Download App

Sexual Problem : मैं अपनी सैक्सुअलिटी को ले कर बहुत कन्फ्यूज्ड हूं

Sexual Problem : मैं प्राइवेट सैक्टर में जौब करता हूं, 30 साल का हो गया हूं. घर में पेरैंट्स शादी करने के लिए दबाव डाल रहे हैं. मुझे कभी किसी लड़की में दिलचस्पी नहीं रही. 2 साल पहले औफिस के पुरुष कलीग से बहुत गहरी दोस्ती हो गई थी. इस बात से मैं इतना परेशान हो गया कि नौकरी ही बदल ली. मैं शादी कर के किसी लड़की की जिंदगी बरबाद नहीं करना चाहता. मैं पेरैंट्स का इकलौता बेटा हूं. उन के प्रति भी मेरी जिम्मेदारियां हैं. इन सब परेशानियों की वजह से मेरा कैरियर प्रभावित हो रहा है. कृपया मेरी उल झन को सुल झाएं.

जवाब : आप की बात को ध्यान से पढ़ने व समझने के बाद यह साफ हुआ कि आप एक गहरे भावनात्मक और मानसिक द्वंद्व से गुजर रहे हैं. यह बहुत बड़ी बात है कि आप अपनी भावनाओं को खुलेपन से व्यक्त कर रहे हैं. सैक्सुअलिटी को ले कर कन्फ्यूजन होना असामान्य बात नहीं है खासकर तब जब समाज और परिवार की अपेक्षाएं हम पर हावी हो जाती हैं. आप ने बताया कि आप को कभी किसी लड़की में दिलचस्पी नहीं रही और एक पुरुष मित्र के साथ आप की गहरी दोस्ती हुई, जिस ने आप को परेशान कर दिया. यह संकेत हो सकता है कि आप की सैक्सुअलिटी ‘होमोसैक्सुअल’ (समलैंगिक) हो.

यह आत्मस्वीकृति का सफर धीरेधीरे और अपने समय पर होता है. खुद से सवाल करें कि आप सचमुच क्या चाहते हैं. बिना किसी दबाव के, सिर्फ अपने दिल की सुनें. दूसरी ओर, मातापिता का शादी के लिए दबाव डालना भारतीय परिवारों में आम है, खासकर जब आप उन की इकलौती संतान हैं.

शादी कर के किसी की जिंदगी बरबाद न करने की आप की सोच का मतलब है कि आप न सिर्फ अपने बारे में, बल्कि दूसरों के बारे में भी सोचते हैं. कुछ सु झाव जो आप की मदद कर सकते हैं. अपनी सैक्सुअलिटी को सम झने के लिए जल्दबाजी न करें. यह एक निजी यात्रा है और इस में आत्मचिंतन की जरूरत होती है. अगर संभव हो तो किसी भरोसेमंद दोस्त या काउंसलर से बात करें, जो आप को बिना जज किए सुन सके.

अपने मातापिता से खुल कर बात करें. यह मुश्किल हो सकता है, लेकिन उन्हें बताएं कि आप अभी शादी के लिए तैयार नहीं हैं. आप को अपनी सैक्सुअलिटी के बारे में पूरी बात बताने की जरूरत नहीं है, अगर आप सहज नहीं हैं. बस, इतना कहें कि आप अपने कैरियर और जिंदगी को ले कर कुछ और समय चाहते हैं. धीरेधीरे उन्हें अपनी सोच के लिए तैयार करें.

अगर आप को लगता है कि आप पुरुषों की ओर आकर्षित हैं तो इस में शर्मिंदगी या ग्लानि की कोई बात नहीं है.

आप अकेले नहीं हैं, दुनिया में लाखों लोग हैं जो समलैंगिक हैं और सुखी, सफल जिंदगी जी रहे हैं. भारत में परिवार और समाज अभी भी समलैंगिकता को ले कर बहुत जागरूक नहीं हैं. लेकिन समय के साथ चीजें बदल रही हैं. 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को हटा कर समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता दी. इस का मतलब है कि आप के पास अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने का हक है.

भविष्य में अगर आप चाहें तो ऐसा साथी ढूंढ़ सकते हैं जो आप को सम झे और जिस के साथ आप सुखी रहें या अगर आप अकेले रहना पसंद करें तो भी आप अपनी जिंदगी को अपने शौक, दोस्ती और लक्ष्यों से भरपूर बना सकते हैं.

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Mahabodhi Temple Controversy : हर धर्म के मामले में हिंदुओं की अड़ंगी

Mahabodhi Temple Controversy : लड़ाई या विवाद सिर्फ इतना सा है कि ब्राह्मण पंडेपुजारी महाबोधि मंदिर से अपनी दुकान समेटना नहीं चाहते क्योंकि यह मंदिर उन के लिए दुधारू गाय सरीखा है. दूसरी तरफ बौद्ध भिक्षु इस मंदिर में पिंडदान और दूसरे कर्मकांडों से व्यथित हैं. मंदिर उन का है लेकिन पूर्ण आधिपत्य उन का नहीं. ऐसे में उन का विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक है जिस के भविष्य में विस्फोटक या उग्र हो जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

वक्फ मामले में दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान 16 अप्रैल को उस वक्त दिलचस्प मोड़ आया था जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने बेहद तल्ख और साफ लहजे में यह पूछा था कि क्या आप कह रहे हैं कि अब से आप हिंदुओं के ट्रस्ट या दान प्रबंधन करने वाले बोर्ड में मुसलिमों को शामिल करने की अनुमति देंगे, साफसाफ बताइए. इस अप्रत्याशित सवाल पर सरकार की ओर से पैरवी कर रहे सौलीसिटर जनरल तुषार मेहता कुछ देर के लिए सकपकाए, फिर संभल कर बोले थे कि संपत्ति के प्रबंधन और धार्मिक मामलों से जुड़े मामलों में फर्क करना होगा.

जाहिर है, इस दलील में कोई दम नहीं था लेकिन, हां, मेहता अपने तजरबे के दम पर बात को एक खुबसूरत से मोड़ पर ले जाने में कामयाब रहे थे पर वह मोड़ इस अफसाने का अंजाम नहीं था. इसलिए 17 अप्रैल को इस मामले को उबाऊ ढंग से भी देख और सुन रहे लोगों ने सब से बड़ी अदालत के इस सवाल का जवाब अपनेअपने ढंग से अपनेआप ही को देने की कोशिश की थी लेकिन वे भी खी झ और लड़खड़ा कर रह गए थे.

लड़खड़ाने की वजहें धार्मिक थीं कि जिस धर्म के सब से बड़े आयोजन कुंभ में मुसलिमों का प्रवेश वर्जित हो, जिस के धीरेंद्र शास्त्री जैसे दर्जनों धर्मगुरु आएदिन यह फतवा जारी करते रहते हों कि हिंदू मंदिरों के बाहर मुसलमानों को दुकान नहीं लगाने देंगे, और तो और, आएदिन ही खासतौर से हिंदू तीजत्योहारों पर सोशल मीडिया पर इस आशय की अपीलें जारी की जाती हों कि मुसलमानों से सामान नहीं खरीदना है, हमें उन का आर्थिक बहिष्कार कर उन की कमर तोड़नी है, उस धर्म से यह उम्मीद करना बेकार है कि वह अपने ट्रस्टों में या दान प्रबंधन करने वाले बोर्डों में मुसलिम तो मुसलिम किसी और अल्पसंख्यक धर्म को झांकने देंगे. मंदिरों के खजानों की तरफ तो पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और औरतों तक के लिए नो एंट्री की तख्ती सदियों से लटकी है.

शायद ही कभी किसी ने देखासुना या महसूस किया हो कि किसी मंदिर की दानपेटी खोल कर दक्षिणा गिनने वालों में इन तबकों का कोई सदस्य शामिल भी था.

लेकिन खुद हिंदू अल्पसंख्यक धर्मों के मामलों में अपनी टांग फंसाने का कोई मौका नहीं छोड़ते. ताजी मिसाल बिहार के बोधगया मंदिर की है जहां फरवरी के महीने से बौद्ध धर्म के अनुयायी मांग कर रहे हैं कि बीटीए को निरस्त किया जाए. बौद्धों को महाबोधि महाविहार दें. बीटीए संविधान विरोधी है.

क्या है बीटीए

बीटीए का पूरा नाम बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 बिहार विधानसभा द्वारा बनाया एक ऐसा कानून है जिस के तहत बौद्धों और हिंदुओं के बीच एक समिति बोधगया मंदिर प्रबंधन समिति यानी बीटीएमसी बनाई गई थी. जिस के 8 सदस्यों में से 4 बौद्ध और 4 हिंदू होते हैं. ये सभी बिहार सरकार द्वारा नामित होते हैं. इस में गया का डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट अध्यक्ष होता है, जिस का हिंदू होना अनिवार्य था. लेकिन 2013 में यह प्रावधान हटा लिया गया था.

यह व्यवस्था लंबे वक्त से चले आ रहे विवाद को सुल झाने के नाम पर बौद्धों के लिए एक झुन झुना मात्र थी क्योंकि इस से हिंदुओं का दबदबा कायम रहा. बोधगया मंदिर विवाद दूसरे मंदिर विवादों से अलग नहीं है जिस का इतिहास बताता है, यह दरअसल एक बौद्ध मंदिर ही है जिसे पहले हिंदू पंडेपुजारियों ने कब्जाया. लेकिन इस पर देशविदेश के बौद्धों ने एतराज जताया तो इसे चालाकी दिखाते कानूनी तौर पर हिंदुओं के हवाले कर दिया गया. इस में देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद का अहम रोल रहा जो कांग्रेसी होते हुए भी कट्टर हिंदूवादी थे.

1922 में जब गया में कांग्रेस का सम्मेलन हुआ था तब महाबोधि सोसाइटी के सदस्यों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था. लेकिन कांग्रेसी सनातनियों ने धूर्तता दिखाते बौद्धों को हाशिए पर ही रखा. लेकिन यह ऐतिहासिक तथ्य या प्रमाण न पहले कभी झुठलाया जा सका था और न आज विवाद के फिर से सुलगने पर कोई यह कह पा रहा है कि इसे तीसरी शताब्दी के पहले सम्राट अशोक ने नहीं बनवाया था व यहीं वट वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था और यह ज्ञान ऊपर कहीं से नहीं टपका था बल्कि बुद्ध का अपना चिंतन और दर्शन एक निष्कर्ष की शक्ल में सार्वजनिक तौर पर व्यक्त होना शुरू हुआ था.

मंदिर का विवादित इतिहास

सम्राट अशोक द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाए जाने के बाद यह मंदिर पूरी तरह बौद्धों के नियंत्रण में रहा. इस के बाद 16वीं शताब्दी में शैव संप्रदाय के एक हिंदू ब्राह्मण पुजारी घमंड गिरी ने यहां पूजापाठ शुरू कर दी तब बौद्धों और भिक्षुओं ने बुद्ध के करुणा के सिद्धांत के तहत कोई एतराज नहीं जताया. तब से ले कर रहरह कर जो विवाद खड़े होते रहे हैं उस की जड़ भी यही करुणा है.

घमंड गिरी के वंशज आज भी अपने पुश्तैनी कारोबार को अंजाम दे रहे हैं. अब तो पैसा कमाने की गरज से और भी पंडेपुजारी गया की इस बहती फल्गु नदी में हाथ धोने इस मंदिर में अपनी दुकान चला रहे हैं. उन की दलील है कि यह हिंदू तीर्थ हैं क्योंकि बुद्ध विष्णु के वशंज थे.

बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करने की ब्राह्मणी साजिश से परे यहां स्वाभाविक तर्क यह उठता है कि अगर ऐसा है तो देशभर के विष्णु और उस के अवतारों राम व कृष्ण के मंदिरों में बुद्ध की मूर्तियां क्यों नहीं? वहां उन का पूजापाठ क्यों नहीं?

अगर कोई हिंदू धर्मगुरु इस मामूली से सवाल का जवाब कभी दे पाता या आज दे पाए तो बात या विवाद इस मुकाम तक पहुंचता ही नहीं, इस मुकाम तक यानी हालिया धरनेप्रदर्शन और सुप्रीम कोर्ट तक.

दरअसल, घमंड गिरी के बोधगया कब्जाने की अपनी एक अलग और अहम वजह यह थी कि 13वीं शताब्दी में तुर्की आक्रमण के बाद अधिकतर बौद्ध भिक्षु यहांवहां हो गए थे. मैदान खाली देख घमंड गिरी ने यह प्रचार शुरू कर दिया कि वही महाविहार यानी महाबोधि मंदिर के वैध उत्तराधिकारी हैं. इस के बाद वे और उन के वारिस तबीयत से पूजापाठ के अपने पुश्तैनी कारोबार के जरिए पैसा कमाते रहे. जिन बुद्ध ने हिंदू कर्मकांडों और पूजापाठ का जम कर विरोध किया था उसी मंदिर के गया में होने के चलते पिंडदान भी होने लगे.

लंबा वक्त गुजरने के बाद एक इंग्लिश लेखक व पत्रकार एडविन अर्नोल्ड ने 1885 में महाबोधि मंदिर को बौद्धों को वापस लौटाने की बात उठाई. इस के 5-6 साल बाद ही श्रीलंका के एक नागरिक/अनागरिक धर्मपाल के पांव यहां पड़े और उन्होंने महाबोधि सोसाइटी की स्थापना करते मंदिर पर बौद्धों के नियंत्रण के लिए मुहिम छेड़ दी.

फिर कांग्रेस अधिवेशन के बाद इस में राजनीति भी इन्वौल्व हो गई. डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने जो किया सो किया लेकिन महात्मा गांधी स्वीकार चुके थे कि यह बौद्ध मंदिर है. इस के बाद रवींद्रनाथ टेगौर ने भी इस से सहमति जताते हिंदुओं से आग्रह किया था कि वे इसे बौद्धों को सौंप दें.

कांग्रेस के मौजूदा दिग्गज नेता जयराम रमेश भी इस बात से इत्तफाक रखते हैं कि यह बौद्ध मंदिर है. उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द लाइट औफ एशिया द पोयम दैट डिफाइन बुद्धा’ में एडविन अर्नोल्ड का जिक्र करते लिखा है, ‘‘अगस्त 1727 में एक मुगल राजकुमार ने शिवियों (शैवों) को इस क्षेत्र में स्वामित्व अधिकार स्थापित करने के लिए एक विलेख दिया था. विलेख दिए जाने के बाद शिवियों ने मंदिर और उस के आसपास के क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया और तब से हिंदू और बौद्ध दोनों ही इस तक पहुंच सकते थे.’’

केजरीवाल सरकार में मंत्री रह चुके राजेंद्र गौतम ने भी बोधगया पहुंच कर बौद्धों का समर्थन किया था. हिंदू देवीदेवताओं पर विवादित टिप्पणियां करने से सुर्खियों में रहे राजेंद्र गौतम कहते हैं, ‘‘ब्राह्मणों को अपना दिल बड़ा कर के हमारा मंदिर हमें दे देना चाहिए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो आंदोलन और तेज होगा.’’

दलित सांसद व भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद भी इस मामले को संसद में उठा चुके हैं. उन्होंने भी बोधगया जा कर बौद्ध भिक्षुओं का समर्थन करते मंदिर को ब्राह्मणमुक्त करने की बात कही.

अप्रत्यक्ष और अघोषित रूप से यह लड़ाई दलित बनाम ब्राह्मण भी होती जा रही है क्योंकि बाकी सवर्ण हिंदुओं का बुद्ध से कोई बैर या परहेज नहीं. वे न तो बुद्ध को मानतेपूजते और न ही उन से असहमत हो पाते हैं. सिर्फ ब्राह्मण ही बुद्ध विरोधी हमेशा से रहा है. दूसरी तरफ अधिकतर दलित ही बौद्ध धर्म को मानते और अपनाते हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में यह आंदोलन एक बड़ा मुद्दा होगा, यह भी साफ दिख रहा है. बिहार के सवा लाख बौद्ध और बौद्ध धर्म से प्रभावित लाखों दलित एकतरफा वोट भी कर सकते हैं, जो जाहिर है इंडिया गठबंधन के खाते में जाएंगे.

अब क्या और क्यों चाहते हैं बौद्ध

इस बार फिर पिछली 12 फरवरी से बौद्ध भिक्षु बोधगया में धरनाप्रदर्शन कर रहे हैं. उन की पहली और सीधी मांग यह है कि बीटी एक्ट खत्म किया जाए. इस मुहिम ने जोर पकड़ना शुरू किया तो देशभर के बौद्ध भिक्षुओं के समर्थन में बौद्ध गया पहुंचने लगे. इस पर प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को महाबोधि मंदिर से खदेड़ दिया तो इन लोगों ने मंदिर से एक किलोमीटर दूर दोमुहान नाम की जगह को अपना ठिकाना बना लिया. इस धरना स्थल पर जगहजगह संविधान की प्रतियां और भीमराव अंबेडकर के फोटो देखने को मिल जाते हैं.

विरोध प्रदर्शन की बात और फैली तो बड़ी तादाद में बुद्धिस्ट दोमुहान लगातार अभी भी पहुंच रहे हैं. इन में महिलाओं की तादाद खासी है. कई शहरों में बीटीए को संविधान विरोधी बताते कैंडल मार्च निकलने लगे. देशभर के बौद्ध विहारों में इस मुद्दे को ले कर मीटिंग्स हो रही हैं. ये सभी चाहते यही हैं कि महाबोधि मंदिर का प्रबंधन और नियंत्रण पूरी तरह बौद्धों के हाथ में दिया जाए. राजेंद्र गौतम और चंद्रशेखर जैसे नेता तुक की बात कहते हिंदू की जगह ब्राह्मण शब्द बेवजह इस्तेमाल नहीं करते दिखे.

इस मुहिम की अगुआई कर रहे अखिल भारतीय बौद्ध मंच के आकाश लामा यहां आ रहे मीडियाकर्मियों से कहते हैं कि इस दुनिया में किसी भी धार्मिक स्थल पर दूसरे धर्म का कब्जा नहीं है. मसजिद को मुसलमान चलाते हैं, मंदिर को हिंदू और गुरुद्वारे को सिख चलाते हैं. लेकिन महाबोधि मंदिर में हिंदुओं का कब्जा है.

बकौल आकाश लामा, इस मांग को ले कर वे बिहार सरकार और अल्पसंख्यक आयोग भी गए लेकिन कहीं हमारी सुनवाई नहीं हुई. मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है जिस में अपनी टांगफसाऊ आदत के मुताबिक हिंदू पक्ष की तरफ से विश्व हिंदू परिषद भी कूद पड़ा है.

