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कुछ पल और

गुनगुनाती हुई फलक से

गिर रही हैं बूंदे

लगता है कोई बदली

तेरी पाजेब से टकराई है.

इन पैरों की रूनझुन

उतर गई दिल में

लगता है सरगम

पायल ने खुद गाई है.

हर आहट की झनक

दिल को लगे ऐसी

सोए अरमानों ने

दिल में ली अंगड़ाई है.

हर छनक खुशबू सी बन

फिजा में महकी ऐसे

लगता है वीरानें में

बहार आई है.

जमीं पर संगीत

तेरी पायल का बजा

कि अप्सरा कोई

पूजा के लिए आई है.

‘कुछ पल और’ भी

छनक जाए पायल तेरी

लगेगा ऐसे में

सुबहसुबह बांसुरी

किसी ने बजाई है.

-रेणु आहूजा

हवा होती जेट एयरवेज

10 साल पहले नएनए तरह के उत्पादों के समाचार आते थे, अब पुराने उत्पादों को बनाने वाली कंपनियों की खरीद और बिक्री के आ रहे हैं. एयर इंडिया और जेट एयरवेज जैसी बड़ी एयरलाइंस कंपनियों की बिक्री के समाचार यह साफ करते हैं कि बड़ा बिजनैस चलाना अब आसान नहीं रह गया है.

डीएलएफ, जेपी, यूनिटैक, आम्रपाली जैसे नामी बिल्डरों का पत्ता साफ सा होने लगा है. रुइया, धूत जैसे बड़े उद्योगपति अपनी जायदादें बेच रहे हैं. स्टील कंपनियां बिक रही हैं.

इस सब का एक बड़ा छिपा कारण वह कंप्यूटर टैक्नोलौजी है जिस ने सब को आकर्षित करतेकरते सम्मोहित कर डाला है. दुनिया की हवा यदि कार्बन डाईऔक्साइड, सल्फर, प्लास्टिक, मीथेन से प्रभावित हुई है तो व्यापार व उद्योगजगत कंप्यूटर क्रांति का शिकार हुआ है.

कंप्यूटरों ने निर्माण में अद्भुत क्रांति की है, इस में संदेह नहीं. न केवल उत्पादन का तरीका बदला है, रोजमर्रा का प्रबंधन व वित्तीय सहायता पाने का तरीका भी बदला है. दूसरा पक्ष यह है कि कंप्यूटरों की हर बात की बारीकी से परख करने की क्षमता ने बहुत से दोष पैदा किए हैं. जिन बातों को छोटा समझ कर आगे चला जा सकता था, अब उन्हें ढोना पड़ता है.

हर कंपनी में एक ऐसी बड़ी फौज खड़ी हो गई है जो कंप्यूटर स्क्रीनों पर तथ्यों को तोड़तीमरोड़ती रहती है. उद्योगपतियों और उन के मैनेजरों की छठी इंद्रिय को जंग लग गया और कंप्यूटर रिपोर्ट सर्वोपरि हो गई है.

नई तकनीक का विरोध करने का मतलब एक तरह से राम और कृष्ण की पोल खोलने जैसा हो गया. ‘कंप्यूटर ने कहा है तो सही ही होगा’ का सिद्धांत चलने लगा है और मालिकों के अपने गुण, अनुभव, दूरदृष्टि, सामाजिक उद्देश्य नष्ट हो गए.

दुनिया ने काफी तकनीकी उन्नति की पर उस से ज्यादा स्थिरता को बिगाड़ दिया है. कंप्यूटर के सहारे हरेक की जिंदगी बंध गई है. हम गुलाम हो गए हैं और आसानी से कंप्यूटर द्वारा बहकाए जा सकते हैं.

जेट एयरवेज, जिसे नरेश गोयल ने 25 साल पहले शुरू किया था, एक क्रांति थी. वह एयर इंडिया की सरकारी मोनोपोली का जवाब था. पर गलत प्रबंधन, गलत प्रतियोगिता, कंप्यूटरों पर निर्भरता के कारण न केवल जेट एयरवेज आज खतरे में है, वह दूसरी हवाई कंपनियों के लिए खतरा भी पैदा कर रही है. यदि वह बंद होगी तो दूसरी कंपनियों को कमाई के अवसर मिलेंगे पर यात्रियों को बहुत महंगे टिकट खरीदने पड़ेंगे.

अगर बिना हाईफाई सिस्टमों के यह हवाईसेवा चलती तो शायद ठीक चलती रहती. अंधाधुंध प्रचार और इंटरनैटजनित दामों का आकर्षण बेशक हमारी हवाई यात्राओं को खतरे में डाल रहा है. इंटरनैट पर निर्भरता के कारण बुकिंग तो आसान हो गई पर प्रबंधकों को शिकायतें मिलनी बंद हो गईं. यह इस क्षेत्र के विनाश का बड़ा कारण है.

चंद मिनटों में चमक उठेगा आपके घर का बाथरूम

घर के बाथरूम को साफ रखना बहुत जरूरी है.  इसके लिए आपको नियमित रूप से इसकी सफाई करनी होगी. लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है, आपके पास बिल्कुल भी समय नहीं होता पर बाथरूम साफ करना बहुत जरूरी होता है, तो आइए इसके लिये हम आपको कुछ आसान से टिप्स बताते हैं जिससे आप बाथरूम को फटाफट चमका सकती हैं.

पोछा, झाडू और मग ये तीनों बाथरूम को साफ करने के लिये सबसे उपयुक्त साधन हैं. अपने हाथों को कैमिकेल से बचाने के लिये प्लास्टिक दस्तानों का प्रयोग करें. कमोड को साफ करने के बाद उसे फ्लश करना मत भूलें. पानी में सर्फ डालिये और उससे घोल तैयार करें. इस पानी को बाथरूम के कोनों में डालिये फिर इसे  1 मिनट के लिये छोड दें. और झाडू से रगड़ दे.

वाश बेसिन –  इसको साफ करने के लिये टौयलेट क्लीनर का प्रयोग कीजिये. यह मार्बल और कीटाणुओं को अच्छे से साफ करता है. नल और बेसिन को साफ करने के लिये हमेशा स्क्रब का इस्तेमाल करें. इसके अलावा हाथ खराब ना हो जाएं इसलिये ग्लव जरुर पहने. स्क्रब- घोल को छिडकने के थोडी देर बाद उसे झाडू की सहायता से स्क्रब कीजिये. बाथरूम की हर जगह जैसे, टाइल, कमोड आदि पर ब्रश और झाडू से सफाई करें.

घर के गंदे कांच को साफ करने के उपाय

आज हम आपको घर पर लगे कांच को साफ करने के तरीके बताने जा रहे हैं, जिससे गंदे दिखने वाले शीशे को आप आसानी से साफ कर सकती हैं. आइए बताते हैं.

–  नमक खाने के स्वाद को बढ़ाने के साथ ही घर की साफ सफाई करने के काम भी आता है. इसका इस्तेमाल करके घर के शीशों को आसानी से साफ किया जा सकता है. नमक से शीशे साफ करने के लिए इसको पानी में डालकर घोल बनाएं इससे शीशा साफ करें, शीशा चमकने लगेगा.

–  कांच को अच्छे से साफ करने के लिए सिरके का उपयोग करें. शिशे की गंदगी साफ करने के लिए सिरके को एक स्प्रे की बोतल में डाल लें. आवश्यकता पड़ने पर कांच पर इससे स्प्रे करें और साफ कपड़े से साफ करें.

– बेकिंग सोडे का इस्तेमाल खाना बनाने के अलावा शीशे को साफ करने में भी किया जाता है. कांच को साफ करने के लिए बेकिंग सोडे को पानी में मिलाकर स्पौंज या किसी मुलायम कपड़े की सहायता से साफ करें. ऐसा करने से इसके दाग- धब्बे साफ हो जाएगे और कांच चमक उठेगा.

जानिए क्यों सोते वक्त मुंह से बहता है लार

सोते वक्त मुंह से लार का निकलना बेहद आम बात है. पर कई बार इससे आपको काफी शर्मिदगी झेलनी पड़ती है. इसके अलावा ये किसी गंभीर बीमारियों का संकेत भी हो सकता है. मेडिकल टर्म में इस समस्‍या को सिआलोरेहिआ कहते हैं. आम तौर पर ये परेशानी शिशुओं में देखी जाती है. जब उनके दांत निकल रहे होते हैं तो सेते वक्त उनके मुंह से लार निकलता है. आइए जानते है कि वयस्‍कों में ये समस्‍या क्‍यों होती हैं.

लार का बहना

जब आप जाग रहे होते हैं तब लार नहीं बहता. जबकि जागते हुए अधिक लार का निर्माण होता है , पर आप इसे निगल लेते हैं. पर सोते वक्त इसकी ग्रंथियों से इसका बहाव होता है. कारण है कि सोते वक्त आपके चेहरे की नसें काफी रिलैक्स्ड होती हैं. सोते वक्त आप ज्‍यादातर मुंह से औक्‍सीजन लेते हैं, इस वजह से लार के ग्लैंड्स लार तैयार करते हैं तो वो बहने लग जाती है क्योंकि आप उसे निगलते नहीं हैं.

इसके अलावा मुंह से लार निकलने के कई अन्य कारण ये हैं.

साइनस इंफेक्शन 

सांस की उपरी नली के संक्रमण आमतौर पर सांस लेने और निगलने की समस्याओं से जुड़े होते हैं. इन समस्याओं में लार जमा हो जाने से मुंह से बहने लगती है.

टोंसिलाइटिस

गले के पीछे मौजूद टोंसिल्स ग्रंथी होती हैं. इनमें सूजन आ जाने से टोंसिलाइटिस हो सकता है. सूजन की वजह से गले का रास्ता छोटा हो जाता है जिससे लार गले से उतर नहीं पाती और मुंह से बहने लग जाती है.

एलर्जी

एलर्जी के कारण भी मुंह से लार निकलने की शिकायत होती है. ये एलर्जी अक्सर नाक या कुछ खाने पीने संबंधी होती हैं.

एसिडिटी 

जानकारों का मानना है कि एसिड रिफ्लक्स एपीसोड्स के कारण गेस्ट्रिक एसिड होता है. इससे एसोफागोसलाइवरी उत्तेजित होता है और बहुत अधिक लार बनने लगती है.

सोने की पोजिशन की वजह से भी

सोते वक्त आमतौर पर तभी बहती है जब आप करवट लेकर सोते हैं. पीठ के बल सोने पर बहुत कम लार बहती होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि जब आप पीठ के बल सोते हैं तो लार आपके गले के रास्ते शरीर में अपने आप चली जाती है.

भारत की तरफ झुकता पहला टैस्ट मैच

अगर आप को ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम के हालिया कप्तान का नाम पूछने के लिए 4 ऑप्शन दिए जाएं और आप अपना सिर खुजाने लगें तो समझ लीजिए कि उस के बाकी खिलाड़ियों के बारे में जानने के लिए आप को कितनी मेहनत करनी पड़ेगी, जबकि अब से 2-3 साल पहले तक यह दिग्गजों से सजी इतनी मजबूत टीम होती थी जिस का क्रिकेट की दुनिया पर अपना दबदबा था.

वैसे, इस टीम के कप्तान का नाम टिम पेन है जो शक्ल से बड़े मासूम बालक से दिखते हैं पर अपनी उम्र के 34 सावन देख चुके हैं. अब तक कुल 15 टैस्ट मैच खेल चुके इसी अनजान खिलाड़ी की अगुआई में वहां की कच्ची टीम के साथ भारत के बाहुबली खिलाड़ी एडिलेड में सीरीज का पहला टैस्ट मैच खेल रहे हैं और मैच के तीसरे दिन के खत्म होने तक मजबूत हालात में दिख रहे हैं.

मैच के पहले दिन जब भारत के सलामी बल्लेबाज क्रीज पर उतरे थे तो उन की फॉर्म के हिसाब से वे मजबूत दिख रहे थे पर जल्दी ही उन की पोल खुल गई. वह तो भला हो चेतेश्वर पुजारा का जो उन्होंने एक छोर संभाले रखा और भारत को 250 रनों के सम्मानजनक स्कोर तक पहुंचा दिया वरना दूसरे छोर वाले बल्लेबाज तो तू चल मैं आया का राग अलाप रहे थे.

बोर्ड पर ढाई सौ रन देख कर मेजबान टीम नाखुश थी और जब वह बल्लेबाजी करने आई तो चेतेश्वर पुजारा के बनाए गए 123 रन ही उसे खल गए. दूसरे दिन का मैच खत्म होने तक ऑस्ट्रेलिया ने 7 विकेट खो कर 197 रन बनाए थे. वहां भी नएनवेले बल्लेबाज ट्रैविस हैड ने किसी 72 रन बना कर किसी तरह मामला संभाल लिया, वरना दूसरे बल्लेबाजों ने तो भारतीय बल्लेबाजों की नकल भर की थी.

तीसरे दिन ऑस्ट्रेलिया की टीम ने अपने खाते में महज 38 रन और जोड़े और वह 235 रनों पर सिमट गई. भारत को 15 रनों की बढ़त मिली जो उस के बल्लेबाजों का हौसला बढ़ाने के लिए काफी थी.

भारत ने दूसरी पारी में संभल कर खेलना शुरू किया और दिन खत्म होने तक 3 विकेट पर 151 रन बना लिए. अब उस की कुल बढ़त 166 रन की हो गई है, जबकि क्रीज पर चेतेश्वर पुजारा और अजिंक्य रहाणे टिके हुए हैं. चूंकि अभी पूरे 2 दिन बाकी हैं और भारत मजबूत हालात में दिख रहा है तो ऐसा माना जा सकता है कि यह मैच वह अपनी झोली में डाल सकता है, बस एडिलेड के बादल उस के साथ बेवफाई न कर दें.

वैसे, क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल कहा जाता है और ऑस्ट्रेलिया की तरफ से 11 बल्लेबाजों में ट्रैविस हैड को भी दोबारा बल्लेबाजी करने के लिए आना है. देखते हैं कि वे अपने कप्तान टिम पेन का पेन (दर्द) कम कर पाएंगे या नहीं.

माधुरी को भाजपा डाले दाना : सितारों की सुंदरता भुनाते राजनीतिक दल

इंद्र को जब भी अपना सिंहासन डोलता दिखाई देता था या विरोधी से खतरे का एहसास होता था तो वह सुंदर सुंदर अप्सराओं का खूब इस्तेमाल करते थे. यह पौराणिक नीति आज भी हमारे राजनीतिक दलों के लिए एकदम कारगर साबित हो रही है. 70 के दशक के बाद से राजनीति में कई खूबसूरत अभिनेत्रियों का उदय हुआ. उन्हें संसद में भेजने का सिलसिला शुरू हो गया.

पुराणों से सब से अधिक सीख लेती दिखाई देने वाली भाजपा ने कई अभिनेत्रियों को चुनाव मैदान में उतारा. वह अब एक और खूबसूरत अभिनेत्री माधुरी दीक्षित को 2019 के लोकसभा के चुनावों में टिकट देना चाहती थी. हालांकि माधुरी की ओर से चुनाव लड़ने का खंडन कर दिया गया पर इस से हमारे देश की राजनीतिक पार्टियों की जाति, धर्म के साथ साथ सुंदरता से मतदाताओं को बहलाने वाली पौराणिक सोच उजागर जरूर कर दी है.

दो दिन पहले खबर थी कि भाजपा माधुरी दीक्षित को पुणे से लोकसभा चुनाव लड़ाने पर विचार कर रही है पर अब उन के प्रवक्ता ने कहा है कि यह खबर झूठी और काल्पनिक है.

असल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पिछले दिनों ‘संपर्क फौर समर्थन’ अभियान के तहत देश की कई हस्तियों से मिलने उन के घर गए और उन्हें भाजपा सरकार की उपलब्धियों की जानकारी दीं. इसी सिलसिले में वह माधुरी दीक्षित से उन के मुंबई स्थित घर में मिले थे.

अब दो दिन पहले महाराष्ट्र के एक बड़े नेता ने ऐलान किया था कि माधुरी दीक्षित को 2019 का लोकसभा चुनाव पुणे से लड़ाने पर विचार किया जा रहा है.

तेजाब, हम आप के हैं कौन, दिल तो पागल है, साजन, देवदास जैसी कई सफल फिल्मों में काम कर मशहूर हुईं माधुरी दीक्षित कुछ साल पहले शादी कर के अपने पति के साथ अमेरिका में रहीं. कुछ समय बाद वह पति के साथ भारत लौट आईं. यहां आने के बाद उन्होंने एक दो फिल्मों में काम किया, पर अब पर्दे से नदारद हैं.

दरअसल हमारे देश का एक बहुत बड़ा वर्ग जाति, धर्म, वर्ग के साथ साथ सुंदरता को देख कर भी वोट करता है. मतदाताओं की इस मानसिकता का फायदा उठाते हुए राजनीतिक दलों ने फिल्म इंडस्ट्री से चुन चुन कर अभिनेता अभिनेत्रियों को टिकट देने  शुरू किए. बेवकूफ मतदाता इन्हें सिर आंखों पर बैठा लेते हैं और इन के पक्ष में जमकर मतदान करते हैं.

लेकिन होता यह है कि ये लोग चुनने के बाद न तो संसद में नजर आते हैं, न ही अपने मतदाताओं के इलाके में. फिल्मी सितारों को संसद में कभी जनता के सवालों पर बोलते हुए नहीं सुना जाता.

हेमामालिनी अपने लोकसभा क्षेत्र मथुरा में जाट परिवार की बहू होने और बारबार शोले फिल्म का डायलौग ‘चल धन्नो, बसंती की इज्जत का सवाल है’, बोल कर मतदाताओं से वोट झटक लेती हैं. बेवकूफ मतदाता अपना बेशकीमती मत महज फिल्म के एक डायलौग पर खुश हो लुटा देता है.

मतदाता को अपने वोट की कीमत पता ही नहीं है. 5 साल तक अगर वह नेताओं से इलाके का विकास न होने का रोना रोता है तो महज इसी गलती की वजह से कि उस ने अपना मत महज हीरोइन को देख कर, नाम सुन कर, उस की खूबसूरती के चर्चे सुन कर बर्बाद कर दिया था.

आप जिस नुमाइंदे को चुन रहे हैं उस की सोच क्या है, इलाके में बिजली, पानी, सड़कों, अस्पताल, स्कूल, कौलेज का इंतजाम करवा देना मात्र सही मायने में विकास नहीं कहलाता, इन के साथसाथ असली विकास उस क्षेत्र में जाति, धर्म, वर्ग, ऊंचनीच के भेदभाव रहित सोच का विकास और फैलाव करने में अपना योगदान देता है. अपने कामों से बराबरी की सोच को क्षेत्र में विकसित करता है. वही लोकतंत्र का सच्चा प्रतिनिधि माना जाता है. लोकतंत्र की मजबूती इसी में है.

जगह जगह दंगे फसाद, जातीय, धार्मिक तनाव का वातावरण लोकतांत्रिक सोच के अभाव में उत्पन्न होती है. नेताओं के बयानों से एक वर्ग में गुस्सा तो दूसरा खुश इसीलिए होता है क्योंकि नेता की सोच भेदभाव और पक्षपातपूर्ण होती है.

राजनीतिक दलों की ऐसी संकीर्ण सोच पर लानत है. क्या वे ऐसे उम्मीदवार नहीं ढूंढ सकते जो देश की समस्याओं को अच्छे से समझते हों, विशेषज्ञ हों और वे गरीबी, भेदभाव, छुआछूत, शिक्षा, चिकित्सा, तकनीक, विज्ञान जैसे विषयों पर देश के लिए कुछ उल्लेखनीय काम कर सकें.

ऐसा नहीं है कि ऐसे योग्य लोग हैं नहीं, भरे पड़े हैं पर राजनीतिक दलों को विकास में योगदान देने वाले योग्य लोग नहीं, वोट बटोरने वाले, उन्हें जिताने वाले उम्मीदवार चाहिए. ऐसे उम्मीदवार चाहिएं जो जनता को बहला कर, फुसला कर, नाच गा कर, भावनात्मक मुद्दों को आगे कर के संसद और विधानसभाओं में पहुंच सकें.

दरअसल राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं का ध्यान भंग करने, उन का विवेक खत्म करने के लिए पौराणिक चालें चलने की कोशिश करती हैं. इंद्र अपने विरोधियों को पस्त करने के लिए हमेशा अप्सराओं का इस्तेमाल करते थे. हमारे राजनीतिक दल खूबसूरत हीरोइनों का इस्तेमाल कर मतदाताओं का विवेक खत्म करने की कोशिशें करती हैं. एकाध को छोड़ कर कोई भी हीरोइन अपने क्षेत्र के मतदाताओं की समस्याओं का समाधान करने में नाकाम रही हैं.

जनता फिल्मी सितारों के अभिनय को देख कर अपना मनोरंजन कर सकती है लेकिन अगर वह उन की खूबसूरती देख कर मनोरंजन के नाम पर अपना भविष्य उन्हें सौंपती है तो यह हद दर्जे की बेवकूफी ही है.

‘होली काऊ स्टेट’ में ही फंस गई भाजपा

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ को भाजपा होली काऊ स्टेट मानती है. ‘होली काऊ’ यानि गाय को माता मानने वाले राज्य. इन तीनो ही राज्यों में भाजपा की सरकार है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, मणिपुर और तेलंगाना के विधानसभा चुनाव के एक्जिट पोल बताते है कि ‘हौली काऊ’ यानि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में भाजपा को सबसे अधिक नुकसान हो रहा है.

इस नुकसान का अंदाजा भाजपा को पहले से था यही वजह है कि भाजपा ने अपने विकास के मुददे को पीछे करके धर्म को चुनाव का मुद्दा बनाया और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सबसे अधिक प्रचार का मौका दिया. योगी इन चुनावों में सबसे अधिक चुनाव प्रचार करने वाले नेता रहे. राजस्थान चुनाव के ठीक पहले उत्तर प्रदेश में गौरक्षा को लेकर पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या ने चुनावी रंग में असर डालने का काम किया.

भाजपा के तमाम प्रयासों के बाद भी होली काऊ राज्यों में पार्टी का जनाधर खिसक गया है. संभव है कि किसी दल को बहुमत न मिलने के कारण भाजपा जोड़तोड़ कर सरकार बचाने में सफल भी हो जाये पर जिस तरह से भाजपा का जनाधर टूटा है उसका प्रभाव 2019 के लोकसभा चुनाव पर पडेगा.

एक्जिट पोल से यह साफ अंदाजा लगाया जा सकता है की हर राज्य में अकेले कांग्रेस ही भाजपा को चुनौती देती नजर आ रही है. केन्द्र में सरकार बनाने के लिये किसी भी दल के लिये सबसे जरूरी मैदानी राज्य ही होते है. यहीं से पार्टी उत्थान और पतन दोनों ही तय होता है. इसका सबसे बड़ा कारण यह भी है कि लोकसभा की सबसे अधिक सीटें इन्हीं मैदानी इलाके के राज्यों से आती हैं.

गंगा यमुना नदियों का यह क्षेत्र कृषि बाहुल्य है. यहां गांवों में किसानों की परेशानियों को कम करने की जगह पर गोरक्षा के नाम पर परेशानियां बढ गई हैं. छुटटा जानवर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं तो गोरक्षा के नाम पर होने वाले झगड़े गांवों की शांंत व्यवस्था को खतरा बने हैं.

यह सच है कि एक बड़ा वर्ग इस तरह के झगड़ों से लाभ लेता है पर आम किसान इसमें परेशान हो रहा है. बुलंदशहर में मुख्य आरोपी योगेश राज को बचाने वाले भले ही बहुत हों पर गांव के आम लोगों को पुलिस परेशान कर रही है. ऐसे में लोगों को गौरक्षा के नाम से होने वाले झगड़ों से परेशानियां हो रही हैं.

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में बडी संख्या में गांव के रहने वाले दलित और पिछडी जातियों ने कांग्रेस के पक्ष मे खडे होकर जो भरोसा जताया है वह कांग्रेस के लिये संजीवनी का काम कर रहा है. यह भरोसा एक बड़े जनाधार में बदल सकता है. आज लोगों को धर्म नहीं विकास चाहिये मोदी ने विकास के नाम पर जो छवि बनाकर 2014 का आम चुनाव जीता था. धर्म का सहारा लेकर 2019 में वह अपना जनाधर घटाने का काम कर रहे हैं. होली काऊ स्टेट राज्यों में पार्टी की हालत एक बागनी भर है. राम के राज्य उत्तर प्रदेश आते आते यह हालात और भी खराब हो जायेगी. अगर धर्म के नाम की राजनीति और अराजकता कम नहीं हुई तो 2019 में भाजपा के लिये आधी सीटें भी बचा पाना संभव नहीं होगा.

EXCLUSIVE : ‘मिर्ज़ापुर’ को इस नजर से शायद ही किसी ने देखा होगा

“शुरू मजबूरी में किये थे, अब मजा आ रहा है..” यह संवाद फरहान अख्तर और अमेजन की को-प्रोड्यूस्ड वेब-सीरीज मिर्ज़ापुर में अपराध के दलदल में फंस चुका गुड्डू पंडित अपने आदर्शवादी पिता से कहता है. हालांकि यह मजबूरी भरा फलसफा उन दर्शकों पर ज्यादा फिट बैठता है जो संस्कारी सेंसर बोर्ड के गलियारे से निकले मनोरंजन से उकता कर और नेटफ्लिक्स की Narcos, House of cards और Sacred Games  नुमा अफीम चाट गए हैं. मजबूरी में शुरू हुआ उनका यह अनसेंसर्ड इंटरटेनमेंट अब मजा देने लगा है. जिसमें सेक्स (Explicit Sex Scenes/Incest), हिंसा, गाली-गलौज की पूरी डोज बिना काटछांट और बीप के तफसील से मिल रही है. लेकिन क्या यह मजा इतना ही देसी और ओरिजिनल है जितना इनके टाइटल्स (Amazon originals & Netflix original) सजेस्ट करते हैं? या फिर महेश भट्ट की तर्ज पर बने नए क्लोन डाइरेक्टर्स/राइटर्स 90 के दशक की तरह OUविदेशों से आउटसोर्स किया गया बासी माल ही अनसेंसर और ओरिजिनल के टैग के साथ भारतीय दर्शकों को पेश कर रहे हैं?

वेब- सीरीज मिर्ज़ापुर के जरिए, लेट्स फाइंड आउट.

