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Hindi Kahani : फेसबुक – क्या राशी और श्वेता भी हो गई धोखाधड़ी का शिकार ?

Hindi Kahani : कालेज में फ्री पीरियड में जैसे ही श्वेता ने अपनी सहेली अमिता और राशी को अपने बौयफ्रैंड रोहन के बारे में बताया तो राशी हैरान होते हुए बोली, ‘‘तू बड़ी छिपीरुस्तम निकली, पिछले 6 महीने से तुम दोनों का चक्कर चल रहा है और हमें तू आज बता रही है.’’

‘‘तो तुम ने कौन सा अपने जयपुर वाले बिजनैसमैन बौयफ्रैंड संचित से हमें अभी तक मिलवाया है,’’ श्वेता ने पलट कर जवाब दिया.

‘‘प्लीज, दोनों लड़ो मत. चलो, कैंटीन चलते हैं, बाकी बातें वहीं कर लेना,’’ अमिता दोनों को चुप कराते हुए बोली.

तीनों क्लास रूम से उठ कर कैंटीन की तरफ चल दीं.

राशी ने 3 बर्गर और हौट कौफी और्डर करते हुए श्वेता से पूछा, ‘‘चल छोड़, अब यह बता, तुम मिले कहां? रोहन के परिवार में कौनकौन है? हमें उस से कब मिलवा रही है?’’

‘‘क्या एक के बाद एक सवालों की बौछार कर रही है, आराम से एकएक कर के पूछ,’’ अमिता ने राशी को टोका.

‘‘अभी तो मैं ही रोहन से नहीं मिली तो तुम्हें कैसे मिलवाऊं,’’ श्वेता ने मजबूरी जताई.

‘‘तो पिछले 6 महीने से तुम एक बार भी नहीं मिले,’’ राशी ने हैरानी से पूछा.

‘‘तो तुम कौन सा संचित से मिली हो,’’ श्वेता ने उसी लहजे में राशी से पूछा.

‘‘संचित बिजनैस के सिलसिले में अकसर विदेश जाता है, उस ने तो मुझे अपने साथ सिंगापुर चलने के लिए कहा था, पर मैं ने ही मना कर दिया. शादी के बाद उस के साथ दुनिया घूमूंगी,’’ राशी चहकते हुए बोली.

‘‘चलो, चलो, बर्गर खाओ, ठंडा हो रहा है,’’ अमिता ने कहा.

‘‘अच्छा, यह तो बता रोहन दिखता कैसा है, उस का कोई फोटो तो दिखा,’’ राशी श्वेता का मोबाइल उठाते हुए बोली.

‘‘अभी उस की आर्मी की ट्रेनिंग पूरी नहीं हुई है, इसलिए उस ने कोई फोटो नहीं भेजा,’’ श्वेता ने जवाब दिया, ‘‘सुनो, कल उस का बर्थडे है, मैं तुम सब को ट्रीट दूंगी,’’ उस ने आगे कहा.

‘‘क्या तू ने रोहन के लिए कोई गिफ्ट नहीं भेजा,’’ अमिता ने श्वेता से पूछा.

‘‘क्यों नहीं, मैं ने उस की मनपसंद घड़ी कोरियर से एक हफ्ते पहले ही भेज दी थी,’’ श्वेता बोली.

‘‘पिछले महीने तेरे बर्थडे पर रोहन ने क्या दिया,’’ राशी ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘उस ने कहा कि वह ट्रेनिंग खत्म होते ही दिल्ली आएगा और मुझे मनपसंद शौपिंग कराएगा,’’ श्वेता चहकते हुए बोली.

‘‘ग्रेट,’’ राशी ने कहा.

‘‘एक मिनट, मुझे तो तुम दोनों के बौयफ्रैंड्स में कुछ गड़बड़ लग रही है,’’ अमिता परेशान होते हुए बोली.

‘‘तेरा कोई बौयफ्रैंड नहीं है, इसलिए तू हम से जलती है,’’ राशी तुनक कर बोली.

तीनों कैंटीन से आ कर क्लास रूम में बैठ गईं, पर अमिता का मन पढ़ने में नहीं लग रहा था, वह यही सोचती रही कि जिन लड़कों को इन्होंने देखा नहीं, उन से मिली नहीं, उन के सपनों में खो कर अपना कीमती समय बरबाद कर रही हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि इन दोनों को एक ही लड़का बेवकूफ बना रहा हो, लेकिन इन्हें समझाना बहुत मुश्किल है. उस ने मन ही मन एक प्लान बनाया और कालेज की छुट्टी के समय दोनों से बोली, ‘‘सुनो, तुम दोनों संडे को मेरे घर आ जाओ, मैं घर पर अकेली हूं, मम्मीपापा कहीं बाहर जा रहे हैं.’’

राशी और श्वेता दोनों संडे को 11 बजे अमिता के घर पहुंच गईं. अमिता दोनों के लिए गरमागरम मैगी बना कर लाई. इसी बीच अमिता अपना लैपटौप भी उठा लाई और दोनों से बोली, ‘‘चलो, आज रोहन और संचित से चैटिंग करते हैं.’’

यह सुन कर श्वेता ने जल्दी से अपना फेसबुक अकाउंट ओपेन किया और रोहन से चैटिंग करने लगी.

‘‘सुन, तू उसे यह मत बताना कि मेरी सहेलियां भी साथ हैं. उस से उस के कुछ फोटो मंगा,’’ अमिता ने श्वेता को सलाह दी.

‘‘6 महीने में रोहन को पूरा विश्वास हो गया था कि श्वेता उस के जाल में पूरी तरह फंस चुकी है, इसलिए उस ने अपने कुछ फोटो उसे भेज दिए.’’

फोटो देखते ही राशी चौंक उठी और बोली, ‘‘ये तो संचित के फोटो हैं.’’

अमिता उसे शांत करते हुए बोली, ‘‘चौंक मत, संचित और रोहन अलग न हो कर एक ही शख्स है, यह न तो आर्मी में है और न ही बिजनैसमैन. यह तुम दोनों को अपने अलगअलग नामों से बेवकूफ बना रहा है.’’

‘‘यह तू क्या कह रही है, क्या तू इसे जानती है?’’ राशी ने अमिता से पूछा.

उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम ही सोचो, तुम ने अपने बौयफ्रैंड्स को महंगे गिफ्ट भेजे, लेकिन उन्होंने तुम्हें कुछ नहीं दिया, मिलने के मौकों को टाला, यह तो अच्छा है कि तुम दोनों समय रहते बच गईं.’’

‘‘आजकल सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर आएदिन ऐसे किस्से सुनने को मिल रहे हैं. इसलिए इन सब से सावधान रहना चाहिए,’’ उस ने आगे कहा.

‘‘पर मुझे तो रोहन ने अपना एड्रैस दिया था, जिस पर मैं ने गिफ्ट भेजे हैं,’’ श्वेता ने कहा.

‘‘मेरी भोली सहेली, जब तक तुम उस का पता करने उस के एड्रैस पर पहुंचोगी तब तक वह शातिर वहां से भाग चुका होगा, ऐसे लोग बहुत शातिर होते हैं, इसलिए कभी भी वे एक एड्रैस पर लंबे समय तक नहीं ठहरते. बस, अपना उल्लू सीधा किया और नौदो ग्यारह हो गए.’’ अमिता ने कहा.

‘‘कम औन, पहले अपनी ग्रैजुएशन पूरी करो फिर बौयफ्रैंड बनाना,’’ उस ने दोनों को सुझाव दिया.

‘‘तू ठीक कहती है अमिता, तू ने हमें हकीकत से परिचित करवा कर समय रहते बचा लिया, न जाने यह हमें कितना बेवकूफ बनाता,’’ राशी बोली.

‘‘चलो, तुम दोनों किसी अनहोनी से बच गईं अन्यथा ताउम्र उन्हें इस का खमियाजा भुगतना पड़ता. आओ, इसी बात पर पकौड़े बनाते हैं,’’ कह कर अमिता दोनों सहेलियों को ले कर किचन की ओर बढ़ गई.

Hindi Story : प्रोतिमा – गौरी का अपनी मां से ही क्यों उठ गया था विश्वास ?

Hindi Story : श्लोक ध्वनि ने गौरी को बिस्तर से उठने को मजबूर कर दिया. आज थोड़ी देर और सोने वाली थी फिर उसे याद आया कि आज ही तो प्रधान मूर्तिकार आने वाले हैं, मां की प्रतिमा के लिए मिट्टी लेने. आज सोनागाछी की गलीगली में गणिकाएं सुबह से ही केशों से स्नान कर उन की बाट जोहती रहेंगी. कहते हैं, दुर्गा ने अपनी परम भक्त वैश्या को वरदान दिया था कि तुम्हारे हाथ से ली गई गंगा की चिकनी मिट्टी से ही मेरी प्रतिमा बनेगी. दुर्गा ने अपनी भक्त को सामाजिक तिरस्कार से बचाने के लिए ही ऐसा किया. तब से ही सोनागाछी की मिट्टी से देवी की प्रतिमा बनाने की शुरुआत हुई, ऐसा प्रचलित है.

‘सच में, मां दुर्गा ने कितनी खुशी दी हम गणिकाओं को,’ गौरी का मन खुशियों से भर उठा.

आज वह भी पवित्र जल से स्नान करेगी और माथे पर सिंदूर की एक लाल बिंदी लगाएगी. कल ही बिडन स्ट्रीट से रसगुल्ले की हांड़ी ले कर आई है. सब को मन भर कर खिलाएगी. तभी ढाक के स्वर से गलीआंगन भर गया. ढाक बजाते हुए ढाक वाला और पीछे मूर्तिकार. गौरी और सभी गणिकाएं किनारे खड़ी रहीं. आज समाज से परित्यक्त हुई इन नारियों के भाग्य जागे हैं. मां की पूजा की शुरुआत यहीं से होगी. यहां से मिट्टी जाएगी, मां की प्रतिमा का आरंभ होगा और फिर षष्ठी के दिन आधी बनी मूर्ति को चक्षुदान किया जाएगा. मां देखेंगी संसार में फैली असमानता और अन्याय.

गौरी का मन अचानक कसैला हो आया. याद आया उसे अपना गांव, अपना घर, धान के खेतों में काम करते उस के खेतिहर पिता, घर में धान कूटती मेहनतकश मां. फिर भी पेट की पीड़ा से बचने के लिए प्राण प्यारी संतान को काम के लिए कोलकाता भेज दिया. घर के काम के लिए लाए थे राखाल दादा, मगर देह के काम में लगा दिया. जिन मातापिता को सुख पहुंचाने के लिए इस दलदल में फंसी थी उन्होंने ही मुंह फेर लिया. अब वे इस नापाक बेटी को देखना भी नहीं चाहते थे.

धीरे से आंखों से छलक आए आंसुओं को पोंछ लिया गौरी ने. क्यों मन मैला करे. वह भी पूजा बाजार करेगी. नई साड़िया खरीदेगी. बालों में गजरा लगा कर पूजा देखने जाएगी और धूनी नाच भी नाचेगी. उस की मां ने मुंह फेरा है तो क्या हुआ दुर्गा मां तो उस की हैं न, उन की प्रतिमा में ही अपनी मां देखेगी गौरी.

गौरी ने अपनी अलमारी खोल कर देखा अपनी छिपी हुई पोटली को, कितने पैसे जमा कर पाई है वह. कोठे की मालकिन को देने के बाद खर्चों से जो बचा है वही उस की बचत है. उसे मालूम है कि उस के पेशे में सिर्फ युवा देह की कीमत है इसलिए बाकायदा बैंक में खाता खोल कर नियमित बचत करती है. इस के अलावा कुछ मिल जाए तो अपनी इसी पोटली में रख देती है. कांथे की कढ़ाई में उस का हाथ बहुत साफ है.दिन के समय वह कांथा वर्क की साड़ियां काढ़ती रहती है. उस की इच्छा है कि बाद में वह अपना बुटीक खोले जहां हाथ से कढ़ी साड़ियां बेचेगी वह.

विचारों में डूबी गौरी ने देखा कि शाम हो चली है. रंगमहल सज चुके थे और व्यापार शुरू हो गया था. गौरी भी इस बाजार में बिकने उतर चली. दूसरे दिन दोपहर में उस ने पूजा का बाजार करने की ठानी. एक गुलाबी जामदानी उस के मन को बहुत भा गई थी. उस ने वह खरीद ली. इधरउधर दुकानें देखते हुए दिन ढल गया था. गौरी अपने घर की तरफ चल दी. वही तो था उस का घर, उस की दुकान. सबकुछ उस का वही तो
था.

जैसे ही वह अपनी गली में मुड़ी एक नौजवान लड़की आ कर उस से लिपट गई,”मुझे बचा लो दीदी, गुंडे मेरे पीछे पड़े हैं,” लड़की फुसफुसाई.

गौरी उसे घसीट कर कोने वाले मकान के बरामदे में ले गई और दोनों एक अंधेरे कोने में छिप गईं. थोड़ी देर में कुछ दौड़ते कदमों की आहट सुनाई पड़ी. खतरनाक दिखते 2-3 लोग थे.

‘’कहां गई? इधर ही आई थी,” उन में से एक बोला.

“उस्ताद, नहीं मिली तो पैसे गए हाथ से.”

“अरे कहां जाएगी. चलो आगे की गलियों में ढूंढ़ते हैं,” कुछ देर ढूंढ़ने के बाद वे चले गए.

लड़की अभी भी हांफ रही थी. गौरी ने कहा,”तुझे पीछे की गली से निकाल दूंगी. यहां का सारा रास्ता मेरा जानापहचाना है.”

लड़की बोली,”दीदी, कहां जाऊंगी, मेरी सगी मां ने ही पैसों के लिए मुझे बेच दिया है. अब मरने के अलावा कुछ चारा नहीं है, क्या करूं?”

गौरी कुछ पल सोचती रही फिर बोली,”सुनो, जहां मैं रहती हूं वहां तुझे नहीं ले जा सकती. वह तो इस से भी बड़ा कुआं है. वहां तो तुझे रोज दरिंदे खाएंगे.”

“फिर क्या करूं मैं?” लड़की की आवाज में हताशा थी.

“सुन, मेरी जानपहचान की एक टीचर हैं. यही से तीसरे मकान में. उन के पास छोड़ देती हूं, आगे तेरी किस्मत,“ गौरी बोली.

गौरी ने जा कर मजुमदार मैडम का दरवाजा खटखटाया. उन से जानपहचान अचानक ही हुई थी. एक बार मंदिर के सामने मजुमदार मैडम गिर गई थीं और गौरी ने ही उन्हें उठाया था और घर पहुंचाया था. लेकिन गौरी उन्हें अपना परिचय देने का साहस नहीं कर पाई थी. मैडम ने उसे बताया था कि वे रिटायर्ड टीचर हैं.

