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विराट, ऐसे खेलोगे क्या वर्ल्ड कप में?

दिल्ली की सर्दी ने इस बार यहां के लोगों को खूब चकमा दिया है. यह मौसम की ही बेवफाई थी कि मार्च महीने की 13 तारीख को जैसेजैसे फिरोजशाह कोटला के क्रिकेट ग्राउंड पर औस्ट्रेलिया और भारत के बीच खेला जा रहा 5वां और आखिरी वनडे मैच रोमांच की गरमी बढ़ा रहा था, वैसेवैसे बादलों से घिरी दिल्ली ने मेहमान टीम को जीत का तोहफा देना शुरू कर दिया था.

नतीजतन, टौस जीत कर पहले बल्लेबाजी करने उतरी औस्ट्रेलिया की टीम ने भारतीय टीम को 35 रनों से हरा दिया. उस ने तय 50 ओवरों में 9 विकेट खो कर 272 रनों का स्कोर खड़ा किया था. वैसे, जब उस्मान ख्वाजा और पीटर हैंड्सकौम्ब क्रीज पर थे तब लग रहा था कि कहीं वे फिर से 300 के पार न स्कोर को पहुंचा दें पर उन के मिडिल आर्डर के बल्लेबाजों ने कोई खास खेल नहीं दिखाया और पौने 300 से पहले वे सिमट गए.

फिरोजशाह कोटला का मैदान ज्यादा बड़ा नहीं है और यहां की पिच भी बल्लेबाजों के हक में रहती है, इसलिए लग रहा था कि भारत को यह मैच जीतने में दिक्कत नहीं होगी पर जवाब में भारतीय टीम लगातार विकेट गंवाती रही और अपने सभी विकेट खो कर वह 237 रन ही बना सकी. नतीजतन, हमारे कप्तान विराट कोहली के होम ग्राउंड पर 35 रनों की हार के साथ ही यह सीरीज भी हमें गंवानी पड़ी.

इस सीरीज की एक खासीयत यह थी कि इस के पहले 2 मुकाबले भारत ने जीते थे, जबकि औस्ट्रेलियाई टीम ने जबरदस्त वापसी करते हुए लगातार 3 मैच जीत कर सीरीज पर 3-2 से कब्जा जमा लिया. अपनी उम्दा बल्लेबाजी के लिए औस्ट्रेलिया के बल्लेबाज उस्मान ख्वाजा को ‘मैन औफ द मैच’ और ‘मैन औफ द सीरीज’ चुना गया.

भारतीय टीम की इस करारी हार के बाद कुछ खिलाड़ियों की फौर्म को ले कर ही सवाल उठने लगे हैं. हो भी क्यों न, औस्ट्रेलिया ने इस से पहले साल 2009 में भारत में द्विपक्षीय वनडे सीरीज जीती थी. इतना ही नहीं, मेहमान टीम 0-2 से पिछड़ने के बाद आज तक कोई वनडे सीरीज नहीं जीत पाई थी लेकिन अब उस ने यह कारनामा कर दिया गया है.

आगे भारत में मार्च के आखिरी हफ्ते से इंडियन प्रीमियर लीग खेले जाने के बाद 30 मई, 2019 से इंगलैंड में वनडे मैचों का वर्ल्ड कप होने जा रहा है और 23 अप्रैल, 2019 तक वर्ल्ड कप के लिए आखिरी 15 खिलाड़ियों के नाम देने हैं, जबकि यह सीरीज हार कर भारत का कमजोर बैटिंग लाइनअप उजागर हो गया है. फील्डिंग में भी कोई खास कमाल नहीं दिखा है. नंबर 4 और नंबर 5 पर खेलने के दावेदार अंबाती रायुडू और लोकेश राहुल को दिल्ली वनडे के लिए टीम में शामिल नहीं किया गया. महेंद्र सिंह धौनी को किस नंबर पर खेलने का मौका मिलेगा, यह भी पक्का नहीं है. उन्हें भी इस सीरीज के आखिरी 2 मैचों में आराम दिया गया था. इस वजह से विकेटकीपर बल्लेबाज ऋषभ पंत को खुद को साबित करने का मौका मिला था लेकिन वे बुरी तरह नाकाम रहे. उन की विकेटकीपिंग भी औसत दर्जे की ही रही. कई मौकों पर वे स्टंप के पीछे चूके जिस का नतीजा पूरी टीम को भुगतना पड़ा. ऐसे में सवाल उठते हैं कि क्या नंबर 4 पर महेंद्र सिंह धौनी की जगह और पक्की होगी? क्या ऋषभ पंत के बजाय दिनेश कार्तिक को बैकअप विकेटकीपर के तौर पर टीम में जगह मिलेगी?

गेंदबाजी में भी यह अभी पक्का नहीं है कि केदार जाधव, कुलदीप यादव, यजुवेंद्र चहल और रविचंद्रन अश्विन जैसे स्पिन गेंदबाजों में से किस को वर्ल्ड कप में मौका मिलेगा.

तेज गेंदबाजी की बात करें तो जसप्रीत बुमराह अपनी शानदार फौर्म में हैं. मोहम्मद शमी, उमेश यादव और भुवनेश्वर कुमार इंग्लैंड की पिचों पर अपना रंग दिखा सकते हैं पर जगह किस की बनेगी यह तो कप्तान विराट कोहली और कोच रवि शास्त्री ही तय करेंगे.

कुल मिलाकर समय कम रह गया है और काम बहुत बाकी है. बल्लेबाजी में रोहित शर्मा और विराट कोहली के दम पर हम इस वर्ल्ड कप में बेहतरीन प्रदर्शन की उम्मीद नहीं कर सकते हैं. इस के लिए तो सभी खिलाड़ियों को अपनीअपनी जिम्मेदारी संभालनी होगी तभी 2011 वाला इतिहास दोहराया जाएगा।.

वर्ल्ड कप की हमारी संभावित 15 खिलाडियों की टीम : रोहित शर्मा, शिखर धवन, विराट कोहली (कप्तान), महेंद्र सिंह धौनी (विकेटकीपर), केदार जाधव, हार्दिक पंड्या, यजुवेंद्र चहल, कुलदीप यादव, जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद शमी, भुवनेश्वर कुमार, केएल राहुल, दिनेश कार्तिक (विकेटकीपर), विजय शंकर और अंबाती रायुडू.

आलू का रायता

सामग्री

– आलू (04 नग)

– दही (02 कप फेंटा हुआ)

– हरी मिर्च  (01 नग कटी हुई)

– भुना जीरा पाउडर (01 चम्मच)

– चाट मसाला (01 चम्मच)

– काली मिर्च पाउडर (चुटकी भर)

– काला नमक (1/2 चम्मच)

– लाल मिर्च पाउडर (स्वादानुसार)

– धनिया पत्ती (आवश्यकतानुसार)

– नमक (स्वादानुसार)

आलू का रायता बनाने की विधि :

– सबसे पहले आलू धो कर उबाल लें.

– उबले आलुओं को ठंडा करके इन्हें छील लें और चाकू की मदद से छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें.

– अब एक कटोरे में सभी सामग्री को अच्छे से मिला लें और ऊपर से भुने हुए जीरे का पाउडर, काली मिर्च   का पाउडर, काला नमक और नमक छिड़कें.

– अगर आप रायता को स्पाइसी बनाना चाहती हैं तो थोड़ा सा पिसा हुआ लाल मिर्च भी मिला सकती हैं.

– स्‍वादिष्‍ट आलू का रायता तैयार है, इसे हरी धनिया से गार्निश करें और खाने के साथ परोसें.

बच्चों के लिए पर्सनल टीवी है बेहद खरतनाक

बचपन में हम जो भी सीखते हैं, जो भी करते हैं, उसका असर हमपर जिंदगी भर रहता है. कहीं ना कहीं हमारे उपर उन आदतों का प्रभाव रहता है. आज के बच्चों में बाहर निकल कर खेलने कूदने की आदत कम हो गई है. वो बाहर जा कर खेलने से ज्यादा एक कमरे में बैठ कर टीवी देखना या स्मार्ट फोन में लगे रहना पसंद कर रहे हैं. लंबे समय तक ऐसा करना उनकी सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है. इसका उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत पर नकारात्मक असर होता है.

हाल ही में प्रकाशित एक स्टडी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि ज्यादा टीवी देखने से बच्चों की सामाजिक, मानसित और शारीरिक विकास पर बुरा असर होता है. इसके अलावा स्टडी में ये भी बात सामने आई कि अधिक टीवी देखने से बच्चे जंक फूड की ओर आकर्षित होते हैं.

स्टडी में ये भी पता लगाने की कोशिश की गई कि अगर बच्चों को छोटी उम्र में ही उनका एक पर्सनल टीवी दे दिया जाए तो इससे उनके शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास पर क्या असर पड़ेगा. इस शोध के लिए शोधकर्ताओं ने करीब 1800 बच्चों का डाटा लिया जो 1997 से 1998 के बीच में पैदा हुए. इस अध्ययन में कई जरूरी आयामों पर जोर दिया गया. इनमें बच्चों का बौडी मास इंडेक्स, उनकी खाने की आदतें और उनके टीचर से उनके व्यवहार के बारे में जानकारी ली गई.

स्टडी में जा बातें सामने आईं उससे मां बाप को काफी कुछ सीखने की जरूरत है. स्टडी के मुताबिक जिन घरों में बच्चों के बेडरूम में उनके लिए पर्सनल टीवी होती है, उन बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर नकारात्मक असर होता है. इन बच्चों में भविष्य में हाई बीएमआई, जंक फूड की तरफ रुझान, डिप्रेशन आदि की समस्या देखी गई.

जानकारों की माने तो आप अपने घर पर टीवी कहां रखते हैं, इसका भी आपके बच्चों के जीवन पर बहुत गहरा असर पड़ता है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि टीवी कभी भी पर्सनल बेडरूम में ना हो और एक तय अवधि तक ही बच्चों को देखने दिया जाए.

मेेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर : उंची दुकान फीका पकवान

रेटिंग : दो स्टार

‘दिल्ली 6’, ‘भाग मिखा भाग’, ‘मिर्जिया’ जैसी फिल्मों के सर्जक राकेश ओमप्रकाश मेहरा एक बार फिर एक संदेश परक फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिस्टिर’ लेकर आए हैं. मगर इस फिल्म में वह नया परोसने में विफल रहने के साथ ही कहानी के स्तर पर काफी भटके हुए नजर आते हैं. शौचालय की जरुरत को लेकर अक्षय कुमार की फिल्म ‘ट्वायलेटःएक प्रेम कथा’ और नीला माधव पंडा की फिल्म ‘हलका’आ चुकी हैं. नीला माधव पंडा की फिल्म ‘हलका’ में बाहरी दिल्ली की झुग्गी बस्ती में रहने वाला बालक अपने घर के अंदर  शौचालय बनाने की लड़ाई लड़ता है, जबकि राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’में मुंबई के धारावी इलाके की झुग्गी बस्ती का बालक बस्ती में  शौचालय के लिए लड़ाई लड़ता है.

