"आइएआइए वंदना जी, मैं आप का ही इंतज़ार कर रहा था,” डोर पर उस के नौक करते ही शिशिर आत्मीय स्वर में बोले. "माफ़ कीजिए, ज्यादा लेट तो नहीं हुई मैं?” "अरे नहीं, मेरा मित्र भी आता ही होगा. आप बैठिए,” राउंड टेबल के सामने वाली कुरसी की ओर शिशिर ने इशारा किया.

"देखिए, ये पेजेस बिलकुल तैयार हैं और नौवेल की प्रस्तावना भी बन कर आ चुकी है,” शिशिर ने उस की तरफ कुछ पेपर्स बढ़ाए. वह उन्हें देखने में तल्लीन थी कि कमरे में किसी ने प्रवेश किया. शिशिर ने उस का स्वागत करते हुए उसे भी वहीं पास की कुरसी पर बैठा दिया.

"वंदना जी, ये हैं आप की नौवेल के अतिथि संपादक और मेरे बहुत अच्छे मित्र मानस. यहीं पंचगनी से इन का एक अखबार निकलता है ‘सच्ची ख़बर’. और मानस, ये हैं इस कहानी की लेखिका वंदना, माफ़ कीजिएगा अब 'वंदू'.”

कानों में 'मानस' शब्द के प्रतिध्वनित होते ही वंदना ने निगाहें उठा कर सामने बैठे शख्स को देखा. बेतरतीब दाढ़ी और हलकी घनी मूंछों ने सामने वाले के चेहरे को काफी ढक रखा था, लिहाज़ा, वह थोड़ा झिझक गई और नमस्ते की मुद्रा में हाथ जोड़ दिए.

"वंदू,” तभी सामने वाले शख्स ने धीमी आवाज़ में उसे पुकारा. हां, उस ने वंदना को पहचानने में कोई भूल नहीं की थी क्योंकि वक्त के तमाम झंझावातों को झेलने के बाद भी वंदना के चेहरे की मासूमियत आज भी बरकरार थी. ओह्ह, वंदना को अपने कानों पर विश्वास न हुआ. सालों बाद ये शब्द, ये आवाज़ सुन कर उस का रोमरोम पुलकित हो उठा. सामने बैठे मानस को देख कर उस की आंखें जैसे भरोसा नहीं कर पा रही थीं.

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