दरवाजा मैडम ने खोला. वे गौरी को पहचान गई थीं. गौरी ने उन से उस लड़की को शरण देने की विनती की. मैडम ने ध्यान से लड़की को देखा और पूछा,”नाम क्या है तुम्हारा?” गौरी तो भागदौड़ में नाम पूछना ही भूल गई थी.

लड़की ने जवाब दिया,” मेरा नाम नमिता है.”

“ठीक है, यहां छोड़ सकती हो. मैं देखूंगी क्या करना है,” मैडम ने कहा.

गौरी ने धन्यवाद देते हुए कहा, “आप के पास इसीलिए लाई हूं कि कहीं गलत जगह न फंस जाए.”

“ठीक है,” कह कर मैडम ने गौरी को विदा किया.

आज गौरी को चैन की नींद आई थी कि उस ने किसी की जिंदगी खराब होने से बचा ली.

2 महीने इसी तरह बीत गए. एक बार गौरी का मन हुआ की वह मजुमदार मैडम के घर पर जा कर हालचाल पूछ ले लेकिन कई बार जाने पर भी उस ने वहां ताला ही लगा पाया. गौरी ने सोचा शायद वह नमिता को अपने साथ किसी दूसरी जगह ले गई हैं.

दोपहर को कोठे की मालकिन के कमरे से काफी शोरशराबा आ रहा था. वह किसी को धमका रही थी और किसी लड़की की रोने की आवाज़ आ रही थी,”सुनो, इस को समझा, नहीं तो इस का क्या हाल होगा बता दो.”

गौरी ने सुना, वह जानती थी क्या हाल होता है जब जानवर शरीर को बोटियों की तरह चिंचोरते हैं, बारबार के बलात्कार से तन के साथ मन कैसे टूटता है, गौरी को पता है. वह आदमी लड़की को घसीटते हुए निकला. गौरी एक कोने में खड़ी हो गई, रोती हुई लड़की ने चेहरा उठाया तो कांप गई गौरी, यह तो नमिता थी.

“तू यहां?”

“दीदी, आप जिसे प्रतिमा बनाने दे आई थीं उस ने ही इसे तोड़ दिया. मां के बाद मैडम ने बेच दिया.”

गौरी का सिर चकराने लगा था. वह धीरे से अपने कमरे में आ कर बैठ गई. ढाक की आवाज गली के सिरहाने से आ रही थी. उसे लगा जैसे यह उस के सिर पर ही बज रहा हो. यहां की मिट्टी से ही प्रतिमा की शुरुआत होती है और उसी प्रतिमा को पूजने वाले हम जैसी जीवित प्रतिमाओं को किस तरह तोड़ डालते हैं? क्या इस का कोई जवाब है किसी के पास?

आज विसर्जन का दिन है और सिंदूर खेला का दिन, लेकिन गौरी का मन उदास है. धीरेधीरे दिन निकल गया है और शाम को तो गौरी जरूर जाएगी मां को विदा देने के लिए. घाट पर किनारे खड़ी है गौरी, मां की प्रतिमा को विसर्जित होते देख रही है.

वैश्यालय की मिट्टी से निर्मित प्रतिमा धूमधाम से जा रही है लेकिन जहां की मिट्टी है वहां की जीतीजागती प्रतिमाएं अंधेरों के कुएं से कभी नहीं निकल पाएंगी. ऐसे ही टूटती रहेंगी यह प्रतिमाएं, बदनामी की कालिख में लिपटी.

Love Story : अंतिम मुस्कान – क्यों शादी नहीं करना चाहती थी प्राची?

Love Story : ‘‘एकबार, बस एक बार हां कर दो प्राची. कुछ ही घंटों की तो बात है. फिर सब वैसे का वैसा हो जाएगा. मैं वादा करती हूं कि यह सब करने से तुम्हें कोई मानसिक या शारीरिक क्षति नहीं पहुंचेगी.’’

शुभ की बातें प्राची के कानों तक तो पहुंच रही थीं परंतु शायद दिल तक नहीं पहुंच पा रही थीं या वह उन्हें अपने दिल से लगाना ही नहीं चाह रही थी, क्योंकि उसे लग रहा था कि उस में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह अपनी जिंदगी के नाटक का इतना अहम किरदार निभा सके.

‘‘नहीं शुभ, यह सब मुझ से नहीं होगा. सौरी, मैं तुम्हें निराश नहीं करना चाहती थी परंतु मैं मजबूर हूं.’’

‘‘एक बार, बस एक बार, जरा दिव्य की हालत के बारे में तो सोचो. तुम्हारा यह कदम उस के थोड़े बचे जीवन में कुछ खुशियां ले आएगा.’’

प्राची ने शुभ की बात को सुनीअनसुनी करने का दिखावा तो किया पर उस का मन दिव्य के बारे में ही सोच रहा था. उस ने सोचा, रातदिन दिव्य की हालत के बारे में ही तो सोचती रहती हूं. भला उस को मैं कैसे भूल सकती हूं? पर यह सब मुझ से नहीं होगा.

मैं अपनी भावनाओं से अब और खिलवाड़ नहीं कर सकती. प्राची को चुप देख कर शुभ निराश मन से वहां से चली गई और प्राची फिर से यादों की गहरी धुंध में खो गई.

वह दिव्य से पहली बार एक मौल में मिली थी जब वे दोनों एक लिफ्ट में अकेले थे और लिफ्ट अटक गई थी. प्राची को छोटी व बंद जगह में फसने से घबराहट होने की प्रौब्लम थी और वह लिफ्ट के रुकते ही जोरजोर से चीखने लगी थी. तब दिव्य उस की यह हालत देख कर घबरा गया था और उसे संभालने में लग गया था.

खैर लिफ्ट ने तो कुछ देर बाद काम करना शुरू कर दिया था परंतु इस घटना ने दिव्य और प्राची को प्यार के बंधन में बांध दिया था. इस मुलाकात के बाद बातचीत और मिलनेजुलने का सिलसिला चल निकला और कुछ ही दिनों बाद दोनों साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे थे. प्राची अकसर दिव्य के घर भी आतीजाती रहती थी और दिव्य के मातापिता और उस की बहन शुभ से भी उस की अच्छी पटती थी.

इसी बीच मौका पा कर एक दिन दिव्य ने अपने मन की बात सब को कह दी, ‘‘मैं प्राची के साथ शादी करना चाहता हूं,’’ किसी ने भी दिव्य की इस बात का विरोध नहीं किया था.

सब कुछ अच्छा चल रहा था कि एक दिन अचानक उन की खुशियों को ग्रहण लग गया.

‘‘मां, आज भी मेरे पेट में भयंकर दर्द हो रहा है. लगता है अब डाक्टर के पास जाना ही पड़ेगा.’’ दिव्य ने कहा और वह डाक्टर के पास जाने के लिए निकल पड़ा.

काफी इलाज के बाद भी जब पेट दर्द का यह सिलसिला एकदो महीने तक लगातार चलता रहा तो कुछ लक्षणों और फिर जांचपड़ताल के आधार पर एक दिन डाक्टर ने कह ही दिया, ‘‘आई एम सौरी. इन्हें आमाशय का कैंसर है और वह भी अंतिम स्टेज का. अब इन के पास बहुत कम वक्त बचा है. ज्यादा से ज्यादा 6 महीने,’’ डाक्टर के इस ऐलान के साथ ही प्राची और दिव्य के प्रेम का अंकुर फलनेफूलने से पहले ही बिखरता दिखाई देने लगा.

आंसुओं की अविरल धारा और खामोशी, जब भी दोनों मिलते तो यही मंजर होता.

‘‘सब खत्म हो गया प्राची, अब तुम्हें मुझ से मिलने नहीं आना चाहिए.’’ एक दिन दिव्य ने प्राची को कह दिया.

‘‘नहीं दिव्य, यदि वह आना चाहती है, तो उसे आने दो,’’ शुभ ने उसे टोकते हुए कहा. ‘‘जितना जीवन बचा है, उसे तो जी लो वरना जीते जी मर जाओगे तुम. मैं चाहती हूं इन 6 महीनों में तुम वह सब करो जो तुम करना चाहते थे. जानते हो ऐसा करने से तुम्हें हर पल मौत का डर नहीं सताएगा.’’

‘‘हो सके तो इस दुख की घड़ी में भी तुम स्वयं को इतना खुशमिजाज और व्यस्त कर लो कि मौत भी तुम तक आने से पहले एक बार धोखा खा जाए कि मैं कहीं गलत जगह तो नहीं आ गई. जब तक जिंदगी है भरपूर जी लो. हम सब तुम्हारे साथ हैं. हम वादा करते हैं कि हम सब भी तुम्हें तुम्हारी बीमारी की गंभीरता का एहसास तक नहीं होने देंगे.’’

बहन के इस ऐलान के बाद उन के घर का वातावरण आश्चर्यजनक रूप से बदल

गया. मातम का स्थान खुशी ने ले लिया था. वे सब मिल कर छोटी से छोटी खुशी को भी शानदार तरीके से मनाते थे, वह चाहे किसी का जन्मदिन हो, शादी की सालगिरह हो या फिर कोई त्योहार. घर में सदा धूमधाम रहती थी.

एक दिन शुभ ने अपनी मां से कहा, ‘‘मां, आप की इच्छा थी कि आप दिव्य की शादी धूमधाम से करो. दिव्य आप का इकलौता बेटा है. मुझे लगता है कि आप को अपनी यह इच्छा पूरी कर लेनी चाहिए.’’

मां उसे बीच में ही रोकते हुए बोलीं, ‘‘देख शुभ बाकी सब जो तू कर रही है, वह तो ठीक है पर शादी? नहीं, ऐसी अवस्था में दिव्य की शादी करना असंभव तो है ही, अनुचित भी है. फिर ऐसी अवस्था में कौन करेगा उस से शादी? दिव्य भी ऐसा नहीं करना चाहेगा. फिर धूमधाम से शादी करने के लिए पैसों की भी जरूरत होगी. कहां से आएंगे इतने पैसे? सारा पैसा तो दिव्य के इलाज में ही खर्च हो गया.’’

‘‘मां, मैं ने कईर् बार दिव्य और प्राची को शादी के सपने संजोते देखा है. मैं नहीं चाहती भाई यह तमन्ना लिए ही दुनिया से चला जाए. मैं उसे शादी के लिए मना लूंगी. फिर यह शादी कौन सी असली शादी होगी, यह तो सिर्फ खुशियां मनाने का बहाना मात्र है. बस आप इस के लिए तैयार हो जाइए.

‘‘मैं कल ही प्राची के घर जाती हूं. मुझे लगता है वह भी मान जाएगी. हमारे पास ज्यादा समय नहीं है. अंतिम क्षण कभी भी आ सकता है. रही पैसों की बात, उन का इंतजाम भी हो जाएगा. मैं सभी रिश्तेदारों और मित्रों की मदद से पैसा जुटा लूंगी,’’ कह कर शुभ ने प्राची को फोन किया कि वह उस से मिलना चाहती है.

और आज जब प्राची ने शुभ के सामने यह प्रस्ताव रखा तो प्राची के जवाब ने शुभ को निराश ही किया था परंतु शुभ ने निराश होना नहीं सीखा था.

‘‘मैं दिव्य की शादी धूमधाम से करवाऊंगी और वह सारी खुशियां मनाऊंगी जो एक बहन अपने भाई की शादी में मनाती है. इस के लिए मुझे चाहे कुछ भी करना पड़े.’’ शुभ अपने इरादे पर अडिग थी.

घर आते ही दिव्य ने शुभ से पूछा, ‘‘क्या हुआ, प्राची मान गई क्या?’’

‘‘हां मान गई. क्यों नहीं मानेगी? वह तुम से प्रेम करती है,’’ शुभ की बात सुन कर दिव्य के चेहरे पर एक अनोखी चमक आ गई जो शुभ के इरादे को और मजबूत कर गई.

शुभ ने दिव्य की शादी के आयोजन की इच्छा और इस के लिए आर्थिक मदद की जरूरत की सूचना सभी सोशल साइट्स पर पोस्ट कर दी और इस पोस्ट का यह असर हुआ कि जल्द ही उस के पास शादी की तैयारियों के लिए पैसा जमा हो गया.

घर में शादी की तैयारियां धूमधाम से शुरू हो गईं. दुलहन के लिए कपड़ों और गहनों का

चुनाव, मेहमानों की खानेपीने की व्यवस्था, घर की साजसजावट सब ठीक उसी प्रकार होने लगा जैसा शादी वाले घर में होना चाहिए.

शादी का दिन नजदीक आ रहा था. घर में सभी खुश थे, बस एक शुभ ही चिंता में डूबी हुई थी कि दुलहन कहां से आएगी? उस ने सब से झूठ ही कह दिया था कि प्राची और उस के घर वाले इस नाटकीय विवाह के लिए राजी हैं पर अब क्या होगा यह सोचसोच कर शुभ बहुत परेशान थी.

‘‘मैं एक बार फिर प्राची से रिक्वैस्ट करती हूं. शायद वह मान जाए.’’ सोच कर शुभ फिर प्राची के घर पहुंची.

‘‘बेटी हम तुम्हारे मनोभावों को बहुत अच्छी तरह समझते हैं और हम तुम्हें पूरा सहयोग देने के लिए तैयार हैं पर प्राची को मनाना हमारे बस की बात नहीं. हमें लगता है कि दिव्य के अंतिम क्षणों में, उसे मौत के मुंह में जाते हुए पर मुसकराते हुए वह नहीं देख पाएगी, शायद इसीलिए वह तैयार नहीं है. वह बहुत संवेदनशील है,’’ प्राची की मां ने शुभ को समझाते हुए कहा.

‘‘पर दिव्य? उस का क्या दोष है, जो प्रकृति ने उसे इतनी बड़ी सजा दी है? यदि वह इतना सहन कर सकता है तो क्या प्राची थोड़ा भी नहीं?’’ शुभ बिफर पड़ी.

‘‘नहीं, तुम गलत सोच रही हो. प्राची का दर्द भी दिव्य से कम नहीं है. वह भी बहुत सहन कर रही है. दिव्य तो यह संसार छोड़ कर चला जाएगा और उस के साथसाथ उस के दुख भी. परंतु प्राची को तो इस दुख के साथ सारी उम्र जीना है. उस की हालत तो दिव्य से भी ज्यादा दयनीय है. ऐसी स्थिति में हम उस पर ज्यादा दबाव नहीं डाल सकते.

‘‘फिर हमें समाज का भी खयाल रखना है. शादी और उस के तुरंत बाद ही दिव्य की मृत्यु. वैधव्य की छाप भी तो लग जाएगी प्राची पर. किसकिस को समझाएंगे कि यह एक नाटक था. यह इतना आसान नहीं है जितना तुम समझ रही हो?’’ प्राची की मां ने शुभ को समझाने की कोशिश की.

