हाथों में हथियार देने की पैरवी कर के किसी भी तरह से अपराध रोकने या सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती. लेकिन अमेरिका में स्कूलों में बढ़ती गोलीबारी की घटनाओं को देखते हुए डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा गठित आयोग ने शिक्षकों को बंदूकें देने की सिफारिश की है. इस सिफारिश की विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने तो आलोचना की ही है, सुरक्षा का यह उपाय कई बुद्धिजीवियों के भी गले नहीं उतर रहा है.

अमेरिका में पिछले कुछ समय से स्कूलों में गोलीबारी की कई घटनाएं हो चुकी हैं. 18 मई 2018 को टैक्सास के सांता फे हाईस्कूल में हुई गोलीबारी में 10 लोग मारे गए और 13 घायल हुए थे. फरवरी 2018 में फ्लोरिडा के मेर्जरी स्टोनमैन डगलस हाईस्कूल में 17 मारे गए. अक्तूबर 2015 में ओरेगौन के उपकुआ कम्युनिटी कौलेज में हुई गोलीबारी में 10 लोगों की जान चली गई थी. दिसंबर 2012 में कनेक्टिकट के सैंडी हुक एलिमेंटरी स्कूल के छात्र ने 28 को गोलियों से भून दिया था. अप्रैल 2007 में वर्जीनिया टेक स्कूल के एक छात्र ने 32 छात्रों और शिक्षकों को मार डाला था.

स्कूलों में लगातार वारदातें बढ़ रही थीं. 1990 के दशक में अमेरिकी स्कूलों में 10 घटनाएं हुईं जिन में 36 लोगों की जानें गईं. 2000 से मई 2018 के बीच गोलीबारी की 22 घटनाएं हुईं इन में 66 लोग मारे गए. इन वारदातों में 77 फीसदी से अधिक गोलीबारी की घटनाओं में दोषी की उम्र 13 से 29 साल थी.

फ्लोरिडा के मेर्जरी स्टोनमैन डगलस हाईस्कूल की घटना के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शिक्षा मंत्री बेस्टी डावोस की अगुवाई में स्कूल सेफ्टी पैनल का गठन किया था.

इस घटना को ले कर अमेरिका में बंदूक रखने की संस्कृति पर नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे.

ट्रम्प को सौंपी गई 180 पन्नों की रिपोर्ट में आयोग ने स्कूल में तैनात कर्मचारियों को बंदूक से लैस करने का सुझाव दिया है. आयोग का दावा है कि अगर यह सिफारिशें मानी गईं तो इस से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के स्कूलों को ज्यादा लाभ होगा क्योंकि वहां पुलिस को पहुंचने में अधिक समय लग जाता है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शिक्षा विभाग, गार्ड सहित अन्य पदों पर सेना और पुलिस बल से सेवानिवृत्त होने वाले अफसरों की तैनाती कर सकता है. ये अफसर सुरक्षा व्यवस्था बढाने के साथसाथ असरदार शिक्षक की भूमिका भी निभा सकते हैं.

अमेरिकी स्कूलों में हुईं गोलीबारी की वारदातों में कहीं न कहीं गोरेकालों के बीच भेदभाव की सोच छिपी रही है. इसीलिए 2014 में ओबामा सरकार ने गोलीबारी की घटनाओं के बाद गोरे और लातिन अमेरिकी छात्रों से भेदभाव की शिकायतों से निपटने के लिए निलंबन व निष्कासन जैसे कठोर कदमों का विकल्प तलाशने के दिशानिर्देश देने पड़े थे.

भारत में फूलन देवी जैसे अनगिनत उदाहरण हैं जो भेदभावजनित अपराधी हैं. यहां के  गांवों में आए दिन ऊंचनीच के भेदभाव के चलते गोलीबारी की घटनाएं हो रही हैं. कभी दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारने के लिए, कभी जुलूस निकालने, कभी आरक्षण की मांग तो कभी मंदिर में घुसने, तालाब का पानी लेने या खानेपीने की चीजें छू लेने पर होती रहती हैं.

दरअसल हथियार का जवाब हथियार नहीं हो सकता. जितने हाथों में हथियार होंगे, अपराध उतने ही ज्यादा होंगे. हथियार चाहे वैध हो या अवैध. स्कूलों के कर्मचारियों के हाथों में हथियार थमाने से वारदातें नहीं घटेंगी, अमेरिकी समाज में व्याप्त भेदभाव की सोच को खत्म करने से थमेंगी.

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