात है. कई बार तुम्हें दवा देने का खयाल आता है, खूंटी से तुम्हारे गंदे कपड़े उतारने को हाथ बढ़ता है. घर में सब तुम्हारी पसंद का था, अभी भी है. मेरी पसंद की केवल किताबें हैं जिन्हें पलटती रहती हूं.

अब न तुम्हारे लौटने का इंतजार है, न तुम से घड़ीघड़ी फोन कर के पूछती हूं कि घर कब आ रहे हो. मैं कितनी भी देर से लौटूं, अब कोई नहीं कहता, ‘बड़ी देर कर दी.’ घर तो तभी घर लगता है जब कोई इंतजार करने वाला हो. लौैट कर आने का आनंद भी तभी आता है जब कोई उलाहना दे. दीवारें उलाहना नहीं देतीं, इंतजार भी नहीं करतीं. मत लौटो, मौन बनी रहती हैं, मेरी तरह.

Love Story : गांठ – क्या शादी के बाद भी नीरज किसी और से प्यार करता था?

Love Story : दरवाजा खोलते ही सामने वाले फ्लैट में रहने आए नवयुवक को देख कर मैं चौंक उठी.

“बेबी के कुछ खिलौने मिलेंगें?” उस ने तड़ से पूछ लिया.

“क्या?” मैं बौखला कर उसे देखने लगी. मेरी बौखलाहट स्वाभाविक थी. भला मेरी 2 साल की गुड़िया के खिलौनों से उस नौजवान का क्या लेनादेना?

“दरअसल, अचानक कुछ मेहमान आ गए. उन के संग छोटा बच्चा है, तो उस के लिए…”

“ओह,” मैं मुसकरा उठी. और अंदर से काफी सारे खिलौने ला कर उसे थमा दिए.

“थैंक्यू भाभी,” कह कर वह चलता बना.

अगले दिन शाम को खिलौने लौटाने आया तो काफी देर मीठी के साथ खेलता रहा. मैं ने मीठी के लिए दूध बनाया तो उस के लिए कोल्डकौफी बना ली. गिलास थमाते हुए मैं ने बात शुरू की, “बच्चों से बहुत लगाव दिखता है आप को?”

“हां. फिर मीठी तो है ही इतनी मीठी. कोई इस के संग खेलने से खुद को कैसे रोक सकता है. औफिस की सारी थकान, तनाव मिट गया है.”

“कहां काम करते हो, अकेले रहते हो…” जैसे छिटपुट प्रश्नों के साथ बातचीत का सिलसिला चलता रहा. पता लगा किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छे पद पर है. शादी अभी नहीं की है. उस दिन के बाद वह मीठी के संग खेलने अकसर आने लगा. मीठी भी उसे देख कर किलक उठती. खूब घुलमिल गई थी उस से. अपनी तुतलाती जबान में जब वह शिशिर को चाचा कह कर पुकारती तो वह निहाल हो उठता. मेरे मना करने के बावजूद वह अकसर उस के लिए खिलौने, चौकलेट आदि ले आता. जिस अधिकारभाव से वह यह सब करता, मेरे लिए उसे रोकना मुश्किल हो जाता. प्रत्युतर में, बस, इतना ही कर पाती कि उसे कुछ न कुछ खिलापिला कर ही विदा करती. शायद कुछ रिश्तों की गरिमा इसी तरह बनाए रखी जा सकती है.

एकदो बार दरवाजा खुला पा कर मीठी खुद ही उस के पास चली गई थी. थोड़ी देर बाद वही छोड़ गया था. उस दिन भी पोर्च में खेलती मीठी को वह अपने संग घर ले गया. काफी देर हो गई और मीठी के दूध का वक्त हो गया तो मैं उसे बुलाने शिशिर के घर चली गई. देखा, 2 कुरसियों के बीच चादर बांध कर शिशिर ने एक झूला सा बना रखा था और मीठी मजे से उस में झूल रही थी.

“जाओ मीठी, अब घर जाओ. देखो, मम्मी लेने आ गई है. कब से कह रहा हूं, मम्मी चिंता कर रही होगी पर मान ही नहीं रही.”

“लास्ट राउंड,” मीठी ने मीठी सी जिद की तो मैं भी इनकार न कर सकी. वहीं सोफे पर बैठ कर पत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगी. अचानक उस में से कुछ कागज निकल कर गिरे. लड़कियों के फोटो और बायोडाटा थे. मुझे उन्हें गौर से देखते देख शिशिर बोल उठा.

“मां ने भेजे हैं.”

“हूं, तो फिर कौन सी सलैक्ट की?” मैं ने उसे छेड़ते हुए पूछा.

“क्या भाभी, आप भी, अच्छा, आप ही बताइए कौन सी अच्छी है?” मैं गौर से सब को देखतीपढ़ती रही.

“ऐसे तो सब ठीक ही लग रही हैं.”

“अब शादी तो एक से करनी है न, भाभी. आप मेरी जगह होतीं तो क्या करतीं?”

मैं थोड़ा मुश्किल में पड़ गई थी. “तुम एक बार सब को देख लो, मिल लो. उस से पता चल जाएगा.” पीछा छुड़ाने के लिए मुझ से यही कहते बना.

“क्या एक बार की मुलाकात से जिंदगी का इतना बड़ा निर्णय लिया जा सकता है?”

“तो फिर क्या करें? हमारे समाज का ऐसा ही दस्तूर है. बात तय न हो, तब तक ज्यादा मेलमुलाकात अच्छा नहीं समझा जाता,” कहते हुए मैं ने एक तरह से हथियार डाल दिए थे. अपनी जीत पर उस के मुख पर एक गर्वीली मुसकान उभर आई थी.

“काश, मां को भी ऐसे ही दोस्ताना अंदाज में अपनी बात समझा पाता. पर वही रिवाज वाली बात हमारे यहां मां दोस्त बन ही नहीं पाती.”

“मां को दोस्त बनाने की चाहत कभी करना भी मत. मां मां होती है. कोई भी रिश्ता इस गरिमामयी पदवी के ऊपर तो क्या, समकक्ष पहुंचने की भी हिमाकत नहीं कर सकता. दोस्त हम खुद चुनते हैं. लेकिन हमारे लिए मां कुदरत चुनती है. दोस्त हमें हर जगह मिल जाएंगे. समय के साथ दोस्त बदलते भी जाएंगे. लेकिन मां हमेशा वही रहती है. बच्चों के हित की कामना करती, उन पर ममता के फूल बरसाती, सद्भावनाओं की सौम्य मूर्ति.”

मैं ने अपनी बात समाप्त की तो शिशिर मानो नींद से जागा. “‘वाहवाह, क्या बोलती हैं आप. निशि आप से मिलेगी तो पागल हो जाएगी.”

“अब यह निशि कौन है?” मैं ने दिखावटी आंखें तरेरीं, “इन फोटो और बायोडाटा को नकारने की वजह कहीं वही तो नहीं है?” शिशिर झेंप कर हंसने लगा.

“आप तो भाभी उड़ते परिंदे के पर पहचान लेती हैं. निशि मेरी ही फर्म में है. कभी लाऊंगा आप से मिलवाने.”

पहली बार में निशि मुझे काफी बिंदास और आधुनिका लगी. जैसा कि स्वाभाविक है, एक ही मुलाकात में किसी के बारे में कोई राय बनाना बुद्धिमानी नहीं हैं. मैं ने भी शिशिर पर अपनी पसंदनापसंद जाहिर नहीं की. वैसे भी, मुझे लगता था किसी के व्यक्तिगत मामले में दखल देना उस संबंध को समाप्त करना है वह भी शादी जैसा संवेदनशील मुद्दा, जिस पर तो खून के रिश्तों तक में तनातनी हो जाती है.

मेरी चुप्पी का शिशिर ने शायद यह अर्थ लगाया कि मैं अभी निशि को और परखना चाहती हूं, इसलिए वह निशि को बदस्तूर मेरे पास लाता रहा. निशि को भी शायद मुझ से बातें करना और मीठी के साथ खेलना अच्छा लगता था. वरना, उस जैसी आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी लड़की को उस की इच्छा के विरुद्ध घसीट कर लाना नामुमकिन था.

मुलाकात दर मुलाकात मैं निशि से प्रभावित होती चली गई. पहली नजर मैं मैं ने जो उस पर बिंदास और आधुनिका का टैग लगाया था वह शायद उस के प्रगतिशील विचारों के कारण था. किसी भी विषय पर वह अपनी बेबाक राय जाहिर करती थी. पर आधुनिक लिबास में भी उस का संस्कारशील व्यक्तित्व बरबस मन मोह लेता था. बातें करते हुए काम में मेरा हाथ बंटाना, छेड़ने पर लजा कर पलकें झुका लेना, शिशिर से अपेक्षित दूरी बरतना, मीठी पर ममता लुटाना जैसे नारीत्व के सभी गुण उस की आधुनिकता के कवच के भीतर सुरक्षित थे. यहां तक कि मैं ने उसे कभी शिशिर के संग अकेले उस के फ्लैट में जाते नहीं देखा. वह सीधे मेरे यहां आती और यहीं से रवाना होती.

“बहुत प्यारी लड़की है,” न चाहते हुए भी उस की अनुपस्थिति में एक दिन यह बात शिशिर के सम्मुख मेरे मुंह से निकल ही गई.

“तो फिर मैं बात पक्की समझूं,” शिशिर मानो ताक में ही बैठा था.

“कैसी बात?” मैं ने हैरानी से पूछा.

“अगले सप्ताह मां आ रही है. उन फोटो-बायोडाटा पर मेरी राय जानने. आप उन्हें सब समझा देंगी न? निशि के बारे में भी बात कर ही लेंगी?” उस ने बेहद आशा से मेरी ओर ताका तो मैं घबरा गई.

“नहींनहीं, यह मुझ से नहीं होगा. अपनी मां से तुम ही बात करो. मैं कि…” कहते हुए मैं ने जीभ काट ली. दरअसल मैं यह कहना चाहती थी कि मैं किसी के व्यक्तिगत झमेले में नहीं पड़ना चाहती. लेकिन शिशिर व निशि के मुझ से संबंध इतने आत्मीय और सम्मानप्रद हो गए थे कि उन के लिए किसी शब्द का प्रयुक्त करना मुझे उपयुक्त नहीं जान पड़ा. पर शिशिर शायद मेरा अभिप्राय समझ गया था. उस का मुंह लटक गया था. वह निराश लौट गया. उस के बाद उस ने कभी यह बात नहीं छेड़ी. हालांकि, मीठी से मिलने, खेलने, उस के लिए खिलौने, चौकलेट लाने का सिलसिला जारी था.