उस दिन पहली बार शुभ को दिव्य से भी ज्यादा प्राची पर तरस आया लेकिन यह उस की समस्या का समाधान नहीं था. तभी उस के तेज दिमाग ने एक हल निकाल ही लिया.

वह बोली, ‘‘आंटी जी, बीमारी की वजह से इन दिनों दिव्य को कम दिखाई देने लगा है. ऐसे में हम प्राची की जगह उस से मिलतीजुलती किसी अन्य लड़की को भी दुलहन बना सकते हैं. दिव्य को यह एहसास भी नहीं होगा कि दुलहन प्राची नहीं, बल्कि कोई और है. यदि आप की नजर में ऐसी कोई लड़की हो तो बताइए.’’

‘‘हां है, प्राची की एक सहेली ईशा बिलकुल प्राची जैसी दिखती है. वह अकसर नाटकों में भी भाग लेती रहती है. पैसों की खातिर वह इस काम के लिए तैयार भी हो जाएगी. पर ध्यान रहे शादी की रस्में पूरी नहीं अदा की जानी चाहिए वरना उसे भी आपत्ति हो सकती है.’’

‘‘आप बेफिक्र रहिए आंटी जी, सब वैसा ही होगा जैसा फिल्मों में होता है, केवल दिखावा. क्योंकि हम भी नहीं चाहते हैं कि ऐसा हो और दिव्य भी ऐसी हालत में नहीं है कि वह सभी रस्में निभाने के लिए अधिक समय तक पंडाल में बैठ भी सके.’’

शादी का दिन आ पहुंचा. विवाह की सभी रस्में घर के पास ही एक गार्डन में होनी थीं. दिव्य दूल्हा बन कर तैयार था और अपनी दुलहन का इंतजार कर रहा था कि अचानक एक गाड़ी वहां आ कर रुकी. गाड़ी में से प्राची का परिवार और दुलहन का वेश धारण किए गए लड़की उतरी.

हंसीखुशी शादी की सारी रस्में निभाई जाने लगीं. दिव्य बहुत खुश नजर आ रहा था. उसे देख कर कोई यह नहीं कह सकता था कि यह कुछ ही दिनों का मेहमान है. यही तो शुभ चाहती थी.

‘‘अब दूल्हादुलहन फेरे लेंगे और फिर दूल्हा दुलहन की मांग भरेगा.’’ जब पंडित ने कहा तो शुभ और प्राची के मातापिता चौकन्ने हो गए. वे समझ गए कि अब वह समय आ गया है जब लड़की को यहां से ले जाना चाहिए वरना अनर्थ हो सकता है और वे बोले, ‘‘पंडित जी, दुलहन का जी घबरा रहा है. पहले वह थोड़ी देर आराम कर ले फिर रस्में निभा ली जाएं तो ज्यादा अच्छा रहेगा.’’ कह कर उन्होंने दुलहन जोकि छोटा सा घूंघट ओढ़े हुए थी, को अंदर चलने का इशारा किया.

‘‘नहीं पंडित जी, मेरी तबीयत इतनी भी खराब नहीं कि रस्में न निभाई जा सकें.’’ दुलहन ने घूंघट उठाते हुए कहा तो शुभ के साथसाथ प्राची के मातापिता भी चौक उठे क्योंकि दुलहन कोई और नहीं प्राची ही थी.

शायद जब ईशा को प्राची की जगह दुलहन बनाने का फैसला पता चला होगा तभी प्राची ने उस की जगह स्वयं दुलहन बनने का निर्णय लिया होगा, क्योंकि चाहे नाटक में ही, दिव्य की दुलहन बनने का अधिकार वह किसी और को दे, उस के दिल को मंजूर नहीं होगा.

आज उस की आंखों में आंसू नहीं, बल्कि उस के होंठों पर मुसकान थी. अपना सारा दर्द समेट कर वह दिव्य की क्षणिक खुशियों की भागीदारिणी बन गई थी. उसे देख कर शुभ की आंखों से खुशी और दुख के मिश्रित आंसू बह निकले. उस ने आगे बढ़ कर प्राची को गले से लगा लिया.

यह देख कर दिव्य के चेहरे पर एक अनोखी मुसकान आ गई. ऐसी मुसकान पहले किसी ने उस के चेहरे पर नहीं देखी थी. परंतु शायद वह उस की आखिरी मुसकान थी, क्योंकि उस का कमजोर शरीर इतना श्रम और खुशी नहीं झेल पाया और वह वहीं मंडप में ही बेहोश हो गया.

दिव्य को तुरंत हौस्पिटल ले जाना पड़ा जहां उसे तुरंत आईसीयू में भेज दिया गया. कुछ ही दिनों बाद दिव्य नहीं रहा परंतु जाते समय उस के होंठों पर मुसकान थी.

प्राची का यह अप्रत्याशित निर्णय दिव्य और उस के परिवार वालों के लिए वरदान से कम नहीं  था. वे शायद जिंदगी भर उस के इस एहसान को चुका न पाएं. प्राची के भावी जीवन को संवारना अब उन की भी जिम्मेदारी थी.

Romantic Story : पहेली – दिल के तारों को झंकृत करती कहानी

Romantic Story : ‘‘हैलो, आई एम कनिका सिंह, फ्रौम राजस्थान.’’ इस खनकती आवाज ने अमित का ध्यान आकर्षित किया तो देखा, सामने एक असाधारण सुंदर युवती खड़ी है. क्लासरूम से वह अभी अपने साथियों के साथ ‘टी ब्रेक’ में बाहर आया था कि उस का परिचय कनिका से हो गया.

‘‘हैलो, मैं अमित शर्मा, राजस्थान से ही हूं,’’ अमित ने मुसकरा कर अपना परिचय दिया.

कनिका वास्तव में बहुत सुंदर थी. आकर्षक व्यक्तित्व, उम्र लगभग 26-27 की रही होगी. लंबा कद किंतु भरापूरा शरीर, तीखे नयननक्श उस की सुंदरता में और वृद्धि कर रहे थे. ‘टी ब्रेक’ खत्म होते ही सभी वापस क्लासरूम में पहुंच गए.

भारत के एक ऐतिहासिक शहर हैदराबाद में 1 माह के प्रशिक्षण का आज पहला दिन था. देश के अलगअलग प्रांतों से संभागियों के पहुंचने का क्रम अभी भी जारी था. कनिका भी दोपहर बाद ही पहुंची थी. पहले दिन की औपचारिक कक्षाएं खत्म होते ही सभी प्रशिक्षुओं को लोकसंगीत और नृत्य कार्यक्रम में शामिल होना था.

खुले रंगमंच में सभी लोग जमा हो चुके थे. कार्यक्रम शुरू हो गया था. लोककलाकार अपनीअपनी कला का बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे थे. संयोग से अमित के पास की सीट खाली थी. कनिका वहां आ गई तो अमित ने मुसकराते हुए उसे पास बैठने का इशारा किया. कनिका बैठते ही अमित से बातचीत करने लगी. उस ने बताया कि वह मनोविज्ञान की प्राध्यापक है. अमित ने कहा कि वह इतिहास विषय का है. कनिका ने बताया कि इतिहास उस का पसंदीदा विषय रहा है और वह चाहती है कि इस विषय का गहन अध्ययन करे. फिर हंसते हुए उस ने पूछा, ‘‘आप मुझे पढ़ाएंगे क्या?’’

अमित ने भी मजाक में उत्तर दिया, ‘‘अरे, मेरा विषय तो नीरस है. लड़कियां तो वैसे ही इस से दूर भागती हैं.’’

कनिका अपने कैमरे से कलाकारों की फोटो खींचने लगी. अमित के मन में उस के लिए न जाने क्यों एक खास आकर्षण पैदा हो चुका था. छोटी सी मुलाकात ने ही उसे बहुत प्रभावित कर दिया था. कनिका के उन्मुक्त व्यवहार से वह मानो उस के प्रति खिंचा जा रहा था.

होस्टल में अमित के दाईं ओर तमिलनाडु और बाईं ओर उड़ीसा के संभागी प्राध्यापक थे. इस अनोखे सांस्कृतिक समागम ने एकदूसरे को जानने और समझाने का भरपूर अवसर प्रदान किया था. इसी होस्टल के ग्राउंड फ्लोर पर महिला संभागियों के रुकने की व्यवस्था थी. कुल 80 लोगों में 40 महिलाएं थीं जो भारत के विभिन्न राज्यों का प्रतिनिधित्व कर रही थीं.

रात्रि भोज के बाद सभी संभागियों का अपना सांस्कृतिक कार्यक्रम चलता था. हाल में सभी लोग जमा थे. इस कार्यक्रम में सभी को भाग लेना अनिवार्य था. कनिका ने राजस्थानी लोकगीत सुनाए जिस से उस की एक और प्रतिभा का पता चला कि वह संगीत में भी खासा दखल रखती थी.

दूसरे दिन सुबह चाय के समय कनिका ने अमित को अपने लैपटाप पर वे सारी फोटो दिखाईं जो उस ने रात्रि सांस्कृतिक कार्यक्रम में खींची थीं.

क्लासरूम में अमित बाईं ओर पहली कतार में बैठता था. आज उस ने नोट किया कि दाईं ओर की पहली कतार में असम और तमिलनाडु की महिला संभागियों के साथ कनिका भी बैठी है. पूरे दिन अमित ने जब भी कनिका को देखा, उसे अपनी ओर देखते, मुसकराते ही पाया. उस के दिल में एक सुखद एहसास जागृत हो रहा था.

लंच में अमित ने कनिका को अपने साथ खाने के लिए आमंत्रित किया. उस मेज पर उस के कुछ तमिल दोस्त भी थे. कनिका बिना किसी झिझक के पास की कुरसी पर बैठ कर खाना खाने लगी.

बातचीत में कनिका ने अमित से पूछा, ‘‘सर, आप की फैमिली में कौनकौन हैं?’’

अमित अब खुल चुका था सो उस ने विस्तार से अपने परिवार के बारे में बताया कि उस की पत्नी सरकारी नौकरी में किसी दूसरे शहर में नियुक्त है. एक छोटी 4 साल की बेटी है जो अपनी मम्मी के साथ ही रहती है. अमित ने कनिका से भी पूछा किंतु वह बात टाल गई और हंसीमजाक में मशगूल हो गई.

रात के 11 बजे थे. होस्टल के हाल में सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था. अचानक अमित के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कौल आई. उत्सुकता के चलते अमित ने उस काल को रिसीव किया.

‘‘हैलो सर, पहचाना?’’ अमित अभी असमंजस में था कि आवाज फिर आई, ‘‘मैं कनिका बोल रही हूं. आप 2 मिनट के लिए लौन में आ सकते हैं?’’

अमित फौरन बाहर आया. कनिका बाहर कैंपस में खड़ी थी. यद्यपि बाहर इस समय और भी महिलापुरुष संभागी बातचीत में व्यस्त थे. किंतु अमित को अजीब महसूस हो रहा था, फिर कनिका ने पूछा, ‘‘सर, क्या आप के पास सिरदर्द की दवा है? आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है.’’

अमित ने घबरा कर कहा, ‘‘ज्यादा खराब हो तो डाक्टर के पास चलें?’’

कनिका के मना करने पर अमित तुरंत अंदर से अपनी मेडिकल किट ले आया और कुछ जरूरी दवाएं निकाल कर कनिका को दे दीं. कनिका ने धन्यवाद दिया और अपने कमरे में चली गई.

प्रशिक्षण के दिन खुशीखुशी बीत रहे थे. शुरू में 1 माह की अवधि बहुत लंबी लग रही थी किंतु अमित को अब लग रहा था कि जीवन का एकएक पल अमूल्य है जो बीता जा रहा है. कनिका के प्रति उस का लगाव बढ़ता जा रहा था. दूसरे दिन अमित इस उम्मीद में अपना मोबाइल देख रहा था कि शायद फिर से फोन आए. रात के 10 बज चुके थे. उस का मन सांस्कृतिक संध्या में नहीं लग रहा था. कुछ समय बाद काल आई. अमित तो जैसे इसी के इंतजार में था, तपाक से उस ने काल रिसीव की. फिर वही मधुर आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘परेशान कर दिया न सर, आप को.’’

अमित ने भी मजाक में पूछ लिया, ‘‘क्यों, नींद नहीं आ रही है क्या? शायद किसी की याद आ रही होगी?’’

कनिका ने खिलखिला कर हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों मजाक बनाते हो…मुझे आप से ही बात करनी थी,’’ फिर आगे बात बढ़ाते हुए बोली, ‘‘मुझे कोई याद नहीं करता, मैं इतनी खास तो नहीं कि कोई…’’ उस ने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया. फिर पूछा, ‘‘आप ने कल वाले प्रोजेक्ट वर्क की क्या तैयारी की है?’’

अमित उसे प्रोजेक्ट वर्क के बारे में समझाने लगा. फिर उस ने कनिका से पूछा कि उसे उस के फोन नंबर कैसे मिले. कनिका ने उस की जिज्ञासा शांत की और बताया कि रजिस्टे्रशन रजिस्टर में से मोबाइल नंबर लिए थे.

अमित को बहुत अच्छा लग रहा था कि कनिका उसे इतना महत्त्व दे रही है जबकि प्राय: सभी पुरुष संभागी उस से बातचीत करने और मेलजोल बढ़ाने के लिए लालायित थे.

कुछ दिन बाद आउटिंग का कार्यक्रम था. 2 रातें घने जंगल में औषधीय पौधों के अध्ययन में बितानी थीं. वहां बने रेस्टहाउस में सब के रहने की व्यवस्था थी. यात्रा में कनिका के हंसीमजाक ने पिकनिक जैसा माहौल बना दिया था. वहां पहुंचते ही फील्ड आफिसर ने सभी लोगों को 2 घंटे का समय लंच और थोड़ा आराम करने के लिए दिया. जिस का उपयोग सभी ने उस सुरम्य प्राकृतिक स्थल को और नजदीक से देखने में किया.

अमित अपना लंच ले कर साथियों के साथ झरने के टौप पर था कि नीचे उस की नजर कनिका पर पड़ी जो अपनी सहेलियों के साथ खड़ी उसे इशारे से नीचे बुला रही थी. उस का मन तो बहुत था लेकिन वह अपने दोस्तों में टारगेट बनना नहीं चाहता था.

कनिका के आमंत्रण को उस ने नजरअंदाज कर दिया. कुछ समय बाद जब वह मिली तो उस ने स्वाभाविक ढंग से शिकायत जरूर की, ‘‘आप आए क्यों नहीं, सर? बहुत अच्छा लगता.’’

बेचारा अमित मन मसोस कर रह गया. विषय बदलने के लिए उस ने कहा, ‘‘आज आप की राजस्थानी बंधेज की साड़ी बहुत सुंदर लग रही है.’’

कनिका खनकती आवाज में बोली, ‘‘सिर्फ साड़ी?’’

अमित ने कहा, ‘‘नहीं, और भी बहुत कुछ, ये वादियां, अमूल्य वनस्पति और आप.’’

कनिका ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘सर, आप बातों को इतना घुमाफिरा कर क्यों कहते हैं?’’

अमित क्या कहता. वह मन की बातों को अंदर दबा जाता था.

पौधों के बारे में जानकारी दी जा रही थी. सभी लोग नोटबुक थामे व्यस्त थे. यह पहला मौका था जब अमित को कनिका के स्पर्श का अनुभव हुआ. ग्रुप में वह सट कर खड़ी मुसकरा रही थी. उस की कुछ खास तमिल सहेलियां अमित से अंगरेजी में पौधों के बारे में पूछ रही थीं और वह उन्हें अंगरेजी में ही समझ रहा था. कनिका पहली बार अमित को धाराप्रवाह अंगरेजी बोलते हुए सुन रही थी. अब कनिका अपने ग्रुप से अलग हो कर पास के कैक्टस के पौधों की ओर चली गई. अमित को भी आवाज दे कर उस ने अपने पास बुला लिया और बोली, ‘‘देखिए सर, यह इस जगह की सब से जीवट वनस्पति है. हम चाहे इसे सौंदर्य की प्रतिमूर्ति न मानें किंतु यह हमें जीना सिखाती है.’’

अमित उस की बात को समझाने का प्रयास कर रहा था. बाकी ग्रुप आगे बढ़ चुका था. तभी एक फोटोग्राफर ने उन दोनों का फोटो ले लिया. अमित को लगा शायद फोटोग्राफर उस के दिल की भावनाओं को जानता है.

कनिका फिर बोली, ‘‘आप को ऐसा नहीं लगता कि ये हमें संदेश दे रहे हैं…सब के बीच हमारा अपना अस्तित्व है और हमें उसे खोने का डर नहीं.’’

रेस्टहाउस में कनिका ने अमित के सामने प्रस्ताव रखा कि क्यों न हम आज रात्रि में झरने के  किनारे चलें. मैं अपनी कुछ सहेलियों के साथ रात का नजारा देखना चाहती हूं. अमित तो जैसे पहले से ही अभिभूत था.

रात्रि विहार ने अमित को कनिका के और नजदीक आने का अवसर दिया. कारण, कनिका ने उसे आज वह सब बताया था जो किसी अनजान पुरुष को बताना संभव नहीं. पहली बार अमित को लगा, कनिका वैसी बिंदास नहीं है जैसी वह दिखती है.

कनिका ने बताया कि 4 साल पहले उस का विवाह हो चुका है. एक 3 साल का बेटा भी है. किंतु जीवन में उसे वह दुखद अनुभव भी झेलना पड़ा है जो एक स्त्री के लिए बहुत दुखद होता है. उस का पति एक बिगड़ा रईस निकला, जिस ने उस की कोई इज्जत नहीं की. कानूनन अब तलाक ले कर वह उस से मुक्ति पा चुका था. कनिका ने इस कठोर यथार्थ को स्वीकार किया और  जीवन को रोरो कर नहीं बल्कि मुसकरा कर जीने का फैसला किया.

ऐतिहासिक जगहों को घूमने वाले दिन कनिका बस में अमित के पास वाली सीट पर बैठी थी. अमित यह सोच कर बहुत खुश था कि आज कनिका पूरे दिन उस के साथ रहने वाली है. वे दोनों अंगरेजी भाषी ग्रुप में थे, जहां भीड़ कम थी, अत: पूरा दिन मौजमस्ती में बीत गया. अमित ने पहली बार आज कनिका को एक गिफ्ट दिया, जिसे बहुत मुश्किल से उस ने स्वीकार किया. आज कनिका ने बहुत फोटो लिए थे.

आखिर टे्रनिंग खत्म होने का अंतिम दिन आ ही गया. सभी के मन उदास थे. अमित आज कनिका से बहुत बातें करना चाहता था. तभी रात को कनिका का फोन आ गया. उस ने पूछा कि क्या वह एक दिन और नहीं रुक सकता. इधर बहुत सारे पर्यटक स्थल देखने को बचे हैं. अमित का तो जाने का मन ही नहीं था. इसलिए वह एक दिन और रुकने को तैयार हो गया. दोनों ने खूब बातें कीं.

औपचारिक विदाई समारोह के समय सभी बहुत भावुक हो गए. अनजान लोग इतने करीबी हो चुके थे कि बिछुड़ने का दुख सहन नहीं हो रहा था. ग्रुप फोटो मधुर यादों का हिस्सा बनने जा रहा था. फोटो तो इतने हो चुके थे कि अलबम ही तैयार हो गया था. भारी मन से गले लग कर सब विदा हुए.

अमित ने कनिका की डायरी में अपने हस्ताक्षर कर अपना संदेश लिखा. न जाने क्यों वह अभी भी अपने मन की बात कनिका को कह नहीं पाया था. कनिका ने भी अमित की डायरी में लिखा, ‘‘मैं इतिहास से बहुत प्यार करती हूं…बहुत… बहुत ज्यादा, लेकिन इतिहास नहीं दोहराती.’’ – कनिका सिंह.

इस विचित्र इबारत का अर्थ अमित की समझ में नहीं आया था.

कनिका के आग्रह पर अमित होटल में एक कमरा बुक करवा कर कल का इंतजार करने लगा. शाम को उस की कनिका से लंबी बातें हुईं, दूसरे दिन उस ने घूमने का कार्यक्रम बनाया था. अमित सोच रहा था, कल वह अवश्य ही कनिका को अपने दिल की बात बता देगा. सारी रात वह सो नहीं पाया.

दूसरे दिन 10 बजे वह तैयार हो कर कनिका से मिलने के लिए रवाना हुआ. 11 बजे कनिका ने चारमीनार के पास मिलने को कहा था. 11 बज गए. अमित की बेचैनी बढ़ने लगी. थोड़ा और समय बीता. वह अधीर हो गया. करीब साढ़े 11 बजे कनिका का फोन आया :

‘‘हैलो सर, आई एम वैरी सौरी. मैं आप को कैसे कहूं. मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा…सर, सुबह पापा का फोन आया था, इमरजेंसी है मुझे वापस घर जाना पड़ रहा है. सौरी, प्लीज आप कांटेक्ट बनाए रखना. मैं कभी आप को नहीं भूलूंगी… मैं कल आप को फोन करूंगी.’’

अमित का मूड उखड़ चुका था. समP में नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दे. कल रात का ट्रेन का आरक्षण वह कैंसिल करा चुका था और अब सारा दिन वह अकेला क्या करेगा. उस ने फ्लाइट पकड़ी और अपने शहर रवाना हो गया.

दूसरे दिन भी कनिका का कोई फोन नहीं आया. वह बहुत परेशान हो गया. उस की उदासी बढ़ती जा रही थी. किसी भी काम में उस का मन नहीं लग रहा था.

अमित ने खुद कनिका को फोन लगाया तो वज्रपात हुआ क्योंकि जो नंबर उस के पास था वह सिम अब डेड हो चुकी थी. असम से एक मैडम का फोन आया तो अमित को पता कि कल उस के पास कनिका का फोन आया था. ऐसी ही बात उस की एक तमिल सहेली ने भी बताई.

अमित का दिल टूट गया. दोनों के साथ के फोटो अमित के सामने पड़े थे. वह निर्णय नहीं कर पा रहा था कि अब वह ट्रेनिंग के दिनों को याद करे या भूलने का प्रयास करे. कनिका तो वैसे ही उस के लिए एक गूढ़ पहेली बन गई थी. अचानक उस की नजर अपनी डायरी पर पड़ी, धड़कते दिल से उस ने प्रथम पृष्ठ पढ़ा. उस पर कनिका का वह संदेश लिखा था जो उस ने विदाई के समय लिखा था : ‘‘मैं इतिहास से बहुत प्यार करती हूं… बहुत…बहुत ज्यादा लेकिन इतिहास नहीं दोहराती,’’ – कनिका सिंह.

आज अमित को उपरोक्त पंक्तियों का सही अर्थ समझ में आ रहा था लेकिन दिल अभी भी संतुष्ट नहीं था. अगर ऐसा ही था तो उस ने नजदीकी ही क्यों बढ़ाई. उस के दिमाग में कई संभावनाएं आजा रही थीं. अचानक अमित को कनिका के कहे वे शब्द याद आ रहे थे जो उस ने कईकई बार उस से कहे थे, ‘‘सर, मैं आप को कभी भुला नहीं पाऊंगी. आप भी मुझे याद रखेंगे न, कहीं भूल तो नहीं जाएंगे?’’

अमित उन शब्दों का अर्थ खोजता रहा लेकिन कनिका उस के लिए अब एक  अनसुलझी पहेली बन चुकी थी.

Social Story : चौराहे की काली – पंड़ित को धर्म सिंह ने कैसे सिखाया सबक

Social Story : ‘‘मेरी बीवी बहुत बीमार है पंडितजी…’’ धर्म सिंह ने पंडित से कहा, ‘‘न जाने क्यों उस पर दवाओं का असर नहीं होता है. जब वह मुझे घूर कर देखती है तो मैं डर जाता हूं.’’ ‘‘तुम्हारी बीवी कब से बीमार है?’’ पंडित ने पूछा.

‘‘महीनेभर से.’’ ‘‘पहले तुम मुझे अपनी बीवी से मिलवाओ तभी मैं यह बता पाऊंगा कि वह बीमार है या उस पर किसी भूत का साया है.’’

‘‘मैं अपनी बीवी को कल सुबह ही दिखा दूंगा,’’ इतना कह कर धर्म सिंह चला गया. पंडित भूतप्रेत के नाम पर लोगों को बेवकूफ बना कर पैसे ऐंठता था. इसी धंधे से उस ने अपना घर भर रखा था.

अगली सुबह धर्म सिंह के घर पहुंच कर पंडित ने कहा, ‘‘अरे भाई धर्म सिंह, तुम ने कल कहा था कि तुम्हारी बीवी बीमार है. जरा उसे दिखाओ तो सही…’’ धर्म सिंह अपनी बीवी सुमन को अंदर से ले आया और उसे एक कुरसी पर बैठा दिया.

पंडित ने उसे देखते ही पैसा ऐंठने का अच्छा हिसाबकिताब बना लिया. सुमन के बाल बिखरे हुए और कपड़े काफी गंदे थे. उस की आंखें लाल थीं और गालों पर पीलापन छाया था. जो भी उस के सामने जाता, वह उसे ऐसे देखती मानो खा जाएगी.

पंडित सुमन की आंखें देख कर बोला, ‘‘अरे धर्म सिंह, मैं देख रहा हूं कि तुम्हारी बीवी पर बड़े भूत का साया है.’’ ‘‘कैसा भूत पंडितजी?’’ धर्म सिंह ने हैरानी से पूछा.

‘‘तुम नहीं समझ पाओगे कि इस पर किस किस्म का भूत है,’’ पंडित बोला. ‘‘क्या भूतों की भी किस्में होती हैं?’’

‘‘क्यों नहीं. कुछ भूत सीधे होते हैं, कुछ अडि़यल, पर तुम्हारी बीवी पर…’’ पंडित बोलतेबोलते रुक गया. ‘‘क्या बात है पंडितजी… जरा साफसाफ बताइए.’’

‘‘यही कि तुम्हारी बीवी पर सीधेसादे भूत का साया नहीं है. इस पर ऐसे भूत का साया है जो इनसान की जान ले कर ही जाता?है,’’ पंडित ने हाथ की उंगली उठा कर जवाब दिया. ‘‘फिर तो पंडितजी मुझे यह बताइए कि इस का हल क्या है?’’ धर्म सिंह कुछ सोचते हुए बोला.

पंडित ने हाथ में पानी ले कर कुछ बुदबुदाते हुए सुमन पर फेंका और बोला, ‘‘बता तू कौन है? यहां क्या करने आया है? क्या तू इसे ले कर जाएगा? मगर मेरे होते हुए तू ऐसा कुछ नहीं कर सकता.’’ ‘‘पंडितजी, आप किस से बातें कर रहे हैं?’’ धर्म सिंह ने पूछा.

‘‘भूत से, जो तेरी बीवी पर चिपटा है,’’ होंठों से उंगली सटा कर पंडित ने धीरे से कहा. ‘‘क्या भूत बोलता है?’’ धर्म सिंह ने सवाल किया.

‘‘हां, भूत बोलता है, पर सिर्फ हम से, आम आदमी से नहीं.’’ ‘‘तो क्या कहता है यह भूत?’’

‘‘धर्म सिंह, भूत कहता है कि वह भेंट चाहता है.’’ ‘‘कैसी भेंट?’’ यह सुन कर धर्म सिंह चकरा गया.

‘‘मुरगे की,’’ पंडित ने कहा. ‘‘पर हम लोग तो शाकाहारी हैं.’’

‘‘तुम नहीं चढ़ा सकते तो मुझे दे देना. मैं चढ़ा दूंगा,’’ पंडित ने रास्ता सुझाया. ‘‘पंडितजी, मुझे एक बात बताओ?’’

‘‘पूछो, क्या बात है?’’ ‘‘मेरी बीवी पर कौन सी किस्म का भूत है?’’

पंडित ने सुमन की तरफ उंगली उठाते हुए कहा, ‘‘इस पर ‘चौराहे की काली’ का असर है.’’ ‘‘क्या… ‘चौराहे की काली’,’’ धर्म सिंह की आंखें डर के मारे फैल गईं, ‘‘मेहरबानी कर के कोई इलाज बताएं पंडितजी.’’

‘‘जरूर. वह काली कहती है कि तुझे एक मुरगा, एक नारियल, 101 रुपए, बिंदी, टीका, कपड़ा और सिंदूर रात को 12 बजे चौराहे पर रख कर आना पड़ेगा.’’ ‘‘इतना सारा सामान पंडितजी?’’ धर्म सिंह ने कहा.

‘‘हां, अगर ऐसा नहीं हुआ तो तेरी बीवी गई काम से,’’ पंडित तपाक से बोला. ‘‘जी अच्छा पंडितजी, पर इतना सामान और वह भी रात के समय, यह मेरे बस की बात नहीं है,’’ धर्म सिंह ने कहा.

