हमारे देश में केंद्र में सरकार बदलते ही भारतीय सिनेमा भी बदलता रहा है. मगर चुनावी वर्ष में जिस तरह का सिनेमा भारतीय दर्शकों को देखने को मिलने वाला है, उससे यह सवाल उठना लाजमी है कि फिल्मकारों पर दबाव डालकर सरकार परस्त फिल्में बनवायी गयी हैं या फिल्मकारों ने अपने विवेक से केंद्र सरकार के आगे घुटने टेकते हुए सरकार परस्त फिल्में बना डाली? यह अहम सवाल है? क्योंकि अब तक एक ही वर्ष में और वह भी महज चंद माह के अंदर इस कदर राजनैतिक फिल्में कभी नहीं आयी.

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