मैं भी सामान्य बने रहने का प्रयास करती थी. लेकिन अंदर ही अंदर मैं अपने व्यवहार पर लज्जित थी. क्या हक था मुझे उस की उम्मीदों पर पानी फेर देने का? कितनी आशाएं ले कर उस ने मुझे निशि से मिलवाया था? तो मैं ने कब कहा था उसे निशि से मिलवाने का. क्या दुनिया में खून के रिश्ते ही सबकुछ होते हैं. दिल के रिश्तों का कोई मोल नहीं. यदि शिशिर की जगह मेरा अपना भाई या देवर होता तो क्या मैं ऐसे ही सारे मसले से अपना पल्ला झाड़ लेती? .कुछ मदद न करती? मैं एक बार उस की मां के सामने उस का पक्ष तो रख ही सकती हूं. कहीं उस की मां ने मुझे झिड़क दिया तो?”

आरोपप्रत्यारोप के ऐसे ही खयालों के तीर मुझे डंसते रहते, जिसे मेरे पति नीरज ने जल्द ही लक्षित कर लिया.

“तबीयत ठीक है तुम्हारी? आजकल शिशिर और उस की वो गर्लफ्रैंड नजर नहीं आते? कुछ?”

नीरज कुछ गलत अर्थ न लगा बैठें, इसलिए मैं ने उन्हें सारी बात खोल कर समझा दी.

“हां, कुछ नहीं हो सकता,” उन्होंने गरदन झटक दी, “अपनी शादी का इतिहास ही याद कर लो,” कहते हुए उन्होंने फिर से अखबार में नजरें गड़ा दीं. नीरज का कटाक्ष मुझे भीतर तक बींध गया. अतीत के जिन नासूरों का मैं चिन्हमात्र भी देखना पसंद नहीं करती थी उन्हें नीरज गाहेबगाहे इतनी बेदर्दी से कुरेद देते कि मैं दर्द से छटपटा जाती. आज भी पूरे दिन वह दर्द मुझे सालता रहा. मीठी सो गई तो मैं बेचैनी से गलियारे में चक्कर काटने लगी. भीतर एक आग सी सुलग रही थी.

शिशिर की मां आ चुकी थी, यह भनक मुझे लग गई थी. लेकिन अभी हमारी मुलाकात नहीं हो पाई थी. कराता भी कौन? तभी सामने से थैलों से लदाफंदा शिशिर आता दिखाई दिया. वह तो कन्नी काट कर अपने फ्लैट में घुस जाना चाहता था पर मैं ने ही पुकार कर उसे रोक लिया. मन ही मन में कुछ निश्चय कर चुकी थी.

“शिशिर, मां आ गई, कब मिलवाने ला रहे हो? ऐसा करो, कल औफिस जाते वक्त मेरे पास छोड़ जाओ. लंच हम साथ ही लेंगी. और निशि की बात भी हो जाएगी,” मेरे अंतिम वाक्य से उस के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई. हाथ में थैले थे वरना वह मुझे उठा कर घुमा ही देता.

“वैसे भाभी, मैं ने आप का काम आसान कर दिया है. जब से मां आई है…”

“शिशिर, आ गया बेटा. ला, मुझे पकड़ा,” अंदर से मां आ गई तो शिशिर की फुसफुसाहट को विराम लग गया.

“नमस्ते आंटी,” मैं ने अभिवादन किया तो शिशिर ने मेरा उन से परिचय करवाया. मैं ने कल का लंच पक्का कर लिया.

अगले दिन शिशिर नियत समय पर आंटी को छोड़ गया. जातेजाते मेरे कान में फुसफुसा गया, “औल द बेस्ट.”

“शैतान,” मैं हंसी. शिशिर की खुशी छलकी पड़ रही थी, जिसे देख कर मुझे अपने निर्णय पर गर्व हो आया. आंटी मेरे संग रसोई में ही आ गईं. खाना बनाखा कर कौफी का कप ले कर बैठे तो बातों का सिलसिला फिर चल पड़ा.

“बहुत तारीफ करता है शिशिर तुम्हारी. समझ लो, तुम्हारे भरोसे ही निश्चिंत हूं. वरना परदेस में जवान लड़का कब हाथ से निकल जाए. ऐसीऐसी बातें बता रहा था, सुन कर मेरे तो रोंगटे खड़े हो गए. एक तो किसी ‘गे’ लड़के की बात बता रहा था. कैसा जमाना आ गया है? और एक यह मुई लिवइन की बीमारी की बात रहा था. मैं तो कहती हूं, लड़का उलटेसीधे चक्करों में पड़े, इस से पहले ही उसे किसी खूंटे से बांध दो.”

अब मुझे समझ आ रहा था कि उस ने कैसे मेरा रास्ता आसान कर दिया था. पर देखा जाए तो जो कुछ उस ने बताया था वह हकीकत थी.

“बात तो वह ठीक ही कह रहा है, आंटी. ये सब तो अब कौमन बातें हो गई हैं,” मैं ने हां में हां मिलाई.

“पर मुझे अपने बेटे पर पूरा विश्वास है. वह ऐसा नहीं है. मां हूं उस की. अच्छे से समझती हूं उसे. पर अब सालभर से दूर रह रहा है. कहीं कुछ…” उन के चेहरे पर चिंता के बादल छाने लगे तो मुझे उन से गहरी सहानुभूति उमड़ आई.

“नहीं आंटी, शिशिर ऐसा हरगिज नहीं है,” मैं ने उन की चिंता दूर करनी चाही और अपने प्रयास में सफल भी रही. वे फिर से उत्साहित हो गईं.

“मैं जानती हूं. तभी तो उस के लिए लड़कियों के फोटो आदि भेजे थे. तुम ने देखे? अब तो बस जिस पर वह उंगली रख दे उसी से कुंडली आदि मिला कर ब्याह पक्का कर दूं. सभी भले घरों की भली लड़कियां हैं. अब मांबाप तो सब देखभाल कर ही तय करते हैं न. तभी तो ऐसी शादियां चलती हैं. और खुद बच्चे भी सुखी रहते हैं. अब तुम्हें ही देख लो, अच्छा घर, अच्छा कमाने वाला पति, प्यारी सी बच्ची सब सुखसाधन हैं, सुख से गृहस्थी चल रही है.”

वे अपनी ही रौ में बोले जा रही थीं.

“हां, यदि अच्छा कमाने वाला पति, बच्चे, सुखसुविधा के साधन ही सुखी गृहस्थी की निशानियां हैं तो मैं सुखी हूं,” दो दिनों से मेरे भीतर उबल रहा लावा मानो आज फट पड़ने को व्याकुल हो उठा था, “सुखी गृहस्थी की नींव होती है पतिपत्नी का आपसी प्यार, विश्वास और समर्पण. लेकिन जिस गृहस्थी की नींव ही समझौते और एहसान की भावना पर टिकी हो उसे किस माने में सुखी गृहस्थी कहा जा सकता है?

“नीरज किसी और से प्यार करते थे. शायद, आज भी करते हों. लेकिन मांबाप के दबाव में आ कर उन्होंने मुझ से शादी कर ली. अपनी कायरता को वे बड़े गर्व से श्रवणकुमार के चोगे में छिपाते फिरते हैं. उन के अनुसार, मुझ से शादी कर के उन्होंने अपने मांबाप और मुझ पर बड़ा एहसान किया है. मैं अंदर ही अंदर इस एहसान के बोझ तले घुट रही हूं.

“समय के साथ खुद को संभालते हुए जब भी आत्मसम्मान से थोड़ा सिर उठाने का प्रयास करती हूं वे कोई न कोई विषैला तीर दाग कर उस नासूर को फिर से हरा कर देते हैं. समझ नहीं आता इस सब के लिए किसे दोषी ठहराऊं- नीरज को, उन के मातापिता को या अपने समय को? इन 3 सालों में कभी अपने मांबाप को भी अपना दुख बताने का साहस न कर सकी. डरती हूं, बेटी की सुखी गृहस्थी का भ्रम यदि टूट गया तो जाने उन पर क्या गुजरे? कभीकभी इंसान अपनों के सामने दिल का दर्द बयां करने में हिचकिचाता है. लेकिन अनजानों से थोड़ी सी हमदर्दी मिलते ही सबकुछ खोल देता है यह सोचकर कि कम से कम दिल का दर्द तो हलका होगा.

“मैं ही जानती हूं मन की गांठ खुल जाने से मैं कितना निर्मल और हलका महसूस कर रही हूं. आप का बेटा भी किसी से प्यार करता है, उस के संग गृहस्थी बसाने के सुनहरे सपने संजो रहा है. हो सकता है आप के दबाव में आ कर कल को वह किसी और से शादी कर ले. ऐसी स्थिति में एक और स्वाति जन्म लेगी अंदर से पूरी तरह टूटी हुई पर ऊपर से अपनी खोखली गृहस्थी को खड़े रखने का व्यर्थ प्रयास करती हुई, न खुल कर सांस ले पा रही होगी न सांस छोड़ने की हिम्मत कर पा रही होगी.

आंटी ने स्नेह से मेरा कंधा थपथपाया तो मुझे होश आया. भावनाओं का सैलाब मुझे न जाने कहां बहा कर ले गया था? आंटी की नम आंखों ने दिल में उम्मीदों के दीप जला दिए. उन्हें बाहर छोड़ने जाते हुए जब हम बैठक से गुजरे तो मेरे कदम जम से गए. सोफे पर बैठे नीरज एक पत्रिका के पन्ने पलट रहे थे. वे लंच के लिए कब आए, अपनी बातों में हमें पता ही न लगा. आंटी चली गईं और मैं चुपचाप खाना लगाने लगी. दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि एसी में भी माथे पर पसीने की बूंदें झिलमिला उठी थीं. ‘काश, नीरज ने कुछ न सुना हो. काश, नीरज ने सबकुछ सुन लिया हो. वरना प्रत्यक्ष में तो कभी मैं यह सब कहने का साहस न जुटा पाऊंगी.’

जानलेवा चुप्पी दोनों के बीच पसरी पड़ी रही. मीठी इस बीच खेल कर, खा कर फिर सो चुकी थी. नीरज औफिस लौटने के बजाय कपड़े बदल कर बिस्तर पर लेट गए तो मेरा शक यकीन में बदल गया. अवश्य उन्होंने सब सुन लिया है. लेकिन मेरी धड़कनें अब नियंत्रित हो चुकी थीं, खोया हुआ आत्मविश्वास लौटने लगा था. आखिर, मैं ने जो भी किया, किसी के भले के लिए किया था. दूसरे को ढांपने के लिए उठे हाथ यदि खुद के उघड़ने की परवा करेंगे तो कैसे किसी को ढांप पाएंगे? मैं भी चुपचाप बिस्तर पर अपनी जगह लेट गई.