‘‘तेरे बस की बात नहीं है तो मैं रख आऊंगा…’’ पंडित ने कहा, ‘‘शाम को सारा सामान लेते आना. मैं शाम को आऊंगा.’’ धर्म सिंह तैयारी करने में लग गया. हालांकि उस ने बीवी को डाक्टर से दवा भी दिला दी, पर वह पंडित को भी मौका देना चाहता था इसीलिए चौराहे पर जाने से मना कर दिया.

रात को पंडित पूरा सामान ले कर चौराहे पर रखने के लिए चल दिया. हवा के झोंके, झींगुरों का शोर और उल्लुओं की डरावनी आवाजें रात के सन्नाटे को चीर रही थीं.

पंडित जैसे ही चौराहे से 30 फुट की दूरी पर पहुंचा, उसी समय वहां 15-16 फुट ऊंची मीनार सी मूर्ति नजर आने लगी. वह कभी छोटी हो जाती तो कभी बड़ी. उस में से घुंघरू की खनखनाती आवाज भी आ रही थी. पंडित यह सब देख कर बुरी तरह घबरा गया. हिम्मत कर के उस ने पूछा, ‘‘क… क… कौन है तू?’’

‘‘मैं चौराहे की काली हूं,’’ मीनार से घुंघरूओं की झंकार के साथ एक डरावनी आवाज निकली. ‘‘तू… तू… क्या चाहती है?’’

‘‘मैं तुझे खाना चाहती हूं,’’ मीनार में से फिर आवाज आई. ‘‘क… क… क्यों? मेरी क्या गलती है?’’ पंडित ने डरते हुए पूछा.

‘‘क्योंकि तू ने लोगों से बहुत पैसा ऐंठा है. अब मैं तेरे खून से अपनी प्यास बुझाऊंगी,’’ कहतेकहते काली धीरेधीरे नजदीक आ रही थी. पंडित के हाथों से सामान तो पहले ही छूट चुका था. ज्यों ही उस ने मुड़

कर पीछे की तरफ भागना चाहा, उस का पैर धोती में अटक गया और वह

गिर पड़ा. जब पंडित को होश आया तो उस ने अपनेआप को बिस्तर पर पाया. वह उस समय भी चिल्लाने लगा, ‘‘बचाओ… बचाओ… चौराहे की काली मुझे खा जाएगी…’’

‘‘कौन खा जाएगी? कैसी काली पंडितजी?’’ पंडित के कानों में धर्म सिंह की आवाज गूंजी. पंडित ने आंखें खोलीं तो अपने सामने धर्म सिंह व गांव के तमाम लोगों को खड़ा पाया. पंडित फिर बोला, ‘‘चौराहे की काली.’’

‘‘नहीं पंडितजी, आप बिना वजह ही डर गए हैं. वह काली नहीं थी,’’ धर्म सिंह ने पंडित को थपथपाते हुए कहा. ‘‘तो फिर कौन थी वह?’’

‘‘वहां मैं था पंडितजी, आप तो यों ही डर रहे हैं,’’ धर्म सिंह ने कहा. ‘‘पर वह तो… कभी छोटी तो कभी बड़ी और घुंघरुओं की आवाज…’’ पंडित बड़बड़ाया, ‘‘न… न… नहीं, तुम नहीं हो सकते.’’

‘‘क्यों नहीं हो सकता? मैं वही नजारा फिर दिखा सकता हूं,’’ इतना कह कर धर्म सिंह काला कपड़ा लगा लंबा बांस, जिस में घुंघरू लगे थे, ले आया. उस ने बांस से कपड़ा कभी ऊंचा उठाया तो कभी नीचा किया और खुद को बीच में छिपा लिया. तब जा कर पंडित को यकीन हुआ कि वह काली नहीं थी.

धर्म सिंह ने पंडित से कहा, ‘‘इस दुनिया में न तो भूत हैं और न ही चुड़ैल. यह सारा चक्कर तो सरासर मक्कारी और फरेब का है.’’

Family Story : हल – आखिर नवीन इरा से क्यों चिढ़ता था ?

Family Story : इरा कल रात के नवीन के व्यवहार से बेहद गुस्से में थी. अब मुख्यमंत्री की प्रैस कौन्फ्रैंस हो और वह मुख्य जनसंपर्क अधिकारी हो कर जल्दी कैसे घर आ सकती थी. पर नहीं. नवीन कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. माना लौटने में रात के 11 बज गए थे, लेकिन मुख्यमंत्री को बिदा करते ही वह घर आ गई थी. नवीन के मूड ने उसे वहां एक भी निवाला गले से नीचे नहीं उतारने दिया. दिनभर की भागदौड़ से थकी जब वह रात को भूखी घर आई, तो मन में कहीं हुमक उठी कि अम्मां की तरह कोई उसे दुलारे कि नन्ही कैसे मुंह सूख रहा है तुम्हारा. चलो हम खाना परोस दें. लेकिन कहां वह कोमलता और ममत्व की कामना और कहां वास्तविकता में क्रोध से उबलता चहलकदमी करता नवीन. उसे देखते ही उबल पड़ा, ‘‘यह वक्त है घर आने का? 12 बज रहे हैं?’’

‘‘आप को पता तो था आज सीएम की प्रैस कौन्फ्रैंस थी. आप की नाराजगी के डर से मैं ने वहां खाना भी नहीं खाया और आप हैं कि…’’ इरा रोआंसी हो आई थी.

‘‘छोड़ो, आप का पेट तो लोगों की सराहना से ही भर गया होगा. खाने के लिए जगह ही कहां थी? हम ने भी बहुत सी प्रैस कौन्फ्रैंस अटैंड की हैं. सब जानते हैं महिलाओं की उपस्थिति वहां सिर्फ वातावरण को कुछ सजाए रखने से अधिक कुछ नहीं?’’

‘‘शर्म करो… जो कुछ भी मुंह में आ रहा है बोले चले जा रहे हो,’’ इरा साड़ी हैंगर में लगाते हुए बोली.’’

‘‘इस घर में रहना है, तो समय पर आनाजाना होगा… यह नहीं कि जब जी चाहा घर से चली गई जब भी चाहा चली आई. यह घर है कोई सराय नहीं.’’

‘‘क्या मैं तफरीह कर के आ रही हूं? तुम इतने बड़े व्यापारिक संस्थान में काम करते हो, तुम्हें नहीं पता, देरसबेर होना अपने हाथ की बात नहीं होती?’’ इरा को इस बेमतलब की बहस पर गुस्सा आ रहा था.

गुस्से से उस की भूख और थकान दोनों ही गायब हो गई. फिर कौफी बना कप में डाल कर बच्चों के कमरे में चली गई. दोनों बच्चे गहरी नींद में सो रहे थे.

इरा ने शांति की सांस ली. नवीन की टोकाटाकी उस के लिए असहनीय हो गई थी.

फोन किसी का भी हो, नवीन के रहते आएगा तो वही उठाएगा. फोन पर पूरी जिरह करेगा क्या काम है? क्या बात करनी है? कहां से बोल रहे हो?

लोग इरा का कितना मजाक उड़ाते हैं. नवीन को उस का जेलर कहते हैं. कुछ लोगों की नजरों में तो वह दया की पात्र बन गई है.

इरा सोच कर सिहर उठी कि अगर ये बातें बच्चे सुनते तो? तो क्या होती उस की छवि बच्चों की नजरों में. वैसे जिस तरह के आसार हो रहे हैं जल्द ही बच्चे भी साक्षी हो जाएंगे ऐसे अवसरों के. इरा ने कौफी का घूंट पीते हुए

निर्णय लिया, बस और नहीं. उसे अब नवीन के साथ रह कर और अपमान नहीं करवाना है. पुरुष है तो क्या हुआ? उसे हक मिल गया है

उस के सही और ईमानदार व्यवहार पर भी आएदिन प्रश्नचिन्ह लगाने का और नीचा दिखाने का…अब वह और देर नहीं करेगी. उसे जल्द से जल्द निर्णय लेना होगा वरना उस की छवि बच्चों की नजरों में मलीन हो जाएगी. इसी ऊहापोह में कब वह वहीं सोफे पर सो गई पता ही नहीं चला.

अगले दिन बच्चों को स्कूल भेजा. नवीन ऐसा दिखा रहा था मानो कल की रात रोज गुजर जाने वाली सामान्य सी रात थी. लेकिन इरा का व्यवहार बहुत सीमित रहा.

इरा को 9 बजे तक घर में घूमते देख, नवीन बोला, ‘‘क्या आज औफिस नहीं जाना है? आज छुट्टी है? अभी तक तैयार नहीं हुई.’’

‘‘मैं ने छुट्टी ली है,’’ इरा ने कहा.

‘‘तुम्हारी तबीयत तो ठीक लग रही है, फिर छुट्टी क्यों?’’ नवीन ने पूछा.

‘‘कभीकभी मन भी बीमार हो जाता है इसीलिए,’’ इरा ने कसैले स्वर में कहा.

‘‘समझ गया,’’ नवीन बोला, ‘‘आज तुम्हारा मन क्या चाह रहा है. क्यों बेकार में अपनी छुट्टी खराब कर रही हो, जल्दी से तैयार हो जाओ.’’

‘‘नहीं,’’ इरा बोली, ‘‘आज मैं किसी हाल में भी जाने वाली नहीं हूं,’’ इरा की आवाज में जिद थी. नवीन कार की चाबी उठाते हुए बोला, ‘‘ठीक है तुम्हारी मरजी.’’

बच्चों और पति को भेजने के बाद वह देर तक घर में इधरउधर चहल कदमी करती रही. उस का मन स्थिर नहीं था. अगर नवीन की नोकझोंक से तंग आ कर नौकरी छोड़ भी दूं तो क्या भरोसा कि नवीन के व्यवहार में अंतर आएगा या फिर बात का बतंगड़ नहीं बनाएगा… लड़ने वाले को तो बहाने की भी जरूरत नहीं होती. नवीन के पिता के इसी कड़वे स्वभाव के कारण ही उस की मां हमेशा घुटघुट कर जी रही थीं. पैसेपैसे के लिए उन्हें तरसा कर रखा था नवीन के पिता ने.

अपनी मरजी से हजारों उड़ा देंगे. नवीन की नजरों में उस के पिता ही उस के आदर्श पुरुष थे और मां का पिता से दब कर रहना ही नवीन के लिए मां की सेवा और बलिदान था.

इरा जितना सोचती उतना ही उलझती जाती, उसे लग रहा था अगर वह इसी तरह मानसिक तनाव और उलझन में रही तो पागल हो जाएगी. हर जगह सम्मानित होने वाली इरा अपने ही घर में यों प्रताडि़त होगी उस ने सोचा भी न था. असहाय से आंसू उस की आंखों में उतर आए. अचानक उस की नजर घड़ी पर पड़ी. अरे, डेढ़ बज गया… फटाफट उठ कर नहाने के लिए गई. वह बच्चों को अपनी पीड़ा और अपमान का आभास नहीं होने देना चाहती थी. नहा कर सूती साड़ी पहन हलका सा मेकअप किया. फिर बच्चों के लिए सलाद काटा, जलजीरा बनाया, खाने की मेज लगाई.

दोनों बेटे मां को देख कर खिल उठे. बिना छुट्टी के मां का घर होना उन के लिए कोई पर्व सा बन जाता है. तीनों ने मिल कर खाना खाया. फिर बच्चे होमवर्क करने लग गए.

5 बजे के लगभग इरा को याद आया कि उस की सहेली मानसी पाकिस्तानी नाटक का वीडियो दे कर गई थी. बच्चे होमवर्क कर चुके थे. इरा ने उन्हें नाटक देखने के लिए आवाज लगाई. दोनों बेटे उस की गोदी में सिर रख कर नाटक देख रहे थे. अजीब इत्तफाक था. नाटक में भी नायिका अपने पति की ज्यादतियों से

तंग आ कर अपने अजन्मे बच्चे के संग घर छोड़ कर चली जाती है हमेशा के लिए.

इरा की तरफ देख कर अपूर्व बोला, ‘‘मां, आप ये रोनेधोने वाली फिल्में मत देखा करो. मन उदास हो जाता है.’’

‘‘मन उदास हो जाता है इसीलिए नहीं देखनी चाहिए?’’ इरा ने सवाल किया.

‘‘बेकार का आईडिया है एकदम,’’ अपूर्व खीज कर बोला, ‘‘इसीलिए नहीं देखनी चाहिए?’’

‘‘अपूर्व,’’ इरा ने कहा, ‘‘समझो इसी औरत की तरह अगर हम भी घर छोड़ना चाहें तो तुम किस के साथ रहोगे?’’

‘‘कैसी बेकार की बातें करती हैं आप भी मां,’’ अपूर्व नाराजगी के साथ बोला, ‘‘आप ऐसा क्यों करेंगी?’’

‘‘यों समझो कि हम भी तुम्हारे पापा के साथ इस घर में नहीं रह सकते तो तुम किस के साथ रहोगे?’’ इरा ने पूछा.

‘‘जरूरी नहीं है कि आप के हर सवाल का जवाब दिया जाए,’’ 13 वर्ष का अपूर्व अपनी आयु से अधिक समझदार था.

‘‘अच्छा अनूप तुम बताओ कि तुम क्या करोगे?’’ इरा ने छोटे बेटे का मन टटोला.

अनूप को बड़े भाई पर बड़प्पन दिखाने का अवसर मिल गया. बोला, ‘‘वैसे तो हम

चाहते हैं कि आप दोनों साथ रहें? लेकिन अगर आप जा रही हैं तो हम आप के साथ चलेंगे. हम आप को बहुत प्यार करते हैं,’’ अनूप बोला, ‘‘चल झूठे…’’ अपूर्र्व बोला, ‘‘मां, अगर पापा आप की जगह होते तो यह उन्हीं को भी यही जवाब देता.’’

‘‘नहीं मां, भैया झूठ बोल रहा है. यही पापा के साथ जाता. पापा हमें डांटते हैं. हमें नहीं रहना उन के साथ. आप हमें प्यार करती हैं. हम आप के साथ रहेंगे,’’ अनूप प्यार से इरा के गले में बांहें डालते हुए बोला.

‘‘डांटते तो हम भी है,’’ इरा ने पूछा, ‘‘क्या तब तुम हमारे साथ नहीं रहोगे?’’

‘‘आप डांटती हैं तो क्या हुआ, प्यार भी तो करती हैं, फिर आप को खाना बनाना भी आता है. पापा क्या करेंगे?’’ अगर नौकर नहीं होगा तो? अनूप ने कहा.

‘‘अच्छा अपूर्व तुम जवाब दो,’’ इरा ने अपूर्व के सिर पर हाथ रख कर उस का मन फिर से टटोलना चाहा.

इरा का हाथ सिर से हटा कर अपूर्र्व एक ही झटके में उठ बैठा. बोला, ‘‘आप उत्तर चाहती हैं तो सुन लीजिए, हम आप दोनों के साथ ही रहेंगे.’’

इरा हैरत से अपूर्व को देखने लगी. फिर पूछा, ‘‘अरे, ऐसा क्यों?’’

‘‘जब आप और पापा 15 साल एकदूसरे के साथ रह कर भी एकदूसरे के साथ नहीं रह सकते, अलग होना चाहते हैं तब हम तो आप के साथ 12 साल से रह रहे हैं. हमें आप कैसे जानेंगे? आप और पापा अगर अलग हो रहे हैं तो हमें होस्टल भेज देना, हम आप दोनों से ही नहीं मिलेंगे,’’ अपूर्व तिलमिला उठा था.

‘‘पागल है क्या तू?’’ इरा हैरान थी, ‘‘नहीं बिलकुल नहीं. इतने वर्षों साथ रह कर भी आप को एकदूसरे का आदर करना, एकदूसरे को अपनाना नहीं आया, तो आप हमें कैसे अपनाएंगे.

‘‘पापा आप का सम्मान नहीं करते तभी आप को घर छोड़ कर जाने देंगे. आप पापा को और घर को इतने सालों में भी समझा नहीं पाईं तभी घर छोड़ कर जाने की बात कर सकती हैं. इसलिए हम आप दोनों का ही आदर नहीं कर सकेंगे और हम मिलना भी नहीं चाहेंगे आप दोनों से,’’ अपूर्व के चेहरे पर उत्तेजना और आक्रोश झलक रहा था.

इरा ने अपूर्व के कंधे को कस कर पकड़ लिया. उस का बेटा इतना समझदार होगा उस ने सोचा भी नहीं था. नवीन से अलग हो कर उस ने सोचा भी नहीं था कि अपने बेटे की नजरों में वह इतनी गिर जाएगी. अगर नवीन उसे सम्मान नहीं दे रहा, तो वह भी अलग हो रही है नवीन का तिरस्कार कर के. इस से वह नवीन को भी तो अपमानित कर रही है. परिवार टूट रहा है, बच्चे असंतुलित हो रहे हैं. वह विवाहविच्छेद नहीं करेगी. उस के आशियाने के तिनके उस के आत्मसम्मान की आंधी में नहीं उड़ेंगे. उसे नवीन के साथ अब किसी अलग ही धरातल पर बात करनी होगी.

अकसर ही नवीन झगड़े के बाद 2-4 दिन देर से घर आता है. औफिस में अधिक काम

का बहाना कर के देर रात तक बैठा रहता.

इरा उस की इस मानसिकता को अच्छी तरह समझती है.

इरा ने औफिस से 10 दिनों का अवकाश लिया. नवीन 2-4 दिन तटस्थता से इरा का रवैया देखता रहा. फिर एक दिन बोला, ‘‘ये बेमतलब की छुट्टियां क्यों ली जा रही हैं?’’

छुट्टियां खत्म हो जाएंगी तो हाफ पे ले लूंगी, जब औफिस जाना ही

नहीं है तो पिछले काम की छुट्टियों का हिसाब पूरा कर लूं,’’ इरा ने स्थिर स्वर में कहा.

‘‘किस ने कहा तुम औफिस छोड़ रही हो?’’ नवीन ने ऊंचे स्वर में कहा, ‘‘मैडम, आजकल नौकरी मिलती कहां है जो तुम यों आराम से लगीलगाई नौकरी को लात मार रही हो?’’

‘‘और क्या करूं?’’ इरा ने सपाट स्वर में कहा, ‘‘जिन शर्तों पर नौकरी करनी है वह मेरे बस के बाहर की बात है.’’

‘‘कौन सी शर्तें?’’ ‘‘नवीन ने अनजान बनते हुए पूछा.’’

‘‘देरसबेर होना, जनसंपर्क के काम में सभी से मिलनाजुलना होता है, वह भी तुम्हें पसंद

नहीं. कैरियर या होम केयर में से एक का चुनाव करना था. सो मैं ने कर लिया. मैं ने नौकरी छोड़ने का निर्णय कर लिया है,’’ इरा ने अपना फैसला सुनाया.

‘‘क्या बच्चों जैसी जिद करती हो,’’ नवीन झल्लाई आवाज में बोला, ‘‘एक जने की सैलरी में घरखर्च और बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी?’’

‘‘पर नौकरी छोड़ कर तुम सारा दिन करोगी क्या?’’ नवीन को समझ नहीं आ रहा था कि वह किस तरह इरा का निर्णय बदले.

‘‘जैसे घर पर रहने वाली औरतें खुशी से दिन बिताती हैं. टीवी, वीडियो, ताश, बागबानी, कुकिंग, किटी पार्टी हजार तरह के शौक हैं. मेरा भी टाइम बीत जाएगा. टाइम काटना कोई समस्या नहीं है,’’ इरा आराम से दलीलें दे रही थी.

‘‘तुम्हारा कितना सम्मान है, तुम्हारे और मेरे सर्किल में लोग तुम्हें कितना मानते हैं. कितने लोगों के लिए तुम प्रेरणा हो, सार्थक काम कर रही हो,’’ नवीन ने इरा को बहलाना चाहा.

‘‘तो क्या इस के लिए मैं घर में रोजरोज कलहकलेश सहूं, नीचा देखूं, हर बात पर मुजरिम की तरह कठघरे में खड़ी कर दी जाऊं बिना किसी गुनाह के?

‘‘क्यों सहूं मैं इतना अपमान इस नौकरी के लिए? इस के बिना भी मैं खुश रह सकती हूं. आराम से जी सकती हूं,’’ इरा ने बिना किसी तनाव के अपना निर्णय सुनाया.

‘‘इरा आई एम वैरी सौरी, मेरा मतलब तुम्हें अपमानित करने का नहीं था. जब भी तुम्हें आने में देर होती है मेरा मन तरहतरह की आशंकाओं से घिर जाता है. उसी तनाव में तुम्हें बहुत कुछ उलटासीधा बोल दिया होगा. मुझे माफ कर दो. मेरा इरादा तुम्हें पीड़ा पहुंचाने या अपमानित करने का नहीं था,’’ नवीन के चेहरे पर पीड़ा और विवशता दोनों झलक रही थीं.

‘‘ठीक है कल से काम पर चली जाऊंगी. पर उस के लिए आप को भी वचन देना होगा कि इस स्थिति को तूल नहीं देंगे. मैं नौकरी करती हूं. मेरे लिए भी समय के बंधन होते हैं. मुझे भी आप की तरह समय और शक्ति काम के प्रति लगानी पड़ती है. आप के काम में भी देरसबेर होती ही है पर मैं यों शक कर के क्लेश नहीं करती,’’ कहतेकहते इरा रोआंसी हो उठी.

‘‘यार कह दिया न आगे से ऐसा नहीं करूंगा. अब बारबार बोल कर क्यों नीचा दिखाती हो,’’ इरा का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम कर नवीन ने कहा.

इरा सोच रही थी कि रिश्ता तोड़ कर अलग हो जाना कितना सरल हल लग रहा था. लेकिन कितना पीड़ा दायक. परिवार के टूटने का त्रास सहन करना क्या आसान बात थी. मन ही मन वह अपने बेटे की ऋणी थी, जिस की जरा सी परिपक्वता ने यह हल निकाल दिया था, उस की समस्या का.

Parenting Tips : दो बच्चों का सिंगल पेरैंट हूं, बेटी पहली क्लास में गई है

Parenting Tips : 2 महीने हो गए हैं. अकसर सिर में दर्द की शिकायत करती है. डाक्टर को दिखा दिया. एमआरआई रिपोर्ट ठीक आई है फिर भी सिरदर्द हो रहा है. बेटा नर्सरी में है. मेरी मां ही बच्चों की देखभाल करती है. मैं बच्चों का पूरा ध्यान रखता हूं. बेटी की इस समस्या से परेशान हूं?

जवाब : आप की बेटी के सिरदर्द की शिकायत के कई कारण हो सकते हैं भले ही रिपोर्ट सामान्य हो. 6 साल की उम्र में बच्चे कई बार शारीरिक या मानसिक कारणों से ऐसी शिकायतें करते हैं.

क्या आप की बेटी पर्याप्त नींद ले रही है? बच्चों को 9 से 11 घंटे की नींद चाहिए. नींद पूरी न होने पर सिरदर्द हो सकता है. डिहाइड्रेशन भी सिरदर्द का कारण हो सकता है. सुनिश्चित करें कि वह दिनभर पर्याप्त पानी पी रही हो. कभीकभी आंखों का नंबर या तनाव सिरदर्द का कारण बनता है. एक बार आंखों का टैस्ट करवा लें. असंतुलित खानपान या लंबे समय तक भूखे रहने से भी सिरदर्द हो सकता है. उस का खानपान नियमित और पौष्टिक रखें.

आप ने बताया कि आप सिंगल पेरैंट हैं और आप की मां बच्चों की देखभाल करती हैं. आप की बेटी शायद मां की कमी महसूस करती हो या घर के माहौल में कोई तनाव हो. बच्चे कई बार भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते और सिरदर्द जैसी शिकायत करते हैं. आप का बेटा भी है, हो सकता है कि बेटी को लगता हो कि उसे कम ध्यान मिल रहा है. बच्चे अनजाने में शारीरिक शिकायतों के जरिए ध्यान मांगते हैं.

वह स्कूल जाती है तो वहां का कोई तनाव (जैसे पढ़ाई, दोस्तों के साथ झगड़ा) भी कारण हो सकता है. उस से बातचीत करें. उस से प्यार से पूछें कि वह स्कूल, दोस्तों या घर में कैसा महसूस करती है.

अगर सिरदर्द की शिकायत बारबार हो रही है और कोई शारीरिक कारण नहीं मिल रहा, तो हां, एक बाल मनोवैज्ञानिक से मिलना अच्छा रहेगा. वे बच्चे के व्यवहार और भावनाओं को सम झ कर सही सलाह दे सकते हैं. आप अकेले पेरैंटिंग कर रहे हैं जो आसान नहीं है. अपनी मां से भी बात करें कि क्या वे बेटी के व्यवहार में कुछ असामान्य देखती हैं. धैर्य रखें और बेटी को अतिरिक्त समय व प्यार दें

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Social Media Trolls : ट्रोल आर्मी नहीं, ये जौम्बी सेना है

Social Media Trolls : देश की सुरक्षा के लिए आर्मी होती है जो देश की सीमाओं की रक्षा के लिए दिनरात मुस्तैदी से काम करती है लेकिन इधर कुछ वर्षों से देश में एक और आर्मी का गठन हुआ है जो सत्ता के नैरेटिव की सुरक्षा के लिए दिनरात काम कर रही है. सत्ता के खिलाफ बोलने वालों पर यह ट्रोल आर्मी जौम्बी की तरह टूट पड़ती है. कौन हैं ये जौम्बी आर्मी के लोग, पढ़िए.

देश का सैनिक देश की सुरक्षा के लिए शहीद होता है और इस ट्रोल आर्मी के सिपाही शहीदों की पत्नियों को गालियां बकते हैं उन का चरित्रहरन करते हैं निर्लज्जता की सारी सीमाओं को पार कर ये लोग सरेआम महिलाओं की इज्जत को तारतार करते हैं.

हिमांशी नरवाल के खिलाफ ट्रोल आर्मी की हैवानियत

पहलगाम में 22 अप्रैल को आतंकियों ने हमला कर दिया था, जिस में लैफ्टिनेंट विनय नरवाल की भी मौत हो गई थी. आतंकियों द्वारा किए इस जघन्यतम वारदात के बाद मेनस्ट्रीम मीडिया ने जम कर नफरत फैलाई. हिंदूमुसलिम के नफरती नैरेटिव को फैलाने में मेनस्ट्रीम मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

इस बीच लैफ्टिनेंट विनय नरवाल की विधवा पत्नी हिमांशी नरवाल ने 1 मई को एएनआई को दिए एक बयान में हिंदूमुसलिम के नैरेटिव की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि ‘जिन लोगों ने गलत किया है, उन्हें सजा मिलनी चाहिए लेकिन हम नहीं चाहते कि लोग कश्मीरियों और मुसलिमों से नफरत करें.’

हिमांशी नरवाल के इस बयान के बाद ट्रोल आर्मी सक्रिय हो गई. हिमांशी को भद्दीभद्दी गालियां दी जाने लगीं. हिमांशी का चरित्रहरण किया जाने लगा. हिमांशी के खिलाफ सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी ने बेशर्मी और हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं.

आखिरकार राष्ट्रीय महिला आयोग ने संज्ञान लिया और कहा कि “किसी महिला को उस की वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए ट्रोल करना किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है. लैफ्टिनेंट विनय नरवाल की मौत के बाद जिस तरह से उन की पत्नी हिमांशी नरवाल को उन के एक बयान को ले कर सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है, वह बेहद निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है. किसी भी सहमति या असहमति को शालीनता और संविधान के दायरे में रह कर व्यक्त किया जाना चाहिए.”

धर्म और जाति नहीं मानने की सजा

कोलकाता की 17 साल की सृजनी नाम की लड़की जिस ने आईएससी बोर्ड में 400 में 400 नंबर प्राप्त कर पूरे पश्चिम बंगाल का नाम रौशन किया है. सृजनी को उस की इस उपलब्धि के लिए देशभर से सराहना मिल रही हैं वहीं ट्रोल आर्मी इस लड़की के पीछे पड़ गई है कारण यह है कि सृजनी ने बोर्ड फार्म में जहां धर्म लिखना था, वहां लिखा “मानवता”, जहां सरनेम था, उसे खाली छोड़ दिया.

गूगल पर सृजनी का इतिहास खंगाला जाने लगा और ग्रोक एआई से बैकग्राउंड निकाल लिया गया. मां प्रोफैसर निकली और पिता साइंटिस्ट, वह भी भटनागर अवार्ड विनर. एक रिपोर्टर के पूछे जाने पर सृजनी ने जो कहा वो ट्रोल आर्मी के लिए काफी था. “मैं धर्म, जाति या जैंडर से नहीं बल्कि इंसान होने से पहचानी जाऊं. यही मेरी पहचान है.”

ऐसा कह कर सृजनी ने धर्म और जाति के नाम पर फैलाए गए नैरेटिव को चुनौती दे डाली. जो लोग भारत को धर्म और जाति में बांटना चाहते हैं सृजनी ने उन्हें एक खाली कालम से हरा दिया. जौम्बी आर्मी को मिर्ची लग गई. 17 साल की होनहार छात्रा को गालियां दी जाने लगीं. सृजनी के मांबाप को भी नहीं बक्शा जा रहा. संस्कारों की ठेकेदारी करने वाली ट्रोल आर्मी नंगानाच करने लगी.

राजनैतिक स्वार्थों के लिए ट्रोल आर्मी का सहारा

सत्ता को हथियाने के लिए और सत्ता में बने रहने के लिए राजनैतिक दलों को अपनी विचारधारा के पक्ष में कई झूठे नैरेटिव गढ़ने पड़ते हैं और जनता इस झूठे नैरेटिव को सच समझ कर उन्हें सर आंखों पर बिठाए रखे इस के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं.

मेनस्ट्रीम मीडिया पर कंट्रोल हो जाए तो सत्ता के झूठे नैरेटिव का व्यापक प्रचार होता है और जनता के दिमागों तक वहीं खबरें पहुंचाई जाती हैं जो सत्ता के झूठे नैरेटिव को सच साबित करती हैं. कांग्रेस के दौर में भी ऐसा होता था जब मेनस्ट्रीम मीडिया सत्ता के नैरेटिव को जनता के सामने आखिरी सच की तरह पेश करती थी.

2014 के बाद देश में बीजेपी की सत्ता आई जिस के पास अपनी विचारधारा थी. धर्म और राष्ट्रवाद के घालमेल से नएनए नैरेटिव गढ़े गए और मेनस्ट्रीम मीडिया का इस्तेमाल कर जनता के दिमाग तक पहुंचाया गया और जनता को बरगलाने के लिए पिछले 11 वर्षों से लगातार यह प्रयास चल रहा है लेकिन इस बीच सोशल मीडिया भी मजबूत हुआ है जिस से सत्ता के झूठे नैरेटिव की पोल खुलते देर नहीं लगती.

सत्ता के पक्ष में मेनस्ट्रीम मीडिया के द्वारा फैलाए गए झूठ पर तुरंत प्रतिक्रिया होती है और सच बाहर आ जाता है. विपक्षी दलों या सत्ता के नैरेटिव के खिलाफ सोशल मीडिया पर बोलने वाले लोगों पर कंट्रोल करना सरकार के लिए संभव नहीं है इसलिए एक ऐसी ट्रोल आर्मी बनाई गई है जो ऐसे लोगों के खिलाफ मोर्चा खोले रहती है और नीचता की हद तक जा कर उन का चरित्रहरण करती है.

महिला हो, विकलांग हो, विद्यार्थी हो, एथलीट हों, सैनिकों की विधवाएं हों या बूढ़े लोग यह ट्रोल आर्मी किसी को नही छोड़ती. इस ट्रोल आर्मी के पास न कोई नैतिकता होती है और न ही कोई शर्म.

Sexual Problem : मैं अपनी सैक्सुअलिटी को ले कर बहुत कन्फ्यूज्ड हूं

Sexual Problem : मैं प्राइवेट सैक्टर में जौब करता हूं, 30 साल का हो गया हूं. घर में पेरैंट्स शादी करने के लिए दबाव डाल रहे हैं. मुझे कभी किसी लड़की में दिलचस्पी नहीं रही. 2 साल पहले औफिस के पुरुष कलीग से बहुत गहरी दोस्ती हो गई थी. इस बात से मैं इतना परेशान हो गया कि नौकरी ही बदल ली. मैं शादी कर के किसी लड़की की जिंदगी बरबाद नहीं करना चाहता. मैं पेरैंट्स का इकलौता बेटा हूं. उन के प्रति भी मेरी जिम्मेदारियां हैं. इन सब परेशानियों की वजह से मेरा कैरियर प्रभावित हो रहा है. कृपया मेरी उल झन को सुल झाएं.

जवाब : आप की बात को ध्यान से पढ़ने व समझने के बाद यह साफ हुआ कि आप एक गहरे भावनात्मक और मानसिक द्वंद्व से गुजर रहे हैं. यह बहुत बड़ी बात है कि आप अपनी भावनाओं को खुलेपन से व्यक्त कर रहे हैं. सैक्सुअलिटी को ले कर कन्फ्यूजन होना असामान्य बात नहीं है खासकर तब जब समाज और परिवार की अपेक्षाएं हम पर हावी हो जाती हैं. आप ने बताया कि आप को कभी किसी लड़की में दिलचस्पी नहीं रही और एक पुरुष मित्र के साथ आप की गहरी दोस्ती हुई, जिस ने आप को परेशान कर दिया. यह संकेत हो सकता है कि आप की सैक्सुअलिटी ‘होमोसैक्सुअल’ (समलैंगिक) हो.

यह आत्मस्वीकृति का सफर धीरेधीरे और अपने समय पर होता है. खुद से सवाल करें कि आप सचमुच क्या चाहते हैं. बिना किसी दबाव के, सिर्फ अपने दिल की सुनें. दूसरी ओर, मातापिता का शादी के लिए दबाव डालना भारतीय परिवारों में आम है, खासकर जब आप उन की इकलौती संतान हैं.

शादी कर के किसी की जिंदगी बरबाद न करने की आप की सोच का मतलब है कि आप न सिर्फ अपने बारे में, बल्कि दूसरों के बारे में भी सोचते हैं. कुछ सु झाव जो आप की मदद कर सकते हैं. अपनी सैक्सुअलिटी को सम झने के लिए जल्दबाजी न करें. यह एक निजी यात्रा है और इस में आत्मचिंतन की जरूरत होती है. अगर संभव हो तो किसी भरोसेमंद दोस्त या काउंसलर से बात करें, जो आप को बिना जज किए सुन सके.

अपने मातापिता से खुल कर बात करें. यह मुश्किल हो सकता है, लेकिन उन्हें बताएं कि आप अभी शादी के लिए तैयार नहीं हैं. आप को अपनी सैक्सुअलिटी के बारे में पूरी बात बताने की जरूरत नहीं है, अगर आप सहज नहीं हैं. बस, इतना कहें कि आप अपने कैरियर और जिंदगी को ले कर कुछ और समय चाहते हैं. धीरेधीरे उन्हें अपनी सोच के लिए तैयार करें.

अगर आप को लगता है कि आप पुरुषों की ओर आकर्षित हैं तो इस में शर्मिंदगी या ग्लानि की कोई बात नहीं है.

आप अकेले नहीं हैं, दुनिया में लाखों लोग हैं जो समलैंगिक हैं और सुखी, सफल जिंदगी जी रहे हैं. भारत में परिवार और समाज अभी भी समलैंगिकता को ले कर बहुत जागरूक नहीं हैं. लेकिन समय के साथ चीजें बदल रही हैं. 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को हटा कर समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता दी. इस का मतलब है कि आप के पास अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने का हक है.

भविष्य में अगर आप चाहें तो ऐसा साथी ढूंढ़ सकते हैं जो आप को सम झे और जिस के साथ आप सुखी रहें या अगर आप अकेले रहना पसंद करें तो भी आप अपनी जिंदगी को अपने शौक, दोस्ती और लक्ष्यों से भरपूर बना सकते हैं.

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Mahabodhi Temple Controversy : हर धर्म के मामले में हिंदुओं की अड़ंगी

Mahabodhi Temple Controversy : लड़ाई या विवाद सिर्फ इतना सा है कि ब्राह्मण पंडेपुजारी महाबोधि मंदिर से अपनी दुकान समेटना नहीं चाहते क्योंकि यह मंदिर उन के लिए दुधारू गाय सरीखा है. दूसरी तरफ बौद्ध भिक्षु इस मंदिर में पिंडदान और दूसरे कर्मकांडों से व्यथित हैं. मंदिर उन का है लेकिन पूर्ण आधिपत्य उन का नहीं. ऐसे में उन का विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक है जिस के भविष्य में विस्फोटक या उग्र हो जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

वक्फ मामले में दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान 16 अप्रैल को उस वक्त दिलचस्प मोड़ आया था जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने बेहद तल्ख और साफ लहजे में यह पूछा था कि क्या आप कह रहे हैं कि अब से आप हिंदुओं के ट्रस्ट या दान प्रबंधन करने वाले बोर्ड में मुसलिमों को शामिल करने की अनुमति देंगे, साफसाफ बताइए. इस अप्रत्याशित सवाल पर सरकार की ओर से पैरवी कर रहे सौलीसिटर जनरल तुषार मेहता कुछ देर के लिए सकपकाए, फिर संभल कर बोले थे कि संपत्ति के प्रबंधन और धार्मिक मामलों से जुड़े मामलों में फर्क करना होगा.

जाहिर है, इस दलील में कोई दम नहीं था लेकिन, हां, मेहता अपने तजरबे के दम पर बात को एक खुबसूरत से मोड़ पर ले जाने में कामयाब रहे थे पर वह मोड़ इस अफसाने का अंजाम नहीं था. इसलिए 17 अप्रैल को इस मामले को उबाऊ ढंग से भी देख और सुन रहे लोगों ने सब से बड़ी अदालत के इस सवाल का जवाब अपनेअपने ढंग से अपनेआप ही को देने की कोशिश की थी लेकिन वे भी खी झ और लड़खड़ा कर रह गए थे.

लड़खड़ाने की वजहें धार्मिक थीं कि जिस धर्म के सब से बड़े आयोजन कुंभ में मुसलिमों का प्रवेश वर्जित हो, जिस के धीरेंद्र शास्त्री जैसे दर्जनों धर्मगुरु आएदिन यह फतवा जारी करते रहते हों कि हिंदू मंदिरों के बाहर मुसलमानों को दुकान नहीं लगाने देंगे, और तो और, आएदिन ही खासतौर से हिंदू तीजत्योहारों पर सोशल मीडिया पर इस आशय की अपीलें जारी की जाती हों कि मुसलमानों से सामान नहीं खरीदना है, हमें उन का आर्थिक बहिष्कार कर उन की कमर तोड़नी है, उस धर्म से यह उम्मीद करना बेकार है कि वह अपने ट्रस्टों में या दान प्रबंधन करने वाले बोर्डों में मुसलिम तो मुसलिम किसी और अल्पसंख्यक धर्म को झांकने देंगे. मंदिरों के खजानों की तरफ तो पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और औरतों तक के लिए नो एंट्री की तख्ती सदियों से लटकी है.

शायद ही कभी किसी ने देखासुना या महसूस किया हो कि किसी मंदिर की दानपेटी खोल कर दक्षिणा गिनने वालों में इन तबकों का कोई सदस्य शामिल भी था.

लेकिन खुद हिंदू अल्पसंख्यक धर्मों के मामलों में अपनी टांग फंसाने का कोई मौका नहीं छोड़ते. ताजी मिसाल बिहार के बोधगया मंदिर की है जहां फरवरी के महीने से बौद्ध धर्म के अनुयायी मांग कर रहे हैं कि बीटीए को निरस्त किया जाए. बौद्धों को महाबोधि महाविहार दें. बीटीए संविधान विरोधी है.

क्या है बीटीए

बीटीए का पूरा नाम बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 बिहार विधानसभा द्वारा बनाया एक ऐसा कानून है जिस के तहत बौद्धों और हिंदुओं के बीच एक समिति बोधगया मंदिर प्रबंधन समिति यानी बीटीएमसी बनाई गई थी. जिस के 8 सदस्यों में से 4 बौद्ध और 4 हिंदू होते हैं. ये सभी बिहार सरकार द्वारा नामित होते हैं. इस में गया का डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट अध्यक्ष होता है, जिस का हिंदू होना अनिवार्य था. लेकिन 2013 में यह प्रावधान हटा लिया गया था.

यह व्यवस्था लंबे वक्त से चले आ रहे विवाद को सुल झाने के नाम पर बौद्धों के लिए एक झुन झुना मात्र थी क्योंकि इस से हिंदुओं का दबदबा कायम रहा. बोधगया मंदिर विवाद दूसरे मंदिर विवादों से अलग नहीं है जिस का इतिहास बताता है, यह दरअसल एक बौद्ध मंदिर ही है जिसे पहले हिंदू पंडेपुजारियों ने कब्जाया. लेकिन इस पर देशविदेश के बौद्धों ने एतराज जताया तो इसे चालाकी दिखाते कानूनी तौर पर हिंदुओं के हवाले कर दिया गया. इस में देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद का अहम रोल रहा जो कांग्रेसी होते हुए भी कट्टर हिंदूवादी थे.

1922 में जब गया में कांग्रेस का सम्मेलन हुआ था तब महाबोधि सोसाइटी के सदस्यों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था. लेकिन कांग्रेसी सनातनियों ने धूर्तता दिखाते बौद्धों को हाशिए पर ही रखा. लेकिन यह ऐतिहासिक तथ्य या प्रमाण न पहले कभी झुठलाया जा सका था और न आज विवाद के फिर से सुलगने पर कोई यह कह पा रहा है कि इसे तीसरी शताब्दी के पहले सम्राट अशोक ने नहीं बनवाया था व यहीं वट वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था और यह ज्ञान ऊपर कहीं से नहीं टपका था बल्कि बुद्ध का अपना चिंतन और दर्शन एक निष्कर्ष की शक्ल में सार्वजनिक तौर पर व्यक्त होना शुरू हुआ था.

मंदिर का विवादित इतिहास

सम्राट अशोक द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाए जाने के बाद यह मंदिर पूरी तरह बौद्धों के नियंत्रण में रहा. इस के बाद 16वीं शताब्दी में शैव संप्रदाय के एक हिंदू ब्राह्मण पुजारी घमंड गिरी ने यहां पूजापाठ शुरू कर दी तब बौद्धों और भिक्षुओं ने बुद्ध के करुणा के सिद्धांत के तहत कोई एतराज नहीं जताया. तब से ले कर रहरह कर जो विवाद खड़े होते रहे हैं उस की जड़ भी यही करुणा है.

घमंड गिरी के वंशज आज भी अपने पुश्तैनी कारोबार को अंजाम दे रहे हैं. अब तो पैसा कमाने की गरज से और भी पंडेपुजारी गया की इस बहती फल्गु नदी में हाथ धोने इस मंदिर में अपनी दुकान चला रहे हैं. उन की दलील है कि यह हिंदू तीर्थ हैं क्योंकि बुद्ध विष्णु के वशंज थे.

बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करने की ब्राह्मणी साजिश से परे यहां स्वाभाविक तर्क यह उठता है कि अगर ऐसा है तो देशभर के विष्णु और उस के अवतारों राम व कृष्ण के मंदिरों में बुद्ध की मूर्तियां क्यों नहीं? वहां उन का पूजापाठ क्यों नहीं?

अगर कोई हिंदू धर्मगुरु इस मामूली से सवाल का जवाब कभी दे पाता या आज दे पाए तो बात या विवाद इस मुकाम तक पहुंचता ही नहीं, इस मुकाम तक यानी हालिया धरनेप्रदर्शन और सुप्रीम कोर्ट तक.

