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Kahani In Hindi : कौन चरित्रहीन – क्यों आभा ने बच्चों की कस्टडी मांगी?

Kahani In Hindi : उसके हाथों में कोर्ट का नोटिस फड़फड़ा रहा था. हत्प्रभ सी बैठी थी वह… उसे एकदम जड़वत बैठा देख कर उस के दोनों बच्चे उस से चिपक गए. उन के स्पर्श मात्र से उस की ममता का सैलाब उमड़ आया और आंसू बहने लगे. आंसुओं की धार उस के चेहरे को ही नहीं, उस के मन को भी भिगो रही थी. न जाने इस समय वह कितनी भावनाओं की लहरों पर चढ़उतर रही थी. घबराहट, दुख, डर, अपमान, असमंजस… और न जाने क्याक्या झेलना बाकी है अभी. संघर्षों का दौर है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. जब भी उसे लगता कि उस की जिंदगी में अब ठहराव आ गया है, सबकुछ सामान्य हो गया है कि फिर उथलपुथल शुरू हो जाती है.

दोनों बच्चों को अकेले पालने में जो उस ने मुसीबतें झेली थीं, उन के स्थितियों को समझने लायक बड़े होने के बाद उस ने सोचा था कि वे कम हो जाएंगी और ऐसा हुआ भी था. पल्लवी 11 साल की हो गई थी और पल्लव 9 साल का. दोनों अपनी मां की परेशानियों को न सिर्फ समझने लगे थे वरन सचाई से अवगत होने के बाद उन्होंने अपने पापा के बारे में पूछना भी छोड़ दिया था. पिता की कमी वे भी महसूस करते थे, पर नानी और मामा से उन के बारे में थोड़ाबहुत जानने के बाद वे दोनों एक तरह से मां की ढाल बन गए थे. वह नहीं चाहती थी कि उस के बच्चों को अपने पापा का पूरा सच मालूम हो, इसलिए कभी विस्तार से इस बारे में बात नहीं की थी. उसे अपनी ममता पर भरोसा था कि उस के बच्चे उसे गलत नहीं समझेंगे.

कागज पर लिखे शब्द मानो शोर बन कर उस के आसपास चक्कर लगा रहे थे, ‘चरित्रहीन, चरित्रहीन है यह… चरित्रहीन है इसलिए इसे बच्चों को अपने पास रखने का भी हक नहीं है. ऐसी स्त्री के पास बच्चे सुरक्षित कैसे रह सकते हैं? उन्हें अच्छे संस्कार कैसे मिल सकते हैं? इसलिए बच्चों की कस्टडी मुझे मिलनी चाहिए… एक पिता होने के नाते मैं उन का ध्यान ज्यादा अच्छी तरह रख सकता हूं और उन का भविष्य भी सुरक्षित कर सकता हूं…’

चरित्रहीन शब्द किसी हथौड़े की तरह उस के अंतस पर प्रहार कर रहा था. मां को रोता देख पल्लवी ने कोर्ट का कागज मां के हाथों से ले लिया. ज्यादा कुछ तो समझ नहीं आया. पर इतना अवश्य जान गई कि मां पर इलजाम लगाए जा रहे हैं.

‘‘पल्लव तू सोने जा,’’ पल्लवी ने कहा तो वह बोला, ‘‘मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूं. सब जानता हूं. हमारे पापा ने नोटिस भेजा है और वे चाहते हैं कि हम उन के पास जा कर रहें. ऐसा कभी नहीं होगा. मम्मी आप चिंता न करें. मैं ने टीवी में एक सीरियल में देखा था कि कैसे कोर्ट में बच्चों को लेने के लिए लड़ाई होती है. मैं नहीं जाऊंगा पापा के पास. दीदी आप भी नहीं जाना.’’

पल्लव की बात सुन कर वह हैरान रह गई. सही कहते हैं लोग कि वक्त किसी को भी परिपक्व बना सकता है.

‘‘मैं भी नहीं जाऊंगी उन के पास और कोर्ट में जा कर कह दूंगी कि हमें मम्मी के पास ही रहना है. फिर कैसे ले जाएंगे वे हमें. मुझे तो उन की शक्ल तक याद नहीं. इतने सालों तक एक बार भी हम से मिलने नहीं आए. फिर अब क्यों ड्रामा कर रहे हैं?’’ पल्लवी के स्वर में रोष था.

कोई गलती न होने पर भी वह इस समय बच्चों से आंख नहीं मिला पा रही थी. छि: कितने गंदे शब्द लिखे हैं नोटिस में… किसी तरह उस ने उन दोनों को सुलाया.

रात की कालिमा परिवेश में पसर चुकी थी. उसे लगा कि अंधेरा जैसे धीरेधीरे उस की ओर बढ़ रहा है. इस बार यह अंधेरा उस के बच्चों को छीनने के लिए आ रहा है. भयभीत हो उस ने बच्चों की ओर देखा… नहीं, वह अपने बच्चों को अपने से दूर नहीं होने देगी… अपने जिगर के टुकड़ों को कैसे अलग कर सकती है वह?

तब कहां गया था पिता का अधिकार जब उसे बच्चों के साथ घर छोड़ने पर मजबूर किया गया था? बच्चों की बगल में लेट कर उस ने उन के ऊपर हाथ रख दिया जैसे कोई सुरक्षाकवच डाल दिया हो.

उस के दिलोदिमाग में बारबार चरित्रहीन शब्द किसी पैने शीशे की तरह चुभ रहा था. कितनी आसानी से इस बार उस पर एक और आरोप लगा दिया गया है और विडंबना तो यह है कि उस पर चरित्रहीन होने का आरोप लगाया गया है जिसे कभी झल्ली, मूर्ख, बेअक्ल और गंवारकहा जाता था. आभा को लगा कि नरेश का स्वर इस कमरे में भी गूंज रहा है कि तुम चरित्रहीन हो… तुम चरित्रहीन हो… उस ने अपने कानों पर हाथ रख लिए. सिर में तेज दर्द होने लगा था.

समय के साथ शब्दों ने नया रूप ले लिया, पर शब्दों की व्यूह रचना तो बरसों पहले ही हो चुकी थी. अचानक ‘तुम गंवार हो… तुम गंवार हो…’ शब्द गूंजने लगे… आभा घिरी हुई रात के बीच अतीत के गलियारों में भटकने लगी…

‘‘मांबाप ने तुम जैसी गंवार मेरे पल्ले बांध मेरी जिंदगी खराब कर दी है. तुम्हारी जगह कोई पढ़ीलिखी, नौकरीपेशा बीवी होती तो मुझे कितनी मदद मिल जाती. एक की कमाई से घर कहां चलता है. तुम्हें तो लगता है कि घर संभाल रही हो तो यही तुम्हारी बहुत बड़ी क्वालिफिकेशन है. अरे घर का काम तो मेड भी कर सकती है, पर कमा कर तो बीवी ही दे सकती है,’’ नरेश हमेशा उस पर झल्लाता रहता.

आभा ज्यादातर चुप ही रहती थी. बहुत पढ़ीलिखी न सही पर ग्रैजुएट थी. बस आगे कोई प्रोफैशनल कोर्स करने का मौका ही नहीं मिला. कालेज खत्म होते ही शादी कर दी गई. सोचा था शादी के बाद पढ़ेगी, पर सासससुर, देवर, ननद और गृहस्थी के कामों में ऐसी उलझी कि अपने बारे में सोच ही नहीं पाई. टेलैंट उस में भी है. मूर्ख नहीं है. कई बार उस का मन करता कि चिल्ला कर एक बार नरेश को चुप ही करा दे, पर सासससुर की इज्जत का मान रखते हुए उस ने अपना मुंह ही सी लिया. घर में विवाद हो, यह वह नहीं चाहती थी.

मगर मन ही मन ठान जरूर लिया था कि वह पढ़ेगी और स्मार्ट बन कर दिखाएगी…

स्मार्ट यानी मौडर्न और वह भी कपड़ों से…

ऐसी नरेश की सोच थी… पर वह स्मार्टनैस सोच में लाने में विश्वास करती थी. जल्दीजल्दी 2 बच्चे हो गए, तो उस की कोशिशें फिर ठहर गईं. बच्चों की अच्छी परवरिश प्राथमिकता बन गई. मगर खर्चे बढ़े तो नरेश की झल्लाहट भी बढ़ गई. बहन की शादी पर लिया कर्ज, भाई की भी पढ़ाई और मांबाप की भी जिम्मेदारी… गलती उस की भी नहीं थी. वह समझ रही थी इसलिए उस ने सिलाई का काम करने का प्रस्ताव रखा, ट्यूशन पढ़ाने का प्रस्ताव रखा पर गालियां ही मिलीं.

‘‘कोई सौफिस्टिकेटेड जौब कर सकती हो तो करो… पर तुम जैसी गंवार को कौन नौकरी देगा. बाहर निकल कर उन वर्किंग वूमन को देखो… क्या बढि़या जिंदगी जीती हैं. पति का हाथ भी बंटाती हैं और उन की शान भी बढ़ाती हैं.’’

आभा सचमुच चाहती थी कि कुछ करे. मगर वह कुछ सोच पाती उस से पहले ही विस्फोट हो गया.

‘‘निकल जा मेरे घर से… और अपने इन बच्चों को भी ले जा. मुझे तेरी जैसी गंवार की जरूरत नहीं… मैं किसी नौकरीपेशा से शादी करूंगा. तेरी जैसी फूहड़ की मुझे कोई जरूरत नहीं.’’

सकते में आ गई थी वह. फूहड़ और गंवार मैं हूं कि नरेश… कह ही नहीं पाई वह.

सासससुर के समझाने पर भी नरेश नहीं माना. उस के खौफ से सभी डरते थे. उस के चेहरे पर उभरे एक राक्षस को देख उस समय वह भी डर गई थी. सोचा कुछ दिनों में जब उस का गुस्सा शांत हो जाएगा, वह वापस आ जाएगी. 2 साल की पल्लवी और 1 साल के पल्लव को ले कर जब उस ने घर की देहरी के बाहर पांव रखा था तब उसे क्या पता था कि नरेश का गुस्सा कभी शांत होगा ही नहीं.

मायके में आ कर भाईभाभी की मदद व स्नेह पा कर उस ने ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमैंट की पढ़ाई की. फिर जब एक कंपनी में उसे नौकरी मिली तो लगा कि अब उस के सारे संघर्ष खत्म हो गए हैं. बच्चों को अच्छे स्कूल में डाल दिया. खुद का किराए पर घर ले लिया.

इतने सालों बाद फिर से यह झंझावात कहां से आ गया. यह सच है कि नरेश ने तलाक नहीं लिया था, पर सुनने में आया था कि किसी पैसे वाली औरत के साथ ऐसे ही रह रहा था. सासससुर गांव चले गए थे और देवर अपना घर बसा कर दूसरे शहर में चला गया था. फिर अब बच्चे क्यों चाहिए उसे…

वह इस बार हार नहीं मानेगी… वह लड़ेगी अपने हक के लिए. अपने बच्चों की खातिर. आखिर कब तक उसे नरेश के हिसाब से स्वयं को सांचे में ढालते रहना होगा. उसे अपने अस्तित्व की लड़ाई तो लड़नी ही होगी. आखिर कैसे वह जब चाहे जैसा मरजी इलजाम लगा सकता है और फिर किस हक से… अब वह तलाक लेगी नरेश से.

अदालत में जज के सामने खड़ी थी आभा. ‘‘मैं अपने बच्चों को किसी भी हालत में इसे नहीं सौंप सकती हूं. मेरे बच्चे सिर्फ मेरे हैं. पिता का कोई दायित्व कब निभाया है इस आदमी ने…’’

‘‘तुम्हारी जैसी महत्त्वाकांक्षी, रातों को देर तक बाहर रहने वाली, जरूरत से ज्यादा स्मार्ट और मौडर्न औरत के साथ बच्चे कैसे सुरक्षित रह सकते हैं? पुरुषों के साथ मीटिंग के बहाने बाहर जाती है, उन से हंसहंस कर बातें करती है… मैं ने इसे छोड़ दिया तो क्या यह अब किसी भी आदमी के साथ घूमने के लिए आजाद है? जज साहब, मैं इसे अभी भी माफ करने को तैयार हूं. यह चाहे तो वापस आ सकती है. मैं इसे अपना लूंगा.’’

‘‘नहीं. कभी नहीं. तुम इसलिए मुझे अपनाना चाहते हो न, क्योंकि मैं अब कमाती हूं. तुम्हें उस अमीर औरत ने बेइज्जत कर के बाहर निकाल दिया है और तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें कमा कर खिलाऊं? नरेश मैं तुम्हारे हाथों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं हूं और न ही तुम्हें बच्चों की कस्टडी दूंगी. हां, तुम से तलाक जरूर लूंगी.

‘‘जज साहब अगर बच्चों को अच्छी जिंदगी देने के लिए मेहनत कर पैसा कमाना चारित्रहीनता की निशानी है तो मैं चरित्रहीन हूं. जब मैं घर की देहरी के अंदर खुश थी तो मुझे गंवार कहा गया, जब मैं ने घर की देहरी के बाहर पांव रखा तो मैं चरत्रिहीन हो गई. आखिर यह कैसी पुरुष मानसिकता है… अपने हिसाब से तोड़तीमरोड़ती रहती है औरत के अस्तित्व को, उस की भावनाओं को अपने दंभ के नीचे कुचलती रहती है… मुझे बताइए मैं चरित्रहीन हूं या नरेश जैसा पुरुष?’’ आभा के आंसू बांध तोड़ने को आतुर हो उठे थे. पर उस ने खुद को मजबूती से संभाला.

‘‘मैं तुम्हें तलाक देने को तैयार नहीं हूं. तुम भिजवा दो तलाक का नोटिस. चक्कर लगाती रहना फिर अदालत के बरसों तक,’’ नरेश फुफकारा था.

केस चलता जा रहा था. पल्लवी और पल्लव को आभा को न चाहते हुए भी केस में घसीटना पड़ा. जज ने कहा कि बच्चे इतने बड़े हैं कि उन से पूछना जरूरी है कि वे किस के साथ रहना चाहते हैं.

‘‘हम इस आदमी को जानते तक नहीं हैं. आज पहली बार देख रहे हैं. फिर इस के साथ कैसे जा सकते हैं? हम अपनी मां के साथ ही रहेंगे.’’

अदालत में 2 साल तक केस चलने के बाद जज साहब ने फैसला सुनाया, ‘‘नरेश को बच्चों की कस्टडी नहीं मिल सकती और आभा पर मानसिक रूप से अत्याचार करने व उस की इज्जत पर कीचड़ उछालने के जुर्म में उस पर मानहानि का मुकदमा चलाया जाए. ऐसी घृणित सोच वाले पुरुष ही औरत की अस्मिता को लहूलुहान करते हैं और समाज में उसे सम्मान दिलाने के बजाय उस के सम्मान को तारतार कर जीवन में आगे बढ़ने से रोकते हैं. आभा को परेशान करने के एवज में नरेश को उन्हें क्व5 लाख का हरजाना भी देना होगा.’’

आभा ने नरेश के आगे तलाक के पेपर रख दिए. बुरी तरह से हारे हुए नरेश के सामने कोई विकल्प ही नहीं बचा था. दोनों बच्चों के लिए तो वह एक अजनबी ही था. कांपते हाथों से उस ने पेपर्स पर साइन कर दिए. अदालत से बाहर निकलते हुए आभा के कदमों में एक दृढ़ता थी. दोनों बच्चों ने उसे कस कर पकड़ा था. Kahani In Hindi

Hindi Stories Love : ऐसे ही आती रहना – स्त्रीपुरुष की संदेहजनक दोस्ती

Hindi Stories Love : शुभी का शक करना भी सही था लेकिन विशाखा ने जिस निर्मल और सहज हृदय के साथ शुभी की सेवापानी की, उस से उस ने प्रोफैसर और शुभी के दिलों में अपनी जगह बना ली.