थकान से आंखें मुंदियाने लगी कि बांहों के एक घेरे ने मुझे अपनी आगोश में ले लिया. कानों में सरगोशी गूंज उठी, “मैं वाकई बहुत ही कमजोर इंसान हूं, स्वाति. तुम ने मुझे ठीक पहचाना. सच तो यह है कि मैं नीरा से भी कभी अपने प्यार का इजहार न कर सका, मम्मी का सुझाया रिश्ता न ठुकरा सका और इन सब का क्षोभ, दबा हुआ गुस्सा हताशा में तुम पर निकालता रहा. तुम्हारे प्यार को तुम्हारी कमजोरी मान कर दबाता रहा.”

चेहरे पर नमी का एहसास हुआ तो मैं चौंक उठी. कहते हैं, पुरुष 2 ही परिस्थितियों में रोता है- या तो जब सीने में बहुत दर्द हो या जब दिल में गहरा पश्चात्ताप हो. ये निश्चित रूप से पश्चात्ताप के आंसू थे जिन्होंने बरसों से बंधी मन की गांठ को खोल डाला.

Romantic Story : एक किन्नर की लव स्टोरी – रानो को आखिर कौन मिल गया था

Romantic Story : खुश थी कि उसे भी कोई चाहने वाला मिल गया है. किन्नरों की जिंदगी में ऐसा कम ही होता है. किन्नरों के ऊपर पैसे फेंकने वाले तो बहुत होते हैं, मगर उन के ऊपर कोई अपना दिल फेंक दे, ऐसा कभी देखा नहीं. राजू एक आटोरिकशा ड्राइवर था. रानो रात के 10 बजे सहेलियों के साथ सड़क पर खड़ी थी. राजू की सांसें तेज चल रही थीं. उस से रानो का खुला हुआ कंधा देखा नहीं जा रहा था. वह गजब की खूबसूरत दिख रही थी. रानो अपनी सहेलियों से हंसहंस कर बातें कर रही थी. कुछ बातें राजू के कानों में भी पड़ रही थीं, मगर पता नहीं क्यों राजू उन बातों को सुनना नहीं चाह रहा था. उस की आंखों में इस वक्त रानो का गोरा कंधा घुसा हुआ था. स्ट्रीट लाइट की रोशनी में रानो की ड्रैस रहरह कर चमक जाती थी.

उस की ड्रैस पर ढेर सारे सितारे लगे हुए थे. रानो ने अपने बालों को खुला छोड़ रखा था. वह रहरह कर अपने बालों को कंधे के पीछे करती और कभीकभी अपनी छाती की ओर कर उंगलियों से अपनी लटों के साथ खेलती. राजू को पता नहीं था कि उस के आटोरिकशे में कौन जाने वाला है, मगर वह पूरे मन से यही चाह रहा था कि रानो उस की सवारी बन जाए. वैसा ही हुआ. रानो हंसती हुई राजू के आटोरिकशे में बैठ गई. राजू ने पहली ही नजर में उसे अपना दिल दे दिया था, एक लड़की समझ कर. लेकिन जब उसे पता चला कि रानो एक किन्नर है, तब भी वह उस की खूबसूरती के आगे सबकुछ भूल गया.

‘‘बहुत खूबसूरत लग रही हो,’’ राजू ने आटोरिकशे के साइड मिरर में देख कर रानो से कहा. यह सुन कर रानो हंस दी और बोली, ‘‘ऐसे मत देख पगले, प्यार हो जाएगा.’’ रानो ने राजू की हंसी उड़ाई, मगर उसे नहीं पता था कि राजू सच कह रहा है. वह तो पहले ही फंस चुका था उस के हुस्न के जाल में. रानो ने देखा कि राजू ने उस की बात का जवाब नहीं दिया, मगर बीचबीच में वह उसे देख जरूर रहा था. रानो ने महसूस किया कि राजू एक सीधासादा लड़का है. उस की नजर में फूहड़पन नहीं था. वह उसे ऐसे देख रहा था, जैसे कोई एक खूबसूरत लड़की को देखता है. रानो ने अपने मन में कुछ सोचा कि तभी होटल आ गया. आटोरिकशे से उतर कर रानो ने ड्राइवर को पैसे दिए. राजू ने देखा भी नहीं कि उस ने कितने पैसे दिए. उस ने एक हाथ में पैसे पकड़े और रानो को देखता रहा.

उसे रानो को कुछ पैसे वापस करने थे. रानो इंतजार कर रही थी, मगर उस ने देखा कि राजू उदास लग रहा है. रानो समझ गई. ‘‘कल 10 बजे वहीं आना, जहां से आज मुझे बैठाया है,’’ इतना कह कर रानो मुसकराते हुए होटल के अंदर चली गई. यह सुन कर राजू खुश हुआ कि रानो ने उसे कल भी बुलाया है. अगले दिन ठीक 10 बजे राजू उसी नुक्कड़ पर पहुंच गया, जहां से रानो उस के आटोरिकशे में बैठी थी. ‘‘चलो,’’ यह सुन कर राजू चौंक गया. उस ने पीछे मुड़ कर देखा, तो रानो उस के आटोरिकशे में बैठ चुकी थी. ‘‘किधर से आईं तुम? मैं तो सामने देख रहा था,’’ राजू थोड़ा खुल सा गया था आज. फिर उस ने आटोरिकशा स्टार्ट किया और साइड मिरर से उसे देखने लगा.

आज रानो ने बैंगनी रंग की ड्रैस पहनी हुई थी. वैसी ही मादक ड्रैस, जिसे देखते ही नशा चढ़ जाए. रानो मेकअप करती थी. वह छोटे से आईने में अपने मेकअप को देख रही थी. जल्दीजल्दी में आज वह ठीक से तैयार नहीं हो पाई थी, तभी उस की नजर राजू से टकरा गई. ‘‘सामने देख कर चलाओ…’’ रानो ने मुसकरा कर कहा. राजू समझ गया कि वह क्या कहना चाह रही थी. ‘‘तुम जैसी खूबसूरत लड़की साथ बैठी हो, तो नजर भटकेगी ही न,’’ राजू ने भी कह दिया. ‘‘क्यों मजाक उड़ा रहे हो. मैं लड़की नहीं हूं,’’ रानो के मन में जैसे कुछ चुभ सा गया था. ‘‘कम भी नहीं हो. कोई भी देखे, तो एकदम पगला जाएगा,’’ राजू ने अपनी बात कही. ‘‘मेरी तरफ से ध्यान हटाओ. मैं तुम्हारे किसी काम की नहीं,’’ रानो ने राजू को आगे बढ़ने से रोका. ‘‘तुम इतनी खूबसूरत हो कि मैं तुम्हारे लिए जिंदगीभर आटोरिकशा चला सकता हूं,’’ राजू बोला, तो रानो हंस दी. राजू ने उस के मन को छू लिया था.

अब रानो राजू के आटोरिकशे को ही अपने आनेजाने के लिए इस्तेमाल करती थी. राजू को अब कुछ की जगह बहुत सारे पैसे मिलने लगे. बड़ीबड़ी पार्टियों में उस का आनाजाना होने लगा. रानो के मना करने के बावजूद राजू नहीं माना और इस बात पर अड़ा रहा कि वह उस से प्यार करता है. उस दिन पता नहीं क्या हुआ. रानो होटल में गई, मगर कुछ ही देर में गुस्से से भरी हुई बाहर निकली. राजू का आटोरिकशा उसे वहीं खड़ा मिला. ‘‘तुम गए नहीं अब तक?’’ रानो ने आटोरिकशे में बैठते हुए गुस्से से कहा. ‘‘पता नहीं क्यों आज मन नहीं हुआ जाने का,’’ राजू बोला. ‘‘घर ले चलो,’’ आज रानो पहली बार इतनी जल्दी घर जा रही थी. आटोरिकशे से उतरने के बाद रानो अपनी बिल्डिंग में जाने लगी, तभी उस ने देखा कि राजू भी उस के पीछेपीछे आ रहा है. ‘‘तुम को घर नहीं जाना है क्या?’’ रानो ने पूछा. ‘‘नहीं, आज तुम्हारे पास रुकने का मन है.’’ ‘‘अच्छा…’’ कह कर रानो आगे बढ़ गई.

वह बड़े से घर में अकेले रहती थी. घर में घुसते ही रानो ने अपनी ड्रैस ऐसे उतारी, जैसे वह इस ड्रैस से खूब नाराज हो. उसे यह भी खयाल नहीं आया कि आज उस के साथ कोई और भी आया है. राजू बड़ीबड़ी आंखों से रानो को कपड़े उतारते देख रहा था. उस ने पीले रंग की ड्रैस पहनी थी, जो उस ने अभीअभी उतारी थी. अब उस के भरे हुए सीने पर काले रंग की ब्रा दिख रही थी, जिस से उस का हुस्न जितना ढका हुआ था, उस से ज्यादा दिख रहा था. यह देख राजू के मुंह में पानी आ गया. उस से रहा नहीं गया और उस ने रानो के पूरे जिस्म पर अपनी नजर दौड़ा दी. पूरी औरत तो लगती थी रानो. रानो सोफे पर ऐसे बैठ गई, मानो उसे राजू से कोई शर्म नहीं आ रही थी. ‘‘कुछ खाओगे?’’ पूछ कर रानो ने राजू का ध्यान भंग किया. राजू ने भी कह दिया, ‘‘हां.’’ राजू इस वक्त रानो की खुली जांघों को घूर रहा था, जो एकदूसरे पर चढ़ी हुई थीं. रानो को उस ने पहली बार इतना खुल कर देखा था. रानो की तरफ से कोई मनाही न देख उस का हौसला बढ़ गया और वह रानो के पास बैठ गया. रानो ने अपनी आंखें बंद कर लीं.

राजू ने उस के होंठों को अपनी उंगली से छुआ. फिर उस ने रानो के पूरे जिस्म को अपनी उंगली से छुआ. राजू को अपने पास पा कर रानो बहुत खुश थी. अब यह सिलसिला बहुत तेजी से आगे बढ़ने लगा. दोनों एकदूसरे की बांहों में घंटों पड़े रहते. अपने धंधे के बाद भी रानो अब खुश रहने लगी थी. उस का बड़ेबड़े अमीरों से वास्ता पड़ता था. बड़ेबड़े लोग भी अजीब शौक रखते हैं और ऐसे ही एक अजीब शौक को पूरा करने के लिए रानो जैसी किन्नरों की जरूरत पड़ती है. रानो बस कहने को किन्नर थी, वरना उस के हुस्न के आगे अच्छीअच्छी लड़कियां पानी भरें. यही वजह थी कि उसे उस के काम के औरों से ज्यादा पैसे मिलते थे. इतनी कम उम्र में उस ने इतना पैसा कमा लिया था कि उसे पैसे से अब कोई मोह नहीं रह गया था. मगर जब रानो पूरी तरह राजू के प्यार में गिरफ्त हो गई, तब राजू के मन में लालच आ गया. अब वह किसी न किसी काम के बहाने उस से पैसे मांगने लगा था. रानो ने पहले मना नहीं किया. राजू के ऊपर खूब पैसे लुटाए. मगर लालच का पेट इतना बड़ा होता है कि बड़े से बड़ा खजाना भी खाली हो जाए. फिर एक दिन रानो की दौलत भी कम पड़ गई.

