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स्मार्टफोन चार्ज करते समय ना करें ये गलतियां

हममें से ज्यादातर लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल तो करते हैं पर उसकी बैटरी और चार्जिंग की समस्या को लेकर परेशान रहते हैं. ऐसे में आपको फोन बदलने की नहीं बल्कि, अपनी फोन चार्ज करने की आदत सुधारने की जरूरत है, क्योंकि अक्सर लोग फोन चार्ज करते समय कई सारी गलतियां कर बैठते हैं और उसके बाद से ही शुरू होती है फोन में कई सारी गड़बड़ियां.

फोन चार्जिंग को लेकर अंजाने में की गई गलती और आपकी लापरवाही की वजह से या तो आपका फोन खराब होता है या फिर चार्जर में ही दिक्कत आने लगती है. कई बार तो 6 महीने से पहले ही फोन की बैटरी खराब हो जाती है.

तो चलिए आज हम आपको इस समस्या से पार पाने का तरिका यानी कि ऐसी गलतियों के बारे बताते हैं जिन्हें आपको फोन चार्ज करते वक्त नहीं करनी चाहिए.

औरिजनल चार्जर से ही फोन चार्ज करें

फोन चार्ज करते वक्त हमेशा ध्यान रखें कि कभी भूलकर भी दूसरे या डुप्लिकेट चार्जर से फोन चार्ज ना करें. फोन चार्ज करते समय हमेशा असली चार्जर का ही इस्तेमाल करें. इसका फायदा यह होगा कि आपकी बैटरी की लाइफ बनी रहेगी, चार्जिंग प्वाइंट खराब नहीं होगा और फोन जल्दी चार्ज होगा और ज्यादा लम्बे समय तक चलेगा.

फास्ट चार्जर से करें तौबा

आजकल बाजार में कई सारे फास्ट चार्जर मौजूद हैं लेकिन ये आपके फोन के लिए किसी दुश्मन से कम नहीं हैं. इनसे आपका फोन जल्दी चार्ज तो हो जाता है लेकिन फोन की बैटरी भी बर्बाद हो जाती है. इसलिए जितना हो सकें इस तरह के चार्जर से अपना फोन चार्ज करने से बचें.

रात में फोन को चार्ज में लगाकर ना छोड़ें

कई लोगों की आदत होती है कि रात में फोन को चार्ज में लगाकर सो जाते हैं और पूरी रात फोन चार्ज होता रहता है, जबकि चार्जिंग समय ज्यादा से ज्यादा 2-3 घंटे का ही होता है. अगर आप भी ऐसा करते हैं तो आज से अपनी इस आदत को सुधार लीजिए, क्योंकि ऐसा करने से फोन भी गर्म होने लगता है और बैटरी भी जल्द ही खराब हो जाती है.

100% चार्जिंग से बचे

कभी भी फोन को 80% से ज्यादा चार्ज ना करें, क्योंकि इसके बाद बैटरी गर्म होने लगती है और उसकी लाइफ कम हो जाती है. वैसे भी 80 फीसदी चार्जिंग पूरे दिन के लिए काफी है.

पावर सेवर ऐप से बचें

कई लोग बैटरी बचाने का दावा करने वाले थर्ड पार्टी ऐप फोन में इंस्टौल करके रखते हैं, ऐसा ना करें क्योंकि इस तरह के ऐप हमेशा आपके फोन को नुकसान ही पहुंचाते हैं. दरअसल ऐसे ऐप फोन पर प्रेशर बनाते हैं और उसे भारी कर देते हैं. इसके बाद आपका फोन हैंग होने लगता है.

टर्म इंश्योरैंस के फायदे जानते हैं आप

बीमा लेते वक्त ज्यादातर लोग इस बात का खयाल नहीं रखते कि बीमा कवर कितना होना चाहिए जिस से आने वाले समय में अपनों की बीमारी, पढ़ाई, शादीब्याह के मौके पर किसी प्रकार का वित्तीय दबाव न झेलना पड़े. जो लोग पर्याप्त बीमा कवर लेने की सोचते हैं वे ऊंचे प्रीमियम के चलते ऐसा कर नहीं पाते. ऐसी स्थिति में मौजूदा जरूरतों को और मुद्रास्फीति का ध्यान रखते हुए टर्म इंश्योरैंस प्लान प्रत्येक के लिए बेहतरीन विकल्प है.

बैंक बाजार डौट कौम के सीइओ व कोफाउंडर आदिल शेट्टी का कहना है, ‘‘टर्म इंश्योरैंस आप को जीवन में निश्चितता देता है. दरअसल इस के जरीए आप कम प्रीमियम पर बड़ा बीमा कवर खरीद पाते हैं. अच्छा तो यह रहेगा कि आप अपनी मौजूदा सालाना आय का 20 गुना के बराबर बीमा कवर लें. इस से आकस्मिक मृत्यु की स्थिति में परिजनों को संपूर्ण वित्तीय सुरक्षा मिलती है.’’

क्या है टर्म इंश्योरैंस

यह बीमा का ही एक प्रकार है. हालांकि दूसरे बीमा विकल्पों की तुलना में यह खास इसलिए है, क्योंकि यह काफी सस्ता है और इस से पर्याप्त कवर मिलता है. दरअसल, टर्म इंश्योरैंस में कोई कैश वैल्यू नहीं होती. टर्म प्लान 10, 20, 30 या 50 वर्षों के लिए भी हो सकता है. यदि इस अवधि में बीमित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उस के नौमिनी कवर की राशि क्लेम कर सकते हैं.

टर्म इंश्योरैंस की औनलाइन खरीदारी सस्ती है. दरअसल, उपभोक्ता जब औनलाइन पौलिसी लेता है तो संबंधित बीमा कंपनी को इंश्योरैंस एजेंट और कागजी कार्यवाही पर खर्च नहीं करना पड़ता है. लिहाजा इस का फायदा बीमा कंपनी सीधा पौलिसीधारक को उपलब्ध कराती है. साथ ही बीमा खरीदते वक्त औनलाइन फार्म भरने से आप कई औपचारिकताओं से भी बच जाते हैं.

पर्याप्त बीमा कवर

टर्म इंश्योरैंस व्यक्ति को न्यूनतम प्रीमियम पर अधिकतम कवर उपलब्ध कराता है. उदाहरण के तौर पर यदि मुंबई में रहने वाला 30 वर्ष का युवक जो धूम्रपान नहीं करता, वह 30 साल के लिए एक करोड़ रुपए के कवर वाला टर्म प्लान लेता है तो इस का सालाना प्रीमियम 7,497 रुपए से शुरू होता है. यही व्यक्ति अगर इतनी ही अवधि के लिए 50 लाख रुपए का कवर लेता है तो इस का सालाना प्रीमियम 4,222 रुपए से शुरू होता है.

सर्वाइवल बैनिफिट

रैग्युलर टर्म प्लान में प्रावधान है कि यदि बीमा की अवधि में बीमित व्यक्ति सहीसलामत है, तो उसे मैच्योरिटी पर कोई कैश वैल्यू नहीं प्राप्त होती. लेकिन टर्म इंश्योरैंस की श्रेणी में ही टर्म रिटर्न औफ प्रीमियम प्लान्स (टीआरओपी) का भी विकल्प मौजूद है. इस में प्लान की मैच्योरिटी पर प्रीमियम रिफंड का विकल्प होता है.

लो क्लेम रिजैक्शन

यदि आप का टर्म इंश्योरैंस 10 साल से अधिक समय तक सक्रिय रहा है तो क्लेम खारिज होने की संभावना बेहद कम होती है. यदि आप ने 50 लाख रुपए या इस से कम राशि का टर्म प्लान लिया है तो बहुत सी बीमा कंपनियां आप से हैल्थ चैकअप कराने का आग्रह भी नहीं करती हैं.

राइडर्स

राइडर्स के जरीए आप अपने टर्म इंश्योरैंस को समयसमय पर और बेहतर बना सकते हैं. इस से आप को कई अन्य जोखिमों का भी कवर मिल जाएगा. उदाहरण के तौर पर आप बेहद कम कीमत पर टर्म प्लान के तहत ऐक्सीडैंटल डैथ बैनिफिट, क्रिटिकल इलनैस, पार्शियल और परमानैंट डिसैबिलिटी कवर जैसी अतिरिक्त सुविधाओं को भी जुड़वा सकते हैं.

फ्लैक्सिबल पेमैंट औप्शन

टर्म इंश्योरैंस पौलिसी में पौलिसीधारक को उस की सुविधा अनुसार प्रीमियम भुगतान के कई विकल्प मिलते हैं. मसलन इस में आप को सीमित भुगतान या एकमुश्त भुगतान या फिर नियमित भुगतान का विकल्प मिलता है, जिस का मतलब है कि आप पौलिसी प्रीमियम की पेमैंट मासिक, तिमाही या फिर सालाना आधार पर कर सकते हैं.

