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डिजिटल प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स पर लगा दिग्गजों का जमावड़ा

सिनेमा जगत में डिजिटल प्लेटफार्म के बढ़ते प्रभाव के साथ नई उभरती प्रतिभाओं और छोटे फिल्मकारों की उम्मीदें जगी थी कि वह सिनेमा में कुछ बेहतर रचनात्मक काम कर सकेंगे. इसी सोच के साथ नई प्रतिभाआें व छोटे फिल्मकारों ने डिजिटल प्लेटफार्म के लिए लघु फिल्में बनानी शुरू की थीं और फिर वह फीचर फिल्में बनाने का सपना चाहते थे.

मगर इन्हें पता ही नहीं चला और दिग्गज फिल्मकारों ने डिजिटल प्लेटफार्म के ‘नेटफिलक्स’ के साथ मिलकर अपनी खिचड़ी पका ली. जी हां! शुक्रवार की सुबह जब ‘नेटफ्लिक्स’ ने घोषणा की कि आठ भारतीय फिल्मकारों की फिल्में वह अपने प्लेटफार्म पर प्रसारित करने वाले हैं, तो छोटे फिल्मकारों के साथ साथ उभरती प्रतिभाओं की उम्मीदों पर तुषारापात हो गया.

‘‘नेटफ्लिक्स’’ ने शुक्रवार की सुबह घोषणा की है कि वह आठ भारतीय फिल्मकारों की फिल्में प्रसारित करने वाले हैं. ‘‘नेटफ्लिक्स’’ के कंटेट एक्जक्यूटिव सिमरन सेठी के अनुसार ‘नेटफिल्क्स’ पर लीना यादव की फिल्म ‘‘राजमा चावल’’ के अलावा ‘‘फायरब्रांड’’, ‘‘15 अगस्त’’ और ‘‘म्यूजिक टीचर’’ प्रसारित होने वाली हैं. जबकि ‘‘नेटफ्लिक्स’ पर अलग वर्ष देव पटेल की फिल्म ‘‘होटल मुंबई’’ के अलावा ‘‘चौपस्टिक्स’’, ‘‘बुलबुल’’, ‘‘अपस्टार्ट’’ और ‘‘कोबाल्ट ब्लू’ आएंगी.

अगले वर्ष ‘‘नेटफ्लिक्स’’ पर 17 मौलिक फिल्में प्रसारित होंगी, जिसमें से नौ मौलिक फिल्में भारतीय हैं. यह फिल्में खासतौर पर ‘‘नेटफ्लिक्स’’ के लिए बन रही हैं.

‘‘नेटफ्लिक्स’’ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रीड हौस्टिंग कहते हैं – ‘‘हम कहानियों पर पैसा खर्च करते हैं और हमने पूरे विश्व से कुछ सर्वश्रेष्ठ कहानियों का चयनकर लोगों से उन पर फिल्म बनाने के लिए कहा है. हम पूरे एशिया में भारत, कोरिया, जापान, सिंगापुर, इंडोनेशिया के सर्वश्रेष्ठ कहानी कहने वालों को चयनित किया है. जब हम कहानियां सुनाते हैं, तो रिश्ते बनते हैं.’’

‘‘नेटफ्लिक्स’’ के लिए भारतीय फिल्मकारों द्वारा बनाई जा रही अन्य फिल्में इस प्रकार हैंः

बाहुबली-बिफोर द बिगनिंग :
इसमें स्मरण साहू, मृणाल ठाकुर, राहुल बोस, अतुल कुलकर्णी और सुनील पलवल की मुख्य भूमिकाएं हैं.

लीलाः
प्रयाग अकबर के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म की निर्देशक दीपा मेहता और पटकथा लेखक उर्मी जुवेकर हैं. यह एक मां की व्यथा है, जिसे अपनी बेटी के भविष्य की चिंता है. हुमा कुरेशी और संजय सूरी जैसे कलाकारों के साथ फिलहाल इस फिल्म की शूटिंग दिल्ली में चल रही है.

टाइपराइटरः
सुजौय घोष निर्देशित यह फिल्म गोवा की पृष्ठभूमि पर हौरर व रोमांचक फिल्म है. यह कहानी गोवा के एक भूतिया मकान की है. कहानी के अनुसार जब एक परिवार गोवा के एक भूतिया मकान में रहने आता है,तो उसे स्कूल सहित दूसरी समस्याओं के साथ साथ भूत की मांग को भी पूरा करने लिए संघर्ष करना पड़ता है.

बदलाः
2016 की चर्चित स्पैनिश फिल्म ‘‘द मिस्टीरियस गेस्ट’’ का आधिकारिक हिंदी रीमेक ‘‘बदला’’ का निर्देशन सुज्वॉय घोष कर रहे हैं. इसमें अमिताभ बच्चन, तापसी पन्नू व अली फजल की मुख्य भूमिकाएं हैं. इस फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी है.

सेक्रेड गेम्स का दूसरा सीजनः
इसकी शूटिंग शुरू हो चुकी है.

विकास का दामन छोड़, धर्म की राजनीति पर चलती भाजपा

मायावती, अखिलेश की तर्ज पर चलते योगी आदित्यनाथ भी अपने वोट बैंक को खुश करने के लिये मूर्तियां, पार्क और नाम बदलने की राजनीति कर रहे है. ऐसा करने से पहले उनको इनकी हार से भी सबक लेना चाहिये. इन नेताओं की हार बताती है कि प्रदेश की जनता को दिखावे की राजनीति कभी पंसद नहीं आती है. बहुमत की सरकार अगले ही चुनाव मे ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती है. योगी सरकार का प्रदर्शन 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी की राह में बाध डाल सकता है.

उत्तर प्रदेश में नाम बदलने की राजनीति पुरानी है. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की आलोचना करने वाली भारतीय जनता पार्टी भी उसी राह पर चल रही है. योगी सरकार ने मुगलसराय से लेकर फैजाबाद तक के तमाम नाम बदल दिये हैं. इसके बाद भी इस समस्या का कोई छोर दिखाई नहीं पड रहा है. उत्तर प्रदेश की राजधनी लखनऊ सहित कई जिलों के नाम बदलने की मांग भी चल रही है.

संभव है कि योगी सरकार चुनाव सामने देख कुछ और शहरों के नाम भी बदल दें. असल में शहरों के नाम बदलने के पीछे की मंशा केवल अपने वोटबैंक को खुश रखने की होती है. इससे उस शहर की दशा पर कोई प्रभाव नहीं पडता. ऐसे बहुत से शहरों के उदाहरण सामने हैं.

राजनीतिक दल इस बहाने यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि अगर उनकी सरकार रही तो राजतंत्र की तरह वह कोई भी फैसला ले सकते हैं. जिस तरह से मायावती और अखिलेश मूर्तियां, पार्क और जिलों के नाम बदलने में लगे थे अब वही काम योगी सरकार कर रही है. योगी सरकार को देखना चाहिये कि पार्क और मूर्तियां बनवाने के बाद भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती हाशिये पर चली गई. भाजपा की राम मंदिर राजनीति भी इस प्रदेश के लोगों ने पंसद नहीं की थी. 1992 में आयोध्या में विवादित ढांचा ढहने के बाद 2017 तक भाजपा बहुमत की सरकार बनाने से दूर रही थी. प्रदेश की जनता ने राम मंदिर की राजनीति को नकार दिया था. ऐसे में फिर से राम मंदिर की राजनीति भाजपा को राजनीति से कहीं बाहर न कर दे यह सोचना चाहिये.

सफल नहीं होती मूर्ति, पार्क और नाम की राजनीति :

उत्तर प्रदेश के इतिहास को देखें तो 1990 के बाद से यह चलन तेज हो गया है. 1990 के पहले कांग्रेस के कार्यकाल में भी ऐसे बदलाव यदाकदा देखने को मिले. उस समय यह कभीकभी ही होता था. इसे बाद जब मंडल और मंदिर की राजनीति शुरू हुई इस चलन ने जोर पकड़ लिया. बसपा नेता मायावती ने कई शहरों के नाम बदले और कुछ नये जिले भी बना दिये. सपा की सरकार ने मायावती के कुछ फैसलों को बदला और पुराने शहरों के नाम बहाल भी हो गये. अपनी अपनी सरकार में यह बदलाव होने लगे. दलित विचारक रामचन्द्र कटियार कहते हैं ‘राजशाही के जमाने में जब एक राजा दूसरे राजा के राज्य में कब्जा करता था तो वहां पर अपनी प्रभुसत्ता को दिखाने के लिये जीत का स्तंभ बनाता था. उसी तरह से लोकतंत्र में राजनीतिक दल अपने वोटबैंक को खुश करने के लिये ऐसे फैसले लेने लगे हैं.’

बसपा ने अपने वोट बैंक को खुश करने के लिये अम्बेडकर पार्क, रमा बाई पार्क, कांशीराम पार्क अपने राज में बनवाये. इनमें उस समय की उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अपनी मूर्ति के साथ ही साथ कई दलित महापुरूषों की मूर्तियां लगवायीं. उत्तर प्रदेश की राजधनी लखनऊ और दिल्ली के करीबी नोएडा में ऐसे पार्क आज भी मौजूद हैं. मायावती के समय के अम्बेडकरनगर, संतकबीर नगर, सिद्वार्थनगर, गौतमबुद्व नगर जैसे कई नाम इसका उदाहरण हैं. नये जिले बनने के बाद भी यहां के हालात नहीं सुधरे हैं.

अखिलेश सरकार ने अपने समय में जनेश्वर पार्क बनाया और कई जिलों के नाम बदले. इसके बाद भी अपने वोट बैंक को खुश नहीं रख पाये और बहुमत की सरकार अगले चुनाव में धराशायी हो गई थी. भाजपा की ही तरह से 2007 में मायावती और 2012 में अखिलेश बहुमत से मुख्यमंत्री बने और अगला ही चुनाव हार गये.

सबक नहीं सीखा :

योगी सरकार ने अपने के पहले की सरकारों के कामों से कोई सबक नहीं सीखा और सत्ता में आने के बाद विकास की जगह पर ऐसे ही नाम बदलने वाले काम करने लगी. सबसे पहले योगी सरकार ने मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर दीनदयाल उपाध्याय नगर कर दिया गया. इसके बाद इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज कर दिया गया. फैजाबाद को नाम बदल कर अयोध्या कर दिया गया.

इकाना क्रिकेट स्टेडियम का नाम बदल कर पूर्व प्रधनमंत्रीअटल बिहारी वाजपेई के नाम पर रख दिया गया. यह सिलसिला अभी चल रहा है. कुछ लोगों के द्वारा आगरा, लखनऊ और कई दूसरे शहरों का नाम भी बदलने की मांग उठाई जा रही है. जिस तरह से बसपा और सपा ने अपने दलित और पिछडे वर्ग को खुश करने के लिये नाम बदलने की राजनीति की उसी तरह से योगी सरकार अपने हिदुत्व के वोट बैंक को खुश करने के लिये काम कर रही है.

राजनीतिक दल केवल सत्ता में बने रहने की राजनीति करते हैं. उनका मकसद किसी भी तरह से सत्ता में बने रहने और राज करने का होता है. लोकतंत्र में जनता का जागरूक होना जरूरी होता है. उसे सरकारों पर विकास की बातों को लेकर चलने के लिये दवाब डालना चाहिये. सरकार जनता को विकास, नौकरी, सड़क, पानी, किसान, शिक्षा, भ्रष्टाचार और सेहत के मुददो से दूर मूर्तियां, पार्क और नाम बदलने जैसे काम करने का दिखावा कर वोटबैंक को खुश करने का प्रयास करती है. कई बार सरकारों को लगता है कि वह जनता को बरगलाने में सफल हो गये हैं पर हकीकत में ऐसा नहीं होता. अगर मूर्तियां, पार्क और जिलों के नाम बदलने से सरकार बनती और लोग वोट देते तो बसपा नेता मायावती कभी चुनाव नहीं हारती.

हार से नहीं ले रहे सबक :

मायावती ने 1995 से 2007 तक 4 बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद लगातार उनको हार का सामना करना पड रहा है. 2012 के विधनसभा चुनाव में हार का सिलसिला 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधनसभा चुनाव में जारी रहा. बसपा के गठन के बाद से सबसे खराब हालत में बसपा और मयावती पहुंच गई हैं. भाजपा ने 1991 में बहुमत की सरकार बनाने के बाद जब उस पर अयोध्या कांड का दाग लगा तो 15 साल वह बहुमत से दूर रही. 2017 में उसे बहुमत मिला अब अगर भाजपा वापस अपने दिखावे की राजनीति पर जायेगी तो उसके लिये आगे का सफर मुश्किल हो जायेगा. राजनीति दलों को अपने विरोधी दलों की हार से सबक लेना चाहिये.

भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर प्रदेश के हिन्दुत्व वोट बैंक को खुश रखने की कोशिश की. योगी आदित्यनाथ प्रदेश को विकास की राह पर ले जाने की जगह पर वोटबैंक को खुश करने की राजनीति पर ले जा रहे हैं. इसका यह परिणाम था कि योगी के गढ गोरखपुर में भाजपा लोकसभा का उपचुनाव हार गई. यह सीट खुद योगी आदित्यनाथ ने खाली की थी. इसी तरह उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य की सीट फूलपुर भी भाजपा उपचुनाव में हारी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कैराना विधनसभा और नूरपुर की लोकसभा सीट भी भाजपा हार गई. ऐसे में योगी सरकार की छवि का अंदाजा लग सकता है. 2019 के लोकसभा चुनाव में योगी सरकार के कामकाज का प्रभाव चुनाव पर पडेगा. जिस तरह से योगी सरकार का प्रदर्शन है. भाजपा के लिये 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले आधी सीटें भी बचा पाना मुश्किल नजर आ रहा है.

खरीदारों की पहली पसंद रेडी टू मूव होम

सब का सपना, घर हो अपना.  यह सपना कुछ का जिंदगीभर सपना ही रह जाता है तो कुछ सपने को पूरा करने  के लिए अपनी खूनपसीने की कमाई लगा कर धोखाधड़ी का शिकार बन कर रह जाते हैं.  वहीं, कुछ जमीन समेत घर या फ्लैट की कीमत का भुगतान कर अपना निवास मिलने का इन्तजार करते दिखते हैं. उधर, कुछ बिल्डर्स धोखेबाज हैं तो कुछ ग्राहकों की रकम का गलत इस्तेमाल करते रहते हैं. वहीं, कुछ बिल्डर्स सरकारी खानापूर्ति के चलते ग्राहकों को समय पर उन का निवास नहीं दे पाते. बिल्डर्स की अपनी दिक्कतें भी हैं.

खरीदार पैसा देता है तो उसे मकान/फ्लैट चाहिए ही.  बिल्डर्स को अपनी अड़चनों को खुद, कैसे भी हो, दूर कर खरीदार को समय पर घर मुहैया कराना चाहिए. ऐसा न होने के चलते संबंधित मामले कोर्ट तक पहुंचते हैं, सरकार को दखल देना पड़ता है आदि.

काफी अरसे से प्रौपर्टी बाजार में सुस्ती देखी जा रही है. तकरीबन पूरे देश सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के खरीदारों की प्राथमिकताएं अब बदली हैं. एक सर्वे के मुताबिक, दिल्ली-एनसीआर में प्रौपर्टी ढूंढने वाले 94 फीसदी लोग या तो रेडी टू मूव इन मकान/फ्लैट खरीदना चाहते हैं या ऐसे निर्माणाधीन फ्लैट जो 6 महीने के भीतर कम्प्लीट होने वाले हैं. इन में से 48 फीसदी खरीदार तो पूरी तरह तैयार फ्लैट ही खरीदना चाहते हैं.

मकान खरीदारों के इस रुझान के पीछे एनसीआर, खासकर नोएडा में पिछले कुछ वर्षों के दौरान प्रोजेक्ट डिलीवरी का खराब रिकौर्ड तो है ही, रेडी टू मूव इन प्रौपर्टी पर जीएसटी न लगना भी एक बड़ा कारण बताया जा रहा है. इस के साथ ही, रेडी टू मूव इन और निर्माणाधीन फ्लैट्स की कीमतों के बीच अंतर अब काफी कम हो गया है, इसलिए भी लोग बने बनाए फ्लैट खरीदने को प्राथमिकता दे रहे हैं.

एक प्रौपर्टी सलाहकार फर्म के ‘ग्राहक भावना सर्वे’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्राहकों की शिकायतों के मामले में दिल्ली-एनसीआर टौप पर है.  मंदी से रिकवरी के मामले में यह अभी भी बेंगलुरु या मुंबई जैसे बड़े शहरों के मुकाबले पीछे चल रहा है. एनसीआर में 2013 के बाद लांच हुए करीब 2 लाख फ्लैट्स अब भी किसी न किसी स्तर पर लंबित हैं. इन में से 1.30 लाख फ्लैट्स नोएडा व ग्रेटर नोएडा में हैं.

सर्वे के मुताबिक, एनसीआर में प्रौपर्टी चाहने वाले 94 फीसदी लोग रेडी टू मूव इन या 6 महीने के भीतर तैयार होने वाले फ्लैट खरीदना चाहते हैं.  दरअसल, रेडी टू मूव इन मकान ग्राहक में यह भरोसा पैदा करते हैं कि जैसा और जितना दिख रहा है, वैसा और उतना मिलेगा.  जुलाई 2017 के बाद जीएसटी भी एक बड़ी वजह है, जो अभी सिर्फ निर्माणाधीन प्रौपर्टीज पर चार्ज किया जा रहा है. रेडी टू मूव  इन फ्लैट पर जीएसटी चार्ज नहीं लगाया जाता है. फ्लैट पर जीएसटी 12 फीसदी चार्ज किया जाता है, यह 12 फीसदी चार्ज एक घर खरीदार के लिए माने रखता है.

सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 7 उच्च शहरों में 4.25 लाख रेडी टू मूव इन मकान हैं जो 2013 के बाद लांच किए गए, जबकि इसी दौरान लांच किए गए प्रोजेक्ट्स में तकरीबन 7.75 लाख मकान लंबित हालत में हैं.

 

भाजपाई महाभारत में बूढ़े बने आफत

पार्टी विथ डिफरेंस का दम भरती रहने वाली भाजपा के अनुशासन के बम जो दिवाली के दूसरे दिन फूटे तो भोपाल से दिल्ली और नागपुर तक में उनकी गूंज सुनाई दी. मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर और पूर्व केंद्रीय मंत्री सरताज सिंह विधानसभा चुनाव लड़ने अड़ गए थे लेकिन आलाकमान ने उनके टिकिट होल्ड पर रख दिये थे.  मंशा यह थी कि ये दोनों उम्र दराज नेता थक कर चुप हो जाएंगे या फिर मनाने पर मान जाएंगे. बाबूलाल गौर अपनी परंपरागत सीट गोविंदपुरा भोपाल से लड़ना चाहते थे जहां से वे दस बार से विधायक हैं और सरताज सिंह अपनी सीट सिवनी मालवा से लड़कर विधानसभा पहुंचना चाहते थे.

जब पहली और दूसरी लिस्ट में नाम नहीं आया तो तजुर्बेकार बाबूलाल गौर को समझ आया कि बात सिर्फ इंतजार से नहीं बनने वाली लिहाजा उन्होंने निर्दलीय या फिर कांग्रेस से लड़ने की घोषणा कर दी और अपनी बहू कृष्णा गौर को भी भोपाल की किसी दूसरी सीट से लड़ाने के संकेत दे दिये. अगर ऐसा होता तो भाजपा के हाथ से भोपाल की दो सीटें एक साथ जातीं, क्योंकि बाबूलाल गौर जमीनी नेता हैं और जीतने के लिए भाजपा के मोहताज तो कतई नहीं हैं. इसलिए उन्होंने खुली धौंस यह भी दी थी कि पार्टी चाहे तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दे.

भोपाल में उनकी पकड़, धाक और लोकप्रियता किसी और नेता से कहीं ज्यादा है, कृष्णा गौर को भी अपने दम पर वे जिता ले जाते या फिर भाजपा की लुटिया डुबो देते इसमें कोई शक नहीं.

ठीक यही हाल सरताज सिंह का होशंगवाद संभाग में है. इन दोनों ने कभी हवा हवाई राजनीति नहीं की है और न ही कभी पार्टी की गाइड लाइन को तोड़ा है. यहां तक कि अब से ढाई साल पहले इन दोनों को जब प्रदेश मंत्रिमंडल से उम्र का हवाला देते हटाया गया था तब भी दोनों ने बगावत का रास्ता अख्तियार नहीं किया था, हां एतराज जरूर जताया था वह भी इस सटीक दलील के साथ कि जब वे फिट हैं और सक्रिय मैदानी राजनीति कर रहे हैं तो फिर हटाने की तुक या वजह क्या. भाजपा ने तब 75 प्लस का फार्मूला दिया था कि इससे ज्यादा की उम्र के नेता अहम पदों पर नहीं रहेंगे यह पार्टी का फैसला है तो दोनों मान भी गए थे.

पर इस बार न गौर माने न सरताज तो इसकी वजह सिर्फ इतनी नहीं है कि ये दोनों सत्ता की हवस के चलते बगावत पर उतर आए बल्कि असल वजह यह है कि ये दोनों लालकृष्ण आडवाणी और डाक्टर मुरली मनोहर जोशी सरीखे कोई आधा दर्जन नेताओं का हश्र देख रहे हैं जिन्हें कोई किसी भी स्तर पर नहीं पूछ रहा. भाजपा में कोई कीमत उन बूढ़े नेताओं की नहीं रह गई है जिन्होंने अपने खून पसीने से पार्टी को सींचा और खड़ा किया.

बात जैसा कि दोनों ने कहा अगर आत्मसम्मान और स्वाभिमान की है तो इन दोनों ने कुछ गलत नहीं किया और नरेंद्र मोदी, अमित शाह और टिकिट वितरण में मनमानी कर रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को बता और जता दिया कि वे अभी चुके नहीं हैं और चुप भी नहीं रहेंगे इसके लिए यदि आस्था और निष्ठा जैसे शब्दों को तिलांजलि भी देनी पड़े तो ये उससे हिचकेंगे नहीं. वैसे भी राजनीति में खोखले आदर्शों वाले इन लफ्जों के कोई माने नहीं रह गए हैं खासतौर से भाजपा में जिस में जरूरत और उम्मीद से ज्यादा अफरा तफरी चुनाव के वक्त मची हुई है.

बाबूलाल गौर तो इस मामूली शर्त पर मान गए कि गोविंदपुरा सीट से उनकी जगह टिकिट उनकी बहू कृष्णा गौर को दे दिया जाये जो पांच साल से भोपाल में सक्रिय हैं और भोपाल की मेयर भी रह चुकी हैं. लेकिन जब सरताज सिंह को टिकिट नहीं दिया गया तो वे सार्वजनिक रूप से फूट फूट कर रोये और फिर कुछ घंटे की सोचा विचारी के बाद सीधे प्रदेश कांग्रेस कार्यालय जा पहुंचे जहां कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह उनके स्वागत सत्कार के लिए थाल सजाये दरवाजे पर ही मुस्कुराते हुये खड़े थे. सरताज सिंह को टिकिट के मसले पर, मार दिया जाये या छोड़ दिया जाये की तर्ज पर भाजपा तो सोचती ही रह गई लेकिन कांग्रेस ने तुरंत होशंगाबाद  सीट से उनकी उम्मीदवारी घोषित कर दी जहां उनका मुकाबला अपनी ही कद काठी के जमीनी नेता सीताशरण शर्मा से होगा. विधानसभा अध्यक्ष सीताशरण शर्मा को अब अपने ही साथी से कड़ी टक्कर मिलेगी यानि मुकाबला भाजपा बनाम भाजपा ही रहेगा.

बात अकेले भोपाल और होशंगाबाद और गौर व सरताज की नहीं है बल्कि पूरे प्रदेश में भाजपा की भद्द पिट रही है. टिकिट वितरण को लेकर हालांकि हर चुनाव में हर पार्टी में टूटफूट होती है लेकिन भाजपा में इस बार ज्यादा हो रही है तो इसकी वजह शाह – मोदी की जोड़ी का उतरता जादू भी है और भाजपा आलाकमान का कांग्रेस जैसा होते जाना भी है. कोई दर्जन भर  सीटों पर भाजपा के बगावती ताल ठोक रहे हैं तो इन्हें हल्के में लेने की भूल भी भाजपा कांग्रेस की तरह ही कर रही है.

साल 2003 में जब कांग्रेसी जहाज मध्यप्रदेश के सियासी समुंदर में डूबा था तो इसकी बड़ी वजह उसकी अंदरूनी और उजागर कलह थी. अब हालात उलट हैं कांग्रेस के पास खोने को कुछ बचा नहीं है लिहाजा वह भगवाई विभीषणों का स्वागत कर रही है इनमे से एक अहम नाम शिवराज सिंह के साले संजय सिंह मसानी का भी है जिन्हें उसने बालाघाट की बारा सिवनी सीट से टिकिट दे दिया है. वायरल हुये एक वीडियो में संजय सिंह भी सरताज सिंह की तरह फूट फूट कर रोते और वोट मांगते नजर आए.

मुद्दा जहां तक उम्र और नए लोगों को मौका देने का है जिसकी चर्चा मध्यप्रदेश में गरम है तो बात बहुत साफ भी है कि अगर कोई नेता पकी उम्र में भी सक्रिय है तो उसे जबरन रिटायर नहीं किया जा सकता, उसकी लोकप्रियता को चुनौती देने वाले नेता अगर पैदा ही नहीं हो रहे तो इसमें बूढ़ों का क्या दोष, नए नेताओं को बजाय रोने झींकने के बाबूलाल गौर और सरताज सिंह सरीखे नेताओं से सीखना चाहिए कि मतदाता में पैठ ही नेता की असली ताकत होती है और इसके लिए हाडतोड़ मेहनत करना पड़ती है. वोट पेड़ पर नहीं लगते बल्कि जमीन में उगते हैं जिनसे जरा सी भी दूरी राजनैतिक कैरियर बनने के पहले ही खत्म कर देती है.

और बात जहां तक भाजपा की है तो उसका तिलस्म टूट रहा है नेताओं की भागदौड़ी और बगावत से उसकी इमेज पर बुरा फर्क पड़ रहा है और बूथ मेनेजमेंट का पाठ और सबक कार्यकर्ता भी भूल रहा है.  दिक्कत तो यह है कि अब शिवराज सिंह भी चमक और पकड़ खो रहे हैं और अमित शाह की फटकार भी किसी काम नहीं आ रही ऐसे में अब उसे सहारा अयोध्या वाले राम का ही बचा है.

फिल्म ‘‘केदारनाथ’’ पर छाया केदारनाथ के पुजारियों का प्रकोप

फिल्मकार अभिषेक कपूर ने जब से फिल्म ‘‘केदारनाथ’’ बनाने की घोषणा की थी, तब से इस फिल्म के निर्माण में कई तरह की समस्याएं आती रही हैं. सर्वप्रथम फिल्म के कलाकारों के चयन में कई तरह की दिक्कतें आईं. फिर फिल्म के निर्माण को लेकर अभिषेक कपूर को प्रेरणा अरोड़ा के संग अदालत की लड़ाई लड़नी पड़ी.

उसके बाद इस फिल्म का निर्माण अभिषेक कपूर की पत्नी प्रज्ञा कपूर के साथ रौनी स्क्रूवाला ने किया. किसी तरह यह फिल्म पूरी हुई. अब जब लग रहा था कि सुशांत सिंह राजपूत व सारा अली खान की फिल्म ‘‘केदारनाथ’’ की सभी समस्याएं खत्म हो गयी हैं और 12 नवंबर के इसका ट्रेलर बाजार में लाने की तैयारी हो रही है, तो अब केदारनाथ के पुजारियों की कोप दृष्टि इस फिल्म पर पड़ गयी है.

Kedarnath priests demand a ban on movie

मुंबई के एक अंग्रेजी दैनिक के अनुसार केदारनाथ मंदिर के पुजारियों व केदार सभा ने इस फिल्म पर ‘‘लव जेहाद’’ का प्रचार करने का आरोप लगाते हुए बैन लगाने की मांग की है. केदारनाथ मंदिर के पुजारियों की संस्था ‘केदार सभा’ ने फिल्म के निर्माता प्रज्ञा कपूर व रौनी स्क्रूवाला को पत्र लिखकर फिल्म से प्रेम कहानी को हटाकर नए सिरे से कहानी लिखने की मांग की है. इतना ही नही केदार सभा ने उनके सभी सदस्यों को तुरंत फिल्म दिखाने की भी मांग की है. ज्ञातव्य है कि फिल्म ‘‘केदारनाथ’’ की कहानी 2013 में उत्तराखंड व केदारनाथ में आई बाढ़ की तबाही के मंजर पर है. जिसमें श्रृद्धा व भक्ति के साथ सुशांत सिंह राजपूत व सारा अली खान की प्रेम कहानी है. इसमें सारा अली खान ने एक उच्च वर्ग की ब्राह्मण तीर्थयात्री और सुशांत सिंह राजपूत ने तीर्थ यात्रियों को पहाड़ों पर चढ़ाने का काम करने वाले मुस्लिम कुली का किरदार निभाया है. जिनके बीच प्यार पनपता है. इस फिल्म का फिल्मांकन उत्तराखंड में हुआ है.

Kedarnath priests demand a ban on movie

उधर केदार सभा के कार्यकारी अधिकारी एन पी जमलोकी ने कहा है – ‘‘हमें फिल्म की विषयवस्तु का पूरा पता नहीं है. मगर फिल्म का प्रोमो देखकर हमें इसमें बहुत कुछ आपत्तिजनक नजर आया. चुंबन दृष्य और दो अलग अलग धर्म के युवक युवती के बीच प्रेम का चित्रण गलत ढंग से है. धार्मिक स्थल पर फिल्मायी गयी यह प्रेम कहानी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है. इसलिए निर्माताओं के लिए जरूरी है कि वह मंदिर की कमेटी को पहले फिल्म दिखाएं.’’

मुझे खुशी है की दर्शक आज भी मुझे हीरो के रूप में स्वीकारते हैं : गोविंदा

फिल्म ‘इलज़ाम’ से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले इस अभिनेता ने हर शैली की फिल्मों में काम किया है, फिर चाहे वह कौमेडी हो, रोमांस हो या एक्शन, हर भूमिका में वे फिट रहे हैं और कई पुरस्कार भी जीते हैं. अत्यंत हंसमुख और स्पष्टभाषी गोविंदा का शुरूआती दौर बहुत अच्छा नहीं था, उन्हें बहुत मुश्किल से पहली फिल्म मिली थी, पर उनकी मां ने उन्हें हमेशा भरोसा दिया कि एक दिन वे अच्छे एक्टर बनेंगे और वे बने भी.

कौमेडी में इतना अच्छा काम करने वाले अभिनेता कम ही हैं. ‘हद कर दी आपने’ फिल्म में उन्होंने एक परिवार के 6 सदस्यों की भूमिका निभाई और फिल्म हिट रही. किसी भी फिल्म में वे अपनी भूमिका को चुनौती समझते हैं और उसे अच्छा करने की कोशिश करते हैं. उन्होंने अपने समय के हर अभिनेता और अभिनेत्री के साथ काम किया है. उनकी और निर्देशक डेविड धवन की जोड़ी बहुत कमाल की थी. उन दोनों ने उस दौर में कई हिट फिल्में दीं, जो आज भी चर्चित हैं. इतना ही नहीं उनकी डांसिंग कला के सभी दीवाने हैं. किसी भी डांस के साथ उनके चेहरे का एक्शन देखने लायक होता है. काम के दौरान ही उनका परिचय सुनीता से हुआ और उन दोनों ने शादी की. उनके दो बच्चे टीना आहूजा और हर्षवर्धन आहूजा हैं.

इन दिनों वे अपनी अगली फिल्म ‘रंगीला राजा’ के प्रमोशन पर हैं, जिसमें उन्होंने डबल भूमिका निभाई है. उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश पेश हैं.

प्र. क्या आप कभी पुराने दिनों को याद करते हैं?

पुराने दिनों को अब हम याद नहीं कर सकते, माहौल बदला है, लोग बदले हैं, पर मुझे इस बात से ख़ुशी है कि सालों बाद भी मुझे दर्शक हीरो के रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन इतना याद आता है कि शुरू-शुरू में कई प्रोडक्शन हाउस के साथ मेरा झगड़ा हो जाता था, कई लोगों ने तो औफिस से निकाल तक दिया, क्योंकि उन्हें लगता था कि मैं एक संघर्षरत हूं और काम मांग रहा हूं. उनका व्यवहार भी बहुत अजीब हुआ करता था.

प्र. कौमेडी का दौर भी आज बदला है, इसे कैसे लेते हैं?

कौमेडी कम होने वजह ये है कि लोगों को समझ नहीं है कि किसको क्या दिखाएं और कितना दिखाएं. अभी चंद लोगों के हाथों में कौमेडी कैद हो चुकी है, इसलिए वह खुलकर सामने नहीं आती, टीवी पर ऐसा नहीं है. हर किसी को अपना हुनर दिखाने का मौका मिलता है और कौमेडी अच्छी निकलकर आती है. फिल्मों में इसकी कमी हो चुकी है, क्योंकि आज फिल्मों को व्यवसाय की दृष्टि से बनाया जाता है. पहले व्यवसाय के साथ-साथ मनोरंजन पर अधिक ध्यान होता था. मुझे लगता है कि कुछ समय बाद अच्छी कौमेडी आ जाएगी. थोडा धीरज धरने की जरुरत है.

प्र. 90 का दशक आपका था, उन फिल्मों को आज भी लोग पसंद करते हैं, इस बारें में आपकी सोच क्या है?

इसकी वजह यह है कि उन फिल्मों को आप अपनी जिंदगी से जोड़ पाते हैं. इसलिए जो भी दृश्य आपको छुए, वह आपको आकर्षित करता है और उसे आप बार-बार देखना चाहते हैं. मुझे याद आता है कि मेरी मां कहा करती थी कि बिना बात किये नृत्य करो. मुझे पहले अजीब लगा, लेकिन जब उन्होंने कुछ शास्त्रीय नृत्य की झलकियां दिखाईं, जिसमें बिना बात किये ही व्यक्ति डांस करता है तो मुझे उनकी बात समझ में आई. मैंने कई फिल्मों में उस भाव को प्रदर्शित किया और सफल रहा.

प्र. मां से आप बहुत प्रेरित है मां की किस बात को आप अभी भी याद करते हैं?

मां कहा करती थी कि अति नैतिकता, अति धार्मिकता, अति स्वच्छता, अति प्रेम आदि कभी भी अच्छे नहीं होते. अच्छाई उतनी रखनी चाहिए, जिससे कि व्यक्ति बेवकूफ न लगे. मेरे हिसाब से जीवन में एक सामंजस्य हमेशा बनाकर रखनी चाहिए और वह मैं करने की कोशिश करता हूं.

प्र. आपने इतनी सारी अच्छी फिल्में की हैं, कौन सी फिल्म आपके दिल के करीब है?

कोई भी मेरी फिल्म मुझे बहुत अच्छी नहीं लगी, क्योंकि मैं उसे कई अलग-अलग तरीके से देखने लगा हूं. मैं दृश्यों को आनंद के साथ देखता हूं. फिल्म ‘स्वर्ग’ के दृश्य अच्छे लगे. बहुत सारी दूसरी फिल्मों के दृश्य भी अच्छा लगते हैं. मैं बच्चों को भी उन दृश्यों को दिखाता हूं, क्योंकि वह मेरे दिल को छूती हैं.

प्र. आपके आलोचक कौन हैं?

पहले तो दर्शक हैं, इसके बाद मेरे बच्चे, जिनसे मैं कई बार फिल्म साईन करने से पहले राय ले लिया करता हूं. आज के युवा बहुत समझदार हैं, उन्होंने फ़िल्मी माहौल को ही बदल दिया है और हर चुनौती को स्वीकार करने से घबराते नहीं.

प्र. आप अपने अंदर किस कमी को आज भी महसूस करते हैं?

मैं एक बार मेरी मां के सामने रोया और कहा था कि मुझे लोग कम आंकते हैं. सामाजिक व्यवहार और मेरी भाषा सही नहीं होती, मैं उसमें कम पड़ जाता हूं. मैं कुछ भी कह देता हूं. मुझे समझ में क्यों नहीं आता. मां ने कहा था कि इससे आप खुद निकल सकते हो. मैंने समझा और निकल गया. मुझे अब लगता है कि वह कमी मेरे लिए ठीक थी, अगर वो चोट मुझे नहीं लगती तो शायद मैं ऐसा नहीं बन पाता.

प्र. आपकी फिटनेस का राज क्या है?

मैडिटेशन और योगा करता हूं, नियम से खाना खाता हूं. जिम मैं नहीं जाता.

प्र. आपने पहली कमाई से क्या-क्या किया था?

मैंने मां के लिए साड़ी और एक गोल्ड की चेन खरीदी थी. बहुत प्रसन्न था कि मैं हीरो बन गया था और मैं इस ख़ुशी में 4 दिन तक सोया नहीं था, क्योंकि अब मैं मेरी मां के अनुसार हीरो बन चुका था.

प्र. आप दोनों की शादीशुदा जिंदगी अच्छी चल रही है, इसे बनाये रखने में किसका सहयोग अधिक है?

इसमें मेरी पत्नी सुनीता का सहयोग अधिक है, वह एक समझदार पत्नी हैं. उन्हें पता है कि घर कैसे चलाया जाता है. मैंने शुरू से कह दिया था कि जब तक मां है, उसकी चलेगी. उसके बाद आपकी चलेगी. मैं कितनी भी ‘राजा’ नाम की फिल्में कर लूं, पर मैं रियल लाइफ में राजा नहीं हूं. पहले मां ने जो आदेश दिया, वह करता था अब सुनीता और टीना जो कहती हैं, वह करता हूँ.

प्र. ‘मी टू’ से क्या महिलाएं सुरक्षित हो सकेंगी?

ये पर्सनल बातें है. इसमें आपका पहनावा, सोच, बातचीत करने का तरीका आदि सब शामिल होता है, क्योंकि इससे कुछ लोग इसका सही प्रयोग करेंगे, तो कुछ लोग इसका गलत प्रयोग भी कर सकते हैं. इसलिए जो कानून कहेगा वही सही होगा. मैं अभी राजनीति से निकल चुका हूं और किसी भी राजनीति में पड़ना नहीं चाहता.

प्र. क्या आप अपनी आत्म कथा लिखना चाहते है?

हां, मेरी इच्छा है कि लिखूं, पर उसकी शुरुआत मेरी मां से होगी, क्योंकि जो मैं हूं इसमें अभी बहुत कुछ बाकी रह गया है. उनकी सोच तक अभी नहीं पहुंच पाया हूं. लोग मुझे ‘ममास बौय’ कहते हैं, पर मैं खुश हूं. मैं ये सोचता हूं कि जो भी व्यक्ति मेरी आत्मकथा को पढ़ लेगा, वह मां के साथ कभी गलत हरकत नहीं करेगा, ये जरुरी है. मैं अध्यात्म नहीं बेचूंगा. जो सहज सरल हो और समाज पर उसकी छवि का असर हो उसे ही लिखना चाहता हूं.

सबसे कम उम्र का भारतीय कप्तान जिसने आक्रामक होकर मैच जीतना सिखाया

टीम इंडिया को जीत का रास्ता दिखाने वाले यूं तो टीम इंडिया में कई कप्तान हुए हैं. कई लोगों को कपिल देव याद आएंगे तो कुछ लोगों को सौरव गांगुली. जिन्होंने कुछ समय पहले ही क्रिकेट फौलो करना शुरू किया है, उन्हें धोनी और कोहली के नाम याद आएंगे.

लेकिन हम बता रहे हैं उस क्रिकेट कप्तान की कहानी, जो 21 की उम्र में ही टीम इंडिया का कप्तान बन गया. उसी कप्तान को ये श्रेय दिया जाता है, जिसने पहली बार टीम इंडिया को आक्रामक बनकर जीतना सिखाया.

हम बात कर रहे हैं मंसूर अली खान पटौदी की. उन्हें टीम इंडिया में टाइगर के नाम से भी जाना गया. उनसे पहले उनके पिता भी टीम इंडिया के कप्तान रह चुके थे. मंसूर अली का जन्म 5 जनवरी 1941 को भोपाल में नवाब इफ्तिखार अली खान के घर हुआ था.

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उन्होंने भारत के लिए 46 टेस्ट खेले. इनमें से 40 में उन्होंने कप्तानी की. 21 साल की उम्र में उन्हें टीम की कमान सौंप दी गई. वह उस समय इतनी कम उम्र में टीम की कमान संभालने वाले पहले खिलाड़ी थे. उनके नाम ये रिकौर्ड 40 साल तक रहा.

अपने टेस्ट करियर में पटौदी ने 2793 रन बनाए. इसमें 6 शतक भी शामिल हैं. उनके नेतृत्व में टीम इंडिया को पहली बार विदेश में जीत मिली. 1968 में न्यूजीलैंड के दौरे पर गई टीम को उन्होंने जीत दिलाई. इसी लिए उनके बारे में कहा जाता था कि उनकी सबसे बड़ी ताकत रणनीति बनाने में थी. उनका सर्वोच्च स्कोर 203 रहा.

भले उनकी कप्तानी में टीम इंडिया ने 40 में से 9 टेस्ट में ही जीत हासिल की, लेकिन ये पटौदी ही थे, जिन्होंने टीम को ये भरोसा दिलाया कि टीम इंडिया दुनिया में किसी भी पिच पर कैसे भी हालात में जीत सकती है.

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एक्सीडेंट में गंवाई आंख, लगा सब कुछ खत्म

1961 में ब्रिटेन में एक कार हादसा हुआ. कांच का एक टुकड़ा मंसूर अली की आंख में लगा. इस हादसे में उनकी एक आंख की रोशनी चली गई. सभी को लगा कि उनका क्रिकेट करियर अब खत्म. लेकिन वे दूसरी ही मिट्टी के बने थे. उन्हें किसी भी कीमत पर क्रिकेट खेलना था और वह खेले भी. 1962 में उन्होंने वेस्ट इंडीज टूर के दौरान उन्हें टीम का उपकप्तान चुन लिया गया.

1975 में मंसूर अली ने क्रिकेट से संन्यास ले लिया. उनका निजी जीवन भी काफी सुर्खियों में रहा. 1993 से लेकर 1996 तक वह टीम के रेफरी भी रहे. 2011 में लंग इन्फेक्शन के कारण उनका निधन हो गया.

अंधविश्वास से अंध हटाने का प्रयास जारी रहना चाहिए

आपातकाल के दिनों की बात है. मद्रास हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए एक याचिका आई जिस में कहा गया था कि तमिलनाडु में पेरियार की मूर्तियों के नीचे जो बातें लिखी हुई हैं, वे आपत्तिजनक हैं और लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाती हैं इसलिए उन्हें हटाया जाना चाहिए. याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ईरोड वेंकट रामास्वामी उर्फ पेरियार जो कहते थे, उस पर विश्वास रखते थे इसलिए उन के शब्दों को उन की मूर्तियों के पैडेस्टर पर लिखवाना गलत नहीं ह

पेरियार की मूर्तियों के नीचे लिखा था- ‘ईश्वर नहीं है और ईश्वर बिलकुल नहीं है. जिस ने ईश्वर को रचा वह बेवकूफ है, जो ईश्वर का प्रचार करता है वह दुष्ट है और जो ईश्वर की पूजा करता है वह बर्बर है.’ पेरियार ने लगभग 90 वर्ष पहले तमिलनाडु में आत्मसम्मान मुहिम की स्थापना की थी और आज भी उन के राजनीतिक व सामाजिक विचार वरिष्ठ राजनीतिज्ञ एम करुणानिधि से ले कर विख्यात तमिल ऐक्टर कमल हासन तक को प्रभावित कर रहे हैं. लेकिन तर्कवादी व मानवतावादी संगठन केवल तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं हैं. देश के लगभग हर राज्य में ये संगठन धार्मिक अंधविश्वास व सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. बावजूद इस के कि उन के सदस्यों को न सिर्फ हर रंग के दक्षिणपंथियों की धमकियां बरदाश्त करनी पड़ रही हैं बल्कि कई मामलों में तो उन्हें अपनी जान तक गंवानी पड़ जाती है, जैसा कि नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे व एम एम कलबुर्गी की हत्याओं से यह स्पष्ट हो जाता है. लेकिन फिर भी संघर्ष जारी है.

कहने का अर्थ यह है कि फिलहाल देश में जहां एक तरफ धार्मिक अंधविश्वास व सांप्रदायिकता के खिलाफ वैज्ञानिक तर्क व मानवतावाद को प्रस्तुत करने का प्रयास हो रहा है वहीं दूसरी तरफ इस आवाज पर विराम लगाने का भी जोरशोर से प्रयास जारी है ताकि देश को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जा सके. इस के अतिरिक्त ये कोशिशें भी जारी हैं कि कट्टरपंथी व दकियानूसी मुसलिम व्याख्या को थोपा जाए. इंडियन रेशनलिस्ट एसोशिएशन के अध्यक्ष जनरल सनल एदामरूकू पिछले 3 वर्षों से हेलसिंकी (फिनलैंड) में रह रहे हैं. उन्होंने चर्च को चुनौती दी थी. उन के खिलाफ न सिर्फ ईशनिंदा के मुकदमे ठोके गए बल्कि उन को जान से मारने की धमकियां भी दी गईं. उन का कहना है कि आलोचनात्मक शोध के लिए भारतीय समाज असहिष्णु हो गया है क्योंकि सभी धर्मों के अतिवादी तत्त्व अत्यधिक आक्रामक व हिंसक हो गए हैं. उन के अनुसार, ‘‘स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि राजनीतिक वर्ग इन घटनाक्रमों पर खामोश रहता है जबकि अगर प्रधानमंत्री सिर्फ इतना कह दें कि आलोचनात्मक, वैज्ञानिक स्वभाव व तर्कवाद हमारी परंपरा का हिस्सा हैं और तर्कशास्त्रियों पर हमले बरदाश्त नहीं किए जाएंगे तो अच्छी शुरुआत हो सकती है. लेकिन इस किस्म का बयान कहीं भी देखने को नहीं मिल रहा.’’

71 वर्षीय प्रबीर घोष साइंस ऐंड रेशनलिस्ट एसोसिएशन औफ इंडिया के अध्यक्ष हैं. कोलकाता की मोतीझील कालोनी में उन के घर की दीवार पर ईसा मसीह की तसवीर लटकी हुई है, जिस से रक्त बहता दिखाया गया है. प्रबीर कहते हैं, ‘‘एक ईसाई महिला ने दावा किया था कि चमत्कार के तौर पर इस तसवीर से रक्त बहने लगा है. मैं ने अपनी संस्था के सदस्यों को वहां भेजा, जिन्होंने रुई पर रक्त का नमूना लिया. खोजबीन से मालूम हुआ कि कोलकाता के एक ब्लडबैंक से उस के पति द्वारा रक्त खरीदा गया था. यह मालूम होते ही महिला गायब हो गई. ईसा मसीह की इस तसवीर के अलावा मेरे पास साईंबाबा की सोने की चेन और एक अन्य गौडमैन की सोने की गेंद भी है. मैं ने इन्हें उन की धोखाधड़ी साबित कर के हासिल किया था.’’

प्रबीर के संगठन में 700 कार्यकर्ता हैं जो पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों में उन की 53 पुस्तकों को वितरित करते हैं ताकि लोगों को अंधविश्वास से दूर रखा जा सके. प्रबीर सभी गौडमैनों को चमत्कार करने की चुनौती देते हैं, हारने पर पैसा देने का वादा करते हैं और इस तरह वे अब तक 700 गौडमैन को पराजित कर चुके हैं व 7 हजार से अधिक उन के सामने से भाग खड़े हुए हैं. प्रबीर की मुलाकात एक बार टीवी स्टूडियो में एक बाबा से हुई, जो व्यक्ति को हवा में उड़ाने का दावा कर रहे थे. प्रबीर ने उन्हें ऐसा करने की चुनौती दी तो बाबा गुस्से में आगबबूला हो कर उन्हें गालियां देने लगे. प्रबीर पर बीबीसी के चैनल 4 ने ‘गुरु बस्टर्स’ नामक डौक्यूमैंट्री भी बनाई है.

एक और कहानी सुनिए. सड़क के किनारे 4 व्यक्तियों के आसपास खासी भीड़ जमा है. 4 में से 1 व्यक्ति सलीम एक लड़के को आगे आने के लिए कहता है. सलीम लड़के के सिर पर गीला कपड़ा रखता है और फिर मिट्टी के तेल में डूबी हुई एक बोरी रखता है. वह बोरी में आग लगाता है. उस का दूसरा साथी जलती हुई आग पर औमलेट बनाने के लिए पैन रखता है. इस तरह सलीम इस ‘जादू’ को तोड़ता है कि व्यक्ति के सिर को नुकसान पहुंचाए बिना भी उस के सिर पर आग लगाई जा सकती है. सलीम केरल युक्तिवादी संगम की मल्लापुरम शाखा के जिलाध्यक्ष हैं. वे अपने वैज्ञानिक तर्कों से तथाकथित बाबाओं के चमत्कारों की पोलपट्टी खोलते हैं. मुसलिमों में दकियानूसी विचारों को चुनौती देने के लिए उन्हें कट्टरपंथी अपना निशाना बनाते हैं. साल 2001 में उन्होंने एक प्रेमविवाह का समर्थन किया, मुसलिम अतिवादियों ने उन्हें अपना निशाना बनाया और 5 माह तक उन्हें व उन के परिवार को पुलिस सुरक्षा में रहना पड़ा. उन को खाड़ी देशों से भी धमकीभरे संदेश मिले.

पंजाब की तर्कशील सोसाइटी का गठन 29 वर्ष पहले हुआ था. यह सोसाइटी श्रीलंका में रहने वाले भारतीय तर्कशास्त्री अब्राहम कुबूर से प्रभावित है. यह निरंतर बाबाओं, भूतप्रेतों, ऊपरी असर आदि तथाकथित रहस्यमय घटनाओं की पोलपट्टी खोलती है. इस संस्था ने 5 लाख रुपए का नकद इनाम घोषित कर रखा है उस व्यक्ति के लिए जो ‘फ्रौडप्रूफ’ स्थितियों में अपनी तथाकथित अलौकिक शक्तियों का प्रदर्शन कर सके. अब तक किसी ने इस इनाम को नहीं जीता है.

अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम

सितंबर 1995 की यह अफवाह शायद आप को आज भी याद होगी कि किस तरह अचानक पूरे देश में यह बात फैल गई कि शिव, गणेश आदि की मूर्तियां दूध पी रही हैं. इस मिथ का भांडा फोड़ा नरेंद्र नायक ने जो फैडरेशन औफ इंडियन रेशनलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं. मैंग्लोर के रहने वाले नायक तब से इस किस्म के चमत्कारों का भांडा फोड़ते आ रहे हैं और इस के लिए वे अब तक 2,000 से अधिक शो कर चुके हैं व लैक्चर दे चुके हैं. लेकिन जब आप हानिकारक व अतार्किक चीजों के खिलाफ सवाल उठाने लगते हैं तो यथास्थितिवादी आप के विरोध में खड़े हो जाते हैं. वे आप को नुकसान तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं, जैसा कि भारत जन विज्ञान जत्था के जयंत पांडिया के साथ हुआ.

1993 में राजकोट में बारिश कराने के लिए ‘अश्वमेघ यज्ञ’ का आयोजन किया गया था जिस में राज्यपाल व मुख्यमंत्री को भी आमंत्रित किया गया था. इसे पांडिया ने चुनौती दी तो बजरंग दल के 300 कार्यकर्ताओ ने उन के दफ्तर पर हमला किया व उन पर तेजाब फेंका. लेकिन पांडिया अंधविश्वास से ‘अंध’ हटाने के लिए अब भी प्रयासरत हैं.

पांव पसारती सनातन संस्था

साल 2011 में महाराष्ट्र में तत्कालीन कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की गठबंधन सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि सनातन संस्था पर न सिर्फ प्रतिबंध लगा दिया जाए बल्कि उसे आतंकी संगठन घोषित कर दिया जाए. महाराष्ट्र के तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) उमेश चंद सारंगी ने इस आशय का पत्र 11 अप्रैल, 2011 को केंद्रीय गृहमंत्रालय को लिखा था. पिछले दिनों सनातन संस्था के स्थायी सदस्य 32 वर्षीय समीर गायकवाड़ को विशेष जांच दल (सिट) ने वामपंथी नेता व सामाजिक कार्यकर्ता गोविंद पानसरे की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया है. कर्नाटक पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि कहीं सनातन संस्था के कार्यकर्ताओं का हाथ तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर व प्रोफैसर एम एम कलबुर्गी की हत्या में भी तो नहीं है. इसलिए यह जानना आवश्यक हो जाता है कि आखिर सनातन संस्था है क्या?

सनातन संस्था सब से पहले उस समय प्रकाश में आई थी जब मडगांव (गोआ) के एक सिनेमाघर में 2009 में बम विस्फोट हुआ था, जिस में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी. उस समय पुलिस ने सनातन संस्था के 150 से अधिक सदस्यों से बम विस्फोट के बारे में पूछताछ की थी. सनातन संस्था का गठन 1999 में हुआ था. उस का राष्ट्रीय मुख्यालय पणजी (गोआ) से 28 किलोमीटर दूर पौंडा के एक गांव बंडीवाडे या बंडोडे में है. इस की पीली व सफेद बिल्ंिडग को ‘आध्यात्मिक विद्यालय’ का नाम दिया गया है. सनातन संस्था के संस्थापक डा. जयंत बालाजी अठावले हैं जो पिछले 10 सालों से किसी भी नए व्यक्ति से नहीं मिले हैं, पर अपने अनुयायियों से नियमित मुलाकात करते हैं. सनातन संस्था के परचों में डा. अठावले को ‘अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त हिप्नोथेरैपिस्ट’ के तौर पर परिभाषित किया गया है. सनातन संस्था अपने ऊपर लगे तमाम आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहती है कि वह विरोध के लोकतांत्रिक तरीकों में विश्वास करती है, हिंसा को प्रोत्साहित नहीं करती.

सनातन संस्था के प्रबंधक ट्रस्टी वीरेंद्र पी मराटे कहते हैं, ‘‘चाहे नरेंद्र दाभोलकर हों या गोविंद पानसरे, जो लोगों से कहते हैं कि देवताओं व साधुओं में विश्वास न करो, या चाहे एम एम कलबुर्गी हों जो देवताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हैं, इस से हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचती है, लेकिन हम सिर्फ लोकतांत्रिक तरीकों से ही लड़ना चाहते हैं.’’ सनातन संस्था के मुख्यालय में ज्यादातर सदस्य 30-40 वर्ष के बीच के हैं. बहुसंख्या में महिला सदस्य हैं और ऐसे पूर्व पत्रकार, जो स्थानीय अखबारों में काम करते थे और अब संस्था के मराठी मुखपत्र ‘दैनिक संस्था प्रभा’ को निकालते हैं. इस अखबार में हिंदुत्व व उस से जुड़ी हुई विचारधाराओं के पक्ष में लेख प्रकाशित किए जाते हैं. इस के ज्यादातर सदस्य महाराष्ट्र, पुणे, गोआ व कर्नाटक से हैं, जिस से मालूम होता है कि इस संस्था का प्रभावक्षेत्र कौन सा है.

संस्था का दावा है कि वह जो हिंदी, मराठी, अंगरेजी व कन्नड़ भाषाओं में पत्रपत्रिकाएं प्रकाशित करती है, उस के 95 हजार से अधिक ग्राहक हैं. ऐसी ही प्रकाशित सामग्री गायकवाड़ के घर से भी बरामद हुई थी, जो मराटे के अनुसार ‘प्रसार’ है यानी संस्था के 250 पूर्णकालिक सदस्यों में से एक. सनातन संस्था के मुख्य उद्देश्यों में भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करवाना शामिल है. मराटे के मुताबिक, ‘‘हमारा लक्ष्य डा. अठावले के नेतृत्व में एक राष्ट्र, एक पहचान विकसित करना है और हम हिंदू राष्ट्र बनने के लिए तैयार हैं. हमारा सहयोगी संगठन हिंदू जागृति पूर्णतया इसी के लिए प्रयास कर रहा है और नेपाल को भी हिंदू राष्ट्र घोषित कराना चाहता है.’’

देवताओं का विरोधी अर्जक संघ

जब आप कानपुर देहात में सिकंदरा के पटेल चौक में जाएंगे तो अर्जक संघ के कार्यालय पर आप की आवश्यकरूप से नजर पड़ेगी. खासकर उस के इस नारे पर- ‘भगवान से यदि न्याय मिलता तो न्यायालय नहीं होते, सरस्वती से यदि विद्या मिलती तो विद्यालय नहीं होते.’ इस नारे के बावजूद अर्जक संघ का कार्यालय बाहर से उन हजारों छोटेमोटे संगठनों के कार्यालयों जैसा ही लगता है जिन की उत्तर प्रदेश में बाढ़ सी आई हुई है. लेकिन अंदर जाने के बाद मालूम होता है कि यह कट्टर नास्तिकों का संगठन है. 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, 28 लाख से अधिक लोग देश के मौजूद 6 प्रमुख धर्मों में से किसी का भी पालन नहीं करते हैं. वे नास्तिक हैं, उन में से 5.82 लाख उत्तर प्रदेश में हैं और इस की मूल वजह अर्जक संघ का प्रयास है. अर्जक संघ उत्तर प्रदेश में सक्रिय सब से बड़ा नास्तिक समूह है, जिस का प्रभाव ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में फैला हुआ है, विशेषकर कानपुर, बस्ती, फैजाबाद, वाराणसी, प्रतापगढ़ और पास के राज्यों बिहार व झारखंड में. इस के सदस्य अपने संस्थापक रामस्वरूप वर्मा द्वारा लिखित 32 पृष्ठ की पुस्तिका पर विश्वास करते हैं. रामस्वरूप वर्मा 1967 में उत्तर प्रदेश में वित्त मंत्री थे.

अर्जक का अर्थ है वह समुदाय जो हाथ मजदूरी या श्रम के काम में लगा रहता है. और यही कारण है कि जो लोग ब्राह्मण या सवर्ण जाति में जन्म लेते हैं उन के लिए इस संगठन की सदस्यता खुली हुई नहीं है. जागृत मानव समता का प्रचार करने वाला अर्जक संघ ब्राह्मणवाद, मूर्तिपूजा, भाग्य या किस्मत, पुनर्जन्म, आत्मा आदि का कट्टर विरोधी है.

जाहिर है इन विचारों के चलते संघ के सदस्यों के लिए जीवन की चुनौतियां बहुत कठिन हैं, खासकर आज जब पूरे देश में मंडल का प्रभाव बढ़ता जा रहा है. संघ के एक सदस्य विश्राम अपनी छोटी बहन को ले कर उस की शादी तय करने के लिए गए थे कि उन लोगों को मालूम हो गया कि विश्राम नास्तिक हैं, इसलिए उन्होंने शादी तोड़ दी. विश्राम से सवाल किया गया कि आप नैतिकता को कैसे तय करते हैं? विश्राम ने कहा कि जो चीज भी तर्क व साक्ष्य के पैमाने पर खरी उतर जाए, वह नैतिक है, इस के अलावा बाकी सब अनैतिक. संघ के जिलाध्यक्ष सीताराम कटियार रामायण व डार्विनवाद से सहजता से उदाहरण देते हैं और डार्विन के तर्कों पर सब को रद्द कर देते हैं. उन का कहना है, ‘‘अन्य धर्मों के धर्मग्रंथों की तरह हिंदू धर्मग्रंथों को भी ईश्वर की इच्छा बताया जाता है. क्या यह ईश्वर की इच्छा है कि आप अपने कर्मों की वजह से नीच जाति से जन्म लें और ब्राह्मण सामाजिक व्यवस्था के ऊपरी पायदान पर हमेशा रहें. आप ईश्वर के खिलाफ विद्रोह नहीं कर सकते, इसलिए ब्राह्मण समाज व सरकार के जरिए नीची जातियों का दमन करते रहते हैं. अब तो देश को एक ऐसा प्रधानमंत्री मिल गया है जो प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी की बात करता है, यह सब कितनी दकियानूसी है.’’

गौरतलब है कि अर्जक संघ रामायण को ‘ब्राह्मण महिमा’ मानता है. 1978 में दयानकपुर गांव में उस के संस्थापक रामस्वरूप वर्मा ने रामायण की कौपियों को जलाया था, जिस के लिए सीताराम कटियार सहित 80 लोगों को हिरासत में लिया गया था. सीताराम कटियार कहते हैं कि 1978 के आंदोलन के बाद ही लोगों ने उन के संगठन पर ध्यान देना शुरू किया. उस से पहले वे पंडितों पर ही विश्वास करते थे, लेकिन अब उन को मालूम है कि धर्मग्रंथ एक व्यक्ति की गप से ज्यादा कुछ नहीं है. संघ त्योहार के रूप में गणतंत्र दिवस, और डा. अंबेडकर के जन्मदिवस को चेतना दिवस के रूप में मनाता है.

शादी के बाद कुछ खिलाडियों का प्रदर्शन हुआ खराब, तो कुछ के सितारे हुए बुलंद

पिछले दो सालों में कई भारतीय क्रिकेटर शादी के बंधन में बंध गए हैं, जिनमें अजिंक्य रहाणे, रोहित शर्मा, उमेश यादव, हरभजन सिंह, भुवनेश्वर कुमार और कप्तान विराट कोहली शामिल हैं. शादी के बाद या तो खिलाड़ियों का खेल और बेहतर हो जाता है या फिर उनके खेल का स्तर गिर जाता है. आज हम ऐसे ही कुछ वर्तमान और पूर्व खिलाड़ियों की बात करने जा रहे हैं जिनका शादी से पहले और शादी के बाद खेल पर कैसा प्रभाव पड़ा था.

इन खिलाड़ियों में सबसे पहले हम बात करते हैं क्रिकेट का भगवान कहे जाने वाले मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर की, जिन्होंने अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत 16 साल की उम्र में 1989 में की थी. अपने प्रदर्शन से सचिन ने क्रिकेट के भगवान की ख्याति प्राप्त की. साल 1995 में उन्होंने डौक्टर अंजली से शादी कर ली. सचिन हर जगह अपने साथ अंजली को अपने सपोर्ट के लिए लेकर जाते थे.

सचिन का प्रदर्शन

शादी से पहले टेस्ट मैच में सचिन ने 35 मैच खेले, जिसमें उन्होंने 52.72 की एवरेज से 2,425 रन बनाए. इनमें 8 सेंचुरी भी शामिल हैं. वहीं शादी के बाद सचिन ने 165 मैच खेले, जिसमें उन्होंने 53.98 की एवरेज से 13,496 रन बनाए. इसमें 43 सेंचुरी शामिल हैं.

वहीं वनडे में शादी से पहले सचिन ने 97 मैच खेले. 36.99 की औसत से उन्होंने 3,070 रन बनाए, जिसमें 4 सेंचुरी लगाई. शादी के बाद सचिन ने 366 मैच खेले जिसमें 46.82 की औसत से 15,356 रन बनाएं. इसमें 45 सेंचुरी शामिल हैं.

राहुल द्रविड

पूर्व कप्तान राहुल द्रविड ने कई बार अपनी टीम को हारने से बचाया है. राहुल द्रविड दुनिया के सबसे सम्मानित खिलाड़ियों में से एक हैं. इंदौर के रहने वाले द्रविड ने 4 मई, 2003 को अपनी प्रेमिका और डौक्टर विजेता पेंढरकर से शादी कर ली थी.

शादी से पहले द्रविड ने 69 टेस्ट मैच खेले, जिसमें उन्होंने 53.47 की एवरेज से 5,614 रन बनाए. इसमें 14 सेंचुरी शामिल हैं. शादी करने के बाद द्रविड ने 95 मैच खेल और 51.5 की एवरेज से 7,674 रन बनाए. इनमें 22 सेंचुरी भी शामिल हैं.

वहीं वनडे में उन्होंने शादी से पहले 207 मैच खेले. 39.15 की औसत से 6,499 रन बनाए. शादी के बाद उन्होंने 137 मैच खेले. 39.2 की एवरेज से 4,390 रन बनाए, जिसमें 4 सेंचुरी भी शामिल हैं.

सौरव गांगुली

सौरव गांगुली अब तक बेहतरीन कप्तानों में से एक रहे हैं. गांगुली को लोग और उनके साथी दादा के नाम से बुलाते हैं. गांगुली ने फरवरी, 1997 में अपनी बचपन की दोस्त डोना रौय से शादी की थी.

शादी से पहले गांगुली ने 8 टेस्ट मैच खेले, जिसमें उन्होंने 49.29 की एवरेज से 690 रन बनाए. इसमें 2 सेंचुरी शामिल हैं. डोना से शादी करने के बाद दादा ने 105 मैच खेल और 41.54 की एवरेज से 6,522 रन बनाए. इनमें 14 सेंचुरी भी शामिल हैं.

वहीं वनडे में उन्होंने शादी से पहले 20 मैच खेले. 27.83 की औसत से बिना किसी सेंचुरी के 501 रन बनाए. शादी के बाद उन्होंने 291 मैच खेले. 41.94 की एवरेज से 10,862 रना, जिसमें 22 सेंचुरी भी शामिल हैं.

महेंद्र सिंह धोनी

धोनी की खेल यात्रा बहुत ही प्रभावित करने वाली रही है. एक सरकारी नौकरी छोड़ क्रिकेट के लिए उनका जुनून सभी को बहुत प्रेरित करता है. धोनी ने साल 2010 में शादी की थी और उनकी एक प्यारी से बेटी भी है जिसका नाम जीवा है.

शादी से पहले धोनी ने 43 टेस्ट मैच खेले, जिसमें उन्होंने 42.6 की एवरेज से 2,428 रन बनाए. इसमें 4 सेंचुरी शामिल हैं. शादी के बाद धोनी ने 47 मैच खेल और 34.48 की एवरेज से 2,448 रन बनाए. इनमें 2 सेंचुरी भी शामिल हैं.

वहीं वनडे में उन्होंने शादी से पहले 166 मैच खेले. 51.31 की औसत से 5,593 रन बनाए. इसमें 7 सेंचुरी शामिल हैं. शादी के बाद उन्होंने 145 मैच खेले. 51.87 की एवरेज से 4305 रन बनाए, जिसमें 3 सेंचुरी भी शामिल हैं.

रोहित शर्मा

रोहित शर्मा टीम इंडिया के शानदार बल्लेबाज हैं. साल 2015 में रोहित ने रितिका से शादी की थी. दोनों की मुलाकात एक प्रोफेशनल्स के तौर पर हुई थी लेकिन दोनों कब एक दूसरे को पसंद करने लगे यह किसी को पता नहीं चला. दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं, जो कि हाल ही में श्रीलंका के खिलाफ मोहाली में खेले गए वनडे में भी देखने को मिला था जब रोहित ने डबल सेंचुरी जड़ी थी.

शादी से पहले रोहित ने 16 टेस्ट मैच खेले, जिसमें उन्होंने 33.19 की एवरेज से 896 रन बनाए. इसमें 2 सेंचुरी शामिल हैं. शादी के बाद रोहित ने 7 मैच खेले और 84.17 की एवरेज से 505 रन बनाएं. इनमें 1 सेंचुरी भी शामिल हैं.

वहीं वनडे में उन्होंने शादी से पहले 143 मैच खेले. 39.71 की औसत से 4,567 रन बनाए. इसमें 8 सेंचुरी शामिल हैं. शादी के बाद उन्होंने 30 मैच खेले. 71.15 की एवरेज से 1,850 रन बनाए, जिसमें 8 सेंचुरी भी शामिल हैं.

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