रानो ने बहुत समझाया, मगर राजू को बात समझ नहीं आई. आखिर में रानो ने साफसाफ कह दिया कि अब वह पैसे नहीं दे सकती. मगर तब तक राजू के मन में शैतान आ चुका था. रानो के पास बहुत पैसा था और राजू उस के सारे भेद जान चुका था. राजू ने पूरी योजना बनाई और एक दिन रानो के पास पहुंचा और कहा कि उसे उस की बात समझ में आ गई है. रानो बहुत खुश हुई. दोनों में प्यार हुआ. इस के बाद उन्होंने खाना खाया. फिर प्यार हुआ. जब रानो एकदम मस्त हो गई, तब राजू ने उस की हसरत भी पूरी की. राजू ने रानो की पीठ सहलाते हुए उस के बालों को आगे की तरफ सरका दिया, जिस से रानो को अब फर्श के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था. रानो के बाल बहुत घने थे. जब भी वह घर में बिना कपड़ों के रहती, अपने बालों को संवारती रहती. उसे आईने में अपने उभारों को देखना अच्छा लगता था. फिर लंबे काले बालों से अपने गोरेगोरे उभारों को ढकती थी.

कभीकभी तो राजू के सामने भी वह ऐसा करती थी. क्या करती, प्यार में पड़ गई थी न. रानो के शरीर में बस एक ही कमी थी कि वह औरत हो कर भी औरत नहीं थी. वह राजू को एक औरत का सुख देना चाहती थी. राजू ने रानो को महसूस नहीं होने दिया था कि वह एक किन्नर है. वह उसे एक लड़की की ही नजर से देखता था. रानो अब उस के सामने पूरी कोशिश करती कि एक लड़की ही दिखे. कपड़े भी उस ने शरीफ लड़कियों वाले खरीद लिए थे. जब वह राजू के साथ बाहर निकलती, तो सब देखते रह जाते. रानो ने राजू को अपना पति ही मान लिया था और उसे खुश रखने की भरपूर कोशिश करती थी.

आज भी रानो बहुत खुश थी कि राजू ने उस की बात मान ली है. पैसे की उस के पास कमी नहीं थी. वह बस राजू के मन से लालच दूर कर देना चाहती थी. इस वक्त भी रानो और राजू प्यार करने में मस्त थे. अपने घने बालों की वजह से रानो को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. तभी राजू ने जेब से चाकू निकाला और रानो की छाती में एक जोरदार वार किया. रानो चीखती हुई निढाल हो कर फर्श पर गिर पड़ी. थोड़ी देर में उस की मौत हो गई. घर में जितनी भी दौलत थी, राजू ले कर फरार हो गया.

Traditional Dress : फैशन पर प्रभाव डालते धार्मिक विचार

Traditional Dress : दानपिंड बराबर होता रहे इसलिए धार्मिक विचारों का प्रोपगेंडा चारों तरफ से फैलाया जाता है. इसे युवाओं में पोपुलाराइज करने के लिए फैशन का इस्तेमाल किया जाता है.

जब भी फैशन की बात होती है तो आमतौर पर वेस्टर्न पोशाकों की ही तस्वीरें सामने दिखने लगती हैं. पीछे कुछ सालों में देखें तो यह तस्वीर बदल रही है. खासतौर पर 14-15 साल की लड़कियों से ले कर महिलाओं तक में यह बदलाव दिख रहा है. केवल पहनावा ही नहीं फेस्टिवल को जिस तरह से मनाया जाने लगा है वहां भी भारतीय पहनावा सब से आगे दिखने लगा है. लड़कियां सलवार सूट ही नहीं ट्रैडिशनल साड़़ी और डिजाइनर ब्लाउज पहनने लगी हैं. इस के साथ गहने भी पुरानी डिजाइन के खरीदे जाने लगे हैं.

लड़कियों में ही नहीं लड़कों में भी अब भारतीय पहनावे का क्रेज बढ़ रहा है. फेस्टिवल में लड़के भी कुर्तापायजामा के साथ सदरी पहनने लगे हैं. कई लड़के तो खास अवसरों पर धोती पहनने लगे हैं. यही कारण है कि रेडी टू वियर धोती आने लगी है. जिस को पैंट या पायजामे की तरह से पहन लिया जाता है. अब बहुत कम पार्टियों में सूट और टाई वाले लड़के दिखते हैं. मध्यम वर्ग में यह चलन बहुत तेजी से बढ़ा है. अपर क्लास भी इसी तरह का व्यवहार कर रहा है.

फैशन डिजाइनर निवेदिता सिंह सोमवंशी कहती हैं, “अब कोई इवैंट हो या फेस्टिवल सब बड़ी ट्रेडिशनल तरह से मनाए जाने लगे हैं. फेस्टिवल की तो अपनी एक थीम होती ही है जन्मदिन हो शादी या और अवसर इन की थीम भी ट्रेडिशनल होने लगी है. जैसे शादी के पहले हल्दी और मैंहदी होने लगी है. इस की पूरी थीम ट्रेडिशनल होती है. ऐसे में इस में हिस्सा लेने वाले ट्रेडिशनल ड्रैस ही पहनेंगे. वह चाह कर भी वैस्टर्न नहीं पहन सकते. स्कर्ट या गाउन पहन कर कोई हल्दी और मैंहदी के इवेंट नहीं कर सकता है.”

यही हाल शादियों का है. शादी में राजपूताना स्टाइल हर किसी को पंसद आने लगी है. दूल्हे के साथ तलवार सब रखते हैं. पहले यह राजपूत शादियों में दिखता था. एक जमाना था कि दूल्हा कार से ही बारात में जाता था. अब केवल दरवाजे बारात के लिए बग्घी और घोड़े का प्रयोग होता है. केवल इस दिखावे के लिए ही घोड़ा और बग्घी वाले हजारों रुपए खर्च कराते हैं.

बात केवल राजपूताना थीम की ही नहीं है. अब फेस्टिवल और इवेंट दोनों ही जगहों पर हिंदू संस्कृति हावी दिखने लगी है. फोटो, वीडियो और सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए इस थीम को सब से ज्यादा पंसद किया जा रहा है.

जिन जातियों में कभी ब्राहमणवाद को विरोध होता है वहां भी शादियों में हिंदी संस्कृति का प्रभाव सजावट से ले कर पहनावे तक पर साफ दिखने लगा है. इस की सब से बड़ी वजह यह होती है कि लोग अपनी पहचान बनाने के लिए नेताओं और मंत्रियों को बुलाने लगे हैं. यह नेता और मंत्री आए तो उन को अच्छा लगे इस के लिए सजावट इन के हिसाब से करनी पड़ती है. पहले कांग्रेसी, बसपाई, वामपंथी और समाजवादी नेता भगवा रंग के कपड़ों को पहनने से परहेज करते थे. अब यह भी भगवा सदरी तो पहन ही लेते हैं. जो बहुत भगवा पहनने से बचते हैं उन को भी सफेद रंग के कपड़ों में संतोष करना पड़ रहा है.

सदरी क्यों है खास

सदरी को नेहरू जैकेट के नाम से भी जाना जाता है. इस की खूबसूरती यह है कि एथनिक लुक के लिए इन्हें कुर्ते के साथ या आधुनिक लुक के लिए शर्ट और ट्राउजर के साथ पहन सकते हैं. हर अवसर पर इस को पहना जा सकता है. कीमत के हिसाब से देखें तो हर आयवर्ग के लिए फिट रहती है. 800 रुपए से ले कर ऊपर इस की कीमत होती है. इस को बनाने में अलगअलग तरह का फैब्रिक प्रयोग किया जाता है. इस को प्रिंटैड शर्ट, सिंपल कुर्ता या सर्दियों के लिए टर्टलनेक के ऊपर पहन सकते हैं. इस के पहनने से कोई भी पोशाक बेहतर लुक देने लगती है.

अलगअलग फैब्रिक से बने होने के कारण यह टिकाऊ होने के साथ ही साथ आरामदायक भी होती है. मौसम के हिसाब से अलगअलग तरह की जैकेट का प्रयोग कर सकते हैं. मौसम के हिसाब से ही इस के रंग भी अलगअलग हो सकते हैं. आज के दौर में नेताओं के द्वारा इस को ज्यादा पहना जाता है. युवा अब पार्टियों में इस का प्रयोग करने लगे हैं. इस को पहनते समय सब से बड़ी मांग इस के ट्रैडिशनल होने के कारण होती है.

बदल रही महिलाओं की सोच

महिलाओं की बात करें तो सलवारसूट पहनने की यह मानसिकता अब मध्यम आयु वर्ग की महिलाओं में अधिक लोकप्रिय है. पहले अधेड़ उम्र की महिलाएं साड़ी पहनने के लिए जानी जाती थीं. सलवारकमीज भी पहनावे का हिस्सा हो गया है. 35-50 साल की महिलाएं सलवार सूट में घूमते हुए देखी जा सकती थी. पहले सलवार सूट पहनने से मना किया जाता था. अब वैस्टर्न ड्रैस की जगह पर सलवारसूट को स्थान दे दिया गया है. पार्टी में अभी भी साड़ी ही सब से ऊपर ट्रैंड कर रही है. फेस्टिवल और शादी साड़ियों के साथ पहना जाने वाला ब्लाउज अलग स्टाइल का हो सकता है.

अब उत्तर भारत की साड़ी पर राजस्थानी लंहगा वाली साड़ी हावी है. पहले दुलहन को शादी में बनारसी साड़ी पहननी जरूरी होती थी और यह साड़ी पीढ़ियों तक चलती थी. सास अपनी बहू को देती थी. अब लंहगाचोली पहना जाने लगा है. इस में भी राजपूताने वाली ट्रेडिशनल लुक सब से प्रमुख होती है. इस में धर्म और संस्कृति का प्रभाव दिखता है. भले ही फैशन की दुनिया में साड़ी को सब से सैक्सी पोशाक माना जाता हो पर इस का धार्मिक महत्व भी कम नहीं है.