फिल्म की कहानी मुंबई के धारावी इलाके की झुग्गी बस्ती की है, जहां गरीब तबके के लाखों लोग रह रहे हैं. यहां एक सजह व सुखद जीवन जीने की सुविधाओं का घोर अभाव है. यहीं पर आठ वर्षीय कन्हैया उर्फ कनु (ओम कनौजिया) अपनी मां सरगम ( अंजली पाटिल) के साथ रहता है. कनु के पिता नहीं है. पता चलता है कि सरगम ने सोलह साल की उम्र में किसी लड़के से प्यार किया था और शादी से पहले ही सरगम के गर्भवती हो जाने पर वह भाग गया, तब सरगम मुंबई के धारावी इलाके में आकर रहने लगी थी. उसकी पड़ोसन राबिया (रसिका अगाशे), राबिया का पति जस्सू (नचिकेत) और उसकी बेटी मंगला(सायना आनंद) है. कनू व मंगला के दोस्त हैं रिंग टोन(आदर्श भारती) और निराला (प्रसाद). इस बस्ती में एक गगनचुंबी इमारत में रहने वाली समाज सेविका ईवा (सोनिया अलबिजूरी) अपनी कार से आती रहती हैं, जो कि मंगला के स्कूल का खर्च उठाती है और इसके बदले में मंगला के हाथों लोगों के बीच कंडोम बंटवाती हैं, जिससे लोग कम से कम बच्चे पैदा करें. यही काम वह बाद में कनु को भी देती हैं. एक कंडोम बांटने पर एक रूपया देती है.

कनु एक समाचर पत्र बेचने वाले पप्पू (नितीश वाधवा) की दुकान पर काम करता है. पप्पू, सरगम से प्यार करता है और आए दिन किसी न किसी बहाने वह सरगम से मिलने आता रहता है. इस बात को राबिया समझ जाती है. वह सरगम से कहती है कि पप्पू अच्छा लड़का और वह सरगम से प्यार भी करता है. पर सरगम उसे महत्व नहीं देती. एक दिन जब रात में सरगम षौच के रेलवे पटरी की तरफ जाती है लिए बाहर जाती है, तो उसी मोहल्ले के साईनाथ (मकरंद देशपांडे), सरगम को छेड़ने का प्रयास करता है. पर ऐन वक्त पर पुलिस हवलदार आ जाता है, जो कि साईनाथ को मारकर भगा देता है. लेकिन हवलदार के साथ आया पुलिस का अफसर सरगम के साथ बलात्कार करता है. इससे सरगम बहुत दुखी होती है. अब कनु की समझ में आ जाता है कि जिस तरह ईवा के घर के अंदर ट्वायलेट है, वैसा उसके घर या बस्ती में न होने की बवजह से उसकी मां के साथ बलात्कार हुआ. तो वह अपने दो साथियां के साथ नगरपालिका के दफ्तर जाकर ट्वायलेट बनाने की मांग करता है. नगर पालिका का अफसर उन्हे यह कहकर भगा देता है कि दिल्ली में प्राइम मिनिस्टर के पास पत्र भेजने पर ही  शौचालय बनेगा. अब कनु अपने दोस्तों के साथ प्राइम मिनिस्टर के आफिस पहुंचता है, जहा वह एक अफसर (अतुल कुलकर्णी) को पत्र देकर आ जाते हैं. मुंबई पहुंचने के बाद वह और उसके दोस्त मंदिर बनवाने, मस्जिद बनवाने आदि के नाम पर लोगों से चंदा इकट्ठा करते हैं, जिससे वह अपनी बस्ती में ट्वायलेट बनवा सके. पर एक दिन पुलिस वाले कनु व उसके दोस्तों से यह पैसा ले लेते हैं. उधर पप्पू, सरगम को समझाकर गुप्त रोग आदि की जांच करवाने के लिए कहता है. फिर दोनों शादी करने के लिए सहमत हो जाते हैं. इसी बीच प्रधानमंत्री के आफिस से नगरपालिका में पत्र आता है और कनु की बस्ती में सार्वजनिक  शौचालय बन जाता है.

राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने अपनी फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ में नारी सुरक्षा का मुद्दा उठाया है, मगर वह कथा कथन में बुरी तरह से मात खा गए. फिल्मकार राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने फिल्म की षुरूआत में कंडोम बांटने से की और फिर एक महिला के साथ शौच जाने पर बलात्कार के बाद कहानी  शौचालय की तरफ मुड़ जाती है और कंडोम व कम बच्चे का मसला वह भूल गए. तो वहीं कम उम्र के चारो बच्चे जिस तरह से  शौचालय बनाने की जद्दोजेहाद करते हुए दिखाए गए, वह अविश्वसनिय लगता है.  शौचालय की मूल कहानी तक पहुंचने में भी कहानीकार व निर्देशक ऐसी लंबी उल जलूल यात्रा करते हैं कि दर्षक बोर हो जाता है. ’मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ देखकर इस बात का अहसास ही नहीं होता कि इस फिल्म के निर्देशक राकेश ओम प्रकाश मेहरा ही है, जिन्होने कभी ’दिल्ली 6’ और ’भाग मिल्खा भाग’ जैसी फिल्मों का निर्माण व निर्देशन किया था.

पूरी फिल्म देखने के बाद इस बात का अहसास होता है किलेखकीय टीम के सदस्य मनोज मैरटा, राकेश ओमप्रकाश मेहरा व हुसेन दलाल इतने बड़े हो गए हैं कि उनके लिए बाल मनोविज्ञान की समझ के साथ लेखन करना संभव ही नहीं रहा.

संगीतकार शंकर एहसान लौय का संगीत भी प्रभावहीन है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो चारो बच्चों में से कनु का मूख्य किरदार निभाने वाले बाल कलाकार ओम कनौजिया प्रभावित नहीं करते. जबकि आदर्श भारती व प्रसाद में ज्यादा संभावनाएं नजर आती हैं. छोटे से किरदार में बाल कलाकार सयाना आनंद जरुर अपनी तरफ ध्यान आकर्षित करने में सफल रहती है. सरगम के किरदार में अंजली पाटिल ने भी उत्कृष्ट अभिनय किया है. इसके अलावा अन्य कलाकारों के हिस्से कुछ खास करने को रहा नहीं. यॅूं भी कहानी तो एक मां और बेटे के ही इर्द गिर्द घूमती है. मगर इन बाल कलाकारों के बेहतरीन अभिनय के बावजूद फिल्म दर्शकों को बांधकर नहीं रख पाती.

दो घंटे दस मिनट की अवधि वाली फिल्म ’मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ का निर्माण राकेश ओमप्रकाश मेहरा, पी एस भारती, नवमीत सिंह, राजीव टंडन व अर्पित व्यास ने किया है. फिल्म के निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा, लेखक मनोज मैरटा, राकेश ओमप्रकाश मेहरा व हुसेन दलाल, संगीतकार शंकर एहसान लौय, कैमरामैन पावेल डायलस और कलाकार हैं-अंजली पाटिल, ओम कनौजिया, अतुल कुलकर्णी, मकरंद देशपांडे, रसिका अगाषे, सोनिया अलबिजुरी, सायना आनंद, आदर्ष भारती, प्रसाद, नचिकेत पूरणपत्रे, नितीश वाधवा, जिज्ञासा यदुवंशी व अन्य.

चाप रोल रेसिपी

सामग्री:

– 200 ग्राम चाप

– 2 हरा प्याज कटा हुआ

– 4 बेबी प्याज कटा हुआ (आवश्ताकतानुसार)

– बारबेक्यू सौस

– चिली औरिगैनो सौस (आवश्यकतानुसार)

– कालीमिर्च स्वादानुसार

– थोड़ी सी आइसबर्ग कटी हुई

– चाप तलने के लिए (पर्याप्त तेल)

– मैदा के रैपर

– 1 कटोरी मैदा

– नमक (स्वादानुसार)

बनाने की विधि

– चाप को टुकड़ों में काट कर गरम तेल में क्रिस्पी होने तक तल लें.

– एक बाउल में हरा प्याज, बेबी प्याज, आइसबर्ग, बारबेक्यू व चिली औरिगैनो सौस,     नमक, कालीमिर्च और चाप के टुकड़े मिला कर फिलिंग तैयार करें.

– मैदे में पानी मिला कर टाइट लोई(डो) तैयार करें.

– इस लोई (डो) से पतलीपतली रोटियां बेल कर गरम तवे पर उलटपलट कर सेंक लें.

– ध्यान रखें कि रोटियां फूलें नहीं.

– रोटियों में फिलिंग रख कर रोल्स तैयार करें और मनपसंद चटनी के साथ सर्व करें.

हामिद : कश्मीर के वर्तमान हालातों का सजीव चित्रण…

रेटिंग : 4 स्टार

‘‘द व्हाइट एलीफेंट’’ और ‘‘बाके की क्रेजी बारात’’ जैसी फिल्मों के निर्देशक ऐजाज खान की तीसरी फिल्म‘‘हामिद’’एक सात वर्षीय बालक के नजरिए से कश्मीर घाटी में चल रहे खूनी संघर्ष, उथल पुथल, सीआरपीएफ जवानों पर पत्थर बाजी, लोगों के गुम होने आदि की कथा से ओतप्रोत आम बौलीवुड मसाला फिल्म नहीं है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही जा चुकी फिल्म ‘‘हामिद’’ मूलतः अमीन भट्ट लिखित कश्मीरी नाटक‘‘फोन नंबर 786’’ पर आधारित है. जिसमें मासूम हामिद अपने भोलेपन के साथ ही अल्लाह व चमत्कार में यकीन करता है. मासूम हामिद जिस भोलेपन से अल्लाह व कश्मीर के मुद्दों को लेकर सवाल करता है, वह सवाल विचलित करते हैं. वह कश्मीर में चल रहे संघर्ष की पृष्ठभूमि में बचपन की मासूमियत और विश्वास की उपचार शक्ति का ‘‘हामिद’’ में बेहतरीन चित्रण है. मासूम हामिद उस पवित्रता का प्रतीक बनकर उभरता है, जो भय और मृत्यु के बीच एक आशा की किरण है.

