लेखिका- पूनम पाठक

तमाम बंदिशों से दूर वंदना आज खुली हवा में सुकून की सांस ले रही थी. तोड़ आई थी अपने पीछे वह सात जन्मों के उस बंधन को जो बेड़ी बन कर कई सालों से उसे जकड़े हुए था. वह रिश्ता जिसे कभी उस ने जीजान से संवारने की कोशिश की थी, शिद्दत से निभाना चाहा था आखिरकार दरक चुका था. किसी रिश्ते को यों तोड़ देना सहज तो नहीं होता लेकिन यह एकतरफ़ा रिश्ता आख़िर वह निभाती भी कब तक? वैसे भी, आज तक इस रिश्ते में उस के हिस्से सिर्फ़ और सिर्फ़ कर्तव्यों की सूची आई थी, कहीं किसी अधिकार का नामोनिशान न था.

46 वर्षीया वंदना अब इस रिश्ते का बोझ ढोतेढोते थक चुकी थी. मन से तो बहुत पहले  ही वह इस रिश्ते को नकार चुकी थी, पर चूंकि पत्नी होने के साथ वह एक मां भी थी, सो बेटी के प्रति अपनी आख़िरी ज़िम्मेदारी निभा कर उस ने इस रिश्ते को तिलांजलि देने का मन बना लिया.

अभी पिछले हफ्ते ही उस की बेटी की शादी हुई थी. उस के बाद चारछह दिन मेहमानों की आवाजाही में बीत गए. कल सुबह ही उस ने पति प्रशांत का घर छोड़ दिया था. छोड़ आई थी उस के लिए वह एक चिट्ठी भी कि उसे तलाशने की कोशिश न की जाए. जिंदगी को अब वह अपने लिए, अपनी मरजी के मुताबिक जीना चाहती है.

अब तक उस ने एक आम घरेलू औरत की तरह अपने घर की साजसंभाल की थी. उस की दुनिया सिर्फ घर और घरवालों तक ही सीमित थी. पहली बार घर से अकेले बाहर निकलते वक्त उसे थोड़ा डर तो लगा लेकिन वह जानती थी कि अगर अभी नहीं तो कभी नहीं. बदलाव का यह अवसर उसे बारबार न मिलेगा.

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