पहनावे पर हावी कट्टरपन

इसी लिए लड़कियों में सलवारसूट और महिलाओं में साड़ी का पहनावा बढ़ रहा है. इस में भी कलर और स्टाइल की बात करें तो ट्रेडिशनल स्टाइल सब से आगे है. पिछले 15-20 सालों में जैसेजैसे समाज, राजनीति और विचार पर हिंदुत्व ने कब्जा करना शुरू किया यह बदलाव आने लगा है. पोशआक और पहनावे को ले कर कट्टरपन समाज में दिखने लगा है.

मंदिरों और ऐतिहासिक इमारतों में जहां मस्जिद और मकबरे हैं वहां पहनावे कोड लागू है. जैसे वहां जाने के लिए पूरा तन ढके कपड़े हों. सिर ढका हो. स्कूल और कालेजों में भी यह दिखने लगा है.

आज के 20-25 साल पहले बहुत कम स्कूलों में लड़कियां बुरका पहन कर जाती थीं. आज कान्वैंट और मिशनरी स्कूलों में भी लड़कियां हिजाब पहन कर जा रही हैं. पहले मुसलिम महिलाएं केवल काले रंग के बुरके में ही दिखती थीं आज बुरके के साथ ही साथ तरहतरह के हिजाब भी पहने जाने लगे हैं. इन सब को ले कर तमाम तरह के विवाद भी होने लगे हैं. हर धर्म में उस की संस्कृति यानि कल्चर का प्रभाव दिखने लगा है.

हिंदुओं में यह और भी अधिक दिखने लगा है. जिस का प्रभाव हमारी शिक्षा और घर के रहनसहन पर पड़ने लगा है.

इन वजहों से खर्चे बढ़ गए हैं. ट्रेडिशनल कपड़ों में पोशाकों पर खर्च अधिक होता है. इस के साथ ही साथ उस से मैचिंग ज्वैलरी का भी खर्च है. इस की सब से बडी परेशानी हमारी सोच है. हम नौकरी पर जा रही बहू या बेटी से यह उम्मीद करने लगे हैं कि वह मौडर्न या कहे तो वैस्टर्न ड्रैस पहन कर न जाए. ऐसे में शादी के बाद औफिस जाते समय सलवार कुर्ता या साड़ी का प्रयोग करना पड़ता है. कई घरों में यह झगड़ों की शुरूआत होती है. यह कई बार व्यवहारिक भी नहीं होता है.

असल में इस तरह के पहनावे से हमारी सोच और विचारधारा दिखती है. यह एक बड़ा उदाहरण है कि राजनीति और विचार किस तरह से हमारे घर के अंदर तक दखल देने लगे हैं. इस के पीछे धर्म, ब्राहमणवाद और रूढ़िवादी विचार हैं. जिस को फैलाने का काम मंदिरों से होता है. जब कानून नहीं था तब धर्म के कानून ही जीवन को चलाते थे. मंदिर और ब्राहमण जो कहता था राजा उस की मानता था. राजा के सहारे धर्म अपना राज चलाता था.

आज के दौर में यही हो रहा है. हिंदुत्व को आगे कर के नेता अपना राज चला रहे हैं. मंदिर फलतेफूलते रहें उन को चढ़ावा आता रहे इस के लिए घर, त्योहार, इवैंट हर जगह उस का प्रभाव बनाया जाता है. मंदिरों में ड्रैस कोड हो गया. फेस्टिवल में ड्रेस कोड हो गया ऐसे में हमारा फैशन और पहनावा बदल गया है.

यही नहीं घर का खानपान भी बदल गया है. जो लोग शाकाहारी नहीं है वह दिन देख कर ही नानवेज खाते हैं. शादीविवाह की दावतों में भी अब शाकाहारी का चलन बढ़ गया है. धर्म और कट्टरपन हमारे खाने और पहनने तक को प्रभावित करने लगा है. जो आज की राजनीति और विचारों से ग्रसित है.

Raid 2 : अजय देवगन की नैय्या पार होगी ?

Raid 2 : महीने की शुरुआत में अजय देवगन की फिल्म ‘रेड 2’ रिलीज हुई. मगर जैसी उम्मीद इस फिल्म से थी वैसा कमाल यह फिल्म दिखा नहीं पाई.

पिछले लंबे समय से अभिनेता अजय देवगन की फिल्में बौक्स औफिस पर लगातार फ्लौप होती रही हैं, लेकिन एक मई को रिलीज हुई उन की फिल्म ‘रेड 2’ का ट्रेलर देख कर काफी उम्मीदें बंधी थी, पर अफसोस फिल्म उन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती नजर आई. इस के बावजूद महाराष्ट्र दिन और मजदूर दिवस की छुट्टी के चलते एक मई को पहले दिन ‘रेड 2’ ने बौक्स औफिस पर 19.5 करोड़ रुपए एकत्र किए जो अजय देवगन के खुश होने का एक कारण बन गई.

क्योंकि लंबे समय से अजय देवगन की कोई भी फिल्म पहले दिन डबल डिजिट की ओपनिंग नहीं ले रही थी, पर ‘रेड 2’ ने डबल डिजिट में वह भी 19.5 करोड़ रुपए की ओपनिंग ली. इस अनुपात में देखा जाए तो फिल्म ‘रेड 2’ को 8 दिन के बढ़े हुए सप्ताह में करीबन 150 करोड़ रुपए बौक्स औफिस पर एकत्र कर लेना चाहिए था, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

16 मार्च 2018 को राजकुमार गुप्ता निर्देशित फिल्म ‘रेड’ रिलीज हुई थी, इस में अजय देवगन की ही मुख्य भूमिका थी. तब 40 करोड़ की लागत में बनी फिल्म ‘रेड’ ने 153 करोड़ से अधिक कमाए थे. 2018 में अजय देवगन की निजी मल्टीप्लैक्स चैन नहीं थी.

अब 7 साल बाद उसी फिल्म का सिक्वल ‘रेड 2’ एक मई 2025, गुरूवार के दिन रिलीज हुई. इस का निर्माण टीसीरीज के साथ ही अजय देवगन के बिजनेस मैनेजर कुमार मंगत पाठक ने किया है. फिल्म में अजय देवगन के साथ वाणी कपूर, रितेश देशमुख, सौरभ शुक्ला जैसे कलाकार हैं.

निर्माता फिल्म का बजट बताने को तैयार नही हैं. मगर कलाकारों की फौज को देखते हुए फिल्म का बजट 150 करोड़ रुपए होना चाहिए. इस रकम को वसूल करने के लिए फिल्म को बौक्स औफिस पर करीबन 400 करोड़ रुपए कमाने चाहिए.

लेकिन फिल्म को अच्छे रिव्यू नहीं मिले, कई अच्छे रिव्यूअर ने फिल्म की काफी आलोचना की. जिन लोगों ने 2018 में रिलीज फिल्म ‘रेड’ नहीं देखी है, उन्हें तो यह फिल्म पसंद आएगी, पर जिन्होंने ‘रेड’ देखी हुई है, उन्हें ‘रेड 2’ में कुछ भी नया नहीं मिला.

जब पहले दिन फिल्म ने 19.5 करोड़ बौक्स औफिस पर एकत्र किए थे, तब भी निर्माता पर कौरपोरेट बुकिंग, टिकटें खरीदने के साथ ही फर्जी शो रखने के आरोप लगे थे. अजय देगवन ने अपने सभी मल्टीप्लैक्स तो हाउसफुल दिखाए. निर्माताओं ने आरोपों का खंडन भी नहीं किया.

सकनिल्क के अनुसार पूरे 8 दिन के एक्सटैंडेड सप्ताह में ‘रेड 2’ ने महज 96 करोड़ रूपए बौक्स औफिस पर एकत्र किए. सही आंकड़ें क्या हैं, यह निर्माता के अलावा किसी को नहीं पता. मगर यह आंकड़े भी फिल्म को सफल नहीं बताते. सिर्फ अजय देवगन के लिए खुश होने की बात हो सकती है कि पिछली फिल्मों के मुकाबले इस फिल्म में स्थिति कुछ तो बेहतर हुई है.

मजेदार बात यह है कि इसी बीच सिनेमाघरों की संख्या बढ़ाने की आमिर खान व शाहरुख खान की मांग तथा नैटफ्लिक्स के सीईओ द्वारा सिनेमाघर खत्म करने की मांग के बीच आमिर खान ने ऐलान किया है कि वह अपनी फिल्म ‘सितारे जमीन पर’ को सिनेमाघर में रिलीज करेंगे, पर ओटीटी को नहीं देंगे और दो माह बाद वह फिल्म को यूट्यूब पर रिलीज करेंगे.

उधर दिनेश वीजन की फिल्म ‘भूल चूक माफ’ 9 मई को सिनेमाघरों में रिलीज होनी थी, पर जब फिल्म की एडवांस बुकिंग 50 लाख रुपए भी नहीं हुई तो दिनेश वीजन ने एक दिन पहले ऐलान कर दिया कि वह फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज नहीं करेंगे.

अब ‘भूल चूक माफ’ 16 मई से अमेजन पर स्ट्रीम होगी, तो फिल्मों के कंटैंट को सुधारने की दिशा में काम करने की बजाय अलग तरह की जोड़तोड़ निर्माताओं के बीच शुरू हो गई है. यह हालात बता रहे हैं कि सभी फिल्मकार भारतीय सिनेमा को बरबाद करने पर आमादा हैं.

Gold Loan : गिद्ध नजर औरतों के गहनों पर

Gold Loan : बैंक और फाइनैंस कंपनियां गोल्ड लोन के मीठे जाल में फंसा कर महिलाओं के गहने हड़प रहे हैं. यह दरअसल महिलाओं की सारी जमापूंजी को छीन लेने की एक सोचीसमझी साजिश है. जानिए गहनों को निगलने के लिए कैसे एकतरफा नियम है.

फिल्म ‘मदर इंडिया’ देखने वाली पीढ़ी को याद होगा कि कैसे राधा ने अपने बेटे शामू की शादी का खर्च पूरा करने के लिए अपने सोने के कंगन साहूकार सुखी लाला के पास गिरवी रखे थे. हर माह सूद वसूलने के बाद भी सुखी लाला की नीयत उन सोने के कंगनों पर खराब हो गई थी. वह राधा के कंगन हड़प लेने के चक्कर में था, तभी राधा का बेटा बिरजू सुखी लाला के पास से वे कंगन चुरा लाता है. मगर चोरी का इलजाम लगने के बाद बिरजू को गांव से बाहर निकाल दिया जाता है और बिरजू डाकू बन जाता है.

