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भारतीय सेना में स्थाई कमीशन प्राप्त करने वाली महिला अफसरों का यह पहला तकनीकी बैच था. सभी मेकैनिकल इंजीनियर थीं. आईएमए, देहरादून में डेढ़ साल की सख्त ट्रेनिग के बाद पासिंग आउट हुई थीं. मैं, लैफ्टिनैंट नीरजा गुप्ता, सैनिक परिवार से नहीं थी. अकसर सभी महिला अफसर सैनिक परिवारों से थीं. मैं केवल गुप्ता परिवार से थी. पंजाब के व्यापारिक परिवार की लड़की यानी मैं ने घर में सब के विरोध करने के बावजूद सेना को अपना कैरियर बनाया था. अलगअलग प्रदेशों से आई लड़कियां अपनेअपने प्रदेश की सुंदरता लिए हुए थीं. एक से बढ़ कर एक लड़िकयों के सुंदर, स्टाइलिश बाल थे.

हम सभी जेंटलमेन कैडट थीं. यूनीफौर्म और किट के अन्य सामान दिलाने के बाद हमें सीधे बारबर शौप ले जाया गया था. सुंदर ढंग से सजी हुई थी बारबर शौप. देख कर सभी का मन खुश हो गया था. सैनिक परिवारों से आई लड़कियां जानती थीं कि अब क्या होने वाला है. उन में से सिख परिवार से आई लड़की सुरिंदर कौर से मैं ने पूछा था, उन के पिता कर्नल थे, ‘यहां हमारे बाल स्टाइलिश किए जाएंगें?’

‘झली, होईं ऐं. यहां सब के मुंडन किए जाएंगे. बाल इतने छोटे किए जाएंगे कि कैप से बाहर दिखाई न दें.’
फिर हमारे बालों की वह रेड़ मारी गई थी कि सभी जिंदगीभर भूल नहीं पाएंगी. इतना ख़याल जरूर रखा गया था कि हमें जीसी लड़कों की तरह गंजा नहीं किया गया था. बाल छोटे तो किए गए थे लेकिन पीछे मशीन नहीं लगाई गई थी. फिर भी बहुत सी लड़कियां तो अपनी शक्ल देख कर रो पड़ी थीं. जो रो रही थीं या नहीं भी रो रही थीं, हमारे साथ आए इंस्ट्रक्टर हरनाम सिहं जी ने हमें तीन लाइन में खड़ा किया और अपनी बुलंद आवाज में कहा था, ‘ जैंटलमेन कैडटस, मेरी बात ध्यान से सुनें.

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