वह आज आ रही है, यह सोच कर ही मेरा मन बल्लियों उछल रहा है. वह आएगी, मेरे सामने बैठेगी, उस के बारे में सोच कर और किसी बहाने से उस से फोन पर बात करने के बाद मेरे लिए खुद को संभालना काफी मुश्किल होता है. फिर, आज तो वह मेरे सामने होगी, यह सोच कर ही मैं रोमांच से भर उठता हूं. यद्यपि मैं जानता हूं कि इस अवसर पर मुझे रोमांच से नहीं भरना चाहिए पर क्या करूं, उस के आने की सूचना मात्र से ही मेरा रोमरोम हर्षित हो उठता है. मुझे आज भी याद है, 3 वर्ष पहले भी वह जब आने वाली थी तब भी सुबह से ही मैं ने घर सिर पर उठा रखा था और वही हाल मेरा आज भी है. जब से उस के आने की सूचना मिली है, मैं थोड़ीथोड़ी देर में किचन में जाता हूं और शुभी से कहने लगता हूं, ‘‘शुभि, उन्हें ये पसंद है, उन्हें खाने में बिना मिर्चमसाले की सब्जी पसंद है. शुभी, तुम्हें याद है न जब वे यहां थे तब वह अकसर बिना प्याजलहसुन की सब्जी बनाती थी. मेरी इतनी उत्सुकता और उतावलापन देख कर शुभी हंसते हुए कुछ मजाकिया अंदाज में बोल पड़ी, ‘‘इतना तो आप अपनी बेटी के आने पर उतावले नहीं होते जितने आज हो रहे हो.’’
‘‘तुम्हीं तो कहती हो कि कोई आता है तो उस का ध्यान रखना अपनी जिम्मेदारी है. अब तुम अकेली परेशान न हो, इसलिए ही तो मैं तुम्हारी मदद करने की कोशिश कर रहा था. अगर तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा तो ठीक है, मैं जा कर टीवी देखता हूं. करो तुम अकेली ही सारा काम, मुझे क्या,’’ कुछ बनावटी सा गुस्सा दिखाते हुए मैं ने कहा.
‘‘अरे नहींनहीं, चलो जब तक मैं किचन का बाकी काम निबटा व नहा कर आऊं, तुम डाइनिंग टेबल सैट कर दो. वे लोग आएंगे तो सभी बैठ कर बातें करेंगे.’’ यह कह कर शुभी नहाने चली गई और डाइनिंग टेबल पर जरूरी सामान रख कर मैं बालकनी में आ कर बैठ गया. कुछ देर बाद शुभी 2 कप चाय ले कर मेरे बगल में आ कर बैठ गई. शुभी को पता है कि मौसम कोई भी हो, चाय मेरी कमजोरी है. चाय पीतेपीते शुभी बोली, ‘‘विशाखा अपने पति के साथ पहली बार आ रही है. चलो अच्छा ही हुआ कि उस ने शादी कर ली वरना मातापिता का साथ कब तक रहता है.’’
‘‘हूं, बात तो सही है.’’ इस के बाद शुभी बाकी के काम करने चली गई और मैं खो सा गया कुछ पुरानी यादों में.

हां, तो मैं आप को बता दूं कि वर्तमान में मैं यानी अंशुमान मिश्रा एक कालेज से रिटायर्ड प्रोफैसर हूं. मेरे परिवार में एक बेटी और एक बेटा हैं, दोनों विवाहित हैं और अमेरिका में सैटल्ड हैं. शुभी मेरी पत्नी है और सेवानिवृत्त होने के बाद पत्नी के साथ सुखी वैवाहिक जीवन का आनंद ले रहा हूं. उन दिनों मैं आगरा के सैंट जौंस कालेज में इतिहास विषय का हैड औफ द डिपार्टमैंट था जब मेरा परिचय विशाखा से हुआ था. मेरी सेवानिवृत्ति में 3 वर्ष थे और उस दिन मैं कुछ दिनों बाद ही कालेज में होने वाले इतिहास के एक सैमिनार की तैयारी में बिजी था कि उसी समय मेरे दरवाजे पर ‘मे आई कम इन, सर’ की आवाज सुन कर चौंक गया था.

जब सिर उठा कर देखा तो सामने एक सुंदर बाला को देख कर मन हर्षमिश्रित आश्चर्य से भर गया. दूधिया सफेद रंग, कंजी आंखें, कमर तक सर्प जैसी लहराती चोटी, लगभग 6 फुट की लंबाई और करीने से बांधी गई प्रिंट की प्योर सिल्क की साड़ी में वह बाला मु?ो किसी आसमान से उतरी परी जैसी प्रतीत हुई थी. मैं अपलक उसे देखने में इस कदर खो गया कि विशाखा का ‘मे आई कम इन सर,’ ?भी मुझे सुनाई ही नहीं पड़ा था.

जब विशाखा ने फिर से अपना प्रश्न दोहराया तो मैं ने कहा, ‘‘ओह, आइएआइए मैडम, प्लीज कम.’’
‘‘सर, आई एम विशाखा शर्मा, इतिहास की न्यू लैक्चरर.’’
‘‘यस, आई नो अबाउट यू, प्लीज सिट,’’ मैं ने अपने सामने पड़ी कुरसी की तरफ इशारा कर के विशाखा से कहा.
उस दिन की औपचारिक बातचीत के बाद विशाखा तो चली गई पर 59 साल की उम्र में भी मेरे ऊपर मानो उस का जादू चढ़ गया था. उस के बोलने के अंदाज और बला की खूबसूरती पर मैं तो पहली नजर में ही बोल्ड हो गया था. इस के बाद अकसर विशाखा से मिलना होता ही रहता था. आश्चर्य की बात यह थी कि तन के साथसाथ विशाखा इंटैलिजैंसी में भी किसी से कम न थी. यही नहीं, थोड़े ही समय में कालेज में भी उस ने खासी लोकप्रियता हासिल कर ली थी.

कालेज में आगामी कुछ दिनों में ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम’ विषय पर एक राष्ट्रीय स्तर का सैमिनार होने वाला था, चूंकि मैं हैड औफ द डिपार्टमैंट था और इतिहास विषय के फिलहाल हम 2 ही प्रोफैसर थे, सो आजकल तैयारी के सिलसिले में विशाखा से अकसर मुलाकात होने लगी थी. हमेशा वैल ड्रैस्ड रहना, किसी भी मुद्दे पर अपनी स्पष्ट राय देना, खिलखिला कर हंसना और देशदुनिया के बारे में उस की जागरूकता देख कर मैं अकसर दंग रह जाता था. उस दिन काम करतेकरते काफी देर हो गई.
जब हम दोनों कालेज से निकले तो मैं ने उसे उस के घर छोड़ने का औफर दिया जिसे उस ने बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया. रास्ते में कार चलाते हुए मैं ने उस के परिवार के सदस्यों के बारे में पूछा तो उस ने बहुत अल्प शब्दों में उत्तर दिया, ‘‘सर, मैं मूलतया कानपुर की रहने वाली हूं, यहां अपने मातापिता के साथ रहती हूं.’’

संक्षिप्त सा उत्तर दे कर वह चुप हो गई. मुझे लगा कि शायद वह इस के आगे कुछ और नहीं बताना चाहती, इसलिए मैं भी चुप हो गया पर तो क्या लगभग 40 की होने के बाद भी विशाखा अविवाहित है या फिर कोई और बात है, मैं इसी विचार में पड़ा था कि अचानक विशाखा की आवाज सुनाई दी, ‘‘सर, बस यहीं छोड़ दीजिए, अगले टर्न के कौर्नर पर मेरा घर है.’’
विशाखा की आवाज से मैं एकदम चौंका और बोला, ‘‘अरे नहींनहीं, मैं घर पर ही छोड़ देता हूं.’’ यह कह कर मैं ने गाड़ी मोड़ दी. विशाखा को उस के घर पर छोड़ कर मैं अपने घर की तरफ चल दिया. रात के 9 बजे का समय सभी के अपने घर लौटने का समय होता है. आजकल ट्रैफिक ने हर जगह अपने पांव इतने अधिक पसार लिए हैं कि हर शहर दिल्ली के ट्रैफिक को मात देने लगा है. सो, मेरी गाड़ी भी मंदमंद गति से ही चल रही थी.
जैसे ही घर पहुंचा, हैरानपरेशान सी शुभी को बालकनी में चक्कर काटते हुए पाया. मुझे देखते ही उस ने ‘कहां चले गए थे आज? कब से फोन लगा रही हूं? उठा क्यों नहीं रहे थे?’ जैसे अनेक सवाल दाग दिए.
‘‘अरे भाई, मुझे घर के अंदर आने दोगी कि नहीं,’’ कह कर मैं ने घर में प्रवेश किया और शुभी मेरे पीछेपीछे आ गई.
‘‘अरे, आज जो नई लैक्चरर आई है, उस को घर छोड़ना था, इसलिए देर हो गई.’’
‘‘और फोन क्यों नहीं उठा रहे थे. जब उठाते नहीं हो तो फोन खरीदा क्यों है,’’ शुभी कुछ तैश में बोली.
‘‘सैमिनार की तैयारी कर रहे थे, इसलिए फोन साइलैंट मोड पर कर दिया था और औन करना भूल गया था. अब चाय भी पिलाओगी या झगड़ा ही करती रहोगी, मेरी जानेमन.’’ मैं ने कुछ प्यार से शुभी के गाल पर एक किस्सी जड़ दी थी और शुभी ‘‘तुम भी न, इस उम्र में भी’’ कह कर शरमाती हुई चली गई थी और मैं फ्रैश होने बाथरूम में.

शुभी के साथ यही समस्या थी कि 55 की उम्र में ही वह खुद को 80 की समझने लगी थी. जरा भी रोमांस का मूड बनाओ तो झिड़क देती थी. मैं अभी कुछ और मधुर स्मृतियों में गोता लगाता कि तभी शुभी का स्वर मेरे कानों में पड़ा, ‘‘अरे आप को बाजार से कुछ मिठाइयां लानी थीं न, भूल गए क्या?’’
‘‘अरे हां, जाता हूं बस,’’ कह कर मैं ने बैग और कार की चाबी ली और चल दिया बाजार.
बाजार से आ कर मैं ने शुभी से पूरी तैयारियों का जायजा लिया और आ कर अपने बैडरूम में टीवी के सामने जम गया. मेरी आंखें तो टीवी स्क्रीन पर थीं पर मन फिर दौड़ लगाते हुए आज से लगभग 8 वर्ष पहले जा पहुंचा जब विशाखा से मेरी अनौपचारिक मुलाकातें होने लगी थीं. मुझे उस की नजदीकी एक सुकून देने लगी थी, मेरी हर समस्या का सौल्यूशन उस के पास होता था. उस के चेहरे की जरा सी उदासी मुझे परेशान कर देती थी. चूंकि इतिहास के हम 2 ही प्रोफैसर थे, सो विभिन्न शहरों में होने वाले कालेज के सैमिनारों में भी हम दोनों ही जाते थे.

मेरी विशाखा से बढ़ती नजदीकियों ने कब शुभी के मन में शक का बीज बो दिया, मुझे पता ही न चला जबकि शुभी के प्रति मेरे व्यवहार में लेशमात्र भी बदलाव नहीं था. एक दिन जब रात को मैं काफी लेट घर पहुंचा तो दरवाजा खोलते ही शुभी के बदले तेवर देख कर हैरान रह गया, ‘‘इतनी देर कैसे हो गई?’’
‘‘अरे, तुम्हें बताया तो था कि आजकल कालेज में बहुत काम है.’’
‘‘क्या हर समय कामकाम लगाए रहते हो, मुझे सब पता है क्या, कितना और कैसा काम चल रहा है आजकल.’’
‘‘क्या हुआ शुभी, ये उलटीसीधी बातें क्यों कर रही हो?’’ मैं ने आश्चर्य से कहा.

‘‘इतने दिनों से देख रही हूं, तुम उस नई लड़की विशाखा को ले कर कुछ ज्यादा उत्साहित नहीं रहते हो. मिसेज बंसल भी आज मुझे बता रही थीं कि आजकल तुम दोनों बस आपस में ही लगे रहते हो. घंटों स्टाफरूम में बैठ कर अपनी ही बातें करते रहते हो. आज ही मुझे समझ आया कि आजकल तुम देर से क्यों आते हो,’’ शुभी ने हम दोनों पर आरोप लगाते हुए कहा.
‘‘ओहो, क्या हो गया है तुम्हारी बुद्धि को, जियोग्राफी के प्रोफैसर बंसल की पत्नी मिसेज बंसल को तुम जानतीं नहीं क्या कितनी पंचायती है, कालेज के हर इंसान के बारे में तरहतरह की बातें बनाना उस का काम है. तुम उस की बातों पर भरोसा कर रही हो. मुझ से लगभग 20 वर्ष छोटी होगी वह और तुम.’’ मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इस समस्या का निदान कैसे करूं. खैर, गुस्से में डाइनिंग टेबल पर चाय छोड़ कर मैं अपने रूम में आ गया.

विशाखा को कालेज जौइन किए 8 माह हो गए थे. विशाखा मुझे अच्छी लगती थी, यह सही था परंतु उस में प्यार, प्रेम या वासना जैसा भाव कभी नहीं था. हम स्टाफरूम में बैठ कर देश, दुनिया और समाज के विभिन्न मुद्दों पर घंटों बातें करते रहते थे. विशाखा का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि मैं खुद उस तरफ खिंच जाता था. एक दिन जब मैं विशाखा को घर छोड़ने आ रहा था तो वह बोली, ‘सर, आप के परिवार में कौनकौन है?’
‘विशाखा, मेरी एक बेटी और बेटा है. दोनों ही अपने परिवार के साथ यूएस में सैटल्ड हैं. यहां पर मैं अपनी पत्नी शुभी के साथ रहता हूं. चलो, आज मैं तुम्हें शुभी से मिलवाता हूं.’ शायद विशाखा से मिलने के बाद शुभी का शक का कीड़ा निकल जाए, इसलिए मैं ने विशाखा के सामने घर चलने का प्रस्ताव रख दिया.
‘सर, मैं श्योर आप के साथ चलती पर आज मुझे घर जा कर मांपापा को डाक्टर के पास ले जाना है. अगली बार मैं मेम से मिलने जरूर चलूंगी.’
‘क्यों, क्या हुआ पापामम्मी को?’
‘नहीं सर, हुआ तो कुछ नहीं है पर रूटीन चैकअप करवाना है ताकि एकदम से कोई मुसीबत न आ जाए वैसे भी यह शहर मेरे लिए नया है.’

‘अरे, तुम चिंता क्यों करती हो, जब कभी कोई भी जरूरत हो तो जरूर बताना. कभी भी अकेला मत समझना खुद को. वैसे, तुम बुरा न मानो तो एक बात पूछूं. तुम्हारे परिवार में और कौनकौन है.’’ न जाने क्यों मैं उस के परिवार के बारे में जानने को बहुत उत्सुक था.’
‘सर, मैं ने बताया था न आप को, बस मैं और मेरे मातापिता,’ विशाखा ने कहा तो इस बार मैं थोड़ा ज्यादा खुल गया और कहा, ‘तो आप ने विवाह…’ आगे के शब्द लाख चाहने पर भी मेरे मुंह से निकल ही नहीं पाए.
‘सर, बहुत लंबी दास्तान है, क्या करेंगे सुन कर,’ विशाखा ने उदास स्वर में कहा.
‘विशाखा, एक बात कहूं, कभीकभी कहने से मन हलका हो जाता है, इसलिए चाहो तो कह डालो. अभी तो तुम्हारा घर दूर है.’ मैं मानो विशाखा की जिंदगी का सबकुछ जान लेना चाहता था.