रेटिंग : 4 स्टार‘‘द व्हाइट एलीफेंट’’ और ‘‘बाके की क्रेजी बारात’’ जैसी फिल्मों के निर्देशक ऐजाज खान की तीसरी फिल्म‘‘हामिद’’एक सात वर्षीय बालक के नजरिए से कश्मीर घाटी में चल रहे खूनी संघर्ष, उथल पुथल, सीआरपीएफ जवानों पर पत्थर बाजी, लोगों के गुम होने आदि की कथा से ओतप्रोत आम बौलीवुड मसाला फिल्म नहीं है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही जा चुकी फिल्म ‘‘हामिद’’ मूलतः अमीन भट्ट लिखित कश्मीरी नाटक‘‘फोन नंबर 786’’ पर आधारित है. जिसमें मासूम हामिद अपने भोलेपन के साथ ही अल्लाह व चमत्कार में यकीन करता है. मासूम हामिद जिस भोलेपन से अल्लाह व कश्मीर के मुद्दों को लेकर सवाल करता है, वह सवाल विचलित करते हैं. वह कश्मीर में चल रहे संघर्ष की पृष्ठभूमि में बचपन की मासूमियत और विश्वास की उपचार शक्ति का ‘‘हामिद’’ में बेहतरीन चित्रण है. मासूम हामिद उस पवित्रता का प्रतीक बनकर उभरता है, जो भय और मृत्यु के बीच एक आशा की किरण है.फिल्म की कहानी शुरू होती है एक कारखाने से, जहां रहमत (सुमित कौल) और रसूल चाचा (बशीर लोन) नाव बनाने में मग्न है. जब रात होने लगती है, तो रसूल चाचा, रहमत को घर जाने के लिए कहते हैं. रास्ते में रहमत को सीआरपीएफ के जवानों के सवालों के जवाब देने पड़ते हैं. इधर घर पर रहमत के लाडले सात साल के बेटे हामिद को अपने पिता के आने का इंतजार है. क्योंकि उसे मैच देखना है और टीवी चलाने के लिए बैटरी की जरुरत है. जब रहमत अपने घर पहुंचता है, तो रहमत का बेटा हामिद (ताल्हा अरशद) जिद करता है कि उसे मैच देखना है, इसलिए अभी बैटरी लेकर आएं. रहमत की पत्नी और हामिद की मां इशरत (रसिका दुग्गल) के मना करने के बावजूद रहमत अपने बेटे की मांग को पूरा करने के लिए रात में ही बैटरी लेने निकल जाता है, पर वह घर नहीं लौटता. उसके बाद पूरे एक वर्ष बाद कहानी शुरू होती है. जब इशरत अपने बेटे की अनदेखी करते हुए अपने पति की तलाश में भटक रही है. वह हर दिन पुलिस स्टेशन जाती रहती है. इधर हामिद की जिंदगी भी बदल चुकी है. एक दिन उसके दोस्त से ही उसे पता चलता है कि उसके अब्बू यानी कि पिता अल्लाह के पास गए हैं. तब वह अपने अब्बू के अल्लाह के पास से वापस लाने के लिए जुगत लगाने लगता है. एक दिन एक मौलवी से उसे पता चलता है कि अल्लाह का नंबर 786 है. तो वह 786 को अपनी बाल बुद्धि के बल पर दस नंबर में परिवर्तित कर अल्लाह को फोन लगाता है. यह नंबर लगता है कश्मीर घाटी में ही तैनात एक अति गुस्सैल सीआरपीएफ जवान अभय (विकास कुमार) को. अभय अपने परिवार से दूर कश्मीर में तैनात है और इस अपराध बोध से जूझ रहा है कि उसके हाथों अनजाने ही एक मासूम की हत्या हुई है. फोन पर एक मासूम बालक की आवाज सुनकर अभय उससे बात करने लगता है और हामिद का दिल रखने के लिए वह खुद को अल्लाह ही बताता है. अब हर दिन हामिद और अभय के बीच बातचीत होती है. हामिद के कई तरह के सवाल होते हैं, जिनका जवाब अभय देने का प्रयास करता है. उधर एक इंसान अपनी तरफ से हामिद को गलत राह पर ले जाने का प्रयास करता रहता है, पर अभय से बात करके हामिद सही राह पर ही चलता है. हामिद अपनी हर तकलीफ अल्लाह यानी कि अभय को बताता रहता है. अभय हर संभव उसकी मदद करता रहता है. वह हामिद के लिए अपनी तरफ से रहमत की खोजबनी शुरू करता है, जिसके लिए उसे अपने उच्च अधिकारी से डांट भी खानी पड़ती है. यह सिलसिला चलता रहता है.एक दिन गुस्से में अभय, हामिद से कह देता है कि वह तो क्या कोई भी इंसान उसके अब्बू रहमत को वापस नही ला सकता. वह मर चुके है. उसके बाद हामिद अपने पिता के गुम होने की फाइल व तस्वीर आदि को जमीन में दफन कर देता है. फिर अपनी मां को लेकर उसी कारखाने में जाता है, जहां उसने अपने पिता की ही तरह नाव बनायी है. वहां पहुंचने पर रसूल चाचा बताते हैं कि हामिद के नाम पार्सल आया है, हामिद उसे खोलता है तो उसमें से लाल रंग से भरे दो डिब्बे निकलते हैं. हामिद कहता है कि यह अल्लाह ने भिजवाया है, क्योंकि उसने अल्लाह से कहा था कि लाल रंग खरीदने के लिए उसके पास पैसे नहीं है, फिर नाव को लाल रंग से रंगकर वह अपनी मां को उसी नाव में बिठाकर डल झील में घूमाता है.ऐजाज खान के निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘‘द व्हाइट एलीफेंट’’ अब तक रिलीज नहीं हो पायी है. जबकि उनकी दूसरी हास्य फिल्म ‘‘बांकेलाल की क्रेजी बारात’’ 2015 में प्रदर्शित हुई थी. अब अति गंभीर विषय वाली ‘‘हामिद’’ उनके निर्देशन में बनी तीसरी फिल्म है. इस फिल्म में ऐजाज खान ने एक सात वर्षीय बच्चे हामिद के माध्यम से कश्मीर घाटी के उन सभी मसलों को उठाया है, जो हमसे अछूते नहीं है. फिल्म में सेना और कश्मीरियों के बीच टकराव, अलगाववादियों द्वारा मासूम बच्चों व किशोरो को आजादी,  जन्नत व अल्लाह के नाम पर बरगलाना, घर के पुरुषों के गायब होने के बाद स्त्रियों के दर्द, सेना के जवान का एक मासूम बालक की वजह से कश्मीरी परिवार के लिए पैदा हुई सहानुभूति को गलत अर्थ में लेना, अपने परिवारो से कई सौ किलोमीटर दूर पत्थरबाजों के बीच रह रहे आरपीएफ जवानो की मनः स्थिति आदि का बेहतरीन चित्रण है. मगर लेखक व निर्देशक ने कहीं भी अति नाटकीयता या तीखी बयानबाजी को महत्व नही दिया है.रवींद्र रंधावा और सुमित सक्सेना लिखित संवाद काफी अच्छे हैं और यह दिलों को झकझोरने के साथ ही सोचने पर मजबूर करते हैं. फिल्म की कमजोर कड़ी इसकी लंबाई है. इसे एडीटिंग टेबल पर कसने की जरुरत थी.जहां तक अभिनय का सवाल है, तो हामिद की शीर्ष भूमिका में बाल कलाकार ताल्हा अरशद की मासूमियत व अभिनय दिल तक पहुंचता है. ताल्हा ने अपने किरदार को जिस संजीदगी के साथ जिया है, वह अभिभूत करता है. अपने पति की खोज में भटकती इशरत के किरदार में रसिका दुग्गल ने अपने सशक्त अभिनय से लोहा मनवाया है. वह अपने अभिनय से दर्शकों की आत्मा को भेदती है. अभय के किरदार को विकास कुमार ने भी सजीव किया है. रहमत के छोटे किरदार में सुमित कौल अपनी छाप छोड़ जाते हैं. अन्य कलाकारों ने भी सधा हुआ अभिनय किया है. फिल्म के कैमरामैन भी बधाई के पात्र हैं.फिल्म‘‘हामिद’’का निर्माण ‘‘यूडली फिल्मस’’ने किया है. फिल्म के निर्देशक ऐजाज खान, लेखक रविंद्र रंधावा व सुमित सक्सेना तथा कलाकार हैं- ताल्हा अरशद, विकास कुमार, रसिका दुग्गल, सुमित कौल, बशीर लोन, गुरवीर सिंह, अशरफ नागू, मीर सरवर, काजी फैज, उमर आदिल, गुलाम हुसेन, साजिद, साफिया व अन्य.

फिल्म की कहानी शुरू होती है एक कारखाने से, जहां रहमत (सुमित कौल) और रसूल चाचा (बशीर लोन) नाव बनाने में मग्न है. जब रात होने लगती है, तो रसूल चाचा, रहमत को घर जाने के लिए कहते हैं. रास्ते में रहमत को सीआरपीएफ के जवानों के सवालों के जवाब देने पड़ते हैं. इधर घर पर रहमत के लाडले सात साल के बेटे हामिद को अपने पिता के आने का इंतजार है. क्योंकि उसे मैच देखना है और टीवी चलाने के लिए बैटरी की जरुरत है. जब रहमत अपने घर पहुंचता है, तो रहमत का बेटा हामिद (ताल्हा अरशद) जिद करता है कि उसे मैच देखना है, इसलिए अभी बैटरी लेकर आएं. रहमत की पत्नी और हामिद की मां इशरत (रसिका दुग्गल) के मना करने के बावजूद रहमत अपने बेटे की मांग को पूरा करने के लिए रात में ही बैटरी लेने निकल जाता है, पर वह घर नहीं लौटता. उसके बाद पूरे एक वर्ष बाद कहानी शुरू होती है. जब इशरत अपने बेटे की अनदेखी करते हुए अपने पति की तलाश में भटक रही है. वह हर दिन पुलिस स्टेशन जाती रहती है. इधर हामिद की जिंदगी भी बदल चुकी है. एक दिन उसके दोस्त से ही उसे पता चलता है कि उसके अब्बू यानी कि पिता अल्लाह के पास गए हैं. तब वह अपने अब्बू के अल्लाह के पास से वापस लाने के लिए जुगत लगाने लगता है. एक दिन एक मौलवी से उसे पता चलता है कि अल्लाह का नंबर 786 है. तो वह 786 को अपनी बाल बुद्धि के बल पर दस नंबर में परिवर्तित कर अल्लाह को फोन लगाता है. यह नंबर लगता है कश्मीर घाटी में ही तैनात एक अति गुस्सैल सीआरपीएफ जवान अभय (विकास कुमार) को. अभय अपने परिवार से दूर कश्मीर में तैनात है और इस अपराध बोध से जूझ रहा है कि उसके हाथों अनजाने ही एक मासूम की हत्या हुई है. फोन पर एक मासूम बालक की आवाज सुनकर अभय उससे बात करने लगता है और हामिद का दिल रखने के लिए वह खुद को अल्लाह ही बताता है. अब हर दिन हामिद और अभय के बीच बातचीत होती है. हामिद के कई तरह के सवाल होते हैं, जिनका जवाब अभय देने का प्रयास करता है. उधर एक इंसान अपनी तरफ से हामिद को गलत राह पर ले जाने का प्रयास करता रहता है, पर अभय से बात करके हामिद सही राह पर ही चलता है. हामिद अपनी हर तकलीफ अल्लाह यानी कि अभय को बताता रहता है. अभय हर संभव उसकी मदद करता रहता है. वह हामिद के लिए अपनी तरफ से रहमत की खोजबनी शुरू करता है, जिसके लिए उसे अपने उच्च अधिकारी से डांट भी खानी पड़ती है. यह सिलसिला चलता रहता है.

HAMID

एक दिन गुस्से में अभय, हामिद से कह देता है कि वह तो क्या कोई भी इंसान उसके अब्बू रहमत को वापस नही ला सकता. वह मर चुके है. उसके बाद हामिद अपने पिता के गुम होने की फाइल व तस्वीर आदि को जमीन में दफन कर देता है. फिर अपनी मां को लेकर उसी कारखाने में जाता है, जहां उसने अपने पिता की ही तरह नाव बनायी है. वहां पहुंचने पर रसूल चाचा बताते हैं कि हामिद के नाम पार्सल आया है, हामिद उसे खोलता है तो उसमें से लाल रंग से भरे दो डिब्बे निकलते हैं. हामिद कहता है कि यह अल्लाह ने भिजवाया है, क्योंकि उसने अल्लाह से कहा था कि लाल रंग खरीदने के लिए उसके पास पैसे नहीं है, फिर नाव को लाल रंग से रंगकर वह अपनी मां को उसी नाव में बिठाकर डल झील में घूमाता है.

ऐजाज खान के निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘‘द व्हाइट एलीफेंट’’ अब तक रिलीज नहीं हो पायी है. जबकि उनकी दूसरी हास्य फिल्म ‘‘बांकेलाल की क्रेजी बारात’’ 2015 में प्रदर्शित हुई थी. अब अति गंभीर विषय वाली ‘‘हामिद’’ उनके निर्देशन में बनी तीसरी फिल्म है. इस फिल्म में ऐजाज खान ने एक सात वर्षीय बच्चे हामिद के माध्यम से कश्मीर घाटी के उन सभी मसलों को उठाया है, जो हमसे अछूते नहीं है. फिल्म में सेना और कश्मीरियों के बीच टकराव, अलगाववादियों द्वारा मासूम बच्चों व किशोरो को आजादी,  जन्नत व अल्लाह के नाम पर बरगलाना, घर के पुरुषों के गायब होने के बाद स्त्रियों के दर्द, सेना के जवान का एक मासूम बालक की वजह से कश्मीरी परिवार के लिए पैदा हुई सहानुभूति को गलत अर्थ में लेना, अपने परिवारो से कई सौ किलोमीटर दूर पत्थरबाजों के बीच रह रहे आरपीएफ जवानो की मनः स्थिति आदि का बेहतरीन चित्रण है. मगर लेखक व निर्देशक ने कहीं भी अति नाटकीयता या तीखी बयानबाजी को महत्व नही दिया है.