हिंदुओं का दावा चूंकि कमजोर है, इसलिए उन्हें समर्थन भी कम मिल रहा है. उलट इस के, बौद्धों के समर्थन में आवाजें विदेशों से भी आईं जिन में अमेरिका और जापान के नाम उल्लेखनीय हैं. 7 मार्च को अमेरिका में भारतीय दूतावास के बाहर सैकड़ों बौद्ध अनुयायियों ने इकट्ठा हो कर महाबोधि मंदिर को बौद्धों को सौंपने की बात कही थी. भारत सहित दुनियाभर के 500 से भी ज्यादा बौद्ध संगठन इस मुद्दे पर लामबंद हैं. वैसे भी, साल 1992 में जापान से भारत आ कर बस गए एक बौद्ध भिक्षु सराई सुसाई ने इस मांग को ले कर एक बड़ा आंदोलन छेड़ा था.

लड़ाई का असल मुद्दा कर्मकांड

हिंदू यानी ब्राह्मण महाबोधि मंदिर से आसानी तो क्या मुश्किल से भी कब्जा छोड़ेंगे, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि पिंडदान जैसे कर्मकांड से इन की जेबें भरती हैं. हैरानी तो इस बात की ज्यादा है कि बौद्ध धर्म की बुनियाद ही हिंदू कर्मकांडों, जातिगत भेदभाव और छुआछूत जैसे विकारों पर पड़ी है. बुद्ध ने एक वक्त में अपनी थ्योरियों के प्रभाव से ब्राह्मणवाद लगभग खत्म कर दिया था. लेकिन धूर्त ब्राह्मणों ने उन्हें ही विष्णु का अवतार घोषित कर अपनी रोजीरोटी आंशिक रूप से बचा ली थी जो बाद में बढ़ती गई और अब मोदी राज में भाजपा की मंदिर नीति के चलते सरपट दौड़ रही है.

अब इस मंदिर में दुकान चला रहे पंडेपुजारी स्थानीय लोगों को यह बताते रहते हैं कि दरअसल महाबोधि मंदिर हिंदू मंदिर है. विद्यानंद पांडे नाम के एक पुरोहित इन में से एक हैं जिन की दलील यह है कि हमारे यानी हिंदुओं के शिवलिंग और 5 पांडव यहां हैं. लाखों लोग यहां पिंडदान करते हैं. हम पीढि़यों से पिंडदान कराते आ रहे हैं और आगे भी कराते रहेंगे. लेकिन ये लोग कहते हैं कि सनातन धर्म को हटा दो. आखिर, भगवान बुद्ध किस की औलाद हैं.

उलट इस के, आकाश लामा का रोना यह है कि मंदिर में पिंडदान के नाम पर लोटाथाली सब जा रहा है लेकिन हम अपना कैमरा भी नहीं ले जा सकते. उन की नई चिंता इस्कौन मंदिर वालों के यहां पड़ते कदम हैं. उन के मुताबिक, यह मंदिर विश्व धरोहर है, इस का सम्मान किया जाना चाहिए. धरनाप्रदर्शन कर रहे बौद्ध यह दलील भी देते हैं कि यह एक्ट संविधान बनने के पहले बना था, हमें तो भीमराव अंबेडकर के संविधान के हिसाब से एक्ट चाहिए. महाबोधि मंदिर बौद्धों को सौंप दिया जाना चाहिए.

बौद्धों की इस दलील में भी दम है कि महाबोधि मंदिर को दुनियाभर के बौद्धों से दान मिलता है लेकिन वह पैसा स्कूलअस्पताल वगैरह बनवाने में खर्च नहीं किया जाता. वह स्वागतसत्कार में ही उड़ा दिया जाता है. यानी लड़ाई दानदक्षिणा की भी है पर हिंदू इस मंदिर में ज्यादा दान नहीं देते बनिस्बत बौद्धों के.

यानी बौद्धों की बड़ी तकलीफ बुद्ध के इस मंदिर में होते कर्मकांड भी हैं और जाहिर है वे तब तक होते रहेंगे जब तक बीटी एक्ट में हिंदू सदस्यों का प्रावधान है. अब देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्ष क्या दलीलें देते हैं और कौन सा पक्ष अपने पक्ष में ऐतिहासिक साक्ष्य पेश कर पाएगा. हालांकि इस लिहाज से बौद्धों का दावा भारी और दमदार है.

गुरुद्वारों को भी नहीं बख्शा था

हिंदू यानी ब्राह्मण पंडेपुजारी अपने मठमंदिरों से पैसा कमाएं, यह बहुत ज्यादा एतराज की बात इस लिहाज से नहीं कि हर धर्म अपनी प्राथमिकता में भक्तों और अनुयायियों की जेब पर उस्तरा चलाने को ही निर्मित हुआ है. चर्चों और मसजिदों में इस से जुदा कुछ नहीं है, न ही जैन मंदिर अछूते हैं. बस, तरीके अलगअलग हैं. ये सब के सब दरअसल दानदक्षिणा और चढ़ावा कलैक्शन सैंटर हैं. लेकिन सिख और बौद्ध धर्म में यह लूटपाट अपेक्षाकृत कम और लगभग स्वैछिक है.

दिलचस्प चिंता की बात यह है कि क्यों पंडेपुजारी दूसरे धर्मों के स्थलों से भी पैसा बटोरना चाहते हैं जबकि देश में लाखों मंदिर हैं और अब तो रोजरोज नएनए बन रहे हैं. पुराने ब्रैंडेड मंदिर कैसे सरकार चमका रही है, यह हम आएदिन तथ्य और आंकड़ों के साथ प्रकाशित करते रहे हैं और यह सिलसिला टूटेगा नहीं.

वक्फ बोर्ड में गैरमुसलिम सदस्यों, जाहिर है, हिंदुओं की भरती पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का किसी के पास कोई ठोस जवाब नहीं है. सवाल यह कि क्यों हिंदुवादियों की सरकार हर धर्म में किसी न किसी तरह हिंदू घुसपैठ चाहती है? जहां वह सीधे नहीं पहुंच सकती वहां यह काम उस के अघोषित एजेंट पंडेपुजारी कर रहे हैं. इस की ताजी मिसाल महाबोधि मंदिर है लेकिन इस के पहले ये पंडेपुजारी सिखों के गुरुद्वारों से भी इफरात से पैसा कमाते थे.

पृथक खालिस्तान की मांग हालफिलहल भले ही हाशिए पर हो लेकिन इस का जिन्न हर कभी बोतल के बाहर आ जाता है. हिंदूसिख मतभेदों का इतिहास इस से जुड़ा है. अब से कोई 105 साल पहले ये मतभेद उजागर होना शुरू हुए थे जब गुरुद्वारा सुधार आंदोलन चरम पर था.

गुरुद्वारे सिखों की सांस्कृतिक व सामाजिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र तब भी हुआ करते थे. लेकिन इन का संचालन तब ब्राह्मणपुजारी किया करते थे जिन्हें महाद कहा जाता था. पैसा कमाने की गरज और नीयत से इन महादों ने एक वक्त में गुरुद्वारों को भी लूटखसोट का अड्डा बना डाला था. इस के लिए जाहिर है उन्हें ज्योतिष, टोनेटोटके, तंत्रमंत्र सहित मूर्तिपूजा और दूसरे डर दिखाने पड़ते थे.

हद तो तब हो गई थी जब इन्होंने छोटी जाति के सिखों के गुरुद्वारे आने पर रोक लगाना शुरू कर दी थी जोकि सिख धर्म के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ बात थी.

सिखों ने इस लूट और अंधविश्वासों का विरोध किया और गुरुद्वारों का प्रबंधन ब्राह्मणपुजारियों यानी महादों से छीनते उन्हें खदेड़ दिया. इस के बाद ही अकाली दल और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी वजूद में आए. मुफ्त की रोजीरोटी छिनी, तो ब्राह्मणों ने सिखों को तरहतरह से बदनाम करना शुरू कर दिया.

शुक्र इस बात का है कि बौद्धों को वे ज्यादा बदनाम नहीं कर पा रहे. लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट से हारे तो उन्हें बदनाम नहीं करेंगे, इस बात की गारंटी नहीं. लेकिन तब तक मोक्ष प्राप्ति और पिंडदान के नाम पर वे खासी रकम बना चुके होंगे और नहीं हारे यानी कोर्ट ने मौजूदा व्यवस्था कायम रखी तो धंधा और तेज व बेखटक चलेगा ही.

Love Story : छाया – दो प्रेम दीवानों की अधूरी कहानी

Love Story : ‘‘तुम में इतना धैर्य कहां से आ गया. 2 दिन हो गए एक फोन भी नहीं किया,’’ विनय झल्लाहट दबा कर बोला.

‘‘नारी का धैर्य तुम ने अभी देखा ही कहां है. वैसे भी मैं तुम्हारे साथ थी भी कहां. बस, एक भीड़ का हिस्सा थी,’’ वृंदा का स्वर शांत था.

‘‘क्या मतलब है. ऐसे कैसे कह सकती हो. परसों मिले थे तो कोई लड़ाईझगड़ा नहीं हुआ था. मैं ने तुम्हें कुछ कहा भी नहीं जिस से तुम्हें गुस्सा आए.’’

‘‘कहने की जरूरत नहीं होती. पिछले 6 महीने से तुम लगातार मुझे अनदेखा करते आ रहे हो और मैं हमेशा सिर्फ तुम्हारे बारे में सोचती रहती हूं. परसों भी अपनी किसी न किसी महिला मित्र से तुम फोन पर बात करते रहे, मानो मैं तुम्हारे साथ थी ही नहीं.’’

‘‘वह तो मेरी लाइन ही ऐसी है.’’

‘‘पर मैं तो पूरी तरह तुम्हारे सुखदुख में भागीदार बन कर समर्पित रही. जब भी तुम्हें कोई काम पड़ा तुम मुझे कह देते और तुम्हारा वह काम करते हुए मुझे लगता कि मैं प्यार के लिए अपना फर्ज निभा रही हूं.’’

‘‘यार, ऐसा कुछ भी नहीं है. अच्छा तुम कल मिलो. ये बेकार की बातें हैं, इन्हें दिमाग से निकालो. कुछ भी नहीं बदला है.’’

‘‘अभी आफिस में काम है, फिर बात करेंगे,’’ कह कर वृंदा मोबाइल औफ करती हुई दफ्तर में लौट आई.

अपनी कुरसी पर बैठी वृंदा सोचने लगी कि इसी विनय ने 2 साल पहले शुरुआती दौर में कितनी कोशिश कर के उस से संपर्क बढ़ाया था. नौकरी लगने के बाद जब वृंदा ने अपनी कहानी छपवाई तो उस को लगा था कि वह हवा में उड़ रही है. पहली ही कहानी किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में छप जाए और प्रशंसा के सैकड़ों पत्र मिलें तो मन तो उड़ेगा ही.

बाद में उस की कुछ और कहानियां छपीं तो कुछ पाठकों के फोन भी आने लगे. कुछ तो प्रशंसा के बहाने अपनी रचना पढ़ने का अनुरोध कर देते. कुछ छपी कहानी की समीक्षा विस्तार से करते.

उन्हीं प्रशंसकों में से एक विनय भी था. किसी भी अखबार में वृंदा का कुछ छप जाता तो सब से पहले उस का फोन आता.

एक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘आप क्या हर महिला लेखिका को फोन करते हैं? मेरे अलावा दूसरे लेखकों को भी पढ़ते हैं क्या?’

‘मैडम, मैं पत्रकार हूं. साहित्यिक पृष्ठ मैं ही तैयार करता हूं. बाकी पत्रपत्रिकाओं में क्या जा रहा है उस की पूरी जानकारी मुझे रहती है.’

‘क्या आप मेरी कहानियों को संभाल कर रखते हैं?’ वृंदा ने झिझकते हुए पूछा.

‘मैं आप का जबरदस्त प्रशंसक हूं. बताइए, क्या सेवा है.’

‘आप के यहां से प्रकाशित पत्रिका के पिछले अंक में मेरी एक कहानी छपी है. उस की एक भी प्रति मेरे पास नहीं है. क्या आप एक प्रति भिजवा देंगे. शायद पोस्टमैन ने रख ली होगी.’

और अगले दिन विनय मेरे आफिस के रिसेप्शन पर बैठा था. हम दोनों चाय पीने के लिए पास के रेस्तरां में बैठे तो विनय का फोन बारबार बज उठता.

‘किसी मित्र का फोन है क्या? सुन लो.’

‘नहीं, बड़ी मुश्किल से आप से मिलना हो पाया है. बाद में फोन सुन लूंगा. मुझे आप की कहानियां सच में बहुत अच्छी लगती हैं और प्रभावित भी करती हैं. बाकी लेखिकाएं नारी विमर्श के नाम पर मीडिया से जुड़ा जो कुछ लिख रही हैं वह पढ़ा नहीं जाता है.’

‘मुझे भी लगता है कि नारी आंदोलन को व्यवसाय बना लिया गया है. ऐसी औरतें नारी मुक्ति का झंडा उठाए हुए हैं जो खुद कब की आजाद हो चुकी हैं.’

‘आप समाज के सभी पात्रों को लेती हैं. हमारे परिवार के ढांचे को तोड़ने वाले साहित्य का क्या फायदा. कुछ लेखिकाएं ‘लिव इन रिलेशन’ को मुद्दा बना कर लिख रही हैं तो कुछ कई पुरुषों के साथ यौन संबंधों पर. हम कह सकते हैं कि आपस में वादा और विश्वास होने की बातें कहीं खोती जा रही हैं.’

‘ये तथाकथित लेखिकाएं महिलाओं के किस वर्ग को चित्रित कर रही हैं. इन की चकाचौंध में समस्याओं का सामना करने वाली निम्न और मध्यम वर्ग की महिलाओं पर ध्यान ही नहीं दिया जाता,’ वृंदा जोश में बहती जा रही थी.

‘मैडम, आज मेरा इंटरव्यू है. अब निकलता हूं. अब तो आप से मिलना- जुलना होता ही रहेगा,’ यह कह कर विनय फटाफट चला गया.

फिर तो वृंदा को मानो बात करने के लिए बेहद सुलझा हुआ अपनी तरह की सोच वाला साथी मिल गया. घर और आफिस के बंधेबंधाए ढांचे में सामाजिक चर्चाओं के लिए कोई भी नहीं था. पर विनय के साथ चर्चाओं का दायरा जल्दी ही टूट गया. बौद्धिक चर्चाएं स्त्रीपुरुष के परस्पर आकर्षण पर आ कर रुक गईं. साहित्य जीवन से ही तो बना है. मगर विनय फ्रीलांसर था. इसलिए उस ने साफ कह दिया कि कहीं पक्की नौकरी लगने तक उसे शादी के लिए रुकना होगा.

विनय ने भी हिंदी और अंगरेजी साहित्य पढ़ा था. पर उसे सरकारी नौकरी से चिढ़ थी. पत्रकार को जो आजादी है, वह और किस को है. फिर पावर भी तो है. सत्ता के साए में रहने वाले बड़ेबड़े लोगों से मिलने और बात करने का मौका जिस सहजता से एक पत्रकार को मिलता है वह दूसरों को कहां मिलता है. विनय को एक न्यूज चैनल में नौकरी मिली तो उस का व्यक्तित्व निखर गया और उसी के साथ उस के संपर्क बढ़ते जा रहे थे.

उस दिन लंच में वे दोनों पार्क में बैठे थे तो विनय फोन सुनने लगा. ग्रुप के मित्रों की आपसी खटपट को ले कर वह नीता से 20 मिनट तक बात करता रहा. धीरेधीरे अलगअलग नामों के फोन आने लगे. विनय फोन काटता तो तुरंत एसएमएस आ जाता. वृंदा के साथ होने पर भी विनय का ध्यान दूर जाने लगा था.

वृंदा को विनय अपने कामों में उलझाए रखता. कभी समीक्षा के लिए लाइब्रेरी से किताब मंगाता तो कभी कोलकाता में अपने घर जाने के लिए रेल का आरक्षण कराने के लिए वृंदा को कह देता. वह लंच में आधाआधा घंटा उस का इंतजार करती रहती और जब विनय आता तो फोन पर कोई न कोई डिस्टर्ब करता रहता.

धीरेधीरे वृंदा को लगने लगा कि वह प्यार किसे करती है विनय को या प्यार की धारणा को. जो आदमी अभी से कई लोगों में बंटा है, शादी के बाद उस से कैसे निष्ठा की उम्मीद की जा सकती है. फिर तो पूरा परिवार और समाज बीच में आ जाएगा. कभी वह विनय को टोकती तो कह देता, ‘तुम्हारा वहम है. वह मेरी महिला मित्र है. सब से काम पड़ता है. फिर हमारा दायरा ऐसा है जिस में पीनेपिलाने के लिए पार्टीज चलती ही रहती हैं.’

‘मुझे इन्हीं से चिढ़ है. जहां तक शराब की बात है तो हमारे यहां इसे कोई पसंद नहीं करता. फिर औरतों का शराब पीना तो हम सोच भी नहीं सकते.’

‘तुम अपनी मध्यवर्गीय सोच से बाहर निकलो. सब की अपनीअपनी जिंदगी है. मैं तो कम ही पीता हूं पर ग्रुप में कुछ लोग मुफ्त की देख कर इतनी पी लेते हैं कि उन के लिए घर लौटना मुश्किल हो जाता है.’

‘देखो विनय, अगर तुम शराब नहीं छोड़ोगे तो हम शादी भी नहीं कर सकते हैं.’

‘रहना तो मुझे पत्रकारिता की दुनिया में ही है. तुम अपने मातापिता को समझाओ न कि शायद पीने वाला हर आदमी बुरा नहीं होता है.’

‘मुझे मत समझाओ. मैं ने शादियों में शराब पी कर लोगों को हुड़दंग करते देखा है. बीवी को पीटते लोग भी देखे हैं. हमारे एक रिश्तेदार की मौत शराब पीने के बाद छत से गिर कर हो गई थी. जब मैं ही तुम से कनविंस नहीं हो पा रही हूं तो मम्मीपापा को कैसे करूं. हम दोनों की जिंदगी और हमारे मूल्यांकन का तौर- तरीका बिलकुल अलग है. जो चीज तुम्हें सामान्य लगती है वह मेरे लिए अजीब हो जाती है. फिर तुम सिर्फ मेरे नहीं हो बल्कि नीता, पिंकी, श्वेता यानी एकसाथ कितनी लड़कियों से दोस्ती की हुई है, जो तुम्हारे करीब आने के लिए एकदूसरे को पछाड़ने में लगी हुई हैं.’

‘उन के साथ काम के सिलसिले में बाहर जाना होता है. फिर मैं हूं ही इतना हैंडसम और वैलबिहेव्ड कि सभी मुझे पसंद करती हैं. पर मैं शादी तो तुम से ही करूंगा.’