‘सर, आम लड़कियों की भांति मेरी भी शादी एक अच्छे खातेपीते परिवार में हुई थी. उस समय मैं ग्रेजुएशन कर रही थी और पोस्टग्रेजुएट कर के आगे नैट की परीक्षा देना चाहती थी पर अचानक से मेरी मौसी एक रिश्ता ले कर आ गईं. लड़के वाले उन के दूर के किसी रिश्तेदारी में थे. वे एक दिन आए और मैं उन्हें पसंद आ गई थी. उन लोगों का एक्सपोर्टइंपोर्ट का बिजनैस था. पैसे वाले लोग थे. पापामम्मी को लगा कि इकलौती लड़की है, अच्छा घरपरिवार मिल रहा है तो आननफानन शादी कर दी.
‘शादी के समय मुझे आगे पढ़ने के लिए भी सहमति दी गई थी पर बाद में सब भुला दिया गया. उन के परिवार में महिलाओं को बिजनैस के लिए यूज किया जाता था. पार्टियों में सजाधजा कर मूर्तियों की तरह बैठा देते और विरोध करने का मतलब मारपीट और गालीगलौज. महिलाओं का अस्तित्व ही सिर्फ यही था कि वे बिजनस के लिए आने वाले क्लाइंट्स के लिए पार्टियों की व्यवस्था करें. हम महिलाओं को तो अपनी बात कहना दूर, मुंह खोलने तक की इजाजत न थी.
‘मेरे लिए ये सब बहुत असहनीय था. जिस परिवार में मेरी ही इज्जत नहीं थी वहां आगे चल कर मेरे मातापिता की क्या इज्जत होगी. ऐसे में जरूरत पड़ने पर मैं अपने मातापिता के लिए क्या कर पाऊंगी, यह सब सोच कर दिल घबरा उठता था. फिर एक दिन पिताजी को हार्ट अटैक आया. मां के अकेले होने के बाद भी मुझे रुकने की परमिशन नहीं दी गई क्योंकि कोई विदेशी क्लाइंट आने वाला था जिस के लिए मेरा वहां रहना जरूरी था. इस स्थिति में मां को अकेला छोड़ कर जाने से मैं ने मना कर दिया तो मेरे पति ने गुस्से से कहा कि फिर दोबारा घर आना भी मत.
‘उस के बाद मेरा जाने का भी मन नहीं किया और जब मेरे मातापिता को सच्चाई का पता चला तो उन्होंने कहा, ‘अब तुम्हें भी वहां जाने की जरूरत नहीं है, ऐसे घर में जीवन नहीं काटा जा सकता जहां इंसान की भावनाओं की कोई कीमत न हो. उस के बाद सर, मैं ने पोस्टग्रेजुएट किया, फिर एक तरफ नैट की परीक्षा दी और दूसरी तरफ पति को तलाक का नोटिस. सर, मैं भी ऐसा कलहपूर्ण जीवन नहीं जीना चाहती थी क्योंकि मुझे हमेशा लगता है कि जिंदगी जीने के लिए है न कि ढोने के लिए. नैट में मेरा पहली बार में ही चयन हो गया था और पीएचडी कर के अब आप के जैसे विद्वान प्रोफैसर के अंडर में काम कर रही हूं,’ कह कर विशाखा चुप हो गई.
‘ओह, यू कैन कौल मी एनी टाइम.’ अब तक विशाखा का घर भी आ चुका था. सो, मैं ने उसे उतारा और आगे गाड़ी बढ़ा दी. विशाखा की दास्तान सुनने के बाद मेरी उस के प्रति सहानुभूति बढ़ गई थी. इस के बाद तो विशाखा भी मुझ से काफी खुल गई थी और मैं भी. अकसर लोग एक स्त्रीपुरुष की मित्रता को संदेहास्पद नजरों से देखने लगते हैं पर मुझे हमेशा लगता है कि तन की भूख से अधिक आवश्यक है इंसान की दिमागी भूख का शांत होना.

शुभी एक बहुत अच्छी पत्नी है, इस में कोई शक नहीं है लेकिन उस की दुनिया घरपरिवार, बच्चे, किटी पार्टियों, साड़ीगहनों तक सीमित है. यह सही है कि जिंदगी के हर मोड़ पर उस ने मेरा खुशीखुशी साथ दिया है लेकिन फिर भी कुछ है जो विशाखा में शुभी से अलग है, कुछ है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. आम महिलाओं से उस में कुछ अलग है जिस से मुझे उस से बात करना अच्छा लगता है. विशाखा एकदम खुले विचारों वाली महिला थी. हां, कभी भी मेरे मन में उस के प्रति गलत भाव या आसक्ति के भाव नहीं आए. हमारी दोस्ती थी गंगा की तरह निर्मल, पवित्र, सरल और सहज जिसे जीना अच्छा लगता था. जो बोरिंग जिंदगी में रंग भर देती थी. वह मुझ से बहुत छोटी लेकिन फिर भी कुछ साम्य था जो हमें किसी मोड़ पर नजदीक ला देता था, जो मुझे अच्छा लगता था पर अब शुभी को समझना सब से बड़ी समस्या थी.

जिंदगी अपने तरीके से अपने ही ढर्रे पर चल रही थी पर कहते हैं न कि जिंदगी हर दिन नए सवाल और नए चैलेंज ले कर आती है. सो, एक दिन रात को शुभी के पेट में भयंकर दर्द उठा. मैं तुरंत उसे हौस्पिटल ले कर पहुंचा. 2 दिन तक तमाम टैस्ट होने के बाद डाक्टर ने उस के यूट्रस की लेयर के काफी मोटी होने के कारण कैंसर की आशंका जताई. कैंसर नाम सुनते ही मेरे होश उड़ गए. मेरे चेहरे के उड़े रंग को देख कर डाक्टर बोले, ‘नथिंग अबाउट वरी. वी विल रिमूव यूट्रस एंड आफ्टर देन वी सेंट इट फौर कैंसर डायग्नोसिस. मे बी इट इज नौट कैंसरस.’

अपनी मां के बारे में जान कर दोनों बच्चों ने इंडिया आने की इच्छा जताई पर मैं ने कहा, ‘अभी तो सारा काम हौस्पिटल का ही रहेगा. आजकल बहुत अच्छे हौस्पिटल होते हैं जहां केवल पैसा देना होता है. जब तुम्हारी मां ठीक हो कर घर आ जाए तब आना तो उस के साथ रहोगे तो उसे अच्छा लगेगा.’

बच्चों को भी मेरी बात समझ आ गई और उन्होंने अगले माह का आने का टिकट करवा लिया. 3 दिन से मैं कालेज नहीं गया था और इस बीच व्यस्तता के कारण आने वाले फोन कौल्स का जवाब भी नहीं दिया था. विशाखा के 10 फोन कौल्स देख कर मैं ने उसे फोन लगाया तो वह लगभग मुझे डांटती हुई बोली, ‘क्या सर, फोन आप रखते किसलिए हैं जब उठाना नहीं होता. कितने कौल्स किए मैं ने आप को.’
‘‘अरे, वह शुभी को…’’ कहते हुए मैं ने पूरी दास्तान उसे सुना दी.
‘‘अरे, इतनी बड़ी बात हो गई और आप ने मुझे बताया तक नहीं. एक फोन तो करना था,’’ कह कर उस ने फोन रख दिया.
इस के एक घंटे बाद ही विशाखा मेरे सामने थी. ‘अरे सर, दीदी को इतनी परेशानी थी, आप अकेले थे पर बताया क्यों नहीं?’

इस के बाद तो विशाखा ने शुभी की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी. उस के औपरेशन होने से ले कर घर आने तक विशाखा उस के साथ छाया की तरह रही. उस की हर छोटीछोटी बात का ध्यान रखती थी विशाखा. ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर आदि भी अकसर वह अपने घर से ले कर आती या फिर हमारे घर आ कर बना देती थी. धीरेधीरे शुभी और विशाखा की बढ़ती नजदीकी मुझे बड़ा सुकून दे रही थी कि शायद अब शुभी के मन का संदेह दूर हो पाए. लगभग एक माह बाद शुभी पूरी तरह ठीक हो गई थी और सब से बड़ी संतोषजनक बात यह थी कि शुभी के यूट्रस की रिपोर्ट भी कैंसरस नहीं थी.

ठीक होने के लगभग एक सप्ताह बाद शुभी ने एक दिन सुबह मुझ से कहा, ‘आज शाम को कुछ गेस्ट डिनर पर आने वाले हैं. आते समय रसमलाई और बटरस्कौच आइसक्रीम लेते आना. यह मत पूछना कि कौन आ रहा है. यह मेरी तरफ से तुम्हारे लिए सरप्राइज है.’ मैं ने सोचा कि शायद शुभी की कुछ फ्रैंड्स आ रही होंगी और ज्यादा दिमाग न लगा कर मैं कालेज चला गया.

शाम को जब मैं कालेज से लौटा तो देखा, शुभी ने घर को बहुत खूबसूरती से सजा रखा था. मैं कुछ समझ पाता, उस से पहले ही कौलबेल बजी और किचन में से शुभी ने मुझ से दरवाजा खोलने को कहा. मैं ने जैसे ही दरवाजा खोला तो विशाखा को अपने मातापिता के साथ देख कर हैरान रह गया. तभी शुभी मेरे पीछे से आई और बोली, ‘मिश्राजी, चौंकिए मत, मिलिए मेरी छोटी बहन विशाखा और उस के मम्मीपापा यानी मेरे अंकलआंटीजी.’

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. सो, यंत्रवत मैं ने अपने दोनों हाथ नमस्ते की मुद्रा में उन के सामने जोड़ दिए थे. शुभी का बदला स्वरूप मुझे सुकून देने वाला भी था और हैरत करने वाला भी. उस दिन जब वे लोग खाना खा कर चले गए तो कुछ अंतरंग क्षणों में शुभी ने मेरे दोनों हाथों को अपने हाथ में ले लिया और बोली, ‘मुझे माफ कर दो, मिश्राजी. मुझे आज खुद अपनी छोटी सोच पर शर्म आ रही है. विशाखा बहुत अच्छी लड़की है.’
‘मुझे अच्छा लगा कि तुम ने शक किया, आखिर मुझे पता तो चला कि इस उम्र में भी तुम मेरे ऊपर अपना पूरा अधिकार समझती हो,’ कहते हुए मैं ने शुभी को अपनी तरफ खींच कर बांहों में कैद कर लिया. उस दिन शुभी भी बिलकुल नवविवाहिता की तरह मेरे सीने से चिपक गई.

मेरे रिटायरमैंट के 3 साल बाद तक भी विशाखा आगरा में ही रही. इन 3 सालों में अकसर वह मेरे पास आती रहती थी कालेज के किसी न किसी काम से और यदि कभी वह नहीं आ पाती थी तो मैं ही इतिहास विभाग में जा कर बैठ जाता था जिस से विशाखा के साथसाथ अन्य लोगों से भी मुलाकात हो जाया करती थी. 6 साल तक आगरा में रहने के बाद विशाखा का ट्रांसफर आगरा से दिल्ली हो गया था.

रिटायर्ड हैड औफ द डिपार्टमैंट होने के कारण मुझे भी उस की फेयरवेल में बुलाया गया था. उस दिन जब मैं घर आया था तो मेरा उदास चेहरा देख कर शुभी कुछ व्यंग्य सा करते हुए बोली, ‘‘आज आप बहुत दुखी लग रहे हो. चिंता मत करो, विशाखा मुझे दीदी कहती है, कभी भी बुला लूंगी.’’

कुछ दिनों बाद वहीं पर उस ने अपने एक सहकर्मी के साथ विवाह कर लिया था. उस के जाने के बाद सच कहूं तो मैं बहुत अकेला सा हो गया था. अब कोई ऐसा नहीं था जिस से मैं खुल कर बातें कर सकूं. एक दिन मेरा बहुत मन कर रहा था कि उस से बात करूं पर वह क्या सोचेगी, यह सोच कर रुक गया. फिर मन नहीं माना तो मैं ने विवाह की बधाई देने के बहाने मोबाइल पर उस का नंबर घुमा दिया था.

इस तरह किसी महिला को मैं पहली बार फोन कर रहा था, सो, न जाने क्यों मेरी आवाज उस दिन कांप सी गई थी पर जैसे ही उस ने उधर से फोन उठाया, ‘‘हैलो सर, कैसे हैं आप? और शुभी दी कैसी हैं?’’

वही जानीपहचानी खिलखिलाहट सुन कर दिल खुश हो गया. यही नहीं, उस की आवाज कानों में पड़ते ही मानो मेरे दिल की अनेक घंटियां बजने लगी थीं. दिल बाघबाघ हो गया था. दिल के सोए तार झंकृत होने लगे थे. खुद को कुछ संभालते हुए मैं ने कहा, ‘‘विशाखा, बहुतबहुत बधाई. मैं ने सोचा, मैसेज की जगह फोन पर ही बधाई दी जाए ताकि आप की आवाज भी सुनने को मिल जाए.’’

यह सुनते ही वह खिलखिला कर हंस पड़ी थी और मैं उस की खिलखिलाहट में खो सा गया था. अभी मैं उस की खिलखिलाहट में खोया ही था कि विशाखा ने अपने पति से बात करवाई. काफी खुश लग रही थी वह. मुझे इस से कोई फर्क ही नहीं था कि वह अब शादीशुदा है पर मुझे उस का साथ अच्छा लगता था और वह भी खुले विचारों वाली थी और हमारी दोस्ती को सम्मानजनक नजरिए से देखती थी.

मेरा और उस का बौद्धिक स्तर कुछ हद तक एक था, जिस से मुझे उस से बातें करना अच्छा लगता था. यही कारण था कि जब 3 दिनों पहले उस का फोन आया, ‘‘सर, परसों कालेज में एक सैमिनार है, मैं और सोमेश आ रहे
हैं आगरा.’’
‘‘अरेअरे, मोस्ट वैलकम. बताओ कौन सी ट्रेन से आ रही हो, मैं लेने स्टेशन पर आ जाऊंगा. रुकना घर पर ही है. तुम से मिल कर शुभी बहुत खुश होगी,’’ मैं ने खुश होते हुए कहा तो वह बोली, ‘‘सर, आप और दीदी परेशान क्यों होते हैं, कालेज वालों ने रुकने का इंतजाम ताज होटल में किया है.’’
‘‘अरे नहींनहीं, कोई परेशानी नहीं है. हां, ताज होटल जैसा तो नहीं है मेरा घर.’’
‘‘नहीं सर, वह बात नहीं है. ठीक है, सर, परसों मिलते हैं. मुझे भी आप लोगों से मिलना बहुत अच्छा लगता है.’’
और तब से ही मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है. मैं तो अभी भी विशाखा के खयालों में खोया था तभी शुभी की आवाज मेरे कानों में पड़ी, ‘‘देखो न, घंटी कब से बज रही है. तुम भी न, कानों में रुई लगाए हो क्या.’’
शुभी की आवाज सुन कर मैं ने झट दौड़ लगाई और पट से दरवाजा खोल दिया. सामने वही वैल ड्रैस्ड, हंसता हुआ चेहरा लिए विशाखा खड़ी थी.
‘‘आओआओ,’’ कह कर मैं ने उन्हें अंदर बुलाया.
विशाखा का पति सोमेश भी बहुत हैंडसम था. विशाखा जहां शुभी से बातें करने में व्यस्त थी वहीं मैं सोमेश से. विशाखा अब पहले से और भी अधिक खूबसूरत हो गई थी. शादी के बाद उस का रूप निखर गया था. मैं भले ही सोमेश से बातें कर रहा था पर कनखियों से विशाखा को भी जीभर कर देख लेता था. 2 दिनों तक विशाखा हमारे साथ रही. आज विशाखा के जाने का दिन था. जाते समय मैं ने भारी मन से उस से कहा कि ऐसे ही आती रहना. मिलनाजुलना होता रहेगा तो अच्छा रहेगा. Hindi Stories Love

Operation Sindoor : सिंदूर का राजनीतिकरण

Operation Sindoor : भारतीय जनता पार्टी पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा की गई हत्याओं को उसी तरह भुना रही है जैसे महाभारत में युधिष्ठिर की जुआ खेलने की गलत आदत के नाम पर गीता के उपदेश को देश पर थोप कर की गई थी. पहलगाम में हुई 26 निर्दोष भारतीयों की मौतों की जिम्मेदारी मोदी के कंधे पर न आ जाए, इस के लिए पाकिस्तान पर बमबारी की गई और 4 दिनों में ही बिना वाजिब कारण बताए, बिना कोई ठोस परिणाम के ‘दूसरों’ के कहने पर बंद कर दी.

पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने पहलगाम में अपने कुकृत्य से भारतीय औरतों के सिंदूर को मिटा डाला था जिस का औपरेशन सिंदूर को अमल में ला कर बदला ले लिया गया. लेकिन अब पूरी भारतीय जनता पार्टी देश में उन सधवाओं को सिंदूर बांटती फिर रही है जिन के पति सुरक्षित हैं.

युधिष्ठिर का जुआ खेलना गलत था, द्रौपदी का हरण गलत था, मिले राज्य को खोना गलत था पर फिर भी कुरुक्षेत्र का युद्ध धर्मयुद्ध बना डाला गया और दुर्योधन को खलनायक बना डाला जबकि परिवार के सारे बड़ेबूढ़े दुर्योधन के साथ थे.

अपनी गलतियों को छिपाना और उन पर पानी फेरना हमारी संस्कृति का हिस्सा है. शकुंतला का दुष्यंत से प्रेम एक तरह से अनैतिक था पर उन के बेटे को भरत का नाम दे दिया गया. हिरण्यकश्यप अपने पुत्र को अपनी तरह से चलाना चाहता था पर उस की बहन और नरसिंह अवतार को ला कर उसे मिला राज उस से छीन लिया गया. गलती देवताओं की थी उन्होंने दस्यु राजा के हाथों पराजय क्यों पाई? उस गलती को स्वीकार न कर हिरण्यकश्यप के बेटे प्रहलाद का महिमामंडन कर डाला गया.

औपरेशन सिंदूर वैसा ही था. सिंदूर लगाना अपनेआप में एक विवादास्पद काम है क्योंकि यह एक औरत की निजता पर सामाजिक प्रहार है. ब्रेनवाश हुई औरतें इसे लगा भी रही हैं तो यह देश केवल हिंदू सधवाओं का तो नहीं है कि देशरक्षा को सिर्फ विवाहित औरतों से जोड़ा जाए. उस से ज्यादा शिकायत की बात यह है कि अब भारतीय जनता पार्टी वाले कमल वाला दुपट्टा डाल कर, कमल वाली टोपी पहन कर सिंदूर बांट रहे हैं जो कोरा चुनावी नारा ही है. 26 लोगों की लाशों पर दुख प्रकट करने के स्थान पर विवाहित औरतों के खोए जीवनसाथियों के नाम पर कमल चुनावचिह्न वाली भाजपा का वोट बटोरना घोर अनैतिकता वाला काम है. महाभारत के युद्ध की तरह यह एक अधर्म युद्ध है.

देश की रक्षा करने के लिए देश का हर व्यक्ति तैयार है. जो लड़ सकता है वह लड़ेगा. जो लड़ नहीं सकता वह टैक्स दे कर हथियारों के खरीदने, सेना को सहायता देने आदि को तैयार है. लेकिन देशरक्षा को जब पार्टीरक्षा बना दिया जाएगा तो आपत्ति होगी ही. औपरेशन सिंदूर अगर सेना ने नाम दिया था तो किसी राजनीतिक पार्टी को कोई हक नहीं कि वह इस को रातदिन भुनाती रहे.

Hindu : भागवत कथा सुनने वालों में महिलाओं की संख्या अधिक क्यों होती है?

Hindu : कथा सुनने वालों में महिलाओं की संख्या सब से अधिक क्यों होती है? कथावाचक कथा से ज्यादा सासबहू के सीरियल वाली कहानियां अधिक सुनातें हैं. इस के बाद रोचक अंदाज में समाधान भी देते हैं. क्या यह महिलाओं के खिलाफ धर्म की कोई साजिश है?

उत्तर प्रदेश में इटावा के दांदरपुर गांव में कथावाचक मुक्त सिंह उर्फ मुकुट मणि यादव उन के साथी संत सिंह यादव और ढोलक वादक सूरदास से बदसलूकी का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. इसे ले कर राजनीति और जातीय गोलबंदी शुरू हो गई है. मुक्त सिंह और संत सिंह दोनों पिछड़ी यादव जाति से है. सूरदास दलित जाति से है. ऐसे में इस घटना से उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय गोलबंदी करने वालों को ताकत मिल गई है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में जातीय संघर्ष कराने की योजना बन रही है.

कथावाचकों के समर्थन में समाजवादी पार्टी और यादव महासभा के उतरने के बाद अब ब्राह्मण महासभा ने भी मोर्चा खोल दिया है. ब्राह्मण महासभा का कहना है कि यादव कथावाचकों के साथ को कुछ हुआ वह गलत था, लेकिन जाति छिपा कर कथावाचक के रूप में काम करना भी गलत था. इसे ले कर कथावाचकों के खिलाफ अलगअलग जिलों की कोर्ट में मुकदमें भी कायम हो रहे हैं.

पुलिस ने कथावाचकों से बदसलूकी करने वालों में से 21 साल के आशीष तिवारी, 19 साल के उत्तम अवस्थी, 24 साल के प्रथम दुबे उर्फ मनु दुबे और 30 साल के निक्की अवस्थी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है.

यूपी ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष अरुण दुबे ने इटावा के एसएसपी बृजेश कुमार श्रीवास्तव से मुलाकात कर अपना पक्ष रखा. उन्होंने कहा कि पहले सिर्फ एक पक्ष को सुना गया था, अब दूसरे पक्ष ने पुलिस के सामने अपनी बात रखी है. पुलिस ने गंभीरता से हमारी बात सुनी और जांच के बाद एक्शन लेने की बात कही. अरुण दुबे कहते है ‘ये मामला जातिगत नहीं था, सपा ने इसे जातिगत बना दिया. कथा तो कोई भी कह सकता है, हम भी सुनने जाते हैं. लेकिन कथा की आड़ में गलत हरकत करोगे तो कोई कैसे बर्दाश्त करेगा. व्यास पीठ पर बैठने वाला कथावाचक अगर यदि किसी महिला का हाथ पकड़ेगा, उसपर गलत दृष्टि डालेगा, तो स्वाभाविक है लोगों में आक्रोश होगा.’

इटावा के समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष प्रदीप शाक्य ने कहा कि घटना बहुत ही निंदनीय और दुखद है. ब्राह्मण समाज के लोगों को ऐसा कृत्य करने वालों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए. समाज में जहर न घोलें. अगर कथावाचक यादव भी थे तो मारपीट का हक किसने दिया. क्या यादव हिंदू नहीं हैं?

भागवत कथा में यादव कथावाचकों के साथ बदसलूकी हुई थी. इस कथा में रेनू तिवारी भी शामिल थी. रेनू तिवारी वहीं महिला हैं, वायरल वीडियो में जिन के पैर कथावाचक छूते हुए दिख रहे हैं और माफी मांगते भी नजर आ रहे हैं. रेनू तिवारी ने कथावाचक मुकुट मणि यादव और संत सिंह यादव पर आरोप लगाते हुए कहा कि भागवत कथा के दौरान मुकुट मणि ने उन के साथ छेड़खानी की थी. इस की शिकायत ले कर वह अपने पति के साथ एसपी से मिलने पहुंची. उन्होंने जांच और कार्रवाई की मांग की है.

बकेवर थाना क्षेत्र के दांदरपुर गांव निवासी रेनू तिवारी ने बताया ‘हमारे यहां भागवत कथा करने के लिए मुकुट मणि यादव, संत सिंह यादव और उन के साथी आए थे. पहले दिन की कथा के बाद जब मैं उन्हें भोजन करवा रही थी तब कथावाचक ने मेरी उंगली पकड़ कर मेरे साथ बदतमीजी करने की कोशिश की. इस दौरान कथावाचक का सहयोगी भी साथ था. उसी वक्त मैं ने अपने पति से इस की शिकायत की थी. इस के बाद वहां मौजूद लड़कों को गुस्सा आ गया और उन्होंने कथावाचक और उन के साथियों को घेर लिया.

क्या कहतें है मुक्त सिंह?

कथावाचक मुक्त सिंह पर आरोप है कि वह मुकुट मणि अग्निहोत्री बन कर कथावाचन का काम कर रहे है? दूसरा आरोप यह है कि महिला के साथ दुर्व्यवहार किया? इस संबंध में मुकुट मणि से की गई बातचीत में वह कहते हैं ‘मैं भी इटावा का ही रहने वाला हूं. वर्तमान में मैं इटावा सिविल लाइंस मे रहता हूं. यहां से दांदरपुर गांव 15 किलोमीटर दूर है. मेरा पैत्रक गांव केवल 3 किलोमीटर ही दूर है. मैं करीब 16 साल से भगवत कथा कह रहा हूं. मैं ने गुरू शिष्य परंपरा में अपने गुरू अवधेशानंद जी महाराज से शिक्षा ली है.

यह घटना 21 जून की है. जब मैं कथा कहने के लिए दांदरपुर गांव पहुंचा पहले दिन कथा कहने के बाद खाना खाने को बुलाया और पूछा कि आप किस जाति के हो. जब हम ने उन को बताया कि हम तो यादव जाति से है.’

‘उन लोगों ने कहा कि हमारे गांव में सब से ज्यादा ब्राह्मण जाति के लोग हैं. ऐसे में कोई यादव जाति के कथावाचकों से कथा क्यों सुनेगा? ‘तब हम ने कहा कि आपने पहले क्यों नहीं पूछा? गांव के लोगों ने हमारी एक नहीं सुनी. मारपीट और अपमानजनक व्यवहार किया. हमारे साथ 2 और लोग थे. एक सूरदास और एक संत सिंह यादव थे. उन लोगों ने हम से कहा कि अब वह किसी दूसरे कथावाचक से कथा सुनेंगे.’

‘इस का खर्च आप से लिया जाएगा. मुझ से 25 हजार नकद और सोने की चेन छीन ली. जब हम गांव से चलने लगे तो हम लोगों के साथ रातभर मारपीट की गई. चोटी काटी गई और पेशाब डाल कर पवित्र करने का काम किया. इस के बाद हमें लग रहा था कि हम आत्महत्या कर लें.

बात सोशल मीडिया के जरीए पूरे समाज में फैल गई तो हमारे पक्ष में भी लोग खड़े होने लगे. इस के बाद हम सपा प्रमुख अखिलेश यादव से मिले उन्होंने हम तीनों लोगो को 51-51 हजार नकद की सहायता दी. और मदद का वादा भी किया.’

आप के ऊपर दूसरा आरोप है दोदो आधार कार्ड रखने की? ‘ इस की जांच की जा सकती है. मेरा एक ही आधार मुक्त सिंह के नाम से है. दूसरा कैसे बना यह मुझे नहीं पता. जब आधार बनाने वाली कंपनी से पूछा जाएगा तो सच पता चल जाएगा. यह हमारे खिलाफ साजिश है. मेरे उपर महिला ने जो आरोप लगाए वह भी पूरी तरह से गलत हैं. यह इस घटना के बाद पेशबंदी के रूप में सामने रखी जा रही है. इस की सही जांच हो तो पता चल जाएगा.’

जाति बन रही मुद्दा

कथावाचकों की जाति को ले कर छिड़ा विवाद राजनीतिक रंग लेने लगा है. समाजवादी पार्टी इस विवाद में कूद गई है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव से कथावाचकों को मिलवाने के बाद यह आंदोलन बनने लगा. जैसे कुछ माह पहले सपा के सांसद रामजीलाल सुमन के द्वारा संसद में दिए गए बयान में राणा सांगा को गद्दार कहने पर क्षत्रिय समाज आंदोलन करने लगा था. ठीक वही हालात अब ब्राह्मण और यादव समाज के बीच छिड गया है. सोशल मीडिया से ले कर जमीन तक पर यही हालात है.

राजनीतिक लाभ के चक्कर में इस विवाद के पीछे की मूल बात खत्म होती जा रही है. भागवत कथा सुनने वालों में सब से बड़ी संख्या महिलाओं की होती है. कथावाचक कथा से ज्यादा सासबहू के सीरियल वाली कहानियां अधिक सुनातें हैं. इस के बाद रोचक अंदाज में समाधान भी देते हैं. इन के ज्यादातर समाधानों में महिलाओं को कहा जाता है कि वह पति, सास की सेवा करें, यही उन का धर्म है.

अपने बारे में सोचना अधर्म हो जाता है. सब से ज्यादा चढ़ावा महिलाएं ही चढ़ाती हैं. पुरूष भले ही खाली हाथ कथा सुनने चले आए लेकिन महिलाएं हमेशा ही चढ़ावा ले कर आती हैं.

हर प्रवचन में पति और घर की सेवा का पाठ

समाज में केवल इतनी जागरूकता आई है कि अब अपनी जाति के देवताओं के मंदिर हो गए हैं. उन के अपने पुजारी और कथावाचक हो गए हैं. गांव में अगड़ी जातियों के लिए मंदिर हैं जहां दलित और पिछड़े पूजापाठ करने नहीं जाते, उन लोगों ने अपनी जाति के मंदिर बना लिए हैं. धर्म की आलोचना करने वाले भी इन नए पुजारियों, कथावाचकों और मंदिरों को मानने लगे हैं.

अब महिलाएं अपनी जाति के धार्मिक लोगों बात चुनने लगी हैं. जो कभी मनुवाद का विरोध करते थे उन के मनु अलग हो गए हैं.

कथावाचक किसी भी जाति का हो उस का मूल एक ही होता है कि महिलाएं धर्म को मानती रही. उन को बारबार यह बात समझाई जाती है कि उन के कर्तव्य घर, पति, साससुसर की सेवा करना होता है. जब तक धर्म की बेड़ियां नहीं टूटेगी तब तक कथा और चढ़ावे का यह धंधा चलता रहेगा. यह पैसा कमाने का एक बढ़िया जरिया हो गया है. यही वजह है कि अब केवल ब्राह्मण ही नहीं दूसरी जातियों के कथावाचक भी होने लगे हैं. समाज स्वीकार कर ले इसलिए यह जाति भी छिपाने लगे हैं.

समाजवादी विचारधारा में धर्म को आमतौर पर एक व्यक्तिगत मामला माना जाता है. समाजवादी विचारधारा का मानना है कि धर्म सामाजिक परिवर्तन के लिए एक उपकरण हो सकता है, लेकिन धर्म का उपयोग शोषण या सामाजिक विभाजन के लिए नहीं किया जाना चाहिए. सरकार या समाज को किसी विशेष धर्म को बढ़ावा नहीं देना चाहिए.

कुछ समाजवादी मानते हैं कि धर्म सामाजिक परिवर्तन के लिए एक उपकरण हो सकता है. धार्मिक समाजवाद में धार्मिक सिद्धांतों का उपयोग सामाजिक न्याय और समानता को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है.

समाजवादी धर्म की आलोचना भी करते हैं. उन का मानना है कि धर्म का उपयोग अक्सर सामाजिक असमानता को बनाए रखने या सामाजिक संघर्षों को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है.

कार्ल मार्क्स जो समाजवादी विचारधारा के एक प्रमुख व्यक्ति थे, उन का मानना था कि ‘धर्म शोषकों का अफीम’ है, जो लोगों को उन के दुखों से राहत देने का वादा कर के सामाजिक अन्याय को सहन करने के लिए प्रोत्साहित करता है. कई समाजवादी धर्मनिरपेक्षता के समर्थक हैं, जिस का अर्थ है कि धर्म को सार्वजनिक जीवन से अलग रखा जाना चाहिए.

आज के दौर में समाजवाद का सिद्वांत केवल वोट तक सीमित रह गया है. इस में धर्म के बढ़ते प्रभाव, महिलाओं के प्रति धर्म का नजरिया क्या है? इन बातों पर बहस नहीं हो रही. धर्म का विरोध करने वाले अब केवल दूसरे धर्म का विरोध करते है.

वह अपने धर्म, अपने मंदिर, अपने कथावाचकों के धर्मिक रूप का विरोध नहीं करते है. रामचरितमानस का विरोध करने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए. उन की बेटी मंदिरों में पूजापाठ करती है. घर के बाहर वह पूजापाठ का विरोध करते हैं. अपने धर्म, पूजापाठ और कथा के नाम पर जातियता करना खतरनाक है. इस के खराब प्रभाव ही सामने पड़ेंगे.

Indian Penal Code 1860 : सजा सफाई की

Indian Penal Code 1860 : पश्चिमी देशों की उदारता की भावना से प्रेरित हो कर भारतीय जनता पार्टी ने 1860 के इंडियन पीनल कोड में जो थोड़ेबहुत बदलाव किए हैं उन में से एक छोटे अपराधों के लिए सामाजिक कार्य शामिल हैं. भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 (एफ) के अंतर्गत किए जाने वाले सामाजिक कार्यों में दिल्ली सरकार ने अस्पतालों, लाइब्रेरियों, क्लासरूमों, बागों, पब्लिक बिल्डिंगों की सफाई के काम तय किए हैं.

आत्महत्या के प्रयास, सरकारी कर्मचारियों के प्राइवेट बिजनैस करने, छोटी चोरियों, आम जगह पर शराब पीने, मानहानि जैसे अपराधों के लिए मजिस्ट्रेट अपराध सिद्ध होने पर अपराधी को एक साल की सजा या इस तरह के सामाजिक काम करने की जिम्मेदारी दे सकते हैं.

यह सिद्धांत रूप में तो अच्छा लगता है पर हमारे यहां के उद्दंड अपराधी, खासतौर पर ऊंची जातियों के अपराधी सफाई जैसे काम आम दफ्तरों में सुपरवाइजरों के सामने करेंगे, यह लगभग असंभव है. ये लोग इन जगहों पर सिर्फ उत्पात मचाएंगे और धीरेधीरे सारे विभाग इस तरह के अपराधियों को अपने यहां सामाजिक कार्य करने देने से इनकार कर देंगे.

वी शांताराम ने कभी ‘2 आंखें 12 हाथ’ जैसी फिल्म इसी थीम पर बनाई थी. राजेश खन्ना की एक फिल्म ‘दुश्मन’ में भी ऐसी ही सजा दी गई थी. पर ये मामले फिल्मी कहानियों के हैं. असल में उस समाज में जहां जातिगत कामों का जहर बचपन से ठूंसठूंस कर भर दिया जाता हो और जहां पूरी राजनीति जाति के नाम पर चल रही हो वहां सरकारी कानून के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के आदेश पर अपराधी अपने अपराध के प्रायश्चित्त करने के रूप में वास्तव में सामाजिक काम करेंगे, असंभव है.

हमारे यहां अंगरेजों ने 1857 के पहले रेजिमैंटों में ब्राह्मणों और राजपूतों को रखा था पर जब चरबी में डूबे कारतूसों को काटने का सवाल आने लगा तो इन सिपाहियों का गांवों में भी हुक्कापानी बंद होने लगा. मंगल पांडे जैसे सिपाहियों का गोरों के खिलाफ बंदूक उठाने के पीछे जाति का सवाल ही था. वह 1857 के विद्रोह से पहले कई साल तक बंदूक तो भारतीयों पर ही चलाया करता था क्योंकि ब्रिटिश कंपनी की फौजें भारतीय राजाओं से ही लड़ती रहीं, फ्रैंच या डच से नहीं.

सजा का यह नियम प्रयोग के तौर पर लगता अच्छा है पर सरकारी स्कूलों तक में सफल नहीं होता जहां ऊंची जातियों के बच्चे सजा के तौर पर स्कूल की सफाई करने से इनकार कर देते हैं और उन के मांबाप आ खड़े होते हैं.

World Leaders : राजाओं से बदतर शासक

World Leaders : भारत हो या अमेरिका, ईरान हो या हो इजराइल, अब यह पक्का हो गया है कि जनता की सुखसमृद्धि से शासकों को कोई मतलब नहीं. उन्हें केवल अपने एजेंडे से मतलब है और वह या तो धार्मिक होता है या फिर सिर्फ धौंस जमाने वाला. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 3 साल से यूक्रेन से नाहक लड़ रहे हैं. उन की निजी इच्छा है कि वे यूरोप के सर्वेसर्वा बनें.

अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप की इच्छा है कि अमेरिका में गोरों का चर्च वाला राज फिर से लागू हो जिस में काले, भूरे, पीले लोग गुलामों की तरह काम करें.

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इजराइल की जमीन को फैलाने में लगे हैं जबकि उन का देश अच्छाखासा उन्नत हो गया है और उन्हें उन मुसलिमों को बुला कर काम कराना पड़ता है जिन को वे दुश्मन मानते हैं. दूसरी ओर ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनाई को सिर्फ कट्टर इसलाम बेचना है.

भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में भी धर्म सिर चढ़ा हुआ है. पाकिस्तान और बंगलादेश इसलाम को भुना रहे हैं जबकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिंदूरक्षक की अपनी छवि बरकरार रखने के लिए चालें चला करते हैं.

मतलब यह कि इन देशों के नेताओं को जनता के हितों की चिंता नहीं है. लोकतंत्र हो या धर्मतंत्र, शासक का 21वीं सदी में पहला काम जनता के लिए सुखसुविधाएं जुटाना है. यह काम जनता अब खुदबखुद करती है. चूंकि हर देशवासी जीना चाहता है, अच्छी तरह जीना चाहता है, लंबे समय तक जीना चाहता है इसलिए वह सरकारों को नहीं देख रहा क्योंकि सरकारें तो और कामों में बिजी हैं. सरकारें तो आम आदमी पर टैक्स थोप कर पैसा छीनती हैं और उसे धर्म या सेना पर खर्च करती हैं.

सरकारों ने अब वे काम करने कम कर दिए हैं जो जनता खुद न कर सके, जिन के लिए सैकड़ोंहजारों के सहयोग की जरूरत होती है. वे काम अब निजी कंपनियां करने लगी हैं. दुनियाभर को इंटरनैट ने एक कर दिया है लेकिन यह सरकारों के बल पर नहीं किया गया. सरकारों ने तो इस पर टैक्स वसूला, अड़ंगे लगाए. निजी कंपनियों ने तकनीक डैवलप की, तार बिछाए, सैटेलाइट छोड़े, मोबाइल और कंप्यूटर बनाए. उन्हें एकदूसरे से जोड़ा. सरकारें कहीं नहीं थीं इस सब में क्योंकि पिछले 15-20 सालों से देशों के शासक ढोल बजाने वाले साबित हो रहे हैं, लोगों को जमा कर उन के हित के काम करने वाले नहीं. कहींकहीं अपवाद हो सकता है लेकिन उस के पीछे शासक की टैंडरों, जमीनों के दामों, नौकरियां आदि देने में कमीशनखोरी की इच्छा छिपी रहती है.

International : इजराइल के यहूदी

International : इजराइल के यहूदी जो सदियों तक यूरोपीय समाजों में मार खाते रहे, अब कुछ ज्यादा ही उग्र हो रहे हैं. उन्होंने 1947 में अपने पुनर्जन्म के बाद आसपास के मुसलिम देशों को हरा व बंजर रेगिस्तान में एक समृद्ध देश बना कर दुनिया के सामने आदर्श खड़ा किया था. लेकिन हमास के 7 अक्तूबर, 2023 के आक्रमण का जो जवाब उन्होंने गाजा को पूरी तरह नष्ट कर के दिया और अब ईरान पर हमला करने का जो कृत्य किया है, वह कुछ ज्यादा ही है, अनैतिक भी है और अमानवीय भी.

मजबूत देश, चाहे छोटे हों या बड़े, अगर अपने को ताकतवर सम झते हैं तो वे आसपास वालों से उसी तरह से भिड़ने को तैयार रहते हैं जैसे गांव या गली का गुंडा हर आतीजाती लड़की को छेड़ने का अपना अधिकार सम झने लगता है.

पश्चिम एशिया का कोई इसलामी देश दूध का धुला नहीं है. किसी देश में जनता को उतने हक नहीं मिले जितने इजराइल में मिले हुए हैं. इजराइल में तेल के कुएं नहीं हैं पर तेल के कुओं वाले किसी इसलामी देश में जनता उतनी सुविधाएं नहीं पा रही जितनी इजराइल की जनता पा रही है.

90 लाख की आबादी वाला छोटा सा देश इजराइल आसपास के 30-40 करोड़ और कुल मिला कर 2 अरब की आबादी वाले मुसलिम देशों पर कई दशकों से भारी पड़ रहा है. पर इस का यह मतलब नहीं कि वह वही करने लगे जो मुसलिम देशों के शासक अपनी जनता के साथ कर रहे हैं.

गाजा में कच्चेपक्के मकानों में खैरातों पर जीते लोगों के घर हर रोज तोड़ कर इजराइल ने बेबात में दुनियाभर में बदनामी करा ली है. जो लोग पहले कट्टर इसलामी लोगों और उन के देशों को नफरत से देखते थे, अब वे गाजा ही नहीं बल्कि ईरान के प्रति भी नरम हो गए हैं. फिलिस्तीनी और ईरानी असल में किसी हमदर्दी के लायक नहीं हैं क्योंकि उन के धार्मिक और प्रशासकीय नेता समाज को, खासतौर पर औरतों को, बंधक बना कर रखते हैं. उन्हें न लोकतंत्र से कोई प्रेम है और न ही तर्क या सच से.

फिलिस्तीनी और ईरानी दोनों कट्टर मुसलिम समाज हैं. ईरानी अत्याचारों की कहानियां तो जगजाहिर हैं. जरा से बाल दिखने पर मुहसा अमीनी और अरमिना गेरावंद को तेहरान की सड़कों से उठा कर मार डाला गया. वहां हिजाब को मोरल इसलामी पुलिस के जरिए थोपा जाता है. ऐसे में इजराइल अगर उन के नेताओं, उन के दफ्तरों, उन के शहरों और उन के मिलिट्री ठिकानों को तबाह कर रहा है, तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता.

इजराइल ने हमास के गाजा में और आयतुल्लाह खामेनाई के ईरान में अत्याचारों से भरी किताबों की स्याही को अपने बमों से फीका कर दिया है. लोग अपनों पर अत्याचारों को भूल रहे हैं, मिसाइलों और ड्रोनों के हमले ज्यादा याद रख रहे हैं. इजराइल ने अपनी अकड़ और धौंस में वही किया जो हमारे यहां 1971 की दुर्गा बनी इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातस्थिति लागू कर के किया था, देवी से शैतान बनना.

Social Story : चोरों के उसूल – शादी के बाद रवि की जिंदगी में क्यूं आया भूचाल?

Social Story : रामनाथ को बंगलौर आए मुश्किल से एक दिन हुआ था. अभी 3 दिन का काम बाकी था. एक कंपनी में काम के सिलसिले में बातचीत चल रही थी कि तभी उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. फोन दिल्ली से आया था. उस की पत्नी रोते हुए बोल रही थी, ‘‘रवि की तबीयत बहुत खराब हो गई है. उसे अस्पताल में इमरजेंसी वार्ड में दाखिल किया है. आप के बिना मैं अपने को बेसहारा महसूस कर रही हूं. आप जितना जल्दी हो सके वापस आ जाइए.’’

उस के चेहरे का रंग पीला पड़ गया. वह एकदम से उठ खड़ा हुआ. अपनी मजबूरी बता कर उस ने कंपनी के अफसर से रुखसत ली. होटल से अपना सामान समेटा और सीधा रेलवे स्टेशन पहुंच गया. टिकट काउंटर पर उस ने अपनी परेशानी बताई, पर काउंटर क्लर्क बोला, ‘‘अगले 3 हफ्ते तक आरक्षण मुमकिन नहीं है. मुझे बहुत अफसोस है कि मैं आप की कोई मदद नहीं कर सकता.’’

रामनाथ ने टिकट लिया और बिना आरक्षण वाले डब्बे की ओर दौड़ पड़ा.

गाड़ी छूटने में ज्यादा समय नहीं था. वहां डब्बे में भीड़ देख कर वह घबरा गया. पांव रखने तक की जगह नहीं थी. वह आरक्षित डब्बे की ओर दौड़ा. मुश्किल से डब्बे में चढ़ा ही था कि गाड़ी चल पड़ी. उस का दुख उस के चेहरे पर साफ झलक रहा था. कोई भी उस की पीड़ा को पढ़ सकता था.

एक सहयात्री ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘भाई साहब, आप बड़े दुखी लग रहे हैं, क्या बात है?’’ पूरी बात सुनने पर वह बोला, ‘‘आप फिक्र न करें. आप मेरे साथ बैठें. इतनी दूर का सफर आप खड़े हो कर कैसे करेंगे.’’ रामनाथ को थोड़ा सहारा मिला.

वह एक बड़ी कंपनी का मामूली सेल्समैन था. हवाई जहाज से सफर करने की उस की शक्ति नहीं थी. जब वह दिल्ली से बंगलौर के लिए चला था तो रवि की तबीयत खराब जरूर थी पर इतनी गंभीर नहीं थी, वरना वह बंगलौर न आता.

शादी के 15 साल बाद रवि उन की जिंदगी में खुशियां बिखेरने आया था. रहरह कर उस का मासूम चेहरा उस की आंखों के सामने आ रहा था. वह जल्द से जल्द अपने बेटे के पास पहुंच जाना चाहता था. गाड़ी तेजी से दौड़ी जा रही थी, लेकिन रामनाथ को वह रेंगती लग रही थी.

यह उस की खुशकिस्मत थी कि कृष्णकांत जैसा भला सहयात्री उसे मिल गया. उस ने उसे कुछ खाने को दिया. दुख की घड़ी में भूख भी नहीं लगती. उस ने पानी के दो घूंट पी लिए. उसे कुछ राहत मिली.

कृष्णकांत बोला, ‘‘भाई साहब, आप अपना मन आसपास के वातावरण से जोडि़ए. कुछ बातचीत कीजिए, वरना यह सफर काटे न कटेगा. ज्यादा चिंता न करें. दिल्ली में आप के भाईबंधु और पत्नी आप के बेटे का पूरा ध्यान रख रहे होंगे. हम आप के साथ हैं. आप का बेटा जरूर ठीक हो जाएगा,’’ सांत्वना के इन दो शब्दों ने उस के दुखी मन पर मरहम का काम किया.

तभी टिकट चेकर आ गया. इस से पहले कि वह रामनाथ से टिकट के बारे में पूछता, कृष्णकांत उसे एक ओर ले गया और उसे पूरी बात बताई तथा रामनाथ की सहायता करने के लिए प्रार्थना की. टिकट चेकर बड़ा घाघ था. उस ने बड़ी सख्ती से मना कर दिया और रामनाथ को अगले स्टेशन पर आरक्षित डब्बे से उतरने की ताकीद कर दी.

कृष्णकांत ने रामनाथ को आराम से बैठने के लिए कहा. उस ने टिकट चेकर के कान में कुछ फुसफुसा कर कहा. उस के चेहरे पर रौनक छा गई. उस ने सिर हिला कर हामी भरी और आगे बढ़ गया. कृष्णकांत ने राहत की सांस ली.

टिकट चेकर से हुई पूरी बात उस ने रामनाथ को बताई और बोला, ‘‘सिर्फ बैठ कर सफर तय करना होता तो कोई समस्या नहीं होती. इस दौरान 2 रातें भी आएंगी. अगर आप सोएंगे नहीं और ठीक से आराम नहीं करेंगे तो आप की तबीयत भी खराब हो सकती है. मैं ने टिकट चेकर से बात कर ली है. वह आप को बर्थ दे देगा. आप को थोड़े पैसे देने पड़ेंगे. आप को कोई एतराज तो नहीं है न?’’

अंधे को क्या चाहिए, दो आंखें. रामनाथ बोला, ‘‘भाई साहब, आप जैसा सज्जन व्यक्ति बहुत कम लोगों को मिलता है. आप मेरी इतनी मदद न करते तो न जाने मेरा सफर कितना तकलीफदेह होता. मेरे लिए आप जितना कर रहे हैं, मैं स्वयं यह शायद ही कर पाता.’’

कई यात्री अपने मित्रों के साथ बातचीत करने में मशगूल थे तो कई अपने परिवार के सदस्यों के साथ खिलखिला रहे थे. कुछ खानेपीने में लगे थे. रामनाथ यह सब देखसुन रहा था, पर उस का पूरा ध्यान अपने पुत्र और पत्नी पर ही टिका था. बीमार बेटे और पत्नी का व्यथापूर्ण चेहरा रहरह कर उस की आंखों के सामने लहरा रहा था.

दुख भी इनसान को थका देता है. बैठेबैठे उसे नींद ने आ घेरा. उसे लगा जैसे वह रवि और अपनी पत्नी के साथ सफर कर रहा था. तीनों कितने खुश लग रहे थे. रवि अपनी उम्र के बच्चों के साथ खेलने में व्यस्त था. अपने पुत्र और पत्नी के सान्निध्य से उस के चेहरे पर खुशी के भाव आ रहे थे. किसी बच्चे के रोनेचिल्लाने से उस की नींद टूट गई और उस ने स्वयं को वास्तविकता के धरातल पर पड़ा पाया. गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकी हुई थी.

उस ने मोबाइल पर अपनी पत्नी से संपर्क साधा और रवि का हालचाल पूछा. वह बोली, ‘‘डाक्टर रवि के इलाज में लगे हैं. वह अब होश में है और बारबार आप को पूछ रहा है. उसे ग्लूकोज चढ़ा रहे हैं.घर के सभी बड़े यहीं पर हैं. डाक्टर कहते हैं कि अब स्थिति काबू में है. बस, आप जल्दी से आ जाइए, तभी मुझे सुकून मिलेगा.’’

रामनाथ को अपनी पत्नी से बातचीत कर के कुछ ढाढ़स बंधा. उस ने कृष्णकांत को अपने पुत्र की स्थिति के बारे में बताया. वह बोला, ‘‘मैं कहता था न कि आप का पुत्र जरूर ठीक हो जाएगा. अब आप का दुख कुछ कम हुआ होगा. आप अपनी पत्नी से बातचीत करते रहिए. चिंता न करें. सब ठीक होगा.’’

तभी टिकट चेकर रामनाथ के पास आया. वह उसे एक ओर ले गया और बोला, ‘‘मैं ने आप के लिए बर्थ का इंतजाम कर दिया है. आप को मुझे 100 रुपए देने होंगे. मेरे साथ आइए. मैं जो भी बोलूं आप चुपचाप सुनते रहिए. आप कुछ भी बोलिएगा नहीं.’’

रामनाथ उस के पीछे चल पड़ा.

एक बर्थ के पास पहुंच कर टिकट चेकर रुक गया. वहां एक युवक बर्थ पर लेटा आराम कर रहा था. रामनाथ को संबोधित करते और उस युवक को सुनाते हुए वह बोला, ‘‘गाड़ी में चढ़ने के बाद अपनी बर्थ पर बैठना चाहिए. अपने यार दोस्तों की बर्थ पर बैठ कर गप्पें मारने से होगा यह कि आप की बर्थ किसी और को भी दी जा सकती है. आइंदा खयाल रखिए.’’

फिर टिकट चेकर उस युवक से बोला, ‘‘मुझे अफसोस है कि आप को यह बर्थ खाली करनी होगी. जिस के नाम पर यह बर्थ आरक्षित थी वह आ गया है. आप चिंता न करें. मैं आप को दूसरी बर्थ दिला दूंगा,’’ उस ने अपनी जेब से 50 रुपए का नोट निकाला और उसे थमा दिया.

रामनाथ ने अपना सामान बर्थ पर रखा. रात का समय हो चला था. सभी अपना बिस्तर लगा रहे थे. उस ने भी अपना बिस्तर लगाया और लेट गया. उस ने सुन रखा था कि चोरों के भी अपने उसूल होते हैं. एक बार किसी को जबान दे दी तो उस की मानमर्यादा का पालन करते हैं. यह टिकट चेकर किस श्रेणी में आता था वह अनुमान नहीं लगा पाया. कहीं कोई उस से ज्यादा पैसे देने वाला आ गया तो… इसी उधेड़बुन में उसे कब नींद ने आ घेरा उसे पता हीं नहीं चला. Social Story

Hindi Stories Love : विश्वास के घातक टुकड़े – इंद्र को कब आई पूर्णिमा की याद

Hindi Stories Love : रात का सन्नाटा पसरा हुआ था. घर के सभी लोग गहरी नींद सोए थे, लेकिन पूर्णिमा की आंखों में नींद का नामोनिशान तक नहीं था. बगल में लेटा उस का पति इंद्र निश्चिंत हो कर सो रहा था, जबकि पूर्णिमा अंदर ही अंदर घुट रही थी. पूर्णिमा को इंद्र के व्यवहार में आए परिवर्तन ने बेचैन कर रखा था.

पूर्णिमा की शादी को 5 साल गुजर गए थे, लेकिन वह मां नहीं बन पाई थीं. इलाज जरूर चल रहा था, लेकिन परिणाम की हालफिलहाल कोई आशा नहीं थी. रात के तीसरे पहर इंद्र की नींद खुली. बिस्तर टटोला तो उसे पूर्णिमा नजर नहीं आई. उस ने उठ कर बल्ब का स्विच औन किया. देखा, पूर्णिमा बिस्तर के एक कोने पर घुटनों में मुंह छिपाए बैठी थी. उसे इस हालत में देख कर इंद्र ने पूछा, ‘‘पूर्णिमा, तुम अभी तक सोई नहीं?’’

‘‘मुझे नींद नहीं आ रही,’’ पूर्णिमा का स्वर बुझा हुआ था.

‘‘क्यों?’’ इंद्र ने पूछा.

‘‘बस, यूं ही.’’ पूर्णिमा ने टालने वाले अंदाज में जवाब दिया.

‘‘पूर्णिमा, मैं जानता हूं कि तुम्हें नींद क्यों नहीं आ रही है. मैं तुम्हारा दुख समझ सकता हूं. थोड़ा इंतजार करो, सब ठीक हो जाएगा.’’ इंद्र का इतना कहना भर था कि पूर्णिमा उस के सीने से लग कर सुबकने लगी.

‘‘इंद्र, तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे?’’ पूर्णिमा ने अनायास पूछा. पत्नी के इस सवाल पर इंद्र गंभीर हो गया. वह कुछ सोच कर बोला, ‘‘कैसी पागलों वाली बातें कर रही हो?’’

बीते दिन की ही बात थी. पूर्णिमा हमेशा की तरह इंद्र की अलमारी के कपड़ों को हैंगर में लगा रही थी, तभी गलती से एक शर्ट नीचे गिर गई. शर्ट की जेब से एक फोटो निकल कर जमीन पर जा गिरा. पूर्णिमा ने सहज भाव से फोटो को उठाया, किसी लड़की का फोटो था. लड़की देखने में आकर्षक लग रही थी. उस की उम्र 25 के आसपास रही होगी. वह इंद्र के पास जा पहुंची, वह अखबार पढ़ रहा था.

जैसे ही पूर्णिमा ने फोटो दिखाई, वह अखबार छोड़ कर उस के हाथ से फोटो लेते हुए बोला, ‘‘यह फोटो तुम्हें कहां से मिली? ‘‘तुम औरतों की यही खामी है, टटोलना नहीं छोड़ सकतीं.’’ कहते हुए इंद्र ने फोटो अपनी जेब में रख ली.

‘‘तुम्हारे कपड़े ठीक कर रही थी. मुझे क्यापता था कि तुम जेब में इतने महत्त्वपूर्ण दस्तावेज रखते हो.’’ पूर्णिमा ने चुहलबाजी की.

इंद्र मुसकरा कर बोला, ‘‘मेरे ही विभाग की है.’’

‘‘तो जेब में क्या कर रही थी?’’

‘‘फिर वही सवाल. एक फार्म पर लगानी थी, गलती से मेरे साथ चली आई.’’ वह बोला.

पूर्णिमा इधर कुछ महीनों से महसूस कर रही थी कि भले ही इंद्र उस के साथ बिस्तर पर सोता है, लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं थी. पतिपत्नी का संबंध महज औपचारिकता बन कर रह गया था. एक दिन उस से न रहा गया तो पूछ बैठी, ‘‘इंद्र, तुम बदल गए हो.’’

‘‘यह तुम कैसे कह सकती हो?’’ वह सकपकाते हुए बोला.

‘‘तुम्हारे व्यवहार से महसूस कर रही हूं.’’ पूर्णिमा ने कहा.

‘‘ऐसी बात नहीं है. औफिस में काम का बोझ बढ़ गया है.’’ उस ने सफाई दी तो पूर्णिमा ने मामले को ज्यादा तूल नहीं दिया.

दिन के 10 बज रहे होंगे. इंद्र का औफिस से फोन आया, ‘‘पूर्णिमा, आज मेरा मोबाइल चार्जिंग पर ही लगा रह गया. क्या तुम उसे मुझ तक पहुंचा सकती हो?’’

‘‘जरूर, तुम औफिस से बाहर आ कर ले लेना.’’ कह कर पूर्णिमा ने जैसे ही फोन चार्जर से निकाला एक लड़की का फोन आ गया, ‘‘इंद्र सर, आज मैं औफिस नहीं आ सकूंगी.’’

पूर्णिमा ने कोई जवाब नहीं दिया तो वह बोली, ‘‘आप कुछ बोल नहीं रहे. क्या नाराज हो मुझ से. माफी मांगती हूं, कल मेरा मूड नहीं था. घर पर कुछ रिश्तेदार आए थे, मम्मी ने जल्दी आने के लिए कहा, इसलिए आप के साथ कौफी पीने नहीं जा सकी.’’

पूर्णिमा को समझते देर नहीं लगी कि इंद्र शाम को देर से क्यों आता है. सोच कर पूर्णिमा का दिल बैठने लगा. वह खुद पर नियंत्रण करते हुए बोली, ‘‘मैं उन की बीवी बोल रही हूं. आज वह अपना मोबाइल घर पर ही छोड़ गए हैं.’’

पूर्णिमा का इतना कहना भर था कि उस ने फोन काट दिया.

पूर्णिमा का मन आशंकाओं से भर गया. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इंद्र से कैसे पेश आए. वह सोचने लगी कि इस लड़की से इंद्र का क्या संबंध है. ऐसे ही विचारों में डूबी पूर्णिमा पति को मोबाइल देने के लिए निकल गई. इंद्र के औफिस पहुंच कर उस ने फोन कर दिया, इंद्र औफिस के बाहर आ गया. फोन देते समय पूर्णिमा ने उस लड़की का जिक्र किया तो वह बोला, ‘‘मैं बात कर लूंगा.’’

शाम को इंद्र घर आया तो आते ही पूर्णिमा से बोला, ‘‘मैं 2 दिनों के लिए औफिस के काम से लखनऊ जा रहा हूं. मेरा सामान पैक कर देना.’’

‘‘अकेले जा रहे हो?’’ पूर्णिमा के इस सवाल पर वह असहज हो गया.

‘‘क्या पूरा औफिस जाएगा?’’

‘‘मेरे कहने का मतलब यह नहीं था.’’ पूर्णिमा ने कहा तो अचानक इंद्र को न जाने क्या सूझा कि एकाएक सामान्य हो गया. वह पूर्णिमा को बाहों में भरते हुए बोला, ‘‘मुझे क्षमा कर दो.’’

इस के बाद पूर्णिमा भी सामान्य हो गई. उस ने पति के कपड़े वगैरह बैग में रख दिए. पति के जाने के बाद वह अकेली रह गई. घर में बूढ़ी सास के अलावा कोई नहीं था. वह किसी से ज्यादा नहीं बोलती थी. इसीलिए वह चाह कर भी अपने मन की बात किसी से शेयर नहीं कर पाती थी.

रात को आंगन में चांदनी बिखरी थी, जो पूर्णिमा को शीतलता देने की जगह शूल की तरह चुभ रही थी. मन में असंख्य सवाल उठ रहे थे. कभी लगता यह सब झूठ है तो कभी लगता उस का वैवाहिक जीवन खतरे में है. तभी अचानक सास की नजर पूर्णिमा पर पड़ी.

‘‘यहां क्यों बैठी हो?’’

‘‘नींद नहीं आ रही है.’’ कह कर पूर्णिमा उठने लगी.

‘‘इंद्र चला गया इसलिए?’’ इस सवाल का पूर्णिमा ने कोई जवाब नहीं दिया.

इंद्र को ले कर उस के मन में जो चल रहा था, वह उस की निजी सोच थी. उसे सास से साझा करने का कोई औचित्य नहीं था. अनायास उस का मन अतीत की ओर चला गया. पूर्णिमा अपने मांबाप की एकलौती संतान थी. आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद उस के पिता ने सिर्फ इंद्र की अच्छी नौकरी देखी और कर दी शादी. काफी दहेज दिया था उन्होंने उस की शादी में. एक ही रात में इंद्र की सामाजिक हैसियत का ग्राफ ऊपर उठ गया था.

तब उसे क्या पता था कि ऐसा भी वक्त आएगा, जब रुपयापैसा सब गौण हो जाएगा. हर महीने सैकड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद उस के मां बनने की संभावना क्षीण नजर आती थी. कभीकभी इंद्र खीझ जाता, तो पूर्णिमा अपनी मम्मी से दवा पर होने वाले खर्चे की बात करती. संपन्न मांबाप उस के खाते में तत्काल हजारों रुपए डाल देते थे.

इधर कुछ महीने से इंद्र उखड़ाउखड़ा सा रहने लगा था. दोनों में बात कम ही हो पाती थी. उसे भावनात्मक सहारे की जरूरत थी. सोचतेसोचते उस का मन भर आया. अगले दिन अचानक पूर्णिमा के मम्मीपापा आ गए. उन्हें देखते ही वह फफक कर रो पड़ी. बेटी का दुख उन्हें पता था. बोले, ‘‘मायके चलो.’’

पूर्णिमा के लिए यह राहत की बात थी. लेकिन उसे इंद्र की मां का खयाल था. इसलिए मातापिता से कहा, ‘‘सास अकेली रह जाएंगी. इंद्र औफिस के काम से बाहर गए हुए हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं, मैं 2 दिन उस का इंतजार कर लूंगा.’’ पूर्णिमा के पापा बोले.

तीसरे दिन इंद्र आया तो पूर्णिमा ने कहा, ‘‘मैं मायके जाना चाहती हूं.’’

‘‘बिलकुल जाओ,’’ इंद्र निर्विकार भाव से बोला, ‘‘तुम कुछ दिनों के लिए मायके चली जाओगी तो माहौल चेंज हो जाएगा. एक ही माहौल में रहतेरहते ऊब होने लगी है.’’

‘‘पति के साथ रहने में कैसी ऊब? कहीं तुम मुझ से ऊब तो नहीं गए?’’ लेकिन इंद्र ने एक शातिर खिलाड़ी की तरह चुप्पी साध ली. पूर्णिमा बेमन से मायके चली गई.

पूर्णिमा मायके चली जरूर गई थी, लेकिन उस का मन इंद्र पर ही टिका रहा. सोच रही थी कि अब तो वह आजाद पंछी की तरह रहेगा. पता नहीं वह क्या करता होगा. मन नहीं माना तो उस ने इंद्र को फोन लगाया.

‘‘कौन?’’ उधर से आवाज आई.

‘‘अब तुम्हें मेरी आवाज भी पहचान में नहीं आ रही.’’ पूर्णिमा ने उखड़े स्वर में कहा.

‘‘पूर्णिमा, तुम से बाद में बात करूंगा.’’ कह कर इंद्र ने काल डिसकनेक्ट कर दी.

इस दरमियान उस के कानों में कुछ ऐसी आवाजें आईं मानो कोई पिक्चर चल रही हो. घड़ी की तरफ देखा, शाम के 5 बज रहे थे. शक के कीड़े फिर कुलबुलाए. इंद्र कहीं अपनी उसी सहकर्मी के साथ पिक्चर तो नहीं देख रहा. सोच कर पूर्णिमा की बेचैनी बढ़ गई. पूर्णिमा की मां की नजर उस पर पड़ी, तो वह बोलीं, ‘‘यहां अकेले क्यों बैठी हो?’’

‘‘तो कहां जाऊं?’’ पूर्णिमा झल्लाई.

‘‘जब से आई हो परेशान दिख रही हो. इंद्र से कुछ कहासुनी तो नहीं हो गई.’’ मां ने पूछा.

‘‘हांहां, मैं ही बुरी हूं. झगड़ालू हूं.’’ पूर्णिमा रुआंसी हो गई. मां ने करीब आ कर स्नेह से उस के सिर पर हाथ फेरा तो वह शांत हो गई.

पूर्णिमा को मायके में रहते 15 दिन हो गए. इस बीच एक दो बार इंद्र का फोन आया लेकिन मात्र औपचारिकता के लिए. एक दिन पूर्णिमा की सास का फोन आया, ‘‘पूर्णिमा, कब आ रही हो?’’

‘‘मम्मीजी, मैं जानती हूं आप को मेरी फिक्र है, लेकिन इंद्र ने एक बार भी नहीं कहा कि आ जाओ. जब उसे मेरी जरूरत ही नहीं है तो मैं आ कर क्या करूंगी.’’ पूर्णिमा ने कहा.

‘‘ऐसे कैसे हो सकता है, उस ने तो तुम्हें कई बार फोन किए.’’ सास बोलीं.

‘‘वह तो कह रहा था कि तुम आने के लिए तैयार नहीं हो.’’

सास की बात सुन कर पूर्णिमा तिलमिला गई. अब इंद्र झूठ भी बोलने लगा था. काफी सोचविचार कर पूर्णिमा ने वापस ससुराल जाने का मन बनाया. इंद्र के मन में क्या चल रहा है, यह जानना उस के लिए बेहद जरूरी था. वह अपनी ससुराल चली गई.

इंद्र ने अचानक आई पूर्णिमा को देखा तो अचकचा गया. बोला, ‘‘बताया होता तो मैं लेने आ जाता.’’

‘‘तुम्हें फुरसत हो तब न?’’ पूर्णिमा के चेहरे पर व्यंग्य की रेखाएं खिंच गईं.

इंद्र ने पूर्णिमा को मनाने की कोशिश की, ‘‘आज शाम को पिक्चर चलते हैं.’’

‘‘नहीं जाना मुझे पिक्चर.’’ वह बोली.

‘‘जैसी तुम्हारी मरजी.’’ कह कर इंद्र अपने दूसरे कामों में लग गया.

एक रात इंद्र गंभीर था. पूर्णिमा को अहसास हो गया था कि उस के मस्तिष्क में कुछ चल रहा है. उस वक्त पूर्णिमा कोई किताब पढ़ रही थी. लेकिन बीचबीच में इंद्र के चेहरे पर आतेजाते भावों को चोर नजरों से देख लेती थी.

‘‘पूर्णिमा, मैं अंजलि से शादी करना चाहता हूं.’’ इंद्र का इतना कहना भर था कि पूर्णिमा की जिंदगी में भूचाल सा आ गया. उस ने किताब एक तरफ रखी, ‘‘मेरा शक ठीक निकला. अंजलि नाम है न उस का. बहुत खूब.’’ पूर्णिमा हंसी.

इस हंसी में रोष भी था तो बेवफाई की एक गहरी पीड़ा भी, जिस का अहसास सिर्फ उस स्त्री को ही हो सकता है, जिस ने पति को देवता मान कर अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया हो.

‘‘तुम ऐसा सोच भी कैसे सकते हो? अभी मैं जिंदा हूं.’’ वह बोली.

‘‘काफी सोचविचार कर मैं ने यह फैसला लिया है.’’ इंद्र ने कहा, ‘‘डाक्टर ने साफ कह दिया है कि तुम्हारे मां बनने की संभावना क्षीण है.’’

‘‘नहीं बनूंगी. मगर इस घर में सौतन कभी नहीं आएगी. कैसी बेगैरत लड़की है. एक शादीशुदा मर्द को फंसाया और तुम कैसे पुरुष हो जिस ने लाज, शरम, सब को ताक पर रख कर एक लड़की को जाल में फांस लिया.’’

‘‘वह स्वयं तैयार है.’’

‘‘मैं तुम से बहस नहीं करना चाहता. बात काफी बढ़ चुकी है. वह पेट से है.’’

‘‘बगैर शादी के?’’ वह चौंकी.

‘‘उस की इजाजत तुम से चाहता हूं.’’

‘‘न दूं तो?’’

‘‘तुम्हारी मरजी. अगर तुम मां बन सकती तो यह नौबत ही नहीं आती.’’

‘‘सोचो, अगर तुम बाप नहीं बन पाते और मैं यही रास्ता अपनाती, तब क्या तुम मुझे ऐसी ही इजाजत देते?’’ इंद्र के पास इस का कोई जवाब नहीं था.

पूर्णिमा की मनोदशा अब एक परकटे परिंदे की तरह हो गई. जब कुछ नहीं सूझा तो वह गुस्से में बोली, ‘‘बताओ, तुम ने मेरे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया? क्यों मेरे अस्तित्व को गाली दी? क्या सोचा था कि मेरी नाक के नीचे व्यभिचार करोगे और मैं चुप बैठी रहूंगी.’’

‘‘तो जाओ चिल्लाओ. कुछ मिलने वाला नहीं है.’’ इंद्र भी ढिठाई पर उतर आया.

‘‘अगर न चिल्लाऊं तो?’’

‘‘बड़ी मां का दरजा मिलेगा.’’ इंद्र ने कहा.

‘‘तुम्हारी उस रखैल के बच्चे की बड़ी मां का दरजा घिन आती है मुझे उस के नाम से.’’ इंद्र ने गुस्से में पूर्णिमा को मारने के लिए हाथ उठाया.

‘‘खबरदार, जो मुझे हाथ भी लगाया.’’ पूर्णिमा के तेवर देख कर इंद्र ने हाथ पीछे खींच लिया. उस रात जो कुछ हुआ, उस से पूर्णिमा का मन व्यथित था. सुबह उस का किसी काम में मन नहीं लगा. वह बीमारी का बहाना बना कर लेटी रही. इंद्र औफिस चला गया तब उठी. सास ने पूर्णिमा का हाल पूछा.

डायनिंग कुरसी पर बैठी पूर्णिमा बोली, ‘‘मांजी, इंद्र दूसरी शादी करना चाहता है. क्या आप इस के लिए तैयार हैं?’’

कुछ पल सोच कर वह बोलीं, ‘‘यह इंद्र का निजी मामला है, इस में मैं कुछ नहीं कर सकती.’’

‘‘इस का मतलब इंद्र के इस फैसले पर आप को कोई आपत्ति नहीं है?’’ पूर्णिमा ने पूछा.

‘‘देखो पूर्णिमा, हर आदमी बाप बनना चाहता है. उस ने भरसक प्रयास किया. जब डाक्टरों ने तुम्हारे बारे में साफसाफ कह दिया. तो वह जो कर रहा है उस में मैं कुछ भी नहीं कर सकती.’’

‘‘ऐसे कैसे हो सकता है कि एक छत के नीचे मेरी सौत रहे?’’

‘‘यह तुम्हें सोचना होगा. रही मानसम्मान की बात, तो मैं जब तक रहूंगी तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी.’’

‘‘न रही तब?’’ पूर्णिमा ने कहा तो सास ने कोई जवाब नहीं दिया.

इंद्र औफिस से देर से आया. आने के बाद कपड़े उतार कर बिना खाएपीए बिस्तर पर पड़ गया. पूर्णिमा सोच रही थी कि किस हक से इंद्र से मनुहार करे. पर मन नहीं माना.

‘‘खाना लगा दूं?’’

‘‘मैं खा कर आया हूं.’’ सुनते ही पूर्णिमा का पारा चढ़ गया. क्योंकि वह जानती थी कि खाना किस के साथ खाया होगा. गुस्से में पूर्णिमा भी बिना खाएपीए अलग बिस्तर लगा कर सोने चली गई.

नींद आने का सवाल ही नहीं था. बारबार मन एक ही बात पर आ टिकता. इंद्र के बारे में उस ने जैसा सोचा था, वह उस से अलग निकला. उसे सपने में भी भान नहीं था कि वह ऐसा कदम भी उठा सकता है.

‘‘क्या सोचा है तुम ने?’’ इंद्र का स्वर अपेक्षाकृत धीमा था.

‘‘जब तुम ने फैसला ले ही लिया है तो मैं कुछ नहीं कर सकती. पर इतना जरूर बता दो कि मेरी इस घर में क्या स्थिति होगी? स्वामिनी या नौकरानी. अर्द्धांगिनी तो अब कोई और कहलाएगी.’’ पूर्णिमा भरे मन से बोली.

‘‘तुम्हारा दरजा बरकरार रहेगा?’’ इंद्र का चेहरा खिल गया.

‘‘रात का बंटवारा कैसे करोगे?’’ पूर्णिमा के इस अप्रत्याशित सवाल पर वह सकपका गया. जब कुछ नहीं सूझा तो उलटे उसी पर थोप दिया.

पूर्णिमा गुस्से में बोली, ‘‘अंजलि से प्यार मुझ से राय ले कर किया था?’’

इंद्र पूर्णिमा के कथन पर झल्ला गया, ‘‘पुराने पन्ने पलटने से कोई फायदा नहीं.’’

पूर्णिमा ने यह खबर अपने मायके पहुंचा दी. उस के मम्मीपापा, भाईबहन सभी रोष से भर गए. पापा तल्ख स्वर में बोले, ‘‘पूर्णिमा, तुम यहीं चली आओ. कोई जरूरत नहीं है, उस के पास रहने की.’’

‘‘वहां आ कर क्या मिलेगा? एक नीरस उबाऊ जिंदगी. सब का अपनाअपना लक्ष्य रहेगा, वही मेरे लिए एक बांझ स्त्री का अभिशप्त जीवन. बहुत होगा किसी स्कूल में नौकरी कर लूंगी. क्या इस से मेरा दुख कम हो जाएगा?’’ कहतेकहते पूर्णिमा की आंखों में आंसू भर आए.

‘‘मैं तुम्हारी दूसरी शादी करवा दूंगा.’’ पापा बोले.

‘‘कोई जरूरत नहीं है. वहां भी दूसरे के बच्चे पालने होंगे. इस से अच्छा सौतन के ही खिलाऊं.’’

‘‘मैं उसे जेल भिजवा दूंगा.’’ पिता ने कहा.

‘‘उस से मिलेगा क्या? बेहतर है कि समय का इंतजार करूं. हो सकता है मेरी गोद भर जाए.’’ पूर्णिमा ने आशा नहीं छोड़ी थी. अंतत: इंद्र से अपनी मर्जी से अंजलि के साथ शादी कर ली. उस की पत्नी बन कर वह घर में आ गई.

औफिस से आ कर इंद्र सब से पहले पूर्णिमा के कमरे में आता था. पर जल्द ही उसे पूर्णिमा से ऊब होने लगी थी. अंजलि की खुशबू वह पूर्णिमा के कमरे तक महसूस करता. फिर तेजी से चल कर उस के पास जाता. अंजलि उसी के इंतजार में सजधज कर तैयार बैठी रहती. गोरीचिट्टी अंजलि जब होंठों पर लिपस्टिक लगाती तो उस के होंठ गुलाब की पंखुडि़यां जैसे लगते थे.

एक हफ्ते बाद पहली बार इंद्र रात बिताने पूर्णिमा के पास आया.

पूर्णिमा को कहीं न कहीं विश्वास था कि वह मां अवश्य बनेगी. बेमन से उस के पास 2 घंटे बिता कर वह अंजलि के पास चला गया. पूर्णिमा अपने अरमानों का कत्ल होते देखती रही. इंद्र उस की भावनाओं को रौंद रहा था. सोचतेसोचते उस की आंखें भीग गईं.

एक दिन वह भी आया, जब अंजलि मां बनने वाली थी. इंद्र काफी परेशान था. पूर्णिमा से बोला, ‘‘हो सके तो अस्पताल में तुम रह जाओ. पता नहीं किस चीज की जरूरत हो.’’

यह सुन कर पूर्णिमा का दिल भर आया. वह सोचने लगी कि आज इंद्र, अंजलि के लिए कितना परेशान है. अगर वह सक्षम होती तो उस की परेशानी पर उस का हक होता. पूर्णिमा की आंखों में आंसू छलक आए. इंद्र की नजर उस पर पड़ी, ‘‘रोनेधोने से क्या मिलने वाला है. खुशियां मनाओ कि इस घर में एक चिराग जलने वाला है. जिस की रोशनी में हम सब नहाएंगे.’’

‘‘सिर्फ तुम दोनों.’’ वह बोली.

‘‘वह तुम्हें बड़ी मां कहेगा.’’ इंद्र ने खुश हो कर कहा.

‘‘नहीं बनना है मुझे किसी की बड़ी मां.’’ पूर्णिमा गुस्से में बोली.

इंद्र जाने लगा तो कुछ सोच कर पूर्णिमा ने कहा, ‘‘किस नर्सिंगहोम में जाना होगा?’’

इंद्र ने नर्सिंगहोम का नाम बता दिया तो वह वहां चली गई. अंजलि ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया, सब के चेहरे खिल उठे. सास जल्द से जल्द नवजात शिशु को गोद में ले कर दादी बनने की हसरत पूरी करना चाहती थी.

कुछ घंटे के इंतजार के बाद अंजलि को उस के केबिन में लाया गया. साथ में नर्स की गोद में बच्चा भी था. नर्स ने कुछ नेग के साथ बच्चा सास की गोद में रख दिया. बच्चे को देख इंद्र का मन पुलकित हो उठा.

‘‘बिलकुल इंद्र पर गया है,’’ सास पुचकारते हुए बोली. इंद्र दौड़ कर बाजार से मिठाई लाया. अस्पताल के सारे स्टाफ का मुंह मीठा कराया. एक तरफ खड़ी पूर्णिमा अंदर ही अंदर रो रही थी. किसी का ध्यान उस पर नहीं गया. सब को बच्चे और अंजलि की फिक्र थी.

जो खुशी उसे देनी चाहिए थी वह अंजलि से मिल रही थी. जो मानसम्मान उसे मिलना चाहिए था, वह अंजलि को मिल रहा था. यह सब उस के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहा थी. मौका देख कर वह बिना बताए घर लौट आई. बिस्तर पर पड़ते ही वह फूटफूट कर रोने लगी. क्योंकि यहां उस का रुदन सुनने वाला कोई नहीं था. तभी मां का फोन आया. वह फोन पर ही रोने लगी.

‘‘पूर्णिमा, चुप हो जा मेरी बच्ची. मैं अभी तेरे भाई को तुझे लेने के लिए भेज रही हूं. परेशान मत हो.’’ मां ने ढांढस बंधाया.

‘‘क्यों न होऊं परेशान, अंजलि मां बन गई. एक मैं हूं जो बांझ के कलंक के साथ जी रही हूं.’’ पूर्णिमा का क्षोभ, गुस्सा, झलक गया. वह सिसकती रही.

मां ने उसे समझाया, ‘‘कोई नहीं जानता कि कल क्या होगा? हो सकता है तू भी मां बन जाए.’’

‘‘नहीं बनना है मुझे मां.’’ कह कर पूर्णिमा ने फोन काट दिया.

वह सुबक रही थी, तभी इंद्र का फोन आया, ‘‘पूर्णिमा, कहां हो तुम? सब तुम को पूछ रहे हैं.’’

‘‘बच्चा कैसा है?’’ पूर्णिमा स्वर साध कर बोली.

‘‘एकदम ठीक है,’’ इंद्र खुश हो कर बोला.

कुछ दिन अस्पताल में रह कर अंजलि घर आ गई. इंद्र को तो बहाना मिल गया अंजलि के साथ रहने का. बच्चा खिलाने के नाम पर अब वह पूर्णिमा की खबर भी लेना भूल गया. यह सब असह्य था पूर्णिमा के लिए. सो एक दिन मन बना कर इंद्र से बोली, ‘‘इंद्र, मैं हमेशा के लिए मायके में रहना चाहूंगी.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘यहां मेरा मन नहीं लगता. वहां मेरा सुखदुख बांटने वाले मांबाप तो हैं.’’

‘‘तुम्हें यहां किस बात की कमी है,’’ सुन कर एक बार फिर से उस का मन भीग गया. पर जाहिर नहीं होने दिया.

‘‘परसों मेरा भाई आ रहा है. मुझे नहीं लगता कि अब यहां मेरी जरूरत है. मैं एक कामवाली बाई बन रह गई हूं.’’

‘‘तुम ऐसा क्यों कह रही हो?’’

‘‘ऐसा ही है.’’ बात को तूल न देते हुए वह अपने कमरे में आई और सामान पैक करना शुरू कर दिया.

जैसेजैसे सामान पैक करती उस की रुलाई फूटती रही. कभी सोचा तक नहीं था कि एक दिन ऐसी स्थिति आएगी, जब इस घर की दीवारें उस के लिए बेगानी हो जाएंगी. कभी यही दीवारें उस के नईनवेली दुलहन बनने की गवाह थीं. जब वह पहली बार आई थी तो लगता था कि ये सब उस पर फूल बरसा रही हैं. मगर आज कालकोठरी सरीखी लग रही थीं. सास ने महज औपचारिकता निभाई. बेटे के खिलाफ न तब खड़ी हुई, न अब.

पूर्णिमा को मायके में रहते हुए एक महीना हो गया था. उस ने एक संस्थान में नौकरी कर ली. शुरू में कभीकभार इंद्र का फोन आ जाता था. उस ने उसे खर्च के लिए रुपए देने की पेशकश की मगर पूर्णिमा ने मना कर दिया. देखतेदेखते 6 महीने गुजर गए. इंद्र अपनी नई पत्नी के साथ खुश था.

अचानक एक दिन उस के औफिस में एक युवक उस से मिलने के लिए आया. इंद्र उसे ले कर एक रेस्टोरेंट में चला गया. जैसेजैसे वह युवक इंद्र से अपनी बात कहता, वैसेवैसे इंद्र के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ती जातीं.

‘‘तुम्हारे पास सबूत क्या है?’’ इंद्र बोला.

उस ने अदालत के कागजात इंद्र को दिखाए, जिस में गवाह के रूप में उन लोगों के हस्ताक्षर थे, जिस के बारे में वह सोच भी नहीं सकता था.

‘‘अब तुम चाहते क्या हो?’’ इंद्र ने उस से पूछा.

‘‘वह आज भी मेरी पत्नी है. बाकी आप जो भी फैसला लें.’’ कह कर उस युवक ने इंद्र को ऐसे भंवरजाल में फंसा दिया कि उस से न हंसते बन रहा था न ही रोते. उस का मोबाइल नंबर लेने के बाद वह घर आया.

उस समय अंजलि अपने बच्चे के साथ लेटी हुई थी. एकहरे बदन की अंजलि मां बनने के बाद और भी निखर गई थी, जिस से सिवाय प्यार जताने के उसे कुछ नहीं सूझ रहा था. मगर हकीकत तो आखिर हकीकत होती है. वह बिना कपड़े उतारे चिंताग्रस्त हो कर सोफे पर बैठ गया.

‘‘ऐसे क्यों बैठा है. अंजलि क्या कर रही है?’’ इंद्र की मां ने पूछा.

सास की आवाज पर अंजलि की तंद्रा टूटी.

‘‘आप? आप कब आए?’’ वह अचकचा उठी.

‘‘ये क्या हालत बना रखी है? औफिस में ज्यादा काम था क्या? देर क्यों हो गई?’’ अंजलि के सवालों से वह खिसिया गया.

‘‘क्या आते ही सवालों की झड़ी लगा दी. खुद तो दिन भर बच्चे का बहाना बना कर लेटी रहती हो. पति मरे या जीए, तुम्हें जरा भी चिंता नहीं रहती.’’ इंद्र के बदले तेवर ने अंजलि को असहज बना दिया. ऐसा पहली बार हुआ, जब इंद्र के बात करने का लहजा उस के प्रति असम्मानजनक था.

‘‘मैं ने ऐसा क्या कर दिया. यह तो रोज ही होता है. अब बच्चे को समय न दूं तो क्या उसे अकेला छोड़ दूं.’’ अंजलि ने भी उसी टोन में जवाब दिया. उस समय तो इंद्र ने अपने आप पर नियंत्रण रखा, मगर जब परिस्थिति बदली तो मूल विषय पर आ गया.

‘‘क्या तुम्हारी पहले भी शादी हो चुकी है?’’ इंद्र के इस सवाल पर अंजलि अंदर ही अंदर डर गई. डर स्वाभाविक था. पहले तो उस ने नानुकुर किया. मगर जब इंद्र ने उस के पहले पति का नाम बताया तो वह अपने बचाव में बोली, ‘‘हां, 3 साल पहले मैं ने अपने औफिस में काम करने वाले प्रियांशु से शादी की थी.’’

‘‘क्या तुम्हारा उस से तलाक हुआ था?’’ इंद्र के इस सवाल पर उस ने चुप्पी साध ली.

‘‘बोलती क्यों नहीं? अगर यह मामला पुलिस के सामने गया तो जेल मुझे होगी. क्योंकि मैं ने किसी की ब्याहता को घर में रखा है.’’ इंद्र ने अपनी कमजोरी स्वत: जाहिर कर दी.

‘‘नहीं लिया था,’’ अंजलि बोली.

‘‘वजह?’’ इंद्र ने पूछा.

‘‘शादी के बाद पता चला कि उस का चालचलन अच्छा नहीं है. वह न केवल शराबी था बल्कि उस के दूसरी औरतों से भी संबंध थे.’’

‘‘इसलिए साथ छोड़ दिया?’’

‘‘हां.’’

‘‘शादी क्या गुड्डेगुडि़यों का खेल है, जो आज किसी से कर ली और कल किसी और के साथ.’’

‘‘यह सवाल आप मुझ से पूछ रहे हैं? आप ने खुद शादी को मजाक बना रखा है.’’ अंजलि अपने मूल स्वभाव पर आ गई. इंद्र सन्न रह गया. जिसे उस ने फूल सी कोमल समझा था, वह कांटों सरीखी निकली.

‘‘क्या बक रही हो?’’ वह चीखा.

‘‘गलत क्या कहा. आप ने पूर्णिमा के साथ जो किया, क्या वह खेल नहीं था?’’ इंद्र को अब अपनी भूल का अहसास हुआ. अनायास उस का ध्यान पूर्णिमा पर चला गया. उसे अफसोस होने लगा कि उस ने पूर्णिमा का विश्वास क्यों तोड़ा. पर अब क्या किया जा सकता था.

‘‘इंद्र, मैं जानती हूं कि मुझ से गलती हुई. मुझे उसे तलाक दे देना चाहिए था.’’

‘‘तुम ने इस सच को मुझ से क्यों छिपाया?’’ इंद्र ने पूछा.

‘‘मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. मैं ने जब प्रियांशु से शादी की, तब मेरे मातापिता दोनों की रजामंदी थी. वे दोनों इस शादी के गवाह भी थे. मगर बाद में हालात कुछ ऐसे बने कि मैं ने प्रियांशु का घर हमेशा के लिए छोड़ दिया.

‘‘3 साल तक उस ने मेरी कोई खबर नहीं ली. न ही मैं ने उस के बारे में जानने का प्रयास किया. यह सोच कर कि मामला खत्म हो चुका है. नौकरी के दौरान वह शहर में अकेला रहता था. बाद में पता चला कि उस ने नौकरी छोड़ दी. मैं ने सोचा या तो वह कहीं और नौकरी कर रहा होगा या अपने शहर उन्नाव चला गया होगा.’’

‘‘तुम्हें पूरा विश्वास है कि वह उन्नाव का ही रहने वाला था?’’ इंद्र के इस सवाल पर वह किंचित परेशान दिखी.

‘‘उस ने बताया था तो मैं ने मान लिया.’’ अंजलि से बात करने पर इंद्र को लगा कि या तो अंजलि पूरी तरह बेकसूर है या फिर वह खुद साजिश का शिकार हो चुका है.

‘‘क्या तुम उस के साथ जाना पसंद करोगी?’’ इंद्र के इस सवाल पर वह विचलित हो गई.

‘‘आप कैसे सोच सकते हैं कि मैं उस के साथ रहना पसंद करूंगी? मैं आप के बच्चे की मां बन चुकी हूं.’’

‘‘कानूनन हमारा विवाह अवैध है. तुम भले ही न फंसो, लेकिन तुम्हारे उस पति की शिकायत पर मुझे जेल हो सकती है.’’ इस पर अंजलि ने कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई.

अगले दिन उस युवक का फोन आया तो इंद्र ने बाद में बात करने को कहा. इस बीच उस ने वकील के माध्यम से इस विवाह की हकीकत को जानने का प्रयास किया. वकील ने बताया कि उन दोनों ने अदालत में शादी की है. यह जान कर इंद्र और भी परेशान हो उठा.

अगले दिन उस युवक का दोबारा फोन आया, ‘‘आप ने क्या सोचा है?’’

‘‘तुम अब तक कहां थे?’’ इंद्र गुस्से में बोला.

‘‘जहां भी था, इस का मतलब यह तो नहीं है कि आप मेरी बीवी को अपनी बना लें.’’ वह बोला.

‘‘तुम चाहते क्या हो?’’ इंद्र मूल मुद्दे पर आया.

‘‘अंजलि मुझे चाहिए.’’ कुछ सोच कर इंद्र बोला, ‘‘वह तुम्हारे साथ जाना नहीं चाहती.’’

यह सुन कर वह हंसने लगा.

‘‘इस का मतलब यह तो नहीं कि आप उसे अपने घर में रख लें.’’ उस का कहना ठीक था.

‘‘मैं चाहता हूं कि एक बार तुम उस से मिल लो. अगर वह तुम्हारे साथ जाना चाहेगी तो ले जाना वरना तलाक दे कर अपना रास्ता बदल लो.’’ इंद्र ने कहा.

‘‘ठीक है,’’ इंद्र ने अंजलि को इस वार्तालाप से अवगत कराया.

‘‘मैं उस का चेहरा तक देखना पसंद नहीं करूंगी. आप ने कैसे सोच लिया कि मैं उस के साथ जाऊंगी.’’ अंजलि की त्यौरियां चढ़ गईं.

‘‘बिना तलाक दिए मैं भी तुम्हें अपने पास रखना नहीं चाहूंगा.’’ इंद्र ने साफ कह दिया.

‘‘आप होश में तो हैं. आप की हिम्मत कैसे हुई ऐसा सोचने की?’’ इस बार अंजलि के तेवर बिलकुल अलग थे. कल तक जिसे वह छुईमुई समझता था वह नागिन सी फुफकारने लगी थी.

‘‘ऐसा रहा तो मुझे जहर खा कर मरना पडे़गा. इस भंवनजाल से निकलने के लिए बस एक ही रास्ता बचा है मेरे लिए.’’ इंद्र रुआंसा हो गया.

‘‘वह तुम्हें तलाक देगा. क्या इस के लिए तैयार हो?’’ उस के चेहरे पर खुशी के भाव तैर गए.

‘‘बिलकुल,’’ अंजलि के कथन से उसे तसल्ली हुई. इंद्र ने उस युवक को एक गोपनीय जगह बुलाया.

‘‘वह तुम्हारे साथ जाने के लिए तैयार है.’’ कह कर इंद्र ने प्रियांशु के साथ चाल चली.

‘‘क्या?’’ वह आश्चर्य से बोला.

‘‘मैं उस कमीनी के साथ बिलकुल नहीं रहूंगा.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘इस से पहले भी उस ने एक लड़के से शादी कर के मुझे धोखा दिया था. वह शादी महज 6 महीने चली थी.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’ इंद्र ने पूछा.

‘‘ऐसी बातें छिपाए नहीं छिपती. तभी तो मैं ने उस का साथ छोड़ा.’’

‘‘यह सब जानने के बावजूद भी तुम उसे अपनी पत्नी बता रहे हो?’’

‘‘बताना ही पड़ेगा. उस ने काफी पैसे ऐंठे हैं मुझ से. लगभग 5 लाख रुपए. अब अगर सूद समेत मुझे नहीं मिलेगा तो जाहिर सी बात है, मैं आप दोनों को नहीं छोड़ूंगा.’’

‘‘कितने चाहिए?’’

‘‘10 लाख.’’ उस युवक ने कहा.

‘‘मैं इतना नहीं दे सकता. 6 पर तैयार हो जाओ तो मैं तुम्हें दे सकता हूं.’’ वह तैयार हो गया.

इस तरह अंजलि उस युवक से आजाद हो गई. अब यह इंद्र को तय करना था कि अंजलि को किस रूप में ले. क्या ऐसी औरत विश्वास लायक है? वह खुद भी तो बेवफाई के कटघरे में खड़ा था. अनायास उस का ध्यान पूर्णिमा पर चला गया और वह पश्चाताप के गहरे सागर में डूब गया. Hindi Stories Love

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