एक दिन गुस्से में अभय, हामिद से कह देता है कि वह तो क्या कोई भी इंसान उसके अब्बू रहमत को वापस नही ला सकता. वह मर चुके है. उसके बाद हामिद अपने पिता के गुम होने की फाइल व तस्वीर आदि को जमीन में दफन कर देता है. फिर अपनी मां को लेकर उसी कारखाने में जाता है, जहां उसने अपने पिता की ही तरह नाव बनायी है. वहां पहुंचने पर रसूल चाचा बताते हैं कि हामिद के नाम पार्सल आया है, हामिद उसे खोलता है तो उसमें से लाल रंग से भरे दो डिब्बे निकलते हैं. हामिद कहता है कि यह अल्लाह ने भिजवाया है, क्योंकि उसने अल्लाह से कहा था कि लाल रंग खरीदने के लिए उसके पास पैसे नहीं है, फिर नाव को लाल रंग से रंगकर वह अपनी मां को उसी नाव में बिठाकर डल झील में घूमाता है.

रवींद्र रंधावा और सुमित सक्सेना लिखित संवाद काफी अच्छे हैं और यह दिलों को झकझोरने के साथ ही सोचने पर मजबूर करते हैं. फिल्म की कमजोर कड़ी इसकी लंबाई है. इसे एडीटिंग टेबल पर कसने की जरुरत थी.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो हामिद की शीर्ष भूमिका में बाल कलाकार ताल्हा अरशद की मासूमियत व अभिनय दिल तक पहुंचता है. ताल्हा ने अपने किरदार को जिस संजीदगी के साथ जिया है, वह अभिभूत करता है. अपने पति की खोज में भटकती इशरत के किरदार में रसिका दुग्गल ने अपने सशक्त अभिनय से लोहा मनवाया है. वह अपने अभिनय से दर्शकों की आत्मा को भेदती है. अभय के किरदार को विकास कुमार ने भी सजीव किया है. रहमत के छोटे किरदार में सुमित कौल अपनी छाप छोड़ जाते हैं. अन्य कलाकारों ने भी सधा हुआ अभिनय किया है. फिल्म के कैमरामैन भी बधाई के पात्र हैं.

फिल्म‘‘हामिद’’का निर्माण ‘‘यूडली फिल्मस’’ने किया है. फिल्म के निर्देशक ऐजाज खान, लेखक रविंद्र रंधावा व सुमित सक्सेना तथा कलाकार हैं- ताल्हा अरशद, विकास कुमार, रसिका दुग्गल, सुमित कौल, बशीर लोन, गुरवीर सिंह, अशरफ नागू, मीर सरवर, काजी फैज, उमर आदिल, गुलाम हुसेन, साजिद, साफिया व अन्य.

आशीर्वाद : (आखिरी भाग)

तभी एक शिष्य अमित के पास आया और बोला, ‘‘आप को गुरुजी ने याद किया है.’’

अमित एकदम उठा और शिष्य के साथ चल दिया.

गुरुजी के कमरे में पहुंच कर अमित हाथ जोड़ कर बैठ गया.

सामने बैठे गुरुजी ने पूछा, ‘‘क्या हुआ अमित? मेनका नहीं आई?’’

‘‘गुरुजी, मैं ने उसे बहुत कहा, पर वह नहीं आई. कहने लगी कि मैं माफी नहीं मांगूंगी. इस पर मैं ने उसे थप्पड़ भी मार दिया और वह गुस्से में बेटी के साथ कहीं चली गई.’’

‘‘चली गई? कहां चली गई? इस तरह अपनी पत्नी से हमें अपमानित करा कर तुम ने उसे जानबूझ कर यहां से भेजा है. यह तुम ने अच्छा नहीं किया,’’ गुरुजी ने अमित की ओर गुस्से से देखा.

अमित घबरा गया. वह गुरुजी के चरणों में सिर रख कर बोला, ‘‘मैं ने उसे नहीं भेजा गुरुजी. मैं सच कह रहा हूं. मेरा विश्वास कीजिए.’’

‘‘विश्वास… कैसा विश्वास? मुझे तुम जैसे अविश्वासी भक्त नहीं चाहिए. जिन की पत्नी अपने पति की बात न मानती हो. हम ने मेनका को इसलिए बुलाया था कि उसे भी आशीर्वाद मिल जाता.’’

‘‘गुरुजी, आप कहें तो मैं उसे छोड़ दूं. उस से तलाक ले लूं.’’

‘‘हम कुछ नहीं कहेंगे. जो तुम्हारी इच्छा हो करो…’’ गुरुजी ने नाराजगी

भरी आवाज में कहा, ‘‘अब तुम जा सकते हो.’’

‘‘गुरुजी, मेनका की ओर से मैं माफी मांगता हूं.’’

‘‘ऐसा नहीं होता कि किसी के अच्छेबुरे कर्मों का फल किसी दूसरे को दिया जाए. तुम अपने कमरे में जाओ,’’ गुरुजी ने अमित की ओर गुस्से से देखते हुए कहा.

अमित चुपचाप थके कदमों से अपने कमरे में पहुंचा.

कुछ देर बाद 2 शिष्य अमित के पास आए और उस के बैग में से कपड़े निकाल कर बाहर डालने लगे मानो कुछ ढूंढ़ रहे हों.

अमित समझ नहीं पाया कि यह क्या हो रहा है? उस ने पूछा, ‘‘भैयाजी, यह क्या कर रहे हो? बैग से कपड़े क्यों निकाल रहे हो?’’

‘‘अभी पता चल जाएगा,’’ कहते हुए एक शिष्य ने बैग में से एक लाल रंग की बहुत सुंदर सी डब्बी निकाल कर खोली. उस में हीरे की एक अंगूठी थी.

दूसरा शिष्य बोला, ‘‘आज ही यह अंगूठी गुरुजी को दिल्लीवासी एक भक्त ने भेंट में दी थी. उस भक्त की आभूषण की दुकान है. यह डब्बी कुछ देर पहले से गायब थी. हमें तुम पर शक था, पर अब तो पता चल गया कि यह चोरी तुम ने ही की है.’’

‘‘नहीं, मैं ने अंगूठी नहीं चुराई. मैं चोर नहीं हूं. मुझे अंगूठी के बारे में कुछ नहीं मालूम. मैं बेकुसूर हूं,’’ अमित घबरा कर बोला.

‘‘अंगूठी तेरे पास से मिली है और तू कहता है कि तू ने चोरी नहीं की,’’ एक शिष्य ने कहा.

तभी 2 शिष्य और आ गए. उन चारों ने अमित के साथ मारपीट शुरू कर दी.

अमित के साथ हो रही मारपिटाई की आवाज सुन आश्रम में कुछ भक्त कमरों से बाहर निकल कर देखने गए. जब उन्हें पता चला कि गुरुजी की अंगूठी चुराने पर उस की पिटाई की जा रही है तो किसी ने भी उसे छुड़ाने की कोशिश नहीं की. सभी नफरत और गुस्से से अमित की ओर देख रहे थे.

सभी का कहना था कि ऐसे चोर की तो खूब पिटाई कर के पुलिस में देना चाहिए.

चारों शिष्यों ने अमित की इतनी पिटाई कर दी कि वह बेहोश हो गया. आश्रम से बाहर उसे सड़क के किनारे फेंक दिया.

गाडि़यां आतीजाती रहीं. लोग देखते रहे कि सड़क के किनारे कोई शख्स पड़ा हुआ है.

पुलिस की गश्ती गाड़ी उधर से जा रही थी. सड़क के किनारे किसी को पड़ा हुआ देख कर गाड़ी रुकी. दारोगा और

2 सिपाही उतरे. उन्होंने अमित को देखा. उस के चेहरे पर मारपिटाई के निशान थे. मुंह व सिर से खून भी निकला था.

पुलिस ने उसे उठा कर जिला अस्पताल में भरती करा दिया. डाक्टर से कह दिया कि जब यह होश में आ जाए तो सूचना दे देना.

सुबह तकरीबन 7 बजे अमित को होश आया तो उस का पूरा शरीर बुरी तरह से दुख रहा था.

डाक्टर ने अमित के पास आ कर पूछा, ‘‘आप का नाम?’’

‘‘अमित.’’

‘‘क्या रात को किसी से झगड़ा हो गया था?’’ डाक्टर ने सवाल किया.

अमित ने सबकुछ बता दिया कि वह गुरुजी का एक भक्त है. पत्नी के साथ यहां आश्रम में आया था. रात पत्नी से कहासुनी होने पर वह चली गई. गुरुजी के शिष्यों ने उस पर चोरी का आरोप लगा कर मारपिटाई कर सड़क पर फेंक दिया.

‘‘तुम्हारा समय अच्छा है अमित कि उन शिष्यों ने तुम्हारी जान नहीं ली. वे तुम्हें बेहोशी की हालत में गंगा में भी फेंक सकते थे. अब उन्होंने तुम्हारा बैग, मोबाइल वगैरह सामान जरूर फेंक दिया होगा गंगा में.’’

अमित चुप रहा.

‘‘अब तुम्हारी पत्नी कहां होगी?’’ डाक्टर ने पूछा.

‘‘पता नहीं. वह बेटी को ले कर चली गई थी कि रात को किसी होटल में रुकेगी. सुबह बस या टे्रन से वापस जाने की बात कह रही थी.’’

‘‘उस के पास मोबाइल फोन होगा. जरा उस का नंबर बताओ.’’

अमित ने मेनका का मोबाइल नंबर बताया. डाक्टर ने नंबर मिलाया तो उधर घंटी बजने लगी.

‘हैलो,’ उधर से आवाज सुनाई दी.

‘‘मैडम मेनका बोल रही हैं?’’

‘हां, बोल रही हूं. आप कौन?’

‘‘मैं यहां सिविल अस्पताल से डाक्टर विपिन बोल रहा हूं. आप के पति अमित यहां अस्पताल में भरती हैं. अब वे काफी ठीक हैं. लीजिए उन से बात कीजिए,’’ कहते हुए डाक्टर ने मोबाइल अमित को दे दिया.

‘‘हैलो,’’ अमित की कराहती सी आवाज निकली.

‘क्या हुआ? तुम ठीक तो हो न? अस्पताल में क्यों? तुम्हारी तो आवाज भी नहीं निकल रही है.’

‘‘तुम यहां आ जाओ मेनका. मैं तुम्हारे बगैर जी नहीं सकूंगा,’’ कहतेकहते अमित को रुलाई आ गई.

‘मैं आ रही हूं. बस अभी पहुंच रही हूं,’ उधर से मेनका की घबराई सी आवाज सुनाई पड़ी.

डाक्टर ने पुलिस को सूचना दे दी कि अमित को होश आ गया है.

कुछ देर बाद चिंतित व डरी सी मेनका पिंकी के साथ अस्पताल में अमित के पास पहुंची. अमित के चेहरे पर चोट के निशान थे. सिर पर पट्टी बंधी हुई थी.

अमित को देखते ही वह कांप उठी. उस ने पूछा, ‘‘यह कैसे हुआ?’’

अमित ने सबकुछ बता दिया.

तभी दारोगा व एक सिपाही उन के पास आए. दारोगा ने पूछा, ‘‘अब कैसे हो आप?’’

‘‘ठीक हूं…’’ अमित ने कहा, ‘‘यह मेरी पत्नी और बेटी हैं.’’

