परिवार के बल पर चल रही राजनीतिक पार्टियों में अब कलह और बिखराव पैदा हो गया है. परिवार बंट रहे हैं तो पार्टियां भी परिवार के सदस्यों के बीच विभाजित हो रही हैं. शुरुआत हरियाणा में इंडियन नैशनल लोकदल से हो चुकी है.

चौधरी देवीलाल के परिवार में चल रही कलह का अंजाम 9 दिसंबर को हिसार से सांसद दुष्यंत चौटाला द्वारा नई पार्टी के ऐलान के रूप में सामने आया है. उन्होंने जींद में रैली कर जननायक जनता पार्टी नाम से नई पार्टी का ऐलान किया है. दुष्यंत चौटाला को ओमप्रकाश चौटाला ने इनलो से निकाल दिया गया था. दुष्यंत चौटाला ओमप्रकाश चौटाला के पोते और अजय चौटाला के बेटे हैं.

दुष्यंत चौटाला की नई पार्टी हरियाणा के 3 लालों देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल के परिवारों से निकली चौथी पार्टी है. चौधरी देवीलाल ने अपने राजनीतिक जीवन में कई पार्टियां बनाई थी. वह कांग्रेस छोड़ने के बाद भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी, लोकदल, जनता दल, दलित मजदूर पार्टी, समता पार्टी में रहे. इस के बाद उन के बेटे ओमप्रकाश चौटाला ने 1996 में इनेलो का गठन किया था.

2001 में देवीलाल की मृत्यु के बाद पार्टी में संघर्ष शुरू हो गया था. वर्तमान में ओमप्रकाश चौटाला इनेलो के प्रमुख हैं और उन के बड़े बेटे अजय सिंह पार्टी के महासचिव पर परिवार में आपसी कलह के चलते अजय सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया.

अब इनेलो पर ओप्रकाश चौटाला और उन के दूसरे बेटे अभय सिंह का कब्जा है. अभय सिंह विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं. दुष्यंत सिंह द्वारा बनाई गई नई पार्टी में उन की मां डबवाली से विधायक नैना चौटाला, भाई दिग्विजय सिंह साथ हैं. दिग्विजय सिंह दो बार राजस्थान से विधायक रहे और इंडियन नैशनल स्टूडेंट संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने.

पिछले कुछ समय से चौटाला परिवार में राजनीतिक विरासत को ले कर झगड़ा सड़कों पर आ गया था. ओमप्रकाश चौटाला शिक्षक भर्ती घोटाला मामले में जेल में हैं.

दुष्यंत चौटाला ने नई पार्टी के झंडे पर चौधरी देवीलाल की फोटो लगाई है. उन का कहना है कि इनेलो का गठन चौधरी देवीलाल ने नीतियों और सिद्घांतों को ले कर किया था पर अब पार्टी ने उन के सिद्घांतों को त्याग दिया है. कार्यकर्ताओं को  परेशान करना शुरू कर दिया गया और उन के पिता को पार्टी से बाहर निकाल दिया गया.

पार्टी के झंडे पर ओमप्रकाश चौटाला की फोटो न होने पर दुष्यंत सिंह ने कहा कि वह हमारे परिवार के मुखिया जरूर हैं पर वह विरोधी दल में हैं. झंडे पर उन की फोटो नहीं देना हमारी मजबूरी है.

राजनीतिक परिवारों का बंटना कोई नई बात नहीं है. देश के सब से बड़े राजनीतिक परिवार माने जाने वाले गांधी परिवार में संजय गांधी की मृत्यु के बाद जबरदस्त कलह देखने को मिली. संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी ने अपनी सास और तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ चली गई थीं. मेनका गांधी को परिवार से अलग होना पड़ा. बाद में वह अपने परिवार की राजनीतिक दिशा से एकदम विपरीत जा कर भाजपा में शामिल हो गईं. उन के पुत्र वरुण गांधी भी भाजपा की ओर से सांसद बने. मेनका गांधी की अपने जेठ राजीव गांधी और अपनी जेठानी सोनिया गांधी से भी नहीं बनी.

सिंधिया परिवार में भाई और बहनों के कलह के चलते अलगअलग राजनीतिक पार्टियों में चले जाने की बात पुरानी है. ठाकरे परिवार कलह में दो फाड़ हो गया. बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद उन के पुत्र उद्घव ठाकरे ने शिवसेना पर कब्जा कर लिया तो भतीजे राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्र्माण सेना बना ली.

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में कलह जारी है. मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश और भाई शिवपाल सिंह में ठनी हुई है. मुलायम सिंह यादव भाई शिवपाल के पक्ष में दिखाई देते हैं. शिवपाल अब नई पार्टी के गठन की सोच रहे हैं.

बिहार में लालू यादव परिवार में भाइयों के बीच मनमुटाव की खबरें सुर्खियों में हैं तो तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार में उन के बेटों के बीच राजनीतिक विरासत के बंटवारे का हल नहीं हो पाया है.

दरअसल आज कलह से कोई भी परिवार नहीं बच पा रहा है. वह चाहे राजनीतिक परिवार हो या व्यापारिक या फिर आम व्यावसायिक या नौकरीपेशा.

आज के दौर की बात करें तो संयुक्त परिवार की अवधारणा लगभग खत्म हो चुकी है जब सभी तरह के फैसले परिवार का मुखिया लेता था और वह सर्वमान्य होता था. अब नई पीढी परिवार के बड़ेबुजुर्गों की सलाह के हर फैसले खुद लेना चाहता है. वह किसी का हस्तक्षेप बर्दास्त नहीं कर सकता. हर सदस्य अपनेफायदे और स्वार्थ के वशीभूत हो रहा है.

परिवारों में बढ़ती कलह की इस स्थिति को टाला नहीं जा सकता. अब परिवारों में न धर्म की प्रेम, शांति, एकता जैसी सीख काम आ रही, न स्वयं का विवेक. अगर किसी समस्या का हल न होता दिख रहा तो स्थिति को वक्त के भरोसे छोड़ देने के अलावा कोई चारा नहीं है.

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