उस डाकू को गोली मारने को महिमामंडित करने के लिए ‘मदर इंडिया’ बनाई गई ताकि जनता को संदेश मिले कि गिरवी रखे गहने तो हमेशा के लिए चले जाते हैं. यह महानता का काम नहीं था, यह कोरा षड्यंत्र था अमीर साहूकारों का धंधा बनाए रखने का.

सच तो यह है कि डाकू बिरजू नहीं, बल्कि वह साहूकार सुखी लाला था जिस की नीयत राधा के कंगनों पर खराब हो गई थी और सूद की रकम पाने के बाद भी उन्हें वह लौटाना नहीं चाहता था.

सोने के प्रति दशकों पहले का लालच आज भी ज्यों का त्यों है. आज तमाम सरकारी और गैरसरकारी बैंक व प्राइवेट बैंकिंग वित्तीय संस्थान साहूकार सुखी लाला की भूमिका में हैं जिन की गिद्ध नजरें औरतों के सोने पर टिकी रहती हैं, जिसे अपने पास गिरवी रखने के लिए पहले तो वे खूब चिकनीचुपड़ी बातें कर ग्राहकों को फांस लेते हैं और फिर पहला मौका मिलते ही वे उस सोने को हड़प जाते हैं. सरकार पूरी तरह इन संस्थानों के साथ है, जनता का सोना हड़पने की तमाम कोशिशें जारी हैं.

इस साजिश के पीछे अमीरों के बैंक और उन में काम कर रहे कर्मचारी जुटे हुए हैं. ऐसी खबरें आएदिन अखबारों की सुर्खियों में रहती हैं जब बैंक में अपने घर का सोना गिरवी रखने के बाद ग्राहक बैंक द्वारा ठगा जाता है.

अभी 3 अप्रैल, 2025 की न्यूज है जब रायचूर पुलिस में एक कम्प्लैंट हुबली के विद्यानगर में बैंक औफ महाराष्ट्र के जोनल अधिकारी सुजीत डिसूजा ने रायचूर में गांधी चौक के पास बैंक औफ महाराष्ट्र शाखा के प्रबंधक के नरेंद्र रेड्डी के खिलाफ दर्ज करवाई. नरेंद्र रेड्डी गोल्ड लोन में हेरफेर कर बैंक का 10.9 करोड़ रुपया ले कर फरार हो गया था.

कितना सुरक्षित आप का सोना

11 जनवरी, 2025 को पाली जिले में धनवर्षा गोल्ड लोन ब्रांच, जिस में कुछ लोगों ने अपना सोना गिरवी रखा हुआ था, के लौकर से असली सोने के गहने निकाल कर नकली जेवर रख दिए गए. जो सोना बैंककर्मियों ने गायब किया उस की कीमत 1.25 करोड़ रुपए के लगभग थी. पीडि़त चांदनी गहलोत, हितेश टांक, सत्यनारायण टांक, किशन लाल, इशिता गहलोत, अमरचंद इस घटना के बाद से सकते में हैं. अब बैंक भी नहीं बता रहा कि उन का सोना उन्हें वापस मिलेगा भी या नहीं. पुलिस में केस दर्ज हो चुका है. पुलिस कछुए की गति से काम कर रही है.

12 दिसंबर, 2024 को दिल्ली के नजदीक नोएडा में गोल्ड लोन देने वाली कंपनी की मैनेजर ने ही करोड़ों का सोना गायब कर दिया. मामला थाना सैक्टर 20 में दर्ज हुआ है. क्षेत्र के सैक्टर 18 स्थित एक गोल्ड लोन उपलब्ध कराने वाली कंपनी में कार्य करने वाली महिला मैनेजर के खिलाफ एफआईआर हुई है, जिस ने करोड़ों रुपए के सोने के जेवरात की धोखाधड़ी कर ली. इस मामले में सहायक ब्रांच मैनेजर ने थाना सैक्टर 20 में मुकदमा दर्ज करवाया है.

मैनेजर का कहना है कि सैक्टर 18 स्थित उन की ब्रांच से कुछ दिनों पहले 15 लाख रुपए का गोल्ड लोन का पैकेट उन के यहां काम करने वाली ब्रांच मैनेजर ने चुरा लिया. ब्रांच मैनेजर अपने कपड़ों में पैकेट छिपाती हुई सीसीटीवी कैमरे में कैद हुई है.

15 दिसंबर, 2024 को रोहतक, हरियाणा के एक बैंक का मैनेजर डेढ़ करोड़ रुपए का सोना ले कर चंपत हो गया. परेशान ग्राहक आज भी बैंक के चक्कर काट रहे हैं. रोहतक के भिवानी चुंगी पर एक निजी बैंक की ब्रांच है, जो लोगों का सोना गिरवी रख कर लोन देती है. बैंक मैनेजर 11 दिसंबर को सुबह 14 पैकेट सोना व 12 दिसंबर को सुबह 10 बजे 11 पैकेट सोना ले कर बैंक से गायब हो गया. कर्मचारियों को जब शक हुआ तो उन्होंने उच्च अधिकारियों को इस की जानकारी दी.

इस के बाद उच्च अधिकारियों ने बैंक के सभी सीसीटीवी फुटेज खंगाले, जिस में बैंक मैनेजर सभी पैकेट ले जाता हुआ दिखाई दिया. जिस समय मैनेजर यह पैकेट ले कर जा रहा था उस वक्त अन्य कर्मचारी भी बैंक में मौजूद थे, लेकिन किसी को भी शक न हुआ और मैनेजर मौके से सोना ले कर फरार हो गया. इस सोने की कीमत डेढ़ करोड़ रुपए से अधिक थी.

बैंकों के कर्मचारियों को पहले इस रिपोर्ट में लिया गया है क्योंकि यही ग्राहकों को दिखते हैं. भारतीय रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय और बैंकों के बोर्डों में बैठे जो लोग भारीभरकम डौक्यूमैंट बनाते हैं वे किसीकिसी को दिखते हैं पर असली सुखी लाला वे ही हैं.

सोने पर किसी की भी नीयत खराब होते देर नहीं लगती. बैंक के लौकर में आप का सोना कितना सुरक्षित है, इस का अंदाजा इन खबरों से आसानी से लगाया जा सकता है. ये तो चोरी की वारदातें हैं जो आएदिन बैंकों में घट रही हैं. इस के अलावा आप का सोना वित्तीय संस्थानों के नियमों के तहत भी हड़प लिया जाता है. सोने का बाजार जितना तेजी से ऊपर चढ़ रहा है, उस के मुकाबले अन्य सभी व्यापार फीके हैं.

मोदी सरकार ने पहले नोटबंदी कर आप, खासकर, गृहिणियों की बचत का सारा नकद पैसा बाहर निकलवा लिया. उन्हें बैंकों में जमा करवा लिया. इस में से बहुत सा पैसा कमीशन एजेंटों ने उड़ा डाला जिन्होंने आधी रात की डकैती को जामा पहनाया था.

अब तमाम बैंक और वित्तीय संस्थान गृहिणियों के गहने भी निकलवाने की जुगत में हैं. उन के द्वारा जो गोल्ड लोन के बड़ेबड़े विज्ञापन दिए जा रहे हैं उन से ऐसा मैसेज जा रहा है जैसे आप का सोना आप की अलमारी में या लौकर में रखारखा सड़ रहा है. हर बैंक के बाहर गेटनुमा विज्ञापन लगे हैं कि गोल्ड लोन लो, मानो वहां मुफ्त खाने का लंगर लगा हो.

नए जमाने के महाजन

आरबीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश की सरकार के अपने कुल स्वर्ण भंडार में से करीब 414 मीट्रिक टन सोना विदेशी तिजोरियों में रखा हुआ है. मार्च 2024 के अंत तक आरबीआई के पास 822.1 टन सोना था. इस सोने का 413.8 टन हिस्सा विदेशी वौल्टों में रखा था. सोना व्यापार, सुरक्षा और अन्य वित्तीय कारणों से विदेश में रखा जाता है. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण अनेक विदेशी बैंकों ने रूस को अपने यहां जमा सोने को निकालने पर प्रतिबंध लगा दिए थे, जिस से दूसरे कई देश चिंतित हैं.

हाल ही में आरबीआई 100 टन सोना ब्रिटेन से वापस लाया है. दुनियाभर में युद्ध और मंदी की बढ़ती आशंकाओं के बीच आरबीआई अपने स्वर्ण भंडार को भारत में स्थानांतरित करने की योजना बना रहा है. दूसरी तरफ देश के सरकारी व गैरसरकारी बैंक और फाइनैंस कंपनियां भारत के घरों में रखे गृहिणियों के जेवरों को भी बाहर निकालने के लिए गोल्ड लोन जैसे औफर्स का खूब प्रचारप्रसार कर रहे हैं.

सरकारी अधिकारियों की देखरेख में सोना कितना सुरक्षित है, इस की गारंटी कौन सा वित्त मंत्री, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रिजर्व बैंक ले सकता है. जहां भी सोना रखा है वहां दोचार लोगों को ही पता है कि कितना सोना हिसाब में लिखा है और वास्तव में वौल्ट में (तिजोरी में) कितना है. कुछ सौ किलो सोने की हेराफेरी कर डाली जाए तो पीढि़यों तक हिसाब नहीं मिलाया जा सकता.

जमीन और सोना ऐसी चीजें हैं जिन के दाम समय के साथ बढ़ रहे हैं. पुराने समय में लोग जरूरत पड़ने पर अपनी जमीन महाजन या गांव के अमीर किसान के पास गिरवी रख कर पैसा उधार उठाते थे. जमीन पर चूंकि हमेशा से पुरुष अपना अधिकार मानता रहा है तो उस को बेचने या गिरवी रखने के लिए वह अपनी पत्नी या घर की किसी अन्य महिला से पूछने या मांगने की जरूरत नहीं सम झता था. लेकिन जिन के पास जमीन नहीं होती थी या जो जमीन गिरवी नहीं रखना चाहते थे, वे पत्नी के गहने गिरवी रखते थे जिस के लिए उन्हें पत्नी से बड़ी मानमनौअल करनी पड़ती थी.

सोना ऐसी चीज है जिस पर औरत का हक ज्यादा होता है. गहने औरत की संपत्ति भी हैं और उस का लालच भी. औरत के पास उस के गहनों के अलावा और कुछ भी ऐसा नहीं होता जो उसे आर्थिक रूप से मजबूत करता हो. उस के गहनों के साथ उस का भावनात्मक जुड़ाव भी होता है. जैसे, जो गहने उस को मायके से मिले होते हैं उन्हें वह जीवनभर अपने से अलग नहीं करना चाहती है. उन गहनों को खुद से अलग करना उस के लिए जान दे देने जैसा होता है.

घर पर कोई आर्थिक मुसीबत आने पर पुरुष जब स्त्री से उस के गहने मांगता है तो वह क्षण स्त्री के लिए बड़ा कष्टकारी होता है पर यह आश्वासन मिलने पर कि उस के गहने सिर्फ गिरवी रखे जाएंगे और अगली फसल पर पैसा आने, तनख्वाह मिलने या अन्य किसी स्रोत से पैसे जमा होने पर छुड़वा लेंगे तो स्त्री अपने गहने देने को तैयार हो जाती है. औरतों को महाजनों पर भरोसा कम होता है क्योंकि वे उन की चालाकी सम झती हैं जैसे बिरजू सुखी लाला की चालाकी सम झता था पर अपनी मां के हाथों मारा गया.

महाजन के पास गहने गिरवी रखने के बाद हर महीने उस का सूद चुकाना पड़ता था. कई बार ऐसा होता कि गांवदेहातों में अगली फसल खराब हो जाने पर, सूखा पड़ने या बाढ़ में फसल नष्ट होने पर यदि किसान सूद नहीं दे पाता था तो उस की जमीन या सोना महाजन हड़प जाता था. ऐसे में अधिकांश लोग गिरवी रखे अपने गहने और जमीन गंवा ही देते थे.

आज भी दूरदराज के गांवों में सूदखोर महाजन बैठे हैं. कई तो ऐसे हैं जो 12 से 24 फीसदी ब्याज पर जरूरतमंद व्यक्ति का सोना अपने पास गिरवी रखते हैं और फिर उस सोने को बैंक में 9 फीसदी ब्याज पर रख कर गोल्ड लोन उठा लेते हैं. यानी 3 से 15 फीसदी का मुनाफा कमाते हैं.

हालांकि अब ज्यादातर महाजनों और अमीर किसानों की जगह सरकारी व गैरसरकारी बैंकों, कोऔपरेटिव सोसाइटियों, नौन बैंकिंग फाइनैंस कंपनियों ने ले ली है. जो पहले तो खूब मीठीमीठी लुभावनी बातें कर के लोगों को उन के सोने के जेवर गिरवी रख कर लोन लेने के लिए रि झाते हैं और जरा सी गलती होने या किस्त चुकाने में देरी होने पर सोना हड़प कर जाते हैं.

औरतें सरकार और एयरकंडीशंड दफ्तरों में खुली गोल्ड लोन की दुकानों पर आसानी से भरोसा कर लेती हैं. वहां महाजन से ज्यादा खातिर की जाती है. मनचाही चायकौफी पिलाई जाती है. ‘अपनों जैसा’ व्यवहार गोल्ड दे कर लोन लेते समय किया जाता है.

आजकल गोल्ड लोन के इस तरह के इश्तिहारों से अखबारों के पन्ने रंगे नजर आ रहे हैं, टीवी चैनलों पर गोल्ड लोन के विज्ञापन छाए हुए हैं, सड़कों पर बड़ीबड़ी होर्डिंग्स में सस्ते गोल्ड लोन का लालच परोसा जा रहा है. दुकानों, बाजारों, बसअड्डों, मैट्रो स्टेशनों, रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों पर गोल्ड लोन, गोल्ड लोन की चीखचील्लाहट मची है.

बौलीवुड के नामीगिरामी ऐक्टर गोल्ड लोन का प्रचार करते नजर आ रहे हैं. अक्षय कुमार मणप्पुरम गोल्ड लोन का प्रचार करते हुए कहते हैं, ‘आप के पास सोने की ताकत है तो पर्सनल या बिजनैस लोन क्यों लें, अपने सोने के बदले मिनटों में लोन पाएं.’

फिर वे कहते हैं, ‘अपने सोने के आभूषण गिरवी रख कर तुरंत नकद प्राप्त करें. गोल्ड लोन सब को मिलेगा अब घर बैठे.’

विज्ञापन कुछ ऐसे रि झाते हैं कि ग्राहक को अपने हाथपैर हिलाने की भी जरूरत नहीं है. कंपनी खुद उस के घर पर आ कर उसे नकद पैसे दे जाएगी. आखिर कंपनी या बैंक इतने उदार हृदय के क्यों हो रहे हैं?

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन मुथूट फाइनैंस से गोल्ड लोन लेने के लिए लोगों को उकसा रहे हैं. विज्ञापनों में वे कहते हैं, ‘हाथी (मुथूट का लोगो) पर भरोसा करोगे तो पक्का जीतोगे.’ वे कहते हैं, ‘जब अपनों का साथ हो तभी होता है शुभारंभ. इसीलिए सिर्फ मुथूट फाइनैंस सदियों से देता आ रहा है हर नई शुरुआत में अपनों जैसा भरोसा.’ चायकौफी भी मनपसंद की मिलेगी.

यानी अमिताभ बच्चन कंपनी की तरफ ग्राहक का भरोसा जगा रहे हैं. मुथूट के लिए शाहरुख खान भी प्रचार कर रहे हैं, कह रहे हैं, ‘बुक माई गोल्ड लोन. फर्स्ट टाइम इन इंडिया.’ एक अन्य विज्ञापन कहता है, ‘पर्सनल लोन के मुकाबले गोल्ड लोन लेना ज्यादा आसान.’

आखिर एकाएक ऐसा क्या हो गया कि दुनियाभर के बैंक और कंपनियों की नजरें आप की अलमारी में रखे जेवरों पर गड़ गई हैं? जिन जेवरों को औरतें पीढ़ीदरपीढ़ी सहेजती आ रही हैं, जिन जेवरों से उन के खानदान की पहचान है, उस का गर्व है, जिन गहनों से उन का गहरा भावनात्मक जुड़ाव है, तमाम कंपनियां और बैंक उन्हें आप की अलमारी और लौकर से क्यों निकाल लेने पर उतारू हैं?

दरअसल, जिस तेजी से सोने के दाम बढ़ रहे हैं उस को देखते हुए ही आज दुनियाभर के सरकारी और गैरसरकारी बैंक, साहूकार, कोऔपरेटिव गोल्ड लोन के क्षेत्र में उतर आए हैं. माना जा रहा है कि 6 माह बीततेबीतते सोना डेढ़ लाख रुपए प्रति 10 ग्राम तक पहुंच सकता है. लिहाजा, इस समय पूरी कोशिश इस बात की हो रही है कि किसी तरह भारत की गृहिणी से उस का वह सोना बाहर निकलवाया जाए जो उस ने बरसों की मेहनत से जोड़जोड़ कर एकएक गहने के रूप में संजोया हुआ है.

औरतों के गहनों पर नजर

मुथूट ग्रुप के संयुक्त प्रबंध निदेशक अलेक्जैंडर जौर्ज मुथूट कहते हैं, ‘‘भारत में घरेलू आभूषणों के रूप में +25,000 टन सोना उपलब्ध है और इस का 5 फीसदी से भी कम सोने के ऋण के माध्यम से मुद्रीकृत किया जाता है. विकास की गुंजाइश बहुत अधिक है. मु झे विश्वास है कि हमारी नई गोल्ड लोन श्रेणी हमारी आर्थिक स्थिति को और मजबूत करेगी.’’

असल में यह सोना देश को नहीं, कंपनियों को और खर्चीली सरकार को मजबूत कर रहा है. असली सोना तो मंदिरों में भरा है पर किसी की हिम्मत है कि कहे कि सरकार इसे छीन ले. वक्फ एक्ट समर्थन करने वालों के मुंह पर मंदिरों के सोने के भंडार पर सोने के ताले लगे हैं.

रुद्र प्रताप एक छोटा सा अखबार निकालते हैं. उन की पत्नी एक छोटी सरकारी नौकरी में है. दोनों के 3 बच्चे हैं. 2 बेटियां और एक बेटा. रुद्र को उन के अखबार में कभीकभार ही विज्ञापन मिलते हैं जिस से अखबार का संचालन होता है. घर पत्नी की सैलरी से चलता है. फिर भी तीनों बच्चों की शादियां उन्होंने खूब धूमधाम से कीं.

वह इस कारण क्योंकि रुद्र प्रताप के पास उन के खानदान का पुराना सोना काफी मात्रा में था. 3 बच्चों की शादियां उन्होंने उसी सोने के कुछ हिस्से को बेच कर कीं.

सोने के बढ़ते दामों पर बातचीत करते हुए रुद्र बताते हैं कि जब उन्होंने 2009 में बड़ी बेटी की शादी की थी उस वक्त सोना करीब 15,000 रुपए प्रति 10 ग्राम था. 5 साल बाद जब दूसरी बेटी की शादी की तब सोने की कीमत दोगुनी हो गई यानी करीब 30,000 रुपए प्रति 10 ग्राम और एक साल पहले जब उन्होंने बेटे की शादी की तो सोने का दाम 60,000 रुपए प्रति 10 ग्राम पहुंच गया था जो अब 1 साल 2 महीने में बढ़ कर 1 लाख के करीब प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया है. सोने के दाम हर दिन ऊपर चढ़ रहे हैं.

अब तो धीरेधीरे चांदी के दामों में भी वृद्धि हो रही है. चांदी का इस्तेमाल अनेक प्रकार के गैजेट्स बनाने में भी होता है. चीन में चांदी की काफी खपत है. हैरानी नहीं होनी चाहिए यदि कुछ ही दिनों में सिल्वर लोन का शोर भी कानों में पड़ने लगे और महिलाओं के चांदी के गहने भी अलमारियों से निकल कर बैंकों में जमा हो जाएं.

वर्तमान समय में लोगों के जीवन स्तर और पैसा खर्च करने की प्रवृत्ति में बेतहाशा वृद्धि हुई है. कोरोना महामारी के बाद तो लोगों का जैसे जीवन पर से भरोसा ही उठ गया है. पता नहीं कब मौत आ जाए तो जितनी ख्वाहिशें हैं उन्हें अभी पूरी कर लो. बुढ़ापे के लिए बचा के रखने का कोई फायदा नहीं है. कुछ ऐसी मानसिकता लोगों पर हावी हो गई है.

बाजार ने भी इस मानसिकता को पकड़ लिया है और उस ने ऐश से जीवन जीने के लालच को बढ़ाया है. अब 18 साल का होने पर एक किशोर अपने मांबाप से साइकिल नहीं, सीधे बाइक की फरमाइश करता है. अमीर घर का हो तो सीधे कार की डिमांड होती है. मांबाप भी उसे बाइक या कार दिलाने में नानुकुर नहीं करते. आईफोन, कंप्यूटर, टेबलेट आदि सब तो अब आम हैं.

