“शुरू मजबूरी में किये थे, अब मजा आ रहा है..” यह संवाद फरहान अख्तर और अमेजन की को-प्रोड्यूस्ड वेब-सीरीज मिर्ज़ापुर में अपराध के दलदल में फंस चुका गुड्डू पंडित अपने आदर्शवादी पिता से कहता है. हालांकि यह मजबूरी भरा फलसफा उन दर्शकों पर ज्यादा फिट बैठता है जो संस्कारी सेंसर बोर्ड के गलियारे से निकले मनोरंजन से उकता कर और नेटफ्लिक्स की Narcos, House of cards और Sacred Games  नुमा अफीम चाट गए हैं. मजबूरी में शुरू हुआ उनका यह अनसेंसर्ड इंटरटेनमेंट अब मजा देने लगा है. जिसमें सेक्स (Explicit Sex Scenes/Incest), हिंसा, गाली-गलौज की पूरी डोज बिना काटछांट और बीप के तफसील से मिल रही है. लेकिन क्या यह मजा इतना ही देसी और ओरिजिनल है जितना इनके टाइटल्स (Amazon originals & Netflix original) सजेस्ट करते हैं? या फिर महेश भट्ट की तर्ज पर बने नए क्लोन डाइरेक्टर्स/राइटर्स 90 के दशक की तरह OUविदेशों से आउटसोर्स किया गया बासी माल ही अनसेंसर और ओरिजिनल के टैग के साथ भारतीय दर्शकों को पेश कर रहे हैं?

वेब- सीरीज मिर्ज़ापुर के जरिए, लेट्स फाइंड आउट.

 रिवोल्यूशनरी Underground Cinema

अमरीकन फिल्म क्रिटिक मिनी फारबर ने 1957 में अपने एक आर्टिकल में पहली बार Underground Cinema का जिक्र किया था. यह टर्म उस तरह की फिल्मों के लिए इस्तेमाल की गयी थी जो हौलीवुड में एंटी-आर्ट रोल प्ले कर रही थीं. ये एक तरह की विद्रोही फिल्में थी जो सिनेमा को बड़े फिल्म स्टूडियोज, स्टार सिस्टम और कमर्शियलिज्म के चंगुल से निकालना चाहती थीं. इसलिए रूस, जर्मनी और अमेरिका में उन दिनों कई नए कलाकारों, निर्देशकों और टेक्नीकल क्रू ने प्रतिबंधित सब्जेक्ट्स के साथ ऐसी ढेर सारी फिल्में बनाईं जो प्रोपर रिलीज तो नहीं पाती थीं लेकिन वीडियो-औन-डिमांड सेक्टर में पहुंचकर धीरे-धीरे अपना कल्ट स्टेटस बना लेती थीं.

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