 रिवोल्यूशनरी Underground Cinema

अमरीकन फिल्म क्रिटिक मिनी फारबर ने 1957 में अपने एक आर्टिकल में पहली बार Underground Cinema का जिक्र किया था. यह टर्म उस तरह की फिल्मों के लिए इस्तेमाल की गयी थी जो हौलीवुड में एंटी-आर्ट रोल प्ले कर रही थीं. ये एक तरह की विद्रोही फिल्में थी जो सिनेमा को बड़े फिल्म स्टूडियोज, स्टार सिस्टम और कमर्शियलिज्म के चंगुल से निकालना चाहती थीं. इसलिए रूस, जर्मनी और अमेरिका में उन दिनों कई नए कलाकारों, निर्देशकों और टेक्नीकल क्रू ने प्रतिबंधित सब्जेक्ट्स के साथ ऐसी ढेर सारी फिल्में बनाईं जो प्रोपर रिलीज तो नहीं पाती थीं लेकिन वीडियो-औन-डिमांड सेक्टर में पहुंचकर धीरे-धीरे अपना कल्ट स्टेटस बना लेती थीं.

कल्ट होने से स्थापित फिल्ममेकर्स की नजर इन पर पड़ने लगी और जब इस रिवोल्यूशनरी सिनेमा को एक खास वर्ग के दर्शकों से तवज्जुह मिली तो इसे Underground Cinema की जगह Independent Cinema या इंडी कहा जाने लगा. यह इस तरह सिनेमा की पहली सामाजिक स्वीकृति थी. इसकी एसेप्टेंस बढ़ी तो फायनेंसर भी आगे आये. फिर तो बाढ़ सी आ गयी इंडिपेंडेंट फिल्मों की.

स्टीवन सोडेन बर्ग से लेकर कोहेन ब्रदर्स और टेरेन्टीनों आदि उसी Wave से निकले हैं. और भारतीय सन्दर्भ में कहें तो जिया सरहदी (हम लोग, फुटपाथ), कमल स्वरुप (ओम दर बदर), अनुराग कश्यप (गैंग्स औफ वासेपुर, गुलाल, जू, सेक्रेड गेम्स, अगली, दैट गर्ल इन येलो बूट्स), विशाल भारद्वाज (ओमकारा, मकबूल, हैदर, कमीने), नीरज गेवान (मसान), कनु बहल (तितली), विक्रमादित्य मोटवानी (उड़ान, सेक्रेड गेम्स गेम्स) आदि उसी इंडी सिनेमा की पीढियां हैं. इनकी फिल्मों में पहले एबस्ट्रेक्ट सब्जेक्ट, एंटी सिस्टम प्लौट होता था बाद इनमें

अतिरेक सेक्स, हिंसा और गालियां हावी होती गयीं. इसे डार्क सिनेमा भी कह सकते हैं. हालांकि इसे भारतीय आर्ट सिनेमा (समानान्तर सिनेमा) समझने की गलती न करें. वो धारा अलग है और उस पर बात फिर कभी. बहरहाल मिर्ज़ापुर वेब सीरीज भी उसी इंडी परपंरा की लीक पर है.

हालांकि पहले इस धारा की फिल्में रेवेन्यू एंगल से बौक्स औफिस पर बहुत कामयाब नहीं होती थीं क्योंकि इन्हें न तो ढंग के थियेटर या रिलीज मिलती थी और सेंसर की कैंची से मिले ढेरों कट्स व बीप साउंड इनके इंडी फैक्ट्स किल कर देते थे. लेकिन जैसे नेटफ्लिक्स और उसके बाद अमेजन, वीवू, और हूलू जैसे औनलाइन स्ट्रीमिंग वेंचर्स आये, सारा गेम पलट गया. इनके आने से सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सेंसरबाजी से मुक्ति मिल गयी और इनके जरिए Shocked Value वाला कंटेंट मोबाइल, लैपटौप और टैब के रास्ते युवा आडियंस तक पहुंचने लगा. यूथ ने इन्हें हाथों हाथ लिया तो इन्होने और इंडी फिल्म मेकर्स को पकड़ा और ऐसा ही कंटेंट बनवाया. नतीजा सामने है. आज मनोरंजन उद्योग में यह स्ट्रीमिंग ब्रांड गेम चेंजर बन चुके हैं. स्ट्रीमिंग सर्विस प्रोवाइडर बनकर ये अपने नए नियम बनाकर हौलीवुड को भी नियंत्रित कर रहे हैं.

फिर आया Narcos, Breaking Bad और GOT

कई इंग्लिश कंट्रीज में कंटेंट बना रहे नेटफ्लिक्स ने अब तक हर देश में अपने पांव पसारने शुरू कर दिए थे. अपने साथ लगे स्पैनिश भाषी क्षेत्र मैक्सिको, कोलंबिया इनमें प्रमुख थे. लेकिन ग्लोबल औडियंस के मद्देनजर इनके प्रोडक्शन में बने प्रोडक्ट अंगरेजी में बन रहे थे. लिहाजा रीजनल कंटेंट व्यूवर इनसे अनभिज्ञ था. फिर नेटफ्लिक्स ने नया प्रयोग किया कि क्यों न जिस देश की कहानी या किरदार पर फिल्म या वेब सीरीज बबनाई जा रही हो उसकी भाषा उसी देश की रखी जाए. और बाकी दुनिया में उसे सबटाइटल्स और डबिंग के जरिये ग्लोबल दर्शकों तक पहुंचाया जाए.

इस दिशा में यों तो पहले भी कई प्रयोग हो चुके थे लेकिन Narcos गेम चेंजर निकला. नार्कोस पाब्लो एस्कोबार की जिन्दगी पर बेस्ड है जो एक कोलंबियाई माफिया था. एक दौर में वह अमेरिका और यूरोप जैसे शक्तिशाली देश के लिए सर दर्द था. 1949 में कोलंबिया में जन्मा पाब्लो कार चोरी के धंधे से किडनेपिंग में उतरा फिर किंग औफ कोकीन बन गया. करीब 2 अरब रूपए की एनुअल इनकम के साथ मेडेलिन कार्टेल के यह अपराधी करीब 4000 लोगों के हत्या के लिए जिम्मेदार था. इस शख्स की नीति थी या तो घूस लो या गोली खाओ. एक दफा उसने अपने खिलाफ कानूनी सबूत मिटाने के लिए कोलंबिया के पूरे कोर्ट को ही आग लगवा दी जिसमें 200 जज 1000 पुलिस कर्मी मारे गए. फिर भी कोलंबिया के लोगों में उसकी इमेज रोबिनहुड की थी.

मिर्ज़ापुर के कालीन भैया (पंकज त्रिपाठी), सेक्रेड गेम्स के गणेश गायतोंडे (नवाजुद्दीन सिद्दकी), और इनसाइड एज के भाई साहब सरीखे किरदार पाब्लो के डीएनए से ही निकले हैं.

Narcos इसलिए नया और कामयाब प्रयोग था क्योंकि वेब सीरीज के 3 सीजन में पाब्लो के माफिया बनने की कहानी स्पैनिश भाषा में होने के बावजूद हर देश में सराही गयी. दुनिया में सबसे ज्यादा देखी जाने वाली (इंग्लिश सबटाइटल्स) यह सीरीज इतनी कल्ट बन गयी कि अब इसका मेक्सिको वर्जन यानी नार्कोज मैक्सिको- सीजन 4 भी स्ट्रीम हो रहा है. इसमें पाब्लो जैसे और माफियाओं की जिन्दगी को सेक्स, हिंसा और गलियों की चटपटी चाट में उसी फौर्मूले के साथ परोसा जा रहा है. इस प्रयोग की सफलता ने नेटफ्लिक्स को सेक्रेड गेम्स और अमेजन को मिर्ज़ापुर हिन्दी में बनाने के लिए प्रोत्साहित किया, वर्ना सेक्रेड गेम्स की परिकल्पना इंग्लिश में बनाने की थी. जाहिर है ये नए भाषाई प्रयोग दोनों के लिए भारत में पैर जमाने में कारगर साबित हुए. अब तो वे हिन्दी फिल्में भी प्रोड्यूस कर रहे हैं.

अब बात मिर्ज़ापुर की..

जिस तरह अनुराग नेटफ्लिक्स के चहेते हैं वैसे ही फरहान अख्तर अमेजन के. दोनों ही प्रतिस्पर्धी ब्रांड हैं और दोनों के अपने खेमे भी बन चुके हैं. फरहान ने अमेजन के लिए आईपीएल और मैच फिक्सिंग के इर्द-गिर्द इनसाइड एज बनाई थी, जिसका दूसरा सीजन भी आने वाला है लेकिन इससे पहले उन्होंने मिर्ज़ापुर बनाकर अनुराग कश्यप टाइप जोनर को पकड़ने का साहस दिखाया है और काफी हद तक कामयाब भी हुए हैं.

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में बसे मिर्ज़ापुर में जुर्म की दुनिया और राजनीति के गलियारे एक ही जगह पर आकर मिल जाते हैं. यहां बाहुबली अपराधियों का असर और दखल साफ दिखता है. इन कुख्यात माफियाओं और गैंगस्टर्स से पुलिस प्रशासन भी परेशान है लेकिन इतना नहीं जितना इसमें दिखाया गया है.

असल दुनिया में पूर्वांचल से श्रीप्रकाश शुक्ला, सुभाष ठाकुर, मुख्तार अंसारी, मुन्ना बजरंगी, बृजेश सिंह, राजन तिवारी, विजय मिश्रा, हरिशंकर तिवारी जैसे बाहुबली/अपराधी/ गैंगस्टर  चर्चित रहे हैं. सो इस वेब सीरीज के पात्रों के नाम भी कुछ इसी तर्ज पर रखे हैं. जैसे कालीन भाई उर्फ अखंडानन्द त्रिपाठी (पंकज त्रिपाठी), मुन्ना त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा), बबलू पंडित (विक्रांत मैसी), गुड्डू पंडित (अली फजल), रमाकांत पंडित (राजेश तैलंग), रतिशंकर शुक्ला (शुभ्रज्योति भारत), बीना त्रिपाठी (रसिका दुग्गल), मकबूल (साजी चौधरी) और नेता जी यादव वगैरह वगैरह.

करण अंशुमान, गुरमीत सिंह और मिहिर देसाई निर्देशित मिर्ज़ापुर कहानी है कालीन भैया यानी अखंडानन्द त्रिपाठी की. जो पीढी दर पीढ़ी मिर्ज़ापुर को कंट्रोल करने का दावा करते आये हैं. इसके लिए वे कालीन के धंधे की आड़ में देसी कट्टों, अफीम का काला धंधा भी करते हैं. और पुलिस और नेताओं को उनका हिस्सा डेडलाइन हिसाब से पहुंचाते रहते हैं. उनकी एक कमउम्र दूसरी बीवी भी है जो बिस्तर पर जब-तब उन्हें शिलाजीत खाने की सलाह देती रहती है. जाहिर है त्रिपाठी जी हाथ में गन लेने वाले मर्द ज्यादा है लेकिन बिस्तर पर उनकी पिस्तौल इस्तेमाल से पहले ही फट के फर्रुखाबाद हो जाती है. चौंकिए मत, इस से भी ज्यादा देशज और फोक गालियों की मधुर ध्वनि पूरी सीरीज में बजती रहेगी. अगर आप वेगन हैं तो कान से खून भी आ सकता है. इसे वैधनिक चेतावनी की तरह लें सकते हैं. मसलन कालीन भाई का बेटा मुन्ना एक सीन में परिवार को धमकाने हुए कहता है, ‘टेबल पर मां जी हैं, आप भी (बहन से) आकर बैठ जाइए, वो क्या है न, मां-बहन करने में आसानी होगी.’

मुन्ना बिजनेस संभालने में जरा कमजोर है जिसका फायदा एक दिलचस्प एंट्री लेते हुए

बबलू-गुड्डू ब्रदर्स उठाते हैं. इस से मुन्ना खफा है. कालीन भैया के पिता “बाउजी” (कुलभूषण खरबंदा) भी हैं जो एक हिंसक इतिहास के चलते व्हील चेयर पर हैं. दिन भर टीवी पर डिस्कवरी के वाइल्ड शोज देखते हैं और दिमाग से पूरी तरह जानवर भी हैं. इसका पता लास्ट एपिसोड यानी क्लाइमेक्स में लगेगा. तब तक ये बैठे-बैठे ही रोटी तोड़ते हैं. हां, जरूरत पड़ने पर बेटे और पोते को पार्ट टाइम गाइड भी करते हैं. गुड्डू और बबलू की जोड़ी जय-वीरू टाइप की है. गुड्डू दिमाग से पैदल लेकिन बौडी से फौलाद है जिसका एक मात्र सपना मिस्टर पूर्वांचल बनने का है जबकि बबलू दुनियादारी और पढ़ने लिखने में बहुत होशियार. दोनों कालीन भैया के राइट और लेफ्ट हैण्ड बन जाते हैं. फिर शुरू होता है वर्चस्व, ईर्ष्या, बदले, महत्वाकांक्षा, धोखे और लालच की खूनी जंग. अपराध के सफाये के लिए एसपी मौर्या भी खानापूर्ती कर रहा है.

मिर्ज़ापुर को मैक्सिको बना दिया बे

सेक्रेड गेम्स या मिर्ज़ापुर जैसी वेब सीरीज के साथ दिक्कत यही है कि इनमें कहानी तो मुंबई या मिर्ज़ापुर की होती है लेकिन संरचना यानी माहौल मैक्सिको या कोलंबिया का लगता है. कोलाबिया जैसा कस्बा, आपस में मिलती छतों के ड्रोन शौट्स, तंग गलियां, मोटर साइकिल किलर्स, ड्रग-गन का कारोबार, भीड़ और कोर्ट कचहरी के बीच शूट आउट सब मिर्ज़ापुर को कोलंबिया या मैक्सिको सरीखा फील देते हैं. यह समस्या अनुराग की गैंग्स औफ वासेपुर के साथ भी है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि ये भी वहीं के फिल्म मेकिंग स्कूल से हैं. हत्या करने के वीभत्स तरीके, अंगों का काटना. खोपड़ी का शौटगन से फटकर गिरना (फिल्म Hobo with a shot gun से इंस्पायर्ड), आंखें और आंतें निकलकर बाहर लटक जाना, सेक्स के दौरान गोलीबारी, औरत का सेक्सुअल ओब्जेक्टीफिकेशन, नेता-पुलिस के सिंगल लेयर्ड किरदार, सरकार का तमाशबीन बने रहना और डिसफंक्शनल फैमिली जैसे फॉर्मूले Narcos, Breaking Bad, Game  Of thrones, या टेरेनटीनो के सिनेमा से उठाये लगते हैं. ऐसा इसलिए भी रहा होगा क्योंकि इनके निर्माण में नेटफ्लिक्स या अमेज़न की क्रिएटिव टीम का दखल रहा होगा. और वे अभी भी अपनी पुरानी वेब सीरीज के हैंगओवर में डूबे हैं.

SPOILAR ALERT : साड़ियों में पूर्वांचल की देहाती औरतें हाथ में औटो मैटिक मशीन गन लिए लस्सी की दुकान पर असैसिनेशन बन ताबड़तोड़ गोलियां बरसा रही हैं. एक सौतेली मां अपने बेटे की सेक्स की भूख और गुस्सा शांत करने के लिए नौकरानी को कमरे में ऐसे धकेल रही है जैसे शेर के पिंजरे में मांस के लोथड़े फेंके जाते हैं. ससुर बहू को अपने साथ सेक्स करने पर मजबूर कर रहा है. क्या इंडियन जौइंट फैमिलीज में यही सब होता है? एक फीमेल लीड का ओपनिंग सीन यह है कि वह लाइब्रेरी में मस्तराम पढ़कर मास्टरबेट कर रही है. ऐसे ही कई चौंकाने वाली सीन है जो ग्लोबल औडियंस को भारत की रियल इमेज के तौर पर बेचे जा रहे हैं.

मिर्ज़ापुर का किंग, जैसा भौकाल पाने के लिए सब पाब्लो वाले तरीके ही अपना रहे हैं. गायतोंडे भी उसी कंट्रोल मेनियक सिमटम्स का टूल है. नेता, चुनाव फंड, पौलिटिकल प्रोटेक्शन, किडनैपिंग आदि सारे ट्विस्ट-टर्न्स भी वैसे के वैसे हैं.

कुछ ढंग का भी है..

सो सीरीज में बंदूकें, खून, मर्डर और गैंगस्टर सब कुछ वैसा ही जैसा ड्रग लौर्ड माफिया सिनेमा में होता है. इसलिए इंडियन प्लाट तो नहीं लेकिन किरदार और उनकी भाषा जरूर मौलिक और ह्यूमरस है. यही भाषा और किरदार या कहें संवाद और अभिनय इस सीरीज को कुछ हद तक देखने लायक बनाते हैं. बीच के 3-4 एपिसोड्स बोरिंग है. क्लाइमेक्स में की गयी मेहनत दिखती है क्योंकि सीजन 2 के लिए रोचक एंडिंग तैयार करने का प्रेशर रहा होगा.

बाकी संवाद बहुत चुटीले हैं. कीच सीन गाली से ही हंसाते हैं इसलिए उन्हें हूबहू लिखना मुश्किल है. इसके अलावा एक सीन में मुन्ना त्रिपाठी कॉलेज की चलती क्लास में अपने खिलाफ चुनाव में खड़े कंडीडेट की ठुकाई कर रहा है और मास्साब आँख नीचे किये किताब घूरने में व्यस्त है. फिर मुन्ना के जाने के बाद क्लास को हडकाते हुए कहते हैं, ”अरे कोई पार्टी चल रही है क्या, पढ़ो!”

एक और सीन है जहां पुलिसवाला त्रिपाठी कालीन भैया से मिलने के लिए कमर से झुककर खड़ा है और हिचकिचाते हुए कहता है, ”सर, आपके दर्शन चाहिए थे.”  तो इस पर त्रिपाठी कहता है, ”क्यों मैं देवता हूं.”  इसी तरह एक और सीन है, जिसमें त्रिपाठी पहली बार पंडित ब्रदर्स से मुखातिब होते हैं और त्रिपाठी जब पंडित के परिवार की सुरक्षा की फिक्र की बात करता है तो जवाब में गुड्डू कहता है, ”आपका मुन्ना हमारे घर पर आकर, वापस जिंदा नहीं आया तो?”

सबसे मजेदार सीन मुझे तब लगा जब खाने की टेबल पर कालीन भाई अपने बेटे को औरत की इज्जत करने का उपदेश दे रहे हैं और बीच में बीना हलके से हंस कर उसके सारे उपदेश का गुड़-गोबर कर देती है. ऐसा इसलिए क्योंकि यह वही कालीन भाई है जो बिस्तर पर सेक्स के दौरान बीना के टौप पोजीशन लेने की कोशिश में उसे यह कहकर नीचे ही रखते हैं कि ज्यादा मर्द न बनो और जब वह अपने सेक्सुअल सेटिस्फेक्शन को शिकायती तंज मारती है तो उसे कहता है, “ज्यादा गर्मी चढ़ी है, चकले में बिठा दें तुम्हे. शरीफ घर की औरतों की तरह रहो.”

ऐसे ही सीन से अमेजन प्राइम की इंडियन ओरिजनल सीरीज भरी पड़ी है. जो गाहे-बगाहे हंसा देते हैं. इसके क्रूर और इंटेंस सीन खासकर क्लाइमेक्स में हंसाते ही हैं.

पंकज त्रिपाठी और दिव्येंदु शर्मा का काम सबसे उम्दा है. दोनों से डर भी लगता है और दोनों को और देखना चाहेंगे. उनसे नफरत है तो सहानुभूति भी. इस सीरीज में कोई नायक जैसा आदर्श स्थापित नहीं हो पाता. जो कि सबसे बड़ी कमी है. वकील रमाकांत पंडित के अन्दर आग है जो इंट्रोडक्शन सीन के बाद राख बन जाती है. उनका किरादर बहुत ज्यादा कंप्रोमाइज्ड है. शुरूआती दो एपिसोड्स में हमें महिलाओं का किरदार ज्यादा देखने को नहीं मिलता. लेकिन फिर बीच-बीच में वे आती और जाती रहती हैं और जरूरत पड़ने पर सेक्स और रोमांस के सीन्स में जाया होती रहती हैं. रसिका दुग्गल ही याद रहती हैं. मिर्ज़ापुर की कास्ट और स्टोरीटेलिंग का चुटीला अंदाज छोड़ दें तो स्क्रीन प्ले ही सबसे विलेन बनकर खड़ा है. क्योंकि बंदूकें, खून, मर्डर और गैंगस्टर सब कुछ होने के बावजूद आखिर में कुछ कमी सी रह जाती है. कारण वही कि सब देखा-देखा सा लगता है.

बड़ी बातें इशारे में ही समझें

हर कहानी की तरह इसका भी एक कमर्शियल एजेंडा है लेकिन कुछ परते ऐसी हैं जो आपको सेक्स, हिंसा और डायलौगबाजी से परे होकर देखनी पड़ेंगी. जैसे ब्राहमणवाद का क्रूर और खोखला चेहरा सांकेतिक तौर पर दिखता है. उनके घर में औरत की इज्जत और औरत का विद्रोह दोनों हाजिर है. फ्यूडल सोच वाले बाउजी हैं तो सामाजिक और जातिगत भेदभाव के पुराने प्रेजीड्यूस भी. मुस्लिम और छोटी जाति आज भी इनके यहां निचले पायदान पर खड़ी है और उनके साथ खाना खाने आज भी इनका धर्म भ्रष्ट होता है. घर की औरत जब बावर्ची के साथ हमबिस्तर होती है तो इस रूढ़िवादिता के साइड इफेक्ट्स भी उजागर होने लगते हैं.

ससुर को वंश बढ़ाने के लिए अपना ही खून/बीज चहिये, पित्रात्मक सत्ता के पैरोकार इसके लिए INCEST (कौटुम्बिक व्यभिचार) से भी परहेज नहीं करते जबकि नौकरानी से सरेआम रेप को मूक मंजूरी भी मिलती है. छोटी जाति के आदमी का अफसर बनना बड़ी जातियों को आज भी गंवारा नहीं है. सो सामाजिक विमर्श के तराजू पर ऐसा बहुत कुछ है जो बैकग्राउंड में पार्श्व संगीत की तरह चलता रहता लेकिन बकलोली, सेक्स, हिंसा की अतिरेकता में उभर नहीं पाता. अगर ये फैक्टर सही से उभरते तो यह सीरीज बेहद प्रासंगिक और मौलिक हो सकती थी. सिर्फ नाम देसी रखना काफी नहीं है.

मिर्ज़ापुर और भी हैं

बाकी ऐसी ही कुछ और सीरीज के लिए तैयार रहिये. ZEE5 की नई वेब सीरीज रंगबाज भी इसी लाइन पर है और अरुणोदय सिंह की अपहरण भी. ट्रेलर तो इसे नेट फ्लिक्स और अमेजन के प्रोडक्ट का फौलो अप बता रहे हैं, बनाने वाला स्टूडियो भले ही देसी हैं.

जियो वर्ल्ड सेंटर : रिलायंस ने रखा रियल एस्टेट में कदम

अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की तर्ज पर भारत में जियो वर्ल्ड सेंटर बनेगा. एशिया के धनाढ्य व्यवसायी व भारत के जानेमाने इंडस्ट्रियलिस्ट मुकेश अम्बानी की कम्पनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) अपने जियो ब्रैंड को और विस्तार देने जा रही है. अब वह रियल एस्टेट में हाथ आजमाएगी.

कंपनी ने कुछ सालों में जियो ब्रैंड के तहत कई प्रोडक्ट और सर्विसेज को शामिल किया है, जिनमें फोन, डेटा सर्विस, जियोमनी वौलेट, जियो सिनेमा, जियो टीवी खास हैं. रिलायंस एजियो ब्रैंड नाम से एक औनलाइन फैशन ई-कौमर्स साइट भी ऑपरेट करती है. आरआईएल अपने पहले व्यावसायिक केंद्र का नाम जियो वर्ल्ड सेंटर रखेगी जो देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई में बनेगा.

मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कौम्प्लेक्स में बनाए जाने वाले वर्ल्ड जिओ सेंटर में इंटरनैशनल कन्वेंशन सेंटर, होटल, औफिसेज, 2 मौल और दूसरे डेवलपमेंट्स होंगे. 2 मौलों में से एक लग्जरी मौल होगा, जिस में परफौर्मिंग आर्ट थिएटर और छत पर ड्राइवइन मूवी थिएटर बनाया जएगा.

गौरतलब है कि डीएलएफ ने वर्ष 2008  में दिल्ली में एंपोरियम नाम से एक लग्जरी मौल खोला था. इस मौल को खुले हुए 10 साल हो गए हैं और इस बीच दुनियाभर में लग्जरी ब्रैंड्स को ले कर माहौल में बदलाव आया है. ऐसे में माना जा रहा है कि जियो मौल एक नया स्टैंडर्ड स्थापित करेगा. रिलायंस के दोनों मौल मुंबई के बांद्राकुर्ला कौम्प्लेक्स में 500 मीटर की दूरी पर बन रहे हैं. दूसरे मौल का नाम मेकर्स मैक्सिटी रखा जाएगा, जो आरआईएल और मेकर ग्रुप का जौइंट वेंचर है. इस में टामी हिलफिगर,  जारा,  मैसिमो दुती और दूसरे प्रीमियम ब्रैंड्स के शोरूम होंगे. रिलायंस से जुड़े एक सूत्र का कहना है कि दोनों मौल अगले साल तक शुरू हो सकते हैं.

जियो के लग्जरी मौल में रिलायंस के साथ पार्टनरशिप करने वाले कई ग्लोबल ब्रैंड्स के शोरूम खुलेंगे. इन में जेग्ना, कनाली, बोटेगा वेनेटा और अरमानी शामिल हैं. इन के आलावा रिलायंस के साथ पार्टनरशिप नहीं करने वाले स्विट्जरलैंड के कई ब्रैंड्स और दूसरे टाप ग्लोबल ब्रैंड्स के भी शोरूम यहां होंगे. रिलायंस लग्जरी मौल एक जोन या पूरा एक फ्लोर अबू जानी, संदीप खोसला और राघवेंद्र राठौड़ जैसे इंडियन डिजाइनर्स को देने की योजना पर काम कर रहा है, जिस से दुनिया के सामने देश के टैलेंट को दिखाया जा सके.

मालूम हो कि आरआईएल की यूनिट रिलायंस रिटेल के पास 9,000 से ज्यादा स्टोर्स हैं. यह देश का सब से बड़ा रिटेल नेटवर्क है. रिलांयस रिटेल के पास देश में 1.95 करोड़ वर्गफुट स्पेस है, जहां वह अपने सुपरमार्केट्स और स्पेशलिटी स्टोर्स औपरेट करती है. आरआईएल की ही दूसरी यूनिट रिलायंस ब्रैंड के पास 40 से ज्यादा ग्लोबल ब्रैंड्स हैं.

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