‘‘अच्छा, अब आप यह बताओ कि हमें क्या करना है? आप चाहें तो रिपोर्ट लिखा सकते हो.’’

‘‘नहीं सर, हमें कोई रिपोर्ट नहीं लिखवानी है. हमें यह भी पता चल गया है कि गुरुजी की पहुंच ऊपर तक है. कई मंत्री व बड़ेबड़े नेता भी यहां आश्रम में आते रहते हैं. गुरुजी का कुछ नहीं बिगड़ेगा,’’ अमित ने कहा.

‘‘जिस दिन भी इस शैतान गुरु के पाप का घड़ा भर जाएगा, उस दिन यह भी नहीं बचेगा,’’ मेनका बोली.

कुछ देर तक बातचीत कर के दारोगा सिपाही के साथ वापस चला गया.

पछतावे के साथ अमित बोला, ‘‘कल सुबह अस्पताल से मुझे छुट्टी मिल जाएगी. हम वापस घर चले जाएंगे.

‘‘मेनका, मैं ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस गुरु को मैं भगवान समझता रहा, वह एक शैतान है. इस गुरु की अंधभक्ति में मैं ने जिंदगी के इतने साल बरबाद कर दिए.

‘‘मैं ने हमेशा तुम्हारी कही गई बातों की अनदेखी की. तुम तो इन ढोंगी बाबाओं से नफरत करती थीं, लेकिन मैं उस की वजह नहीं समझ पाया.

‘‘तुम ने इशारोंइशारों में कई बार मुझे समझाने की कोशिश भी की थी, पर मेरी अक्ल पर तो जैसे पत्थर पड़ गए थे. दुख की बात तो यह है कि मैं ही तुम्हें यहां जबरदस्ती लाया था.’’

‘‘पुरानी बातों को सोच कर अपना मन मत दुखाओ. अगर मैं इस शैतान का कहना मान लेती तो कुछ भी न होता. तुम पर कोई आरोप न लगता. मारपिटाई भी न होती और न ही मुझे पिंकी के साथ होटल में जाना पड़ता.

‘‘मैं उन औरतों जैसी नहीं हूं जो अपने पति से विश्वासघात कर ऐसे ढोंगी गुरु की हर बात मान लेती हैं,’’ मेनका बोली.

‘‘मेनका, तुम तो बहुत पहले से ही मुझे समझा रही थीं, पर मैं ही गहरी नींद में आंखें बंद किए हुए था. काश, मैं भी तुम्हारी तरह गुरुजी के जाल में न फंसता.’’

‘‘कोई बात नहीं, जब जागो तभी सवेरा,’’ मेनका ने अमित की ओर देखते हुए कहा.

अमित एक नई सीख ले कर अस्पताल से सीधा अपने घर की ओर चल दिया. उस ने मन में ठान लिया था कि घर जाते ही वह उस ढोंगी गुरु के दिए गए सामान को फिंकवा देगा.

गठबंधन का खेल

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का एकसाथ मिल कर 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ना एक पुराने तरीके को फिर से दोहराना तो होगा पर इस बार समझ में फर्क होना चाहिए. पहले 1993 में जब दोनों एकसाथ मिले थे तो मामला सिर्फ बाबरी मसजिद बनाम राम मंदिर था और बचाना मुसलिमों को था. यह बात जरूर मन में थी कि दोनों ही उन हिंदू जातियों की पार्टियां हैं जो सदियों से नीची देखी गई हैं.

इस बार मुसलमानों का नाम कोई नहीं ले रहा. उन की चिंता नहीं है. चिंता तो अपनी है. देशभर में दलितों की जम कर पिटाई हो रही है. किसान जो पिछड़ों में आते हैं कर्ज और फसल के कम दाम के मारे तो हैं ही अब ऊंचे पंडे हिंदुओं की गौपूजा के शिकार हो रहे हैं. भाजपा सरकारों ने गौवध को तो गौरक्षा के नाम पर बंद करा दिया पर सूखी गाय का क्या किया जाए इस का कोई इंतजाम नहीं किया.

किसानों और दलितों को नोटबंदी की मार भी पड़ी थी. तब उन्होंने सोचा था कि इस से अमीर खत्म हो जाएंगे पर अब पता चला कि नोटबंदी से अमीरों को छोटा सा नुकसान हुआ और सरकार को कोई फायदा नहीं हुआ. लाइनों में गरीब लगे. औरतों की छिपी पूंजी गई. आज भी गरीबों के पास 500-1000 के पुराने नोट निकल कर आते हैं और कहते हैं बोलो जय मोदी सरकार की.

भाजपा के असली मालिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पिछले 50-60 साल में बड़ी मेहनत कर के दलितों व पिछड़ों को छोटे छोटे देवी देवता दे कर खुश किया था कि लो, अब तुम भी सवर्णों के बराबर आ गए. भगवा दुपट्टा पहनने के बाद वे अपने को ऊंचों के बराबर मानने लगे थे. वे भाजपा की झंडा ढोने वाली और तोड़फोड़ करने वाली भीड़ के बड़े हिस्से थे. उन्हीं के बल पर भाजपा ने 2014 का लोकसभा और 2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव जीता था. भाजपा ने उन्हें कुछ देने के बदले द्रोणाचार्य की तरह बिना धनुष चलाने की ट्रेनिंग दिए दक्षिणा में उन का अंगूठा काट लिया, उन्हें और गरीब बना डाला.

मायावती और अखिलेश यादव के लिए यह अब बड़ी चुनौती था. उधर 2014 की तरह चूंकि कांग्रेस भी चुप नहीं बैठ रही थी और राहुल गांधी ने गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में जबरदस्त हमला बोल कर जता दिया कि कांग्रेस मुक्त देश का सपना गलत है. मायावती और अखिलेश यादव ने शायद इसीलिए कांग्रेस को गठबंधन में नहीं रखा कि कांग्रेसी सीटों पर उसे भाजपा से नाराज, कांग्रेस की अपनी पुरानी, सपा, बसपा सब की वोटें मिल सकती हैं. चुनावी गणित कहता है कि भाजपा से नाराज दलित किसान और मायावती व अखिलेश के 2017 के वोटर ही उत्तर प्रदेश में भाजपा को भारी शिकस्त देने के लिए काफी हैं.

जब उपचुनाव में गोरखपुर वाली लोकसभा सीट बिना खास मेहनत के भाजपा हार सकती है तो वह बाकी राज्य में दोहराया जा सकता है यह बसपा और सपा की सोच है और गलत नहीं. कांग्रेस को साथ न मिला कर उन्होंने बहुत गलत काम नहीं किया.

हां, अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल को क्यों छोड़ा, यह थोड़ा अचकचा रहा है. शायद इसलिए कि अजित सिंह ने इस दौरान अमित शाह से भी संपर्क साधे रखा हो. वैसे भी जाटों की पार्टी थोड़ी असमंजस में है. जाट आम पिछड़ों व दलितों से ऊपर हैं और गांवों में अपने को पहले के ठाकुरों जैसा मानते हैं. पर ऊंचे सवर्ण उन्हें अपने बराबर नहीं मानते. उन्हें कहीं आरक्षण मिलता है, कहीं नहीं. गांवों में वे ठाकुरों की तरह ही धौंस जमाते हैं. उन्होंने अपने नएनए देवीदेवता खोज लिए हैं, क्योंकि उन्हें सवर्णों ने पुराने देवीदेवता तो नहीं दिए, पर दलितों को उन को नहीं पूजने देते.

मायावती और अखिलेश के लिए वे बेकार से हैं चाहे धौंस जितनी जमा लें. जाट मुसलमानों का हिस्सा हिंदू जाटों से अब 2014 के बाद भगवाई हुड़दंगियों की वजह से अलग हो गया है. इन्हीं जाट मुसलमानों को गाय मारने वाला कह कर जम कर सताया गया है. इन्हें तो बचाने वाले को वोट देना ही पड़ेगा.

जो बात मायावती और अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में सोची है वह कमीबेशी पूरे देश में होगी. जहां सिर्फ कांग्रेस मौजूद है वहां भाजपा खतरे में है. जहां वोट बंट सकते हैं वहीं भाजपा की जीत पक्की है. हिंदू समाज को बांट कर राज करने की पुरानी तरकीब समाज पर रुतबा बनाने के लिए तो ठीक है पर देश पर शासन करने के लिए ठीक नहीं है.

भाजपा ने अपने बचाव में 10 फीसदी सवर्ण आरक्षण का जो सुदर्शन चक्र चलाया है वह उलटा भी पड़ सकता है. इस से साफ हो गया है कि भाजपा का मतलब सब का साथ सब का विकास तो है ही नहीं वह तो सवर्णों का हित चाहती है. 60 साल के आरक्षण के बावजूद आज भी सरकारी पदों पर सवर्ण ही बने हैं यह पिछड़े दलित जानते हैं. मंडल कमीशन के भारीभरकम 25 फीसदी आरक्षण के 30 साल बाद भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा है. अब बाकी 50 फीसदी में जनरल कैटीगरी में निचली पिछड़ी जातियों के होशियार पूरे न घुस जाएं इसलिए भी यह आरक्षण लाया गया है. यह बात दलितों और पिछड़ों को नहीं मालूम हो, ऐसा नहीं हो सकता. वे अपने पैरों पर क्यों कुल्हाड़ी मारेंगे? लोकसभा, राज्यसभा और अब विधानसभाओं में उन्होंने इस कानून को बनाने पर चुपचाप ठप्पा लगा दिया पर चाहेंगे कि मोदी कहीं और उलझ जाएं.

मायावती व अखिलेश का साथ आना उन की राजनीतिक ही नहीं सामाजिक मजबूरी भी है. आज का युवा बराबरी का हक मांगता है. उसे भाजपा से उम्मीद थी पर 5 सालों में उलटा हुआ. इस का राजनीतिक लाभ तो कोई उठाएगा ही. भाजपा तो सवर्णों को भी आपस में बराबर का नहीं मानती.

महाभारत का कटु यथार्थ

रामायण और महाभारत ये 2 ऐसे महाकाव्य हैं जिन्हें वैदिक युग में लिखे जाने का गौरव प्राप्त है. इन में से हम यहां ‘महाभारत’ पर कुछ चर्चा कर रहे हैं. श्रीमद्भगवत गीता इसी ‘महाभारत’ का एक भाग है, जिसे हिंदू आत्मा व कर्म की महान दार्शनिक व्याख्या अपने में समेटे होने के कारण अत्यंत पवित्र मानते हैं. जहां तक महाभारत का प्रश्न है तो कहते हैं कि इस की रचना वेदव्यास ने की थी और इसे गणेश द्वारा लिपिबद्ध किया गया था. मोटे तौर पर इसे अर्थात महाभारत को अधर्म पर धर्म की, अनीति पर नीति की, अन्याय पर न्याय की और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक माना जाता है.

इसीलिए कहा जाता है कि महाभारत के अध्ययन से मनुष्य भवसागर से मुक्त होता है. इस को पढ़ने से मनुष्य को ब्रह्महत्या से मुक्ति प्राप्त होती है. ऐसा भी कहा जाता है कि अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष का वर्णन जोकि महाभारत में किया गया है, वह पुराणों में उपलब्ध नहीं है, अत: महाभारत को पढ़ने या सुनने से मोक्ष की इच्छा रखने वाले को मोक्ष, स्वर्ग की इच्छा रखने वाले को स्वर्ग, विजय की इच्छा रखने वाले को विजय तथा गर्भवती स्त्री को इच्छानुसार संतान प्राप्त होती है. मनुष्य की सारी कामनाएं पूरी होती हैं, उस का यश फैलता है और मृत्यु के बाद उस को परम गति प्राप्त होती है. महाभारत की महत्ता को प्रसारित करने वाले कुछ श्लोक जो ‘महाभारत’ में मौजूद हैं, निम्न हैं :

मातापितृ सहस्त्राणि पुत्र दाराशतानि च.

संसारेष्वनुभूतानि यांति यास्यंति चापरे. (1)

हर्षस्थानसहस्त्राणिभयस्थानि शतानि च.

दिवसे दिवसे मूढ़ामाविशन्तिन पंडितम.(2)

उर्ध्व बाहुविरोम्येष न च कश्र्चिच्वृदृणोति मे.

धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थ न सेव्यते. (3)

न जातुकमान्न लोभाद्धर्म त्यजेज्जीवितस्यापि हेतो:.

नित्यो धर्म: सुखदु:खे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्य. (4)

उपरोक्त श्लोकों का अर्थ है :

इस विश्व में सहस्त्रों मातापिता हुए हैं, होते रहेंगे. इसी प्रकार स्त्रीपुरुष भी सैकड़ों हुए हैं, हो रहे हैं और होते रहेंगे. मूर्ख व्यक्तियों को हजारों बार खुशी व सैकड़ों बार विषाद होता है, किंतु पंडित जन हर्ष व विषाद नहीं करते. मैं दोनों भुजाओं को ऊपर उठा कर उच्च स्वर से कह रहा हूं कि धर्म से ही अर्थ और काम की सिद्धि होती है, फिर धर्म का सेवन क्यों नहीं करते? परंतु मेरी बात कोई सुनता ही नहीं. काम, भय और लोभ के कारण तथा जीवन के लिए धर्म को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धर्म नित्य है और सुखदुख अनित्य है. जीवन नित्य है किंतु जीव का कारण शरीर आदि अनित्य है. अत: इस महाभारत को जो व्यक्ति सावधानीपूर्वक पढ़ता है वह निश्चय ही परमसिद्धि को प्राप्त करता है.इस प्रकार हमें बारबार यह संदेश दिया गया है कि महाभारत का अध्ययन अर्थात रसपान हमें :

  • ब्रह्महत्या से मुक्ति दिलाता है.
  • हमारे पितरों को तर्पण प्रदान करता है.
  • हमें मोक्ष हासिल कराता है.
  • हमारी स्वर्ग जाने की इच्छा को पूरा करता है.
  • हमें हमेशा विजयश्री प्रदान करता है.
  • इच्छानुसार संतान देता है.
  • मनोकामनाओं की पूर्ति करता है.
  • हमें यश प्रदान करता है.
  • हमें धार्मिक बना कर अर्थ व काम की सिद्धि प्रदान करता है.
  • हमें हर्ष व विषाद में संतुलित रखता है.
  • हमें परमज्ञान व परमसिद्धि प्रदान करता है.

यहां महाभारत अध्ययन, श्रवण व रसास्वादन के परिणामों पर अगर मनन किया जाए तो यह नतीजा निकल कर सामने आता है कि ‘लाखों रोगों की यह तो एक ऐसी अचूक दवा है जो अपनेआप में चमत्कारी है.’

महाभारत के पढ़ने के जो लाभ बताए गए हैं और खुद महाभारत अपने पढ़ने की महत्ता को व्याख्यायित करता है, उस से तो यही लगता है कि सारा हिंदू धर्म एक ओर और महाभारत अकेला दूसरी ओर, फिर भी सब के बराबर है.

दूसरी तरफ बहुप्रचलित अर्थों में महाभारत को अशुभ व परिवार- विनाशक ग्रंथ माना जाता है. ऐसा कहा भी जाता है कि जहां भी महाभारत का वाचन व परायण होता है वहां कुल का विनाश हो जाता है क्योंकि महाभारत आखिर कुल के नाश होने की ही तो कथा है. अगर थोड़ी देर को यह मान भी लिया जाए कि कुल के विनाश होने व परिवार में उत्पात होने की धारणा मनगढं़त है, तो भी इस के परायण से जुड़े लाभों की प्राप्ति पर यकीन करना किसी भी कोण से उचित प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि न तो यह धार्मिक (केवल युद्ध का वर्णन है) ग्रंथ है, न ही मर्यादित या सांस्कृतिक ग्रंथ.

महाभारत में साम, दाम, दंड, भेद से स्वार्थसिद्धि के प्रयासों के अलावा कुछ है ही नहीं. चाहे कौरव हों या पांडव सब के सब अनैतिक, अधर्मी, झूठे व पापी हो कर युद्ध जीतने की चेष्टा से संलग्न नजर आते हैं. इस पूरे ग्रंथ में न तो कहीं सत्य दिखाई देता है, न ही शील, न ही मर्यादा और न ही नैतिकता. तो फिर ऐसा ग्रंथ अपने पढ़ने वालों के लिए मोक्ष, यश, पुण्य लाभ, कामनापूर्ति, यशप्रदाय, पितर तर्पण व सद्गति कहां से ले कर आएगा?

जब पूरे ग्रंथ में सदाचार की होली जलती दिखाई देती है, नारी का बारबार अपमान होता दिखता है और राज्य के लोभ में पड़े कौरवपांडव छल, कपट व झूठ का नंगा नाच करते हुए नजर आते हैं तो ऐसे में इस ग्रंथ को पावन, सत्य उद्घोषक, धर्मप्रचारक, न्याय संरक्षक व नीति उच्चारक मानना सिवा मूर्खता के और क्या है?

अब हम यहां कुछ उन प्रसंगों की चर्चा करते हैं जो महाभारत की कथा के अभिन्न हिस्से हैं और जो घोर दुराचारी व पतनशील समाज की करनी प्रतीत होते हैं. उन पर दृष्टिपात करने से यह सहज में ही स्पष्ट हो जाता है कि महाभारत का धर्म, सत्य और नैतिकता से दूरदूर का रिश्ता नहीं है. ऐसे में इस के पठनपाठन और मनन से खास लाभ प्राप्ति का प्रश्न ही कहां उठता है? तो आइए, हम देखते हैं कि महाभारत कथा के वे कलंकपूर्ण प्रसंग क्या हैं :

  • मल्लाह कन्या व अद्वितीय सुंदरी सत्यवती का बीच मझधार में ऋषि पाराशर द्वारा मोहित हो कर बलपूर्वक शीलभंग किया जाना और फिर अवैध पुत्र द्वैपायन व्यास की उत्पत्ति होना.
  • पूर्व से ही शादीशुदा राजा शांतनु का सत्यवती से विवाह (वही सत्यवती जिस का पाराशर ने शीलभंग किया था) करने का निश्चय तथा भीष्म को पिता की वासना की खातिर आजीवन कुंआरे रहने की प्रतिज्ञा करने को विवश होना.
  • भीष्म द्वारा बलपूर्वक अंबा, अंबिका व अंबालिका का अपहरण किया जाना और वह भी उस समय जब उन का स्वयंवर संपन्न होने जा रहा था.
  • नियोग क्रिया द्वारा (अवैध शारीरिक संसर्ग द्वारा) धृतराष्ट्र, पांडु व विदुर का जन्म होना. इस के लिए व्यास को चुना गया, जोकि खुद अवैध संतति थे.
  • कर्ण व पांडवों की अवैध उत्पत्ति, क्योंकि कर्ण का जन्म तो उस समय हुआ था जब कुंती अविवाहित थी और पांडवों का जन्म कुंती व माद्री से उस समय हुआ जब पांडु पौरुषविहीन हो चुके थे.
  • 5 भाइयों की एक ही स्त्री (द्रौपदी) से शादी होना. इस से यह सिद्ध होता है कि पांडव औरत को भोग्या मानते थे.
  • भीम व अर्जुन का अपनी पत्नी द्रोपदी से बेवफाई करते हुए अनेक स्त्रियों से विवाह करना.
  • द्रौपदी को अपमानित करने के उद्देश्य से दुर्योधन द्वारा युधिष्ठिर को द्यूत क्रीड़ा के षड्यंत्र में फांसा जाना व युधिष्ठिर द्वारा अपनी पत्नी को दांव पर लगाना.
  • द्रौपदी को दुशासन द्वारा भरी सभा में वस्त्रविहीन करने की चेष्टा. ऐसे में भीष्म, द्रोणाचार्य व कृपाचार्य जैसे महारथियों का शांत रहना अनैतिकता का प्रतीक है.
  • धृतराष्ट्र द्वारा पुत्रमोह में लिप्त हो कर उस की सभी उचितअनुचित गतिविधियों का समर्थन करना.
  • युद्ध के नियमों व मर्यादाओं को बलाए ताक रख कर अभिमन्यु का वध.
  • शिखंडी की आड़ में भीष्म का वध किया जाना. वैसे स्वयं भीष्म से उन की मृत्यु का रहस्य पूछा जाना भी अमर्यादित था.
  • द्रोणाचार्य, जोकि पांडवों के भी गुरु थे, का वध करने के लिए युधिष्ठिर द्वारा असत्य बोल कर उन्हें शोकमग्न किया जाना और बाद में धृष्टद्युम्न द्वारा उन का सिर धड़ से अलग कर दिया जाना.
  • कर्ण का वध उस समय किया जाना, जब वह कीचड़ में से रथ के पहियों को निकाल रहा था.
  • दुर्योधन का वध मल्लयुद्ध के नियमों के विरुद्ध किया जाना.
  • भीम द्वारा दुशासन का रक्तपान किया जाना.

इस प्रकार के अमर्यादित प्रसंगों से महाभारत लबालब भरा है जो यह जाहिर करता है कि महाभारत एक अनैतिक कथा से अधिक कुछ नहीं है. न तो इस में कहीं धर्म है, न सत्य, न आदर्श, न मर्यादा, न नीति और न शील. इसलिए इसे महिमामंडित किया जाना और इस के वाचन से विशिष्ट लाभों की प्राप्ति पर विश्वास करना सिवा मूर्खता के और कुछ नहीं है.

अतीत में बी.आर. चोपड़ा द्वारा दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर इसे बड़ी भव्यता व धार्मिकता के साथ प्रसारित किया गया था और लोगों ने भी इसे बड़ी श्रद्धा व मनोयोग के  साथ देखा, पर इस की वास्तविकता क्या है यह इस लेख में भलीभांति विश्लेषित कर दिया गया है. अत: महाभारत अधर्म, असत्य, अन्याय, अनीति से भरपूर एक ऐसा ग्रंथ है जिस के नायक (पांडव) भी उतने ही चरित्र व मर्यादा में गिरे हुए हैं जितने कि खलनायक (कौरव). और कृष्ण ने भी पांडवों को छलकपट व फरेब अपनाने को ही प्रोत्साहित किया है.

किस्तों में सुपारी

मनदीप बंसल और शादीशुदा कर्मजीत कौर अच्छे दोस्त तो थे ही, दोनों के बीच अच्छाखासा रोमांटिक अफेयर भी था. कर्मजीत कौर 2 ऐसी नावों पर सवार थी, जिन में छेद थे. ऐसे में डूबना गारंटी होता है. और यही बात मनदीप पर भी लागू थी.

आर्किटेक्ट मनदीप बंसल उर्फ मिंटी मशहूर बिल्डर था. वह ठेके पर बड़ीबड़ी बिल्डिंग बनाने के साथसाथ प्लौट खरीद कर उन पर कोठियां बना कर बेच देता था. इस काम में उसे अच्छाखासा मुनाफा हो जाता था. सिविल इंजीनियर मनदीप को भवन निर्माण का बड़ा तजुर्बा था. लुधियाना शहर में उस की गिनती बड़े बिल्डरों में होती थी. हालांकि उस के पिता सुरिंदर सिंह कपड़े के व्यापारी थे, पर मिंटी ने भवन निर्माण के क्षेत्र में काफी नाम कमाया था.

मनदीप 3 भाईबहन थे. सब से बड़े थे सुरजीत सिंह बंसल, जो कपड़े का व्यापार करते थे. दूसरे नंबर पर मनदीप था और सब से छोटी बहन थी रवनीत कौर. सुरजीत को छोड़ कर मनदीप और रवनीत अभी अविवाहित थे. लगभग 2 साल पहले बंसल परिवार गुरु अंगतदेव नगर में रहता था.

फिर अचानक उन्हें वह घर छोड़ कर खन्ना एन्क्लेव, धांदरा रोड पर किराए की एक कोठी में रहना पड़ा. बंसल परिवार के गुरु अंगतदेव नगर छोड़ने के पीछे की भी एक अहम कहानी है, जिस ने आगे चल कर एक बहुत बड़े अपराध को जन्म दिया था.

बहरहाल, खन्ना एन्क्लेव में रहते हुए बंसल बंधुओं ने लुधियाना के ही शहीद भगत सिंह नगर में एक प्लौट खरीद कर उस पर एक विशाल कोठी का निर्माण करवाया, जो लगभग पूरा हो चुका था. मुहूर्त के अनुसार उन्हें दिनांक 14 अक्तूबर, 2018 को नई कोठी में गृहप्रवेश करना था. इस के लिए सभी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. उन्होंने घर का सारा सामान भी बांध लिया था.

11 अक्तूबर की सुबह 9 बजे मनदीप बंसल अपनी एक निर्माण साइट दुगरी फेज-1 की कोठी नंबर-196 पर चल रहे काम को देखने गया था. यह कोठी सरदार सुखविंदर सिंह की थी, जिस का निर्माण मनदीप करवा रहा था. निर्माणाधीन कोठी पर मनदीप पूरे एक घंटे तक रुका. इस के बाद उसे दूसरी साइट पर जाना था.

ठीक 10 बज कर 2 मिनट पर मनदीप कोठी से बाहर निकल कर अपनी इंडिका कार के पास आया और कार में बैठने के लिए जैसे ही उस ने ड्राइविंग सीट का दरवाजा खोलना चाहा, तभी कार के पीछे छिपा एक बाइक सवार अचानक वहां आया और उस ने मनदीप पर रिवौल्वर से अंधाधुंध फायरिंग कर दी थी.

उस ने मनदीप पर 5 गोलियां दागीं. इस के बाद वह वहां से निकल गया.गोलियां लगते ही मनदीप कटे पेड़ की तरह लहरा कर जमीन पर गिर गया.

गोलियों की आवाज सुन कर लोग वहां जमा हो गए. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि हत्यारा कौन था और उस ने मनदीप पर गोलियां क्यों चलाईं. निर्माणाधीन कोठी का मालिक सुखदेव सिंह भी दौड़ता हुआ बाहर आ गया. उस ने मनदीप को सहारा दे कर कुरसी पर बिठा कर पानी पिलाने की कोशिश की, पर मनदीप की हालत गंभीर थी, उस ने अस्पताल चलने के लिए कहा.

सुखदेव ने इस घटना की सूचना मनदीप के घर वालों और पुलिस को दे दी और मनदीप को डीएमसी अस्पताल ले गया. पर अस्पताल पहुंचते ही डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. तब तक मनदीप का बड़ा भाई सुरजीत और पुलिस भी वहां पहुंच गई.

सूचना मिलते ही लुधियाना पुलिस कमिश्नर डा. सुखचैन सिंह गिल, एडीसीपी सुरिंदर लांबा, एसीपी (क्राइम) सुरिंदर मोहन, एसीपी रमनदीप सिंह भुल्लर, सीआइए स्टाफ-2 के इंचार्ज राजेश शर्मा और थाना दुगरी प्रभारी इंसपेक्टर राजेश ठाकुर घटनास्थल पर पहुंच गए.

सुरजीत बंसल की तरफ से अज्ञात के खिलाफ धारा 302, 120 बी और 25,27,54, 59 आर्म्स ऐक्ट के तहत दुगरी थाने में रिपोर्ट दर्ज कर ली गई.

घटनास्थल का मुआयना करने पर पुलिस को वहां से खाली कारतूस का कोई खोखा नहीं मिला था, जो हैरानी वाली बात थी. आखिर गोलियों के खाली खोखे कहां गायब हो गए?

पुलिस इसे आंतकवादी हमले से भी जोड़ कर देख रही थी. एडीसीपी डा. सुखचैन सिंह ने मनदीप बंसल हत्याकांड को जल्द सुलझाने के लिए पुलिस की कई टीमें बनाईं. इस वारदात के बाद शहर में दहशत का माहौल था. पुलिस टीमें कई एंगल्स और थ्यौरियों पर काम कर रही थीं.

पुलिस सब से पहले यह पता करने में जुट गई कि क्या मृतक की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी. इस दिशा में एक ऐसा नाम उभर कर सामने आया था, जिस पर पुलिस को शकहुआ. वह नाम था मृतक के पूर्व पड़ोसी बलविंदर सिंह का.

जांच का दायरा जैसेजैसे आगे बढ़ा, वैसेवैसे यह बात भी स्पष्ट होती चली गई कि बलविंदर सिंह ही मनदीप का हत्यारा हो सकता है. इसी के साथ 2 साल पहले बंसल बंधुओं के गुरु अंगतदेव नगर वाली कोठी को छोड़ने की वजह भी स्पष्ट हो गई.

पुलिस ने बलविंदर के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो वारदात के समय उस के फोन की लोकेशन उस के घर न्यू अमर कालोनी की आ रही थी. इस का मतलब साफ था कि शातिर बलविंदर ने यह काम खुद न कर के किराए के किसी हत्यारे से करवाया होगा.

एक पुलिस टीम बलविंदर के घर भेजी गई पर वह अपने घर नहीं मिला, शायद वह फरार हो गया था. दरअसल पुलिस का ध्यान बलविंदर की ओर इस कारण गया था कि जब उन्होंने मृतक के भाई सुरजीत से बात की तो यह पता चला कि आज से 2 साल पहले मृतक और बलविंदर पड़ोसी हुआ करते थे और उन के बीच अच्छाखासा याराना था. दोनों हम प्याला हम निवाला दोस्त थे. इतना ही नहीं, दोनों का एकदूसरे के घर भी काफी आनाजाना था.

बलविंदर का स्पेयर पार्ट्स का बिजनैस था. बलविंदर की पत्नी कर्मजीत कौर बहुत खूबसूरत थी. लोग उस की एक झलक पाने के लिए तरसते थे. उस का झुकाव अविवाहित मनदीप बंसल की ओर हो गया था. बाद में मनदीप और कर्मजीत के बीच अवैध संबंध बन गए थे, जिस का बलविंदर को जल्द ही पता चल गया था.

तब उस ने अपनी पत्नी को समझाने के साथसाथ मनदीप को भी अपने घर आने से रोक दिया था. मोहल्लेदारी देखते हुए एक टाइम तो मनदीप ने अपने आप को रोक लिया था पर कर्मजीत कौर नहीं मानी. वह कोई न कोई बहाना कर मनदीप से मिलने उस के घर पहुंच जाती थी.

बलविंदर अपनी पत्नी कर्मजीत पर नजर रखे हुए था. उसे पत्नी की एकएक हरकत की जानकारी मिल जाती थी. इस बात को ले कर उस के घर हर समय क्लेश रहने लगा था. बलविंदर और कर्मजीत के बीच रिश्ते अब सामान्य नहीं रह गए थे. उन के रिश्तों और शादीशुदा जिंदगी में जहर घुल चुका था.

कुछ रिश्ते कुदरत तय करती है, जो मर्यादाओं और खून के धागों से बंधे होते हैं. कुछ रिश्ते समाज बनाता है, जो मजबूरी की सलाखों में जकड़े होते हैं. और कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जो दिल की धड़कनों पर सवार, चाहत की मझदार में तैरते हैं.

मनदीप बंसल और शादीशुदा कर्मजीत कौर का इसी तरह का संबंध था. दोनों अच्छे दोस्त तो थे ही, इन के बीच अच्छाखासा रोमांटिक अफेयर भी था. कर्मजीत कौर 2 ऐसी नावों पर सवार थी, जिन में छेद थे. ऐसे में डूबना गारंटी होता है. और यही बात मनदीप पर भी लागू थी.

जब कोई इंसान अपनी जिंदगी के अहम फैसले को बिना सोचेसमझे या लापरवाही से लेता है, तो ऐसा कर के वो जुए की बाजी खेल रहा होता है. अगर जीत गए तो ठीक, लेकिन हार हुई तो उस की अपनी जिंदगी और कइयों की जिंदगियां इस कदर बरबाद होती हैं कि संभलने का दूसरा मौका तक हाथ नहीं आता है.

बलविंदर ने पत्नी को लाख समझाने का प्रयास किया, लेकिन पत्नी पर इस का फर्क नहीं पड़ा. क्योंकि अब पानी उस के सिर के ऊपर से गुजर चुका था. करीब 2 साल पहले मंदीप और कर्मजीत कौर घर से भाग गए. इस से बलविंदर की बड़ी बदनामी हुई. शर्म के मारे वह समाज में किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहा.

उस ने अपने स्तर पर दोनों की तलाश शुरू की, पर 2 दिनों बाद वे दोनों अपनेअपने घर लौट आए. पत्नी के इस शर्मनाक कारनामे से बलविंदर किसी से आंख मिलाने लायक नहीं रहा. पत्नी के वापस आ जाने के बाद उस ने बिना किसी से कोई बात किए और बिना कुछ कहे रातोंरात अपना गुरु अंगतदेव नगर वाला मकान छोड़ दिया. वह अपने परिवार के साथ कोठी नंबर-9, खन्ना एन्क्लेव, धांधरा रोड पर आ कर रहने लगा था. इस बात को पूरे 2 साल बीत चुके थे और लगभग सभी लोग इस बात को भूल भी चुके थे.

अपनी तफ्तीश को आगे बढ़ाने से पहले पुलिस के सामने यह बात लगभग पूरी तरह से साफ हो गई थी कि अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए ही बलविंदर ने मनदीप की हत्या करवाई थी. अब पुलिस का टारगेट भाड़े के वे हत्यारे थे, जिन्होंने इस घटना को अंजाम दिया था. सो उन की तलाश में पुलिस ने पूरे क्षेत्र के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालनी शुरू की. सीसीटीवी कैमरों की फुटेज में हत्यारे का चेहरा स्पष्ट दिखाई दे रहा था. वह बाइक पर आया था और वारदात को अंजाम दे कर निकल गया था.

हत्यारा कैमरे में कैद तो हो गया था पर पुलिस अभी पता नहीं लगा पाई थी कि वह कौन शख्स है. इसी बीच पुलिस को सूचना मिली कि दुगडी मार्केट में एक बाइक लावारिस खड़ी है. पुलिस ने वह बाइक अपने कब्जे में ले ली. पुलिस ने जब आगे की जांच की तो पता चला कि 5 अक्तूबर को वह बाइक गुरुद्वारा आलमगीर साहब के बाहर से चोरी हुई थी. चोरी की रिपोर्ट उस ने थाना डेहलों में दर्ज करवाई थी.

पुलिस ने जांच की तो जानकारी मिली कि वह बाइक वही थी, जो सीसीटीवी कैमरे में दिखी थी. इस का मतलब यह हुआ कि हत्यारे ने चोरी की बाइक से वारदात को अंजाम दिया था.

कैमरे में कैद हत्यारा वैसे तो पुलिस के सामने था पर सफलता अभी बहुत दूर थी. सीसीटीवी फुटेज से पुलिस को यह भी जानकारी मिल गई थी कि मौके पर हत्यारे ने आधे घंटे तक इंतजार किया था. इस का मतलब यह था कि मंजीत की हत्या की प्लानिंग बहुत पहले ही बना ली गई थी. हत्यारे ने वारदात को अंजाम देने के लिए पूरी रेकी की हुई थी.

मौका देख कर उस ने मनदीप को गोली मारी और फरार हो गया. प्रत्यक्षदर्शियों ने भी यही बताया था कि हत्यारा 9 बजे के करीब उस निर्माणाधीन कोठी के सामने आ कर खड़ा हो गया था. उस ने फरार होने के लिए ही बाइक सीधी कर के लगा रखी थी. वह वहां काफी समय तक मनदीप का इंतजार करता रहा था.

बहरहाल पुलिस ने काफी भागदौड़ करने के बाद हत्यारे की पहचान कर ली थी. उस का नाम गुरविंदर सिंह था और वह शिमला पुरी का रहने वाला था. गुरविंदर के बारे में अधिक जानकारी जुटाई तो पुलिस को पता चला कि गुरविंदर कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियर है. वह किसी कंप्यूटर हार्डवेयर की दुकान पर काम करता था.

गुरविंदर के बारे में जानकारी मिलते ही पुलिस ने चारों ओर अपना जाल बिछा दिया. काफी मेहनत के बाद पुलिस ने वारदात के 15 घंटों बाद मनदीप हत्याकांड के सुपारीकिलर शूटर गुरविंदर को दुगडी से धर दबोचा.

थाने में पुलिस के उच्चाधिकारियों के सामने जब उस से पूछताछ की तो उस ने बड़ी आसानी से अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उसी ने बलविंदर के कहने पर मनदीप की हत्या का सौदा 15 लाख रुपए में तय किया था.

15 लाख रुपए उसे एक साल की अवधि में किस्तों के रूप में मिलने थे. पेशगी के तौर पर उसे 20 हजार रुपए अवैध रिवौल्वर खरीदने के लिए दे दिए गए थे और एक हजार रुपए उसे मनदीप की हत्या से कुछ समय पहले दिए गए थे.

बाकी 5 लाख रुपए मनदीप की हत्या करने के बाद देना तय हुआ था. यानी ये पैसे सुपारीकिलर गुरविंदर की शादी से एक दिन पहले 13 अक्तूबर को देने थे. गुरविंदर पर इसी बात का दबाव था. इसी वजह से उस ने सही समय पर मनदीप की हत्या कर भी दी थी.

अब उसे कौंट्रैक्ट की पहली किस्त के 5 लाख रुपए मिलने थे. इस से पहले कि उसे सुपारी की यह 5 लाख रुपए की किस्त मिलती, पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. गुरविंदर को अब भी उम्मीद थी कि बलविंदर उसे पैसे देगा क्योंकि कौंट्रैक्ट के अनुसार समय रहते उस ने मनदीप की हत्या कर दी थी.

14 अक्तूबर को मनजीत बंसल को अपनी नई कोठी में गृहप्रवेश करना था और 14 अक्तूबर को ही गुरविंदर की भी शादी होनी थी. शादी में खर्च किए जाने वाले रुपए उसे मनदीप की हत्या करने के बाद ही मिलने थे.

बलविंदर सिंह और हार्डवेयर की दुकान पर काम करने वाले आरोपी गुरविंदर की मुलाकात करीब 6 महीने पहले हुई थी. जल्द ही वह दोनों एकदूसरे के दोस्त बन गए थे. गुरविंदर सिंह ने बातोंबातों में बलविंदर सिंह को बताया था कि 14 अक्तूबर को उस की शादी है और उसे काफी पैसों की जरूरत है.

गुरविंदर की शादी वाली बात को ध्यान में रखते हुए बलविंदर ने मनदीप को मौत के घाट उतारने की पूरी प्लानिंग बनाई. 2 साल से उस के अंदर जो चिंगारी धीरेधीरे सुलग रही थी अब उसे बुझाने का समय आ गया था. वैसे भी बीते 2 सालों में वह खामोश नहीं बैठा था.

अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए उस ने अपनी कोशिशें जारी रखी थीं और सही समय का इंतजार कर रहा था. दूसरे उस के पास ऐसा कोई आदमी भी नहीं था, जो इस काम को अंजाम तक पहुंचा सकता. उसे गुरविंदर जैसे जरूरतमंद आदमी की तलाश थी.

गुरविंदर जरूरतमंद था, वह एक लड़की से प्रेम करता था और लड़की के घर वाले शादी के लिए तैयार नहीं थे. अपनी प्रेमिका से शादी करने के लिए उस ने घर से भाग कर कोर्टमैरिज करने की योजना बनाई थी और इस सब के लिए उसे पैसों की सख्त जरूरत थी.

बलविंदर ने जब गुरविंदर को मनदीप की हत्या के बदले 15 लाख रुपए देने का औफर दिया तो वह झट से तैयार हो गया. बलविंदर ने उस से कहा कि वह जिस दिन हत्या करेगा, उस दिन 5 लाख रुपए और बाकी के 10 लाख रुपए वह एक साल की किस्तों में देगा. इस पर गुरविंदर राजी हो गया था.

मनदीप की हत्या की सुपारी लेने के बाद गुरविंदर ने 4 महीने पहले मनदीप की रेकी करनी शुरू कर दी थी. गुरविंदर को पता था कि मनदीप कितने बजे घर से निकलता है और कहांकहां जाता और रुकता है.

गुरविंदर को इतना तक पता था कि मनदीप कौन सी जगह पर कितना समय गुजारता है. पेंच यहां फंसा कि वह हत्या करेगा कैसे? उस के पास हथियार तक नहीं था.

इस के लिए उस ने बलविंदर से 20 हजार रुपए हथियार खरीदने के लिए मांगे. पैसे ले कर वह कुछ समय पहले बलविंदर के साथ फिरोजपुर गया और .32 बोर के रिवौल्वर की 6 गोलियां खरीदीं. वहीं उस ने गोली चलाने की भी ट्रेनिंग ली और खरीदी हुई 6 गोलियों में से एक गोली भी चलाई. बाकी की बची 5 गोलियां उस ने मनदीप की हत्या करने के लिए रख ली थीं.

गोलियां खरीदने के बाद बलविंदर ने गुरविंदर से पूछा कि बिना रिवौल्वर के गोली कैसे चलाओगे? तब गुरविंदरटालमटोल करता रहा. लेकिन उस ने इस का इंतजाम पहले ही कर लिया था.

गुरविंदर की मां डाबा इलाके में रहने वाले एक प्रौपर्टी डीलर के घर खाना पकाने का काम करती थी और वहीं रहती थी. गुरविंदर भी अकसर वहीं रहता था. वह कभीकभार जसपाल बांगड़ स्थित अपने घर भी चला जाता था. उसे अपने मालिक के बारे में पूरी जानकारी थी कि वह सुबह 11 बजे से पहले घर से नहीं निकलते. उस के मालिक के पास भी .32 बोर की रिवौल्वर थी. वह पिछले डेढ़ महीने से मालिक बिल्ला की रिवौल्वर ले कर घर से निकल जाता था. वारदात वाले दिन भी आरोपी बिल्ला का रिवौल्वर ले कर चला गया था.

गुरविंदर ने बलविंदर को यह नहीं बताया था कि उस के पास रिवौल्वर है या नहीं, इसलिए बलविंदर को गुरविंदर पर शक होने लगा कि वह काम कर पाएगा या नहीं. इस के लिए उस ने अपने एक खास दोस्त अमनपाल से बात की और कहा वह गुरविंदर की रेकी करे. गुरविंदर जहां मनदीप की रेकी कर रहा था, वहीं बलविंदर के कहने पर अमनपाल गुरविंदर की रेकी करने लगा था.

वारदात वाले दिन सुबह अमनपाल और गुरविंदर एक स्कूल के पास मिले और वारदात को अंजाम देने के बाद फिर से वहीं मिलने की बात की. जिस समय गुरविंदर सिंह वारदात को अंजाम देने दुगरी फेज-1 पहुंचा और मनदीप के इंतजार में कार के पास खड़ा हो गया, जबकि अमनपाल दूसरी तरफ खड़ा उस पर नजर रखे हुए था.

जैसे ही गुरविंदर ने मनदीप को गोलियां मारीं तो अमनपाल ने तुरंत बलविंदर को फोन कर बता दिया कि काम हो गया है. वारदात को अंजाम देने के बाद गुरविंदर अमनपाल से मिला और उसे पूरा यकीन दिलाने के लिए रिवौल्वर से निकाले हुए 5 खाली खोखे दे दिए.

उस के बाद वह अपने घर गया और अपने मालिक की रिवौल्वर रख कर कपड़े बदले. फिर वह बलविंदर से पैसे लेने के लिए निकल पड़ा. पर इस घटना के बाद बलविंदर ने अपना फोन बंद कर दिया था.

गुरविंदर का बयान दर्ज करने के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर अमनपाल को गिरफ्तार कर लिया और हत्या में प्रयोग रिवौल्वर भी दुगरी से बरामद कर ली.

13 अक्तूबर को पुलिस ने गुरविंदर और अमनपाल को अदालत में पेश कर पूछताछ के लिए 2 दिन के रिमांड पर लिया. विस्तार से पूछताछ करने के बाद आरोपी गुरविंदर और अमनपाल को पुन: 15 अक्तूबर को अदालत में पेश किया गया, जहां अदालत के आदेश पर उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

दूसरी ओर मृतक मनदीप बंसल के घर वालों और व्यापार मंडल के सदस्यों ने अस्पताल में हंगामा खड़ा कर दिया था. वे मनदीप का पोस्टमार्टम नहीं होने दे रहे थे. उन की मांग थी कि जब तक सभी हत्यारे पकड़े नहीं जाएंगे, लाश का पोस्टमार्टम नहीं होने देंगे. पुलिस कमिश्नर सुखचैन सिंह गिल ने अस्पताल पहुंच कर उन्हें समझाया और आश्वासन दिया, तब कहीं जा कर मृतक का पोस्टमार्टम किया गया.

सिविल अस्पताल के 3 डाक्टरों डा. रिपुदमन, डा. गुरिंदरदीपग्रेवाल और डा. दविंदर के पैनल ने लाश का पोस्टमार्टम किया.

रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि मनदीप की पीठ पर 2 गोलियां दाईं तरफ और 2 बाईं तरफ लगीं, जो दिल और फेफड़े में जा घुसीं, जिस से उस की मौत हो गई थी. एक गोली उस की बाजू में लगी थी.

दूसरी तरफ वारदात में प्रयोग किए गए रिवौल्वर के असली मालिक का रहस्य पुलिस के लिए बरकरार था. पहले गुरविंदर की तरफ से बताया गया कि जिस घर में वह रहता है, उस ने उस के मालिक बिल्ला का रिवौल्वर चुरा कर मनदीप की हत्या की थी.

लेकिन जब पुलिस ने रिकौर्ड खंगाला तो सामने आया कि बिल्ला के पास रिवौल्वर है ही नहीं. पुलिस द्वारा बरामद किया गया रिवौल्वर उसी इलाके के रहने वाले एक अन्य व्यक्ति का था. जब पुलिस ने उस तक पहुंचने की कोशिश की तो वह घर से फरार हो गया.

सूत्रों के अनुसार मामले में एक कांग्रेसी नेता मैदान में उतर आया था, जो एक स्वयंभू प्रधान को बचाना चाहता था. उस की भूमिका इस हत्याकांड में है या नहीं, पुलिस इस मामले की भी जांच करेगी. इस हत्याकांड का मास्टरमाइंड बलविंदर सिंह कथा लिखने तक नहीं पकड़ा गया था.

 -कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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