स्मार्टफोन अब सिर्फ शौक नहीं रहा बल्कि हर आदमी की जरूरत बन गया है. यहां तक कि बच्चों की भी. ऐसे में पुरुष अपनी सूखी सैलरी से परिवार की इच्छाएं पूरी नहीं कर सकता. जब वह गोल्ड लोन के बारे में सुनता है तो वह सोचता है कि बीवी के गहने जो बरसों से लौकर में पड़े हैं उन को बैंक में गिरवी रख कर लोन ही ले लो और किस्त चुकाते हुए एक निश्चित समयसीमा के बाद गहने वापस पा लो.

बैंक भी गोल्ड लोन के लिए बड़ी आकर्षक बातें कर के ग्राहक को लुभाते हैं, मगर असलियत तब खुलती है जब ब्याज के पैसों के साथसाथ व्यक्ति बीवी के गहने भी गंवा देता है.

नियम व शर्तों की पेचीदगियां

दरअसल गोल्ड लोन लेने की बातें जितनी सहज और आकर्षक लगती हैं, असलियत में वे उतनी ही भ्रामक, उल झी हुई और धोखाधड़ी से भरी हुई हैं.

कोई भी बैंक या उस का एजेंट ग्राहक को पूरी बातें या असलियत नहीं बताता है. आधीअधूरी जानकारी दे कर ग्राहक का सोना गिरवी रखवा लिया जाता है और बाद में जरा सी गलती होने पर बैंक ग्राहक का पूरा सोना हड़प कर जाता है. यानी पुरखों की सारी जमापूंजी और एक गृहिणी की संपत्ति एक झटके में हाथ से निकल जाती है. जब आप बैंक के खिलाफ ऐक्शन लेने की बात सोचते हैं तो बैंक कहता है कि आप ने खुद सारे टर्म्स एंड कंडीशन पर हस्ताक्षर किए हुए हैं.

जब आप गोल्ड लोन लेने के लिए किसी बैंक में जाते हैं तो वे आप के सामने 12 से 15 पेज के दस्तावेज रख देते हैं जो इंग्लिश में होते हैं और उन में जो कुछ बड़ी घुमावदार भाषा में लिखा होता है उसे उच्च इंग्लिश शिक्षा प्राप्त व्यक्ति भी ठीक से सम झ नहीं पाता. सो, एक कम शिक्षित आम व्यक्ति के लिए उस दस्तावेज को पढ़नासम झना कितना मुश्किल है, इसे आसानी से सम झा जा सकता है. आम आदमी तो उस एजेंट की बातों को ही सत्य सम झ कर उस के द्वारा दिए दस्तावेज पर उनउन जगहों पर हस्ताक्षर करता चला जाता है जहांजहां वह करने को कहता है.

व्यक्ति को लगता है कि बैंक कितना उदार है जो इतनी आसानी से मु झे लोन दे रहा है, बैंक का एजेंट खुद चल कर घर तक आया है, खुद सारा फौर्म भर रहा है पर उस को झटका तब लगता है जब सोना वापस करने का समय आने पर बैंक उसे उस की कोई न कोई गलती बता कर उस का सारा सोना हड़प कर जाता है.

क्या हो जब कर्ज न चुके

दरअसल प्रचार की आकर्षक बातों को किनारे रख कर यदि गोल्ड लोन की शर्तों पर ध्यान दें तो यहां भी कर्ज वाला नियम ही लागू होता है और इस नियम के अनुसार यदि आप समय से कर्ज नहीं चुका पाते हैं तो वित्तीय संस्थान को आप का सोना बेचने का हक है.

लोन चुकाने में देरी होने पर बैंक सोने की नीलामी कर सकता है. इस के लिए आएदिन अखबार के किसी कोने में छोटेछोटे अक्षरों में नीलामी की खबर दिखती होगी. आमतौर पर लोग इन खबरों को नहीं पढ़ते जिन में अमुक व्यक्ति का नाम, एड्रैस वगैरह लिखा जाता है कि चूंकि अमुक व्यक्ति ने लोन की किस्त समय से नहीं चुकाई, लिहाजा, तय शर्तों के अनुसार बैंक उस के सोने की नीलामी कर रहा है. कई बार तो ग्राहक को पता तक नहीं चलता और उस का सारा सोना नीलाम कर दिया जाता है.

लोन चुकाने में देरी होने पर आप का क्रैडिट स्कोर भी खराब हो जाता है और भविष्य में किसी अन्य प्रकार का लोन लेने में दिक्कत आती है. ये तमाम बातें कोई भी बैंक या बैंक का एजेंट ग्राहक को उस वक्त नहीं बताता है जिस वक्त वह उस को गोल्ड लोन के फायदे गिनवाते हुए फौर्म भरवा रहा होता है.

बैंक या बैंक का एजेंट गोल्ड लोन लेने वाले को यह भी नहीं बताता कि यदि सोने का भाव गिरता है तो आप को अतिरिक्त सोना गिरवी रखने के लिए भी कहा जा सकता है. सोने की कीमत में गिरावट आने पर बैंक ज्यादा सिक्योरिटी भी मांग सकता है या लोन की रकम कम कर सकता है. ऐसी अनेक बातें हैं जो 15 पेज के इंग्लिश में लिखे एग्रीमैंट फौर्म में घुमाफिरा कर लिखी होती हैं और उन पर वे आप के हस्ताक्षर ले लेते हैं कि आप को उन की सारी शर्तें मंजूर हैं. आप बिना फौर्म को पढ़े आंख मूंद कर हस्ताक्षर करते चले जाते हैं.

यह बात साफतौर पर सम झ लेनी चाहिए कि गोल्ड लोन का समय पर भुगतान करना बेहद जरूरी है. यदि आप समय पर भुगतान नहीं कर पाते तो लोन देने वाली संस्था आप के सोने को बेचने का अधिकार रखती है. सामान्यतया बैंक 3 महीने से 3 साल तक के लिए लोन देते हैं जबकि नौन बैंकिंग फाइनैंस कंपनी में यह अवधि अलग हो सकती है. इसलिए पहले से तय कर लें कि आप किस अवधि में लोन चुका सकते हैं और अपनी योजना के अनुसार ही लोन लें.

एक बात और सम झ लेनी चाहिए कि आप जितना सोना गिरवी रख रहे हैं उस का 75 फीसदी ही आप को लोन मिलेगा. यदि आप के जेवरों की कीमत एक लाख रुपए है तो आप को सिर्फ 75,000 रुपए ही लोन के रूप में मिलेंगे. सोने के बदले कर्ज लेने की दूसरी शर्त यह है कि जिस गोल्ड को आप गिरवी रख रहे हैं, वह कम से कम 18 कैरेट शुद्ध होना चाहिए.

सोने की शुद्धता की जांच बैंक खुद करता है मगर यह जांच वह आप के सामने नहीं करता. आम आदमी उस समय ज्यादा चूंचूं नहीं करता क्योंकि उस से कहा जाता है कि लोन चुकता करने के बाद यही जेवर उसे वापस मिल जाएंगे.

स्टेट बैंक औफ इंडिया 9 फीसदी से शुरू होने वाली ब्याज दरों पर 50 लाख रुपए तक का गोल्ड लोन प्रदान करता है. गोल्ड लोन की अवधि 3 साल तक हो सकती है (अगर ईएमआई में लोन का भुगतान किया जा रहा हो) और अगर बुलेट रीपेमैंट के जरिए लोन का भुगतान किया जा रहा है तो 3 महीने, 6 महीने और 12 महीने.

इन बातों के अलावा ऐसे कई खर्चे हैं जो बैंक शुरू में आप को नहीं बताते हैं. इन एक्स्ट्रा चार्जेज पर वे फौर्म भरते वक्त बात नहीं करते हैं जबकि गोल्ड लोन में भी दूसरे आम लोन की तरह प्रोसैसिंग फीस लगती है, जो बैंकों और नौन बैंकिंग फाइनैंस कंपनी के हिसाब से अलगअलग होती है. इस के अलावा प्रोसैसिंग फीस पर जीएसटी भी लगता है. लोन लेने के लिए प्रोसैसिंग फीस, वैल्यूएशन फीस, लौकर चार्ज, सर्विस चार्ज और एसएमएस चार्ज जैसे कई शुल्क लगते हैं जो एजेंट आप को नहीं बताता है.

बैंक या नौन बैंकिंग फाइनैंस कंपनी गहनों और सोने के सिक्कों के बदले ही लोन देते हैं. आप 50 ग्राम से ज्यादा वजन के सोने के सिक्के गिरवी नहीं रख सकते. वित्तीय संस्थान गोल्ड बार को भी गिरवी नहीं रखते हैं.

लूट नहीं तो क्या

तो, प्रचार की चमकदमक में गुमराह होने से बचें और सैलिब्रिटीज की लच्छेदार बातों में न आ कर गोल्ड लोन लेने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि आप इसे किस उद्देश्य के लिए ले रहे हैं और उस की किस्त आप समय से चुका पाएंगे या नहीं. आप की संपत्ति का उपयोग हमेशा गंभीर और अपरिहार्य परिस्थितियों में होना चाहिए. मामूली जरूरतों को पूरा करने के लिए या महल्ले वालों व रिश्तेदारों को अपनी शानोशौकत दिखाने के लिए अपनी संपत्ति गिरवी रखना सम झदारी नहीं है.

इस बात पर पूरा ध्यान दें कि आप के पास समय से किस्त चुकाने के साधन हैं या नहीं. समय पर भुगतान करना बेहद जरूरी है. यदि आप समय पर भुगतान नहीं कर पाते तो लोन देने वाली संस्था आप के सोने को बेचने का अधिकार रखती है. यह न सोचें कि आप का सोना उन के पास सुरक्षित है.

एक बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, जून 2024 में 6,696 करोड़ रुपए के दिए गए लोन के बदले सोने के जेवर औक्शन कर दिए गए क्योंकि उधार लेने वालों ने लोन चुकाया नहीं. यह पैसा छीना गया. अप्रैल 2024 से जून 2024 के 3 महीनों में 30 प्रतिशत लोन लेने वालों ने गहने नहीं छुड़ाए. बैंकों के लिए स्वर्णिम दिन हैं क्योंकि अब सोने की कीमत बढ़ गई है.

27 मार्च, 2025 को पश्चिम बंगाल के 24 परगना के स्टेट बैंक औफ इंडिया ने एक विज्ञापन जारी किया जिस में सईदा खातून के 22 कैरेट के 60 ग्राम सोने की 3 चूडि़यां नीलाम करने की सूचना थी. अब मई में सोने का दाम 1 लाख रुपए प्रति ग्राम है. सो, यह लूट नहीं है क्या, जो बैंकों ने मचाई है. अगर बैंक यह सोना औक्शन न करता तो ग्राहकों को लाभ ही लाभ होता.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें