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अकेली औरत का भरोसा : इंदरजीत कौर से क्या गलती हुई

रविवार का दिन था. मुद्दत के बाद सभी भाईबहन अमृतसर में रहने वाली अपनी बड़ी बहन इंदरजीत कौर के घर जमा हुए थे. इंदरजीत कौर के 6 भाईबहन थे. सब से बड़ी जगजीत कौर थीं, जिन की मृत्यु काफी अरसा पहले ही हो चुकी थी. दूसरे नंबर पर स्वयं 68 वर्षीय इंदरजीत कौर थीं. भाईबहनों में सब से छोटा था कंवलजीत सिंह, जो अपने बीवीबच्चों के साथ दिल्ली में रहता था.

इंदरजीत के घर पर इन सभी भाईबहनों का जमावड़ा कंवलजीत सिंह के दिल्ली से अमृतसर आने की खुशी में हुआ था. चूंकि परिवार के सभी लोग काफी दिनों बाद मिले थे, इसलिए मिल कर बहुत खुश थे.

इस भागमभाग की जिंदगी में कहां किसी को किसी से मिलने की फुरसत मिलती है. सभी भाईबहन अधेड़ आयु के थे और इस उम्र में भी वे अपने बचपन की खुशियों से यूं वंचित नहीं रहना चाहते थे. सो सब ने मिल कर खूब हंसीमजाक कर बचपन की यादें ताजा कीं.

अगले महीने आने वाले रक्षाबंधन की बात चल रही थी कि यह त्यौहार कहां और किस के घर मनाया जाए. इस मुद्दे पर सभी ने अपनीअपनी राय पेश की. अंत में तय हुआ था कि रक्षा बंधन पर सभी बहनभाई कंवलजीत के घर दिल्ली जाएंगे और इसी बहाने दिल्ली भी घूम लेंगे. यह बात 20 जुलाई, 2018 की है. इस के अगले दिन 21 जुलाई को सभी लोग अपनेअपने घर चले गए.

करीब 50 वर्ष पूर्व इंदरजीत की शादी जोगिंदर के साथ हुई थी. इस दंपति की कोई संतान नहीं थी. उन के पति जोगिंदर सिंह की मृत्यु को भी काफी दिन गुजर चुके थे. इंदरजीत कौर बचपन से ही नेत्रहीन थीं. पर अपनी कार्यकुशलता और बुद्धि के बल पर उन्होंने अपने आप को कभी किसी का मोहताज नहीं बनने दिया था.

अपनी पढ़ाई के साथ उन्होंने संगीत में विशारद हासिल की और शिक्षा पूरी कर के बाबा दीप सिंह कन्या विद्यालय अमृतसर में बतौर संगीत अध्यापिका के रूप में नौकरी कर ली थी.

संतानहीन होने के कारण वह बच्चों से अधिक प्रेम और स्नेह करती थीं. नेत्रहीन होने के बावजूद वह अपनी प्रतिभा का हुनर बच्चों को सिखाने के कारण स्कूल में काफी प्रसिद्ध थीं. स्कूल का हर बच्चा इंद्रजीत कौर के नाम से वकिफ था और उन की दिल से इज्जत करता था.

साल 2012 में इंदरजीत कौर स्कूल से सेवानिवृत हो गई थीं और इन दिनों घर पर ही रह कर अपने पुराने विद्यार्थियों और गरीब बच्चों को मुफ्त में संगीत की शिक्षा दिया करती थीं. अन्य दिनों की तरह 24 जुलाई, 2018 को भी वह रात का खाना खाने के बाद अपने कमरे में जा कर सो गई थीं.

डेयरी पर काम करने वाला नौकर अनिल रोजाना की तरह 25 जुलाई की सुबह भी इंदरजीत कौर के यहां दूध देने आया तो उस ने दरवाजा खटखटाया.

काफी देर तक दरवाजा खटखटाने के बाद भी दरवाजा नहीं खुला तो वह हैरान हुआ. क्योंकि पिछले कई सालों से वह इंदरजीत कौर के घर दूध देने आता था. आंधीतूफान हो या बरसात, इंदरजीत कौर दरवाजा खटखटाते ही हाथ में दूध का बरतन लिए दरवाजे पर आ जाती थीं.

बीमार होने के बावजूद भी वह दूध लेने दरवाजे तक पहुंच जाया करती थीं. फिर आज ऐसा क्या हुआ जो अभी तक दरवाजा नहीं खुला.

मन ही मन सोचता हुआ अनिल दरवाजे का कुंडा खोल कर अंदर चला गया. उस ने अंदर जा कर देखा तो इंदरजीत कौर बिस्तर पर चित अवस्था में गिरी पड़ी थीं. उस ने नजदीक जा कर उन्हें आवाज दी.

कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो वह घबरा कर साथ वाली गली में रह रहे इंदरजीत कौर के भाई गुलजार सिंह के घर चला गया. उस ने गुलजार सिंह को बताया कि मांजी बेहोश पड़ी हुई हैं. इतना सुनते ही गुलजार सिंह और उस की पत्नी पिंकी दौड़ते हुए इंदरजीत कौर के घर पहुंचे.

कमरे में पहुंच कर उन्होंने देखा कि अलमारी टूटी हुई थी और इंदरजीत कौर के मुंह पर तकिया रखा हुआ था. इंदरजीत कौर के भारी वजन के टौप्स जो कि उन के कानों में थे, उन्हें बेरहमी से खींच कर निकाला गया था. हाथों में 2 सोने की भारी चूडि़यां भी नहीं थीं. उन की बाजुओं पर जगहजगह खरोंचों के निशान थे. अलमारी में से एक हार, अंगुठियां और कैश गायब था. उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि लूट के इरादे से उन की बहन की हत्या की गई है.

उन्होंने पहले उन्हें झकझोर कर उठाने की कोशिश की. जब कोई हलचल नहीं हुई तो नब्ज टटोली. पता चला कि उन का शरीर एकदम ठंडा पड़ चुका था. लग रहा था जैसे उन की मृत्यु हुए काफी समय बीत गया हो. घबरा कर उन्होंने जल्दी से पुलिस का 100 नंबर मिलाया पर 15 मिनट तक रुक रुक कर घंटी बजती रही, किसी ने फोन नहीं उठाया.

आखिर उन्होंने यह सोच कर 108 नंबर डायल किया कि शायद उन की सांसें बाकी हों. मगर 108 नंबर पर भी घंटी बजती रही, किसी ने फोन नहीं उठाया. इस बीच किसी ने मोहल्ले के ही एक डाक्टर को बुला लिया. डाक्टर ने जांच कर के इंदरजीत कौर की मौत हो जाने की पुष्टि कर दी.

किसी तरह पुलिस को सूचना दी तो करीब साढ़े 10 बजे थाना डिविजन-बी के अंतर्गत आने वाली पुलिस चौकी शहीद ऊधमसिंह नगर के इंचार्ज भूपिंदर सिंह उन के घर आए. उन्होंने पूछताछ के साथ ही घटना की सूचना थाना डिविजन-बी के प्रभारी सुखविंदर सिंह को भी दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सुखवीर सिंह एएसआई भूपिंदर सिंह, दलजीत सिंह, लखविंदर सिंह, हवलदार गुरमेज सिंह, पवन कुमार, गुलजार मसीह और क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम के साथ वहां पहुंच गए. इंदरजीत कौर का मकान अमृतसर शहर के भीड़भाड़ वाले इलाके शहीद ऊधम सिंह नगर की गली नंबर 5 में था. बंद गली होने के कारण उस में बाहर के लोगों का आनाजाना ना के बराबर था. कोई भूलाभटका मुसाफिर ही गलती से उस तरफ आ जाए तो बात अलग थी.

प्रथम तफ्तीश में थानाप्रभारी सुखबीर सिंह को पता चला की इंद्रजीत कौर उस घर में कई वर्षों से अकेली रहती थीं. उन की हत्या लूट के इरादे से की गई थी और यह किसी भेदी या परिचित आदमी का ही काम लग रहा था, जिस ने पहचाने जाने के डर से इंदरजीत कौर की हत्या की थी.

इंदरजीत कौर साल 2012 में सरकारी स्कूल से बतौर अध्यापक रिटायर हुई थीं. उन्हें हर महीने पेंशन के 40 हजार रुपए मिलते थे. पति की भी कुछ समय पहले मौत हो चुकी थी और संतान नहीं होने के कारण वह घर में अकेली रहती थीं.

पुलिस ने अनुमान लगाया कि वारदात को अंजाम देने वालों के लिए वह साफ्ट टारगेट थीं. बदमाशों ने रात को घर में घुस कर पहले उन की हत्या की होगी और बाद में वे लोग घर में रखी नकदी और लाखों रुपए के सोने के गहने ले कर फरार हो गए होंगे.

घटना के बारे में पता चलते ही सीपी (अमृतसर) सुधांशु शेखर श्रीवास्तव, डीसीपी जगमोहन सिंह, एडीजीपी जगजीत सिंह वालिया, डीजीपी (इनवैस्टीगेशन) और कई थानों के थानाप्रभारी घटनास्थल पर पहुंच गए थे.

एक्सपर्ट्स ने मौकाएवारदात से फिंगरप्रिंट उठाए. काफी खोजबीन करने पर भी घटनास्थल से कोई ऐसा सुराग नहीं मिला, जिस से हत्यारों तक पहुंचा जा सके. बहरहाल मृतका के भाई गुलजार सिंह अरोड़ा के बयानों पर हत्या और लूटपाट का मुकदमा भादंवि की धारा 306 और 120 बी के तहत दर्ज कर लिया गया. थानाप्रभारी सुखबीर सिंह ने लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दी और आगे की तफ्तीश में जुट गए.

जांच के दौरान उन्होंने क्षेत्र के कई संदिग्ध युवकों को पूछताछ के लिए उठाया. जेल में और जेल के बाहर के उन सभी बदमाशों से पूछताछ की जो इस तरह की वारदातों को अंजाम देने में सिद्धहस्त थे.

फिर भी इंदरजीत की हत्या का कहीं कोई सुराग नहीं मिला. इस से निराश हो कर थानाप्रभारी सुखबीर सिंह ने अपनी जांचपड़ताल का दायरा मृतका के घर के आसपास और उन के जानने वाले लोगों तक फैलाया.

हर उस आदमीऔरत पर कड़ी नजर रखी जाने लगी, जिस का मृतका के घर आनाजाना था. खोजबीन करने पर एक ऐसा नाम उभर कर सामने आया, जिस का न केवल मृतका के घर काफी आनाजाना था बल्कि वह उन के रुपएपैसों का भी पूरा हिसाब रखता था. उस का नाम था दविंदर सिंह.

दविंदर सिंह, सुलतानविंड, अमृतसर के मेन बाजार में रहता था और मृतका की सहेली सुदेश का पति था, जो स्कूल में पढ़ाया करती थी.

दविंदर सिंह पेशे से वकील था और सहानुभूति के नाते उस का मृतका के घर में काफी आनाजाना था. वह उन के बैंकों का काम भी किया करता था. दरअसल इंदरजीत कौर के भाईभाभी ने बताया था कि इंदरजीत कौर को रिटायरमेंट पर लगभग 30 लाख रुपए मिले थे.

इस के अलावा उन्हें हर महीने 40 हजार रुपए पेंशन भी मिलती थी. उन का खर्च ज्यादा नहीं था. इसलिए उन्होंने अपना लाखों रुपया ब्याज पर दे दिया था. जिस का ब्याज हर महीने दविंदर सिंह ही लाया करता था.

किनकिन लोेगों को यह पैसा ब्याज पर दिया गया था और किनकिन लोगों से पैसा और ब्याज लेना था, इस की सारी जानकारी दविंदर सिंह को ही थी. मृतका का काफी पैसा कमेटियों में भी लगा हुआ था.

पैसा बढ़ाने के लिए इंदरजीत कौर ने मोटीमोटी कमेटियां भी डाल रखी थीं. यह सारा लेखाजोखा भी दविंदर के पास था. ऐसे में आशंका जताई गई कि कहीं ब्याज पर दिया पैसा तो हत्या का कारण नहीं बना?

बहरहाल दविंदर को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया गया. उस से बड़ी गहराई से पूछताछ की गई. पर वह इस मामले में बेगुनाह निकला. उस के पास इंदरजीत कौर के पैसे का पाईपाई का पूरा हिसाब था.

दविंदर से पूछताछ के बाद पुलिस एक बार फिर से अंधेरी गलियों में खो गई. इस बीच पुलिस ऐसे सुनारों पर भी नजर रखे हुए थी जो चोरीचकारी का माल खरीदते थे. पुलिस को आशा थी कि लुटेरे लूटा हुआ माल बेचने के लिए सुनार के पास जरूर जाएंगे.

थानाप्रभारी सुखबीर सिंह का अगला निशाना थी सुखी. इंदरजीत कौर ने अपनी देखभाल, खाना बनाने, कपड़े धोने, सफाई करने आदि कामों के लिए सुखी नाम की महिला को अपने पास रख रखा था. जो 2 हजार रुपए महीना ले कर उन के घर के काम किया करती थी. दविंदर के बाद एक सुखी ही थी जो इंदरजीत कौर के घर के चप्पेचप्पे से परिचित थी.

थानाप्रभारी ने सुखी के बारे पता लगवाया तो पता चला कि सुखी का असली नाम सुरजीत कौर है और वह बलबीर सिंह की पत्नी है. सुखी तरनतारन रोड पर रायल होटल के पास रहती थी. सुखी को थाने बुला कर महिला पुलिस अधिकारी के समक्ष पूछताछ की गई तो वह भी निर्दोष निकली. इस के बाद पुलिस ने अपनी तफ्तीश का रुख मृतका के रिश्तेदारों और खास परिचितों की ओर मोड़ दिया.

मृतका इंदरजीत कौर के पास में ही रहने वाला भाई पहले केबल का काम करता था पर बीमारी के चलते अब वह काफी अरसे से घर पर ही था. अन्य रिश्तेदार भी दूरदूर रहने वाले थे और अच्छी हैसियत में थे. थानाप्रभारी की समझ में यह नहीं आ रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इंदरजीत के घर किसी ने किसी को आतेजाते हुए नहीं देखा हो.

इस वारदात को अंजाम देने के लिए बाहर से कोई नहीं आया होगा. जो कोई भी था, वह गलीमोहल्ले का ही होगा. भले ही वारदात को अंजाम देने के लिए उस ने आदमी बाहर से बुलाए हों पर साजिशकर्ता गली का ही कोई होगा. इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने एक बार नए सिरे से पूरे घटनाक्रम को समझना शुरू किया और मोहल्ले के हर घर का नजर रखवाई.

इंदरजीत कौर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ चुकी थी. रिपोर्ट के अनुसार उन की मौत दम घुटने के कारण हुई थी. मृतका के अंतिम संस्कार में बहुत भीड़ थी. इतना ही नहीं एक दिन पहले मृतका को अंतिम विदाई देने के लिए क्षेत्र के सभी स्कूल बंद किए गए थे.

एक ऐसी बात थी जो थानाप्रभारी सुखबीर सिंह को खटक गई थी. मृतका की गली में रहने वाला बबला नामक आदमी उन की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हुआ था. देखने को तो वह एक साधारण सी बात थी, पर इंसपेक्टर सुखबीर को इस के पीछे का मकसद दिखाई देने लगा.

इंदरजीत कौर के घर से कुछ ही दूरी पर किराए पर रहने वाला बबला सफेदी करने का काम करता था. उस का मृतका के घर काफी आनाजाना था. भला ऐसा कैसे हो सकता था कि जहां अंतिम यात्रा में सैकड़ों लोग आए हों. वहीं मृतका का करीबी बबला आया था.

थानाप्रभारी ने बबला के बारे में और जानकारी एकत्र की तो पता चला कि वह वारदात वाले दिन से ही फरार है और जिस मकान से वह फरार हुआ था पहले वह मकान उस की मां ने किराए पर लिया था और वह मृतका इंदरजीत कौर के घर नौकरानी का काम किया करती थी. इस कारण बबला का मृतका के घर आनाजाना था.

बबला का असली नाम रणजीत सिंह था. वह अपनी पत्नी सुमन के साथ किराए के मकान में रहता था. यह दंपति गांव चितौड़गढ़, फतेहगढ़ चूडियां, गुरदासपुर का रहने वाला था और शहीद ऊधमसिंह नगर में किराए के मकान में रह रहा था. घर की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी और उस के सिर पर हजारों रुपए का कर्जा भी था.

थानाप्रभारी ने तुरंत बबला के घर पर रेड कर दी. पर वह पहले ही फरार हो चुका था. जब उस की पत्नी सुमन से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि उसे मालूम नहीं वह कहां गए हैं. वह घर के खर्च के लिए पैसे भी नहीं दे कर गए. उस ने बताया कि उस के पास मात्र 50 रुपए हैं.

पुलिस ने जब बबला के घर में तलाशी ली तो घर से 6 मोबाइल फोन, एक लैपटौप व 500-500 रुपए के 15 हजार रुपए बरामद किए गए. जबकि उस की पत्नी सुमन ने कहा था कि मेरे पास सिर्फ 50 रुपए हैं. थानाप्रभारी ने पूछताछ के लिए सुमन को हिरासत में ले लिया और थाने ले आई.

पूछताछ के दौरान सुमन ने इंदरजीत कौर की हत्या और उस के घर हुई लूटपाट के अपराध को स्वीकार करते हुए बताया कि उन्हें पता था कि इंदरजीत कौर अकेली हैं और उन के घर लाखों रुपए का सोना और नकदी रखी है. बबला का काम पिछले काफी महीनों से नहीं चल रहा था. उस के सिर पर देनदारी थी और लेने वाले दिनरात तगादा कर के उसे धमका रहे थे. इसलिए उन्होंने लूट की योजना बनाई.

रात के समय जब पूरा मोहल्ला सो गया तो बबला इंदजीत कौर के घर में दाखिल हुआ. वह यह बात अच्छी तरह से जानता था कि जाग जाने पर इंदरजीत कौर उसे पहचान लेंगी, क्योंकि इंदरजीत की सूंघने और समझने की शक्ति बहुत तेज थी. वह किसी चीज को सूंघ कर उस का नाम बता देती थीं.

अलमारी तोड़ते समय शोर होने से इंदरजीत का जाग जाना लाजमी था. इसलिए वह घर से ही उन की हत्या की योजना बना कर गया था. घर में दाखिल होते ही सब से पहले उस ने सोई हुई इंदरजीत कौर के मुंह पर तकिया रख कर तब तक दबाता रहा जब तक कि उन के प्राण नहीं निकल गए थे.

इस के बाद उस ने अलमारी खोल कर उस में रखे 24 हजार रुपए निकाल लिए. फिर उस ने इंदरजीत के पहने हुए गहने उतारे. जब बबला वारदात को अंजाम दे रहा था तो उस की पत्नी सुमन घर की छत पर खड़ी हो कर निगरानी कर रही थी.

वह लगातार अपने पति के संपर्क में थी. लूटे हुए 24 हजार रुपयों में से 7 हजार रुपए बबला ने राणा नाम के व्यक्ति को उधार के वापस लौटाए थे. बाकी के 15 हजार रुपए पुलिस ने बरामद कर लिए.

पुलिस काररवाई पूरी करने के बाद और एक दिन के रिमांड की समाप्ति पर सुमन को 29 जुलाई को अदालत में पेश कर जिला जेल भेज दिया गया. बबला कथा लिखे जाने तक पुलिस की पकड़ से दूर था पुलिस बड़ी तेजी से उस की तलाश में जुटी थी.

—पुलिस सूत्रों पर आधारित

मंजिल (भाग-4) : पुरवा और सुहास की खुशियां क्या कायम रह पाईं

एक दिन दुकान पर जाने से पहले सुहास सागर के घर पहुंच गया. बेला उसे देख कर चकित हो बोली, ‘‘क्या हुआ, देवरजी, आज दुकान जाने की जगह हम लोग कैसे याद आ गए?’’

मुसकरा कर सोफे पर बैठते हुए सुहास बोला, ‘‘बहुत दिनों से आप के हाथ की चाय नहीं पी थी भाभी, इसीलिए.’’

सागर ने तौलिए से चेहरा पोंछते हुए कहा, ‘‘हां भई, चाय तो मुझे भी चाहिए,’’ फिर सुहास की बगल में बैठते हुए बोले, ‘‘तुम्हारी बहन की शादी बहुत शानदार रही.’’

सुहास कुछ बोलता कि बेला ने रसोई से चुटकी ली, ‘‘श्वेता तो गई सुहास, अब हमारी देवरानी कब आ रही है?’’

यह सुनते ही सुहास का मन गुदगुदा उठा. वह यहां बात करने ही तो आया है. झट से बोला, ‘‘जब आप जैसी भाभियां कोशिश करेंगी तभी तो आएगी.’’

‘‘ऐसा है तो कल ही मैं वहां जा कर बात छेड़ देती हूं,’’ बेला ने कहा.

‘‘भाभी हों तो ऐसी,’’ सुहास चहक उठा, इतनी सरलता से बात बन जाएगी यह उस ने सोचा भी नहीं था. इसीलिए तो उसे हर छोटीबड़ी समस्या के साथ बेला की याद आ जाती है.

बेला के सुझाव पर ही सुहास ने अपनी दुकान पर मन लगा कर काम करना शुरू कर दिया था और सलाह लेने के बहाने वह जबतब पुरवा के घर पहुंच जाता था. सहाय साहब उसे देखते ही प्रसन्न हो जाते. उसे व्यापार बढ़ाने के नए गुर सिखाते. आखिर उस की लगन रंग लाई और एक दिन सहाय साहब रिश्ते की बात ले कर वर्मा साहब के घर पहुंच गए.

वर्मा दंपती ने सहाय साहब का खूब स्वागतसत्कार किया. एकदूसरे का हाल पूछा गया. श्वेता के विवाह पर हुए भव्य आयोजन की सहाय साहब ने प्रशंसा की और अंत में बोले, ‘‘वर्मा साहब, मैं भी अब अपनी जिम्मेदारी जल्दी पूरी करना चाहता हूं. आप ने तो पुरवा को देखा ही है.’’

वर्मा साहब और रजनीबाला एक स्वर में बोले, ‘‘आप की बेटी तो बहुत सुंदर और सुशील है. हम दोनों को बहुत पसंद है.’’

सहाय दंपती को मनचाहा वरदान मिल गया. प्रसन्नता से गद्गद होते हुए सहाय साहब बोले, ‘‘वर्मा साहब, हमें भी आप का बेटा बहुत पसंद है. जब से वह हम लोगों से मिला है, हम अपने बेटे की दूरी भूल गए हैं. और इसी उम्मीद पर आए हैं कि…’’

वर्मा साहब ने उन की बात पूरी होने से पहले ही कहा, ‘‘आप की बेटी हमारी हुई सहाय साहब, हमारा बेटा आप शौक से ले जा सकते हैं.’’

रजनीबाला सहित सभी की खुशी ठहाकों में गूंज उठी. मिठाई मंगाई गई और विवाह तय हो गया. मुंह मीठा कर के सहाय साहब जब घर को वापस लौटे तो उन के कदम मारे खुशी के जमीन पर नहीं पड़ रहे थे.

देखते ही देखते सुहास और पुरवा की सगाई का दिन भी तय हो गया. दोनों जब भी मिलते, कल्पनाओं की उड़ान भरते. उन्हें लगता जैसे वे किसी स्वप्नलोक में घूम रहे हों.

पुरवा कहती, ‘‘सुहास, मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि हम दोनों अब विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं.’’

‘‘हां, सच, अभी तो हम मिले ही थे और एकदूसरे के हो जाने की चाहत में तड़प ही रहे थे कि हमारे मातापिता ने सारे रास्ते आसान कर दिए.’’

पुरवा कुछ पल सोचती और कहती, ‘‘सुहास, पता नहीं क्यों अब डर सा लगता है.’’

‘‘अरे, यह क्या बात हुई.’’

‘‘हां, सच, अभी तक लगता था कि हम प्यार का खेल खेल रहे हैं, पर सुहास, शादी खेल तो नहीं है न,’’ पुरवा की सोच गहरी हो जाती.

‘‘कहती तो ठीक हो, पुरवा. देखो न, तुम से विवाह के लिए मुझे कितने पापड़ बेलने पड़ गए, वरना मैं और दुकान…’’

सुहास की बातें भले ही हंसी में टल जातीं पर यह भी सच था कि दोनों अपने आने वाले कल के लिए जहां बहुत खुश थे, वहीं एक भय भी उन में समाया हुआ था.

दोनों की सगाई वाले दिन श्वेता अपने पति व ससुराल वालों के साथ आई थी. उस का रूप खिलाखिला जा रहा था और चेहरा उल्लास से दमक रहा था.

बहुत से नए चेहरों से पुरवा को परिचित कराया गया. बेला ने हंसते हुए कहा, ‘‘देवरानीजी, मेरे देवर को बहुत संभाल कर रखना. अपनी धड़कनों में कैद कर के.’’

पुरवा मुसकरा दी. उस की आंखों में भविष्य के सुनहरे सपने तैर रहे थे. वह उस दिन के बारे में सोचने लगी जब वह सुहास से मिली थी. सच, कैसीकैसी घटनाओं से जुड़ कर जीवन के दिन गुजरते हैं.

और वह घड़ी भी आ गई जब दोनों का विवाह धूमधाम से संपन्न हो गया. पुरवा वर्मा परिवार की बहू बन कर आ गई. जिन लोगों ने पहले से उसे देख रखा था वह तो खुश थे ही, पर जो पहली बार उसे देख रहे थे, वे सब भी बारबार उस की सुंदरता की तारीफ कर रहे थे. महिलाएं रजनीबाला से कह रही थीं, ‘‘मिसेज वर्मा, आप बहू बहुत सुंदर ढूंढ़ कर लाई हैं.’’

एक ने टोका, ‘‘सुना है दोनों पहले से एकदूसरे को जानते हैं.’’

रजनीबाला हंस दीं, ‘‘हां भई, आजकल बच्चे पहले पसंद कर लेते हैं, मांबाप तो बाद में मिलते हैं. इस में नया क्या है?’’

रजनीबाला के जाने के बाद एक महिला बोली, ‘‘तभी तो इतनी अच्छी बहू मिल गई है. सुना है लड़की के पिता ने ही इन के बेटे को काम पर रखवाया है.’’

दूसरी ने उसे और सुधारते हुए कहा, ‘‘अरे, काम पर नहीं, व्यापार शुरू करवाया है. दुकान खुलवा दी है.’’

पुरवा सारी बातें सुन रही थी. विचित्र सी कड़वाहट से उस का मन भर उठा कि उस के सुहास के बारे में कैसीकैसी चर्चा है. उस ने मन ही मन सोचा कि पापा यदि व्यापार नहीं करवाते तो क्या सुहास कुछ और नहीं कर सकता था. तभी एक और दबादबा सा स्वर पुरवा के कानों तक पहुंचा, ‘‘वैसे तो सुहास का मन किसी काम में नहीं लगता है. बस, इधरउधर बैठक करवा लो…’’ इस के आगे पुरवा और नहीं सुन सकी. उस ने अपने दोनों कान बंद कर लिए क्योंकि वह अपने सुहास के लिए कोई अपशब्द नहीं सुन सकती.

सुहाग की सेज सजी हुई थी. श्वेता और अन्य लड़कियां पुरवा को निरंतर छेड़ रही थीं. पुरवा को सजाने का कार्य बेला ने किया था. सजा कर जब बेला ने पुरवा का चेहरा देखा तो बोली, ‘‘बस, एक काले टीके की और जरूरत है. लगता है, चांद धरती पर उतर आया है.’’

पुरवा कितनी बार इन लोगों से मिल चुकी थी, पर उस समय लग रहा था, सबकुछ नयानया है. एक तरफ मन उमंगों से भरा हुआ है तो दूसरी तरफ जाने उस में कैसा भय समाया है जो हृदय की धड़कनों को निरंतर तेज कर रहा है. सारा वातावरण और सभी चेहरे नएनए से लग रहे थे. हालांकि वे सभी लोग अब उस से पूर्णतया जुड़ गए थे, फिर भी जाने कैसी सिहरन थी.

पुरवा ने अपना विचलित मन संभालने का प्रयास किया. उस ने लोगों की खिल- खिलाहटों के बीच उस पूरे कमरे पर नजर दौड़ाई जो उस के लिए ही सजाया गया था. आज उस की सुहागरात है यह सोचते ही उस की सिहरन फिर बढ़ गई. रंगबिरंगे फूलों की मालाओं से पूरा पलंग सजा हुआ था. आज तक जहां रहती आई है वहां से एकदम अलग यह स्वप्नों का संसार आज उस के सामने है.

रात 11 बजे भाभी सुहास को धकेलते हुए कमरे में लाईं और सब लड़कियों को कमरे से बाहर कर दरवाजा बाहर से बंद कर दिया.

वही सुहास था, वही पुरवा पर पुरवा की दृष्टि लाज से झुकी जा रही थी.

‘‘पुरवा…’’ इस संबोधन के साथ उस के नजदीक बैठ कर सुहास ने उस का घूंघट उठाया तो उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं. सुहास के मन में भी हलकी- हलकी सिहरन थी, जीवन का हर नया मोड़ एक अनुभव होता है, यह वह जानता है, फिर भी जब वह मोड़ सामने आ जाए तब मन में उमंगों के साथसाथ उद्वेलन भी होता है, यह उसे पहली बार अनुभव हो रहा था. सुहास बोला, ‘‘पुरवा, आज आंखें मूंदने की नहीं, जागने की रात है,’’ और बंद आंखों के साथ पुरवा मुसकरा दी. धीरेधीरे आंखें खोलीं और मधुर स्वर में बोली, ‘‘मैं विश्वास करना चाह रही थी कि हम दोनों सचमुच एक हो गए हैं. समाज जिसे पतिपत्नी कहता है, आज हम वही बन चुके हैं.’’

सुहास ने आहिस्ता से उसे बांहों में भर लिया और बोला, ‘‘हां पुरवा, आज हमारी प्रतीक्षा पूरी हो गई है.’’

उस रात हवाओं में भी सुगंध भर गई थी. पूरा कमरा फूलों की सुगंध से महक रहा था. पुरवा और सुहास को जैसे सपनों का साम्राज्य मिल गया था. वह सपना जो अचानक कभी राह में मिल गया था, तब कुछ सोचा नहीं था, समझा भी नहीं था. बस, उसी सपने को डोर समझ कर दोनों कहीं खिंचे चले जा रहे थे. उस स्वप्न में विचित्र चाहत और अनोखा आकर्षण था. कुछ पाने से पहले बहुत कुछ करना और समझना था और दोनों ने ही अपनी चाहत को पाने के लिए भरपूर प्रयास किया था.

सुहाग सेज पर दोनों के मन किसी भी प्रश्न से उलझना नहीं चाह रहे थे. हालांकि अब उन के स्वप्नों का आकार और भी विस्तृत हो गया था फिर भी उस पल को वह दोनों केवल अपनेआप में आत्मसात कर लेना चाहते थे.

अगली सुबह पुरवा एकदम नईनई लग रही थी. एक तरफ सुहास के प्यार से तनमन भीगा हुआ था और दूसरी तरफ एकदम नए वातावरण में उसे अपनेआप को स्थापित करना पड़ रहा था.

उस की वह सुबह मातापिता के घर की हर सुबह से एकदम अलग सी थी. पहले सी अल्हड़ मस्ती और निश्चिंतता नहीं थी. कहीं कोई भूल न हो जाए यह डर तो मन में समाया ही था. हर एक की खुशी का उसे ध्यान भी रखना था. देखते ही देखते घर मेहमानों से खाली होने लगा. फिर वही वर्मा साहब, रजनीबाला, सुहास रह गए. बस, पुरवा ही उस घर में एक नया चेहरा था लेकिन अपनी व्यवहार- कुशलता से वह भी जल्दी ही सब के बीच में घुलतीमिलती जा रही थी.

सुहास दुकान जाने से पहले रोज कहता, ‘‘आज घर पर ही रह जाऊं?’’

‘‘क्यों?’’ पुरवा क्रोध करने का नाटक करते हुए कहती, ‘‘घर पर रहोगे तो व्यापार बढ़ना तो दूर, समाप्त ही हो जाएगा,’’ लेकिन उस के मन में इस बात को ले कर खुशी होती कि उस का पति उसे कितना चाहता है कि एक पल को भी छोड़ने को तैयार नहीं है.

‘‘अच्छा है न, तुम्हें छोड़ कर कहीं जाने का बहाना ही नहीं रह जाएगा,’’ सुहास यह कहते हुए हंस कर उसे बांहों में भर लेता.

पुरवा को लगता, जाने कहां से यह कुछ पलों का सुख उस की झोली में आ गिरा है, इतना प्यार करने वाला पति, उस का मान रखने वाले और दुलार करने वाले सासससुर, प्यारी सी ननद व भैयाभाभी जैसे जेठजेठानी.

मेहमानों के चले जाने के बाद दोनों हनीमून के लिए ऊटी चल पड़े. दोनों के मन उत्साह से भरे हुए थे. जिस होटल में दोनों ठहरे थे उसी में एक और नव दंपती भी ठहरा हुआ था. युवक फौज में आफिसर था और पत्नी बहुत सुंदर व चुस्त दिखने वाली युवती थी. रात को बिस्तर में दुबक कर आपस में लाड़ करते हुए सुहास ने कहा, ‘‘ये जो दूसरा जोड़ा है पुरवा, वह हम दोनों जितना खूबसूरत तो नहीं है न?’’

सुहास की हथेली अपने अधरों से चूमते हुए पुरवा बोली, ‘‘हम से अधिक सुंदर है या नहीं, यह तो नहीं पता, पर हमारे प्यार से अधिक सुंदर किसी और का प्यार हो ही नहीं सकता है.’’

‘‘सच?’’ सुहास ने उसे बांहों में भर कर उस के अधरों पर चुंबन जड़ दिया. पुरवा कुछ पल बाद बोली, ‘‘पर हम दोनों उन्हें क्यों याद कर रहे हैं?’’

‘‘अरे हां, यह भी ठीक है, हम यहां जी भर कर प्यार करने आए हैं. कोई दूसरा हमारे बीच क्यों?’’

उस दूसरे जोड़े से इन की दोस्ती बहुत जल्दी हो गई थी. उस रात अचानक ऊटी में बहुत बर्फ पड़ी थी. पुरवा तो ठंड से जकड़ी जा रही थी और उसे छींक पर छींक आ रही थी. सुहास ने उस के लिए चाय बनाते हुए कहा, ‘‘यह बहुत अच्छा हुआ जो हमें यहां बर्फ भी देखने को मिल रही है.’’

‘‘लेकिन यह ठंड तो मुझ से सहन नहीं हो रही है,’’ पुरवा ने कांपते हुए कहा.

‘‘मैं बाहर के काउंटर से विक्स खरीद कर लाता हूं. तुम्हें नींद अच्छी आ जाएगी,’’ सुहास बोला.

‘‘पर तुम्हें क्या ठंड नहीं लग जाएगी,’’ पुरवा ने चिंता जाहिर की.

‘‘वह कैसा पुरुष जो इतनी सी बर्फ से पिघल जाए,’’ सुहास ने शरारत के साथ कहा और बाहर चला गया. कारीडोर में वह दंपती मिल गया. सुहास को देखते ही पुरभव बोल पड़ा, ‘‘आप… अकेले?’’

‘‘हां, भाई, मेम साहब को ठंड लग गई है, विक्स लेने जा रहा हूं.’’

मित्रता होने पर दोनों एकदूसरे के नाम से परिचित हो गए थे. सुहास आगे बढ़ गया तो पुरभव की पत्नी वसुधा ने कहा, ‘‘प्यार कर के शादी करने का यही आनंद है. पति बेचारा पत्नी की सेवा में भागाभागा फिर रहा है.’’

‘‘सेवा में तो यह बंदा भी हर समय हाजिर है मलिका साहिबा,’’ पुरभव ने भी शरारत से झुक कर कहा तो वसुधा खिलखिला कर हंस पड़ी. सुहास ने जाते- जाते उन की बातें सुन लीं और हंस पड़ा. अपने नए जीवन की एक मधुर सी आलोचना को वह प्यार की उपलब्धि मान कारीडोर से बाहर निकल गया.

ऊटी में घूमतेटहलते दोनों जोड़े कहीं न कहीं टकरा ही जाते थे. कभी बर्फीली घाटियों में, कभी जगमगाती वादियों के सुंदर से पर्यटन स्थल पर या होटल की लाबी में. एक दिन सुहास ने पुरवा से कहा, ‘‘ये साथ वाला जोड़ा भी खासा दिलचस्प दिखाई देता है.’’

‘‘कोई खास बात?’’ पुरवा ने बालों में ब्रश करते हुए कहा.

‘‘नहीं, खास नहीं, पर दोनों बोलते बहुत हैं,’’ सुहास ने पुरवा द्वारा निकाले सूट को देखते हुए कहा, ‘‘पुरवा, तुम ने नोट किया, यह दूसरा जोड़ा हमेशा एक सा रंग पहन कर निकलता है.’’

सुहास ने पैंट उठाते हुए अचानक यह बात कही तो पुरवा ने ब्रश रख कर पहले तो सुहास को देखा और फिर हंस दी.

‘‘क्या तुम भी मैचिंग बन कर चलना चाहते हो?’’ पुरवा के अधरों पर शरारत देखी तो सुहास घबरा गया. नईनवेली दुलहन बुरा तो नहीं मान गई.

पुरवा बोली, ‘‘पहनने में तो कोई हर्ज नहीं है, पर कहीं वह लोग यह न समझ लें कि हम ने उन की नकल की है.’’

‘‘हां, वह तो है ही, हमें उन की नकल थोड़े ही करनी है,’’ सुहास ने स्वयं को बचाने का प्रयास किया.

पुरवा ने साड़ी की प्लेट ठीक करते हुए कहा, ‘‘वैसे कल तुम्हें वसुधा का स्कर्ट भी बहुत पसंद आ रहा था. बारबार तारीफ कर रहे थे.’’

‘‘अरे, नहीं यार,’’ सुहास थोड़ा लज्जित सा हो कर बोला, ‘‘वह तो साथ चलने वालों का मन रखने के लिए इस तरह की प्रशंसा करनी पड़ती है.’’

‘‘हां, सो तो है, तभी कल से कई बार मुझ से कह चुके हो कि स्कर्ट क्यों नहीं पहनती हो.’’

अब सुहास पैंट छोड़ कर उस के निकट आ गया और उसे बांहों में भर कर बोला, ‘‘तुम्हें बुरा लगा तो मुझे क्षमा कर दो.’’

पुरवा मुसकरा पड़ी, सुहास के आलिंगन में पहुंचते ही वह पलक झपकते अपने सारे गिलेशिकवे भूल जाती थी.

एक दिन घूमते हुए सुहास ने पुरवा से कहा, ‘‘पुरु, मुझे नए लोगों से दोस्ती करने में बहुत आनंद आता है. अभी तुम्हें मालूम नहीं है कि अपने घर के आसपास के लोगों में मेरी कितनी इज्जत है. मेरे बिना सब के जरूरी काम रुक जाते हैं.’’

‘‘अच्छा,’’ पुरवा हंस दी, ‘‘जो नहीं  देखा वह सब भी देखने को मिल ही जाएगा पर मैं सोचती हूं कि यहां हम दोनों दोस्ती करने नहीं, हनीमून पर आए हैं, जिस में केवल पतिपत्नी ही एकदूसरे को समझते और दोस्ती करते हैं.’’

‘‘तुम्हारा भी जवाब नहीं,’’ सुहास उस के तर्क पर हंसने लगा. पुरवा को

पा कर जैसे अब उसे कोई चिंता ही

नहीं रह गई थी. उस की गुनगुनाहट में मस्ती थी.

यह सब देख कर पुरवा को लगता कि सुहास अपना इच्छित फल पा कर मन की खुशी छिपा नहीं पा रहा है, इसीलिए अपना उल्लास चारों ओर बिखेरता फिर रहा है.

जब वापस लौटने की घड़ी आई तो दोनों उदास हो गए. सुहास बोला, ‘‘कैसा आनंद आ रहा था इस अजनबी जगह पर, किसी की चिंता नहीं, कोई डर या जिम्मेदारी नहीं.’’

‘‘जिम्मेदारी तो है,’’ पुरवा ने शरारत से कहा, ‘‘मुझे सहीसलामत साथ ले जाने की.’’

पुरवा के इस शरारती अंदाज पर सुहास हंस दिया. पुरभव और वसुधा से उन के घर का पता लिया और पत्र लिखने के वादे के साथ दोनों अपनेअपने ठिकानों पर लौट चले.

घर पर बहुत गहमागहमी थी. दोनों के स्वागत में श्वेता व गौरव भी घर पर मौजूद थे. पुरवा को देखते ही श्वेता गले लग गई और धीरे से बोली, ‘‘कैसा रहा हनीमून.’’

पुरवा ने मुसकरा कर दृष्टि झुका ली. वर्मा साहब व रजनी ने कहा, ‘‘आज सब हैं तो कितना अच्छा लग रहा है, नहीं तो घर सूनासूना हो गया था.’’

एकांत मिलते ही पुरवा ने श्वेता से पूछा, ‘‘और तुम कैसी हो ननद रानी?’’

‘‘ठीक हूं, भाभी,’’ श्वेता ने हंसने की चेष्टा की.

‘‘सब प्यार तो करते हैं न?’’ पुरवा ने यों ही भाभी होने का दुलार दिखाया था पर श्वेता एकदम उदास हो गई.

‘‘क्या बात है श्वेता, गौरव तो बहुत भला लड़का है?’’ पुरवा ने उस की उदासी से चिंतित हो कर पूछा.

‘‘हां, वह तो बहुत प्यार करते हैं भाभी पर उस घर में इतने लोग हैं और सब अपने अलगअलग तेवर दिखाते हैं. मुझे इस तरह झुंड में रहने की आदत नहीं थी.’’

‘‘ऐसा मत कहो श्वेता, तुम्हारा भरापूरा परिवार है, उसे भेड़बकरी के झुंड की संज्ञा मत दो,’’ पुरवा ने समझाया तो श्वेता तुनक गई.

‘‘तुम क्या समझोगी भाभी, मेरी परेशानी. अकेले भैया व मम्मीपापा हैं न बस यहां.’’

पुरवा को लगा कि इस समय श्वेता से कोई भी बहस व्यर्थ होगी. इसलिए खामोश हो गई.

सुहास और पुरवा ने सब के उपहार निकाल कर दिए तो रजनी ने खुश होते हुए कहा, ‘‘कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन इस छोटे बेटे की कमाई का उपहार मिलेगा.’’

‘‘क्यों मम्मी,’’ पुरवा ने आश्चर्य से पूछा.

वर्मा साहब और श्वेता ने एकसाथ कहा, ‘‘कमाने का शौक ही कहां था. बस, जगत सेवा करने का शौक था इसे.’’

‘‘क्यों बदनाम कर रहे हो तुम दोनों मेरे बेटे को,’’ रजनी ने कृत्रिम क्रोध दिखाते हुए कहा, ‘‘वह भी तो पुण्य का काम ही करता है. किसी के काम आना कोई बुरी बात है क्या?’’

पुरवा मुसकरा दी और बोली, ‘‘आप के बेटे के जीवन में मैं भी तो उसी पुण्य लाभ के फलस्वरूप आई हूं. मेरी सहायता करने ही तो दौड़ पड़े थे चोर के पीछे,’’ पुरवा की बात पर एक मिलाजुला ठहाका वातावरण में गूंज उठा.

‘‘कुछ भी हो बेटा, तुम्हारे प्यार ने इसे एक जिम्मेदार इनसान बना दिया, वरना तो इस का बचपना जाता ही नहीं था,’’ रजनी ने पुरवा को प्यार से देखते हुए कहा.

पुरवा हंस कर सोचने लगी, मैं सचमुच मैं कितने अच्छे घर में आई हूं जो सब इतना प्यार और मानसम्मान देते हैं.

-क्रमश:

मंजू की खूनी सोच : कैसे खेला गया जीवन मृत्यु का खेल

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद-भदोही जिले की सीमा पर स्थित दुर्गागंज थाना क्षेत्र का एक गांव है कुढ़वा. इस गांव के  कुछ लोग 15 जून की सुबह के समय अपने खेतों की तरफ जा रहे थे कि किसी की नजर नहर पर बनी पुलिया के नीचे चली गई. पुलिया के नीचे औंधे मुंह एक लाश पड़ी थी. उसे देख कर ही लोग वहां जमा होने लगे.

कुछ ही देर में यह बात गांव में फैली तो गांव से भी तमाम लोग लाश देखने के लिए उस पुलिया के नजदीक पहुंच गए. लाश पुलिया के पास की झाडि़यों में पड़ी थी. इस बीच किसी ने फोन कर के इस की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी.

थाना दुर्गागंज के थानाप्रभारी छविनाथ सिंह को पुलिस कंट्रोल रूम से नहर की पुलिया के नीचे लाश पड़ी होने की सूचना मिली तो वह बिना देर किए पुलिस टीम के साथ मौके की ओर रवाना हो गए. जब वह पुलिया के पास पहुंचे तो वहां लोगों की अच्छीखासी भीड़ थी, जिन में महिलाओं से ले कर बड़ेबूढ़े और बच्चे भी शामिल थे.

सभी लाश को ले कर तरहतरह की चर्चा में मशगूल थे. पुलिस को देख सभी पुलिया से कुछ दूर हो लिए. थानाप्रभारी ने सीधे नहर के पास जा कर पुलिया के नीचे देखा तो पता चला कि लाश किसी युवक की थी. आसपास का निरीक्षण कर के थानाप्रभारी को पता चल गया कि कहीं और हत्या करने के बाद लाश को यहां फेंका गया है.

बहरहाल, उन्होंने युवक की लाश पुलिया के नीचे से निकलवा कर मुआयना किया. मृतक का गला किसी धारदार हथियार से कटा हुआ था. घाव देख कर लग रहा था कि उस की हत्या कुछ समय पहले ही की गई थी.

थानाप्रभारी ने मौके पर मौजूद लोगों से जब उस की शिनाख्त करानी चाही तो सभी ने युवक को पहचानने से इनकार कर दिया. थानाप्रभारी ने लाश मिलने की सूचना एसपी और सीओ (भदोही) को भी दे दी.

पुलिस को मौके से कोई भी ऐसा सबूत नहीं मिला, जिस से युवक की पहचान हो सके. खोजी कुत्ता भी लाश सूंघने के बाद इधरउधर घूम कर वापस लौट आया. संभवत: घटनास्थल पर लोगों की आवाजाही होने की वजह से सबूत नष्ट हो गए थे.

बहरहाल, थानाप्रभारी छविनाथ सिंह ने मौके की काररवाई पूरी कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. उसी समय एसपी सचिंद्र पटेल और सीओ अभिषेक पांडेय भी मौके पर पहुंच गए. एसपी ने वहां मौजूद लोगों से मृतक के बारे में पूछताछ की. लेकिन उस के बारे में कोई कुछ भी नहीं बता सका.

एसपी ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए उसी समय सीओ (भदोही) अभिषेक पांडेय के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. इस के अलावा उन्होंने स्वाट टीम के प्रभारी अजय सिंह को भी इस केस को खोलने में लगा दिया.

यह केस पुलिस टीम के लिए किसी अबूझ पहेली से कम नहीं था क्योंकि घटनास्थल पर कोई ऐसा तथ्य नहीं मिला था, जिस से पुलिस को कुछ मदद मिल सके. पुलिस ने मुखबिर भी लगा रखे थे लेकिन उन की भागदौड़ भी बेकार साबित हुई. फिर भी पुलिस टीम इस केस को फाइलों में न दबा कर तफ्तीश में जुटी रही.

थानाप्रभारी छविनाथ सिंह को लग रहा था कि मृतक कहीं दूसरी जगह का रहा होगा और उस की हत्या कहीं दूसरी जगह कर के लाश यहां फेंकी गई है. मन में यह बात आते ही उन्होंने अपने कुछ मुखबिरों को पड़ोसी जिले इलाहाबाद के क्षेत्रों में भी टोह लेने को कह दिया. उन की यह मेहनत रंग लाई.

उधर इस घटना के खुलासे में जुटी स्वाट टीम भी घटना से जुड़े सभी पहलुओं की बड़ी बारीकी से जांच कर रही थी. टीम को कुछ सबूत भी हाथ लगे. उन सबूतों के आधार पर पुलिस के कदम केस के खुलासे की दिशा में बढ़े, तो सफलता मिल ही गई. मृतक की शिनाख्त हो गई. पता चला कि मृतक का नाम हजारी सरोज उर्फ रवि है और वह अवरता चेरिया, सैदाबाद, थाना हंडिया, जिला इलाहाबाद का रहने वाला था.

शिनाख्त होने के बाद स्वाट टीम व दुर्गागंज पुलिस की टीम ने घटना से जुड़े तमाम पहलुओं और साक्ष्यों के आधार पर खोजबीन की.

जांच में पता चला कि रवि की हत्या में उस की पत्नी समेत 6 अन्य लोग शामिल थे, जो आपस में अच्छे दोस्त थे और आर्केस्ट्रा पार्टी में काम करते थे. पुलिस टीम के लिए इतनी जानकारी काफी थी, सो पुलिस ने सभी आरोपियों की तलाश शुरू कर दी.

इस का नतीजा यह हुआ कि पुलिस ने 25 जुलाई, 2018 की रात कुढ़वा तालाब मसूदी के पास से रवि की पत्नी मंजू समेत 5 लोगों को गिरफ्तार कर लिया, जबकि 2 आरोपी फरार हो गए.
अभियुक्तों को हिरासत में लेने के बाद जब उन से पूछताछ शुरू की तो हजारी सरोज की हत्या की चौंकाने वाली कहानी सामने आई.

हजारी सरोज उर्फ रवि उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के अवरता चेरिया गांव में रहता था. उस के पिता समरजीत मेहनतमजदूरी कर के अपने परिवार की गुजरबसर कर रहे थे. रवि के गांव में मंजू नाम की एक महिला रहती थी, जिस के पति रामपाल की 5 साल पहले मौत हो गई थी. 3 बच्चों की मां मंजू गठीले बदन की होने के साथसाथ अच्छे नाकनक्श वाली थी. 3 बच्चों की मां बनने के बाद भी उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह 3 बच्चों की मां है.

मंजू गांव में विधवा के रूप में रह रही थी. इसी बीच उस के नैन रवि से लड़ गए और दोनों साथसाथ जीनेमरने की कसमें खा कर साथसाथ रहने लगे. कुछ दिनों के बाद दोनों ने इलाहाबाद जा कर कोर्टमैरिज कर ली.

रवि से विवाह के पहले से ही मंजू का प्रेम संबंध कटहरा निवासी राजू सरोज के साथ चल रहा था, जो रवि का दोस्त था. राजू और मंजू के संबंधों की जानकारी रवि को नहीं थी.इधर रवि और मंजू की शादी से खार खाए गांव और घर के लोगों ने रवि और मंजू को गांवघर से बाहर कर दिया. ऐसे में रवि अपने दोस्त राजू सरोज के यहां आ कर रहने लगा था. पत्नी मंजू और उस के बच्चों की वजह से रवि की जिम्मेदारी बढ़ गई थी, इसलिए रवि मंजू के साथ एक आर्केस्ट्रा में काम करने लगा.
कहते हैं कि औरत जब चरित्रहीनता पर आमादा हो जाती है तो उसे किसी लोकलाज का डर नहीं रहता. मंजू भी ऐसी ही औरत थी. रवि से विवाह कर लेने के बाद भी उस के संबंध राजू सरोज से बने रहे, जिस की भनक बाद में रवि को लग गई थी.

वह मंजू को ले कर सूरज, गुजरात जाने की बात करने लगा था. जब इस की जानकारी राजू को हुई तो उसे लगने लगा कि उस की प्रेमिका अब उस से दूर हो जाएगी. वह रवि को सूरत जाने से रोकने के प्रयास में लग गया.

सब से पहले उस ने मंजू को मनाते हुए कहा, ‘‘रानी, तुम सूरत चली जाओगी तो मैं कैसे रहूंगा. क्या तुम ने कभी इस बारे में सोचा है?’’

उसे एकटक देखते हुए मंजू बोली, ‘‘राजू, मैं कर भी क्या सकती हूं. मैं ने रवि से शादी की है, वह मुझे जहां ले कर जाएगा वहां जाना ही पड़ेगा.’’

इसी के साथ मंजू ने एक चौंकाने वाली बात कह डाली. वह बोली, ‘‘राजू, रवि के रहते मुझे उस की बात माननी ही पड़ेगी. हां, अगर वह नहीं रहेगा तो मैं तुम्हारे साथ हमेशा के लिए रह सकती हूं.’’
उस का इतना कहना मात्र था कि राजू ने मन ही मन एक फैसला ले लिया और मंजू से बोला, ‘‘घबराओ मत मंजू, मैं अपनी राह का कांटा ही हटा दूंगा. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी.’’

मंजू से बात कर के राजू ने रवि को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. इस योजना को अंजाम देने के लिए राजू सरोज ने मंजू सहित अपने 5 साथियों को शामिल किया जो दूसरे आर्केस्ट्रा में काम किया करते थे.

तय योजना के मुताबिक 14 जून, 2018 को राजू सरोज रवि को गांव से गई बारात में नउआपुर ले गया, जहां उस ने भोला यादव की बोलेरो से अपने साथियों को भी बारात में बुला लिया था.
बारात में सब एक जगह एकत्र हुए तो उन्होंने बारात का खाना खाने के बजाए चिकन खाने की योजना बनाई. राजू सरोज ने सभी के साथ रवि को भी बोलेरो में बिठा लिया. रास्ते में राजू ने पहले साथ लाए देसी तमंचे की बट से रवि के सिर पर 2 बार प्रहार किए और उसे दबोच लिया. फिर उस की गरदन में गमछे का फंदा बना कर उस का गला घोंट दिया. इस के बाद भी जब रवि नहीं मरा तो सर्जिकल ब्लेड, जो राजू साथ ले कर आया था, से उस का गला काट दिया, जिस से उस की मौत हो गई. इस के बाद उस की लाश को जिले की सीमा से बाहर भदोही जिले के दुर्गागंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत गांव कुढ़वा की पुलिया के नीचे छिपा कर सब वापस लौट आए.

रास्ते में सभी ने अपने उन कपड़ों को जला दिया, जिन में खून के छींटे लगे थे. इस के बाद उन्होंने गाड़ी को अच्छी तरह से धो कर खून साफ कर दिया ताकि कहीं से भी हत्या का पता न लग पाए. चूंकि रवि का गांवघर से नाता नहीं था, इसलिए उस के लापता होने के बाद किसी ने उस की खोजखबर नहीं ली थी, जिस से हत्यारे बचते रहे.

पुलिस पूछताछ में पकड़े गए अभियुक्तों ने बताया कि रवि की हत्या के बाद सभी मिल कर राजू और मंजू को भगाने की फिराक में थे, क्योंकि राजू के भाग जाने पर कोई उन्हें न तो पकड़ पाता और न ही कोई उन पर शक करता. अभी वे ऐसा करने वाले ही थे कि पुलिस टोह लेती हुई उन तक पहुंच गई.

पुलिस ने रवि की हत्या के आरोप में उस की पत्नी मंजू, मंजू के प्रेमी राजू सरोज तथा उन के साथियों महीपाल, रामफेर और बुझावन को गिरफ्तार कर उन के खिलाफ आईपीसी की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया.

ये सभी इलाहाबाद के गांव सराय ममरेज के रहने वाले थे. इस मामले में पुलिस को 2 अन्य आरोपियों की अभी भी तलाश है, जिन का घटना में शामिल होना बताया जा रहा है.
इस पूरे प्रकरण में मृतक की शिनाख्त सब से टेढ़ी खीर थी, क्योंकि मृतक सैदाबाद, हंडिया का रहने वाला था तो अभियुक्त सराय ममरेज का और लाश मिली थी दुर्गागंज में. एसपी सचिंद्र पटेल ने इस केस को सुलझाने वाली टीम को 10 हजार रुपए नकद पुरस्कार दिया. कहानी लिखे जाने तक इस मामले में जेल भेजे गए अभियुक्तों की जमानत नहीं हो सकी थी ?

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में कुछ पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.

संस्कृति की यह कैसी रक्षा

देशभर में अराजकता इतनी बढ़ गई है कि कहीं भी कोई युवा जोड़ा अब सुरक्षित नहीं रह गया है. नैतिकता के नाम पर गांवगांव, कसबेकसबे में गुंडों के गुट राह चलते किसी भी जोड़े को पकड़ लेते हैं और उन पर इम्मोरल होने का आरोप लगा कर तुरंत सजा देते हैं. वे खुद बच निकलते हैं क्योंकि इसे संस्कृति की रक्षा करने के लिए किया गया काम जो कहा जाता है.

आजकल ऐसे बहुत से वीडियो वायरल हो रहे हैं जिन में खेतों में 3-4 लड़के किसी जोड़े को पकड़ कर मारतेपीटते हैं, लड़की का रेप करते हैं, वीडियो बनाते हैं और फिर दनदनाते हुए निकल ही नहीं जाते, वीडियो को पोस्ट भी कर देते हैं. उन्हें मालूम है कि आज के माहौल में उन्हें कोई नहीं पकड़ेगा.

छत्तीसगढ़, जहां भारतीय जनता पार्टी का राज है, के कोरबा क्षेत्र में 19 साल के एक लड़के ने बिना कारण आत्महत्या कर ली. मातापिता हैरान थे कि क्या हुआ. 10 दिनों बाद पता चला जब एक लड़की पुलिस थाने पहुंची कि सुनसान रास्ते में 2 लड़कों ने उस का रेप किया था और उस के साथ मौजूद लड़के, जिस ने आत्महत्या कर ली, को रेप होते हुए देखने को मजबूर किया था.

इस शर्मिंदगी को वह लड़का सह नहीं पाया और उस ने आत्महत्या कर ली. लड़की इस अपराधभाव से मुक्त नहीं हो पाई और 10 दिनों बाद उस ने कटघोरा के पुलिस स्टेशन पहुंच कर शिकायत दर्ज करा दी.

एक तरफ देश में बेटी बचाओ के नारे लगाए जा रहे हैं, दूसरी ओर बेटियों का खुलेआम नैतिकता के नाम पर बलात्कार किया जा रहा है. दोस्ती करना और प्रेम करना हर युवा का अधिकार है पर पाखंड के पुजारी इस प्रेम पर पाबंदी लगाना चाहते हैं ताकि विवाह केवल जातियों में, कुंडलियां मिला कर, दानदक्षिणा दे कर ही हो. दरअसल, यह संस्कृति बचाओ अभियान नहीं है, बल्कि यह व्यापार बचाओ अभियान है.

गुलाब के फूलों से बढ़ाएं घर की खूबसूरती

गुलाब के फूलों से आपके घर की खूबसूरती में चार चांद लग जाती है. जी हां ये फूल आपके घर की खूबसूरती के साथ- साथ आपके  शान-शौकत को बढ़ाते है.

गुलाब के फूल का इस्तेमाल आप कई सारे कामों में करती हैं. जैसे- घर सजाने में, श्रृंगार में, खुशबू के लिए आदि कामों में. ऐसे में आपको इस पौधे की केयर भी उसी तरह करनी चाहिए जैसे आप इनका इस्तेमाल करती हैं,  क्योंकि इस मौसम में यानि सर्दियों में  ठंडी हवाएं चलती हैं, तो ऐसे में इन पौधों के खराब होने का डर रहता है. आइए बताते हैं, आप कैसे इनका देखभाल कर सकती हैं.

–  गुलाब के पौधे बहुत ही नाजुक होते हैं. उन्हें सबसे ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है. अगर आपके घर में गुलाब के पौधे के पास गंदगी या सूखी पत्तियां हो, तो उसे वहां से हटा दें इससे गुलाब के पौधें को संक्रमण सबसे ज्यादा लगता है.

–  गुलाब के पौधे को गमले में लगाएं जिससे आप उसे घर के अंदर रख सकें. आप चाहें तो घर के अंदर भी इनडोर गार्डनिंग कर सकते हैं और वैसे आजकल इंडोर प्लांट्स का फैशन अधिक है.

–  गमले में पौधा लगाते समय ध्यान दें कि पानी की निकासी का उचित प्रबंध होना चाहिए. गमले के छेद से अतिरिक्त पानी का बाहर निकलना जरूरी है.

–  गुलाब को कभी भी ओस में खुला न छोडें और सर्द हवाओं से इनका बचाव करें. सर्दियों के दिन में रात के वक्त ठंडी हवाएं चलने पर गुलाब के पौधे को किसी पौलीथीन के थैले से ढक दें. जिससे गुलाब को बचया जा सके.

कम बजट में भी अपने घर को दें नया लुक

आप  घर में नया बदलाव लाना चाहती हैं, तो ये काम आप बिना पैसे खर्च किए भी कर सकती हैं. आज हम ऐसे ट्रिक्स आपको बताने जा रहे हैं, जिससे आप आजमा कर घऱ को एक नया लुक दे सकती हैं. आइए जानते हैं.

–  घर को आकर्षक बनाने के लिए पुराने पीतल के बरतनों को पालिश करके आप सजाने के काम में ला सकती हैं. उसके ऊपर स्टोन लगाकर उसे और भी आकर्षक बना सकती हैं. इसके अलावा पुराने अच्छे कपडों का भी यूज कर सकती हैं. जैसे-आपकी कोई पुरानी अच्छी साड़ी हो,  जिसे आप नहीं पहनना चाहती तो आप उसे कुशन कवर या कर्टेन के रूप में यूज कर सकती हैं. इसके अलावा पुरानी साडियों का स्टाइलिश बेडशीट विद पिलो कवर भी बनने लगे हैं, यह बेडरूम की खूबसूरती बढा देते हैं.

–  एक्सेसरीज फर्नीचर इसके स्थान में भी बदलाव ला सकती हैं. जैसे- बडे रूम का सामान टेबल या साइड टेबल, चेयर, स्टूल और एक्सेसरीज में लैंप, पेंटिंग, वाल मिरर या डेकोरेशन के सामान आदि को लिविंग रूम में लगा सकती हैं और लिविंग रूम का कुछ सामान बेडरूम में सजा सकती हैं. ऐसा आप हर पांच से छह माह में एक बार कर सकती हैं. इससे लिविंग रूम और बेडरूम दोनों में बदलाव महसूस होगा.

–  दीवारों पर फोटो लगाना, यह बहुत पुराना चलन हो चुका है. आप अपनी क्रियेटिविटी दिखाएं कुछ नया करके दिखाएं. जैसे-आप परिवार के लोगों की अलग-अलग फोटो लें और व्हाइट ग्लासी पेपर में चिपकाकर उसके नीचे उनका थोडा-सा इतिहास और उनकी खासियत लिखें और दीवार पर चिपका दें. इस तरह जितने लोगों की फोटो लगाना चाहती हैं, इसी तरह तैयार करके लगाएं तो काफी अच्छा लगेगा.

–  इसके अलावा कई बार बच्चों के द्वारा बनाए गए क्रौफ्ट का भी यूज कर सकती हैं, उसे सजाने के काम ला सकती हैं. वो कलरफुल चीजें दीवारों पर अच्छी भी लगेंगी और बच्चें का प्रोत्साहन भी बढेगा. इसके अलावा आप घर पर वाल हैंगिंग और सैफ्ट टौय बनाकर भी घर पर सजा सकती हैं. तो आप दीवारों पर कलाकृतियों बनाकर भी पेंट कर सकती हैं.

–  मार्केट में लैंप बनाने के लैंम्पशीट मिलती है, आप उसे घर लाकर लैंप भी बना सकती हैं और उसे लाइट के ऊपर लगा सकती हैं. यह देखने में आकर्षक लगता है. पुराने पत्थर और शंख जैसी चीजों को हम घर के बाहर करवा देते हैं या घर के किसी कोने में पडे रहने देते हैं लेकिन आप इनका यूज भी अपने घर को सजाने के लिए कर सकते हैं.इमली के दानों को रंग कर उस पर ग्लिटर लगाकर बाउल में रखकर सजा सकते हैं.

सर्दियों में सरसों के तेल से करें बौडी मसाज

किचन में इस्‍तेमाल होने वाला सरसों का तेल आपकी त्वचा के लिए काफी फायदेमंद होता है. इससे ग्लोंइंग व मुलायम त्‍वचा के साथ ही मजबूत और काले घने बाल भी हासिल किये जा सकते हैं. सरसों के तेल से बौडी मसाज करने से शरीर को काफी आराम मिलता है और त्‍वचा भी चमकदार बन जाती है. खासकर की सर्दियों के मौसम में ये काफी फायदेमंद होता है. आइये जानते हैं सरसों के तेल से मालिश करने के क्‍या-क्‍या फायदे हैं.

चमकदार त्‍वचा

अगर आपको ग्‍लोइंग और साफ त्‍वचा चाहिये तो सरसों का तेल इस्तेमाल करें. सरसों के तेल में बेसन, दही और नींबू की कुछ बूंद मिलाइये. इस फेस मास्‍क को अपने चेहरे पर लगाइये और 10-15 मिनट के बाद ठंडे पानी से धो लें. टैन और डार्क स्‍पाट हटाने के लिये इसे हफ्ते में तीन बार जरुर लगाएं.

क्‍लींजिंग

अपने चेहरे की हफ्ते में दो बार सरसों के तेल से मसाज करें, इससे चेहरे की सारी गंदगी और धूल-मिट्टी साफ हो जाएगी. तेल को गर्दन, पांव और घुटनों पर हल्‍के से लगाएं और मालिश करें. सरसों के तेल को किसी अन्‍य चीज के साथ बिल्‍कुल ना मिक्‍स करें. इसे बस गरम करें और बौडी पेन व ठंड से राहत पाएं.

मौइस्‍चोराइजर

अगर आपका शरीर रूखा है तो आप अपने शरीर की रोजाना सरसों के तेल से मालिश करें. इसी के साथ आप अपने फेस पैक में इस तेल की कुछ बूंदे डाल कर ग्‍लोइंग चेहरा पा सकती हैं. या फिर खाली सरसों का ही तेल ले कर अपने चेहरे और गर्दन पर दो-तीन मिनट के लिये गोलाई में मालिश करें. फिर इसे 10 मिनट तक के लिये ऐसे ही रखें और फिर फेस वाश से चेहरे को धो लें.

बालों को लंबा करे

सरसों का तेल ना केवल स्‍किन के लिये अच्‍छा होता है बल्कि बालों पर भी इसका बहुत अच्‍छा प्रभाव पड़ता है. रोजाना सरसों के तेल से सिर की मसाज करने पर सिरदर्द दूर होता है और बाल की जड़ भी मजबूत होती है. अगर आपको इसकी महक नहीं अच्‍छी लगती है तो आप इसे बादा या आंवले के तेल के साथ मिक्‍स कर के लगा सकती हैं.

आंत के कैंसर से बचना चाहते हैं तो खूब खाएं हरी सब्जियां

जिस तरह का खानपान लोगों का हुआ है, कई तरह की बीमारियां परेशानियां सामने आई हैं. खाद्य पदार्थों में अत्यधिक रसायनों का प्रयोग खाने की गुणवत्ता को कम कर रहा है और कई तरह की बीमारियों का कारण बन रहा है. ऐसे में जरूरी है कि हम अपने खानपान को ले कर जागरुक हों. इस खबर में हम आपको आंत के कैंसर के बारे में बताएंगे.

हाल ही में हुई एक स्टडी में बात सामने आई है कि अगर आप हरे साग सब्जियों के शौकीन हैं तो आप आंत की ज्यादातर समस्याओं से बचे रहेंगे. रिपोर्ट में ये बात सामने आई कि गोभी या ब्रोकली जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां खाने से आंत स्वस्थ रहते हैं और आंतों के कैंसर से बचाव होता है.

सबसे पहले इसको चूहों पर आजमाया गया. जिसमें पता चला कि जिन्हें इन्डोल 3 कार्बिनोल (आई3सी) युक्त आहार दिया गया, उनमें आंत में सूजन या आंतों के कैंसर से बचाव हुआ. गोभी और ब्रोकली में भी ये तत्व पाया जाता है. ये एक तरह के प्रोटीन को सक्रिय करता है, जिससे आंतों के कैंसर से बचाव होता है.

इस शोध पर जानकारों का कहना है, जब कैंसरग्रस्त चूहों को आई3सी से भरपूर डायट खिलाया गया, तो उनमें ट्यूमर की संख्या में कमी देखी गई.

इससे एक बात स्पष्ट है कि आंत की तमाम बीमारियों में हरी सब्जियां काफी लाभकारी हैं, इसलिए स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है कि आप हरे साग सब्जियों का सेवन जरूर करें.

बुढ़ापे में चाहते हैं अच्छी यादाश्त तो ये खबर आपके लिए है

बुढ़ापे में ज्यादातर लोगों में  यादाश्त की समस्या होती है. 55-60 वर्ष के बाद लोगों को चीजों को याद रखने में काफी परेशानी होती है. इस लिहाज से जरूरी है कि समय से पहले कुछ बातों को ध्यान में रखें जिससे बुढ़ापे में आने वाली इन परेशानियों से आप बच सकते हैं.

एक अध्ययन में ये बात सामने आई है कि जो लोग हरी पत्तेदार सब्जियां, गहरे नारंगी और लाल रंग वाली सब्जियां, स्ट्रौबेरी, ब्लैकबेरी, ब्लूबेरी खाते हैं और संतरे का जूस पीते हैं उन्हें यादाश्त संबंधी शिकायते कम होती हैं. यादाश्त के लिए ये खानपान काफी प्रभावशाली हैं.

अध्ययन में ये भी पता चला है कि जो लोग बुढ़ापे से 20 साल पहले तक प्रचूर मात्रा में फल और हरी सब्जियां खाते हैं उनका दिमाग काफी बेहतर काम करता है और यादाश्त संबंधी शिकायतें नहीं होती हैं. इसके अलावा जो लोग रोजाना संतरे का जूस पीते हैं उनमें यादाश्त कमजोर होने की संभावना उन लोगों की तुलना में 47 फीसदी कम हो जाती है जो संतरे का जूस नहीं पीते हैं.

हावर्ड यूनिवर्सिटी के टी. एच. चान स्कूल औफ पब्लिक हेल्थ के चांगझेंग यूआन ने कहा, “इस शोध की सबसे खास बात यह थी कि हमने प्रतिभागियों का 20 साल की अवधि तक अध्ययन किया. हमारे शोध से इस संबंध में और पुख्ता सबूत सामने आएं हैं कि दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए सही खानपान महत्वपूर्ण है.”

इस शोध को  कुल 27,842 लोगों पर किया गया, जिनकी औसत उम्र 51 साल थी. इनमें 55 फीसदी प्रतिभागियों की अच्छी यादाश्त देखी गई, 38 फीसदी लोगों की यादाश्त औसत थी. और केवल 7 फीसदी प्रतिभागियों की याददाश्त कमजोर थी.

प्यार बनाम आत्मनिर्भरता : भावनाओं के साथ साथ इन बातों का भी ध्यान रखें

आज लड़के यह समझने को तैयार नहीं हैं कि लड़की के लिए उस का भविष्य उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि स्वयं किसी लड़के का होता है. लड़कियों के लिए भविष्य कोई सपना या विकल्प नहीं, बल्कि उस की आवश्यकता है. यह आवश्यकता केवल वित्त की ही नहीं, बल्कि लड़कियां अपनी क्षमता साबित करने और व्यक्तित्व को परिभाषित करने के लिए भी यह जरूरी समझती हैं.

स्त्री और पुरुष दोनों ही अपना भविष्य चुनने के लिए स्वतंत्र होते हैं. लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि धीरेधीरे पनप रहे अपने प्रेमसंबंध से वे अपने पथ से विचलित हो जाएं. लेकिन दीर्घ अवधि का प्रेमालाप और मोमबत्ती की मध्यम रोशनी में साथ किया गया रात्रिभोज उन्हें एक रात के यौनसुख की ओर अग्रसर करता है और फिर सप्ताह के अंत में मद्यपान की शुरुआत होती है, जो धीरेधीरे प्रतिदिन में बदल जाती है. संपूर्ण प्रतिस्पर्धी, मतलबी दुनिया में युवाओं की यही सचाई है.

स्त्रीपुरुष संबंधों की विशेषज्ञा लूसी बेरेसफोर्ड अपनी पुस्तक ‘इनविजिबल थ्रैड्स’ के विमोचन समारोह में दिल्ली आई थीं. उन का कहना है कि आज के युवा आपसी संबंधों की अपेक्षा नौकरी और भविष्य को ज्यादा महत्त्व दे रहे हैं. वे ऐसे संबंधों को त्यागने, जो खुद के लिए कारगर नहीं हैं या खुद को अपने साथी के अनुरूप न पाने पर भी अलग होने में जरा भी देर नहीं करते. उन्हें विश्वास होता है कि उन के जीवन में शीघ्र ही कोई दूसरा आ जाएगा.

28 वर्षीय राकेश चौबे हाल ही में हुए अपने प्रथककरण की व्याख्या करते हुए कहते हैं, ‘‘मैं अपने साथी से व्यक्तित्व या गलतफहमी के आधार पर अलग नहीं हुआ, बल्कि व्यावसायिक व्यस्तता की असमानता और पद के बेमेल के कारण हुआ हूं.’’

27 वर्षीय अनीता सिंघल अपनी आंखों में आंसू झलकाते हुए पूर्व में हुए ब्रेकअप का जिक्र करते हुए कहती हैं, ‘‘पूर्व प्रेमी के साथ मेरा भविष्य सुरक्षित नहीं था क्योंकि कालेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद भी वह अपने रोजगार के प्रति प्रतिबद्ध नहीं था. प्यार का मतलब यह नहीं कि हम अपनी महत्त्वाकांक्षाओं और भविष्य को ले कर आंखें मूंद लें. सचाई यही है कि आप अपना भविष्य या नौकरी का चुनाव अपने भावनात्मक संबंधों पर नहीं छोड़ सकते.’’

29 वर्षीय व्यवसाई अंकित सक्सेना का कहना है, ‘‘जीवन में प्रेमालाप को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता लेकिन आपसी संबंधों का मतलब होता है कि हम एकदूसरे को खुशी प्रदान करें, एकदूसरे को सहयोग करें, एकदूसरे की आवश्यकताओं का ध्यान रखें. तनाव, चिंता और दबाव प्रत्येक व्यवसाय तथा नौकरी के हिस्से हैं. इन्हें हमें अपने निजी क्षणों पर हावी नहीं होने देना चाहिए. अगर हमारा जीवनसाथी हमारे लक्ष्य पर सवाल उठाता है, हम पर शक करता है, छोटीछोटी बातों को तूल दे कर झगड़ा करता है, तो अच्छा है कि हम एकदूसरे से अलग हो जाएं.’’

उपरोक्त उदाहरणों से आप ने जान लिया होगा कि प्यार से अधिक महत्त्वपूर्ण आत्मनिर्भरता है. अगर आप आत्मनिर्भर हैं तो आप को जीवनसाथी की कमी नहीं. इसलिए आप अपना ध्यान आत्मनिर्भर होने पर केंद्रित करें.

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