CBSE Education System : सीबीएसई क्यों वजूद में है, इस पर सोचा जाए तो समझ आता है कि इसे भेदभाव फैलाए रखने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है जिस का पालन वह पूरी ईमानदारी व निष्ठा से कर रहा है. धार्मिक वर्णव्यवस्था की तर्ज पर सीबीएसई ने शैक्षिक वर्णव्यवस्था की जिम्मेदारी उठा रखी है, इसलिए गरीब, दलित, आदिवासी और मुसलमान बच्चे प्रतिभाशाली होते हुए भी सर्वाइव नहीं कर पा रहे. वे सर्वाइव कर सकते हैं बशर्ते सीबीएसई को भंग कर दिया जाए.
सीबीएसई से ताल्लुक रखती एक दिलचस्प और हैरान कर देने वाली बात यह है कि वह संसद द्वारा बनाया गया वैधानिक निकाय नहीं बल्कि सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत एक रजिस्टर्ड सोसाइटी है. यानी, इसे बनाने के लिए संसद में कोई अधिनियम पारित नहीं किया गया था जिस पर संसद में लंबीचौड़ी और तार्किक बहस हुई हो, इस के होने या न होने और इस की उपयोगिता या अनुपयोगिता पर सांसदों द्वारा दोनों सदनों में तर्क और आपत्ति रखे गए हों.
इसे तो बस अपने मुताबिक थोड़ा ढांचा और नाम बदल कर नया नाम और मुकाम दे दिया गया था जिस का सार यह था कि जाओ और पैसे व ऊंची जाति वालों की नई पीढ़ी को नीची जाति वाले गरीबों से अलग रखते देश के भविष्य का कर्णधार बनाओ. सीबीएसई ऐसा कर भी रही है. जो काम ब्रिटिश हुकुमत कर रही थी वह सीबीएसई के हिस्से में आ गया. इस ने 2 वर्गों के बीच शैक्षिक जाति और वर्णव्यवस्था की लक्ष्मणरेखा खींच रखी है.
आर्मी वैलफेयर एजुकेशन सोसाइटी, नई दिल्ली बनाम सुनील कुमार शर्मा 2024 मुकदमे की सुनवाई करते वक्त सुप्रीम कोर्ट ने कम से कम 6ठी बार यह कहा था कि सीबीएसई वैधानिक निकाय नहीं है. कोई भी संस्था तभी वैधानिक होती है जब उस की स्थापना ही सीधे किसी कानून या अधिनियम से होती है. सीबीएसई के बनाए नियम सीधे कानून के जरिए नहीं बने होते और न ही उस के बायलौज यानी नियम संसद द्वारा बनाए गए कानूनों जैसी वैधानिक शक्ति रखते हैं बल्कि एक सोसाइटी के रूप में उन की मौजूदा स्थिति तय होती है.
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