दरअसल, घमंड गिरी के बोधगया कब्जाने की अपनी एक अलग और अहम वजह यह थी कि 13वीं शताब्दी में तुर्की आक्रमण के बाद अधिकतर बौद्ध भिक्षु यहांवहां हो गए थे. मैदान खाली देख घमंड गिरी ने यह प्रचार शुरू कर दिया कि वही महाविहार यानी महाबोधि मंदिर के वैध उत्तराधिकारी हैं. इस के बाद वे और उन के वारिस तबीयत से पूजापाठ के अपने पुश्तैनी कारोबार के जरिए पैसा कमाते रहे. जिन बुद्ध ने हिंदू कर्मकांडों और पूजापाठ का जम कर विरोध किया था उसी मंदिर के गया में होने के चलते पिंडदान भी होने लगे.

लंबा वक्त गुजरने के बाद एक इंग्लिश लेखक व पत्रकार एडविन अर्नोल्ड ने 1885 में महाबोधि मंदिर को बौद्धों को वापस लौटाने की बात उठाई. इस के 5-6 साल बाद ही श्रीलंका के एक नागरिक/अनागरिक धर्मपाल के पांव यहां पड़े और उन्होंने महाबोधि सोसाइटी की स्थापना करते मंदिर पर बौद्धों के नियंत्रण के लिए मुहिम छेड़ दी.

फिर कांग्रेस अधिवेशन के बाद इस में राजनीति भी इन्वौल्व हो गई. डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने जो किया सो किया लेकिन महात्मा गांधी स्वीकार चुके थे कि यह बौद्ध मंदिर है. इस के बाद रवींद्रनाथ टेगौर ने भी इस से सहमति जताते हिंदुओं से आग्रह किया था कि वे इसे बौद्धों को सौंप दें.

कांग्रेस के मौजूदा दिग्गज नेता जयराम रमेश भी इस बात से इत्तफाक रखते हैं कि यह बौद्ध मंदिर है. उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द लाइट औफ एशिया द पोयम दैट डिफाइन बुद्धा’ में एडविन अर्नोल्ड का जिक्र करते लिखा है, ‘‘अगस्त 1727 में एक मुगल राजकुमार ने शिवियों (शैवों) को इस क्षेत्र में स्वामित्व अधिकार स्थापित करने के लिए एक विलेख दिया था. विलेख दिए जाने के बाद शिवियों ने मंदिर और उस के आसपास के क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया और तब से हिंदू और बौद्ध दोनों ही इस तक पहुंच सकते थे.’’

केजरीवाल सरकार में मंत्री रह चुके राजेंद्र गौतम ने भी बोधगया पहुंच कर बौद्धों का समर्थन किया था. हिंदू देवीदेवताओं पर विवादित टिप्पणियां करने से सुर्खियों में रहे राजेंद्र गौतम कहते हैं, ‘‘ब्राह्मणों को अपना दिल बड़ा कर के हमारा मंदिर हमें दे देना चाहिए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो आंदोलन और तेज होगा.’’

दलित सांसद व भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद भी इस मामले को संसद में उठा चुके हैं. उन्होंने भी बोधगया जा कर बौद्ध भिक्षुओं का समर्थन करते मंदिर को ब्राह्मणमुक्त करने की बात कही.

अप्रत्यक्ष और अघोषित रूप से यह लड़ाई दलित बनाम ब्राह्मण भी होती जा रही है क्योंकि बाकी सवर्ण हिंदुओं का बुद्ध से कोई बैर या परहेज नहीं. वे न तो बुद्ध को मानतेपूजते और न ही उन से असहमत हो पाते हैं. सिर्फ ब्राह्मण ही बुद्ध विरोधी हमेशा से रहा है. दूसरी तरफ अधिकतर दलित ही बौद्ध धर्म को मानते और अपनाते हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में यह आंदोलन एक बड़ा मुद्दा होगा, यह भी साफ दिख रहा है. बिहार के सवा लाख बौद्ध और बौद्ध धर्म से प्रभावित लाखों दलित एकतरफा वोट भी कर सकते हैं, जो जाहिर है इंडिया गठबंधन के खाते में जाएंगे.

अब क्या और क्यों चाहते हैं बौद्ध

इस बार फिर पिछली 12 फरवरी से बौद्ध भिक्षु बोधगया में धरनाप्रदर्शन कर रहे हैं. उन की पहली और सीधी मांग यह है कि बीटी एक्ट खत्म किया जाए. इस मुहिम ने जोर पकड़ना शुरू किया तो देशभर के बौद्ध भिक्षुओं के समर्थन में बौद्ध गया पहुंचने लगे. इस पर प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को महाबोधि मंदिर से खदेड़ दिया तो इन लोगों ने मंदिर से एक किलोमीटर दूर दोमुहान नाम की जगह को अपना ठिकाना बना लिया. इस धरना स्थल पर जगहजगह संविधान की प्रतियां और भीमराव अंबेडकर के फोटो देखने को मिल जाते हैं.

विरोध प्रदर्शन की बात और फैली तो बड़ी तादाद में बुद्धिस्ट दोमुहान लगातार अभी भी पहुंच रहे हैं. इन में महिलाओं की तादाद खासी है. कई शहरों में बीटीए को संविधान विरोधी बताते कैंडल मार्च निकलने लगे. देशभर के बौद्ध विहारों में इस मुद्दे को ले कर मीटिंग्स हो रही हैं. ये सभी चाहते यही हैं कि महाबोधि मंदिर का प्रबंधन और नियंत्रण पूरी तरह बौद्धों के हाथ में दिया जाए. राजेंद्र गौतम और चंद्रशेखर जैसे नेता तुक की बात कहते हिंदू की जगह ब्राह्मण शब्द बेवजह इस्तेमाल नहीं करते दिखे.

इस मुहिम की अगुआई कर रहे अखिल भारतीय बौद्ध मंच के आकाश लामा यहां आ रहे मीडियाकर्मियों से कहते हैं कि इस दुनिया में किसी भी धार्मिक स्थल पर दूसरे धर्म का कब्जा नहीं है. मसजिद को मुसलमान चलाते हैं, मंदिर को हिंदू और गुरुद्वारे को सिख चलाते हैं. लेकिन महाबोधि मंदिर में हिंदुओं का कब्जा है.

बकौल आकाश लामा, इस मांग को ले कर वे बिहार सरकार और अल्पसंख्यक आयोग भी गए लेकिन कहीं हमारी सुनवाई नहीं हुई. मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है जिस में अपनी टांगफसाऊ आदत के मुताबिक हिंदू पक्ष की तरफ से विश्व हिंदू परिषद भी कूद पड़ा है.

हिंदुओं का दावा चूंकि कमजोर है, इसलिए उन्हें समर्थन भी कम मिल रहा है. उलट इस के, बौद्धों के समर्थन में आवाजें विदेशों से भी आईं जिन में अमेरिका और जापान के नाम उल्लेखनीय हैं. 7 मार्च को अमेरिका में भारतीय दूतावास के बाहर सैकड़ों बौद्ध अनुयायियों ने इकट्ठा हो कर महाबोधि मंदिर को बौद्धों को सौंपने की बात कही थी. भारत सहित दुनियाभर के 500 से भी ज्यादा बौद्ध संगठन इस मुद्दे पर लामबंद हैं. वैसे भी, साल 1992 में जापान से भारत आ कर बस गए एक बौद्ध भिक्षु सराई सुसाई ने इस मांग को ले कर एक बड़ा आंदोलन छेड़ा था.

लड़ाई का असल मुद्दा कर्मकांड

हिंदू यानी ब्राह्मण महाबोधि मंदिर से आसानी तो क्या मुश्किल से भी कब्जा छोड़ेंगे, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि पिंडदान जैसे कर्मकांड से इन की जेबें भरती हैं. हैरानी तो इस बात की ज्यादा है कि बौद्ध धर्म की बुनियाद ही हिंदू कर्मकांडों, जातिगत भेदभाव और छुआछूत जैसे विकारों पर पड़ी है. बुद्ध ने एक वक्त में अपनी थ्योरियों के प्रभाव से ब्राह्मणवाद लगभग खत्म कर दिया था. लेकिन धूर्त ब्राह्मणों ने उन्हें ही विष्णु का अवतार घोषित कर अपनी रोजीरोटी आंशिक रूप से बचा ली थी जो बाद में बढ़ती गई और अब मोदी राज में भाजपा की मंदिर नीति के चलते सरपट दौड़ रही है.

अब इस मंदिर में दुकान चला रहे पंडेपुजारी स्थानीय लोगों को यह बताते रहते हैं कि दरअसल महाबोधि मंदिर हिंदू मंदिर है. विद्यानंद पांडे नाम के एक पुरोहित इन में से एक हैं जिन की दलील यह है कि हमारे यानी हिंदुओं के शिवलिंग और 5 पांडव यहां हैं. लाखों लोग यहां पिंडदान करते हैं. हम पीढि़यों से पिंडदान कराते आ रहे हैं और आगे भी कराते रहेंगे. लेकिन ये लोग कहते हैं कि सनातन धर्म को हटा दो. आखिर, भगवान बुद्ध किस की औलाद हैं.

उलट इस के, आकाश लामा का रोना यह है कि मंदिर में पिंडदान के नाम पर लोटाथाली सब जा रहा है लेकिन हम अपना कैमरा भी नहीं ले जा सकते. उन की नई चिंता इस्कौन मंदिर वालों के यहां पड़ते कदम हैं. उन के मुताबिक, यह मंदिर विश्व धरोहर है, इस का सम्मान किया जाना चाहिए. धरनाप्रदर्शन कर रहे बौद्ध यह दलील भी देते हैं कि यह एक्ट संविधान बनने के पहले बना था, हमें तो भीमराव अंबेडकर के संविधान के हिसाब से एक्ट चाहिए. महाबोधि मंदिर बौद्धों को सौंप दिया जाना चाहिए.

बौद्धों की इस दलील में भी दम है कि महाबोधि मंदिर को दुनियाभर के बौद्धों से दान मिलता है लेकिन वह पैसा स्कूलअस्पताल वगैरह बनवाने में खर्च नहीं किया जाता. वह स्वागतसत्कार में ही उड़ा दिया जाता है. यानी लड़ाई दानदक्षिणा की भी है पर हिंदू इस मंदिर में ज्यादा दान नहीं देते बनिस्बत बौद्धों के.

यानी बौद्धों की बड़ी तकलीफ बुद्ध के इस मंदिर में होते कर्मकांड भी हैं और जाहिर है वे तब तक होते रहेंगे जब तक बीटी एक्ट में हिंदू सदस्यों का प्रावधान है. अब देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्ष क्या दलीलें देते हैं और कौन सा पक्ष अपने पक्ष में ऐतिहासिक साक्ष्य पेश कर पाएगा. हालांकि इस लिहाज से बौद्धों का दावा भारी और दमदार है.

गुरुद्वारों को भी नहीं बख्शा था

हिंदू यानी ब्राह्मण पंडेपुजारी अपने मठमंदिरों से पैसा कमाएं, यह बहुत ज्यादा एतराज की बात इस लिहाज से नहीं कि हर धर्म अपनी प्राथमिकता में भक्तों और अनुयायियों की जेब पर उस्तरा चलाने को ही निर्मित हुआ है. चर्चों और मसजिदों में इस से जुदा कुछ नहीं है, न ही जैन मंदिर अछूते हैं. बस, तरीके अलगअलग हैं. ये सब के सब दरअसल दानदक्षिणा और चढ़ावा कलैक्शन सैंटर हैं. लेकिन सिख और बौद्ध धर्म में यह लूटपाट अपेक्षाकृत कम और लगभग स्वैछिक है.

दिलचस्प चिंता की बात यह है कि क्यों पंडेपुजारी दूसरे धर्मों के स्थलों से भी पैसा बटोरना चाहते हैं जबकि देश में लाखों मंदिर हैं और अब तो रोजरोज नएनए बन रहे हैं. पुराने ब्रैंडेड मंदिर कैसे सरकार चमका रही है, यह हम आएदिन तथ्य और आंकड़ों के साथ प्रकाशित करते रहे हैं और यह सिलसिला टूटेगा नहीं.

वक्फ बोर्ड में गैरमुसलिम सदस्यों, जाहिर है, हिंदुओं की भरती पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का किसी के पास कोई ठोस जवाब नहीं है. सवाल यह कि क्यों हिंदुवादियों की सरकार हर धर्म में किसी न किसी तरह हिंदू घुसपैठ चाहती है? जहां वह सीधे नहीं पहुंच सकती वहां यह काम उस के अघोषित एजेंट पंडेपुजारी कर रहे हैं. इस की ताजी मिसाल महाबोधि मंदिर है लेकिन इस के पहले ये पंडेपुजारी सिखों के गुरुद्वारों से भी इफरात से पैसा कमाते थे.

पृथक खालिस्तान की मांग हालफिलहल भले ही हाशिए पर हो लेकिन इस का जिन्न हर कभी बोतल के बाहर आ जाता है. हिंदूसिख मतभेदों का इतिहास इस से जुड़ा है. अब से कोई 105 साल पहले ये मतभेद उजागर होना शुरू हुए थे जब गुरुद्वारा सुधार आंदोलन चरम पर था.

गुरुद्वारे सिखों की सांस्कृतिक व सामाजिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र तब भी हुआ करते थे. लेकिन इन का संचालन तब ब्राह्मणपुजारी किया करते थे जिन्हें महाद कहा जाता था. पैसा कमाने की गरज और नीयत से इन महादों ने एक वक्त में गुरुद्वारों को भी लूटखसोट का अड्डा बना डाला था. इस के लिए जाहिर है उन्हें ज्योतिष, टोनेटोटके, तंत्रमंत्र सहित मूर्तिपूजा और दूसरे डर दिखाने पड़ते थे.

हद तो तब हो गई थी जब इन्होंने छोटी जाति के सिखों के गुरुद्वारे आने पर रोक लगाना शुरू कर दी थी जोकि सिख धर्म के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ बात थी.

सिखों ने इस लूट और अंधविश्वासों का विरोध किया और गुरुद्वारों का प्रबंधन ब्राह्मणपुजारियों यानी महादों से छीनते उन्हें खदेड़ दिया. इस के बाद ही अकाली दल और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी वजूद में आए. मुफ्त की रोजीरोटी छिनी, तो ब्राह्मणों ने सिखों को तरहतरह से बदनाम करना शुरू कर दिया.

शुक्र इस बात का है कि बौद्धों को वे ज्यादा बदनाम नहीं कर पा रहे. लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट से हारे तो उन्हें बदनाम नहीं करेंगे, इस बात की गारंटी नहीं. लेकिन तब तक मोक्ष प्राप्ति और पिंडदान के नाम पर वे खासी रकम बना चुके होंगे और नहीं हारे यानी कोर्ट ने मौजूदा व्यवस्था कायम रखी तो धंधा और तेज व बेखटक चलेगा ही.

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