वृंदा का फ्रस्ट्रैशन बढ़ने लगा था. विनय का फोन अकसर व्यस्त मिलने लगा. कहीं उस की सरकारी नौकरी के कारण ही तो उस से वह शादी करने के लिए जिद पर अड़ा हुआ है. फिर वृंदा की कहानियों और व्यक्तित्व की जो तारीफ शुरू में होती थी वह क्या था? शायद फ्लर्ट करने का तरीका. जिन सामाजिक महिला कार्यकर्ताओं, लेखिकाओं की शुरू में विनय आलोचना करता था, हमेशा उन्हीं के बीच तो रहता है. वह रिश्ता शायद दोनों के लिए अपरिचित संसार का आकर्षण था. वृंदा मुलाकातों में खुद के लिए विनय के मन में जगह ढूंढ़ती मगर वहां उसे भीड़ नजर आती.

शाम को विनय का फोन फिर आया, ‘‘कल लंच में मिलो न, नाराज क्यों हो?’’

‘‘नाराज नहीं हूं पर मुझे नहीं लगता कि हमें शादी करनी चाहिए. ऐसी जिंदगी का क्या फायदा जिस में मैं तुम्हारे लाइफस्टाइल की आलोचना करती रहूं और तुम मेरे. अपनी लाइफ स्टाइल की ही किसी लड़की से शादी कर लो. मैं भी अपने रिश्ते के बारे में सोचतेसोचते थक गई हूं. कोई रास्ता तो निकलेगा ही.’’

‘‘ध्यान से सोचो. जल्दबाजी में कोई फैसला मत लो.’’

‘‘नहीं, मैं तुम से जितना प्यार करती हूं उतना तुम मुझ से कभी भी नहीं कर पाओगे. हमेशा मैं ही समझौता करती हूं और तुम पूरा ध्यान न दो, ऐसा कब तक चलेगा,’’ कह कर वृंदा ने फोन काट दिया.

अचानक उस ने राहत की सांस ली. रुलाई फूट रही थी मगर प्यार या रिश्ते की छाया के पीछे कब तक भागा जा सकता है. एक कविता की पंक्ति मन में उभरी :

‘मेरा तेरा रिश्ता तू तू मैं मैं का रहा. मैं तू तू करती रही, तू मैं मैं करता रहा.’

Online Hindi Story : उसके साहबजी – श्रीकांत की जिंदगी में क्या शामिल हो पाई शांति ?

Online Hindi Story : दरवाजे की कौलबैल बजी तो थके कदमों से कमरे की सीढि़यां उतर श्रीकांत ने एक भारी सांस ली और दरवाजा खोल दिया. शांति को सामने खड़ा देख उन की सांस में सांस आई. शांति के अंदर कदम रखते ही पलभर पहले का उजाड़ मकान उन्हें घर लगने लगा. कुछ चल कर श्रीकांत वहीं दरवाजे के दूसरी तरफ रखे सोफे पर निढाल बैठ गए और चेहरे पर नकली मुसकान ओढ़ते हुए बोले, ‘‘बड़ी देर कर देती है आजकल, मेरी तो तुझे कोई चिंता ही नहीं है. चाय की तलब से मेरा मुंह सूखा जा रहा है.’’

‘‘कैसी बात करते हैं साहबजी? कल रातभर आप की चिंता लगी रही. कैसी तबीयत है अब?’’ रसोईघर में गैस पर चाय की पतीली चढ़ाते हुए शांति ने पूछा. पिछले 2 दिनों से बुखार में पड़े हुए हैं श्रीकांत. बेटाबहू दिनभर औफिस में रहते और देर शाम घर लौट कर उन्हें इतनी फुरसत नहीं होती की बूढ़े पिता के कमरे में जा कर उन का हालचाल ही पूछ लिया जाए. हां, कहने पर बेटे ने दवाइयां ला कर जरूर दे दी थीं पर बूढ़ी, बुखार से तपी देह में कहां इतना दम था कि समयसमय पर उठ कर दवापानी ले सके. उस अकेलेपन में शांति ही श्रीकांत का एकमात्र सहारा थी.

श्रीकांत एएसआई पद से रिटायर हुए. तब सरकारी क्वार्टर छोड़ उन्हें बेटे के साथ पौश सोसाइटी में स्थित उस के आलीशान फ्लैट में शिफ्ट होना पड़ा. नया माहौल, नए लोग. पत्नी के साथ होते उन्हें कभी ये सब नहीं खला. मगर सालभर पहले पत्नी की मृत्यु के बाद बिलकुल अकेले पड़ गए श्रीकांत. सांझ तो फिर भी पार्क में टहलते हमउम्र साथियों के साथ हंसतेबतियाते निकल जाती मगर लंबे दिन और उजाड़ रातें उन्हें खाने को दौड़तीं. इस अकेलेपन के डर ने उन्हें शांति के करीब ला दिया था. 35-36 वर्षीया परित्यक्ता शांति श्रीकांत के घर पर काम करती थी. शांति को उस के पति ने इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि वह उस के लिए बच्चे पैदा नहीं कर पाई. लंबी छरहरी देह, सांवला रंग व उदास आंखों वाली शांति जाने कब श्रीकांत की ठहरीठहरी सी जिंदगी में अपनेपन की लहर जगा गई, पता ही नहीं चला. अकेलापन, अपनों की उपेक्षा, प्रेम, मित्रता न जाने क्या बांध गया दोनों को एक अनाम रिश्ते में, जहां इंतजार था, फिक्र थी और डर भी था एक बार फिर से अकेले पड़ जाने का.

पलभर में ही अदरक, इलायची की खुशबू कमरे में फैल गई. चाय टेबल पर रख शांति वापस जैसे ही रसोईघर की तरफ जाने को हुई तभी श्रीकांत ने रोक कर उसे पास बैठा लिया और चाय की चुस्कियां लेने लगे, ‘‘तो तूने अच्छी चाय बनाना सीख ही लिया.’’ मुसकरा दी शांति, दार्शनिक की सी मुद्रा में बोली, ‘‘मैं ने तो जीना भी सीख लिया साहबजी. मैं तो अपनेआप को एक जानवर सा भी नहीं आंकती थी. पति ने किसी लायक नहीं समझा तो बाल पकड़ कर घर से बाहर निकाल दिया. मांबाप ने भी साथ नहीं दिया. आप जीने की उम्मीद न जगाते तो घुटघुट कर या जहर खा कर अब तक मर चुकी होती, साहबजी.’’

‘‘पुरानी बातें क्यों याद करती है पगली. तू क्या कुछ कम एहसान कर रही है मुझ पर? घंटों बैठ कर मेरे अकेलेपन पर मरहम लगाती है, मेरे अपनों के लिए बेमतलब सी हो चुकी मेरी बातों को माने देती है और सब से बड़ी बात, बीमारी में ऐसे तीमारदारी करती है जैसे कभी मेरी मां या पत्नी करती थी.’’ भीग गईं 2 जोड़ी पलकें, देर तक दर्द धुलते रहे. आंसू पोंछती शांति रसोईघर की तरफ चली गई. उस की आंखों के आगे उस का दूषित अतीत उभर आया और उभर आए किसी अपने के रूप में उस के साहबजी. उन दिनों कितनी उदास और बुझीबुझी रहती थी शांति. श्रीकांत ने उस की कहानी सुनी तो उन्होंने एक नए जीवन से उस का परिचय कराया.

उसे याद आया कैसे उस के साहबजी ने काम के बाद उसे पढ़नालिखना सिखाया. जब वह छुटमुट हिसाबकिताब करना भी सीख गई, तब श्रीकांत ने उस के सिलाई के हुनर को आगे बढ़ाने का सुझाव दिया. आत्मविश्वास से भर गई थी शांति. श्रीकांत के सहयोग से अपनी झोंपड़पट्टी के बाहर एक सिलाईमशीन डाल सिलाई का काम करने लगी. मगर अपने साहबजी के एहसानों को नहीं भूल पाई, समय निकाल कर उन की देखभाल करने दिन में कई बार आतीजाती रहती. सोसाइटी से कुछ दूर ही थी उस की झोंपड़ी. सो, श्रीकांत को भी सुबह होते ही उस के आने का इंतजार रहता. मगर कुछ दिनों से श्रीकांत के पड़ोसियों की अनापशनाप फब्तियां शांति के कानों में पड़ने लगी थीं, ‘खूब फांस लिया बुड्ढे को. खुलेआम धंधा करती है और बुड्ढे की ऐयाशी तो देखो, आंख में बहूबेटे तक की शर्म नहीं.’

खुद के लिए कुछ भी सुन लेती, उसे तो आदत ही थी इन सब की. मगर दयालु साहबजी पर लांछन उसे बरदाश्त नहीं था. फिर भी साहबजी का अकेलापन और उन की फिक्र उसे श्रीकांत के घर वक्तबेवक्त ले ही आती. वह भी सोचती, ‘जब हमारे अंदर कोई गलत भावना नहीं तब जिसे जो सोचना है, सोचता रहे. जब तक खुद साहबजी आने के लिए मना नहीं करते तब तक मैं उन से मिलने आती रहूंगी.’ शाम को पार्क में टहलने नहीं जा सके श्रीकांत. बुखार तो कुछ ठीक था मगर बदन में जकड़न थी. कांपते हाथों से खुद के लिए चाय बना, बाहर सोफे पर बैठे ही थे कि बहूबेटे को सामने खड़ा पाया. दोनों की घूरती आंखें उन्हें अपराधी घोषित कर रही थीं.

श्रीकांत कुछ पूछते, उस से पहले ही बेटा उन पर बरस उठा, ‘‘पापा, आप ने कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा हमें. एक नौकरानी के साथ…छी…मुझे तो कहते हुए भी शर्म आती है.’’ ‘‘यह क्या बोले जा रहे हो, अविनाश?’’ श्रीकांत के पैरों तले से मानो जमीन खिसक गई.

अब बहू गुर्राई, ‘‘अपनी नहीं तो कुछ हमारी ही इज्जत का खयाल कर लेते. पूरी सोसाइटी हम पर थूथू कर रही है.’’ पैर पटकते हुए दोनों रोज की तरह भीतर कमरे में ओझल हो गए. श्रीकांत वहीं बैठे रहे उछाले गए कीचड़ के साथ. वे कुछ समझ नहीं पाए कहां चूक हुई. मगर बच्चों को उन की मुट्ठीभर खुशी भी रास नहीं, यह उन्हें समझ आ गया था. ये बेनाम रिश्ते जितने खूबसूरत होते हैं उतने ही झीने भी. उछाली गई कालिख सीधे आ कर मुंह पर गिरती है.

दुनिया को क्या लेना किसी के सुखदुख, किसी की तनहाई से. वे अकेलेपन में घुटघुट कर मर जाएं या अपनों की बेरुखी को उन की बूढ़ी देह ताउम्र झेलती रहे या रिटायर हो चुका उन का ओहदा इच्छाओं, उम्मीदों को भी रिटायर घोषित क्यों न कर दे. किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. मगर न जाने उन की खुशियों पर ही क्यों यह समाज सेंध लगा कर बैठा है?

श्रीकांत सोचते, बूढ़ा आदमी इतना महत्त्वहीन क्यों हो जाता है कि वह मुट्ठीभर जिंदगी भी अपनी शर्तों पर नहीं जी पाता. बिलकुल टूट गए थे श्रीकांत, जाने कब तक वहीं बैठे रहे. पूरी रात आंखों में कट गई. दूसरे दिन सुबह चढ़ी. देर तक कौलेबैल बजती रही. मगर श्रीकांत ने दरवाजा नहीं खोला. बाहर उन की खुशी का सामान बिखरा पड़ा था और भीतर उन का अकेलापन. बुढ़ापे की बेबसी ने अकेलापन चुन लिया था. फिर शाम भी ढली. बेटाबहू काम से खिलखिलाते हुए लौटे और दोनों अजनबी सी नजरें श्रीकांत पर उड़ेल, कमरों में ओझल हो गए.

Romantic Story : शरणार्थी – मीना ने कैसे लगाया अविनाश और किशन को चूना ?

Romantic Story : वह हांफते हुए जैसे ही खुले दरवाजे में घुसी कि तुरंत दरवाजा बंद कर लिया. अपने ड्राइंगरूम में अविनाश और उन का बेटा किशन इस तरह एक अनजान लड़की को देख कर सन्न रह गए.

अविनाश गुस्से से बोले, ‘‘ऐ लड़की, कौन है तू? इस तरह हमारे घर में क्यों घुस आई है?’’

‘‘बताती हूं साहब, सब बताती हूं. अभी मुझे यहां शरण दे दो,’’ वह हांफते हुए बोली, ‘‘वह गुंडा फिर मुझे मेरी सौतेली मां के पास ले जाएगा. मैं वहां नहीं जाना चाहती हूं.’’

‘‘गुंडा… कौन गुंडा…? और तुम सौतेली मां के पास क्यों नहीं जाना चाहती हो?’’ अविनाश ने जब सख्ती से पूछा, तब वह लड़की बोली, ‘‘मेरी सौतेली मां मुझ से देह धंधा कराना चाहती है. उदय प्रकाश एक गुंडे के साथ मुझे कोठे पर बेचने जा रहा था, मगर मैं उस से पीछा छुड़ा कर भाग आई हूं.’’

‘‘तू झूठ तो नहीं बोल रही है?’’

‘‘नहीं साहब, मैं झूठ नहीं बोल रही हूं. सच कह रही हूं,’’ वह लड़की इतना डरी हुई थी कि बारबार बंद दरवाजे की तरफ देख रही थी.

अविनाश ने पूछा, ‘‘ठीक है, पर तेरा नाम क्या है?’’

‘‘मीना है साहब,’’ वह लड़की बोली.

अविनाश ने कहा, ‘‘घबराओ मत मीना. मैं तुम्हें नहीं जानता, फिर भी तुम्हें शरण दे रहा हूं.’’

‘‘शुक्रिया साहब,’’ मीना के मुंह से निकल गया.

‘‘एक बात बताओ…’’ अविनाश कुछ सोच कर बोले, ‘‘तुम्हारी मां तुम से धंधा क्यों कराना चाहती है?’’

मीना ने कहा, ‘‘जन्म देते ही मेरी मां गुजर गई थीं. पिता दूसरी शादी नहीं करना चाहते थे, मगर रिश्तेदारों ने जबरदस्ती उन की शादी करा दी.

‘‘मगर शादी होते ही पिता एक हादसे में गुजर गए. मेरी सौतेली मां विधवा हो गई. तब से ही रिश्तेदार मेरी सौतेली मां पर आरोप लगाने लगे कि वह पिता को खा गई. तब से मेरी सौतेली मां अपना सारा गुस्सा मुझ पर उतारने लगी.

‘‘इस तरह तानेउलाहने सुन कर मैं ने बचपन से कब जवानी में कदम रख दिए, पता ही नहीं चला. मेरी सौतेली मां को चाहने वाले उदय प्रकाश ने उस के कान भर दिए कि मेरी शादी करने के बजाय किसी कोठे पर बिठा दे, क्योंकि उस के लिए वह कमाऊ जो थी.

‘‘मां का चहेता उदय प्रकाश मुझे कोठे पर बिठाने जा रहा था. मैं उस की आंखों में धूल झोंक कर भाग गई और आप का मकान खुला मिला, इसी में घुस गई.’’

अविनाश ने पूछा, ‘‘कहां रहती हो?’’

‘‘शहर की झुग्गी बस्ती में.’’

‘‘तुम अगर मां के पास जाना चाहती हो, तो मैं अभी भिजवा सकता हूं.’’

‘‘मत लो उस का नाम…’’ मीना जरा गुस्से से बोली.

‘‘फिर कहां जाओगी?’’ अविनाश ने पूछा.

‘‘साहब, दुनिया बहुत बड़ी है, मैं कहीं भी चली जाऊंगी?’’

‘‘तुम इस भेडि़ए समाज में जिंदा रह सकोगी.’’

‘‘फिर क्या करूं साहब?’’ पलभर सोच कर मीना बोली, ‘‘साहब, एक बात कहूं?’’

‘‘कहो?’’

‘‘कुछ दिनों तक आप मुझे अपने यहां नहीं रख सकते हैं?’’ मीना ने जब यह सवाल उठाया, तब अविनाश सोचते रहे. वे कोई जवाब नहीं दे पाए.

मीना ही बोली, ‘‘क्या सोच रहे हैं आप? मैं वैसी लड़की नहीं हूं, जैसी आप सोच रहे हैं.’’

‘‘तुम्हारे कहने से मैं कैसे यकीन कर लूं?’’ अविनाश बोले, ‘‘और फिर तुम्हारी मां का वह आदमी ढूंढ़ता हुआ यहां आ जाएगा, तब मैं क्या करूंगा?’’

‘‘आप उसे भगा देना. इतनी ही आप से विनती है,’’ यह कहते समय मीना की सांस फूल गई थी.

मीना आगे कुछ कहती, तभी दरवाजे के जोर से खटखटाने की आवाज आई. कमरे में तीनों ही चुप हो गए. इस वक्त कौन हो सकता है?

मीना डरते हुए बोली, ‘‘बाबूजी, वही गुंडा होगा. मैं नहीं जाऊंगी उस के साथ.’’

‘‘मत जाना. मैं जा कर देखता हूं.’’

‘‘वही होगा बाबूजी. मेरी सौतेली मां का चहेता. आप मत खोलो दरवाजा,’’ डरते हुए मीना बोली.

एक बार फिर जोर से दरवाजा पीटने की आवाज आई.

अविनाश बोले, ‘‘मीना, तुम भीतर जाओ. मैं दरवाजा खोलता हूं.’’

मीना भीतर चली गई. अविनाश ने दरवाजा खोला. एक गुंडेटाइप आदमी ने उसे देख कर रोबीली आवाज में कहा, ‘‘उस मीना को बाहर भेजो.’’

‘‘कौन मीना?’’ गुस्से से अविनाश बोले.

‘‘जो तुम्हारे घर में घुसी है, मैं उस मीना की बात कर रहा हूं…’’ वह आदमी आंखें दिखाते हुए बोला, ‘‘निकालते हो कि नहीं… वरना मैं अंदर जा कर उसे ले आऊंगा.’’

‘‘बिना वजह गले क्यों पड़ रहे हो भाई? जब मैं कह रहा हूं कि मेरे यहां कोई लड़की नहीं आई है,’’ अविनाश तैश में बोले.

‘‘झूठ मत बोलो साहब. मैं ने अपनी आंखों से देखा है उसे आप के घर में घुसते हुए. आप मुझ से झूठ बोल रहे हैं. मेरे हवाले करो उसे.’’

