इंद्र को जब भी अपना सिंहासन डोलता दिखाई देता था या विरोधी से खतरे का एहसास होता था तो वह सुंदर सुंदर अप्सराओं का खूब इस्तेमाल करते थे. यह पौराणिक नीति आज भी हमारे राजनीतिक दलों के लिए एकदम कारगर साबित हो रही है. 70 के दशक के बाद से राजनीति में कई खूबसूरत अभिनेत्रियों का उदय हुआ. उन्हें संसद में भेजने का सिलसिला शुरू हो गया.

पुराणों से सब से अधिक सीख लेती दिखाई देने वाली भाजपा ने कई अभिनेत्रियों को चुनाव मैदान में उतारा. वह अब एक और खूबसूरत अभिनेत्री माधुरी दीक्षित को 2019 के लोकसभा के चुनावों में टिकट देना चाहती थी. हालांकि माधुरी की ओर से चुनाव लड़ने का खंडन कर दिया गया पर इस से हमारे देश की राजनीतिक पार्टियों की जाति, धर्म के साथ साथ सुंदरता से मतदाताओं को बहलाने वाली पौराणिक सोच उजागर जरूर कर दी है.

दो दिन पहले खबर थी कि भाजपा माधुरी दीक्षित को पुणे से लोकसभा चुनाव लड़ाने पर विचार कर रही है पर अब उन के प्रवक्ता ने कहा है कि यह खबर झूठी और काल्पनिक है.

असल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पिछले दिनों ‘संपर्क फौर समर्थन’ अभियान के तहत देश की कई हस्तियों से मिलने उन के घर गए और उन्हें भाजपा सरकार की उपलब्धियों की जानकारी दीं. इसी सिलसिले में वह माधुरी दीक्षित से उन के मुंबई स्थित घर में मिले थे.

अब दो दिन पहले महाराष्ट्र के एक बड़े नेता ने ऐलान किया था कि माधुरी दीक्षित को 2019 का लोकसभा चुनाव पुणे से लड़ाने पर विचार किया जा रहा है.

तेजाब, हम आप के हैं कौन, दिल तो पागल है, साजन, देवदास जैसी कई सफल फिल्मों में काम कर मशहूर हुईं माधुरी दीक्षित कुछ साल पहले शादी कर के अपने पति के साथ अमेरिका में रहीं. कुछ समय बाद वह पति के साथ भारत लौट आईं. यहां आने के बाद उन्होंने एक दो फिल्मों में काम किया, पर अब पर्दे से नदारद हैं.

दरअसल हमारे देश का एक बहुत बड़ा वर्ग जाति, धर्म, वर्ग के साथ साथ सुंदरता को देख कर भी वोट करता है. मतदाताओं की इस मानसिकता का फायदा उठाते हुए राजनीतिक दलों ने फिल्म इंडस्ट्री से चुन चुन कर अभिनेता अभिनेत्रियों को टिकट देने  शुरू किए. बेवकूफ मतदाता इन्हें सिर आंखों पर बैठा लेते हैं और इन के पक्ष में जमकर मतदान करते हैं.

लेकिन होता यह है कि ये लोग चुनने के बाद न तो संसद में नजर आते हैं, न ही अपने मतदाताओं के इलाके में. फिल्मी सितारों को संसद में कभी जनता के सवालों पर बोलते हुए नहीं सुना जाता.

हेमामालिनी अपने लोकसभा क्षेत्र मथुरा में जाट परिवार की बहू होने और बारबार शोले फिल्म का डायलौग ‘चल धन्नो, बसंती की इज्जत का सवाल है’, बोल कर मतदाताओं से वोट झटक लेती हैं. बेवकूफ मतदाता अपना बेशकीमती मत महज फिल्म के एक डायलौग पर खुश हो लुटा देता है.

मतदाता को अपने वोट की कीमत पता ही नहीं है. 5 साल तक अगर वह नेताओं से इलाके का विकास न होने का रोना रोता है तो महज इसी गलती की वजह से कि उस ने अपना मत महज हीरोइन को देख कर, नाम सुन कर, उस की खूबसूरती के चर्चे सुन कर बर्बाद कर दिया था.

आप जिस नुमाइंदे को चुन रहे हैं उस की सोच क्या है, इलाके में बिजली, पानी, सड़कों, अस्पताल, स्कूल, कौलेज का इंतजाम करवा देना मात्र सही मायने में विकास नहीं कहलाता, इन के साथसाथ असली विकास उस क्षेत्र में जाति, धर्म, वर्ग, ऊंचनीच के भेदभाव रहित सोच का विकास और फैलाव करने में अपना योगदान देता है. अपने कामों से बराबरी की सोच को क्षेत्र में विकसित करता है. वही लोकतंत्र का सच्चा प्रतिनिधि माना जाता है. लोकतंत्र की मजबूती इसी में है.

जगह जगह दंगे फसाद, जातीय, धार्मिक तनाव का वातावरण लोकतांत्रिक सोच के अभाव में उत्पन्न होती है. नेताओं के बयानों से एक वर्ग में गुस्सा तो दूसरा खुश इसीलिए होता है क्योंकि नेता की सोच भेदभाव और पक्षपातपूर्ण होती है.

राजनीतिक दलों की ऐसी संकीर्ण सोच पर लानत है. क्या वे ऐसे उम्मीदवार नहीं ढूंढ सकते जो देश की समस्याओं को अच्छे से समझते हों, विशेषज्ञ हों और वे गरीबी, भेदभाव, छुआछूत, शिक्षा, चिकित्सा, तकनीक, विज्ञान जैसे विषयों पर देश के लिए कुछ उल्लेखनीय काम कर सकें.

ऐसा नहीं है कि ऐसे योग्य लोग हैं नहीं, भरे पड़े हैं पर राजनीतिक दलों को विकास में योगदान देने वाले योग्य लोग नहीं, वोट बटोरने वाले, उन्हें जिताने वाले उम्मीदवार चाहिए. ऐसे उम्मीदवार चाहिएं जो जनता को बहला कर, फुसला कर, नाच गा कर, भावनात्मक मुद्दों को आगे कर के संसद और विधानसभाओं में पहुंच सकें.

दरअसल राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं का ध्यान भंग करने, उन का विवेक खत्म करने के लिए पौराणिक चालें चलने की कोशिश करती हैं. इंद्र अपने विरोधियों को पस्त करने के लिए हमेशा अप्सराओं का इस्तेमाल करते थे. हमारे राजनीतिक दल खूबसूरत हीरोइनों का इस्तेमाल कर मतदाताओं का विवेक खत्म करने की कोशिशें करती हैं. एकाध को छोड़ कर कोई भी हीरोइन अपने क्षेत्र के मतदाताओं की समस्याओं का समाधान करने में नाकाम रही हैं.

जनता फिल्मी सितारों के अभिनय को देख कर अपना मनोरंजन कर सकती है लेकिन अगर वह उन की खूबसूरती देख कर मनोरंजन के नाम पर अपना भविष्य उन्हें सौंपती है तो यह हद दर्जे की बेवकूफी ही है.

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