कर छूट का फायदा

परिजनों की वित्तीय सुरक्षा के साथ ही टर्म इंश्योरैंस पर पौलिसीधारक को आयकर छूट का भी फायदा मिलता है. पौलिसीधारक इस पर आयकर अधिनियम की धारा 80(सी) के तहत कर छूट प्राप्त कर सकते हैं. इस के अलावा बीमित व्यक्ति की यदि मृत्यु हो जाए तो उस के द्वारा नामांकित व्यक्ति को बीमा की जो राशि मिलती है उस पर भी धारा 10 (10डी) के तहत कर छूट का प्रावधान है.

सोशल मीडिया कहीं बढ़ा न दे अपनों के बीच दूरियां

सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल और घटती, वैवाहिक संतुष्टि के बीच सीधा संबंध है. सोशल मीडिया वैवाहिक जीवन की गुणवत्ता और प्रसन्नता को कम कर रहा है. इस से तलाक के मामले लगतार बढ़ रहे हैं.

कंप्यूटर्स इन ह्यूमन बिहेवियर नामक पत्रिका के एक अध्ययन के मुताबिक फेसबुक इस्तेमाल करने वालों की संख्या में 20 फीसदी की वार्षिक वृद्घि के साथ तलाक दर में 2.18 से 4.323 फीसदी तक की वृद्घि दर्ज की गई है

सुनने में भले ही अजीब लगे पर यह सच है कि सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर आप का व्यवहार आप के जीवनसाथी का दिल दुखा सकता है. यह बात बहुत से अध्ययनों में स्पष्ट हो चुकी है. रिश्तों के मनोविज्ञान में सोशल मीडिया की उलझनें अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगी हैं. अध्ययनों के मुताबिक, जो लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करते वे अपनी वैवाहिक जिंदगी में 11 फीसदी तक अधिक प्रसन्न रहते हैं.

सोशल मीडिया किस तरह से रिश्तों को प्रभावित कर रहा है, यह बात हालफिलहाल की इन घटनाओं से स्पष्ट है-

दिल्ली की गीता कालोनी इलाके में एक युवक ने खुद को इसलिए गोली मार ली क्योंकि उसे शक था कि उस की बीवी का किसी पुलिस वाले के साथ अफेयर चल रहा है.

हसीन नाम के इस 32 वर्षीय युवक ने 14 जून की सुबह अपनी पत्नी का मोबाइल देखा तो उस में एक पुलिस वाले से की गई चैटिंग नजर आई. इसी बात पर दोनों के बीच झगड़ा हुआ. झगड़े के दौरान हसीन ने खुद को गोली मार कर खुदकुशी कर ली.

पुणे में 34 साल के आईटी प्रोफैशनल राकेश ने जनवरी में पत्नी की हत्या करने के बाद आत्महत्या कर ली. वजह बहुत छोटी सी थी. राकेश की पत्नी सोनाली ने पर्सनल चीजें व्हाट्सऐप पर शेयर की थीं.

सुसाइड नोट में राकेश ने इस बात का जिक्र किया था कि शादी के 6 वर्षों बाद भी उन की कोई संतान नहीं थी और इस के लिए दंपती का इलाज चल रहा था. पत्नी अपनी मैडिकल डिटेल्स सोशल मीडिया पर फ्रैंड्स और रिलेटिव्स से शेयर किया करती थी. इसी वजह से उन के बीच झगड़े होते रहते थे.

चंडीगढ़ की एक महिला ने तलाक का फैसला ले लिया क्योंकि उस का पति देररात तक व्हाट्सऐप पर ऐक्टिव रहता था. महिला ने डीएलएसए यानी डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज अथौरिटी से इस संदर्भ में सहायता मांगी. महिला का कहना था कि वह अपने मांबाप के घर गई हुई थी. रात में पति से व्हाट्सऐप पर बातें कर वह सोने चली गई. फिर जब सुबहउस ने व्हाट्सऐप पर पति का औनलाइन स्टेटस चैक किया तो पाया कि उस का पति देररात तक व्हाट्सऐप पर ऐक्टिव था. इसी आधार पर महिला ने शक जाहिर किया कि उस के पति का किसी महिला के साथ अफेयर चल रहा है.

कुछ ऐसा ही मामला है जब एक महिला अपने पति द्वारा नैटवर्किंग साइट्स पर कमैंट्स न किए जाने के कारण झगड़ पड़ी. दरअसल, उस के पति ने उस की नई अपलोड की गई फोटोज को लाइक नहीं किया था और न ही कोई कमैंट किया था. महिला का दावा है कि उस की सारी सहेलियों ने फोटोज लाइक किए सिवा उस के पति के.

सोशल मीडिया की बढ़ती घुसपैठ

एक समय था जब किसी को संदेश भेजने के लिए कबूतरों और पोस्टकार्डों का सहारा लेना पड़ता था. महीनों इंतजार के बाद कोई खैरखबर मिलती थी. आज सोशल मीडिया की बदौलत सात समंदर पार बैठे व्यक्ति को भी पलभर में लंबेलंबे संदेश भेजे जा सकते हैं, उस से बातें की जा सकती हैं.

सब से पहले 1995 में क्लासमेट्स डौट कौम नाम से स्कूलकालेज के लोगों को जोड़ने के लिए पहली सोशल साइट की शुरुआत हुई थी. बाद में 2004 में मार्क जुकरबर्ग द्वारा फेसबुक के ईजाद के बाद तो जैसे सोशल मीडिया क्षेत्र में क्रांति आ गई. इसे और भी ज्यादा बढ़ावा मिला जब मोबाइल फोन के जरिए घरघर में सोशल मीडिया ने अपनी पैठ बना ली. आज विश्व में करीब 200 से ज्यादा नैटवर्किंग साइट्स हैं जिन में फेसबुक, ट्विटर, औरकुट, माई स्पेस, लिंक्डइन, इंस्टाग्राम, फ्लिकर, व्हाट्सऐप आदि प्रमुख हैं.

आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2016 में जब पूरी दुनिया की आबादी 7.3 अरब थी तो 3.4 अरब से ज्यादा लोग इंटरनैट इस्तेमाल कर रहे थे. ऐक्टिव सोशल मीडिया यूजर्स की बात करें, तो यह संख्या 2.3 अरब से ज्यादा थी.

भारत में कुल आबादी का करीब 28.4 फीसदी यानी 37 करोड़ लोग इंटरनैट का प्रयोग कर रहे हैं. जिन में से 10.3 व्यक्ति ऐक्टिव यूजर्स हैं.

नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक, औनलाइन सक्रिय रहने वाले 42 फीसदी वयस्क एक से अधिक सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर व्यस्त रहते हैं.

एकतरह से सोशल मीडिया ने दुनिया मुट्ठी में कर ली है, मगर साथ ही यह रिश्तों में जहर घोलने का काम भी करने लगा है. इस के मनोवैज्ञानिक, शारीरिक, मानसिक प्रभाव खतरनाक साबित हो रहे हैं. जरमनी में हुए एक शोध के मुताबिक, सोशल मीडिया के कारण 35 फीसदी लोगों को रिलैक्स होने और सोने में परेशानी आती है जबकि 55 फीसदी लोग परेशान व चिंतित महसूस करते हैं.

मनोवैज्ञानिक असर

सोशल मीडिया का अधिक इस्तेमाल करने वालों में भावनात्मक समस्याएं पैदा हो जाती हैं. उन का जीवन मशीनी हो जाता है. ऐसे में पतिपत्नी एकदूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस नहीं करते जबकि अंतरंग रिश्ते में भावनाएं प्रमुख भूमिका निभाती है.

ये समस्याएं तब और भी बढ़ जाती हैं जब पतिपत्नी या दोनों एकदूसरे के बजाय विभिन्न सोशल साइटों पर अधिक समय बिताने लगते हैं. इस से दोनों के बीच विश्वास का मुद्दा आ जाता है. उन्हें लगता है कि उन का जीवनसाथी उन से प्यार नहीं करता, उन की परवा नहीं करता या किसी और के साथ संबंध में है.

केरल स्थित बिशप हेबर कालेज में हुए एक शोध के मुताबिक, भारत में तलाक के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. पहले इस के सामाजिक और आर्थिक पहलू ही प्रमुख थे लेकिन आधुनिक जीवनशैली ने अब मनोवैज्ञानिक पहलू भी जोड़ दिया है.

इस संदर्भ में दिल्ली के बीएलके हौस्पिटल के मनोवैज्ञानिक डा. मनीष जैन कहते हैं, ‘‘आज लोग फेसबुक प्रोफाइल्स से आकर्षित हो कर दोस्त बना लेते हैं और झटपट शादी करने का फैसला ले लेते हैं. जो रिश्ता आकर्षण से शुरू होता है वह अकसर ईर्ष्या पर खत्म होता है. जब पति या पत्नी, दोनों में से किसी को लगता है कि उन का जीवनसाथी उन्हें नजरअंदाज कर हा है तो वे एंग्जाइटी का शिकार हो जाते हैं.

असुरक्षा की भावना उन्हें कुछ ऐसे कदम उठाने को मजबूर कर देती है जो उन के वैवाहिक जीवन को टूटने के कगार पर ले जाते हैं. वे दूसरे पुरुषों

या महिलाओं से साइबर रिलेशन विकसित कर लेते हैं ताकि वे अपने अकेलेपन को दूर कर सकें. इन वर्चुअल रिश्तों का प्रभाव वास्तविक रिश्तों पर पड़ता है जो आखिरकार उन्हें तलाक की ओर ले जाता है.’’

फैमिली ला फर्म मैकिनले इरविन के अध्ययन के मुताबिक, 3 में से 1 शादी औनलाइन अफेयर्स, फेसबुक ऐक्टिविटीज आदि के कारण टूट रही हैं. इस अध्ययन में ऐसी कई बातें निकल कर आई हैं जो सोशल मीडिया की वजह से रिश्तों के प्रभावित होने की वजह दर्शाती हैं.

विवादों की जड़ :  4 में से 1 विवाहित व्यक्ति ने स्वीकार किया कि हफ्ते में 1 दिन जीवनसाथी से उन की बहस इस बात पर होती है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल कितना किया जाना चाहिए. 17 फीसदी ने कहा कि उन का अपने जीवनसाथी के संग रोज सोशल मीडिया ऐक्टिविटीज को ले कर झगड़ा होता है. 58 फीसदी लोगों ने स्वीकार किया कि वे अपने जीवनसाथी का पासवर्ड जानते हैं जबकि इस बात की खबर जीवनसाथी को नहीं है.

ईर्ष्या का गढ़ :  एक तरफ तो लोग सोशल मीडिया पर बेमतलब के अपडेट्स करते रहते हैं, दूसरी ओर यह ईर्ष्या और वैमनस्य की वजह भी बनता जा रहा है. किसी और को किए गए कमैंट्स और लाइक्स कब आप के जीवनसाथी के दिल में ईर्ष्या की आग लगा दें, कोई नहीं जानता. अध्ययन में मौजूद 10 फीसदी से ज्यादा लोगों ने स्वीकारा कि फेसबुक ईर्ष्या और मुसीबतों का स्रोत है. 15 फीसदी लोगों ने माना कि सोशल मीडिया उन की वैवाहिक जिंदगी की शांति के लिए बहुत बड़ा खतरा है. 16 फीसदी लोगों ने फेसबुक की वजह से अपने रिश्ते में ईर्ष्या पैदा होने की बात स्वीकारी.

समय की बरबादी :  अध्ययन में पाया गया कि व्यक्ति सोशल मीडिया में क्या कर रहा है, इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि वह इस में कितना समय बिता रहा है. बरबाद किया जाने वाला यह व्यक्त ही दंपती के बीच विवाद की जड़ होता है.

शक का आधार :  3 में से 1 व्यक्ति अपने जीवनसाथी से सोशल मीडिया पासवर्ड छिपाता है, भले ही विवाह को सदा से ऐसा बंधन माना जाता रहा है जिस में कोई भी बात राज नहीं रखनी चाहिए, मगर करीब  33 फीसदी लोग अपने साथी की जासूसीभरी नजरों से छिपने के लिए पासवर्ड बताने से बचते हैं. 10 में से 1 व्यक्ति द्वारा अपने साथी से फेसबुक की कई खास पोस्ट्स और मैसेजेज आदि छिपाने की बात भी स्वीकारी गई है. करीब 8 से 10 फीसदी लोगों के गोपनीय सोशल मीडिया अकाउंट्स पाए गए.

बढ़ती है दरार :  25 फीसदी लोगों ने स्वीकारा कि सप्ताह में 1 दिन फेसबुक की वजह से पार्टनर के साथ उन की लड़ाई छिड़ जाती है. 5 में से 1 व्यक्ति के मन में अपने रिश्ते को ले कर संदेह पाया गया और इस की वजह फेसबुक पर पार्टनर द्वारा की जा रही कोई संदेहास्पद गतिविधि होती है.

दरअसल, जब भी व्यक्ति अपने साथी के सोशल मीडिया से जुड़े अकाउंट खंगालता है, कुछनकुछ गलत पोस्ट या फोटोज उसे नजर आ ही जाते हैं. ऐसे में वह अपने रिश्ते को ले कर असहज हो जाता है. उसे डर रहने लगता है कि कहीं उस का पार्टनर किसी और के करीब तो नहीं? यही डर और असहजता धीरेधीरे विवाद के रूप में प्रकट होने लगती है. किसी अंजान नंबर से आने वाले फोनकौल्स या मैसेजेज की वजह से घर में घमासान हो जाता है.

लाइक्स और कमैंट्स के चक्कर में समय बरबाद करने वाले व्यक्ति, जीवनसाथी या घर पर पूरा ध्यान नहीं दे पाते. ऐसा लोग वर्चुअल वर्ल्ड में तो लोकप्रिय रहते हैं मगर अपने जीवनसाथी और आसपास के लोगों के साथ उन के रिश्ते कमजोर पड़ने लगते हैं.

सोशल मीडिया से औनलाइन अफेयर्स होने के मौके बढ़ जाते हैं. ‘फेसबुक ऐंड योर मैरिज’ पुस्तक के लेखक जैसन क्राफ्सकी कहते हैं कि जब दंपती सोशल मीडिया साइट्स का प्रयोग करते हैं तो इतना ही काफी नहीं कि आप का इरादा अच्छा हो. वैसे भी, ज्यादातर अफेयर इसलिए शुरू नहीं होते कि आप ऐसा करना चाहते थे, बल्कि सोशल मीडिया द्वारा लोगों के सामने इस तरह के प्रलोभन रखे जाते हैं कि व्यक्ति अनायास ही उस रास्ते पर चल पड़ता है.

जरूरी है कि व्यक्ति अपने जीवन में संतुलन बना कर चले. कई मानों में सोशल मीडिया में ऐक्टिव रहना जरूरी हो जाता है. मगर यह भी ध्यान रखें कि यह वर्चुअल वर्ल्ड है, रियल नहीं. यदि हम इसे जरूरत से ज्यादा समय देंगे तो रियल रिलेशनशिप सैकंडरी बनने लगेगी, दूरियां बढ़ेंगी और झगड़े होंगे. बेहतर है कि शुरू से इस तरह बैलेंस बना करचलें कि आप का जीवनसाथी आप की जिंदगी में सदा अपनी अहमियत महसूस करता/करती रहे.

 

वह डायन नहीं थी : अफवाहों ने ली एक दलित की जान

अफवाहें बेलगाम होती हैं. उन की कोई सरहद नहीं होती. लेकिन ये जब हदों को लांघ जाती हैं, तो लोगों और समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा बन जाती हैं. ऐसी ही अफवाह ने एक 65 साला गरीब दलित औरत की जान ले ली.

दरअसल, उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के मुटनई गांव की रहने वाली दलित मान जाटव के लिए 2 अगस्त, 2017 जिंदगी की आखिरी तारीख बन गई. मान जाटव तड़के शौच के लिए खेतों में गई थीं. उन्हें कम दिखाई देता था. अंधेरे की वजह से वे रास्ता भटक कर बघेल समाज की बस्ती में निहाल सिंह के घर के बाहर पहुंच गईं.

इसी बीच एक लड़की ने उन्हें देख कर शोर मचा दिया, जिस के बाद लोग जाग गए और पहली ही नजर में मान जाटव को चोटी काटने वाली ‘डायन’ करार दे दिया गया.

इस के बाद मान जाटव के साथ रूह कंपा देने वाली हैवानियत हुई. निहाल सिंह के बेटे मनीष व सोनू समेत दूसरे लोगों ने उन्हें लाठीडंडों से पीटना शुरू कर दिया. वे चिल्ला रहे थे कि चोटी काटने वाली ‘डायन’ पकड़ी गई है, जबकि मान जाटव बचने की हरमुमकिन कोशिश कर रही थीं और उन्हें बता रही थीं कि वे ‘डायन’ नहीं हैं, बल्कि उन्हीं के गांव की हैं.

गुस्से के गुबार में मान जाटव की कोई भी सुनने को तैयार नहीं था. अंधविश्वास के चश्मे ने लोगों को एक बेकुसूर औरत को बेरहमी से पीटने वाला मर्द बना दिया था.

पीटने वाले लोग अंधविश्वास में बुरी तरह अंधे थे. इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे मान जाटव को यह कह कर पीपल के पेड़ के पास ले गए कि वहां पीटने से पीपल पर रहने वाले भूतप्रेत भी कभी किसी को परेशान नहीं करेंगे.

उन्होंने मान जाटव को अधमरा कर के उन्हें दूसरी जगह ले जा कर पटक दिया. शोरशराबा होने पर मान जाटव के परिवार वालों को पता चला, तो वे वहां पहुंचे और उन्हें अस्पताल ले गए, लेकिन चोटें इतनी गंभीर थीं कि उन की मौत हो गई.

अंधविश्वास की इस भेंट से गांव में तनाव पैदा हो गया. पुलिस पहुंची, तो आरोपी अपने घरों से फरार हो गए.जांच में पता चला कि इलाके में औरतों व लड़कियों की चोटी काटने वाले कथित साए की अफवाह व दहशत थी. आरोपी परिवार की एक औरत की चोटी एक दिन पहले कट गई थी. इसी से उन्हें लगा कि ‘डायन’ चोटी काटने आई है.

अंधविश्वास ने मान जाटव को हमेशाहमेशा के लिए उन के परिवार से दूर कर दिया. उन का बेटा गुलाब कहता है, ‘पीटने वालों ने यह भी नहीं सोचा कि मेरी मां बुजुर्ग हैं. ऐसे तो कोई भी किसी को ‘डायन’ बता कर मार डालेगा.’

वैसे, इस बात में कोई दोराय नहीं है कि अगर मान जाटव का ताल्लुक किसी दबंग परिवार या ऊंची जाति से होता, तो शायद ही उन पर हमला होता. जब सामने वाले से ईंट का जवाब पत्थर से मिलने का डर हो, तो सारा गुरूर हवा हो जाता है.

यह वारदात कानून व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा कर गई. अगर कानून का डर होता, तो शायद ऐसा करने से लोग डरते.

एसएसपी दिनेश चंद्र दुबे कहते हैं, ‘घटना के कुसूरवार बख्शे नहीं जाएंगे. लोगों को समझना चाहिए कि चुड़ैल, डायन या भूतप्रेत जैसा कुछ नहीं होता है. अफवाह फैलाने वालों की सूचना पुलिस को देनी चाहिए.’

दरअसल, ‘चोटीकटवा’ की यह अफवाह नए किरदार के रूप में आई. इस से पहले साल 2001 में ‘मंकी मैन’ ने भी खूब दहशत फैलाई थी. इस के बाद ‘मुंहनोचवा’ आ गया था. कभी ‘काली बिल्ली’, कभी ‘बच्चा चोर’, तो कभी लोगों के घरों में आग लगने के किस्से सुने जाते रहे थे.

हैरानी की बात यह है कि किसी का भी कभी ठोस नतीजा सामने नहीं आया. समय के साथ ऐसी घटनाएं और किस्से थम जाते हैं. ऐसी अफवाहों को वैज्ञानिक अंधविश्वास और मनोचिकित्सक ‘आईडैंटिटी डिसऔर्डर’ नामक बीमारी का नाम देते हैं.

अफवाहें और अंधविश्वास जिस तेजी से अपना काम करते हैं, वे कानून व्यवस्था के लिए खतरा बन जाते हैं. इस के चक्कर में कभी किसी बेकुसूर को पीटा जाता है, तो कभी किसी की हत्या कर दी जाती है.

मान जाटव भी इसी का शिकार हुईं. ऐसी अफवाहों से जादूटोना व तंत्रमंत्र करने वालों की दुकानें जरूर चालू हो जाती हैं, क्योंकि समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो अंधविश्वास का शिकार हो कर हर मर्ज का इलाज ऐसी जगहों पर खोजते हैं. अंधविश्वास का फायदा उठा कर उन्हें जम कर लूटा जाता है.

डायन या चुड़ैल जैसी कोई चीज दुनिया में नहीं होती, लेकिन ज्यादातर मामलों में अपढ़ व दलित औरतें ही इस का शिकार होती हैं. नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, देश के झारखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा, कर्नाटक, असम, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा जैसे राज्यों में यह बुराई फैली हुई है.

साल 2000 से साल 2012 के बीच ही जादूटोना करने के आरोप में देशभर में 2 हजार से ज्यादा लोगों की हत्याएं हुईं. इन में ज्यादातर औरतें ही थीं. बांझ, कुंआरी या विधवा औरतों को शिकार बनाना आसान होता है. ऊंची जाति वाले व दबंग लोग गरीब व आदिवासियों को डायन के रूप में बदनाम कर देते हैं.

संपत्ति का अधिकार छीनने, तंत्रमंत्र के काम को आबाद करने व भेदभाव के चलते भी ऐसी वारदातें होती हैं. यह लोगों की ओछी सोच को दिखाती है कि वे भूतप्रेत, डायन या चुड़ैल के नाम पर किसी की हत्या तक कर देते हैं.

एक साल पहले झारखंड राज्य के रांची के मांडर गांव में डायन बता कर अलगअलग परिवार की 5 औरतों की हत्या कर दी गई थी. इस राज्य में हत्याओं का आंकड़ा 12 सौ के पार है.

बिहार के भागलपुर जिले में भी एक महिला को ‘डायन’ बता कर मार डाला गया. दरभंगा जिले के पीपरा में तो दबंगों ने एक दलित औरत को डायन बता कर न सिर्फ उस के साथ मारपीट की, बल्कि मूत्र पिलाने की कोशिश भी की.

दहशत में परिवार ने गांव ही छोड़ दिया. इस राज्य की 418 औरतें चंद सालों में ऐसे ही अंधविश्वास की भेंट चढ़ गईं.

असम में ‘डायन’ बता कर एक औरत का सिर काट दिया गया. समाज की ऐसी हैवानियत यह बताने के लिए काफी है कि अंधविश्वास का आईना कितना खौफनाक है.

इस बात में कोई दोराय नहीं है कि अंधविश्वास से होने वाली घटनाएं सभ्य समाज को कलंकित करती हैं. लोगों को इस से बाहर निकलना चाहिए. अंधविश्वास और अफवाहें न फैलें, इस के उपाय सरकार को भी करने होंगे, ताकि फिर कोई मान जाटव अंधविश्वासों के गुस्से का शिकार न हो.

सब से खूबसूरत दुलहन दिखना चाहती हैं, तो आजमाएं ये टिप्स

शादियों का सीजन शुरू हो चुका है. मन में पिया मिलन के सपने संजोए हर दुलहन खूबसूरत दिखना चाहती है. फिर नईनवेली दुलहन जब स्टेज पर आती है तो सब का ध्यान उसी की ओर जाता है. दूल्हे राजा भी कनखियों से अपनी दुलहन को निहारने का कोई मौका नहीं छोड़ते. तो फिर क्यों न शादी से 1 महीना पहले से ही इस की तैयारी शुरू कर दी जाए ताकि आप दिखें निखरीनिखरी, संवरीसंवरी सब से खूबसूरत दुलहन.

शुरुआत अंदरूनी निखार से

अंदरूनी निखार का मतलब है आप की त्वचा प्राकृतिक रूप से खिली और निखरी नजर आए. इस के लिए उसे रोजाना देखभाल की जरूरत होगी. नियमित क्लीनिंग, टोनिंग और मौइश्चराइजिंग से त्वचा धीरेधीरे निखरने लगती है. क्लीनिंग के लिए किसी भी अच्छे क्लीनिंग लोशन से सोने से पहले चेहरे, गरदन और हाथपैरों को अच्छी तरह साफ करें. इस के बाद टोनर और मौइश्चराइजर से त्वचा की अच्छी तरह मसाज कर के सोएं.

अपनी त्वचा को सुकोमल और चमकदार बनाने के लिए दूध और दही का प्रोटीन इस्तेमाल करें. इस के अलावा ऐसेंशियल औयल भी मसाज के लिए अच्छा है. लूफा और स्क्रब से पूरे शरीर को स्क्रब करें ताकि मृत त्वचा हट जाए और त्वचा को भरपूर औक्सीजन मिल सके.

होम ब्लीचिंग

शादी की शौपिंग करतेकरते धूप में त्वचा की रंगत सांवली हो सकती है. इसे ठीक करने के लिए घर पर बनाया ब्लीच बैस्ट रहेगा. इस के लिए फुलक्रीम मिल्क पाउडर में हाइड्रोजन पैरोक्साइड की इतनी बूंदें मिलाएं कि पेस्ट बन जाए. फिर इस में ग्लिसरीन की कुछ बूंदें मिलाएं और त्वचा पर लगाएं. 15 मिनट बाद धो लें. कभीकभी ब्लीचिंग से त्वचा में रूखापन आ जाता है. अगर ऐसा हो तो कोई अच्छा सा मौइश्चराइजिंग लोशन लगाएं. अगर त्वचा में पिगमैंटेशन हैं तो विटामिन ई कैप्सूल को तोड़ कर कैस्टर औयल में मिला कर चेहरे पर लगाएं.

बालों की देखभाल

बालों की देखभाल का सब से बेहतर तरीका यह है कि उन्हें नियमित रूप से क्लीनिंग और कंडीशनिंग दें. अपने बालों की नियमित रूप से गरम तेल से मसाज करें. कैस्टर औयल, सनफ्लौवर औयल या कोकोनट औयल में कुछ बूंदें अरोमा लैंगलैंग औयल मिला कर मालिश करें. इस से बालों को पोषण तो मिलेगा ही, साथ ही वे सिल्की और खूबसूरत भी लगेंगे. बालों की कंडीशनिंग के लिए मेथीदाना और दही का पैक बना कर लगाएं. अगर बालों को कलर करवाना है तो पहले से टैस्ट कर लें. कहीं ऐसा न हो कि हेयर कलर सूट न करे और लेने के देने पड़ जाएं.

बालों की स्ट्रेटनिंग सब से लास्ट में करवाएं. अगर रूसी है तो इस के लिए पहले से ट्रीटमैंट ले लें. दही बालों को प्रोटीन देने के साथसाथ रूसी को भी हटाता है. रोज सोने से पहले बालों की अच्छी तरह कौंबिंग करें. इस से बालों की भीतरी त्वचा में ब्लड सर्कुलेशन सही रहेगा, जिस से बालों की चमक बढ़ेगी.

त्वचा बने चमकदार

अपने हाथपैरों और गरदन की त्वचा का खास खयाल रखें. नैचुरल देखभाल के लिए किसी भी गूदेदार फल को मैश कर के उस में मिल्क पाउडर मिला कर त्वचा पर लगाएं और 20 मिनट बाद धो लें. कुछ बूंदें औलिव औयल ले कर पूरे शरीर की मसाज करें. हैंड व फुट क्रीम रोजाना लगाएं. बादाम का तेल भी मसाज के लिए अच्छा रहेगा. नियमित मसाज से त्वचा कांतिमय बनेगी.

त्वचा के निखार के लिए फल और सब्जियां ज्यादा खाएं. साथ में सलाद भी लें. फ्रूट जूस त्वचा में प्राकृतिक चमक लाने का बेहतर उपाय है.

शादी की शौपिंग के लिए नियमित बाहर जाना पड़े तो घर वापस आने पर त्वचा को रिलैक्सेशन दें. कच्चे दूध और गुलाबजल से त्वचा को टोन्ड करें.

भरपूर नींद लें

अकसर शादी की दौड़भाग, आने वाली खुशियों के बारे में सोचसोच कर और गानेबजाने के चक्कर में दुलहन की नींद पूरी नहीं होती, जिस से आंखों के नीचे काले घेरे पड़ जाते हैं. चाहे कुछ भी हो सारे सोचविचार छोड़ कर भरपूर और गहरी नींद सोएं ताकि शादी के दिन आप खिलीखिली और निखरी नजर आएं. नियमित मैडीटेशन व्यर्थ के तनाव को दूर करने में मददगार साबित होगा. नियमित मैडीटेशन से दिमाग शांत और संतुलित रहेगा, जिस से नींद अच्छी आएगी और चेहरा आभायुक्त रहेगा.

पार्लर की बुकिंग

आप जिस पार्लर में हमेशा जाती हैं वही पार्लर बुक करवाएं, क्योंकि वहां की ब्यूटीशियन आप की त्वचा के स्वभाव को अच्छी तरह जानती है. मैनीक्योर, पैडीक्योर, मसाज, फेशियल वगैरह के साथ शादी वाले दिन मेकअप भी वहीं से करवाएं, क्योंकि नियमित रूप से जाने की वजह से वह आप से भावनात्मक रूप से जुड़ी होती है, इसलिए वह आप को अपना समझ कर तैयार करेगी.

सही लहंगे का चुनाव

शादी वाला दिन दुलहन के लिए सब से खास होता है. इस दिन सभी की नजरें उसी पर होती हैं. घराती और बरातियों का अटैंशन पाना है तो सही लहंगे का चुनाव जरूरी है ताकि जब आप दुलहन बन कर स्टेज पर जाएं तो सब की निगाहें बस आप पर जम जाएं खासकर दूल्हे राजा की. अपने कद, त्वचा के रंग और शारीरिक गठन को देखते हुए लहंगे का चुनाव करें.

लंबी और दुबली लड़कियों के लिए ज्यादा घेर वाला लहंगा सही रहेगा. गोरे रंग के लिए सौफ्ट पेस्टल, पिंक, पीच या लाइट सौफ्ट ग्रीन कलर खूब जंचेगा पर लहंगे का आदर्श रंग लाल ही होता है. लाल रंग के लहंगे में सजी दुलहन का रूप कुछ अलग ही निखर कर आता है.

छोटे कद वाली दुलहन के लिए कम घेरदार लहंगा सही रहेगा. अगर आप का रंग गेहुआं है तो रूबी रैड या औरेंज लहंगे का चयन कर सकती हैं. सांवली रंगत के लिए लाल या मजैंटा कलर का लहंगा ठीक रहेगा. अगर लहंगा हैवी वर्क वाला हो तो चुनरी हलकी होनी चाहिए. यह ध्यान रहे कि आप का लहंगा इतना भी हैवी न हो कि संभाला ही न जाए.

ज्वैलरी का चयन

ब्राइडल लहंगे के बाद बारी आती है सही ज्वैलरी के चयन की. मार्केट में हलकी और हैवी हर तरह की डिजाइन की ज्वैलरी मिलती है. पोलकी ब्राइड ज्वैलरी आजकल ट्रैंड में है. पोलकी सैट में सोने के अंदर बिना कटे हुए डायमंड या कीमती स्टोन्स होते हैं. स्टोन ड्रौप और पर्ल के पोलकी गहने भी जंचते हैं.

अगर आप का बजट अच्छा है तो डायमंड ब्राइडल सैट खरीद सकती हैं. गोल्ड से बना पूरा सैट, जिस में मैचिंग इयररिंग्स, कड़े और मांगटीका भी शामिल हो तो वह भी खूब जंचेगा. अगर आप कुछ हट कर और यूनीक दिखना चाहती हैं, तो ऐंटीक ज्वैलरी आप को क्लासिक लुक देगी.

बैटरी की खपत से परेशान यूजर अपनाएं ये आसान तरीका

अगर आप भी उन यूजर्स में से एक हैं जिन्हें लो बैटरी से बार-बार शिकायत रहती है, तो ये ख़बर आपके काम आ सकती है. अच्छे बैटरी बैकअप के लिए कई बार आपको ज्यादा मजबूत बैटरी की नहीं बल्कि कुछ ट्रिक्स की जरूरत होती है. इन ट्रिक्स को अपनाकर बैटरी की खपत को कम किया जा सकता है. तो डालते इन ट्रिक्स पर एक नजर.

वाइब्रेशन औफ करें

फोन की सेटिंग्स में जाकर आप वाइब्रेशन को अपने मन मुताबिक सेट कर सकते हैं. जैसे की-बोर्ड टाइपिंग में बाइब्रेशन मोड औन होने की वजह से जब यूजर टाइप करते हैं तो फोन वाइब्रेट करता है. ये वाइब्रेशन आपके फोन की बैटरी की खपत करता है. इसको औफ करके बैटरी की खपत को आप कम कर सकते हैं. ऐसे ही अगर जरूरत न हो तो फोन वाइब्रेशन को भी औफ कर दें.

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लोकेशन सर्च औफ करें

लोकेशन सर्च एक ऐसा फीचर है जो बैटरी की खपत ज्यादा करता है. अक्सर यूजर इसे औन रखते हैं. अगर आपको जरूरत न हो तो इस फीचर को औफ कर दें.

फोन को अपडेट करें

फोन और ऐप्स को लगातार अपडेट करते रहना चाहिए. इससे फोन और बैटरी दोनों की परफार्मेंस बढ़ती है.

डाटा और वाईफाई

अगर आपके मोबाइल फोन का बैटरी कम है, तो सबसे पहले वाईफाई और डाटा औप्शन को औफ कर दें. वाईफाई और मोबाइल डाटा औन रहने से आपका मोबाइल हमेशा एक्टिव रहता है. ये अलग-अलग लोकेशन पर सिग्नल भी सर्च करता रहता है, जिससे आपके फोन की बैटरी तेजी से कम होती है.

ऐप्स अनइंस्टाल करें

अगर आप किसी ऐप को इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं तो बेहतर होगा इसे अनइंस्टाल कर दें.

अपने गैमिंग ऐप्स को चेक करें

कई गेम्स आपके मोबाइल फोन की बैटरी तेजी से खपत करते हैं. अगर आपके मोबाइल में कम बैटरी है तो ऐसे गेम्स को न खेलें.

ऊप्स मोमेंट्स : फैशन की दौड़ या पब्लिसिटी का फंडा

बॉलीवुड में एक्ट्रेस अपने कपड़ो और फैशन को लेकर काफी सर्तक रहती हैं और हर इवेंट या अवार्ड शो में बेहतर दिखने की चाहत उनमें होती है. लेकिन बेहतर दिखने की इस चाहत में उनके खूबसूरत लिबास कई बार उन्हें ऐसा धोखा दे देते हैं कि वे ऊप्स मोमेंट्स का शिकार हो जाती हैं. बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक की खूबसूरत एक्ट्रेसेस अधिकतर वॉर्डरोब मालफंक्शन का शिकार होती रहती हैं. लेकिन कई बार तो वे खुद ही अपनी खूबसूरती को अपने ट्रांसपेरेंट कपड़ों के जरिये दिखाकर खुद को खबरों की सुर्खियों में शामिल करती हैं.

हाल ही में कैटरीना कैफ ने भी कुछ ऐसा किया कि मीडिया ने उन्हें खबरों की सुर्खियों में शामिल कर दिया. हुआ कुछ यूं कि कैटरीना कैफ हाल ही में एयरपोर्ट गयीं और वहां पर उनके ब्लैक ट्रांसपेरेंट टॉप के नीचे से उनकी शाइन करती लिंगरी नज़र आई. इसी तरह आपकी चहेती अभिनेत्री आलिया भट्ट यानी सेक्सी राधा भी एक इवेंट में ऊप्स मूमेंट का शिकार हो चुकी हैं. उस इवेंट में हिस्सा लेने पहुंची सेक्सी राधा ने वाइट कलर की तंग ड्रेस पहन रखी थी जिसकी वजह वे  काफी असहज नजर आ रही थीं और इसी असहजता में आलिया के वे  कपड़े दिख गये, जो नहीं दिखने चाहिए. लेकिन जब तक वे अपने आप को संभाल पातीं तब तक काफी देर हो चुकी थीं.

पिछले दिनों भारत  की यात्रा पर आए ब्रिटेन की शाही दंपति प्रिंस विलियम और उनकी पत्नी केट मिडलटन ने जब इंडिया गेट पर स्थित अमर जवान ज्योति पर श्रद्धांजलि देने गए, तो श्रद्धांजलि देने के दौरान तेज हवा के झोंकों ने केट की ड्रेस हवा में उछाल दी. शर्मिंदगी से बचने के लिए केट ने फौरन स्कर्ट नीचे खींचकर संभाली लेकिन नाकाम रहीं. केट इतनी परेशान हो गईं, कि पूरे वक्त वो अपनी ड्रेस को ही संभालती रह गईं. बस फिर क्या था वहां मौजूद मीडिया के कैमरों ने इसे कैद कर लिया और सोशल मीडिया पर ये तस्वीर वायरल हो गई.इस मोमेंट को मर्लिन मुनरो मूमेंट का नाम दे दिया गया.

फ्रांस के कांन्स में होने वाले फिल्म फेस्टिवल में दुनिया भर के फ़िल्मी सितारे शिरकत करते है,और उनमे ग्लेमरस दिखने की होड़ रहती है. लेकिन ग्लेमरस दिखने की यह होड़ उन्हें कई बार ऐसी स्थिति में पहुंचा देती है कि न केवल उनकी जग हंसाई होती है, बल्कि उनकी इज्जत  भी पलित हो जाती है. कांस फिल्म फेस्टिवल के दौरान माईवेन ली बेस्को भी वार्डरोब मालफंक्शन का शिकार हो चुकी हैं. जर्मनी में मैन इन ब्लैक-3 के प्रीमियर के मौके पर मिकेला शैफर भी वार्डरोब मालफंक्शन का शिकार हुई.

हाल ही में हिंदी सिनेमा की मांझी हुई अदाकारा शबाना आजमी ने फ्रांस के कांस फिल्म फेस्टिवल को फैशन इवेंट की तरह इस्तेमाल करने पर नाराजगी जताई. शबाना आज़मी  ने टि्वटर को अपनी भावनाएं व्यक्त करने का जरिया बनाया और  ट्वीट किया कि कांस का दूसरा दिन लग रहा था जैसे कपडों की परेड हो. यह एक गंभीर फिल्म समारोह है, न कि फैशन इवेंट. फिल्म और फिल्ममेकर्स पर ध्यान देने के बारे में क्या ख्याल है?

ध्यान से देखा जाए तो लगता है महिलाओं को आजादी के नाम पे कपड़ों से आज़ाद करने की रणनीति हकीकत में पुरुषवादी सोच का नतीजा है, जो महिलाओं को हर दिन पुरुषों के ऐशओआराम की चीज़ बनाते हुए उन्हें गुलामी की ओर ले जा रही है. समाज में महिलाओं की भूमिका बदलने के साथ विज्ञापनों में उनकी छवि भी बदली है. आधुनिक विज्ञापनों में महिलाओं को सेक्स सिंबल के रूप में दिखाया जाता है.

रॉकेफेलर फाउंडेशन के ताजा सर्वे के अनुसार दुनियाभर में अंग प्रदर्शन के मामलें में भारतीय फिल्में सबसे आगे है. ये बात संयुक्त राष्ट्र महिला एवं रॉकेफेलर फाउंडेशन, जिनेवा के एक अध्ययन में साबित हुई है. अपनी फिल्मों में महिलाओं को आकर्षक तरीके से पेश करने के मामले में भारत की गिनती शीर्ष देशों  होती है. भारतीय फिल्मों की 35 फीसदी महिला कलाकार अंग प्रदर्शन करती हैं. यहां फिल्मों में महिला किरदारों को हॉट और सेक्सी दिखाया जाता है. सर्वे ने महिलाओं के साथ होने वाले पक्षपात, उनके प्रति व्यापक रूढ़ीवादी सोच, उनके प्रति कामुक नजरिए और अंतरराष्ट्रीय फिल्म उद्योग द्वारा उन्हें प्रभावशाली भूमिकाओं में कमतर रूप से पेश करने की प्रवृत्ति को उजागर किया गया है. भारत में महिला निर्माता-निर्देशकों और लेखकों की संख्या भी काफी ज्यादा नहीं है. भारत में महिला निर्माताओं की संख्या केवल 15.2 फीसदी है, जबकि विश्व में यह औसत 22.7 फीसदी है. सर्वे में पाया गया कि भारतीय फिल्मों में महिलाओं को एक सेक्स ऑब्जेक्ट की तरह ही पेश किया जाता है.

देह के मामले में आज के दौर में एक ही नियम लागू होता है- If You have it, flaunt it -यानी आपके पास दिखाने लायक शरीर है तो उसे दिखाइए. पूरा का पूरा फैशन उद्मोग स्त्री के इस देह सौंदर्य को कैसे उभारना है, किस अंग को कितना छिपाना व किसे कितना दिखाना है, पर ही टिका है. फैशन की इस होड़ में सभी बराबर के भागीदार हैं.

ठग्स आफ हिंदोस्तान : दर्शकों को ठगने वाली फिल्म, बोरियत के अलावा कुछ नहीं

1795 के ऐतिहासिक घटनाक्रम पर एक्शन प्रधान रोमांचक फिल्म तमाम बडे़ बड़े तामझाम व कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद वाहियात फिल्म साबित होती है. इस फिल्म को देखते समय मुझे बार बार एक स्टूडियो के सीओओ का यह कथ्य याद आ रहा था कि फिल्म की सफलता के लिए एक बेहतरीन रणनीति के साथ सिनेमाघरों में प्रदर्शित करना जरुरी होता है. इस हिसाब से ‘यशराज फिल्मस’ की रणनीति सफल रही.

पहली बात तो पिछले दो सप्ताह के दौरान ऐसी एक भी फिल्म प्रदर्शित नहीं हुई, जिसे दर्शक देखना चाहता. दूसरी बात ‘‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ को दीवाली की चार दिन की छुट्टी का फायदा भी मिलना है. धार्मिक सोच के अनुसार दीवाली की रात सोना नहीं चाहिए. इसलिए इस फिल्म के दीवाली की रात बारह बजे के बाद ही कई शो रख दिए गए, जिनकी कीमत भी काफी रखी गयी. सुबह पांच बजे से शुरू हुए हर शो के बाद टिकट की दरें बढ़ती गयीं. मुंबई से दूर दराज के इलाकों में डेढ़ सौ रूपए से सात सौ रूपए की टिकट दरें रही. तो चार दिन की छुट्टियों में यह फिल्म काफी कमाई कर लेगी, मगर यह ऐसी फिल्म नहीं है, जिसे याद रखा जाए.

फिल्म की कहानी 1795 की पृष्ठभमि में बंगाल के पास की रियासत रौनकपुर से शुरू होती है, जिसके राजा है मिर्जा सिकंदर बेग. ‘‘ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी’’ के जौन्ह क्लाइव (लायड ओवेन) उन पर समझौते के लिए दबाव डाल रहे हैं, सिकंदर मिर्जा बेग उनके खात्मे की योजना बना रहे हैं. इसकी खबर क्लाइव को लग जाती है और वह चाल चलकर मिर्जा के बेटे असलम, उनकी पत्नी व उन्हे मार देते हैं. पर मिर्जा की बेटी जफीरा को खुदा बख्श जहाजी उर्फ आजाद (अमिताभ बच्चन) बचाकर ले जाते हैं.

आजाद उन लोगों के सरदार हैं, जिन्हे अंग्रेजों का गुलाम बनकर जीना पसंद नहीं. फिर कहानी ग्यारह साल बाद शुरू होती है. अब जफीरा (फातिमा सना षेख) भी बड़ी होने के अलावा खुदा बख्श की ट्रेनिंग के चलते तीरंदाजी में माहिर हो गयी है. उसकी तमन्ना अपने माता पिता व भाई के कातिल से बदला लेना है. उधर आजाद आस पास के क्षेत्रों में मशहूर हो गए हैं. वह गुरिल्ला युद्ध करते हुए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को लूटकर भारतीयों की मदद करते रहते हैं. लोग उन्हे अपना मसीहा मानने लगे हैं. पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को आजाद से खतरा नजर आने लगा है.

उधर दुर्गापुर के शासक संग्राम सिंह, हथियारों व धन से आजाद की मदद कर रहे हैं. इन अंग्रेज के लिए अवध का एक ठग फिरंगी मल्लाह (आमिर खान) काम कर रहा है. फिंरगी भारतीय शासकों व धन्ना सेठों को लूटकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को लूट का माल देकर अपना हिस्सा लेता रहता है. फिरंगी एक नृत्यांगना सुरैया (कैटरीना कैफ) के प्यार में पागल हैं. सुरैया, क्लाइव के इशारे पर उनके महल में नाचती रहती हैं.

एक दिन फिरंगी, क्लाइव से आजाद को उनके सामने लाकर खड़ा करने का सौदा करता है. ठग फिरंगी नाटकीय ढंग से आजाद के अड्डे पर पहुंचने के साथ ही आजाद का विश्वास जीत लेता है. जब आजाद हथियार आदि लेने के लिए संग्राम सिंह के यहां जाते हैं, तो जफीरा व फिंरगी सहित कुछ लोग होते हैं. वहां फिरंगी, क्लाइव की मदद कर बता देता है कि आजाद आए हैं. खुदा बख्श उर्फ आजाद व फिरंगी के बीच बहस होती है. फिर दोनों के बीच युद्ध होता है, अंततः खुदा कख्श, जफीरा की हिफाजत की जिम्मेदारी फिंरगी को देकर आग लगे जहाज के साथ आगे बढ़ते हैं और ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाज से टकरा देते हैं.

आजाद के साथियों, जफीरा व फिरंगी को लगता है कि आजाद शहीद हो गए. जबकि आजाद को क्लाइव ने जिंदा गिरफ्तार कर लिया होता है. उसके बाद फिरंगी, क्लाइव से मिलकर अपना ईनाम लेता है और उन्हे आजाद के अड्डे का पता दे आता है, जिससे क्लाइव के सैनिक आजाद के अन्य साथियों को भी पकड़ सकें. इधर खुद जफीरा व आजाद के साथियों के साथ क्लाइव के सैनिकों के पहुंचने पर उन्हे मौत के घाट उतार देता है. लेकिन कुछ दिन बाद क्लाइव के नेतृत्व में क्लाइव की सेना आजाद के अड्डे को तहस नहस कर देती है, पर आजाद के सभी साथी वहां से बच निकलते हैं.

यह सभी फिरंगी के साथ सुरैया के यहां पहुंचते हैं. सुरैया की मदद से सभी क्लाइव के दशहरा कार्यक्रम में पहुंचते हैं, जहां खुदा बख्श उर्फ आजाद के जिंदा होने का पता चलता है. पर रावण के ही साथ क्लाइव भी मारे जाते हैं. जफीरा पुनः अपने पिता के राज्य की शासक बन जाती है.

यह फिल्म ऐतिहासिक दस्तावेज या अंग्रेज शासकों के खिलाफ आजादी की लड़ाई की बनिस्बत बदले की कहानी बनकर उभरती है. कहानी में वही साम दाम दंड भेद का पुराना घिसा पिटा फार्मूला है. कहानी के साथ साथ पटकथा की कमजोरी के चलते अमिताभ बच्चन व आमिर खान जैसे दिग्गज कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद बेहतरीन फिल्म नहीं बन पायी.

फिल्म शुरू होते ही लेखक ने दिखाया है कि ब्रिटिश अफसर क्लाइव कितना तेज, चालाक व शातिर है. ऐसे अफसर को जिस तरह से बार बार फिरंगी मल्लाह मूर्ख बनाता है, वह समझ से परे है. इतना ही नहीं संग्राम सिंह के राज्य में उनके महल के सामने संग्राम सिंह की जासूसी करने के लिए अपने दल बल के साथ रूप बदलकर क्लाइव की मौजूदगी का दृश्य भी घटिया सोच व घटिया पटकथा का परिचायक है.

फिल्म के तमाम सीन पूर्व में प्रदर्शित ‘‘बाहुबली’’ जैसी कुछ हिंदी व ‘‘पायरेट्स आफ कैरेबियन’’ जैसी कुछ अंग्रेजी फिल्मों की याद दिलाते हैं.

फिल्म बेवजह लंबी कर दी गयी. इसे एडीटिंग टेबल पर कसने की जरुरत थी. फिल्म में इमोशन का भी अभाव है. सुरैया यानी कि कैटरीना कैफ व फिरंगी यानी कि आमिर खान के बीच प्रेम प्रसंग का सीन जबरन थोपा हुआ लगता है. इंटरवल से पहले भी फिल्म की कहानी आगे बढ़ते हुए नजर नहीं आती. जबकि इंटरवल के बाद कुद ज्यादा ही बोझिल हो जाती है.

‘‘धूम 3’’ फेम निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य इस फिल्म में अपना हुनर दिखाने की बजाय बुरी तरह से असफल हुए हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो उम्र के इस पड़ाव पर अमिताभ बच्चन ने पानी के जहाज के ऊपर एक्शन दृश्यों को अच्छे ढंग से अंजाम दिया है. मसखरे ठग की भूमिका में आमिर खान हौलीवुड कलाकार जैक स्पैरो की नकल करते हुए नजर आते हैं. अवधी होते हुए भी उनके मुख से भोजपुरी टोन के संवाद भी खलते हैं. यह फिल्म आमिर खान के अभिनय व उनके करियर पर जरुर सवालिया निशान लगाती है.

फिल्म की मुख्य नायिका तो फातिमा सना शेख ही हैं. उन्होंने बेहतरीन अभिनय प्रतिभा का परिचय दिया है. कैटरीना कैफ के हिस्से दो गाने व कुछ दृश्य ही आए हैं. वह महज शो पीस की ही तरह हैं. कम से कम कैटरीना कैफ जैसी अदाकारा को इस तरह की फिल्मों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए.

फिल्म ‘‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ की सबसे बड़ी खासियत बडे भव्य सेट, खूबसूरत लोकेशन, बड़े बड़े पानी के जहाज व दिग्गज कलाकारों का जमावड़ा है. इसके अलावा फिरंगी उफ आमिर खान द्वारा ठगा जाना. फिल्म के कैमरामैन मानुष नंदन बधाई के पात्र हैं. गीत संगीत प्रभावित नहीं करता.

दो घंटे 44 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ का निर्माण ‘‘यशराज फिल्मस’’ ने किया है. फिल्म के निर्देशक व पटकथा लेखक विजय कृष्ण आचार्य, संगीतकार अजय अतुल, कैमरामैन मानुष नंदन तथा कलाकार हैं – अमिताभ बच्चन, आमिर खान, कैटरीना कैफ, फातिमा सना शेख, इला अरूण, लायड ओवन, मोहम्मद जीशान अयूब, रोनित रौय, सत्यदेव कंचराना, अदुल कादिर अमीन व अन्य.

ईरान पर सख्त प्रतिबंध, असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर

तेल अपना नहीं होने के बावजूद अमेरिका तेल वाले मुस्लिम देशों पर प्रतिबंध का हथियार चला कर तेल पर नियंत्रण करने की नीति पर चल रहा है. इस में वह कामयाब भी है. परमाणु सौदे से पीछे हटने के बाद अमेरिका ने ईरान पर सब से सख्त प्रतिबंध लागू कर दिए हैं. अमेरिका ने पश्चिम एशियाई और इस्लामी देशों को भी ईरान से व्यापार नहीं करने की चेतावनी दी है.

इस का सीधा सा मतलब है कि इन प्रतिबंधों के तहत कोई भी देश ईरान से अब तेल नहीं खरीद पाएगा. जो खरीदेगा, उसे अमेरिका की मार सहनी होगा. ट्रम्प प्रशासन का कहना है उसे इस बात का भरोसा है कि इन पाबंदियों से ईरान के शासन के बर्ताव में बदलाव आएगा. इन प्रतिबंधों से भारत और चीन को कुछ छूट मिली है. इन देशों से अमेरिका को भरोसा दिलाया है कि वह छह महीने के अंदर तेल खरीद पूरी तरह से बंद कर देंगे.

ट्रम्प ने भारत को यह इजाजत दी है कि वह मई महीने तक तेल खरीद सकता है. अमेरिका की शर्त है कि भारत उस से जो सामान मंगवाता है उस पर उसे आयात शुल्क कम करना होगा. यानी अमेरिका ईरान पर प्रतिबंध से दूसरे देशों से भी व्यापार से पैसे कमाएगा.

प्रतिबंध ईरान के बैंकिंग और ऊर्जा क्षेत्र में लागू हुए हैं और वहां से तेल आयात जारी रखने वाले यूरोप, एशिया के देशों और कंपनियों पर जुर्माने का प्रावधान है. पिछली बार 2010 और 2016 तक ये प्रतिबंध लागू रहे थे. तब तेल उत्पादन आधा बचा था.

दरअसल 2015 में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय अमेरिका और ईरान में परमाणु डील हुई थी. इस में सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों में चीन, फ्रांस,  इंग्लैंड और रूस शामिल हैं. तब ईरान को प्रतिबंधों में छूट देते हुए ऊर्जा, तेल आयात, खाद्य और फार्मास्युटिकल क्षेत्र में व्यापार की अनुमति दी थी. डील टूटने से प्रतिबंध फिर लागू हो गए.

प्रतिबंधों को ले कर एशियाई देश दो धड़ों में बंट गए हैं. इस बार यूरोपीय यूनियन ने दो टूक कह दिया कि ट्रम्प प्रशासन के प्रतिबंध के बाद भी ईरान के साथ कानूनी तरीके से होने वाले व्यावसायिक समझौते आगे भी जारी रखेंगे.

आज अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक लेनदेन के युग में इस तरह के प्रतिबंध ठीक नहीं है. इस से अमेरिका भले ही अपना मतलब साध लें पर इस से दूसरे देशों को नुकसान उठाना पड़ता है. दुनिया वैसे ही मंदी के दौर से गुजर रही है. इस प्रतिबंध का असर विश्व भर की जनता पर पड़ेगा. तेल की कीमतें बढ जाएंगी. यूरोपीय यूनियन की तरह अगर चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया डट जाएं तो अमेरिका ढीला पड़ सकता है.

अब चुनावी मैदान पर खेलेंगे

क्रिकेटर मोहम्मद अजहरूद्दीन अपने समय के शानदार बल्लेबाज और बेहतरीन कप्तान रहे हैं और आजकल वे दोबारा सुर्ख़ियों में हैं. दरअसल, वैस्टइंडीज के खिलाफ हुए पहले ट्वेंटी20 मैच से पहले इडेन गार्डन्स स्टेडियम में उन्हें एक रस्मी घंटी बजाने की इजाजत देने को ले कर भारत के ओपनिंग बल्लेबाज रह चुके गौतम गंभीर नाराज हो गए. उन्होंने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड, प्रशासकों की समिति और बंगाल क्रिकेट संघ की सोशल मीडिया पर आलोचना करते हुए ट्विटर पर लिखा, ‘भारत ने भले ही ईडन गार्डन्स स्टेडियम में हुए मैच में जीत हासिल की हो लेकिन मुझे खेद है कि बीसीसीआई, सीओए और सीएबी की हार हुई है. ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार को किसी भी सूरत में बरदाश्त नहीं करने की नीति रविवार को छुट्टी पर थी. मैं जानता हूं कि उन्हें (मोहम्मद अजहरूद्दीन को) एचसीए का चुनाव लड़ने की इजाजत दी गई थी लेकिन यह तो सदमा पहुंचाने वाला है. घंटी बज रही है, उम्मीद करता हूं कि शक्तियां सुन रही होंगी.’

गौतम गंभीर की नाराजगी की वजह यह है कि साल 2000 में मैच फिक्सिंग विवाद में मोहम्मद अजहरूद्दीन का नाम सामने आया था और उन पर बीसीसीआई ने आजीवन प्रतिबंध लगाया था. हालांकि, इस फैसले को अजहर ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी थी और साल 2012 में कोर्ट का फैसला उन के पक्ष में रहा था.

पर असली खबर यह है कि गौतम गंभीर के गुस्से और इस विवाद को ज्यादा तूल न देने वाले  मोहम्मद अजहरूद्दीन एक बार फिर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं.

कोलकाता के बर्धवान में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मोहम्मद अजहरूद्दीन ने कहा कि अगर बंगाल के लोगों का आशीर्वाद रहा तो वे चुनाव जरूर लड़ेंगे. इस बार उन की अपने गृह राज्य तेलंगाना की सिकंदराबाद सीट से चुनाव लड़ने की चाहत है. खबर है कि उन्हें इस सीट से टिकट भी मिल सकता है. लिहाजा, उन्होंने इस के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं और कांग्रेस आलाकमान को बता दिया है.

याद रहे कि मोहम्मद अजहरूद्दीन पहले भी कांग्रेस के टिकट पर 2 बार चुनाव लड़ चुके हैं. पहली बार उन्होंने साल 2009 में लोकसभा की मुरादाबाद सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था और सांसद चुने गए थे. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने राजस्थान की टोंक सवाई माधोपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था पर तब वे हार गए थे.

मोहम्मद अजहरूद्दीन के करीबी लोग तो यह भी बताते हैं कि अजहर को पश्चिम बंगाल से भी लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए ऑफर मिल रहे हैं. कई पार्टियों ने इस के लिए उन से बातचीत की है. अगर लोग चाहते हैं तो वे यहां से चुनाव लड़ने से पीछे नहीं हटेंगे.

वैसे एक खबर यह भी आ रही है कि सिर्फ मोहम्मद अजहरुद्दीन ही नहीं बल्कि उन पर अपने भड़ास उतारने वाले गौतम गंभीर भी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो कर अपने गृह राज्य दिल्ली की किसी एक सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी नई दिल्ली लोकसभा सीट से गौतम गंभीर को टिकट दे सकती है. इस की एक वजह यह है कि आजकल गौतम गंभीर सामाजिक कामों में खूब बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं.

इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी तो टीम इंडिया के कप्तान रह चुके महेंद्र सिंह धोनी से भी लगातार संपर्क में है और वे झारखंड से चुनाव लड़ सकते हैं.

चुनावी मौसम में छोटेबड़े राजनीतिक दल तकरीबन हर खेल से जुड़े नामचीन खिलाडियों को टिकट दे कर चुनाव लड़वाते हैं. बहुत से जीत भी जाते हैं पर सवाल तो यह रहता है कि लोकसभा में पहुंच कर वे सदन में जनता की बात कितनी गंभीरता से रखते हैं?

हाल ही में पाकिस्तान में तो वहां के हैंडसम क्रिकेटर रहे इमरान खान प्रधानमंत्री के पद तक जा पहुंचे हैं पर इस के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की है. भारत में भी बहुत से खिलाडी देश की सब से बड़ी चौपाल का हिस्सा बन चुके हैं. कई आज भी टिके हुए हैं पर बहुत से नाम भर को ही नेता बन पाए.

अगर आने वाले लोकसभा चुनाव में कुछ खिलाडी अपना दांव आजमाते हैं तो उन से यही उम्मीद रहेगी कि जिस तरह उन्होंने अपने खेल से नाम कमाया उसी तरह अपने सियासी काम से भी नया इतिहास बना दें.

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