‘‘अजीब आदमी हो… जब मैं ने कह दिया कि कोई लड़की नहीं आई है, तब भी मुझ पर इलजाम लगा रहे हो? जाते हो कि पुलिस को बुलाऊं.’’

‘‘मेरी आंखें कभी धोखा नहीं खा सकतीं. मैं ने मीना को इस घर में घुसते हुए देखा है. मैं उसे लिए बिना नहीं जाऊंगा…’’ अपनी बात पर कायम रहते हुए उस आदमी ने कहा.

अविनाश बोले, ‘‘मेरे घर में आ कर मुझ पर ही तुम आधी रात को दादागीरी कर रहे हो?’’

‘‘साहब, मैं आप का लिहाज कर रहा हूं और आप से सीधी तरह से कह रहा हूं, फिर भी आप समझ नहीं रहे हैं,’’ एक बार फिर वह आदमी बोला.

‘‘कोई भी लड़की मेरे घर में नहीं घुसी है,’’ एक बार फिर इनकार करते हुए अविनाश उस आदमी से बोले.

‘‘लगता है, अब तो मुझे भीतर ही घुसना पड़ेगा,’’ उस आदमी ने खुली चुनौती देते हुए कहा.

तब एक पल के लिए अविनाश ने सोचा कि मीना कौन है, वे नहीं जानते हैं, मगर उस की बात सुन कर उन्हें उस पर दया आ गई. फिर ऐसी खूबसूरत लड़की को वे कोठे पर भिजवाना भी नहीं चाहते थे.

वह आदमी गुस्से से बोला, ‘‘आखिरी बार कह रहा हूं कि मीना को मेरे हवाले कर दो या मैं भीतर जाऊं?’’

‘‘भाई, तुम्हें यकीन न हो, तो भीतर जा कर देख लो,’’ कह कर अविनाश ने भीतर जाने की इजाजत दे दी. वह आदमी तुरंत भीतर चला गया.

किशन पास आ कर अविनाश से बोला, ‘‘यह क्या किया बाबूजी, एक अनजान आदमी को घर के भीतर क्यों घुसने दिया?’’

‘‘ताकि वह मीना को ले जाए,’’ छोटा सा जवाब दे कर अविनाश बोले, ‘‘और यह बला टल जाए.’’

‘‘तो फिर इतना नाटक करने की क्या जरूरत थी. उसे सीधेसीधे ही सौंप देते,’’ किशन ने कहा, ‘‘आप ने झूठ बोला, यह उसे पता चल जाएगा.’’

‘‘मगर, मुझे मीना को बचाना था. मैं उसे कोठे पर नहीं भेजना चाहता था, इसलिए मैं इनकार करता रहा.’’

‘‘अगर मीना खुद जाना चाहेगी, तब आप उसे कैसे रोक सकेंगे?’’ अभी किशन यह बात कह रहा था कि तभी वह आदमी आ कर बोला, ‘‘आप सही कहते हैं. मीना मुझे अंदर नहीं मिली.’’

‘‘अब तो हो गई तसल्ली तुम्हें?’’ अविनाश खुश हो कर बोले.

वह आदमी बिना कुछ बोले बाहर निकल गया.

अविनाश ने दरवाजा बंद कर लिया और हैरान हो कर किशन से बोले, ‘‘इस आदमी को मीना क्यों नहीं मिली, जबकि वह अंदर ही छिपी थी?’’

‘‘हां बाबूजी, मैं अगर अलमारी में नहीं छिपती, तो यह गुंडा मुझे कोठे पर ले जाता. आप ने मुझे बचा लिया. आप का यह एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी,’’ बाहर निकलते हुए मीना बोली.

‘‘हां बेटी, चाहता तो मैं भी उस को पुलिस के हवाले करा सकता था, मगर तुम्हारे लिए मैं ने पुलिस को नहीं बुलाया,’’ समझाते हुए अविनाश बोले, ‘‘अब तुम्हारा इरादा क्या है?’’

‘‘किस बारे में बाबूजी?’’

‘‘अब इतनी रात को तुम कहां जाओगी?’’

‘‘आप मुझे कुछ दिनों तक अपने यहां शरणार्थी बन कर रहने दो.’’

‘‘मैं तुम को नहीं रख सकता मीना.’’

‘‘क्यों बाबूजी, अभी तो आप ने कहा था.’’

‘‘वह मेरी भूल थी.’’

‘‘तो मुझे आप एक रात के लिए अपने यहां रख लीजिए. सुबह मैं खुद चली जाऊंगी,’’ मीना बोली.

‘‘मगर, कहां जाओगी?’’

‘‘पता नहीं.’’

‘‘नहीं बाबूजी, इसे अभी निकाल दो,’’ किशन विरोध जताते हुए बोला.

‘‘किशन, मजबूर लड़की की मदद करना हमारा फर्ज है.’’

‘‘वह तो ठीक है, पर कहीं इसी इनसानियत में हैवानियत न छिपी हो बाबूजी.’’

‘‘आप आपस में लड़ो मत. मैं तो एक रात के लिए शरणार्थी बन कर रहना चाहती थी. मगर आप लोगों की इच्छा नहीं है, तो…’’ कह कर मीना चलने लगी.

‘‘रुको मीना,’’ अविनाश ने उसे रोकते हुए कहा. मीना वहीं रुक गई.

अविनाश बोले, ‘‘तुम कौन हो, मैं नहीं जानता, मगर एक अनजान लड़की को घर में रखना खतरे से खाली नहीं है. और यह खतरा मैं मोल नहीं ले सकता. तुम जो कह रही हो, उस पर मैं कैसे यकीन कर लूं?’’

‘‘आप को कैसे यकीन दिलाऊं,’’ निराश हो कर मीना बोली, ‘‘मैं उस सौतेली मां के पास भी नहीं जाना चाहती.’’

‘‘जब तुम सौतेली मां के पास नहीं जाना चाहती हो, तो फिर कहां जाओगी?’’

‘‘नहीं जानती. मैं रहने के लिए एक रात मांग रही थी, मगर आप को एतराज है. आप का एतराज भी जायज है. आप मुझे जानते नहीं. ठीक है, मैं चलती हूं.’’

अविनाश उसे रोकते हुए बोले, ‘‘रुको, तुम कोई भी हो, मगर एक पीडि़त लड़की हो. मैं तुम्हारे लिए जुआ खेल रहा हूं. तुम यहां रह सकती हो, मगर कल सुबह चली जाना.’’

‘‘ठीक है बाबूजी,’’ कहते हुए मीना के चेहरे पर मुसकान फैल गई… ‘‘आप ने डूबते को तिनके का सहारा दिया है.’’

‘‘मगर, सुबह तुम कहां जाओगी?’’ अविनाश ने फिर पूछा.

‘‘सुबह मौसी के यहां उज्जैन चली जाऊंगी?’’

अविनाश ने यकीन कर लिया और बोले, ‘‘तुम मेरे कमरे में सो जाना.’’

‘‘आप कहां साएंगे बाबूजी?’’ मीना ने पूछा.

‘‘मैं यहां सोफे पर सो जाऊंगा,’’ अविनाश ने अपना फैसला सुना दिया और आगे बोले, ‘‘जाओ किशन, इसे मेरे कमरे में छोड़ आओ.’’

काफी रात हो गई थी. अविनाश और किशन को जल्दी नींद आ गई. सुबह जब देर से नींद खुली. मीना नहीं थी. सामान बिखरा हुआ था. अलमारियां खुली हुई थीं. उन में रखे गहनेनकदी सब साफ हो चुके थे.

अविनाश और किशन यह देख कर हैरान रह गए. उम्रभर की कमाई मीना ले गई. उन का अनजान लड़की पर किया गया भरोसा उन्हें बरबाद कर गया. जो आदमी रात को आया था, वह उसी गैंग का एक सदस्य था, तभी तो वह मीना को नहीं ले गया. चोरी करने का जो तरीका उन्होंने अपनाया, उस तरीके पर कोई यकीन नहीं करेगा.

मीना ने जोकुछ कहा था, वह झूठ था. वह चोर गैंग की सदस्य थी. शरणार्थी बन कर अच्छा चूना लगा गई.

Hindi Kahani : डस्टबिन में बाबा – क्या बूआ प्रशांत का कहा मान गईं ?

Hindi Kahani : जज प्रशांत शर्मा ने कोर्ट से आ कर अपनी पत्नी सुगंधा के साथ शाम की चाय पीते हुए पूछा, ‘‘उमा बूआ से बात हो गई? कब पहुंच रही हैं?’’
‘‘कल सुबह आ जाएंगी,’’ फिर अपने पति को गंभीर देख कर सुगंधा ने पूछा, ‘‘क्या हुआ…? बहुत सीरियस हो.’’

‘‘अपने देश की मूर्ख जनता पर तरस आता है, सुगंधा. अदालत में ढोंगी बाबाओं की केस फाइलें बढ़ती जा रही हैं और हमारी गरीब जनता इन बाबाओं के हाथ की कठपुतली बनती ही जा रही है, इन्हें नेताओं का संरक्षण प्राप्त है, नेताओं को वोट चाहिए और बाबाओं के पास अंधभक्तों के वोट हैं, देख कर कोफ्त होती है. सब से बड़ी बात तो यह है कि जब उमा बूआ को प्रेमशंकर बाबा का नाम जपते देखता हूं, दिल जलने लगता है. अपने ही घर में बूआ को मूर्खता करते देख मुझे कैसे चैन मिल सकता है. कल प्रेमशंकर का फैसला हो जाएगा, जानता हूं कि बूआ प्रेमशंकर के पक्ष में फैसला सुनाने पर मुझ पर प्रैशर डालने आ रही हैं, उन्होंने ही मुझ अनाथ को पालपोस कर इस पद तक पहुंचाया है, वे मुझ से क्या उम्मीद रख कर आ रही हैं, जानता हूं. अपने ही घर में प्रेमशंकर जैसे धूर्त, ढोंगी की अंधभक्त उमा बूआ को कल कैसे समझाना है, यही सोच रहा हूं.

सुगंधा ने कर्मठ, न्यायप्रिय पति को तसल्ली देती नजरों से देखा. वे अच्छी तरह जानती हैं कि प्रशांत उमा बूआ के एहसानों तले दबे हैं, पर अपना कर्तव्य, न्याय व्यवस्था से बढ़ कर भला उन के लिए और क्या हो सकता है.

कल एक बड़े केस का फैसला उन्हें सुनाना था, करोड़ों की संपत्ति वाले ऐयाश प्रेमशंकर का परदाफाश एक लड़की कर चुकी थी. प्रेमशंकर पर दर्जनों हत्याओं, बलात्कार के पहले भी आरोप लगते रहे थे, पर हर बार इन मामलों को दबाया जाता रहा था, अब वह एक निडर लड़की के कारण जेल की हवा खा रहा था. कल सुबह प्रशांत शर्मा को फैसला सुनाना था.

उमा सुबह साढ़े 4 बजे की ट्रेन से पहुंच गई थी. वे प्रशांत के लिए मां जैसा दर्जा ही रखती थीं, वे अपने बेटे विकास, बहू पूजा और पोती निया के साथ रहती थीं. प्रशांत और सुगंधा ने उन के पैर छुए. हालचाल के बाद जब तक उमा फ्रेश हो कर आई, नौकर चाय ले कर आ गया था. प्रशांत और सुगंधा के दोनों बच्चे हौस्टल में पढ़ रहे थे. सुगंधा भी कालेज में प्रोफैसर थी. उमा ने चाय पीते हुए कहा, ‘‘प्रशांत, आज बाबाजी का फैसला होगा न…?’’

‘‘हां बूआ.’’

‘‘बेटा, लोगों ने बेवजह ही उन्हें फंसा दिया. उन्हें बचा लेना, बेटा. अपने सभी साथियों की तरफ से तुम से गुहार लगाने आई हूं, बेटा,’’ कह कर उमा ने अपने पर्स से प्रेमशंकर की फोटो निकाल कर माथे से लगाई, गले में पहनी माला के लौकेट की प्रेमशंकर की तसवीर को माथे से लगाया, कहा, ‘‘बड़े पुण्यात्मा हैं, बाबा. जब भी मेरठ में आते हैं, उन के सत्संग में हजारों की भीड़ यों ही तो नहीं होती होगी न. यह सब आजकल के धर्म से भागने वाले नास्तिक लोगों का कियाधरा है. बाबाजी को बचा लेना, बेटा. तुम से बड़ी उम्मीद ले कर आई हूं.’’

‘‘बूआ, आप ने न्यूज देखी है न. न्यूजपेपर पढ़े हैं न? फिर कैसे आप उस का पक्ष ले सकती हैं? उस के सारे कुकर्मों का प्रमाण मेरे सामने होगा, तो उस के बचने का मतलब ही नहीं है.’’

उमा का गला भर आया, ‘‘न बेटा, बाबा को बचा लो.’’

यह सुन कर प्रशांत चुप ही रहे, फिर कुछ न कहा.

बड़े फैसले का दिन था. प्रशांत पर कई तरह से प्रैशर डाला गया था, पर उन्हें अपने कर्तव्य से प्यारा कुछ भी न था. सुबह से ही उमा टीवी के आगे डट गई थी. आज सुगंधा ने भी उमा के साथ रहने के लिए छुट्टी ले ली थी, हर चैनल पर यही खबर थी. फैसला सुना दिया गया था, जज प्रशांत शर्मा ने फैसले में लिखा था, ‘‘अभियुक्त ने न केवल पीड़िता का भरोसा तोड़ा, बल्कि आम लोगों में संतों की इमेज को भी नुकसान पहुंचाया. सजा देने का उद्देश्य समाज को सुरक्षित करना है और अभियुक्त को रोकना है. अपराध न केवल पीड़ित, बल्कि उस समाज के विरुद्ध भी है, जिस से अपराधी और पीड़ित संबंध रखते हैं. उचित दंड नहीं दिया तो कोर्ट कर्तव्य से पथभ्रष्ट हो जाएगा. अभियुक्त के प्रति अवांछित सहानुभूति न्याय व्यवस्था को अधिक हानि पहुंचाएगी, क्योंकि इस से जनता को विधि की व्यवस्था में विश्वास कम होगा. यदि न्यायालय क्षतिग्रस्त व्यक्ति को संरक्षित नहीं करेगा, तो क्षतिग्रस्त व्यक्ति स्वयं बदला देने के मार्ग पर चलेगा.’’

प्रेमशंकर को उम्रकैद की सजा हुई. उमा तो वहीं सिर पकड़ कर बैठ गई. प्रशांत पर बहुत तेज गुस्सा आया. उमा कमरे से भी न निकली, न कुछ खायापीया.

सुगंधा को पति पर गर्व हुआ. प्रशांत घर आए तो सीधे उमा के रूम में ही गए. फोन पर सुगंधा प्रशांत को उन के गुस्से के बारे में पहले ही बता चुकी थी. उमा के चेहरे का रंग ही उड़ा था, चेहरे पर झुंझलाहट और नाराजगी थी. सुगंधा उमा के बैड पर ही बैठ गई. सुगंधा ने ही कहा, ‘‘प्रशांत, न्यूज तो हम ने देख ली, अपने मुंह से बताओ न, कोर्ट में क्या रहा?’’

प्रशांत ने उमा से कहा, ‘‘सुनोगी, बूआ?’’

उमा चुप रही, प्रशांत ने फिर कहा, ‘‘बूआ, मुझे नहीं लगता कि आप ने अपने बाबा की अंधशक्ति में सचाई पर ध्यान दिया होगा. सच से तो आप आंखें फेरे ही रहीं. पोक्सो ऐक्ट, जुवैनाइल जस्टिस ऐक्ट और इंडियन पीनल कोर्ट की धारा के अंतर्गत आप के बाबा पर चार्जशीट दाखिल हुई थी, इस के खिलाफ रेप, ट्रैफिकिंग और सैक्सुअल क्राइम के केस हैं. यह पापी धर्म के नाम पर ढोंग, पाखंड और आडंबर के खेल में 40 सालों से जनता को मूर्ख बना रहा था, साढ़े 4 साल से चल रही कार्यवाही में इस के झूठ, पाखंड का आवरण हट चुका है, आज उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई तो लगा कि लोगों के मन में न्याय के प्रति एक नई आशा जगी है. इतना तो आप को पता ही होगा न कि इस के गुरुकुल में एक लड़की पढ़ती थी, वह कुछ अस्वस्थ हुई, तो इस के चेले बुरी आत्मा का फेर बता कर इसे आश्रम ले गए, जहां इस लडकी को बंद कर के आप के बाबा ने रेप किया. इस लडकी के शब्दों में, ‘‘मैं आश्रम की सीढ़ियों पर बैठी हुई थी. बाबा ने मुझे इशारे से बुलाया. मैं गई, तो बाबा ने रूम की लाइट बंद कर मुझे अपने पास बैठा लिया, और कहा, ‘‘पढ़लिख कर क्या करोगी, समर्पित हो जाओ, मेरे साथ रहो, मैं तुम्हारा जीवन संवार दूंगा.’’

प्रशांत ने कहा, ‘‘आप के बाबा ने जबरदस्ती इस लडकी का रेप किया, बूआ. आप की तरह वह जिसे भगवान समझती थी, उस के साथ उस ने ऐसी घिनौनी हरकत की. बड़ी मुश्किल से इसे गिरफ्तार किया गया था. इस ने सजा से बचने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाए. आप जैसे अंधभक्तों ने सुप्रीम कोर्ट तक को प्रभावित करने की कोशिशें की, कभी लड़की को झूठी बताया गया, तो कभी उस के घर वालों पर दबाव बनाया गया. मामले को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिशें भी की गई, नेताओं से कहलवाया गया कि हिंदू संत को ही क्यों फंसाया गया. यहां तक कि इस पाखंडी ने खुद को नपुंसक साबित करने की कोशिश भी की. इस पापी के भक्तों की फौज यह सच स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं थी, कई गवाहों की हत्याएं हुईं, कई गवाह लापता हुए. उस की जमानत के लिए 12 बार अर्जी लगाई गई, पर हर बार वे निरस्त कर दी गई. कभी इस के आश्रम में कालाजादू के नाम पर हत्याएं हुई हैं, कभी इस के गुरुकुल के बाथरूम में 2 छात्रों के शव मिले. 70 के दशक में छोटे से आश्रम से निकल कर 19 देशों में 400 से अधिक आश्रम, 4 करोड़ से ज्यादा भक्त और 10,000 करोड़ से भी अधिक की संपत्ति का स्वामी बना आप का पूजनीय. ऐसा नाम है बूआ, जो धर्म के नाम पर धंधा करता रहा. जिस के आगे बड़ेबड़े नेता, उद्योगपति और राजनीतिबाज उस का रास्ता आसान ही करते रहे.’’

प्रशांत ने पलभर रुक कर एक गहरी सांस ली, फिर कहना शुरू किया, ‘‘बूआ, आप ने मुझे मां बन कर पाला है, आप ने आसरा न दिया होता तो मैं पता नहीं कहा होता. आज जो कुछ हूं, आप के स्नेह के ही कारण हूं. पर, आप को ऐसे दुष्ट की पूजा करते हुए देखना मेरा दुर्भाग्य है. आप को कुछ कह नहीं सकता, पर दुखी हूं कि अपने ही घर के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति को समझा नहीं पा रहा हूं कि आप जैसे अंधभक्तों की अंधश्रद्धा का फायदा उठा कर ये ढोंगी बाबा, स्वयंभू संत हर गलत काम को अंजाम देने से नहीं चूकते. इन का साम्राज्य रातोंरात खड़ा नहीं होता, धीरेधीरे ये जनता के दुखदर्द की नस पकड़ लेते हैं.

‘‘बूआ, आप मुझे एक बात बताइए, अगर आप के ये बाबा बलात्कार के मामलों में आजीवन कारावास की सजा पाते हैं तो भी आप को अपनी कोई गलती नजर नहीं आती? कथित चमत्कारी बाबाओं और स्वयंभू भगवानों द्वारा औरतों के शोषण के किस्से हमेशा से सुनते रहते हैं, पर आप जैसी औरतें क्यों इन की बातों में आती हैं? आप पढ़ीलिखी हैं. आप के घर में निया जैसी एक बच्ची है, वैसे ही कई घरों में बेटियां हैं, आप अपने घर में भी यह अंधभक्ति फैला रही होंगी तो कैसे और कब तक सुरक्षित रहेंगी बेटियां? इस केस में पीड़िता के दोषी उस के मातापिता भी तो हैं, जिन्होंने ऐसे ढोंगी, धूर्त बाबा पर आंख बंद कर विश्वास किया. आप तो एक औरत है, बलात्कार की शिकार लड़की की व्यथा जानने के बाद भी मुझ से कैसे यह आशा रख कर आई थीं कि ऐसे पाखंडी के पक्ष में कही आप की कोई भी बात मुझ पर असर करेगी.’’

उमा ने बहुत ही शिथिल स्वर में कहा, ‘‘तुम तो जानते हो न कि इन के परलोक सिधारने के बाद मैं कितनी बीमार हो गई थी, बाबा के सत्संग में गई तो चैन आया.’’

‘‘नहीं, आप को इस पापी की शरण में नहीं, विकास के करवाए इलाज से आराम हुआ था, तभी आप इस के सत्संग में बैठ भी पाईं, दुख हो रहा है बूआ, जिस पापी ने कितनी ही लड़कियों की इज्जत लूट ली, उस की तसवीर मेरी बूआ कैसे गले में लटका कर घूम सकती है?’’

उमा का चेहरा बहुत शांत और गंभीर था, एक नजर प्रशांत और सुगंधा पर डाली, पलभर बाद किचन की तरफ बढ़ी, सुगंधा फौरन उठ कर धीरे से उन के पीछे गई, किचन में झांका, बूआ गले का बाबा का लौकेट डस्टबिन में डाल रही थीं, इतने में प्रशांत भी आ गए थे, पूछा, ‘क्या हुआ?’’
सुगंधा हंस पड़ी, ‘‘बाबा तो गया.’’

‘‘कहां…?’’

‘‘डस्टबिन में.’’

‘‘मेरी बूआ,’’ कहतेकहते प्रशांत ने उमा को गले लगा लिया, कहा, ‘‘ वैल डन, बूआ.’’ तीनों मुसकरा रहे थे, उमा ने भी अपनेआप को बहुत हलका महसूस किया था.

Family Story : मोहजाल – शांति से क्या गलती हुई कि उसे इतनी बड़ी सजा मिली ?

Family Story : पूरे दक्षिणपुरी मदनगीर इलाके में शोर मच चुका था कि शांति मंडल की लड़की राजेश्वरी के लड़के के साथ भाग गई. शांति ठंडी जमीन पर बैठी भी झलस रही थी. नए कूलर की ठंडी हवा भी उसे गरम लग रही थी. सूनी आंखों से खुले दरवाजे को ताक रही थी कि अभी शायद शर्मिला रोज की तरह आ कर कहे, ‘यह सब झठ है, मां.’ मगर शाम के 7 बज गए थे. दीयाबात्ती का समय हो गया था. शांति सोचने लगी, ‘अब क्या आएगी?’

रामरतन मंडल 3-3 बेटियां शांति की छाती पर लाद कर गांव से दूर भाग गया था. किसी ने कहा कोलकाता भाग गया, किसी ने कहा मुंबई भाग गया है, किसी ने कहा दिल्ली में है. जहांजहां रिश्तेदार थे, शांति चिट्ठियां भेजती रही. उड़तीउड़ती खबर मिली कि रामरतन ने दूसरी औरत रख ली है. उस के 2 बेटे भी हैं. अब वह ट्रक चलाता है. शांति ने उसे शहरशहर ढूंढ़ा पर वह भगोड़ा नहीं मिला. गांव में छोटा सा घर था और साझे की जमीन, छल्ला तक नहीं बचा, सारा जेवर सेठसाहूकारों के पास चला गया. तीनों लड़कियां ले कर वह दिल्ली में रहने लगी. कुछ न कुछ काम मिल जाता था. गांव व बिरादरी के लोगों ने झग्गी डालने में उस की मदद की. गाड़ी चल निकली.

एक दिन शांति के पैरों को कुछ हो गया. खैराती अस्पताल की गोलियों से ठीक न हुआ. वह एक डाक्टर के घर भी झड़ूपोंछा करती थी. उस के इंजैक्शन भी काम न आए. बड़ी लड़की जवान होती जा रही थी. उस के सब कपड़े छोटे हो गए थे. कभीकभी वह घर में शांति की साड़ी भी लपेट लेती तो बहुत सयानी लगती. शांति डरती रहती थी कि यदि उसे खुद को कुछ हो गया तो वह क्या करेगी? पैर नहीं चले तो सब का पेट कैसे भरेगी. फिर तीनों अभी बच्चियां थीं.

झग्गियों में द्वारका भी रहता था. वह रिश्ते में रामरतन की मौसी का लड़का, यानी भाई लगता था. द्वारका से चाचाताऊ जमीन हड़प गए थे. उसे घर से ही खदेड़ दिया था. उस का बाप फौज में मर गया था, मां पहले ही चल बसी थी. जमीनजायदाद चली गई, उस का उसे दुख न था. दुख था तो सिर्फ इसी का कि उसे घर से भी निकाल दिया था. दिल्ली में वह खुश नहीं था.

गांव, घर, खेतखलिहान की याद आती थी पर क्या करता? वह आटादाल वाले का रिकशा चलाता था. कच्चेपक्के

2 टिक्कड़ सेंक कर खा लेता था. शांति से हमदर्दी थी कि अकेली औरत बिना मर्द के 3-3 बेटियां पाल रही है. वह कभीकभी रोटी के वक्त बच्चों के लिए बिस्कुट, केले ले जाता था. शांति उसे गरमगरम 2 रोटियां डाल देती. वही बेचारा खबर लाया था कि थोड़ी दूर एक चर्च में एक अंगरेज डाक्टर आया है. बड़ी शिफा है, बड़ा जादू है उस के हाथ में.

उस की दवा से शांति वाकई ठीक हो गई. कुछ दिनों में वह डाक्टर साहब का खाना भी बनाने लगी. हाथपैरों की कई तकलीफों के लिए डाक्टर साहब ने नसों की मालिश सिखाने की क्लास भी शुरू कर दी. शांति बड़े गौर से देखती. डाक्टर साहब ने उस की इच्छा देख उसे क्लास में रहने की इजाजत दे दी और वह जल्दी सीख भी गई. इंग्लिश के कुछ शब्द भी उस की जबान पर चढ़ने लगे. चर्च से 2-3 मेमसाहबों का काम मिल गया. शांति की दुनिया ही बदल गई. उस ने पिछले सब काम छोड़ दिए. मालिश में मेहनत थी, मगर पैसा था.

हाय, क्या काम आया यह पैसा? कैसा भी मौसम हो, कभी 4-5 तो कभी

6-7 घरों में भागतीफिरती. उसे बसों के नंबर कुछ रट गए. नएपुराने इलाके, गलीमहल्ले, कालोनी, बाग उस ने सब देख लिए. शाम हो जाती तो द्वारका झग्गी के बाहर पालतू जानवर की तरह पहरा देता. डाक्टर तो विदेश चला गया. वह देशदेशांतर में घूमघूम कर गरीबों का इलाज करता था. मगर शांति मालिश में ही सुबहशाम लगी रही. बड़ीबड़ी कोठियों की मेमसाहबें उसे मुंहमांगा पैसा और खुश हो कर इनाम भी देतीं. रोटीपानी बड़ी लड़की कांता करने लगी.

बीच की बेटी रानी भी बड़ी हो चली. शांति को तो खाने का लालच ही न था, सो कुछ फल, मिठाई जो भी कोठियों से मिलता उसे भी वह इन्हीं बढ़ती हुई लड़कियों के लिए थैले में भर लाती.

इलाके के सभी झग्गी वालों को दक्षिणपुरी मदनगीर में प्लौट मिल गए. छोटेछोटे पक्के घर बन गए. शांति के केशों में कहींकहीं सफेदी चमकने लगी, मगर फुरती और भी बढ़ गई. कई अमेरिकी, कोरियाई और जापानी महिलाओं का भी उसे काम मिलने लगा. पैसे चौगुने हो गए. वह ज्यादातर घर से बाहर रहने लगी.

पास में ही कपड़ों की फैक्टरी थी. कांता जिद करने लगी कि और लड़कियां भी जा रही हैं, वह भी उस में काजबटन का काम करेगी. बहुत मना करने पर भी न मानी तो द्वारका के साथ भेज दिया.

सब ठीक होने लगा. कांता खुश रहने लगी. वह सुबह का खाना बना कर फैक्टरी जाती, शाम का खाना बीच की बेटी रानी स्कूल से आ कर बना लेती. वह भी बड़ी हो रही थी. शांति घर से बाहर जाती तो डरती. लड़कियों को समझती रहती कि किसी से ज्यादा हंसनाबोलना मत, शहरों में लोग बहलाफुसला लेते हैं. किसी की बातों में न आना. कोई भी बात हो तो मुझे बताना. ‘अपने गांव जा कर, अच्छा रिश्ता देख कर कांता की शादी करेगी,’ शांति यही सोचती रह गई. पहला बम कांता ने ही फोड़ा.

‘भाभी, कांता का इंतजार कर रही हो?’ द्वारका ने पूछा.

‘अब वह कहां आएगी.’

‘क्या? सब ठीक तो है? क्या हुआ उसे?’ शांति ने घबरा कर पूछा.

‘भाभी, उस ने फैक्टरी के एक टेलर मास्टर से आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली है.’

यह सुन कर शांति सिर पीट कर रोने लगी, ‘मैं तो धनीरामजी के बेटे के या फिर चौधरी लखनपाल के छोटे भाई के बारे में सोच रही थी. सिर्फ एक हफ्ते में गांव जाना था. ऐसी जल्दी क्या थी, मां को मरा मान लिया. अरे, कभी बोली भी नहीं. पता भी न चला. इसीलिए तो मैं फैक्टरी नहीं भेजना चाहती थी.’

‘अब रोने से क्या फायदा, भाभी. खुद को संभालो. बाकी लड़कियां घबरा गई हैं. शक तो मुझे हुआ था पर छोटी सी बच्ची खुद शादी कर लेगी, पता न था. सुनते ही गुस्सा तो आया. सोचा, पीछेपीछे जाऊं और उस टेलर मास्टर के हाथपैर तोड़ दूं, मगर फैक्टरी वालों ने समझया कि अब तो शादी हो चुकी है. मांग में सिंदूर भर दिया, मंगलसूत्र पहना दिया, अब क्या होगा.’

‘द्वारका, उस ने मेरे सीने पर घूंसा क्यों मारा? उस भगोड़े नाग की बच्ची को दूध पिलाती रही. क्या लात मारी है, मां को डस गई. मेरी कोख पर थूक दिया है.’

कुछ दिनों बाद दोनों आए. शांति ने कुछ नहीं कहा. कांता आते ही शांति के पैरों में गिर गई और रोने लगी. आंसुओं में सब बह गया. दामाद देख कर शांति का दिल तड़प उठा. अधेड़, दांतों में सोना जड़ा, रंगरूप भी खास नहीं. वह पान मसाला चबाता, चारों तरफ घूरघूर कर देखता और बेबात हंसता रहा. द्वारका भी भागा आया था. खैर, शांति चुप बैठी रही. रानी और शर्मिला ने जल्दीजल्दी आलू की सब्जी और पूरियां बनाईं. द्वारका नुक्कड़ के हलवाई से मिठाई ले आया.

बस, उस के बाद फिर शांति ने नई जिंदगी शुरू कर दी. रातदिन मेहनत करती रही. कांता की भी लड़की हो गई. वह रोतीपीटती आती थी और जो भी टेलर मास्टर मांग करता था, बरतनभांडे, कपड़ेलत्ते और रुपयापैसा, वह सब ले जाती थी.

दूसरा बम फूटा 2 साल बाद. सुबहसुबह चिट्ठी मिली. पहले तो शांति से पढ़ी ही नहीं गई. आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा, अक्षर साफ दिखाई नहीं दिए. बड़ी मुश्किल से शर्मिला ने चिट्ठी पढ़ी, ‘रानी चली गई, एक ड्राइवर के साथ.’

शांति छाती पीटपीट कर रोने लगी.

यह क्या हो रहा था, इतने जतन और प्यार से पाला था. पता नहीं, क्या कमी रह गई. वह उन के लिए पैसा कमाने को भूखीप्यासी, रातदिन भागती रही. रोज समझती थी कि किसी से भी हंसीमजाक, नजरें मत मिलाया करो, किसी के फुसलाने में मत आओ. बाप न भागता, घर में रहता तो अपनी बच्चियों को अपने साए में छिपा कर रखता.

शर्मिला मां की हालत देख कर घबरा गई. वह भी उस से चिपट कर रोने लगी थी, ‘मां, मैं आप को कभी छोड़ कर नहीं जाऊंगी.’

सालभर में ड्राइवर रानी को वापस उसी के घर पटक गया. उस के मांबाप रानी को अपने घर में रखने को तैयार नहीं थे. पेट में बच्चा था. शादी का कोई पक्का सुबूत भी नहीं था. प्यार का बुखार उतर गया था. मां का कलेजा द्रवित हो उठा, सो शांति ने चुपचाप लड़की को संभाला. रानी के हाथपांव काफी कमजोर हो गए थे. खुराक भी शायद पूरी नहीं मिली थी. उस की भी स्वस्थ लड़की हुई. रानी इसी उम्मीद में रही कि बच्ची को देखने को शायद ड्राइवर आएगा, प्यार के वादे निभाएगा.

बाहर राजेश्वरी ने कोसना शुरू कर दिया, ‘‘छिनाल को मेरा ही घर मिला था. मेरे घनश्याम को भगा दिया, भोलाभाला घनश्याम. अरे, पुरखे उसे कोस रहे होंगे. बुड्ढी चालू है, 2 पहले भगा दीं और अब मेरे घर डाका डाल दिया. खुद घरघर घूमती है. लड़कियों को खुला छोड़ रखा है. अरी, मेरा बेटा लौटा दे, अरी बाहर निकल.’’

शांति दरवाजे पर सिर झकाए हुए द्वारका को देख कर सोचने लगी कि अगर किसी के साथ निभाया है तो इसी बेचारे ने. मैं ने कभी इसे अपना नहीं समझ. जब से रामरतन भागा था और वह भटकती हुई दिल्ली आई थी, यही बेचारा दुखसुख में हमेशा काम आया. 5-6 साल छोटा है तो क्या हुआ, बाहर अलग मकान में क्यों रहेगा. इसे यहीं बुला लेना चाहिए. शायद घर के अंदर रहता तो लड़कियां भी काबू में रहतीं, आलतूफालतू लोगों के साथ न भागतीं. फिर बोली, ‘‘द्वारका, अंदर आ जाओ. जो हुआ सो हुआ, अब क्या करूं? अकेले मुझ से कुछ संभाला नहीं जाता. मैं थक गई हूं.’’

अंदर आ कर द्वारका शांति के चरणों में एकदम झक गया. उस के आंसू उमड़ आए, बोला, ‘‘भाभी, तुम अकेली नहीं हो, हम हैं न. आप ने मुझे भी इतना सहारा दिया है. अपना समझ, अब मैं आप की सेवा के लिए बहू भी ले आया हूं. अगली अष्टमी को मुहूर्त निकला है. वह आप की बहुत इज्जत करती है. पैर दबाएगी, सिर में तेल डालेगी. अरी पारबती, भीतर आ जा. डर के मारे ड्योढ़ी में ही बैठी है.’’

यह सुन कर शांति की आंखें फटी की फटी रह गईं. दरवाजे से चिकनी, सांवली, अल्हड़ सी एक औरत घुसी और उस ने पसीने से गीली हथेलियों से शांति के पैर छुए, शांति उसे आशीर्वाद भी न दे सकी, गुमसुम सी

हो गई. फिर बुदबुदाई, ‘द्वारका तू भी…?’

इतने में लाल जोड़े में सजी शर्मिला आ गई, साथ में खिलखिलाता घनश्याम भी था. शर्मिला बोली, ‘‘लो मां, हमें भी आशीर्वाद दो, मैं आ गई. मैं ने कहा था न कि मैं आप को छोड़ कर नहीं जाऊंगी. आप के घर के सामने ही रहूंगी और आतीजाती रहूंगी. रोना मत, मां,’’ फिर वह घनश्याम की ओर मुखातिब हो कर बोली, ‘‘मां के पैर छुओ.’’

तभी बाहर एक गाड़ी रुकी और झेंपताशरमाता रानी का ड्राइवर पति भी अपनी लड़की को देखने आ गया. वह लड़की से मिलने का मोह नहीं छोड़ सका. धीरेधीरे पत्थर बनी शांति में ममता का सागर हिलोरें मारने लगा. वह फफक उठी, शायद अब लड़कियों का भविष्य सुधर सके.

Hindi Story : क्या वही प्यार था – कहानी पतिपत्नी के बीच दिल से जुड़ाव की

Hindi Story : दादी और बाबा के कमरे से फिर जोरजोर से लड़ने की आवाजें आने लगी थीं. अम्मा ने मुझे इशारा किया, मैं समझ गई कि मुझे दादीबाबा के कमरे में जा कर उन्हें लड़ने से मना करना है. मैं ने दरवाजे पर खड़े हो कर इतना ही कहा कि दादी, चुप हो जाइए, अम्मा के पास नीचे गुप्ता आंटी बैठी हैं. अभी मेरी बात पूरी भी नहीं हुई कि दादी भड़क गईं.

‘‘हांहां, मुझे ही कह तू भी, इसे कोई कुछ नहीं कहता. जो आता है मुझे ही चुप होने को कहता है.’’

दादी की आवाज और तेज हो गई थी और बदले में बाबा उन से भी जोर से बोलने लगे थे. इन दोनों से कुछ भी कहना बेकार था. मैं उन के कमरे का दरवाजा बंद कर के लौट आई.

दादीबाबा की ऐसी लड़ाई आज पहली बार नहीं हो रही थी. मैं ने जब से होश संभाला है तब से ही इन दोनों को इसी तरह लड़ते और गालीगलौज करते देखा है. इस तरह की तूतू मैंमैं इन दोनों की दिनचर्या का हिस्सा है. हर बार दोनों के लड़ने का कारण रहता है दादी का ताश और चौपड़ खेलना. हमारी कालोनी के लोग ही नहीं बल्कि दूसरे महल्लों के सेवानिवृत्त लोग, किशोर लड़के दादी के साथ ताश खेलने आते हैं. ताश खेलना दादी का जनून था. दादी खाना, नहाना छोड़ सकती थीं, मगर ताश खेलना नहीं.

दादी के साथ कोई बड़ा ही खेलने वाला हो, यह जरूरी नहीं. वे तो छोटे बच्चे के साथ भी बड़े आनंद के साथ ताश खेल लेती थीं. 1-2 घंटे नहीं बल्कि पूरेपूरे दिन. भरी दोपहरी हो, ठंडी रातें हों, दादी कभी भी ताश खेलने के लिए मना नहीं कर सकतीं. बाबा लड़ते समय दादी को जी भर कर गालियां देते परंतु दादी उन्हें सुनतीं और कोई प्रतिक्रिया दिए बगैर उसी तरह ताश में मगन रहतीं. कई बार बहुत अधिक गुस्सा आने पर बाबा, दादी के 1-2 छड़ी भी टिका देते. दादी बाबा से न नाराज होतीं न रोतीं. बस, 1-2 गालियां बाबा को सुनातीं और अपने ताश या चौपड़ में मस्त हो जातीं.

एक खास बात थी, वह यह कि दोनों अकसर लड़ते तो थे मगर एकदूसरे से अलग नहीं होना चाहते थे. जब दोनों की लड़ाई हद से बढ़ जाती और दोनों ही चुप न होते तो दोनों को चुप कराने के लिए अम्मा इसी बात को हथियार बनातीं. वे इतना ही कहतीं, ‘‘आप दोनों में से किसी एक को देवरजी के पास भेजूंगी,’’ दोनों चुप हो जाते और तब दादी, बाबा से कहतीं, ‘‘करमजले, तू कहीं रहने लायक नहीं है और न मुझे कहीं रहने लायक छोड़ेगा,’’ और दोनों थोड़ी देर के लिए शांत हो जाते.

खैर, गुप्ता आंटी तो चली गई थीं मगर अम्मा को आज जरा ज्यादा ही गुस्सा आ गया था. सो, अम्मा ने दोनों से कहा, ‘‘बस, मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती. अभी देवरजी को चिट्ठी लिखती हूं कि किसी एक को आ कर ले जाएं.’’

अम्मा का कहना था कि बाबा हाथ जोड़ कर हर बार की तरह गुहार करने लगे, ‘‘अरी बेटी, तू बिलकुल सच्ची है, तू हमें ऊपर बनी टपरी में डाल दे, हम वहीं रह लेंगे पर हमें अलगअलग न कर. अरी बेटी, आज के बाद मैं अपना मुंह सी लूंगा.’’

अभी बात चल ही रही थी कि संयोग से चाचा आ गए. चायनाश्ते के बाद अम्मा ने चाचा से कहा, ‘‘सुमेर, दोनों में से किसी एक को अपने साथ ले कर जाना. जब देखो दोनों लड़ते रहते हैं. न आएगए की शर्म न बच्चों का लिहाज.’’

चाचा लड़ने का कारण तो जानते ही थे इसलिए दादी को समझाते हुए बोले, ‘‘मां, जब पिताजी को तुम्हारा ताश और चौपड़ खेलना अच्छा नहीं लगता तो क्यों खेलती हैं, बंद कर दें. ताश खेलना छोड़ दें. पता नहीं इस ताश और चौपड़ के कारण तुम ने पिताजी की कितनी बेंत खाई होंगी.

‘‘भाभी ठीक कहती हैं. मां, तुम चलो मेरे साथ. मेरे पास ज्यादा बड़ा मकान नहीं है, पिताजी के लिए दिक्कत हो जाएगी. मां, तुम तो बच्चों के कमरे में मजे से रहना.’’

आज दादी भी गुस्से में थीं, एकदम बोलीं, ‘‘हां बेटा, ठीक है. मैं भी अब तंग आ गई हूं. कुछ दिन तो चैन से कटेंगे.’’

दादी ने अपना बोरियाबिस्तर बांध कर तैयारी कर ली. अपनी चौपड़ और ताश उठा लिए और जाने के लिए तैयार हो गईं.

यह बात बाबा को पता चली तो बाबा ने वही बातें कहनी शुरू कर दीं जो दादी से अलग होने पर अम्मा से किया करते थे, ‘‘अरी बेटी, मैं मर कर नरक में जाऊं जो तू मेरी आवाज फिर सुने.’’

अम्मा के कोई जवाब न देने पर वे दादी के सामने ही गिड़गिड़ाने लगे, ‘‘सुमेर की मां, आप मुझे जीतेजी क्यों मार रही हो. आप के बिना यह लाचार बुड्ढा कैसे जिएगा.’’

इतना सुनते ही दादी का मन पिघल गया और वे धीरे से बोलीं, ‘‘अच्छा, नहीं जाती,’’ दादी ने चाचा से कह दिया, ‘‘तेरे पिताजी ठीक ही तो कह रहे हैं न, मैं नहीं जाऊंगी,’’ और दादी ने अपना बंधा सामान, अपना बक्सा, ताश, चौपड़ सब कुछ उठा कर खुद ही अंदर रख दिया.

चाचा को उसी दिन लौटना था अत: वे चले गए. शाम को मैं चाय ले कर बाबा के पास गई तो बाबा ने कहा, ‘‘सिम्मी बच्ची, पहले अपनी दादी को दे,’’ और फिर खुद ही बोले, ‘‘सुमेर की मां, सिम्मी चाय लाई है, चाय पी लो.’’

दादी भी वाणी में मिठास घोल कर बड़े स्नेह से बोलीं, ‘‘अजी आप पियो, मेरे लिए और ले आएगी.’’

एक बात और बड़ी मजेदार थी, जब अलग होने की बात होती तो तूतड़ाक से बात करने वाले मेरे बाबा और दादी आपआप कर के बात करते थे जो हमारे लिए मनोरंजन का साधन बन जाती थी. लेकिन ऐसे क्षण कभीकभी ही आते थे, और दादीबाबा कभीकभी ही बिना लड़ेझगड़े साथ बैठते थे. आज भी ऐसा ही हुआ था. ये आपआप और धीमा स्वर थोड़ी ही देर चला क्योंकि पड़ोस के मेजर अंकल दादी के साथ ताश खेलने आ गए थे.

बाबा की तबीयत खराब हुए कई दिन हो गए थे. दादी को विशेष मतलब नहीं था उन की तबीयत से. एक दिन बाबा की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब हो गई. बाबा कहने लगे, ‘‘आज मैं नहीं बचूंगा. अपनी दादी से कहो, मेरे पास आ कर बैठे, मेरा जी बहुत घबरा रहा है.’’

दादी की ताश की महफिल जमी हुई थी. हम उन्हें बुलाने गए मगर दादी ने हांहूं, अच्छा आ रही हूं, कह कर टाल दिया. वह तो अम्मा डांटडपट कर दादी को ले आईं. दादी बेमन से आई थीं बाबा के पास.

दादी बाबा के पास आईं तो बाबा ने बस इतना ही कहा था, ‘‘सुमेर की मां, तू आ गई, मैं तो चला,’’ और दादी का जवाब सुने बिना ही बाबा हमेशा के लिए चल बसे.

तेरहवीं के बाद सब रिश्तेदार चले गए. शाम को दादी अपने कमरे में गईं. वे बिलकुल गुमसुम हो गई थीं हालांकि बाबा की मृत्यु होने पर न वे रोई थीं न ही चिल्लाई थीं. दादी ने खाना छोड़ दिया, वे किसी से बात नहीं करती थीं. ताश, चौपड़ को उन्होंने हाथ नहीं लगाया. जब कोई ताश खेलने आता तो दादी अंदर से मना करवा देतीं कि उन की तबीयत ठीक नहीं है. अम्मा या पापा दादी से बात करने का प्रयास करते तो दादी एक ही जवाब देतीं, ‘‘मेरा जी अच्छा नहीं है.’’

एक दिन अम्मा, दादी के पास गईं और बोलीं, ‘‘मांजी, कमरे से बाहर आओ, चलो ताश खेलते हैं, आप ने तो बात भी करना छोड़ दिया. दिनभर इस कमरे में पता नहीं क्या करती हो. चलो, आओ, लौबी में ताश खेलेंगे.’’

दादी के चिरपरिचित जवाब में अम्मा ने फिर कहा, ‘‘मांजी, ऐसी क्या नफरत हो गई आप को ताश से. इस ताश के पीछे आप ने सारी उम्र पिताजी की गालियां और बेंत खाए. जब पिताजी मना किया करते थे तो आप खेलने से रुकती नहीं थीं और अब वे मना करने के लिए नहीं हैं तो 3 महीने से आप ने ताश छुए भी नहीं. देखो, आप की चौपड़ पर कितनी धूल जम गई है.’’

अब दादी बोलीं, ‘‘परसों होंगे 3 महीने. मेरा उन के बिना जी नहीं लगता. सुमेर के पिताजी, मुझे भी अपने पास बुला लो. मुझे नहीं जीना अब.’’

दादी की मनोकामना पूरी हुई. बाबा के मरने के ठीक 3 महीने बाद उसी तिथि को दादी ने प्राण त्याग दिए. यानी दादी अपने कमरे में जो गईं तो 3 महीने बाद मर कर ही बाहर आईं.

दादीबाबा को हम ने कभी प्रेम से बैठ कर बातें करते नहीं देखा था, लेकिन दादी बाबा की मौत का गम नहीं सह पाईं और बाबा के पीछेपीछे ही चली गईं. उन के ताश, चौपड़ वैसे के वैसे ही रखे हुए हैं.

Best Hindi Story : भुट्टेवाली लव स्‍टोरी

Best Hindi Story : ‘‘देखो तनु शादीब्याह की एक उम्र होती है, कब तक यों टालमटोल करती रहोगी, यह घूमना फिरना, मस्ती करना एक हद तक ठीक रहता है, उस के आगे जिंदगी की सचाइयां रास्ता देख रही होती हैं और सभी को उस रास्ते पर जाना ही होता है,’’ जयनाथजी अपनी बेटी तनु को रोज की तरह समझने का प्रयास कर रहे थे.

‘‘ठीक है पापा, बस यह आखिरी बार कालेज का ग्रुप है, अगले महीने से तो कक्षाएं खत्म हो जाएंगी. फिर इम्तिहान और फिर आगे की पढ़ाई.’’

जयनाथजी ने बेटी की बात सुन कर अनसुना कर दी. वे रोज अपना काफी वक्त तनु के लिए रिश्ता ढूंढ़ने में बिताते. जिस गति से रिश्ते ढूंढ़ढूंढ़ कर लाते उस से दोगुनी रस्तार से तनु रिश्ते ठुकरा देती.

‘‘ये 2 लिफाफे हैं, इन में 2 लड़कों के फोटो और बायोडाटा है, देख लेना और हां दोनों ही तुम से मिलने इस इतवार को आ रहे हैं, मैं ने बिना पूछे ही दोनों को घर बुला लिया है, पहला लड़का अंबर दिन में 11 बजे और दूसरा आकाश शाम को 4 बजे आएगा,’’

जयनाथजी ने 2 लिफाफे टेबल पर रख आगे कहा, ‘‘इन दोनों में से तुम्हें एक को चुनना है.’’

तनु ने अनमने ढंग से लिफाफे खोले और एक नजर डाल कर लिफाफे वहीं पटक दिए, फिर सामने भाभी को खड़ा देख बोली, ‘‘लगता है भाभी इन दोनों में से एक के चक्कर में पड़ना ही पड़ेगा… आप लोगों ने बड़ा जाल बिछाया है… अब और टालना मुश्किल लग रहा है.’’

‘‘बिलकुल सही सोच रही हो तनु… हमें बहुत जल्दी है तुम्हें यहां से भागने की… ये दोनों रिश्ते बहुत ही अच्छे  हैं, अब तुम्हें फैसला करना है कि अंबर या आकाश… पापामम्मी ने पूरी तहकीकात कर के ही तुम तक ये रिश्ते पहुंचाए हैं. आखिरी फैसला तुम्हारा ही होगा.’’

‘‘अगर दोनों ही पसंद आ गए तो? ‘‘तनु ने हंसते हुए कहा.

भाभी भी मुसकराए बगैर नहीं रह पाई और बोली, ‘‘तो कर लेना दोनों से शादी.’’

तनु सैरसपाटे और मौजमस्ती करने में विश्वास रखती थी. मगर साथ ही वह पढ़ाईलिखाई और अन्य गतिविधियों में भी अव्वल थी. कई संजीदे मसलों पर उस ने डिबेट के जरीए अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाई थी. घर में भी कई देशविदेश के चर्चित विषयों पर अपने भैया और पापा से बहस करती और अपनी बात मनवा कर ही दम लेती.

यह भी एक कारण था कि उस ने कई रिश्ते नामंजूर कर दिए थे. उसे लगता था कि उस के सपनों का राजकुमार किसी फिल्म के नायक से कम नहीं होना चाहिए. हैंडसम, डैशिंग, व्यक्तित्व ऐसा कि चलती हवा भी उस के दीदार के लिए रुक जाए. ऐसी ही छवि मन में लिए वह हर रात सोती, उसे यकीन था कि उस के सपनों का राजकुमार एक दिन जरूर उस के सामने होगा.

रविवार को भाभी ने जबरदस्ती उठा कर उसे 11 बजे तक तैयार कर दिया, लाख कहने के बावजूद वे उस ने न कोई मेकअप किया न कोई खास कपड़े पहने. तय समय पर ड्राइंगरूम में बैठ कर सभी मेहमानों का इंतजार करने लगे. करीब आधे घंटे के इंतजार के बाद एक गाड़ी आ कर रुकी और उस में से एक बुजुर्ग दंपती उतरे.

तनु ने फौरन सवाल दाग दिया, ‘‘आप लोग अकेले ही आए हैं अंबर कहां है?’’

तनु के इस सवाल ने जयनाथजी एवं अन्य को सकते में डाल दिया. इस के पहले कि कोई कुछ जवाब देता एक आवाज उभरी, ‘‘मैं यहां हूं, मोटरसाइकिल यहीं लगा दूं?’’

तनु ने देखा तो उसे देखती ही रह गई, इतना खूबसूरत बांका नौजवान बिलकुल उस के तसव्वुर से मिलताजुलता, उसे लगा कहीं वह ख्वाब तो नहीं देख रही. इतना बड़ा सुखद आश्चर्य और वह भी इतनी जल्दी… तनु की तंद्रा तब भंग हुई जब युवक मोटरसाइकिल पार्क करने की इजाजत मांग रहा था.

‘‘हां बेटा जहां इच्छा हो लगा दो,’’ जयनाथजी ने कहा.

अंबर ने मोटरसाइकिल पार्क की और फिर सभी घर के अंदर प्रविष्ट हो गए.

इधरउधर के औपचारिक वार्त्तालाप के बाद तनु बोल पड़ी, ‘‘अगर आप लोग इजाजत दें तो मैं और अंबर थोड़ा बाहर घूम आएं…?’’

‘‘गाड़ी में चलना चाहेंगी या…’’ अम्बर ने पूछना चाहा.

‘‘मोटरसाइकिल पर… मेरी फैवरिट सवारी है…’’

थोड़ी ही देर में अंबर की मोटरसाइकिल हवा से बातें कर रही थी. समंदर के किनारे फर्राटे से दौड़ती मोटरसाइकिल पर बैठ कर तनु स्वयं को किसी अन्य दुनिया में महसूस कर रही थी.

‘‘नारियल पानी पीना है?’’ तनु ने जोर से कहा.

‘‘पूछ रही हैं या कह रही हैं?’’

‘‘कह रही हूं… तुम्हें पीना हो तो पी सकते हो…’’

अंबर ने फौरन मोटरसाइकिल घुमा दी. विपरीत दिशा से आती गाडि़यों के बीच मोटरसाइकिल को कुशलता से निकालते हुए दोनों नारियल पानी वाले के पास पहुंय गए.

अंबर ने एक ही सांस में नारियल पानी खत्म कर दिया और नारियल को एक ओर उछाल कर जेब से पर्स निकाल कर पैसे दे कर बोला, ‘‘मैं ने अपने नारियल के पैसे दे दिए, आप अपने नारियल के पैसे दे दीजिए.’’

तनु अवाक हो कर अंबर को ताकने लगी.

‘‘बुरा मत मानिएगा तनुजी, आप का और मेरा अभी कोई रिश्ता नहीं है, मैं क्यों आप पर खर्च करूं?’’

तनु हार मानने वालों में से नहीं थी. बोली, ‘‘और जो आप के मातापिता हमारे घर पर काजू, किशमिश और चायकाफी उड़ा रहे हैं उस का क्या?

‘‘बात तो सही है, हम दिल्ली वाले हैं. मुफ्त का माल पर हाथ साफ करना हमें खूब आता है…’’

अंबर ने हंसते हुए कहा, ‘‘चिंता न करें मैं दोनों के पैसे दे चुका हूं, नारियल वाला छुट्टा करवाने गया है.’’

यह सुन कर तनु भी हंसे बगैर नहीं रह पाई.

अंबर के जूते मिट्टी से सन गए थे. उस ने पौलिश वाले बच्चे से जूते पौलिश करवाए, तब तक नारियल वाला भी आ चुका था.

‘‘आप ने देशविदेश में कहां की सैर की है,’’ तनु ने पूछा.

अंबर के पास जवाबहाजिर था, ‘‘यह पूछिए कहां नहीं गया, नौकरी ही ऐसी है पूरा एशिया और यूरोप का कुछ हिस्सा मेरे पास है… आनाजाना लगा ही रहता है…’’

‘‘क्या फर्क लगता है आप को अपने देश और परदेश में?’’

‘‘इस का क्या जवाब दूं, सभी जानते हैं, हम हिंदुस्तानी कानून तोड़ने में विश्वास करते हैं, नियम न मानना हमारे लिए फख्र की बात है… वहां के तो जानवर भी कायदेकानून की हद से बाहर नहीं जाते.’’

‘‘फिर क्या होगा अपने देश का?’’

‘‘फिलहाल तो यह सोचिए हमारा क्या होगा, आसमान पर बादल छा रहे हैं और मेरे 10 गिनने तक बरसात हमें अपने आगोश में ले लेगी.’’

‘घर तो जाना जरूरी है. मेरी दूसरी शिफ्ट भी है,’ तनु मन ही मन बुदबुदाई और फिर ऊंची आवाज में बोली, ‘‘चलते हैं और अगर भीग भी गए तो मुझे फर्क नहीं पड़ता, मुझे बरसात में भीगना पसंद है.’’

‘‘मुझे भी,’’ अंबर ने मोटरसाइकिल स्टार्ट करते हुए कहा, ‘‘मगर यों भीगने से पहले थोड़ा इंतजार करना अच्छा नहीं रहेगा? चलिए रेस्तरां में 1-1 कप कौफी हो जाए, यह मेरा रोज का सिलसिला है…’’

तनु ने मुसकरा कर हामी भर दी. अगले चंद ही मिनटों में दोनों रेस्तरां में थे. अंबर ने ऊंची आवाज में वेटर को आवाज दी और जल्दी से 2 कप कौफी लाने का और्डर दिया. कौफी खत्म कर के अंबर ने एक बड़ा नोट बतौर टिप वेटर को दिया और दोनों बाहर आ गए. बारिश रुकने के बजाय और तेज हो चुकी थी.

पूरे रास्ते तेज बरसात में भीगते हुए तनु को बहुत आनंद आ रहा था. घर पहुंचतेपहुंचते दोनों पूरी तरह भीग चुके थे. अंबर के मातापिता मानो उन का इंतजार ही कर रहे थे, उन के आते ही औपचारिक बातचीत कर के सभी वहां से चल पड़े.

‘‘कैसा लगा लड़का?’’ भाभी ने उतावलेपन से पूछा तो तनु ने भी स्पष्ट कर दिया, ‘‘भाभी दूसरे लड़के को मना ही कर दो, कह दो मेरी तबीयत ठीक नहीं है. मुझे अंबर पसंद है…’’

‘‘तनु, अब अगर वे आ ही रहे हैं तो आने दो. कुछ समय गुजार कर उन्हें रुखसत कर देना… कम से कम हमारी बात रह जाएगी.’’

‘‘लेकिन भाभी जब मुझे अंबर पसंद है, तो इस स्वयंवर की क्या जरूरत है?’’

ठीक 4 बजे एक लंबीचौड़ी गाड़ी आ कर रुकी. गाड़ी में से एक संभ्रांत उम्रदराज जोड़ा और एक नवयुवक उतरा. पूरे परिवार ने बड़े ही सम्मान से उन का स्वागत किया.

तनु ने एक नजर लड़के पर डाली और उस के मुंह से अनायास ही निकल गया, ‘‘आप सूटबूट में तो ऐसे आए हैं मानो किसी इंटरव्यू में आए हो.’’

जयनाथजी ने इशारे से तनु को हद में रहने को कहा.

जवाब में युवक ने एक ठहाका लगाया और फिर बिना झिझके  कहा, ‘‘आप सही कह रही हैं. एक तरह से मैं एक इंटरव्यू से दूसरे इंटरव्यू में आया हूं… दरअसल, हम यहां के कामा होटल को खरीदने का मन बना रहे हैं. अभी उन के निदेशकों से मीटिंग थी, जो किसी इंटरव्यू से कम नहीं थी और यह भी किसी इंटरव्यू से कम नहीं है…’’

तनु इधरउधर की औपचारिक बातें करने के बाद मुद्दे पर आ गई. बोली, ‘‘अगर आप लोग इजाजत दें तो मैं और आकाश थोड़ा समय घर से बाहर…’’

‘‘हां जरूर,’’ लगभग सब ने एकसाथ ही कहा.

आकाश ने ड्राइवर से चाबी ली और तनु के लिए गाड़ी का दरवाजा खोल कर बैठने का आग्रह किया. तनु की फरमाइश पर गाड़ी ने एक बार फिर गेटवे औफ इंडिया का रुख किया.

‘‘यहां से एक शौर्टकट है. आप चाहें तो मुड़ सकते हैं 15-20 मिनट बच जाएंगे.’’

‘‘तनुजी आप भूल रही हैं कि इधर नो ऐंट्री है,’’ आकाश ने कहा. फिर मानो उसे कुछ याद आया, ‘‘अगर आप बुरा न मानें तो मैं रास्ते में सिर्फ 10 मिनट के लिए होटल कामा में रुक जाऊं… वहां के निर्देशकों का मैसेज आया है. वे मुझ से मिलना चाहते हैं.’’

तनु ने अनमने मन से हां कर दी. आकाश ने तनु को कौफी शौप में बैठ कर वेटर को आवाज दे कर कौफी और चिप्स का और्डर दिया और स्वयं पुन: माफी मांग कर बोर्डरूम की तरफ चला गया.

10 मिनट के बाद जब आकाश आया तो उस के चेहरे पर खुशी और विजय के भाव थे, ‘‘मेरा पहला इंटरव्यू कामयाब हुआ. यहां की डील फाइनल हो गई है… तनुजी आप हमारे लिए शुभ साबित हुईं…’’

आकाश ने वेटर को बिल लाने को कहा तो मैनेजर ने बिल लाने से इनकार कर दिया, ‘‘यह हमारी तरफ से.’’

‘‘नहीं मैनेजर साहब, अभी हम इस होटल के मालिक नहीं बने हैं और बन भी जाएं तो भी मैं नहीं चाहूंगा कि हमें या किसी और को कुछ भी मुफ्त में दिया जाए. मेरा मानना है कि मुफ्त में सिर्फ खैरात बांटी जाती है और खैरात इंसान की अगली नस्ल तक को बरबाद करने के लिए काफी होती है.’’

होटल के बाहर निकल कर आकाश ने तनु की ओर नजर डाली और कहा,

‘‘बहुत दिनों से लोकल में सफर करने की इच्छा थी, आज छुट्टी का दिन है भीड़भाड़ भी कम होगी. क्यों न हम यहां से लोकल ट्रेन में चलें फिर वहां से टैक्सी.’’

तनु ने अविश्वास से आकाश की ओर देखा और फिर दोनों स्टेशन की तरफ चल पड़े.

‘‘आप तो अकसर विदेश जाते रहते होंगे. क्या फर्क लगता है हमारे देश में और विदेशों में?’’

‘‘सच कहूं तो लंदन स्कूल औफ इकौनोमिक्स से डिगरी लेने के बाद मैं विदेश बहुत कम गया हूं. आजकल के जमाने में इंटरनैट पर सबकुछ मिल जाता है और जहां तक घूमने की बात है यूरोप की छोटीमोटी भुतहा इमारतें जिन्हें वे कैशल कहते हैं और किले मुझे ज्यादा भव्य लगते हैं… स्विटजरलैंड से कहीं अच्छा हमारा कश्मीर है, सिक्किम है, अरुणाचल है, बस जरूरत है सफाई की, सुविधाओं की और ईमानदारी की…’’

‘‘जो हमारे यहां नहीं है… है न?’’ तनु ने प्रश्न किया.

‘‘आप इनकार नहीं कर सकतीं कि बदलाव आया है और अच्छी रफ्तार से आया है. जागरूकता बढ़ी है, देश की प्रतिष्ठा बढ़ी है, हमारे पासपोर्ट की इज्जत होनी शुरू हो गई है. आज का भारत कल के भारत से कहीं अच्छा है और कल का भारत आज के भारत से लाख गुना अच्छा होगा.’’

‘‘आप तो नेताओं जैसी बातें करने लगे आकाशजी,’’ तनु को उस की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी.

गेटवे के किनारे तनु ने फिर नारियल पानी पीने की इच्छा जाहिर कर दी. दोनों ने नारियल पानी पीया.

सही कहा गया है कि इंसान के हालात का और मुंबई की बरसात का कोई भरोसा नहीं. एक बार फिर बादलों ने पूरे माहौल को अपने आगोश में ले कर लिया और चारों ओर रात जैसा अंधेरा छा गया. अगले ही पल मोटीमोटी बूंदों ने दोनों को भिगोना शुरू कर दिया. दोनों भाग कर पास की एक छप्परनुमा दुकान में घुस कर गरमगरम भुट्टे खाने लगे.

आकाश ने जेब से पैसे निकाले और भुट्टे वाली बुजुर्ग महिला के हाथ में थमा दिए. उस की नजर उमड़ते बादलों पर ही थी. प्रश्नवाचक दृष्टि से उस ने तनु की ओर देखा और दोनों बाहर निकल गए. टैक्सी लेने की तमाम कोशिशें नाकामयाब होने के बाद दोनों स्टेशन की ओर पैदल ही निकल पड़े. रास्ते में आकाश ने ड्राइवर को फोन कर के कामा होटल से गाड़ी ले कर स्टेशन आने को कह दिया.

घर पहुंचतेपहुंचते रात हो चुकी थी. आकाश और उस के परिवार वालों ने इजाजत

मांगी. उन के जाते ही जयनाथजी कुछ कहने के लिए मानो तैयार ही थे, ‘‘कितने पैसे वाले लोग हैं, मगर कोई मिजाज नहीं, कोई घमंड नहीं, हम जैसे मध्यवर्ग वालों की लड़की लेना चाहते हैं. कोई दहेज की मांग नहीं, यहां तक कि…’’

‘‘तो मुझे क्या करना चाहिए अंबर कि बजाय आकाश को पसंद कर लेना चाहिए, क्योंकि आकाश करोड़पति है, उस के मातापिता घमंडी नहीं हैं. वे धरातल से जुड़े हैं और सब से बड़ी बात कि उन्हें हम, हमारा परिवार, हमारी सादगी पसंद है. अपनी पसंद मैं भाभी को सुबह ही बता चुकी हूं, आकाश से मिलने के बाद उस में कोई तबदीली नहीं आई है…’’

‘‘ठीक है इस बारे में हम बाकी बातें कल करेंगे…’’ जयनाथजी ने लगभग पीछा छुड़ाते हुए कहा.

रात के करीब 2 बजे तनु ने भाभी को फोन मिलाया, ‘‘भाभी मुझे आप से मिलना है. भैया तो बाहर गए हैं. जाहिर है आप भी जग रही होंगी, मुझे अंबर के बारे में कुछ बातें करनी हैं, मैं आ जाऊं?’’

‘‘तनु मैं गहरी नींद में हूं… हम सुबह मिलें?’’

‘‘मैं तो आप के दरवाजे पर ही हूं… गेट खोलेंगी या खिड़की से आना पड़ेगा?’’

अगले ही पल तनु अंदर थी. बातों का सिलसिला शुरू करते हुए भाभी ने तनु से पूछा, ‘‘तुम मुझे अपना फैसला सुना चुकी हो. अब इतनी रात मेरी नींद क्यों खराब कर रही हो?’’

‘‘भाभी, अंबर को फोन कर के कहना है कि मैं उस से शादी नहीं कर सकती.’’

‘‘क्या?’’ भाभी को लगा कि वह अभी भी नींद में ही है.

पलक झपकते ही तनु ने अंबर को फोन लगा दिया, ‘‘हैलो अंबर मैं तनु बोल रही हूं… मैं इधरउधर की बात करने के बजाय सीधा मुद्दे पर आना चाहती हूं…’’

‘‘ठीक है… जल्दी बता दो मैं इधर हूं या उधर…’’

‘‘इधरउधर की छोड़ो और सुनो सौरी यार मैं तुम से शादी नहीं कर सकती…’’

‘‘ठीक है मगर इतनी रात को क्यों बता रही हो… सुबह तक…’’

‘‘सुबह तक मेरा दिमाग बदल गया तो? तुम चीज ही ऐसी हो कि तुम्हें मना करना बहुत मुश्किल है…’’

‘‘अच्छा औल द बैस्ट, अब सो जाओ और मुझे भी सोने दो, किसी उधर वाले से शादी तय हो जाए तो जगह, तारीख वगैरह बता देना मैं आ जाऊंगा, मुफ्त का खा कर चला जाऊंगा…’’

‘‘मुफ्ती साहब, गिफ्ट लाना पड़ेगा. शादी में खाली लिफाफे देने का रिवाज दिल्ली में होगा, मुंबई में नहीं…’’

‘‘ठीक है 2-4 फूल ले आऊंगा. अब मुझे सोने दो… सुबह मेरी फ्लाइट है…’’

भाभी बिलकुल सकते में थी, ‘‘ये सब क्या है तनु? तुम तो अंबर पर फिदा हो गई थी… क्या आकाश का पैसा तुम्हें आकर्षित कर गया? क्या उस की बड़ी गाड़ी अंबर की मोटरसाइकिल से आगे निकल गई?’’

‘‘भाभी अंबर पर फिदा होना स्वाभाविक है. ऐसे लड़के के साथ घूमनाफिरना,

मजे करना, अच्छा लगेगा मगर शादी एक ऐसा बंधन है, जिस में एक गंभीर, संजीदा इंसान चाहिए न कि कालेज से निकला हुआ एक हीरोनुमा लड़का.

‘‘हम घर से बाहर निकले तो आकाश ने पूरे शिद्दत से ट्रैफिक के सारे नियमों का पालन किया, मेरे लाख कहने के बावजूद उस ने गाड़ी नो ऐंट्री में नहीं घुमाई, अपने देश के बारे में उस के विचार सकारात्मक थे. उसे देश से कोई शिकायत न थी, रेस्तरां में वेटर से इज्जत से बात की न कि उसे वेटर कह कर आवाज दी, मुफ्त का खाने के बजाय उस ने पैसे देने में अपनी खुद्दारी समझ.

‘‘बड़ी गाड़ी छोड़ कर लोकल ट्रेन में जाने में उसे कोई परहेज नहीं, नारियल पानी पी कर उस ने नारियल एक ओर उछाला नहीं, बल्कि डस्टबिन की तलाश की, भुट्टे वाली माई को उस ने जब मुट्ठीभर पैसे दिए तो उस का सारा ध्यान इस पर था कि मैं कहीं देख न लूं.

‘‘इतने पैसे उस भुट्टे वाली ने एकसाथ कभी नहीं देखे होंगे… इतने संवेदनशील व्यक्तित्व के मालिक के सामने मैं एक प्यारे से हीरो को चुन कर जीवनसाथी बनाऊं? इतनी बेवकूफ मैं लगती जरूर हूं, मगर हूं नहीं.’’

भाभी सिर पर हाथ रख कर बैठ गई.

‘‘क्या सर दर्द हो रहा है.’’

‘‘नहीं बस चक्कर से आ रहे हैं…’’

‘‘रुको, अभी सिरदर्द दूर हो जाएगा…’’ तनु ने कहा.

भाभी बोल पड़ी, ‘‘अब क्या बाकी है?’’

तनु ने फोन उठाया और एक नंबर मिलाया, ‘‘हैलो आकाश, मैं ने फैसला कर लिया है… मुझे आप पसंद हैं. मैं आप से शादी करने को तैयार हूं. मुझे पूरा यकीन है कि मैं भी आप को पसंद हूं.’’

‘‘तुम ने फैसला ले कर मुझे बताने का जो समय चुना वह वाकई काबिलेतारीफ है,’’ दूसरी ओर से आवाज आई.

‘‘हूं… मगर भाभी इस बात को मानती ही नहीं… देखो मुझे धक्के मार कर अपने कमरे से बाहर निकालने पर उतारू है…’’

‘‘आकाश ने जेब से पैसे निकाले और भुट्टे वाली बुजुर्ग महिला के हाथ में थमा दिए.

उस की नजर उमड़ते बादलों पर ही थी. प्रश्नवाचक दृष्टि से उस ने

तनु की ओर देखा और दोनों बाहर निकल गए…’’

Writer- Rajesh Kumar Ranga

Mother’s Day 2025: मां

Mother’s Day 2023: बहुत दिनों बाद अचानक माधुरी का आना मीना को सुखद लगा था. दोचार दिन तो यों ही गपशप में निकल गए थे. माधुरी दीदी यहां अपने किसी संबंधी के यहां विवाह समारोह में शामिल होने आई थीं.

‘‘और सुना…सब ठीकठाक तो चल रहा है न,’’ माधुरी ने कहा, ‘‘अब तो दोनों बेटियों का ब्याह कर के तुम लोग भी फ्री हो गए हो. खूब घूमोफिरो…अब क्यों घर में बंधे हुए हो.’’

‘‘दीदी, अब आप से क्या छिपाना,’’ मीना कुछ गंभीर हो कर कहने लगी, ‘‘आप तो जानती ही हैं कि दोनों बेटियों की शादी में काफी खर्च हुआ है. अब दीपक रिटायर भी हो गए हैं. सीमित पेंशन मिलती है. किसी तरह खर्च चल रहा है, बस. कोई आकस्मिक खर्चा आ जाता है तो उस के लिए भी सोचना पड़ता है…’’

माधुरी बीच में ही टोक कर बोलीं, ‘‘देख…मीना, तू अपनेआप को थोड़ा बदल, बेटियों के कमरे खाली पड़े हैं, उन्हें किराए पर दे. इस शहर में बच्चों की कोचिंग का अच्छा माहौल है. तुम्हारे घर के बिलकुल पास कोचिंग क्लासें चल रही हैं. बच्चे फौरन किराए पर कमरा ले लेंगे. उन से अच्छा किराया तो मिलेगा ही घर की सुरक्षा भी बनी रहेगी.’’

माधुरी की बात मीना को भी ठीक लगने लगी थी. उसे खुद आश्चर्य हुआ कि अब तक इस तरह उस ने सोचा क्यों नहीं. ठीक है, दीपक घर को किराए पर देने के पक्ष में नहीं हैं पर 2 कमरे बच्चों को देने में क्या हर्ज है. बाथरूम तो अलग है ही.

माधुरी दीदी के जाते ही पति से बात कर के मीना ने अखबार में विज्ञापन दे दिया.

‘‘देखो मीना, मैं तुम्हारे कार्यक्षेत्र में दखल नहीं दूंगा,’’ दीपक बोले, ‘‘पर निर्णय तुम्हारा ही है सो सोचसमझ कर लेना. क्या किराया होगा, किसे देना है, सारा सिरदर्द तुम्हारा ही होगा, समझीं.’’

‘‘हां बाबा, सब समझ गई हूं, किराए पर भी मेरा ही अधिकार होगा, जैसा चाहूं खर्च करूंगी.’’

दीपक तब हंस कर रह गए थे.विज्ञापन छपने के कुछ ही दिन बाद  दोनों कमरे किराए पर उठ गए थे. निखिल और सुबोध दोनों बच्चे मीना को संभ्रांत परिवार के लगे थे. किराया भी ठीकठाक मिल गया था.

मीना खुश थी. किराएदार के रूप में बच्चों के आने से उस का अकेलापन थोड़ा कम हो गया था. दीपक ने तो अपने मन लगाने के लिए एक संस्था ज्वाइन कर ली थी. पर वह घर में अकेली बोर हो जाती थी. दोनों बेटियों के जाने के बाद तो अकेलापन वैसे भी अधिक खलने लगा था.

शीना का उस दिन फोन आया तो कह रही थी, ‘‘मां, आप ने ठीक किया जो कमरे किराए पर दे दिए. अब आप और पापा कुछ दिनों के लिए चेन्नई घूमने आ जाएं, काफी सालों से आप लोग कहीं घूमने भी नहीं गए.’’

‘‘हां, अब घूमने का प्रोग्राम बनाएंगे उधर का. रीना भी जिद कर रही है बंगलोर आने की,’’ मीना का स्वर उत्साह से भरा था.

फोन सुनने के बाद मीना बाहर लौन में आ कर गमले ठीक करते हुए सोचने लगी कि दीपक से बात करेगी कि बेटियां इतनी जिद कर रही हैं तो चलो, उन के पास घूम आएं.

तभी बाहर का फाटक खोल कर एक दुबलापतला, कुछ ठिगने कद का लड़का अंदर आया था.

‘‘कहो, क्या काम है? किस से मिलना है?’’

‘‘जी, आंटी, मैं राघव हूं. यहां जगदीश कोचिंग में एडमिशन लिया है. मुझे कमरा चाहिए था.’’

‘‘देखो बेटे, यहां तो कोई कमरा खाली नहीं है. 2 कमरे थे जो अब किराए पर चढ़ चुके हैं,’’ मीना ने गमलों में पानी डालते हुए वहीं से जवाब दे दिया.

वह लड़का थोड़ी देर खड़ा रहा था पर मीना अंदर चली गईं. दूसरे दिन दीपक के बाजार जाने के बाद यों ही मीना अखबार ले कर बाहर लौन में आई तो फिर वही लड़का दिखा था.

‘‘हां, कहो? अब क्या बात है?’’

‘‘आंटी, मैं इतने बड़े मकान में कहीं भी रह लूंगा. अभी तो मेरा सामान भी रेलवे स्टेशन पर ही पड़ा है…’’ उस के स्वर में अनुनय का भाव था.

‘‘कहा न, कोई कमरा खाली नहीं है.’’

‘‘पर यह,’’ कह कर उस ने छोटे से गैराज की तरफ इशारा किया था.

मीना का ध्यान भी अब उधर गया. मकान में यह हिस्सा कार के लिए रखा था. कार तो आ नहीं पाई. हां, पर शीना की शादी के समय इस में एक मामूली सा दरवाजा लगा कर कमरे का रूप दे दिया था. हलवाई और नौकरों के लिए पीछे एक कामचलाऊ टायलेट भी बना था. अब यह हिस्सा घर के फालतू सामान के लिए था.

‘‘इस में रह लोगे…पढ़ाई हो जाएगी?’’ मीना ने आश्चर्य से पूछा था.

‘‘हां, क्यों नहीं, लाइट तो होगी न…’’

वह लड़का अब अंदर आ गया था. गैराज देख कर वह उत्साहित था. कहने लगा, ‘‘यह मेज और कुरसी तो मेरे काम आ जाएगी और ये तख्त भी….’’

मीना समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे.

लड़के ने जेब से कुछ नोट निकाले और कहने लगा, ‘‘आंटी, यह 500 रुपए तो आप रख लीजिए. मैं 800 रुपए से ज्यादा किराया आप को नहीं दे पाऊंगा. बाकी 300 रुपए मैं एकदो दिन में दे दूंगा. अब सामान ले आऊं?’’

500 रुपए हाथ में ले कर मीना अचंभित थी. चलो, एक किराएदार और सही. बाद में इस हिस्से को भी ठीक करा देगी तो इस का भी अच्छा किराया मिल जाएगा.

घंटे भर बाद ही वह एक रिकशे पर अपना सामान ले आया था. मीना ने देखा एक टिन का बक्सा, एक बड़ा सा पुराना बैग और एक पुरानी चादर की गठरी में कुछ सामान बंधा हुआ दिख रहा था.

‘‘ठीक है, सामान रख दो. अभी नौकरानी आती होगी तो मैं सफाई करवा दूंगी.’’

‘‘आंटी, झाड़ू दे दीजिए. मैं खुद ही साफ कर लूंगा.’’

खैर, नौकरानी के आने के बाद थोड़ा फालतू सामान मीना ने बाहर निकलवा लिया और ढंग की मेजकुरसी उसे पढ़ाई के लिए दे दी. राघव ने भी अपना सामान जमा लिया था.

शाम को जब मीना ने दीपक से जिक्र किया तो उन्होंने हंस कर कहा था, ‘‘देखो, अधिक लालच मत करना. वैसे यह तुम्हारा क्षेत्र है तो मैं कुछ नहीं बोलूंगा.’’

मीना को यह लड़का निखिल और सुबोध से काफी अलग लगा था. रहता भी दोनों से अलगथलग ही था जबकि तीनों एक ही क्लास में पढ़ते थे.

उस दिन शाम को बिजली चली गई तो मीना बाहर बरामदे में आ गई थी. निखिल और सुबोध बैडमिंटन खेल रहे थे. अंधेरे की वजह से राघव भी बाहर आ गया था पर दोनों ने उसे अनदेखा कर दिया. वह दूर कोने में चुपचाप खड़ा था. फिर मीना ने ही आवाज दे कर उसे पास बुलाया.

‘‘तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? मन तो लग गया न?’’

‘‘मन तो आंटी लगाना ही है. मां ने इतनी जिद कर के पढ़ने भेजा है, खर्चा किया है…’’

‘‘अच्छा, और कौनकौन हैं घर में?’’

‘‘बस, मां ही हैं. पिताजी तो बचपन में ही नहीं रहे. मां ने ही सिलाईबुनाई कर के पढ़ाया. मैं तो चाह रहा था कि वहीं आगे की पढ़ाई कर लूं पर मां को पता नहीं किस ने इस शहर की आईआईटी क्लास की जानकारी दे दी थी और कह दिया कि तुम्हारा बेटा पढ़ने में होशियार है, उसे भेज दो. बस, मां को जिद सवार हो गई,’’ मां की याद में उस का स्वर भर्रा गया था.

‘‘अच्छा, चलो, अब मां का सपना पूरा करो,’’ मीना के मुंह से भी निकल ही गया था. सुबोध और निखिल भी थोड़े अचंभित थे कि वह राघव से क्या बात कर रही है.

एक दिन नौकरानी ने आ कर कहा, ‘‘दीदी, देखो न गैराज से धुआं सा निकल रहा है.’’

‘‘धुआं…’’ मीना घबरा गई और रसोई में गैस बंद कर के वह बाहर आई. हां, धुआं तो है पर राघव क्या अंदर नहीं है.

मीना ने जा कर देखा तो वह एक स्टोव पर कुछ बना रहा था. कैरोसिन का बत्ती वाला स्टोव धुआं कर रहा था.

‘‘यह क्या कर रहे हो?’’

चौंक कर मीना को देखते हुए राघव बोला, ‘‘आंटी, खाना बना रहा हूं.’’

‘‘यहां तो सभी बच्चे टिफिन मंगाते हैं. तुम खाना बना रहे हो तो फिर पढ़ाई कब करोगे.’’

‘‘आंटी, अभी मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं. टिफिन महंगा पड़ता है तो सोचा कि एक समय खाना बना लूंगा. शाम को भी वही खा लूंगा. यह स्टोव भी अभी ले कर आया हूं,’’ राघव धीमे स्वर में बोला.

राघव की यह मजबूरी मीना को झकझोर गई.

‘‘देखो, तुम्हारी मां जब रुपए भेज दे तब किराया दे देना. अभी ये रुपए रखो और कल से टिफिन सिस्टम शुरू कर दो. समझे…’’

मीना ने राघव के रुपए ला कर उसे वापस कर दिए.

राघव डबडबाई आंखों से मीना को देखता रह गया.

बाद में मीना ने सोचा कि पता नहीं क्यों मांबाप पढ़ाई की होड़ में बच्चों को इतनी दूर भेज देते हैं. इस शहर में इतने बच्चे आईआईटी की पढ़ाई के लिए आ कर रह रहे हैं. गरीब मातापिता भी अपना पेट काट कर उन्हें पैसा भेजते हैं. अब राघव पता नहीं पढ़ने में कैसा हो पर गरीब मां खर्च तो कर ही रही है.

महीने भर बाद मीना की मुलाकात गीता से हो गई. गीता उस की बड़ी बेटी शीना की सहेली थी और आजकल जगदीश कोचिंग में पढ़ा रही थी. कभी- कभार शीना का हालचाल जानने घर आ जाती थी.

‘‘तेरी क्लास में राघव नाम का भी कोई लड़का है क्या? कैसा है पढ़ाई में? टेस्ट में क्या रैंक आ रही है?’’ मीना ने पूछ ही लिया.

‘‘कौन? राघव प्रकाश… वह जो बिहार से आया है. हां, आंटी, पढ़ाई में तो तेज लगता है. वैसे तो केमेस्ट्री की कक्षा ले रही हूं पर जगदीशजी उस की तारीफ कर रहे थे कि अंकगणित में बहुत तेज है. गरीब सा बच्चा है…’’

मीना चुप हो गई थी. ठीक है, पढ़ने में अच्छा ही होगा.

कुछ दिनों बाद राघव किराए के रुपए ले कर आया तो मीना ने पूछा, ‘‘तुम्हारे टिफिन का इंतजाम तो है न?’’

‘‘हां, आंटी, पास वाले ढाबे से मंगा लेता हूं.’’

‘‘चलो, सस्ता ही सही. खाना तो ठीक मिल जाता होगा?’’ फिर मीना ने निखिल और सुबोध को बुला कर कहा था, ‘‘यह राघव भी यहां पढ़ने आया है. तुम लोग इस से भी दोस्ती करो. पढ़ाई में भी अच्छा है. शाम को खेलो तो इसे भी अपनी कंपनी दो.’’

‘‘ठीक है, आंटी…’’ सुबोध ने कुछ अनमने मन से कहा था.

इस के 2 दिन बाद ही निखिल हंसता हुआ आया और कहने लगा, ‘‘आंटी, आप तो रघु की तारीफ कर रही थीं…पता है इस बार उस के टेस्ट में बहुत कम नंबर आए हैं. जगदीश सर ने उसे सब के सामने डांटा है.’’

‘‘अच्छा,’’ कह कर मीना खामोश हो गई तो निखिल चला गया. उस के बाद वह उठ कर राघव के कमरे की ओर चल दी. जा कर देखा तो राघव की अांखें लाल थीं. वह काफी देर से रो रहा था.

‘‘क्या हुआ…क्या बात हुई?’’

‘‘आंटी, मैं अब पढ़ नहीं पाऊंगा. मैं ने गलती की जो यहां आ गया. आज सर ने मुझे बुरी तरह से डांटा है.’’

‘‘पर तुम्हारे तो नंबर अच्छे आ रहे थे?’’

‘‘आंटी, पहले मैं आगे बैठता था तो सब समझ में आ जाता था. अब कुछ लड़कों ने शिकायत कर दी तो सर ने मुझे पीछे बिठा दिया. वहां से मुझे कुछ दिखता ही नहीं है, न कुछ समझ में आ पाता है. मैं क्या करूं?’’

‘‘दिखता नहीं है, क्या आंखें कमजोर हैं?’’

‘‘पता नहीं, आंटी.’’

‘‘पता नहीं है तो डाक्टर को दिखाओ.’’

‘‘आंटी, पैसे कहां हैं…मां जो पैसे भेजती हैं उन से मुश्किल से खाने व पढ़ाई का काम चल पाता है. मैं तो अब लौट जाऊंगा…’’ कह कर वह फिर रो पड़ा था.

‘‘चलो, मेरे साथ,’’ मीना उठ खड़ी हुई थी. रिकशे में उसे ले कर पास के आंखों के एक डाक्टर के यहां पहुंच गई और आंखें चैक करवाईं तो पता चला कि उसे तो मायोपिया है.

‘‘चश्मा तो इसे बहुत पहले ही लेना था. इतना नंबर तो नहीं बढ़ता.’’

‘‘ठीक है डाक्टर साहब, अब आप इस का चश्मा बनवा दें….’’

घर आ कर मीना ने राघव से कहा था, ‘‘कल ही जा कर अपना चश्मा ले आना, समझे. और ये रुपए रखो. दूसरी बात यह कि इतना दबदब कर मत रहो कि दूसरे बच्चे तुम्हारी झूठी शिकायत करें, समझे…’’

राघव कुछ बोल नहीं पा रहा था. झुक कर उस ने मीना के पैर छूने चाहे तो वह पीछे हट गई थी.

‘‘जाओ, मन लगा कर पढ़ो. अब नंबर कम नहीं आने चाहिए…’’

अब कोचिंग क्लासेस भी खत्म होने को थीं. बच्चे अपनेअपने शहर जा कर परीक्षा देंगे. यही तय था. राघव भी अब अपने घर जाने की तैयारी में था. निखिल और सुबोध से भी उस की दोस्ती हो गई थी.

सुबोध ने ही आ कर कहा कि  आंटी, राघव की तबीयत खराब हो रही है.

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘पता नहीं, हम ने 2-2 रजाइयां ओढ़ा दीं फिर भी थरथर कांप रहा है.’’

मीना ने आ कर देखा.

‘‘अरे, लगता है तुम्हें मलेरिया हो गया है. दवाई ली थी?’’

‘‘जी, आंटी, डिस्पेंसरी से लाया तो था और कल तक तो तबीयत ठीक हो गई थी, पर अचानक फिर खराब हो गई. पता नहीं घर भी जा पाऊंगा या नहीं. परीक्षा भी अगले हफ्ते है. दे भी पाऊंगा या नहीं…’’

कंपकंपाते स्वर में राघव बड़बड़ा रहा था. मीना ने फोन कर के डाक्टर को वहीं बुला लिया फिर निखिल को भेज कर बाजार से दवा मंगवाई.

दूध और खिचड़ी देने के बाद दवा दी और बोली, ‘‘तुम अब आराम करो. बिलकुल ठीक हो जाओगे. परीक्षा भी दोगे, समझे.’’

काफी देर राघव के पास बैठ कर वह उसे समझाती रही थी. मीना खुद समझ नहीं पाई थी कि इस लड़के के साथ ऐसी ममता सी क्यों हो गई है उसे.

दूसरे दिन राघव का बुखार उतर गया था. 2 दिन मीना ने उसे और रोक लिया था कि कमजोरी पूरी दूर हो जाए.

जाते समय जब राघव पैर छूने आया तब भी मीना ने यही कहा था कि खूब मन लगा कर पढ़ना.

बच्चों के जाने के बाद कमरे सूने तो हो गए थे पर मीना अब संतुष्ट थी कि 2 महीने बाद फिर दूसरे बच्चे आ जाएंगे. घर फिर आबाद हो जाएगा. गैराज वाले कमरे को भी अब और ठीक करवा लेगी.

आईआईटी का परिणाम आया तो पता चला कि राघव की फर्स्ट डिवीजन आई है. निखिल और सुबोध रह गए थे.

राघव का पत्र भी आया था. उसे कानपुर आईआईटी में प्रवेश मिल गया था. स्कालरशिप भी मिल गई थी.

‘ऐसे ही मन लगा कर पढ़ते रहना,’ मीना ने भी दो लाइन का उत्तर भेज दिया था. दीवाली पर कभीकभार राघव के कार्ड आ जाते. अब तो दूसरे बच्चे कमरों में आ गए थे. मीना भी पुरानी बातों को भूल सी गई थी. बस, गैराज को देख कर कभीकभार उन्हें राघव की याद आ जाती. समय गुजरता रहा था.

दरवाजे पर उस दिन सुबहसुबह ही घंटी बजी थी.

‘‘आंटी, मैं हूं राघव. पहचाना नहीं आप ने?’’

‘‘राघव…’’ आश्चर्य भरे स्वर के साथ मीना ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा था. दुबलापतला शरीर थोड़ा भर गया था. आंखों पर चश्मा तो था पर चेहरे पर दमक बढ़ गई थी.

‘‘आओ, बेटा, कैसे हो… आज कैसे अचानक याद आ गई हम लोगों की.’’

‘‘आंटी, आप की याद तो हरदम आती रहती है. आप नहीं होतीं तो शायद मैं यहां तक पहुंच ही नहीं पाता. मेरा कोर्स पूरा हो गया है और आप ने कहा कि मन लगा कर पढ़ना तो फाइनल में भी अच्छी डिवीजन आई है. कैंपस इंटरव्यू में चयन हो कर नौकरी भी मिल गई है.’’

‘‘अच्छा, इतनी सारी खुशखबरी एकसाथ,’’ कह कर मीना हंसी थी.

‘‘हां, आंटी, पर मेरी एक इच्छा है कि जब मुझे डिगरी मिले तो आप और अंकल भी वहां हों, आप लोगों से यही प्रार्थना करने के लिए मैं यहां खुद आया हूं.’’

‘‘पर, बेटा…’’ मीना इतना बोलते- बोलते अचकचा गई थी.

‘‘नहीं, आंटी, ना मत कहिए. मैं तो आप के लिए टिकट भी बुक करा रहा हूं. आज आप लोगों की वजह से ही तो इस लायक हो पाया हूं. मैं जानता हूं कि जबजब मैं लड़खड़ाया आप ने ही मुझे संभाला. एक मां थीं जिन्होंने जिद कर के मुझे इस शहर में भेजा और फिर आप हैं. मां तो आज यह दिन देखने को रही नहीं पर आप तो हैं…आप मेरी मां…’’

राघव का भावुक स्वर सुन कर मीना भी पिघल गई थी. शब्द भी कंठ में आ कर फंस गए थे.

शायद ‘मां’ शब्द की सार्थकता का बोध यह बेटा उन्हें करा रहा था. Mother’s Day 2023.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें