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Family Story : दीदी, मुझे माफ कर दो – नेहा किस दुविधा में पड़ी थी

Family Story : उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. मरने वाला तो मर गया था, लेकिन उस की आखिरी इच्छा नेहा को जिंदा लाश बनाने पर तुली हुई थी. फिर एक दिन… सुबह से यह चौथा फोन था. फोन उठाने का बिलकुल मन नहीं था. पर मां समझने को तैयार ही नहीं थीं. फोन की घंटियां उस के दिमाग पर हथौड़े की तरह पड़ रही थीं. आखिरकार, नेहा ने फोन उठा ही लिया, ‘‘हैलो, हां मां, बोलो?’’ ‘‘बोलना क्या है, घर में सभी तुम्हारे जवाब का इंतजार कर रहे हैं. तुम किसी की बात का जवाब क्यों नहीं देती?’’ ‘‘मां, इतना आसान नहीं है यह सब. मुझे सोचने का मौका तो दो,’’ नेहा ने बुझी आवाज में कहा. ‘‘सोचना क्या है इस में? तुम्हारी बहन की आखिरी इच्छा थी. क्या बिलकुल भी दया नहीं आती तुम्हें. उन बच्चों के मासूम चेहरों को तो देखो.’’ ‘‘मां, मैं समझती हूं, पर…’’ ‘‘पर क्या…? वह सिर्फ तुम्हारी बहन नहीं थी.

मां की तरह पाला था उस ने तुम्हें. आज जब उस के बच्चों को मां की जरूरत है, तो तुम्हें सोचने का समय चाहिए?’’ ‘‘मां, इतनी जल्दबाजी में इस तरह के फैसले नहीं लिए जाते.’’ ‘‘हम ने भी दुनिया देखी है. ठीक है, अगर तुम्हें उन बच्चों की छीछालेदर होना मंजूर है, तो फिर क्या कहा जा सकता है.’’ ‘‘यह क्या बात हुई. तुम इस तरह की बातें क्यों कर रही हो?’’ नेहा बोली. मां का गला भर आया, ‘‘तुम अभी मां नहीं बनी हो न. जब मां बनोगी, तब औलाद का दर्द समझोगी. फूल से बच्चे मां के बिना कलप रहे हैं. और तुम हो कि सब दरवाजे बंद कर के बैठी हो.’’ नेहा का मन खराब हो चुका था. क्या इतना आसान था यह सब. 4 भाईबहनों में सब से छोटी थी वह. सब से लाड़ली. पर जिंदगी उसे इतने कड़वे और मुश्किल मोड़ पर ला कर खड़ा कर देगी, उस ने सोचा न था. दीदी की शादी के वक्त महज 17 साल की नाजुक उम्र थी उस की. पहली बार साड़ी पहनी थी. कितना जोश था. जीजाजी के जूते चुराएगी. 10,000 से एक रुपए कम न लेगी. उन्हें खूब तंग करेगी. जीजाजी उस की हर शरारत पर मुसकरा कर रह जाते. वे सिर्फ उस की बहन के पति ही नहीं, नेहा की हर बात के हमराज, समझदार और सुलझे हुए इनसान थे. नेहा बहुत सारी ऐसी बातें, जो दीदी को नहीं बताती थी,

जीजाजी से डिस्कस करती थी. जीजाजी के बढ़ावा देने पर ही नेहा ने सिविल सर्विसेज की तैयारी करनी शुरू की थी, नहीं तो मां के आगे तो वह भी दीदी की तरह मजबूर हो जाती और आज वह भी दीदी की तरह किसी की घरगृहस्थी देख रही होती. दीदी पढ़ने में बहुत अच्छी थीं, पर बाबा की आखिरी इच्छा का मान रखने के लिए दीदी बलि का बकरा बन कर रह गईं और अचारमुरब्बे व नएनए पकवानों के अलावा आगे कुछ भी न सोच सकीं. याद है उसे आज भी वह दिन, जब दीदी की कैंसर की रिपोर्ट आई थी. कैंसर थर्ड स्टेज पर था. घर में कुहराम मच गया था. मां का रोरो कर बुरा हाल था और दीदी दीवार का कोना पकड़े बुत बनी हुई थी. नेहा को समझ में नहीं आ रहा था किसकिस को संभाले और क्या समझाए. समझते सभी थे, पर एकदूसरे को झूठी दिलासा देते रहे. प्रवीण जीजाजी का चेहरा अचानक से बूढ़ा लगने लगा था. अपनी जीवनसंगिनी की यह हालत उन से बरदाश्त नहीं हो रही थी. कितने सुखी थे वे. जीजाजी ने दीदी को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की. मुंबई, चेन्नई कहांकहां नहीं दौड़े.

किसकिस के आगे हाथ नहीं जोड़े. पर सब बेकार गया. जीजाजी की आलीशान कोठी, रुपयापैसा सब धरा रह गया और दीदी सब को रोताबिलखता छोड़ कर चली गईं. इन दिनों में नेहा ने क्याक्या देखा और महसूस किया, वही जानती थी. घर मेहमानों और रिश्तेदारों से भरा हुआ था. नन्ही परी मां के लिए बिलखतेबिलखते नेहा की गोदी में ही सो गई थी. दीदी की चचिया सास कनखियों से नेहा को बारबार घूर रही थीं. ‘‘बेटा, तुम कौन हो? बहुत देखादेखा सा चेहरा लग रहा है.’’ नेहा ने परी की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘मैं इस की मौसी हूं.’’ चाचीजी के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुसकान आ गई. उन्होंने सोती हुई परी के सिर पर हाथ फेरते हुए बड़े अजीब ढंग से कहा, ‘‘हां भई, परी के लिए तुम मांसी हो. अब तो तुम ही इस की मां…’’ नेहा गुस्से से तिलमिला गई. चाची के शब्द गले मे अटक कर रह गए. नेहा परी को ले कर कमरे में चली गई. यह पहली बार नहीं था. इन 13 दिनों में हर आनेजाने वालों की निगाहों में उस ने यही सवाल तैरते देखा था. कितना रोई थी वह उस दिन. धीरेधीरे सारे मेहमान चले गए. नेहा सामान पैक कर रही थी, तभी परी और गोलू ने आ कर चौंका दिया. ‘‘मौसी, आप जा रही हैं?’’ ‘‘हां बेटा, मेरी छुट्टियां खत्म हो गई हैं. औफिस भी जाना है न. तुम उदास क्यों हो.

हम रोज वीडियो काल से बात करेंगे. अपना होमवर्क रोज करना…’’ बच्चे चुपचाप सुनते रहे. दीदी के बच्चे बहुत समझदार और आत्मनिर्भर थे. पर फिर भी बच्चे ही थे. बच्चे नेहा को छोड़ कर चले गए. तभी मां कमरे में आ गईं, ‘‘नेहा, सामान पैक हो गया?’’ ‘‘हां मां, औफिस से बारबार फोन आ रहा है. आप लोग कब निकल रहे हो?’’ ‘‘तुम्हारे पापा और भैया कल सुबह निकलेंगे. मैं अभी कुछ दिन यहीं रहूंगी.’’ नेहा सिर झुकाए मां की बात सुनती रही. ‘‘नेहा, तुझ से एक बात कहनी थी.’’ ‘‘हां, बोलो मां, सुन रही हूं.’’ मां बोलीं, ‘‘नेहा, तुम से कुछ भी नहीं छिपा. तुम्हारी दीदी के जाने के बाद हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है. तुम्हारी दीदी ने मरने से पहले मुझ से एक वादा लिया था. वह चाहती थी कि उस के मरने के बाद तुम उस के बच्चों की जिम्मेदारी संभालो. तुम प्रवीणजी से शादी कर लो.’’ नेहा छटपटा कर रह गई, ‘‘मां, तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो? जीजाजी के साथ मेरी शादी…’’ ‘‘नेहा, समझने की कोशिश करो. आखिर तुम्हारी भी शादी करनी ही है. देखाभाला परिवार है. बच्चों को मां मिल जाएगी.

वैसे भी एक लड़की को क्या चाहिए. आलीशान घर, नौकरचाकर, रुपयापैसा. तुम्हारे पापा की भी यही इच्छा है.’’ नेहा हैरानी से मां को देखती रह गई, ‘‘तुम ने जीजाजी से भी एक बार पूछा है?’’ ‘‘पूछना क्या है उन के मातापिता तो हैं नहीं. चाचाचाची से बात हो गई है. उन्हें भी यह रिश्ता मंजूर है.’’ ‘‘रिश्ता…?’’ नेहा को सारा मामला समझ में आ गया. ‘‘मां, मैं तुम से इस बात की उम्मीद नहीं कर रही थी.’’ मां का चेहरा गंभीर हो गया, ‘‘हो सकता है, आज तुम्हें मेरी बातें अच्छी न लगें, पर तुम्हारी दीदी के जाने के बाद प्रवीणजी और उन के बच्चों की जिम्मेदारी भी मुझ पर है. तुम सोचविचार कर जल्द मुझे जवाब दे दो. कहते हैं, मरने वाले की अंतिम इच्छा न पूरी की जाए, तो उसे कभी शांति नहीं मिलती.’’ आखिरी वाक्य कहते वक्त मां ने नेहा को अजीब सी निगाहों से देखा. पता नहीं, उन निगाहों में ऐसा क्या था. वह उन आंखों में तैर रहे हजारों सवाल के तीर झेल नहीं पाई और मुंह घुमा लिया. एक हफ्ते में मां ने पचासों बार फोन कर दिया था. हर बार एक ही सवाल और नेहा एक ही जवाब देती, ‘मां, मुझे सोचने का वक्त दो.’ नेहा हर बार एक ही बात पर आ कर अटक जाती. सब को दीदी की आखिरी इच्छा की पड़ी है. पर किसी ने एक बार, हां सिर्फ एक बार, उस से पूछा कि उस की इच्छा क्या है? शनिवार की रात थी. इन दिनों नेहा बहुत बिजी रही. हाथ में कौफी का मग लिए वह छत पर आ गई. कितने दिनों बाद वह छत पर सुकून के चंद पलों की तलाश में आ कर बैठी थी. आसमान में चांद बादलों से लुकाछिपी कर रहा था. वह सोचने लगी कि बादलों और तारों के बीच रह कर भी चांद कितना अकेला है.

वह भी तो आज कितनी अकेली थी. कोई उसे समझने को तैयार नहीं. किसी ने एक बार भी उस के बारे में नहीं सोचा. सब अपनी जिम्मेदारियों से छुटकारा पाना चाहते हैं और वह? वह आखिर क्या चाहती है? नेहा की आंखों के सामने जीजाजी का थका हुआ चेहरा, परी और गोलू का मासूम चेहरा, तो कभी मां का गंभीर चेहरा उभर कर आ जाता. नेहा ने आंखें मूंद लीं. आखिर एक लड़की को क्या चाहिए अपनी जिंदगी से. एक खुशहाल परिवार, रुपयापैसा, घर बस. बस, क्या यही चाहिए था उसे. आज अगर वह मां की बात मान कर शादी कर ले तो इस रिश्ते में उसे क्या मिलेगा? दीदी की परछाईं होने का दर्जा? दूसरी पत्नी, दूसरी मां? नेहा मन ही मन मुसकराने लगी. दूसरी मां नहीं, सौतेली मां. बड़ी बहन ज्यादा सुंदर थी. प्रवीण की निगाहें हर चीज, हर रंग, हर त्योहार, हर खुशबू, हर स्वाद में दीदी को ही ढूढ़ेंगीं.

तिनकातिनका जोड़ कर अरमानों से सजाए हुए दीदी के उस घर में एक फूलदान सजाने में भी नेहा के हाथ कांपेंगे. नेहा अभी भी सोच रही थी कि हर पार्टी, हर उत्सव में लोगों की सवालिया निगाहें उसे तारतार करेंगी, ‘देखने में तो ठीक लगती है, फिर ऐसी क्या गरज पड़ी थी, 2 बच्चों के बाप से शादी करने की? अकेली आई है या बच्चे भी…’ घूमने से पहले पचास बार सोचना होगा कि न जाने लोग क्या कहें, ‘घरगृहस्थी संभालनी चाहिए. पर यह तो हनीमून के मूड में है. शादी में इतनी धूम और रिश्तेदारों की क्या जरूरत. चुपचाप कोर्ट मैरिज कर लेती. शर्म नहीं आती. इतने बड़ेबड़े बच्चों के सामने इतना तैयार हो कर खड़ी हो जाती है.’ नेहा ने घबरा कर आंखें खोल दीं और आसमान में तारों के बीच दीदी को ढूंढ़ने लगी, ‘दीदी, मुझे माफ कर देना. शायद, आज मैं तुम्हें और सब को स्वार्थी लगूं, पर मैं इतनी मजबूत नहीं कि जिंदगीभर लोगों के सवालों का जवाब दे सकूं. ‘पर, मैं आज तुम से यह वादा करती हूं कि एक मौसी के तौर पर हमेशा तुम्हारे बच्चों के साथ खड़ी हूं.’ हफ्तों से उमड़तेघुमड़ते सवालों का मानो उसे जवाब मिल गया था. नेहा अपनी मां को फोन करने के लिए छत से नीचे उतर गई.

Romantic Story : प्रेम परिसीमा – करुणानिधि को दिल का दौरा किस वजह से पड़ा था ?

Romantic Story : अस्पताल के एक कमरे में पलंग पर लेटेलेटे करुणानिधि ने करवट बदली और प्रेम से अपनी 50 वर्षीया पत्नी मधुमति को देखते हुए कहा, ‘‘जा रही हो?’’ मधुमति समझी थी कि करुणानिधि सो रहा है. आवाज सुन कर पास आई, उस के माथे पर हाथ रखा, बाल सहलाए और मंद मुसकान भर कर धीमे स्वर में बोली, ‘‘जाग गए, अब तबीयत कैसी है, बुखार तो नहीं लगता.’’

करुणानिधि ने किंचित मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे हाथ रखने से तबीयत तो ठीक हो गई है, पर दिल की धड़कन बढ़ गई है.’’ घबरा कर मधुमति ने उस की छाती पर हाथ रखा. करुणानिधि ने उस के हाथ पर अपना हाथ रख कर दबा दिया. मधुमति समझ गई, और बोली, ‘‘फिर वही हरकत, अस्पताल में बिस्तर पर लेटेलेटे भी वही सूझता है. कोई देख लेगा तो क्या कहेगा?’’

करुणानिधि ने बिना हाथ छोड़े कहा, ‘‘देख लेगा तो क्या कहेगा? यही न कि पति ने पत्नी का हाथ पकड़ रखा है या पत्नी ने पति का. इस में डरने या घबराने की क्या बात है? अब तो उम्र बीत गई. अब भी सब से, दुनिया से डर लगता है?’’ मधुमति ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया और बोली, ‘‘डाक्टर ने आप को आराम करने को कहा है, आवेश में आना मना है. दिल का दौरा पड़ चुका है, कुछ तो खयाल करिए.’’़

‘‘दिल का दौरा तो बहुत पहले ही पड़ चुका है. शादी से भी पहले. अब तो उस दौरे का अंतिम पड़ाव आने वाला है.’’ मधुमति ने उंगली रख कर उस का मुंह बंद किया और फिर सामान उठा कर घर चलने लगी. वह चलते हुए बोली, ‘‘दोपहर को आऊंगी. जरा घर की व्यवस्था देख आऊं.’’

करुणानिधि ने उस की पीठ देखते हुए फिकरा कसा, ‘‘हांहां, घर को तो कोई उठा ले जाएगा. बस, घर ही घर, तुम्हारा तो वही सबकुछ रहा है.’’ मधुमति बिना कोई उत्तर दिए कमरे से बाहर चली गई. डाक्टर ने कह दिया था कि करुणानिधि से बहस नहीं करनी है.

उस के जाते ही करुणानिधि थोड़ी देर छत की ओर देखता रहा. चारों तरफ शांति थी. धीरेधीरे उस की आंखें मुंदने लगीं. पिछला सारा जीवन उस की आंखों के सामने आ गया, प्रेमभरा, मदभरा जीवन… शादी से पहले ही मधुमति से उसे प्रेम हो गया था. शादी के बाद के शुरुआती वर्ष तो खूब मस्ती से बीते. बस, प्रेम ही प्रेम, सुख ही सुख, चैन ही चैन. वे दोनों अकेले रहते थे. मधुमति प्रेमकला से अनभिज्ञ सी थी. पर धीरेधीरे वह विकसित होने लगी. मौसम उन का अभिन्न मित्र और प्रेरक बन गया. वर्षा, शरद और बसंत जैसी ऋतुएं उन्हें आलोडित करने लगीं.

होली तो वे दोनों सब से खेलते, पर पहले एकदूसरे के अंगप्रत्यंग में रंग लगाना, पानी की बौछार डालना, जैसे कृष्ण और राधा होली खेल रहे हों. दीवाली में साथसाथ दीए लगाना और जलाना, मिठाई खाना और खिलाना. दीवाली के दिन विशेषकर एक बंधी हुई रीति थी. मधुमति, करुणानिधि के सामने अपनी मांग भरवाने खड़ी हो जाती थी. कितने प्रेम से हर वर्ष वह उस की मांग भरता था. याद कर करुणानिधि की आंखों से आंसू ढलक गए, प्रेम के आंसू. वे दिन थे जब प्रेम, प्रेम था, जब प्रेम चरमकोटि पर था. एक दिन की जुदाई भी असहनीय थी. कैसे फिर साथ हो, वियोग जल्दी से कैसे दूर हो, इस के मनसूबे बनाने में ही जुदाई का समय कटता था.

वे अविस्मरणीय दिन बीतते गए. अनंतकाल तक कैसे इस उच्चस्तर पर प्रेमालाप चल सकता था? फिर बच्चे हुए. मधुमति का ध्यान बच्चों को पालने में बंटा. बच्चों के साथ ही सामाजिक मेलजोल बढ़ने लगा. बच्चे बड़े होने लगे. मधुमति उन की पढ़ाई में व्यस्त, उन को स्कूल के लिए तैयार करने में, स्कूल के बाद खाना खिलाने, पढ़ाने में व्यस्त, घर सजाने का उसे बहुत शौक था. सो, घंटों सफाई, सजावट में बीत जाते. उद्यान लगाने का भी शौक चढ़ गया था. कभी किसी से मिलने चली गई. कभी कोई मिलने आ गया और कभी किसी पार्टी में जाना पड़ता. रिश्तेदारों से भी मिलनामिलाना जरूरी था. मधुमति के पास करुणानिधि के लिए बहुत कम समय रह गया. इन सब कामों में व्यस्त रहने से वह थक भी जाती. उन की प्रेमलीला शिखर से उतर कर एकदम ठोस जमीन पर आ कर थम सी गई. जीवन की वास्तविकता ने उस पर अंकुश लगा दिए.

यह बात नहीं थी कि करुणानिधि व्यस्त नहीं था, वह भी काम में लगा रहता. आमतौर पर रात को देर से भी आता. पर उस की प्रबल इच्छा यही रहती कि मधुमति से प्रेम की दो बातें हो जाएं. पर अकसर यही होता कि बिस्तर पर लेटते ही मधुमति निद्रा में मग्न और करुणानिधि करवटें बदलता रहता, झुंझलाता रहता. ऐसा नहीं था कि प्रेम का अंत हो गया था. महीने में 2-3 बार सुस्त वासना फिर तीव्रता से जागृत हो उठती. थोड़े समय के लिए दोनों अतीत जैसे सुहावने आनंद में पहुंच जाते, पर कभीकभी ही, थोड़ी देर के लिए ही.

करुणानिधि मधुमति की मजबूरी समझता था, पर पूरी तरह नहीं. पूरे जीवन में उसे यह अच्छी तरह समझ नहीं आया कि व्यस्त रहते हुए भी उस की तरह मधुमति प्रेमालाप के लिए कोई समय क्यों नहीं निकाल सकी. उसे तिरछी, मधुर दृष्टि से देखने में, कभी स्पर्शसुख देने में, कभीकभी आलिंगन करने में कितना समय लगता था? कभीकभी उसे ऐसा लगता जैसे उस में कोई कमी है. वह मधुमति को पूरी तरह जागृत करने में असफल रहा है. पर उसे कोई तसल्लीबख्श उत्तर कभी न मिला.

समय बीतता गया. बच्चे बड़े हो गए, उन की शादियां हो गईं. वे अपनेअपने घर चले गए, लड़के भी लड़कियां भी. घर में दोनों अकेले रह गए. तब करुणानिधि को लगा कि अब समय बदलेगा. अब मधुमति उस की ज्यादा परवा करेगी. उस के पास ज्यादा समय होगा. अब शादी के शुरू के वर्षों की पुनरावृत्ति होगी. पर उस की यह इच्छा, इच्छा ही बन कर रह गई. स्थिति और भी खराब हो गई, क्योंकि मधुमति दामादों, बहुओं व अन्य संबंधियों में और भी व्यस्त हो गई. बेचारा करुणानिधि अतृप्त प्रेम के कारण क्षुब्ध, दुखी रहने लगा. मधुमति उस के क्रोध, दुख को फौरन समझ जाती, कभीकभी उन्हें दूर करने का प्रयत्न भी करती, पर करुणानिधि को लगता यह प्रेम वास्तविक नहीं है.

पिछले 20 वर्षों में कई बार करुणानिधि ने मधुमति से इस बारे में बात की. बातचीत कुछ ऐसे चलती… करुणानिधि कहता, ‘मधुमति, तुम्हारे प्रेम में अब कमी आ गई है.’

‘वह कैसे? मुझे तो नहीं लगता, प्रेम कम हो गया है. आप का प्रेम कम हो गया होगा. मेरा तो और भी बढ़ गया है.’ ‘यह तुम कैसे कह सकती हो? शादी के बाद के शुरुआती वर्ष याद नहीं हैं… कैसेकैसे, कहांकहां, कबकब, क्याक्या होता था.’

इस पर मधुमति कहती, ‘वैसा हमेशा कैसे चल सकता है? उम्र का तकाजा तो होगा ही. तुम्हारी दी हुई किताबों में ही लिखा है कि उम्र के साथसाथ रतिक्रीड़ा कम हो जाती है. फिर क्या रतिक्रीड़ा ही प्रेम है? उम्र के साथसाथ पतिपत्नी साथी, मित्र बनते जाते हैं. एकदूसरे को ज्यादा समझने लगते हैं. समय बीतने पर, पासपास चुप बैठे रहना भी, बात करना भी, प्रेम को समझनेसमझाने के लिए काफी होता है.’ ‘किताबों में यह भी तो लिखा है कि इस के अपवाद भी होते हैं और हो सकते हैं. मैं उस का अपवाद हूं. इस उम्र में भी मेरे लिए, सिर्फ पासपास गुमसुम बैठना काफी नहीं है. तुम अपवाद क्यों नहीं बन सकती हो?’

ऐसे में मधुमिता कुछ नाराज हो कर कहती, ‘तो आप समझते हैं, मैं आप से प्रेम नहीं करती? दिनभर तो आप के काम में लगी रहती हूं. आप को अकेला छोड़ कर, मांबाप, बेटों, लड़कियों के पास बहुत कम जाती हूं. किसी परपुरुष पर कभी नजर नहीं डाली. आप से प्रेम न होता तो यह सब कैसे होता?’

‘बस, यही तो तुम्हारी गलती है. तुम समझती हो, प्रेमी के जीवन के लिए यही सबकुछ काफी है. पारस्परिक आकर्षण कायम रखने के लिए इन सब की जरूरत है. इन के बिना प्रेम का पौधा शायद फलेफूले नहीं, शायद शुष्क हो जाए. पर इन का अपना स्थान है. ये वास्तविक प्रेम, शारीरिक सन्निकटता का स्थान नहीं ले सकते. मैं ने भी कभी परस्त्री का ध्यान नहीं किया. कभी भी किसी अन्य स्त्री को प्रेम या वासना की दृष्टि से नहीं देखा. मैं तो तुम्हारी नजर, तुम्हारे स्पर्श के लिए ही तरसता रहा हूं. और तुम, इस पर कभी गौर ही नहीं करती. किताबों में लिखा है या नहीं कि पति के लिए स्त्री को वेश्या का रूप भी धारण करना चाहिए.’ करुणानिधि की इस तरह की बात सुन मधुमति तुनक कर जवाब देती, ‘मैं, और वेश्या? इस अधेड़ उम्र में? आप का दिमाग प्रेम की बातें सोचतेसोचते सही नहीं रहा. उम्र के साथ संतुलन भी तो रखना ही चाहिए. आप मेरी नजर को तरसते रहते हैं, मैं तो आप की नजर का ही इंतजार करती रहती हूं. आप के मुंह के रंग से, भावभंगिमा से, इशारे से समझ जाती हूं कि आप के मन में क्या है.’

‘मधुमति, यही अंतर तो तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा. नजर ‘को’ मत देखो, नजर ‘में’ देखो. कितना समय हो गया है आंखें मिला कर एकदूसरे को देखे हुए? तुम्हारे पास तो उस के लिए भी समय नहीं है. आतेजाते, कभी देखो तो फौरन पहचान जाओगी कि मेरा मन तुम्हें चाहने को, तुम्हें पाने को कैसे उतावला रहता है, अधीर रहता है. पर तुम तो शायद समझ कर भी नजर फेर लेती हो. पता कैसे लगे? बताऊं कैसे?’ ‘जैसे पहले बताते थे. पहले रोक कर, कभी आप मेरी आंखों में नहीं देखते थे? कभी हाथ नहीं पकड़ते थे? अब वह सब क्यों नहीं करते?

‘वह भी तो कर के देख लिया, पर सब बेकार है. हाथ पकड़ता हूं तो झट से जवाब आता है, ‘मुझे काम करना है या कोई देख लेगा,’ झट हाथ खींच लेती हो या करवट बदल कर सो जाती हो. मैं भी आखिर स्वाभिमानी हूं. जब वर्षों पहले तय कर लिया कि किसी स्त्री के साथ, पत्नी के साथ भी जोरजबरदस्ती नहीं करूंगा, क्योंकि उस से प्रेम नहीं पनपता, उस से प्रेम की कब्र खुदती है, तो फिर सिवा चुप रहने के, प्रेम को दबा देने के, अपना मुंह फेर लेने के और क्या शेष रह जाता है? ‘तुम साल दर साल और भी बदलती जा रही हो. हमारे पलंग साथसाथ हैं…2 फुट की दूरी पर हम लेटते हैं. पर ऐसा लगता है जैसे मीलों दूर हों. मीलों दूर रहना फिर भी अच्छा है. उस से विरह की आग तो नहीं भड़केगी. उस के बाद पुनर्मिलन तो प्रेम को चरमसीमा तक पहुंचा देगा. पर पासपास लेटें और फिर भी बहुत दूर. इस से तो पीड़ा और भी बढ़ती है. कभीकभी, लेटेलेटे, यदि सोई न हो, तो मुझे आशा बंधती कि शायद आज कुछ परिवर्तन हो. पर तुम घर की, बच्चों की बात शुरू कर देती हो.’

ऐसी बातें कई बार हुईं. कुछ समय तक कुछ परिवर्तन होता. पुराने दिनों, पुरानी रातों की फिर पुनरावृत्ति होती. पर कुछ समय बाद करुणानिधि फिर उदास हो जाता. जब से मधुमति ने 50 वर्ष पार किए थे, तब से वह और भी अलगथलग रहने लगी थी. करुणानिधि ने बहुत समझाया, पर वह कहती, ‘आप तो कभी बूढ़े नहीं होंगे. पर मैं तो हो रही हूं. अब वानप्रस्थ, संन्यास का समय आ गया है. बच्चों की शादी हो चुकी है. अब तो कुछ और सोचो. मुझे तो अब शर्म आती है.’ ‘पतिपत्नी के बीच शर्म किस बात की?’ करुणानिधि झुंझला कर कहता, ‘मुझे पता है, तुम्हारे चेहरे पर झुर्रियां पड़ रही हैं. मेरे भी कुछ दांत निकल गए हैं. तुम मोटी भी हो रही हो. मैं भी बीमार रहता हूं. पर इस से क्या होता है? मेरे मन में तो तुम वही और वैसी ही मधुमति हो, जिस के साथ मेरा विवाह हुआ था. मुझे तो अब भी तुम वही नई दुलहन लगती हो. अब भी तुम्हारी नजर से, स्पर्श से, आवाज से मैं रोमांचित हो उठता हूं. फिर तुम्हें क्या कठिनाई है, किस बात की शर्म है?

‘हम दोनों के बारे में कौन सोच रहा है, क्या सोच रहा है, इस से तुम्हें क्या फर्क पड़ता है? अधिक से अधिक बच्चे और उन के बच्चे, मित्र, संबंधी यही तो कहेंगे कि हम दोनों इस उम्र में भी एकदूसरे से प्रेम करते हैं, एकदूसरे का साथ चाहते हैं, शायद सहवास भी करते हैं…तो कहने दो. हमारा जीवन, अपना जीवन है. यह तो दोबारा नहीं आएगा. क्यों न प्रेम की चरमसीमा पर रहतेरहते ही जीवन समाप्त किया जाए.’

मधुमति यह सब समझती थी. आखिर वर्षों से पति की प्रेमिका थी, पर पता नहीं क्यों, उतना नहीं समझती थी, जितना करुणानिधि चाहता था. उस के मन के किसी कोने में कोई रुकावट थी, जिसे वह पूर्णतया दूर न कर सकी. शायद भारतीय नारी के संस्कारों की रुकावट थी. अस्पताल में बिस्तर पर पड़ा, यह सब सोचता हुआ, करुणानिधि चौंका, मधुमति घर से वापस आ गई थी. वह खाने का सामान मेज पर रख रही थी. वैसा ही सुंदर चेहरा जैसा विवाह के समय था…मुख पर अभी भी तेज और चमक. बाल अभी भी काफी काले थे. कुछ सफेद बाल भी उस की सुंदरता को बढ़ा रहे थे.

बरतनों की आवाज सुन कर करुणानिधि ने मधुमति की ओर देखा तो उसे दिखाई दीं, वही बड़ीबड़ी, कालीकाली आंखें, वही सुंदर, मधुर मुसकान, वही गठा हुआ बदन कसी हुई साड़ी में लिपटा हुआ. करुणानिधि को उस के चेहरे, गले, गरदन पर झुर्रियां तो दिख ही नहीं रही थीं. उसे प्रेम से देखता करुणानिधि बुदबुदाया, ‘तेरे इश्क की इंतिहा चाहता हूं.’ छोटे से कमरे में गूंजता यह वाक्य मधुमति तक पहुंच गया. सब समझते हुए वह मुसकराई और पास आ कर उस के माथे पर हाथ रख कर बोली, ‘‘फिर वही विचार, वही भावनाएं. दिल के दौरे के बाद कुछ दिन तो आराम कर लो.’’

करुणानिधि ने निराशा में एक लंबी, ठंडी सांस ली और करवट बदल कर दीवार की ओर मुंह कर लिया. लेकिन कुछ समय बाद ही मधुमति को भी करुणानिधि की तरह लंबी, ठंडी सांस भरनी पड़ी और करवट बदल कर दीवार की ओर मुंह करना पड़ा.

अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद करुणानिधि घर आ गया. अच्छी तरह स्वास्थ्य लाभ करने में कुछ महीने लग गए. तब तक मधुमति उस से परे ही रही. उसे डर था कि समीप आने पर उसे दोबारा दिल का दौरा न पड़ जाए. उस ने इस डर के बारे में करुणानिधि को समझाने की कोशिश की, पर सब व्यर्थ. जब भी इस के बारे में बातें होतीं, करुणानिधि कहता कि वह उसे केवल टालने की कोशिश कर रही है. कुछ महीने बाद करुणानिधि 61 वर्ष का हो गया और लगभग पूर्णतया स्वस्थ भी. इस कारण विवाह की सालगिरह की रात जब उस ने मधुमति की ओर हाथ बढ़ाया तो उस ने इनकार न किया, पर उस के बाद करुणानिधि स्तब्ध रह गया. पहली बार उसे अंगरेजी कहावत ‘माइंड इज विलिंग, बट द फ्लैश इज वीक’ (मन तो चाहता है, पर शरीर जवाब देता है.) का अर्थ ठीक से समझ में आया और वह दुखी हो गया.

मधुमति ने उसे समझाने की कोशिश की. उस रात तो कुछ समझ न आया, पर जब फिर कई बार वैसा ही हुआ तो उसे उस स्थिति को स्वीकार करना पड़ा, क्योंकि डाक्टरों ने उसे बता दिया था कि उच्च रक्तचाव और मधुमेह के कारण ही ऐसी स्थिति आ गई थी.

अब मधुमति दीवार की ओर मुंह मोड़ने लगी, पर मुसकरा कर. एक बार जब करुणानिधि ने इस निराशा पर खेद व्यक्त किया तो उस ने कहा, ‘‘खेद प्रकट करने जैसी कोई बात ही नहीं है. प्रकृति के नियमों के विरुद्ध कोई कैसे जा सकता है. जब बच्चों की देखभाल के कारण या घर के कामकाज के कारण मेरा ध्यान आप की ओर से कुछ खिंचा, तो वह भी प्रकृति के नियमों के अनुसार ही था. आप को उसे स्वीकार करना चाहिए था. जैसे आज मैं स्वीकार कर रही हूं. आप के प्रति मेरे प्रेम में तब भी कोई अंतर नहीं आया था और न अब आएगा. प्रेम, वासना का दूसरा नाम नहीं है. प्रेम अलग श्रेणी में है, जो समय के साथ बढ़ता है, परिपक्व होता है. उस में ऐसी बातों से, किसी भी उम्र में कमी नहीं आ सकती. यही प्रेम की परिसीमा है.’’

करुणानिधि को एकदम तो नहीं, पर समय बीतने के साथ मधुमति की बातों की सत्यता समझ में आने लगी और फिर धीरेधीरे उन का जीवन फिर से मधुर प्रेम की निश्छल धारा में बहने लगा.

Best Hindi Story : सांझा दुख – मां के चेहरे पर खामोशी क्यों थी

Best Hindi Story : कोरोनाकाल चल रहा है. हम सब अपनेअपने घरों में लौकडाउन का पालन करते हुए भी डरे हुए हैं. पता नहीं कब किस को क्या हो जाए. एक ही तरह की दिनचर्या निभाते हुए मन की उलझन और बढ़ती ही जा रही है. कब, कहां, और कैसे? हर मौत पर दिमाग में ये सवाल कौंध रहे हैं. अरे, अभी उन से 10 दिनों पहले ही तो बात हुई थी और आज… विवशता, हताशा और पीड़ा का मिलाजुला रूप हम सब पर भारी है. कैसी महामारी है कि हम अपनों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं जब उन को हमारी सब से ज्यादा जरूरत है.

स्पर्श, प्यार के दो बोल और सेवा के लिए तड़पते हमारे अपने, अकेले में किस से गुहार कर रहे होंगे? तकलीफ को सांझ कर मन शांत हो जाता है. हम ऐसी डरावनी बीमारी के खौफ से घिरे हैं कि उस के पास हम बैठ भी नहीं सकते जिस से हमारा जीवनभर का नाता है. दूर से अपनों की परेशानी देख मन तड़प जाता है और एक टीस कि काश.. ऐसा नहीं होता. हमारे अपने बिछुड़ रहे हैं और ऐसी बिछुड़न, कि हम फिर से मिलने की आस भी नहीं संजो पा रहे हैं. मेरे दिल में यही सब बातें चल रही थीं कि मां आ कर मेरे पास खड़ी हो गईं. नम आंखें बहुतकुछ कह रही थीं. मुझे सीने से लगाते हुए बोलीं, ‘‘शरद नहीं रहा, बिट्टू. कोरोना के काल ने उस को अपनी चपेट में ले लिया.’

’ मैं स्तब्ध मां का चेहरा देखती रही. खामोशी के बीच हमारे अंदर दिल चीर डालने वाला दुख सांझ हो रहा था. आंखें उमड़ रही थीं. मां के जाते ही औंधेमुंह बिस्तर पर कटे पेड़ की तरह ढह गई मैं. आंसू हमारे सुखदुख की साथी तकिया को भिगोते रहे. शरद भैया से मेरा खून का रिश्ता नहीं था, पर खून के रिश्तों पर हमेशा भारी रहा है यह आत्मिक रिश्ता. बचपन से ही वे हमारे लिए रोलमौडल रहे. भैया के कंधे पर बैठ हम कहांकहां की सैर कर आते थे. मैं छोटीछोटी समस्याओं पर उन के पास पहुंच, रोते हुए और अपनी फ्रौक से आंसू पोंछते हुए उन की गोद में सिर रख कर शिकायतों का पुलिंदा खोल दिया करती थी. कभी मां सा, कभी भाई सा, तो कभी सहेलियों सा बरताव करते. वे हंसते हुऐ कहते, ‘थोड़ा रूक जा बिट्टू. जब मैं डाक्टर बन जाऊंगा, तब इन सब को इंजैक्शन लगा कर दर्द का एहसास करवाऊंगा.’ खूब हंसती मैं, और तरहतरह की ऐक्टिंग कर के बताती कि दर्द के कारण वे सब कैसे बिलबिलाएंगे. थोड़ी बड़ी हुई. उन के आने पर चाय मैं ही बनाती थी, क्योंकि उन को मेरे हाथ की बनी चाय पसंद थी. चाय पीते हुए वे कहते, ‘चाची, बिट्टू की शादी हम इसी शहर में कराएंगे, ताकि हम सब को उस के हाथ की बनी चाय हमेशा मिलती रहे.’

बनावटी गुस्सा दिखाती हुई मैं भैया को मारने लगती. वे मुझे सीने से लगाते हुए कहते, ‘इस को कभी भी अपनेआप से दूर नहीं जाने दूंगा.’ मेरी हर समस्या का समाधान था भैया के पास. मेरे स्कूल से ले कर कालेज तक के सफर में भैया हमेशा मार्गदर्शक रहे मेरे. एक दिन हंसते हुए मैं उन से बोली, ‘आप की अपनी कोई बहन नहीं है न, इसीलिए आप मुझे से बहुत प्यार करते हैं.’ मुझे आज भी याद है वह दिन. उन्हें बिलकुल भी बुरी नहीं लगी मेरी बात. उलटे, उन्होंने मेरी नाक पकड़ कर बोला था, ‘बिट्टू, तुम हर जन्म में मेरी बहन हो, और रहोगी. अपना और पराया क्या होता है? जहां प्रेम की लौ जगी, वही अपना है.’ कुछ वर्षों बाद भैया मैडिकल की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चले गए. मैं बहुत रोई थी.

जैसे, मेरी दुनिया बेरंग हो गई हो. सुबह के उजाले से ले कर देररात तक उन के साथ की यादें मुझे और उदास कर जातीं. फोन पर जब मैं अपनी समस्याएं बताने लगती तो वे कहते, ‘इतनी समस्याओं का, बस, एक समाधान है तेरी शादी. दूल्हा आ जाएगा तेरी जिंदगी में, तब जा कर इस निरीह भाई को राहत मिलेगी.’ गुस्से से कहती मैं, ‘अच्छा, तो आप मुझे से छुटकारा चाहते हैं. इतनी जल्दी नहीं छोड़ने वाली मैं आप को. और वैसे भी, पहले आप की शादी होगी, तब मेरी.’ भैया के डाक्टर बनते ही उन की शादी हो गई. खूब नाची थी मैं. खुशी मेरे दामन में नहीं समा रही थी. बाद के दिनों में वे मुझे चिढ़ाते, ‘चाची, मेरी शादी में नागिन डांस के लिए तो इस को पद्मश्री अवार्ड मिलना चाहिए था.’ वक्त के साथ हम सब बदलते गए. मेरी भी शादी हो गई. जिम्मेदारियों ने पैरों में बेडि़यां डाल दीं.

मां की आवाज सुन कर मैं आंसू पोंछते हुए बैठ गई. अपनी गोद में मेरा सिर रख कर प्यार से हाथ फेरते हुए मां बोलीं, ‘‘बिट्टू, तुम्हारे अंदर एक जीव पल रहा है, वह भी तो तुम्हारे खाने का इंतजार कर रहा है.’’ पेट पर हाथ रख कर सोचने लगी मैं, ‘काश, भैया मेरी कोख में आ जाते. मैं मां बन कर उन का खूब खयाल रखती और अपने से कभी भी दूर न जाने देती.’ बहुत प्रयास करने के बाद मैं ने खुद को संयत कर भाभी को कौल किया. उन के रोने की आवाज मेरे कानों में पिघले सीसे की तरह आहत कर रही थी.

‘‘शरद बगैर मुझ से कुछ बोले चले गए, बिट्टू. मैं अब किस को प्यार करूंगी? किस के सहारे रहूंगी? चारों तरफ अंधेरा दिख रहा है? मेरे तो सिर का ताज ही बिखर गया, बिट्टू.’’ ‘‘समय के सामने हम सब विवश हैं, भाभी. धैर्य रखिए. अमन का खयाल रखिए. उस पर इन दुखों का असर नहीं होना चाहिए. टूट जाएगा तो बिखरे को समेटना बहुत मुश्किल होगा, भाभी.’’ तभी अमन की आवाज ने मेरी बची हुई हिम्मत को भी तोड़ कर रख दिया, ‘‘मैं पापा के साथ खेलना चाहता हूं. पापा से मिले हम को एक महीना हो गया है बूआ. सब के पापा हैं, तो मेरे पापा हमें छोड़ कर क्यों चले गए? बताओ बूआ?’’ सांत्वना के शब्द यहीं पर खत्म हो गए थे मेरे. मैं शून्य में निहारते हुए बोली, ‘‘इस का जवाब किसी के पास भी नहीं होगा, अमन बेटा.’’ मां के हाथों में खाने की थाली दिखी, तो आंखों ने सवाल किया और जबान पूछ बैठी, ‘‘मां, पीर पराई है या अपनी है?’’ ‘‘वैष्णव जन तो तेने कहिए जो पीर पराई जाने रे,’’ गाती हुई मां वहां से चली गईं.

लेखिका : कात्यायनी दीप

Hindi Story : पंछी बन कर उड़ जाने दो – निशा को मौसी से क्या शिकायत थी ?

Hindi Story : कालेज में वार्षिक उत्सव की तैयारियां जोरशोर से चल रही थीं. कार्यक्रम के आयोजन का जिम्मा मेरा था. मैं वहां व्याख्याता के तौर पर कार्यरत थी. कालेज में एक छात्र था राज, बड़ा ही मेधावी, हर क्षेत्र में अव्वल. पढ़ाईलिखाई के अलावा खेलकूद और संगीत में भी विशेष रुचि थी उस की. तबला, हारमोनियम, माउथ और्गन सभी तो कितना अच्छा बजाता था वह. सुर को बखूबी समझता था. सो, मैं ने अपना कार्यभार कम करने हेतु उस से मदद मांगते हुए कहा, ‘‘राज, यदि तुम जूनियर ग्रुप को थोड़ा गाना तैयार करवा दोगे तो मेरी बड़ी मदद होगी.’’

‘‘जी मैम, जरूर सिखाऊंगा और मुझे बहुत अच्छा लगेगा. बहुत अच्छे से सिखाऊंगा.’’

‘‘मुझे पूरी उम्मीद थी कि तुम से मुझे यही जवाब मिलेगा,’’ मैं ने कहा.

वह जीजान से जुट गया था अपने काम में. उस जूनियर गु्रप में मेरी अपनी भांजी निशा भी थी. मैं उस की मौसी होते हुए भी उस की सहेली से बढ़ कर थी. वह मुझ से अपनी सारी बातें साझा किया करती थी.

एक दिन निशा मेरे घर आईर् और बोली, ‘‘मौसी, यदि आप गलत न समझें तो एक बात कहूं?’’

मैं ने कहा ‘‘हां, कहो.’’

वह कहने लगी, ‘‘मौसी, मालूम है राज और पद्मजा के बीच प्रेमप्रसंग शुरू हो गया है.’’

मैं ने कहा, ‘‘कब से चल रहा है?’’

वह कहने लगी, ‘‘जब से राज ने जूनियर गु्रप को वह गाना सिखाया तब से.’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम से किस ने कहा यह सब? क्या पद्मजा ने बताया?’’

निशा कहने लगी, ‘‘नहीं मौसी, उस ने तो नहीं बताया लेकिन अब तो उन दोनों की आंखों में ही नजर आता है, और सारे कालेज को पता है.’’

मैं ने कहा, ‘‘चल, अब बातें न बना.’’

उस के बाद से मैं देखती कि कई बार राज व पद्मजा साथसाथ होते और सच पूछो तो मुझे उन की जोड़ी बहुत अच्छी लगती. अच्छी बात यह थी कि राज और पद्मजा ने इस प्रेमप्रसंग के चलते कभी कोई अभद्रता नहीं दिखाई थी. मैं तो देख रही थी कि दोनों ही अपनीअपनी पढ़ाई में और ज्यादा जुट गए थे.

फिर एक दिन निशा आई और कहने लगी, ‘‘मौसी, वैलेंटाइन डे पर मालूम है क्या हुआ?’’

मैं ने कहा, ‘‘तू फिर से राज और पद्मजा के बारे में तो कुछ नहीं बताने वाली?’’

निशा बोली, ‘‘वही तो, मौसी, हम ने वैलेंटाइन डे पार्टी रखी थी. उस में राज और पद्मजा भी थे. सब लोग डांस कर रहे थे और सभी दोस्तों ने उन से बालरूम डांस करने के लिए कहा. राज शरमा गया था जबकि पद्मजा कहने लगी, ‘मैं क्यों करूं इस के साथ डांस. इस ने तो अभी तक मुझ से प्यार का इजहार भी नहीं किया.’

‘‘फिर क्या था मौसी, सब कहने लगे, राज, कह डाल, राज, कह डाल. और राज पद्मजा की आंखों में आंखें डाल कर कहने लगा, ‘आई लव यू, पद्मजा.’ उस के बाद उस ने एक ही नहीं, 7 अलगअलग भाषाओं में अपने प्यार का इजहार किया.’’

जब निशा मुझे उन की बातें बताती तो उस के चेहरे पर अलग ही चमक होती थी. खैर, वह चमक वाजिब भी थी, उस की उम्र ही ऐसी थी.

और एक बार निशा बताने लगी, ‘‘मौसी, मालूम है, पद्मजा राज को बहुत प्रेरित करती रहती है पढ़ाई के लिए और प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए. आप को बताऊं, पद्मजा क्या कहती है उस से?’’

मैं ने कहा, ‘‘जब इतना बता दिया तो यह भी बता दे, वरना तेरा तो पेट दुख जाएगा न.’’ सच पूछो तो मैं स्वयं भी जानना चाहती थी कि दोनों के बीच चल क्या रहा है.

वह कहने लगी, ‘‘मौसी, पद्मजा ने कहा, ‘राज, तुम इस बार वादविवाद प्रतियोगिता में जरूर भाग लोगे. जीतोगे भी मेरे लिए.’ फिर मौसी, राज ने प्रतियोगिता में भाग लिया और जीत भी गया और उस के बाद दोनों साथ में घूमने गए और पता है मौसी, राज अवार्ड के पैसों से उसे शौपिंग भी करवा के लाया.

‘‘पता है क्या लिया पद्मजा ने? चूडि़यां. मौसी, वह दक्षिण भारत से है न, वहां लड़कियां चूडि़यां जरूर पहनती हैं. तो राज ने उसे चूडि़यां दिलवाई हैं.’’

और राज की यह बात मेरे दिल को बहुत छू गई थी. मैं सोच रही थी कितना निर्मल और सच्चा प्यार है दोनों का. दोनों शायद एकदूसरे को आगे बढ़ाने में बड़े प्रेरक थे. ऐसा चलते 2 साल बीत गए और फेयरवैल का दिन आ गया. सभी छात्रछात्राएं एकदूसरे से विदा ले रहे थे.

राज मेरे पास आया, कहने लगा, ‘‘मैम, आप से विदा चाहते हैं, आप ने इन वर्षों में इतना लिखाया, पढ़ाया, आप को बहुतबहुत धन्यवाद.’’ वैसे तो मैं राज की अध्यापिका थी किंतु उस से पहले एक इंसान भी तो थी, सो, मैं ने कहा, ‘‘राज, तुम जैसे छात्र बहुत कम होते हैं. तुम अब सौफ्टवेयर इंजीनियर बन गए हो. सदा आगे बढ़ो. एक दिल की बात कहूं?’’

राज बोला, ‘‘जी, कहिए, मैम.’’ मैं ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी और पद्मजा की जोड़ी बहुत ही अच्छी है. मुझे शादी में बुलाना न भूलना.’’ राज मुंह नीचे किए मुसकरा कर बोला, ‘‘जी मैम, जरूर.’’ और फिर वह चला गया.

यह सब हुए पूरे 8 वर्ष बीत गए और मैं अपने पति के साथ मसूरी घूमने आई हुई थी. वहां मैं ने होर्डिंग्स पर राज की तसवीरें देखीं, पता लगा कि उस का एक स्टेजशो है. मैं ने अपने पति से कह कर शो के टिकट मंगवा लिए और पहुंच गई हौल में शो देखने.

जैसे ही राज स्टेज पर आया, हौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. वह देखने में बहुत ही अच्छा लग रहा था. कुदरत ने उसे रंगरूप, कदकाठी तो दी ही थी, उस पर उस का आकर्षक व्यक्तित्व जैसे सोने पे सुहागा. उस के पहले गीत, ‘‘फिर वही शाम, वही गम, वही तनहाई है…’’ के साथ हौल में समां बंध गया था और जैसे ही शो खत्म हुआ, सभी लड़कियां उस का औटोग्राफ लेने पहुंच गईं. उन के साथ मैं भी स्टेज के पास जा पहुंची.

जैसे ही उस की नजर मुझ पर पड़ी, वह झट से पहचान गया और उसी अदब के साथ उस ने मुझे अभिवादन किया. अपने छात्र राज को इस मुकाम पर देख मेरी आंखों में खुशी के आंसू आ गए थे.

फिर राज और मैं कौफी पीने होटल के लाउंज में चले गए और सब से पहले मैं ने शिकायतभरे लहजे में कहा, ‘‘राज, बहुत नाराज हूं तुम से, तुम ने मुझे शादी में क्यों नहीं बुलाया? कहां है पद्मजा, कैसी है वह?’’

इतना सुनते ही राज की मुसकराती आंखों के किनारे नम हो गए थे. अपने आंसुओं को अपनी मुसकराहट के पीछे छिपाते हुए उस ने कहा, ‘‘मेरी शादी नहीं हुई, मैम, पद्मजा मेरी नहीं हो सकी. उस की शादी कहीं और हो गई है.’’

मुझ से रहा न गया तो पूछ बैठी, ‘‘क्यों नहीं हुई तुम्हारी दोनों की शादी.’’ वह कहने लगा, ‘‘मैम, मैं उत्तर भारत से हूं और वह दक्षिण भारतीय. हमारी जाति भी एक नहीं, इसीलिए.’’

‘‘लेकिन कौन आजकल जातपांत मानता है, राज?’’ मैं ने कहा, ‘‘और फिर तुम दोनों तो इतने पढ़ेलिखे हो.’’

राज ने कहा, ‘‘मैम, मेरे मातापिता इस रिश्ते को ले कर बहुत खुश थे. मेरी मां ने तो बहू लाने की पूरी तैयारी भी कर ली थी. लेकिन पद्मजा के मातापिता इस रिश्ते को ले कर खुश नहीं थे और उन्होंने इनकार कर दिया था. मैं पद्मजा के मातापिता से बात करने भी गया था. उन से बात करने पर वे कहने लगे, ‘देखो राज, तुम एक समझदार और नेक इंसान लगते हो. हमें तुम्हारे में कोई कमी नजर नहीं आती. लेकिन हम अगर अपनी बेटी पद्मजा की शादी तुम से कर दें तो हमारी बिरादरी में हमारी नाक कट जाएगी. और वैसे भी हम ने अपनी ही बिरादरी का दक्षिण भारतीय लड़का ढूंढ़ रखा है. इसीलिए अच्छा होगा कि अब तुम पद्मजा को भूल ही जाओ.’ मैं ने उन से इतना भी कहा कि ‘क्या पद्मजा मुझे भुला पाएगी?’ तो वे कहने लगे, ‘वह हमारी बेटी है, हम उसे समझा लेंगे.’

‘‘मैं ने पद्मजा की तरफ देखा, वह बहुत रो रही थी. उस ने मुझ से हाथ जोड़ कर माफी मांगते हुए कहा, ‘जाओ राज, मैं अपने मातापिता की मरजी के खिलाफ तुम से शादी नहीं कर सकती.’ मैं क्या करता, मैम. बस, तब से ही इस दुनिया से जैसे दिल भर गया. किंतु क्या करूं मेरे भी तो अपने मातापिता के प्रति कुछ फर्ज हैं, बस, इसीलिए जिंदा हूं. बहुत मुश्किल से संभाला है मैं ने अपनेआप को.’’

वह कहता जा रहा था और उस के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. उस का हाल सुन मेरी आंखों से भी आंसुओं की धारा बह चली थी.

राज का यह हाल देख मुझे बड़ा ही दुख हुआ. मैं मन ही मन सोच रही थी कि राज और पद्मजा का प्यार कोई कच्ची उम्र का प्यार नहीं था, न ही मात्र आकर्षण. दोनों ही परिपक्व थे. राज उस से शादी को ले कर सीरियस भी था. तभी तो वह पद्मजा के मातापिता से मिलने गया था. पद्मजा न जाने किस हाल में होगी.

खैर, मैं उस के लिए तो कुछ नहीं कह सकती. किंतु उस के मातापिता, क्यों उन्होंने अपनी बेटी से बढ़ कर जात, समाज, धर्म, प्रांत की चिंता की. यदि राज और पद्मजा 7 वर्ष एकसाथ एक ख्वाब को बुनते रहे तो क्या अपना परिवार नहीं बसा सकते थे. हम अपने बच्चों के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं, उन्हीं बच्चों की खुशियों को क्यों जात, बिरादरी, समाज की भेंट चढ़ा देते हैं? क्यों हम यह नहीं समझते कि प्यार और आकर्षण में बहुत फर्क होता है? यह 16 वर्ष की उम्र वाला मात्र आकर्षण नहीं था, यह सच्चा प्यार था जो आज राज की आंखों से आंसू बन कर बह निकला था. हम क्यों नहीं समझते कि समाज के नियम इंसान ने ही बनाए हैं और वे उस के हित में होने चाहिए न कि जाति, धर्म, भाषा की आड़ में इंसानों के बीच दीवार खड़ी करने के लिए.

बहरहाल, अब हो भी क्या सकता था. लेकिन, मैं इतना तो जरूर कहना चाहूंगी कि जिस तरह राज और पद्मजा का प्यार अधूरा रह गया सिर्फ इंसानों के बनाए झूठे नियम, समाज के कारण, उस तरह किन्हीं 2 प्यार करने वालों को अब कभी जुदा न कीजिए.

मैं यह भी कहना चाहूंगी कि कभी देखा है पंछियोें को? वे किस तरह अपने बच्चों को उड़ना सिखा कर स्वतंत्र छोड़ देते हैं. ताकि वे खुले आसमान में अपने पंख पसार सकें. और कितना सुंदर होता है वह दृश्य जब खुले आसमान में बादलों के संग पंछी उन्मुक्त उड़ान भरते हैं. तो हम इंसान क्यों प्रकृति के नियमों को ठुकरा अपने नियम बना अपने ही बच्चों को मजबूर कर देते हैं राज व पद्मजा की तरह आंसुओं संग जीने को क्यों न हम तोड़ दें वे नियम जो आज के युग में सिर्फ ढकोसले मात्र हैं? क्यों न हम उड़ जाने दें अपने बच्चों को उन्मुक्त आकाश में पंछियों की तरह?

Recycle : जीरो वेस्ट, बातें हवा हवाई

Recycle : किचन और घर से निकलने वाले वेस्ट यानि कचरा को उपयोगी बनाने के लिए जो प्रयास घर और सरकार दोनों के ही द्वारा किए जा रहे हैं वह हवा हवाई दावे साबित हो रहे हैं.

आज के दौर में अखबार और पत्रिकाओं से अधिक सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली एक मिनट वाली रील का बड़ा क्रेज है. जिस में ऐसेऐसे टिप्स दिए जाते हैं जिस में मिनटों का काम सेकेंडों में हो जाता है. मुहावरों की भाषा में कहें तो हाथ पर सरसों उगाने का काम होता है. इस में जिस तरह के टिप्स दिए जातें हैं वह कई प्रकार के होते हैं. आज बात करेंगे किचन के कचरे का. रील में जिस तरह से इस को दिखाया जाता है वह कितना सही है और कितना गलत ?

सोशल मीडिया की रील में किचन के कचरे के बाद उस के कंपोस्ट खाद बनने से ले कर घरों में लगी सब्जी और पौधों में डालने से ले कर उन में फल फूल आने की यह रील बहुत अच्छी लगती है. इस को देख कर कई लोग इस को करने का काम करते हैं. कुछ ही दिनों में उन को यह पता चल जाता है कि यह काम उतना सरल नहीं होता जितना रील में दिखाया जाता है. जीरो वेस्ट की सच्चाई क्या है ? यह कितना व्यवहारिक है ?

क्या है जीरो वेस्ट ?

जीरो वेस्ट का अर्थ है कचरे को कम से कम करना. इस के लिए रीसाइकल करना और उस को कंपोस्ट खाद में बदलना सब से उपयोगी होता है. किचन से निकलने वाले सब्जी के छिलके और बचे हुए खराब खाने का प्रयोग सब से ज्यादा होता है. इस के अलावा आजकल चाय का प्रयोग घरों में बहुत होता है. बची हुई चाय की पत्ती को फेंकने से अच्छा होता है कि उस का उपयोग कर लिया जाए.

किचन जीरो वेस्ट का अर्थ है अपनी रसोई में भोजन और अन्य वस्तुओं की बरबादी को कम से कम करना, या पूरी तरह से खत्म करना. इस का मतलब है कि खाने के बचे हुए हिस्से, पैकेजिंग और अन्य कचरे का पुनः उपयोग, कंपोस्ट या रीसाइकिल करना होता है. इस के लिए जरूरी है कि भोजन की बरबादी को कम करें. खरीदारी केवल उतनी ही करें जितनी आप को जरूरत हो. बचे हुए खाने को दोबारा इस्तेमाल करें. भोजन को उचित रूप से स्टोर करें ताकि वह खराब न हो. खाने के बचे हुए हिस्सों को कंपोस्ट करें.

घर के अलावा सरकारों ने भी कचरा प्रबंधन का काम शुरू किया है. शहर से ले कर गांव तक यह काम हो रहा है. यह बात और है कि यह बातें हवा हवाई ज्यादा हैं. अधिकतर बड़े शहरों में हर घर में दो तरह के कचरे के डिब्बे रखे जाने लगे हैं. पहला नीले रंग के डिब्बे का उपयोग सूखे कचरे जैसे प्लास्टिक, कागज, धातु आदि के लिए होता है. दूसरे हरे रंग के डिब्बे का प्रयोग गीले कचरे जैसे फल सब्जी के छिलके, बचा हुआ खाना आदि के लिए होता है.

शहरों में कचरा उठाने वाली गाड़ी आती है. इस के अलावा सफाई कर्मचारी ठेले ले कर आते हैं. अब घर में तो कचरा दो रंग वाले डिब्बे में रखा जाता है. जैसे यह कचरा कचरा रखने वाली गाड़ी में पहुंचता है यह एक में ही हो जाता है. इस का एक बड़ा कारण है कि कभी सूखा कचरा ज्यादा हो जाता है तो कभी गीला. ऐेसे में अतिरिक्त कचरा उसी में भर दिया जाता है जिस में कचरा रखने की जगह होती है.

सरकार दावा करती है कि कचरा प्रबंधन करने वाली मशीन इस का रीसाइकिल कर के उपयोगी पदार्थ बना लेगी. अपार्टमेंट और कालोनी में रहने वालों को कचरा उठाने के एवज में एक तय रकम हर माह देनी होती है. इस के बाद भी शहरों में कचरा जगहजगह दिखता है. इसी तरह से गांवों में कचरा से खाद बनाने के लिए सरकार पंचायत के माध्यम से एक जगह बना रही है. जिस की लगात करीब 5 लाख आ रही है. टीनशेड के नीचे गांव के किनारे एक तरह का खाद बनाने का काम किया जा रहा है.

जिन गांवों में यह बन गया है वहां कभी कचरा न जाता है और न खाद बनती है. केवल उत्तर प्रदेश में 57 हजार 691 ग्राम पंचायते हैं. यहां हर गांव में 2-2 सफाई कर्मचारी हैं. नाली और खंडजा है. लेकिन इन में सफाई नहीं होती. पानी की निकासी सही नहीं है. गांव वालों ने अपने घर के आगे नाली रोक ली है. महीने में दो चार बार सफाई कर्मचारी आता है इधरउधर हाथपांव चला कर चला जाता है. पहले गांव में हर घर के पीछे एक कूड़ा भरने का गढ्ढा होता था जिस को घूर कहते थे. उस समय न पानी भरता था न रास्ते में गंदगी रहती थी. गलियां कच्ची होती थी तो धूल होती थी. जीरो वेस्ट में अब वापस घरों में खाद बनाने के प्रयोग शहरों में किए जा रहे हैं.

अस्पतालों में कचरा प्रबंधन

अस्पतालों में कचरा प्रबंधन के लिए लाल और पीले रंग के डिब्बे भी इस्तेमाल किए जाते हैं. लाल डिब्बा रंग के डिब्बे में खतरनाक कचरा और पीले रंग के डिब्बे में संक्रमणकारी कचरा रखा जाता है. हर अस्पताल में एक कचरा प्रबंधन रजिस्टर बना होता है. इस में यह लिखा जाता है किस दिन नगर निगम का कौन सा कर्मचारी आया, कितना कचरा किस रंग के डिब्बे में दिया गया. इस में नगर निगम कर्मचारी को भी अपने हस्ताक्षर करने होते हैं. अगर कभी नगर निगम अचानक जांच करता है और उस को रजिस्टर सही से पूरा भरा नहीं मिलता तो अस्पताल पर फाइन लगाया जाता है. अगर गलती बारबार हो तो नगर निगम अस्पताल का लाइसैंस रद्द करने की कार्रवाई भी कर सकता है.

कई निजी अस्पताल भी मैडिकल वेस्ट को निस्तारित नहीं करते हैं. दवाईयां, इंजेक्शन जैसी हानिकारक चीजों को जला देते हैं. कुछ दिन पहले इब्राहीमपुर वार्ड में निरीक्षण के दौरान खाद्य एवं सफाई निरीक्षक आकांक्षा गोस्वामी ने पाया कि एक अस्पताल का मैडिकल कचरा जलाया जा रहा है. यहां मैडिकल कचरा को अलगअलग रखने की भी कोई व्यवस्था नहीं थी. सफाई निरीक्षक ने अस्पताल संचालक पर एक हजार रुपये का जुर्माना लगाया.

पीजीआइ रोड पर गंदगी फैलाने वाले होटल कॉसमोस पर 5000 रुपए का जुर्माना लगाया गया. इस इलाके में कूड़ा प्रबंधन का काम देख रही मेसर्स ईको कंपनी की तरफ से कूड़ा न लेने की शिकायत की गई. कूड़ा प्रबंधन की निगरानी नगर निगम करता है. हवा हवाई व्यवस्था का उदाहरण यह है कि नगर निगम अस्पताल, होटल और घरों से एकत्र कूडे का खुद सही निस्तारण नहीं करता है. चाहे कितना भी कूडा अलगअलग एकत्र किया जाए पर शहर के बाहर वह एक ही जगह कूड़े के ढेर में बदल जाता है.

ऐसे में जीरो वेस्ट की धारणा धरी की धरी रह जाती है. जीरो वेस्ट एक अवधारणा है जो कचरे के प्रबंधन को एक ऐसा तरीका है जो सभी संसाधनों का संरक्षण करें और कचरे को न जलाएं या दफनाएं. इस का लक्ष्य कचरे को कम करना, फिर रीसाइकल करना, और फिर पुन उपयोग करना होता है. सरकार बहुत सारे प्रयासों और दावों के बाद भी इस काम को नहीं कर पा रही है. पंचायत से ले कर नगर निगम तक सब का हाल एक जैसा ही है.

जीरो वेस्ट में करें योगदान

आम लोग जीरो वेस्ट में कैसे योगदान दे सकते हैं ? किसी इस तरह की वस्तु को न खरीदें तो रिसाइकिल न हो सकती हो. कुछ को आप दोबारा सावधानी पूर्वक इस्तेमाल कर सकते हैं. जैसे कि प्लास्टिक की बोतलों को पानी की बोतल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. आप प्लास्टिक, कागज, और धातु जैसी वस्तुओं को रीसाइकल कर सकते हैं ताकि उन्हें नए उत्पादों में फिर से इस्तेमाल किया जा सके. कम्पोस्ट खाद के रूप में भोजन और बागवानी के कचरे को खाद में बदल सकते हैं. जो पौधों के लिए एक प्राकृतिक खाद है.

जीरो वेस्ट पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है. यह कचरे की मात्रा को कम करता है, जो प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण में योगदान करता है. यह कचरे से होने वाले खर्च को कम करता है और संसाधनों को बचाने में मदद करता है. इस से जीवन पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

रसोई के वेस्ट से खाद कैसे बनाएं?

रसोई के वेस्ट को खाद के रूप में बदलने का काम कैसे करें ? सब से पुराना तरीका है कि जमीन की मिट्टी खोद कर उस में कचरा दबा दीजिए. गोबर आदि मिल जाय तो उसे भी उस खचरें में शामिल कर दें. मिट्टी में नमी होगी और अच्छी धूप मिलेगी तो जल्दी खाद बन जाएगी. जीवित केंचुआ भी उस मिट्टी में डाल सकें तो और अचछा होता है. हर घर में आज के समय में कच्ची जमीन बची नहीं है. ऐसे में यह काम किसी गमले या प्लास्टिक के डिब्बे में कर सकते हैं. इस को समयसमय पर मिलाते भी रहें. इस से अच्छी खाद तैयार हो जाती है.

आजकल लोग घरों में पेड़ पौधे लगाना पसंद करते हैं. अब इन पौधों के लिए यदि घर पर ही खाद तैयार हो जाए तो अपने आसपास सफाई भी रख सकेंगे और कहीं न कहीं अपने पर्यावरण को भी साफ और बचा कर भी रख पाएंगे. असल में जीरो वेस्ट तभी सफल होगा जब इस तरह की मशीनें बने जो घर में किचन वेस्ट को सही कर सकें. जिस तरह से कपड़े और बरतन धोने की मशीनें बनी हैं उसी तरह से वेस्ट को ठीक से नया रूप दिया जा सके. तभी जीरो वेस्ट का सपना साकार हो सकेगा. बिना इस के सारा मामला हवा हवाई रहेगा.

Paramedical Courses : जमाना है हाफ डाक्टरों का

Paramedical Courses : वर्तमान में स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत लगातार बढ़ रही है. हर कोई पैसों की तंगी की वजह से डाक्टर तो नहीं बन सकता. लेकिन जिसे मैडिकल लाइन में अपना कैरियर बनाना है तो इस का एक बहुत अच्छा विकल्प यूथ के लिए जरूर उपलब्ध है. जानें क्या है डाक्टर बनने का दूसरा सस्ता विकल्प.

सृजन काफी परेशान थे. उन के बेटे प्रखर ने इस वर्ष 12वीं की परीक्षा पास की थी. सातवीं कक्षा से ही वह डाक्टर बनने के सपने देख रहा था. बचपन से ही स्थेटेस्कोप कानों में लगा कर अपने दादाजी का बुखार नापता रहता था. दरअसल प्रखर के मामाजी डाक्टर थे. मामाजी से वह काफी हिलामिला था. मामाभांजे में प्यार भी बहुत था और प्रखर को कभी कोई तकलीफ हुई तो उस के मामाजी ही उस का इलाज करते थे.

प्रखर ने बचपन से ही मामाजी जैसा डाक्टर बनने का सपना पाल रखा था, मगर 12वीं में उस के मार्क्स सिर्फ 79% ही आए थे, ऐसे में सृजन को उम्मीद नहीं थी कि प्रखर मैडिकल के टफ कम्पटीशन को निकाल पाएगा. अगर कम्पटीशन निकाल भी लिया तो सरकारी मैडिकल कालेज में यदि उस को स्थान नहीं मिला तो किसी निजी मैडिकल कालेज में बेटे को पढ़ाने की हैसियत सृजन की नहीं थी.

नीट क्लियर करने के बाद डाक्टरी की पढ़ाई वैसे भी 7-8 साल मांगती है और निजी संस्थान में पढ़ो तो खर्चा 90 लाख से 1.5 करोड़ रुपए तक होता है. वहीं सरकारी मैडिकल कालेज में औसत एमबीबीएस कोर्स की फीस 10,000 रुपए से ले कर 50,000 रुपए प्रति वर्ष है.

प्रखर उन का इकलौता बेटा था और शादी के 14 साल बाद पैदा हुआ था. इसलिए उस को ले कर सृजन और उन की पत्नी क्रांति बहुत इमोशनल थे. बचपन से उस की हर ख्वाहिश पूरी करते आए थे. मगर सृजन चाहते थे कि प्रखर जल्दी से जल्दी कमाने लगे, ताकि वे जल्दी ही घर में बहू ला सकें. यदि डाक्टर बनने के चक्कर में प्रखर के 10-12 साल लग गए तो कब वह कमाना शुरू करेगा और कब सेटल होगा?

सृजन ने जब अपनी चिंता अपने साले यानी प्रखर के मामाजी के सामने रखी तो वे तपाक से बोले, ‘कोई जरूरत नहीं है डाक्टर बनाने की. 8-10 साल में डाक्टर बन भी गया तो सरकारी अस्पताल में उस को 30-50 हजार रुपए सैलरी मिलेगी और किसी बड़े प्राइवेट अस्पताल में लगा तो ज्यादा से ज्यादा अस्सी हजार महीना कमा लेगा. अपना खुद का क्लिनिक खोलने और स्थापित डाक्टर बनने के लिए कम से कम 15 साल का तजुर्बा हो तब कहीं जा कर अच्छी कमाई होती है.

फिर क्या करें? प्रखर तो जिद पर अड़ा है कि उसे डाक्टर ही बनाना है. सृजन ने परेशानी व्यक्त की. मामाजी बोले, उस से कहो पैरामैडिकल का कोई कोर्स कर ले. चाहे डिग्री कोर्स कर ले या डिप्लोमा या सर्टिफिकेट पैरामैडिकल कोर्स. डिग्री कोर्स चार साल में हो जाएगा और डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स दो साल में पूरा हो जाएगा.

इस के बाद अगर किसी सरकारी अस्पताल में नौकरी लगती है तो दोतीन साल में उस की सैलरी लगभग उतनी ही होगी जितनी एक नए डाक्टर की होती है. कुछ साल के एक्सपीरियंस के बाद वह अपना पैथलैब खोल ले. कमाई ही कमाई है.

सृजन तो मैडिकल की इस क्षेत्र के बारे में सुन कर उछल पड़े. उन्होंने पैरामैडिकल के बारे में इंटरनेट पर सर्च किया तो करीब 8 ऐसे डिग्री कोर्स सामने आ गए जिस को करने के बाद दौलत और शोहरत दोनों उन के बेटे के कदम चूमें.

बीएससी (नर्सिंग) – बैचलर औफ साइंस (नर्सिंग), बीऔप्टोम – (बैचलर औफ औप्टोम), बीओटी – (बैचलर औफ औक्यूपेशनल थैरेपी), बीपीटी – (बैचलर औफ फिजियोथैरेपी), बीएससी – (विभिन्न विशेषज्ञता), बीफार्मा – (बैचलर औफ फार्मेसी), फार्मा.डी. – (डाक्टर औफ फार्मेसी), बीफार्मा आयुर्वेद – (बैचलर औफ फार्मेसी-आयुर्वेद) जैसे अनेक कोर्सेज जो चार साल में कम्पलीट हो सकते थे, उन के सामने थे.

ये सभी कोर्सेज ऐसे थे जिन को करने के बाद उन के बेटे को तुरंत जौब मिल सकती थी. और इस कोर्स को करने के लिए 12वीं में बहुत हाई परसेंटेज की जरूरत भी नहीं थी. आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों के लिए तो 10+2 में 40% अंक ही काफी थे.

दरअसल पैरामैडिकल का क्षेत्र कोई नया नहीं है मगर इस के बारे में बहुत जानकारी लोगों को नहीं है. जब कि पैरामेडिक्स के बिना आज न तो कोई अस्पताल चल सकता है और न कोई डाक्टर.

12वीं के बाद पैरामैडिकल कोर्स कर के अनेक क्षेत्रों में कार्य कुशलता प्राप्त की जा सकती है. जैसे नर्सिंग, फार्मेसी, फिजियोथेरेपी, औप्टोमेट्री औक्यूपेशन, थेरेपी, मैडिकल लैब टैक्नोलौजी, ओप्थाल्मिक टैक्नोलौजी, रेडियोग्राफिक टैक्नोलौजी, रेडियोथेरैपी, कार्डियोलौजी, न्यूरोलौजी, ब्लड ट्रांसफ्यूजन टैक्नोलौजी, प्लास्टर, एनेस्थीसिया टैक्नोलौजी, परफ्यूजनिस्ट, औपरेशन थिएटर टैक्नोलौजी, मैडिकल ट्रांसक्रिप्शन/मैडिकल रिकार्ड टैक्नोलौजी, साइटोलौजी, हिस्टोपैथोलौजी, ट्रांसफ्यूजन मैडिसिन, क्लिनिकल साइकोलौजिस्ट, एंडोस्कोपी, कम्युनिटी चिकित्सा, स्वास्थ्य निरीक्षक, आपातकालीन और फोरेंसिक चिकित्सा प्रौद्योगिकी, डायलिसिस प्रौद्योगिकी, एक्स-रे प्रौद्योगिकी, चिकित्सा इमेजिंग प्रौद्योगिकी, नेत्र प्रौद्योगिकी, एक्यूपंक्चर और मालिश चिकित्सा आदि.

प्रखर भी इतने सारे औप्शन देख कर खुश हो गया. जौब अपार्चुनिटी भी काफी थीं. 4 साल के डिग्री कोर्स के बाद काम करने के लिए उस के आगे अनेक क्षेत्र खुले थे. वह फार्मास्युटिकल ड्रग मैन्युफैक्चरिंग, सरकारी अस्पताल में विशेषज्ञ सलाहकार के तौर पर, निजी अस्पताल या क्लीनिक में सहायक के रूप में, चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्र में, क्लीनिकल रिसर्च, भारतीय सशस्त्र बल, तकनीकी लेखन, कौरपोरेट अस्पताल में विशेष सलाहकार, अनुसंधान और शिक्षाविद् के रूप में, चिकित्सा पत्रकारिता के क्षेत्र में, केन्द्रीय सिविल चिकित्सा सेवा में, फार्मेसी अथवा चिकित्सा उपकरण निर्माण के क्षेत्र में अच्छा काम कर सकता था.

इस कोर्स में ज्यादा पैसा भी नहीं लगना था. प्रखर के मामाजी ने भी उस को समझाया तो वह समझ गया कि मैडिकल का क्षेत्र अब इतना विस्तृत हो चुका है कि उस में डाक्टर तो एक छोटी सी इकाई के रूप में ही बचा है.

पैरामैडिकल में टौप कोर्सेज भी हैं जैसे औपरेशन थिएटर टैक्नोलौजी- जैसा कि नाम से पता चलता है, इस के अंतर्गत औपरेशन थिएटर के भीतर मरीज को औपरेशन के लिए तैयार करना, डाक्टर्स को औपरेशन में मदद देना, मशीनों को औपरेट करना, ब्लड सैंपल एवं अन्य प्रकार के टेस्ट के सैंपल आदि लेना, औपरेशन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की जानकारी और औपरेशन टेबल पर सर्जिकल परफारमेंस में डाक्टर की हेल्प करने तक सभी कार्य होते हैं.

बीएससी रेडियोलौजी का कोर्स भी बहुत बच्चे कर रहे हैं. यह रेडियोलौजी चिकित्सा की एक शाखा है. एक्स-रे रेडियोग्राफी, अल्ट्रासाउंड, कम्प्यूटेड टोमोग्राफी, पौजिट्रान एमिशन टोमोग्राफी, फ्लोरोस्कोपी और चुम्बकीय अनुनाद इमेजिंग सहित विभिन्न प्रकार की इमेजिंग तकनीकों का उपयोग रोगों के उपचार और निदान के लिए किया जाता है.

रेडियोग्राफर, जिसे संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा जैसे कुछ देशों में ‘रेडियोलौजिक टेक्नोलौजिस्टस’ कहा जाता है, इस कार्य में विशेष रूप से प्रशिक्षित होते हैं. इस क्षेत्र को दो भागों में विभाजित किया गया है- डायग्नोसिस रेडियोलौजी और इंटरवैंशनल रेडियोलौजी.

सब से पहले एक्स-रे का उपयोग रोगियों की चोटों के उपचार और निदान के लिए किया जाता है, जब कि बाद में, रोगों के उपचार और निदान के लिए अल्ट्रासाउंड, एमआरआई, सीटी स्कैन जैसी न्यूनतम इनवेसिव प्रक्रिया की जाती है.

असंख्य कैरियर के अवसरों और आकर्षक वेतन के साथ, रेडियोलौजी कोर्स एक लोकप्रिय विकल्प बन चुका है. यह कोर्स हास्पिटल में मशीनरी कैसे काम करती है, इस के टैक्निकल आस्पेक्ट को देखता है. इस कोर्स के पूरा होने पर एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी औपरेटिंग मशीन को संचालित करने का कौशल प्राप्त हो जाता है.

औडियोलौजी और स्पीच थेरेपी में बीएससी- यह कोर्स कम्युनिकेशन डिसऔर्डर में स्पेशलाइज बनाता है. औडिओलौजिस्ट, हियरिंग डिसऔर्डर को पहचानना, उस को मापना और उस को ठीक करने में स्पेशलाइज बनाता है. स्पीच थेरेपिस्ट्स और स्पीचलैंग्वेज पैथोलौजिस्ट एक साथ काम करते हैं.

औडियोलौजिस्ट और स्पीच थेरैपिस्ट के रूप में कैरियर न केवल सफलता बल्कि नौकरी में सम्मान भी देता है. मैडिकल के क्षेत्र में यह विशेष शाखा वर्तमान समय में बहुत ही आशाजनक करियर विकल्प के रूप में देखी जा रही है. स्पीच थेरैपिस्ट को स्पीच पैथोलौजिस्ट भी कहा जाता है.

भाषण और श्रवण संबंधी विकारों के इलाज के लिए लोगों में बढ़ती जागरूकता के कारण स्पीच थेरैपी विशेषज्ञों की मांग बहुत बढ़ गई है. एक स्पीच थेरैपिस्ट उन लोगों के लिए काम करता है जिन्हें बोलने, शब्द बनाने और ध्वनियों को सुनने में कठिनाई होती है.

किसी चोट, बीमारी या आघात से जिन की संवाद क्षमता प्रभावित हुई हो अथवा गंभीर बीमारियों या दुर्घटना/स्ट्रोक अथवा कैंसर के कारण जिन के स्वरयंत्र को हटा दिया गया हो, जिस के कारण उन्हें बोलने में कठिनाई हो, ऐसे लोगों को सांकेतिक भाषा सिखाने का काम भी स्पीच थेरैपिस्ट करते हैं.

बीएससी औडियोलौजी और स्पीच लैंग्वेज पैथोलौजी तीन साल का पूर्णकालिक स्नातक कोर्स है. यह पाठ्यक्रम सार्वजनिक स्वास्थ्य, औषधि निर्माण, श्रवण सहायता प्रत्यारोपण उद्योग, चिकित्सा अस्पतालों और क्लीनिकों, शैक्षणिक विश्वविद्यालयों, उद्योगों में श्रवण संरक्षण कार्यक्रम जैसे क्षेत्रों में नौकरी के पर्याप्त अवसर प्रदान करता है.

आज पैरामैडिकल क्षेत्र हैल्थ केयर में तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र है. पैरामैडिकल कोर्स प्रीहौस्पिटल, आपात स्थितियों और गैर सर्जिकल मामलों से संबंधित क्षेत्र है. साधारण शब्दों में समझें तो पैरामैडिकल उन्हें बोलते हैं जो एक्सरे करते हैं, अल्ट्रासाउंड करते हैं, सोनोग्राफी करते हैं या फिजियोथेरैपी आदि करते हैं. ये एमबीबीएस डाक्टर नहीं होते मगर आपात स्थिति में रोगी को संभालने वाला सब से पहला व्यक्ति पैरामेडिक होता है.

किसी रोगी की चिकित्सा के लिए डाक्टर इन की सेवाओं पर ही आश्रित होते हैं क्योंकि अपने मरीज के सही उपचार के लिए डाक्टर जो टेस्ट, एक्स रे, अल्ट्रासाउंड, मालिश, एक्सरसाइज आदि लिखता है, वह सारा काम पैरामैडिकल स्टाफ ही संपन्न करता है.

पैरामैडिकल स्टाफ द्वारा मरीज के संबंध में दी जाने वाली रिपोर्ट्स के बिना डाक्टर का काम अधूरा है. उस के बिना वह न तो सही निर्णय पर पहुंच सकता है और न ही सही इलाज कर सकता है.

आज पैरामैडिकल स्वास्थ्य सेवा उद्योग की रीढ़ है. अस्पतालों, क्लिनिक, नर्सिंग होम, पैथ लैब और निजी क्षेत्रों में पैरामैडिकल स्टाफ की मांग बहुत ज्यादा है. कोविड महामारी ने परिदृश्य बदल दिया है. इस वैश्विक महामारी ने विशेष रूप से टियर-2 शहरों में योग्य पैरामेडिक्स की मांग बढ़ा दी है.

कोविड के बाद फिजियोथेरपी, लैब परीक्षण और स्कैनिंग सेवाओं की बहुत आवश्यकता पड़ने लगी है. सरकार की योजना भी अगले कुछ वर्षों में भारत के प्रत्येक जिले में कम से कम एक मैडिकल कालेज बनाने की है. इस के साथ ही एम्स जैसे संस्थान भी बड़ी तेजी से बनाए जा रहे हैं.

ऐसे में स्पष्ट है कि पैरामैडिकल स्टाफ की जरूरत आने वाले समय में बहुत तेजी से बढ़ेगी और साइंस के विद्यार्थी के लिए इस क्षेत्र में करियर बनाना एक बहुत अच्छा विकल्प साबित होगा.

वैसे भी मैडिकल की पढ़ाई काफी महंगी पढ़ाई है. कई लाख रुपए और कई साल की मेहनत के बाद लोग डाक्टर बनते हैं. बहुत से ऐसे छात्र होते हैं जो विज्ञान विषयों में रुचि रखते हैं और साइंस स्ट्रीम से 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करते हैं. हालांकि साइंस विषय ले कर पढ़ने वाले हर बच्चे की आंखों में डाक्टर बनने का सपना होता है, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति कई बार ऐसी नहीं होती कि मैडिकल की पढ़ाई पर बहुत सारा पैसा निवेश किया जा सके.

कई बार मैडिकल में जाने के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षा में छात्र उत्तीर्ण नहीं हो पाते हैं. ऐसे में हताश होने की आवश्यकता नहीं है. पैरामैडिकल का बहुत बड़ा क्षेत्र ऐसे बच्चों को कैरियर के बेहतरीन विकल्प उपलब्ध कराता है. पैरामैडिकल का कोर्स मैडिकल कोर्स के मुकाबले कम खर्च वाला और कम समय में होने वाला है. सच पूछिए तो पैरामैडिक अग्रिम पंक्ति के योद्धा हैं, जो मरीजों के स्वस्थ होने को सुनिश्चित करते हैं.

पैरामैडिकल कोर्स की शुरुआत

इस बात की कोई ठोस जानकारी नहीं है कि पैरामैडिकल की शुरुआत दुनिया में कहां, कब और कैसे हुई. पहले निजी प्रैक्टिस करने वाले डाक्टरों की क्लिनिक में डाक्टर के अलावा उस का एक कंपाउंडर और ज्यादा हुआ तो एक नर्स होती थी. जो डाक्टर के निर्देशानुसार मरीज को दवा और इंजैक्शन देते थे. लेकिन विज्ञान की तरक्की और बाजारवाद के बढ़ने से रोगी को अनेक टेस्ट और थेरेपीज से भी गुजरना पड़ता है. ऐसे में दुनिया भर में पैरामैडिकल स्टाफ की जरूरत पड़ने लगी, जो तकनीकी काम में दक्ष होते हैं.

इस के अलावा अचानक होने वाली दुर्घटनाएं, युद्ध, बमधमाके आदि के दौरान घायल होने वाले रोगियों को तत्काल मदद पहुंचाने के लिए भी ऐसे लोगों की आवश्यकता महसूस हुई जो मेडिकली प्रशिक्षित हों. इस जरूरत को देखते हुए दुनिया के अलगअलग हिस्सों में अलगअलग समय पर ऐसे लोगों को प्रशिक्षित किया जाने लगा जो डाक्टर के पहुंचने तक मरीज को कुछ उपचार के जरिए ऐसी राहत दे सकें कि उस की जान बचाई जा सके.

अमेरिकी लेखक केविन हैजर्ड द्वारा लिखी एक किताब ‘अमेरिकन सायरन: द इन्क्रेडिबल स्टोरी औफ द ब्लैक मैन हू बिकम अमेरिकाज फर्स्ट पैरामेडिक्स’ से पता चलता है कि विश्व में सर्वप्रथम पैरामैडिकल सेवाओं को शुरू करने वाले व्यक्ति एक अश्वेत अमेरिकी थे, जिन का नाम पीटर साफर था.

केविन लिखते हैं कि साफर ने 1966 में अपनी लाड़ली बेटी को सिर्फ इस कारण से खो दिया क्योंकि उस को अस्थमा का अटैक पड़ा तो घर से हास्पिटल तक ले जाने के दौरान उस को कोई फर्स्ट एड नहीं मिल पाई और हौस्पिटल पहुंचने तक उन की बेटी ने दम तोड़ दिया. इस घटना ने पीटर साफर को बहुत व्यथित कर दिया. उन को महसूस हुआ कि कुछ ऐसे लोग होने चाहिए जो समय रहते मरीज की इतनी मदद कर सकें कि वह डाक्टर तक पहुंच जाए.

अपनों को असमय खोने के दर्द से दूसरों को बचाने के लिए पीटर साफर ने एक आधुनिक एम्बुलेंस डिजाइन की. जिस में मरीज को फर्स्ट एड देने के लिए कई मैडिकल उपकरण लगाए गए थे.

लेखक केविन हैजर्ड के अनुसार पीटर साफर ही वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पैरामेडिक्स को प्रशिक्षित करने के लिए दुनिया का पहला पाठ्यक्रम डिजाइन किया था. उन्होंने अस्पताल में गहन देखभाल इकाई – आईसीयू को विकसित करने में भी अहम भूमिका निभाई. औस्ट्रिया में जन्मे पीटर साफर स्वयं एक एनेस्थेसियोलौजिस्ट और सीपीआर के जानकार थे.

1967 में पीटर साफर द्वारा डिजाइन किया गया पैरामैडिकल पाठ्यक्रम ज्वाइन करने वाला पहला ग्रुप काले लोगों का ही था. उन्होंने ‘फ्रीडम हाउस’ नामक अपना एक संगठन बनाया, जिस का शुरुआती उद्देश्य था जरूरतमंद काले अमेरिकियों को सब्जियां और भोजन पहुंचाने के साथसाथ मैडिकल सुविधाएं भी मुहैया कराना.

लेकिन 8 महीने के अंदर ही उन्हें मिर्गी, प्रसव या दम घुटने जैसी आपात स्थितियों से निपटने के लिए भी प्रशिक्षित किया गया. उन की पहली कौल 1968 में मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या के बाद हुए विद्रोह के दौरान हुई, जिस में उन्होंने दंगों में घायल हुए लोगों के तुरंत उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

इस से पहले आपात स्थितियों से निपटने के लिए या तो पुलिस और सेना के जवान लगाए जाते थे या फिर स्वयंसेवी अग्निशमक के जवान, जो लड़ाई या दंगा होने पर हताहतों को गाड़ियों में डाल कर अस्पताल पहुंचा देते थे. लेकिन वे स्वयं मरीज की जान बचाने में कोई मदद नहीं कर पाते थे क्योंकि वे आपातकालीन देखभाल प्रदान करने के लिए प्रशिक्षित नहीं थे.

उस समय के एम्बुलैंस भी ज्यादातर शव वाहन ही थे, जो अस्पताल और कब्रिस्तान के बीच चलते थे. दो देशों के बीच युद्ध के वक्त अनेक सैनिक रणक्षेत्र में सिर्फ इसलिए मर जाते थे क्योंकि उन को तुरंत कोई चिकित्सकीय मदद नहीं मिल पाती थी. ऐसे वक्त में पैरामैडिकल प्रशिक्षण काम आया और इस का तीव्रता से विस्तार हुआ.

1972 में ‘फ्रीडम हाउस’ द्वारा मात्र दो महीने में अस्पताल पहुंचाए गए 1400 रोगियों में से 89% की जान समय रहते बच गई क्योंकि उन्हें तुरंत मैडिकल सपोर्ट और सही देखभाल मिल गई थी.

‘फ्रीडम हाउस’ की इतनी सफलता के बावजूद 1975 में नस्लवादी सोच रखने वाले पिट्सबर्ग के मेयर पीटर फ्लेहर्टी ने ‘फ्रीडम हाउस’ संगठन को बैन कर दिया और उस के स्थान पर एक पूर्ण श्वेत पैरामैडिकल कोर स्थापित किया.

लेखक केविन हैजर्ड अपनी किताब में लिखते हैं – ‘फ्रीडम हाउस बहुत सफल संगठन था. यह उच्च शिक्षित लोगों का संगठन था, जिन में से कई लोगों ने आगे जा कर मास्टर डिग्री, पीएचडी या मैडिकल डिग्री प्राप्त की अथवा राजनीति, पुलिस और अग्निशमन विभाग में उच्च पदों पर नियुक्त हुए.

वे वास्तव में सफल लोग थे, जो कहीं बाहर से नहीं आए थे, बल्कि सेवाभाव ले कर आम अमेरिकी लोगों के बीच से ही निकले थे. लेकिन नस्लवाद के कारण वे नकार दिये गए, परंतु उन का काम इतिहास में दर्ज है.

Online Hindi Story : नया जमाना – क्या था नए जमाने की सुरभि का बदला रूप

Online Hindi Story : डरबन की चमचमाती सड़कों पर सरपट दौड़ती इम्पाला तेजी से आगे बढ़ी जा रही थी. कुलवंत गाड़ी ड्राइविंग करते हिंदी फिल्म का एक गीत गुनगुनाने में मस्त थे. सुरभि उन के पास वाली सीट पर चुपचाप बैठी कनखियों से उन्हें निहारे जा रही थी. इम्पाला जब शहर के भीड़भाड़ वाले बाजार से गुजरने लगी तो सुरभि ने एक चुभती नजर कुलवंत पर डाली और बोली, ‘‘अंकल, कहीं मैडिकल की शौप नजर आए तो गाड़ी साइड में कर के रोक देना, मुझे दवा लेनी है.’’

कुलवंत के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए. सुरभि की तरफ देख कर बोले, ‘‘क्यों, क्या हुआ? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘हां, तबीयत तो ठीक है.’’

‘‘फिर दवा किस के लिए लेनी है?’’

‘‘आप के लिए.’’

‘‘मेरे लिए, क्यों? मुझे क्या हुआ है? एकदम भलाचंगा तो हूं.’’

‘‘आप बड़े नादान हैं. नहीं समझेंगे. अब आप अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाना बंद कीजिए. मैडिकल शौप नजर आए तो वहां गाड़ी रोक देना. मैं 1 मिनट में वापस आ जाऊंगी.’’

कुलवंत को बात समझ में नहीं आई तो चुप्पी साध ली. उन की नजरें स्क्रीन विंडो से हो कर बाजार के दोनों तरफ दौड़ने लगीं. कुछ देर बाद एक मैडिकल शौप नजर आई, तो गाड़ी को साइड में ले कर शौप के आगे रोक दी.

‘‘लो, दवाइयों की दुकान आ गई. जल्दी से दवा ले कर आओ.’’

सुरभि ने फुरती से दरवाजा खोला और मैडिकल शौप पर पहुंच गई. कुलवंत गाड़ी में बैठेबैठे ही सुरभि को देखते रहे. उस ने क्या दवा ली, वे चाह कर भी नहीं जान पाए. सुरभि ने दवा को पर्स में डाला और पैसे दे कर फौरन वापस आ कर गाड़ी में बैठ गई. वह कुलवंत की तरफ देख कर बोली, ‘‘हो गया काम, घर चलिए.’’

कुलवंत को कुछ भी समझ में न आया. उन्होंने गाड़ी को गियर में डाला और ऐक्सिलरेटर पर दबाव बढ़ा दिया. गाड़ी अगले ही पल हवा से बातें करने लगी. ड्राइविंग करतेकरते उन्होंने सुरभि पर एक नजर डाली. न जाने क्यों आज उन्हें सुरभि में एक बदलाव सा नजर आ रहा था.

1 महीने पहले जब वे डरबन आए थे, तब की सुरभि और आज की सुरभि में जमीनआसमान का फर्क था. पिछले 2 दिनों में तो उस का हावभाव एकदम बदल सा गया था. यह सब सोचतेसोचते वे विचारों में खो गए.

कल सुबह वे धड़धड़ाते हुए स्नानघर में घुसे तो उन के पांवों के नीचे की जमीन खिसक गई थी. वहां पर सुरभि पहले से ही स्नान कर रही थी. उस के तन पर एक भी कपड़ा नहीं था. कुलवंत फौरन बाहर आ गए. सुरभि की पीठ दरवाजे की तरफ थी. शायद उस ने कुलवंत को नहीं देखा था. कुलवंत की सांसें धोंकनी की तरह चलने लगीं. वे सोफे पर गिर पड़े. सोचने लगे कि अच्छा हुआ जो सुरभि को कुछ भी मालूम नहीं चला. मगर इस में गलती तो सुरभि की ही थी. सुरभि को अंदर से दरवाजा बंद करना चाहिए था.

उस घटना को गुजरे 24 घंटे से ज्यादा का समय बीत चुका था, मगर कुलवंत की आंखों में स्नानघर वाला दृश्य बारबार घूम जाता था. यौवन की दहलीज पर खड़ी सुरभि के उस रूप ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था. उन्हें खुद से ज्यादा गुस्सा सुरभि पर आ रहा था. उस ने भीतर से दरवाजा बंद क्यों नहीं किया? यह लापरवाही थी या जानबूझ कर की गई कारस्तानी. नहीं, नहीं, यह लापरवाही नहीं हो सकती, यह सब सुरभि ने जानबूझ कर किया है. अच्छा होगा कि निशांत जल्दी से वापस आ जाए.

इन विचारों के साथ वे बचपन की यादों में खो गए. कुलवंत और निशांत बचपन के मित्र थे. दोनों के घर आसपास ही थे. साथ ही खेलतेकूदते बचपन गुजरा. एक ही स्कूल में शिक्षा पाई. यूनिवर्सिटी में साथ ही दाखिला लिया. बाद में निशांत ने सीए की परीक्षा उत्तीर्ण कर के चार्टर्ड अकाउंटैंट का कार्य शुरू कर दिया.

कुलवंत ने अपने पिता का खेतीबाड़ी का काम संभाल लिया. एक दिन अच्छा रिश्ता आया तो प्रभुदयालजी ने अपने बेटे निशांत का विवाह सृजना के साथ धूमधाम से कर दिया. कुलवंत ब्याह के कार्यों में 1 महीने तक जुटा रहा. निशांत के सभी सूट उस ने अपनी पसंद से सिलवाए. बरातियों की लिस्ट बनाने से ले कर प्रीतिभोज का मेन्यू तय करने तक में उस ने प्रभुदयालजी की मदद की. लोग भी कहने लगे कि निशांत और कुलवंत दोस्त नहीं, बल्कि भाई हैं.

कुछ समय बाद कुलवंत की भी शादी हो गई. उस की शादी में निशांत तो आया, मगर उस की पत्नी सृजना नहीं आई थी. कुलवंत को बुरा लगा. उस ने अपने दोस्त को खूब खरीखोटी सुनाईं. निशांत उस दिन कुछ भी नहीं बोला. कुलवंत की हर बात को उस ने सहजता से लिया. घरगृहस्थी में बंधने के बाद दोनों अपनीअपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गए. कभीकभार दोनों दोस्त मिलते तो एकदूसरे से शिकवाशिकायत करने में ही समय गंवा देते. कुलवंत को कई बार लगा कि निशांत की गृहस्थी में सबकुछ ठीक नहीं है. उन्हीं दिनों खबर लगी कि निशांत के लड़की हुई है. मिठाई और उपहार दे कर दोनों पतिपत्नी वापस आ गए.

कुछ दिनों बाद एक अन्य मित्र के द्वारा मालूम पड़ा कि निशांत और सृजना की आपस में नहीं बनती. दोनों में रोज ही झगड़े होते रहते हैं. पुत्र और बहू के झगड़ों से दुखी प्रभुदयालजी की एक दिन हार्ट अटैक से मौत हो गई. उन की मौत के बाद तो निशांत और सृजना का मामला बिगड़ता ही चला गया.

मित्र के घर के बुरे समाचारों के बाद कुलवंत भी चिंतित हो उठा. एक दिन वह अपनी निशा को ले कर निशांत के घर गया. वहां दोनों को खूब समझाया. यहां कुलवंत को पहली बार लगा कि सृजना बहुत ही आक्रामक स्वभाव की थी. निशांत ने तो उन की बात को धैर्य के साथ सुना, मगर सृजना ने उन्हें दोटूक शब्दों में कह दिया, ‘देखिए, कुलवंतजी, आप अपने घर को संभालें. हमारे घर के मामलों में आप को पंचायत करने की जरूरत नहीं है.’

उस दिन कुलवंत भारी मन से वापस घर आया तो रो पड़ा था. आज उस के मित्र का घर बिखराव पर है अैर वह कुछ भी नहीं कर पा रहा था. कुछ समय बाद समाचार मिला कि निशांत और सृजना में तलाक हो गया. कोर्ट के आदेश से सुरभि निशांत को मिल गई थी. एक दिन निशांत ने कुलवंत और निशा को अपने घर बुलाया और बताया कि वह सुरभि को ले कर डरबन जा रहा है. वहां एक मल्टीनैशनल कंपनी में अकाउंटैंट की नौकरी मिल गई है. उस ने कुलवंत को अपने घर की चाबी देते हुए कहा कि मकान किराए पर उठा देना या जैसा तुम्हें उचित लगे, करना. समयसमय पर सफाई जरूर करवा देना. उस समय सुरभि मात्र 8 वर्ष की थी.

वक्त की रफ्तार धीरेधीरे आगे बढ़ती रही. कुलवंत की जिंदगी में सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. लेकिन एक दिन निशा ने स्तन में दर्द होने की बात बताई. डाक्टर को दिखाया तो उस ने जांच के बाद बताया कि उस को कैंसर है. बीमारी लास्ट स्टेज पर थी. कैंसर ने ऐसी जड़ें जमाईं कि निशा कभी ठीक ही नहीं हो पाई. कुलवंत को घर का चिराग दिए बिना ही निशा चल बसी. मातापिता का तो पहले ही देहांत हो गया था. वह दुनिया में अकेला हो गया. कभीकभी उस का मिलना सृजना भाभी से हो जाता था. वह अपने किए पर बहुत रोती थी. देखतेदेखते 12 वर्ष बीत गए. एक दिन निशांत ने वीजा व हवाई जहाज का टिकट भेज कर कुलवंत को डरबन बुला लिया.

मित्र के बुलावे पर वह 1 महीने पहले डरबन आया था. जब उस ने डरबन की धरती पर पांव रखा तो निशांत खुद गाड़ी ले कर एअरपोर्ट आया था. वर्षों बाद एकदूसरे को देख कर दोनों के आंसू निकल आए थे. घर पहुंचे तो सुरभि को देख कर कुलवंत का मुंह खुला का खुला रह गया. 12 वर्ष पूर्व जिस सुरभि को उस ने भारत से विदा किया था, उस में व इस सुरभि में जमीनआसमान का फर्क था. आज तो वह बिलकुल अपनी मां जैसी लग रही थी. उस के  नैननक्श बिलकुल सृजना के जैसे थे.

निशांत और सुरभि के साथ रहने से कुलवंत में जीने की तमन्ना जाग उठी थी. उन दोनों के साथ रहते 1 महीना कब बीता, पता ही नहीं चला.

2 दिन पहले निशांत को किसी जरूरी कार्य से दुबई जाना पड़ा. उस ने रवाना होते समय कुलवंत से कहा था, ‘मैं 1 हफ्ते के बाद ही आ पाऊंगा. तुम्हारी देखभाल

के लिए सुरभि को कह दिया है. कोई विशेष कार्य हो तो मोबाइल पर बता देना.’

अचानक विचारतंद्रा टूटी तो कुलवंत ने देखा कि बंगला आ गया है. उन्होंने गाड़ी पार्किंग में खड़ी की. दोनों दरवाजे के पास पहुंचे तो यह देख कर दंग रह गए कि दरवाजा खुला हुआ है. दोनों ने एकदूसरे की तरफ प्रश्नवाचक नजरों से देखा. सुरभि ने आश्चर्य से कहा, ‘‘मैं ने जाते वक्त ताला लगाया था. पीछे से यह दरवाजा किस ने खोला?’’

दोनों तेजी से दौड़ते हुए भीतर गए तो वहां के हालात देख कर भौचक्के रह गए. पूरे बंगले का सामान इधरउधर बिखरा पड़ा था. सुरभि ने कुलवंत की तरफ देख कर कहा, ‘‘लगता है चोरों ने यहां अपना हाथ दिखा दिया है. मैं पुलिस को फोन करती हूं.’’

सूचना मिलते ही पुलिस की टीम वहां जा पहुंची. अधिकारी पूछताछ के बाद छानबीन में लग गए. लूट की रिपोर्ट लिखने के बाद पुलिस वापस लौट गई. सुरभि ने कुलवंत की तरफ देख कर कहा, ‘‘यार अंकल, यों मुंह लटकाए क्यों बैठे हो? यहां तो यह आम बात है. यह तो अच्छा हुआ हम दोनों घर पर नहीं थे, वरना लुटेरे हमें जान से मार भी सकते थे. मैं पापा को फोन कर के बता देती हूं. आप चाय तो बना कर पिला दीजिए.’’

कुलवंत सुरभि की बेतकल्लुफी पर हैरान था. वह चुपचाप उठा और रसोईघर की तरफ चल दिया. सुरभि ने मोबाइल फोन से घर में हुई लूट की बात अपने पापा को बता दी. उस ने यह भी बता दिया कि चिंता की बात नहीं है. कुलवंत अंकल और वह कुशलमंगल से हैं. कुलवंत ने तब तक चाय बना ली.

रात को दोनों ने मिल कर खाना बना लिया. खाना खाते समय दोनों चुपचुप रहे. खापी कर दोनों फ्री हुए तो कुलवंत अपने कमरे में आ कर पलंग पर लेट गए. उन्हें नींद नहीं आ रही थी. टीवी चालू कर के वे चैनल बदलने लगे. एक चैनल पर कोई संत कथा का वाचन कर रहे थे. उन्होंने मन में विचार किया कि चलो, आज कथा का ही आनंद ले लिया जाए.

इतने में सुरभि दूध का गिलास ले आई. कुलवंत को धार्मिक चैनल पर कथा सुनते देख आश्चर्यचकित हो उठी. उस ने दूध का गिलास टेबल पर रखते हुए कनखियों से कुलवंत की तरफ देखा और बोली, ‘‘वाह, आप को भी कथाओं का शौक है?’’

सुरभि की बात पर कुलवंत की  हंसी छूट गई. वे सुरभि की  तरफ देखे बगैर ही बोल पड़े, ‘‘सब अपनी रोजीरोटी के लिए दौड़ रहे हैं. अपने भारत में तो आजकल कथाकारों की बाढ़ आई हुई है. इन कथाओं में धन बरस रहा है. धर्म के नाम पर न तो लूटने वालों की कमी है और न ही लुटाने वालों की. मैं भी कभीकभी सोचता हूं कि सबकुछ छोड़ कर कथावाचक बन जाऊं. धन और शोहरत के साथ सुंदरसुंदर चेहरे वाली हसीनाओं के दर्शन का लाभ भी मिलता रहेगा.’’

‘‘अरे, रहने भी दो. हसीनाओं को देखना आप को आता ही कहां है? हां, साधु बन कर माला फेरनी हो तो बात दूसरी है.’’

कुलवंत सुरभि की बात सुन कर सन्न रह गए. वे समझ गए कि सुरभि का मूड आज बड़ा रोमांटिक है. उस की द्विअर्थी बातों में कुछ छिपा है. उन्होंने सुरभि की तरफ देख कर कहा, ‘‘ठीक है, तुम जाओ यहां से, रात काफी हो गई है, मैं सोना चाहता हूं. तुम भी अब अपने कमरे में जा कर सो जाओ.’’ सुरभि अपने कमरे में चली गई. उस के चेहरे पर मदमस्त कर देने वाली मुसकान थी. कुलवंत ने दूध के गिलास की तरफ देखा. आज दूध पीने की इच्छा नहीं हो रही थी. मन में विचार किया कि निशांत जल्दी से वापस आ जाए. वे टीवी का स्विच बंद कर के सो गए. कुछ देर बाद नींद ने डेरा डालना शुरू कर दिया. अभी पूरी आंख लगी भी नहीं थी कि अचानक चौंक कर उठ बैठे. आंखें खुलीं तो देखा पलंग के पास कोई खड़ा है.

‘‘कौन है?’’ घबराहट में मुंह से निकल गया.

‘‘मैं हूं.’’

‘‘मैं कौन?’’

‘‘सुरभि.’’

‘‘इस समय यहां क्या करने आई हो?’’

‘‘मुझे नींद नहीं आ रही. अपने कमरे में डर लग रहा है, मैं अकेली वहां नहीं सो सकती.’’

‘‘पागल मत बनो. जाओ, अपने कमरे में. अपनेआप नींद आ जाएगी.’’

‘‘नहीं, डर लगता है. मैं तो यहीं पर सोऊंगी.’’

‘‘समझा करो. तुम अब छोटी बच्ची नहीं रहीं.’’

‘‘इसीलिए तो यहां सोने आई हूं.’’

इतना कहते ही सुरभि कुलवंत के पास लेट गई. कुलवंत की सांसें एकाएक फूलने लगीं. वे पलंग पर एक कोने पर सरक गए. घबराहट के मारे बुरा हाल हो रहा था. उन्होंने सुरभि की तरफ देख कर कहा, ‘‘प्लीज, यह गलत है. हमारी संस्कृति इस की इजाजत नहीं देती. कम से कम हम दोनों की उम्र का फर्क तो देखो. मैं तुम्हारे पापा की उम्र का हूं.’’

सुरभि ने भी करवट बदली और कुलवंत से एकदम सट कर बोली, ‘‘मुझे बेकार की बातें मत समझाइए. आप को समझ में नहीं आता तो मैं बता देती हूं. अब जमाना बदल गया है. जो भूख लगने पर भोजन नहीं करता वह पागल है.’’

‘‘प्लीज, कहना मानो. कल तुम्हारे पापा को मालूम होगा तो वह मेरे बारे में क्या सोचेगा.’’

‘‘डरिए मत, किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा. हो जाने दीजिए, जो कुछ होता है. जहां प्यार पनपता है वहां उम्र का हिसाब गौण हो जाता है. आजकल जमाना बदल गया है. प्यासी तृप्त होगी तो उस का परिणाम मिलेगा. यह व्यभिचार नहीं, उपकार होगा.’’

अचानक उस ने अपनी बंद मुट्ठी कुलवंत की तरफ बढ़ा दी.

‘‘क्या है?’’

‘‘तुम्हारी दवा. आज सुबह मैडिकल शौप से खरीदी थी.’’

इतना कहते हुए उस ने अपनी बंद मुट्ठी खोली. उस में एक ‘पैकेट’ था. यह देख कुलवंत की आंखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गईं. वह समझ गया कि वास्तव में जमाना बदल गया है. नए जमाने के सामने उस ने घुटने टेक दिए. अगले ही पल उस ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.

Love Story : मिनी, एडजस्ट करो प्लीज – क्या एडजस्ट करना आसान था मिनी के लिए

Love Story : देखते ही देखते गुबार उठा और आंधी चलने लगी. भाभी ने ड्राइंगरूम से आवाज दी, ‘मिनी, दरवाजेखिड़कियां बंद कर लेना, नहीं तो गर्द अंदर आ जाएगी.’ उस ने कहना चाहा, भाभी, तूफानी अंधड़ ने तो पहले ही से मेरे मन के दरवाजेखिड़कियों को बंद कर रखा है और मुझे अंधेरे कमरे में कैद कर रखा है.

कुछ देर बाद बारिश शुरू हो गई, तो बाहर का तूफान थम गया पर उस के मन के तूफान की रफ्तार वैसी ही थी. वह जानती थी, भैयाभाभी ड्राइंगरूम में मैट्रोमोनियल के जवाब में आई चिट्ठियां पढ़ रहे होंगे. 6 माह पहले जब भैया ने मैट्रोमोनियल विज्ञापन की बात कही थी तो मैं पत्थर हो गईर् थी. मैं दोबारा किसी के साथ जुड़ने की बात सोच भी नहीं सकती थी. पर भैया ने कहा था, ‘मिनी, सोच कर जवाब देना, सारी जिंदगी पड़ी है आगे.’

भैया ने तो ठीक ही कहा था पर अगले दिन जब उन्होंने मुझे अपनी डिगरियां निकालते देखा तो वे खामोश हो गए.2 कमरों के इस फ्लैट में मैं, भैया और भाभी 3 लोग ही थे पर वक्त ने जैसे हमें अजनबी बना दिया था.

यह अजनबियत पहले नहीं थी. मात्र एक साल ही तो गुजारा था नरेश के घर में. फिर मैं अपनी सूनी मांग ले कर भैया के घर वापस आ गई. नरेश के बाद किसी दूसरे के साथ जुड़ने का खयाल भी मन को झकझोर देता था.

फिर मैं अपनी डिगरियों के सहारे नौकरी की तलाश में लग गई. पर एक विधवा के प्रति लोगों का रुख देख कर मन कांप उठता था. एक विधवा, जवान और खूबसूरत कितने अवगुण थे मुझ में. आखिर, मैं ने हथियार डाल दिए. भैया ठीक ही कहते हैं. अकेले सारी जिंदगी गुजारना सचमुच मुश्किल था.

भैया ने फिर विज्ञापन देखने शुरू कर दिए. चिट्ठियां फिर से आने लगीं. मैं समझ गईर् कि एक न एक दिन मुझे इस घर से जाना ही होगा. इसी बीच एक दिन एक शख्स का पत्र आया. कोठी, कार, अच्छी नौकरी, अकेला घर सबकुछ था उस के पास, और क्या चाहिए किसी औरत को. हां, खलने वाली एक ही बात थी, कि उस की पत्नी जीवित थी और उस के साथ उस का बाकायदा तलाक अभी तक नहीं हुआ था. पर इस से क्या होता है, पत्नी का उस से कोई सरोकार नहीं था.

भैया ने उस शख्स को फोन कर घर आने को कह दिया. वह आया. भैया ने अपनी शंकाएं उस से जाहिर कीं. बदले में उस ने आश्वासनों का ढेर लगा दिया. भैया उस की बातों से संतुष्ट हुए और मुझे उस के हवाले कर दिया.

उस के गंभीर और गरिमामय व्यक्तित्व ने मुझे भी प्रभावित किया था. मुझे मालूम था कि किसी न किसी के गले बांध दी ही जाऊंगी, तो फिर तुम ही सही.

वह मुझे अपने घर ले गया. घर क्या था, पूरी हवेली थी. इस हवेलीनुमा घर के वैभव को छोड़ कर उस की पत्नी क्यों चली गई होगी, यह खयाल मेरे दिल में रहा. मेरे साथ रहते हुए तुम्हें अरसा बीत गया. अब तक तुम मुझे क्यों तड़पाती रहीं, ऐसा क्यों किया तुम ने?

उस के यह पूछने के जवाब में मैं ने पूरी कहानी सुना दी. ‘‘दरअसल, अपने हवेलीनुमा घर में ला कर तुम ने कहा, ‘अपना घर तुम्हें कैसा लगा, मिनी?’ इस के साथ तुम ने मुझे अपनी बांहों के घेरे में कैद कर लिया. मैं ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की, तो तुम ने कहा, ‘क्यों, क्या बात है, अब तो तुम मेरी हो, मेरी पत्नी, यह घर तुम्हारा ही है?’

‘‘‘बिना किसी संस्कार के मैं तुम्हारी पत्नी कैसे हो गई,’ मैं ने प्रतिरोध करते हुए कहा. तुम्हारी बांहों का घेरा कुछ और तंग हो गया और तुम ने हंसते हुए कहा, ‘ओह, तो तुम उस औपचारिकता की बात करती हो, उस की कोई वैल्यू नहीं है, तुम्हारे भी बच्चे होगें, उन्हें मेरा नाम मिलेगा, प्यार मिलेगा, जायदाद में पूरा हिस्सा मिलेगा.’

‘‘कितनी आसानी से तुम ने मुझे सारा कुछ समझा दिया था पर तुम जिसे औपचारिकता कहते हो वही तो एक सूत्र होता है जिस के दम पर एक औरत रानी बन कर राज करती है मर्द के घर और उस के दिल पर.

‘‘महाराज चाय बना कर ले आया था. चाय के साथ उस ने ढेर सारी प्लेटें मेज पर लगा दी थीं. चाय पीने के बाद तुम औफिस के लिए तैयार हुए और जातेजाते मुझे बांहों में भरा. तुम्हारी बांहों में मैं मछली सी तड़प उठी. तुम कुछ समझे, कुछ नहीं समझे और औफिस चले गए. पर मैं अपने औरत होने की शर्मिंदगी में टूटतीबिखरती रही.

‘‘मैं क्या कहती, मुझे तो यह भी नहीं पता था कि तुम्हें क्याक्या पसंद था. मैं ने यह कह कर मुक्ति पा ली, ‘कुछ भी बना लो.’ तभी वीरो आ गई, घर की मेडसर्वेंट. महाराज ने चुपके से उसे मेरे बारे में बताया. वीरो ने कहा, ‘अच्छा तो ये हैं,’ और काम में लग गई. बीचबीच में वह मुझे कनखियों से तोलती रही.

‘‘शाम को तुम औफिस से लौटे तो काफी खुश थे. महाराज तुम्हारी गाड़ी में से कई बैग निकाल कर लाया और सोफे पर रख दिया. तुम ने कई खूबसूरत साडि़यां मेरे सामने फैला दीं, ‘मिनी, ये सब तुम्हारे लिए हैं.’ पर तुम्हारे स्वर का अपनत्व मेरे अंदर की जमी हुई बर्फ को पिघला नहीं सका. तुम्हारी इच्छा से मैं ने आसमानी रंग की साड़ी पहन ली. फिर तुम महाराज और वीरो के जाने का इंतजार करने लगे. उन के जाते ही तुम बेसब्रे हो गए और मुझे बिस्तर पर खींच लिया. तुम्हारे बिस्तर पर बैठते ही मुझे लगा जैसे हजारों बिच्छुओं ने मुझे डंक मार दिया हो. मैं तड़पने लगी. फिर कुछ समझते हुए तुम मेरी पीठ सहलाने लगे.

‘‘‘मिनी, नरेश को क्या हुआ था?’ तुम ने पहली बार इतने प्यार से पूछा कि तुम मुझे आत्मीय से लगने लगे. पिछले

6 महीनों से जो गुबार मन में रुका हुआ था वह अचानक फूट पड़ा. मैं तुम्हारे कंधे पर झुक गई. तुम मेरे आसुंओं से भीगते रहे. फिर मैं ने तुम्हें बताया कि नरेश के साथ मैं ने कितने खुशहाल दिन बिताए थे. लेकिन सुख के दिन ज्यादा देर न रहे और एक दिन औफिस से लौटते समय नरेश का ऐक्सिडैंट हो गया. उस की रीढ़ की हड्डी टूट गई जो इलाज के बावजूद ठीक से जुड़ नहीं पाई.

‘‘नरेश ने जो एक बार बिस्तर पकड़ा तो उठ नहीं पाया. जबजब वह मेरी ओर हाथ बढ़ाता तो उस की हड्डी में कसक उठती. कभीकभी तो वह दर्द से चीखने लगता.

‘‘नरेश अब बिस्तर पर पड़ापड़ा मुझे दयनीय नजरों से देखता रहता और मैं आहत हो जाती. नरेश के इलाज पर बहुत पैसा खर्च हो गया था. धीरेधीरे नरेश को लगने लगा कि उस के कारण मेरी जवान उमंगों का खून हो रहा है. यह अपराधबोझ उस के दिल में घर करने लगा. मैं ने हालात को अपनी नियति मान कर स्वीकार कर लिया था पर नरेश ने नहीं किया.

‘‘नरेश को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी. हम उसे घर ले आए थे. पर अब हालात काफी बदल चुके थे. परिवार वालों की नजर में मैं अपशकुनी थी. नरेश अपने मन की हलचलों से ज्यादा लड़ नहीं सका और न ही अपनी शारीरिक तकलीफ को झेल सका. एक दिन उस ने अपनी कलाई की नस काट ली और चला गया मुझे अकेला छोड़ कर.

‘‘नरेश के परिवार वालों को अब मैं कांटे सी खटकने लगी और एक दिन भैया मुझे घर ले आए.‘‘तुम ने ठंडी सांस ली और कहा, ‘मिनी, ऐडजस्ट करने का प्रयास करो.’ मैं तुम्हारे सीने पर फफक पड़ी. कैसे भूलूं उस सब को. नरेश की आंखें मेरा पीछा करती हैं. मैं ने उसे तिलतिल कर मरते हुए देखा है. उस की आंखों में छलकती प्यास मुझे जीने नहीं देती.

‘‘तुम देर तक मेरी पीठ सहलाते रहे. फिर बत्ती बुझाई और सो गए. पर मैं रातभर जागती रही. मुझे लगा जैसे मैं अंगारों पर लेटी हुई हूं. अगले दिन तुम एक पिंजड़ा ले आए. उस में एक तोता था. तुम ने हंसते हुए कहा, ‘मिनी, इस तोते को बातें करना सिखाना, तुम्हारा मन लगा रहेगा.’ महाराज ने तोते के लिए कटोरी में पानी और हरीमिर्च रख दी.

‘‘तोते ने कुछ भी छुआ नहीं. वह अपनी दुम में ही सिमटा रहा. तुम ने कहा, ‘मिनी, नई जगह आया है न, एकदो दिन में ऐडजस्ट कर लेगा.’

‘‘सचमुच 2 दिनों बाद तोते ने खानापीना शुरू कर दिया. अब वह पिंजड़े में उछलकूद करने लगा था. बीचबीच में आवाजें भी निकालने लगा था. तुम औफिस से आते ही तोते से बातें करते, फिर मुझ से कहते, ‘देखा, तोता अब हम से हिलनेमिलने लगा है.’

‘‘मैं तुम्हें कैसे बताती कि इंसान और पंछी में फर्क होता है. इंसान की अपनी ही कुंठाएं उसे खाती रहती हैं. मैं भावनात्मक रूप से नरेश से जुड़ी हुई थी. मुझ में और तोते में फर्क है.

‘‘तुम ने मुझे गहरी नजर से देखा और गले से लगा लिया. फिर गंभीर स्वर में कहा, ‘मिनी, मैं सरकारी नौकरी में हूं. एक पत्नी के जिंदा रहते दूसरी शादी करना कानूनन जुर्म है. मुझे जेल भी हो सकती है. पर मैं भी इंसान हूं. तनहा नहीं रह सकता. मेरी भी कुछ जिस्मानी जरूरतें हैं. मैं ने कई लड़कियां देखीं, पर कोई पसंद नहीं आई. फिर तुम्हारे भैया का निमंत्रण आया. तुम मुझे बेहद मासूम लगीं. मुझे लगा कि तुम्हारे साथ जीवन आसान हो जाएगा. क्या मैं ने तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती की है?’

‘नहींनहीं, तुम भला क्यों जबरदस्ती करते. पर मैं भैया के लिए एक भार ही थी न. बड़ी मुश्किल से उन्होंने मेरी शादी की थी. पर नरेश…’

‘‘‘उस सब को भूल जाओ, मिनी. गया वक्त कभी लौट कर नहीं आता. ऐडजस्ट करने की कोशिश करो.’

‘‘पर मैं क्या करूं, कुछ समझ नहीं आता. जानवर नहीं हूं, न ही पूंछी हूं, फिर भी जानती हूं आज नहीं तो कल, ऐडजस्ट करना ही होगा.

‘‘तुम्हारे साथ बिस्तर पर लेटते ही नींद आंखों से उड़ जाती. रातभर सोचती रहती, कितनी निष्ठुर होगी तुम्हारी पत्नी जो तुम्हें छोड़ कर चली गई. सोचतेसोचते जब ध्यान तुम्हारी ओर जाता तो लगता, तुम भी सोए नहीं हो. मेरे दिल और दिमाग में तूफानी कशमकश चलने लगती पर समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं.

‘‘अगले दिन तुम औफिस से आए तो काफी उदास थे. पर मैं तो अभी तक तुम्हारे साथ मन से जुड़ नहीं पाई थी. सो, कुछ पूछ नहीं पाई. खाना खा कर तुम पलंग पर लेट गए. तुम बहुत खामोश थे. मैं भी चुपचाप लेट गई. मेरे अंदर की जमी हुई बर्फ अब तुम्हारे व्यवहार से कुछकुछ पिघलने लगी थी. मैं ने देखा, तुम सो नहीं पा रहे थे. अचानक तुम्हारे मुंह से एक गहरी सांस निकली. मैं ने तुम्हारे कंधे पर हाथ रख दिया. तुम ने आंखें खोल कर मेरी ओर देखा और हाथ बढ़ा कर मुझे अपने करीब खींच लिया. मैं ने कोई विरोध नहीं किया.

‘‘मैं ने देखा, तुम्हारी आंखों में वही आदम भूख जाग उठी थी. तुम्हारी नजरों ने मुझे आहत कर दिया. मुझे लगा, मेरी नजदीकी ने बिस्तर पर लेटे नरेश को भी बहुत तड़पाया था और अब तुम्हें…

‘‘‘नहीं, मुझे कोई हक नहीं था तुम्हें तड़पाने का.’ मैं फफक पड़ी. तुम ने मुझे सहलाते हुए कहा, ‘क्या बात है मिनी, क्यों परेशान हो?’

‘‘मैं सरक कर तुम्हारे करीब आ गई. तुम्हारी सांसें अब मेरी सांसों से टकराने लगी थीं. मैं ने अपनी बांहें तुम्हारे गले में डाल दीं. तुम स्पर्श के इस भाव को समझ गए और तुम ने मुझे और अधिक कस कर सीने से लगा लिया और मैं ने अपने अंदर की औरत को समझाया कि आखिर कब तक एक पंछी और इंसान के फर्क में उलझी रहोगी. और मैं ने अपनेआप को तुम्हारे साथ ऐडजस्ट कर ही लिया.’’

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