खबर वाकई में अच्छी है कि छतीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने शराब पीना छोड़ दिया है और अब वे चाहते हैं कि आदिवासी बाहुल्य इस राज्य में शराबबंदी लागू की जाये. देखा जाये तो यह बयान बताता है कि सही मानों में अब वे नेता बन रहे हैं नहीं तो इस आईएएस अधिकारी को चाणक्य कहे जाने वाले नेता अर्जुन सिंह राजनीति में लाये थे. मकसद था शुक्ला बंधुओं को हाशिये पर धकेलना, क्योंकि आदिवासी समुदाय के अजीत जोगी ही अर्जुन सिंह की राह आसान कर सकते थे जो कि उन्होंने की भी.

गुजरे कल के इस वाकये का यह जिक्र बताता है कि अजीत जोगी ने कभी जमीनी राजनीति नहीं की, इसलिए हालिया विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस महज 5 सीटें ले जा पाई, यानि एक तरह से जनता ने इस धारणा को तथ्य में बदल दिया कि छत्तीसगढ़ के थोपे गए मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल औसत से गया गुजरा था. हार के बाद अजीत जोगी को शायद यह बात समझ आ रही है इसलिए वे शराब के नुकसान गिना रहे हैं.

बकौल अजीत जोगी शराब आदिवासियों की दुश्मन है, बात में वजन लाते उन्होंने बताया कि आदिवासियों को शराब के नशे में धुत रखने की साजिश की एक वजह यह भी है कि देश के सबसे रईस इस राज्य की प्राकृतिक संपदा को बाहरी लोग आसानी से लूट सकें. एक और उदाहरण देते उन्होंने बताया कि 200 एकड़ जमीन का मालिक एक किसान शराब में बर्बाद हो गया. अजीत जोगी के मुताबिक शराब का सबसे बड़ा नुकसान औरतों को उठाना पड़ता है, वे वेवक्त विधवा हो जाती हैं.

खुद अपना उदाहरण देते उन्होंने बताया कि वे भी खूब शराब पीते थे, विदेश जाते थे तब भी पीते थे और आदिवासी समुदाय में पैदा लोग तो बचपन से ही इस बुरी लत के आदी हो जाते हैं. जब उनके मन में कुछ बन जाने का ख्याल आया तो उन्होंने शराब छोड़ दी क्योंकि कुछ बनने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा शराब है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से आग्रह करते उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में शराबबंदी लागू की जाये.

आबकारी मंत्री भी थे पियक्कड़

अजीत जोगी के बाद शराब छोड़ने का ऐलान करने वाले दूसरे अहम नेता राज्य के आबकारी मंत्री कवासी लखमा हैं, जिनका शराब पीते फोटो मंत्री पद की शपथ लेते ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. कवासी लखमा अनपढ़ हैं, उन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, लेकिन बस्तर की कोंटा सीट से वे लगातार पांच बार से विधायक चुने जा रहे हैं. उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2003 के चुनाव में उन्हें रिकार्ड 52 फीसदी वोट मिले थे.

गौंड आदिवासी समुदाय के इस विधायक की मानें तो उनकी तीन पीढ़ियों से कोई स्कूल नहीं गया है और पिछड़ापन इतना है कि उनके पिता नहीं जानते कि विधायकी का मतलब क्या होता है इसलिए वे उन्हें खेत में हल जोतने और बीड़ी बनाने की सलाह देते रहते हैं. बस्तर में दादी संबोधन से मशहूर कवासी लखमा जब मंत्री बनाए गए थे तो खूब हल्ला मचा था, हालांकि कहने वालों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री को लेकर भी तंज कसे थे और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की शिक्षा और विवादित डिग्री का जिक्र किया था, जिक्र उमा भारती का भी हुआ था.

प्रियंका गांधी ने ट्वीट कर कवासी लखमा को मंत्री बनाए जाने का स्वागत करते एक जमीनी नेता को इसका हकदार बताया था जो कई विदेश यात्राएं भी कर चुका है और बेबाकी से सवालों के तार्किक और तथ्यात्मक जबाब देता है.

अब मंत्री बन जाने के बाद वे काफी कुछ कर गुजरने की बातें कर रहे हैं और शराब से भी तौबा करने का ऐलान कर चुके हैं तो उन्हें इस पर खरा उतरना भी दिखाना होगा. कवासी लखमा और अजीत जोगी जैसे आदिवासी नेता बेहतर जानते हैं कि उनके समुदाय के पिछड़ेपन और बदहाली की एक बड़ी वजह शराब है. इस समुदाय में खासतौर से छत्तीसगढ़ में बच्चा मां का दूध छोड़ते ही भट्टी में पकी कच्ची (शराब) मुंह से लगा लेता है. ऐसे में वह न तो अपने अधिकार जान पाता और न ही तालीम की अहमियत समझ पाता.

शहरी व्यापारी और सरकारी मुलाजिम भी चाहते हैं कि आदिवासी शराब के नशे में धुत रहें, जिससे वे अपनी खुदगरजी पूरी कर सकें. इस इलाके में आदिवासी हितों की बात करना एक फैशन भर है, पर इस बार बात सुखद है कि 2 दिग्गज आदिवासी नेताओं ने शराब छोडने की पहल की है और उसके नुकसान भी गिनाए हैं. अब जरूरत इस पहल को मुहिम में तब्दील करने की है जिसकी उम्मीद सबसे पहले मीडिया से करना स्वभाविक बात है.

Tags:
COMMENT