कुछ दिन पहले एक खबर काफी सुर्ख़ियों में थी. ये खबर थी सोन चिरैया यानी ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ के विलुप्त होने की कगार पर पहुंचने की. इस खबर ने पक्षीप्रेमियों और बायोलॉजिस्ट को चिंता में डाल दिया था. जिस सोन चिरैया की आबादी वर्ष 1969 में 1260 थी वह अब देश के पांच राज्यों में मात्र 150 ही बची हैं. बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि एक समय सोन चिरैया भारत की राष्ट्रीय पक्षी घोषित होते-होते रह गई थी. जब भारत के ‘राष्ट्रीय पक्षी’ के नाम पर विचार किया जा रहा था, तब ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ का नाम भी प्रस्तावित किया गया था, जिसका समर्थन प्रख्यात भारतीय पक्षी विज्ञानी सलीम अली ने किया था. लेकिन ‘बस्टर्ड’ शब्द के गलत उच्चारण की आशंका के कारण ‘भारतीय मोर’ को राष्ट्रीय पक्षी चुना गया था.
भारतीय वन्य जीव संस्थान ने सोन चिरैया को श्रेणी1 के संरक्षित वन्य प्राणियों में शामिल किया है और इसके शिकार पर पूर्णतः पाबंदी है. देशभर में लटके बिजली के तारों की वजह से सोन चिरैया-ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की लगातार होती मौत पर ग्रीन ट्रिब्यूनल अथॉरिटी ने गहरी नराजगी जाहिर की थी. उसने केंद्र के साथ राज्य सरकारों को भी निर्देश दिए थे कि चार महीने के अंदर बिजली के तारों पर पक्षियों को भगाने के उपकरण लगाए जाएं और आने वाले समय में बिजली के तार भूमिगत बिछाए जाएं. ट्रिब्यूनल का यह आदेश सोन चिरैया को ही नहीं, बल्कि अन्य पक्षियों को भी बचाने में सहायक साबित हो सकता था, लेकिन अफ़सोस कि उसके आदेश को ना तो केंद्र सरकार ने गंभीरता से लिया और ना ही किसी राज्य सरकारों ने.
सोन चिरैया ही नहीं, घर-घर में फुदकने और दाना चुगने वाली गौरैया भी अब लगभग गायब हो चुकी है. बड़ी संख्या में कौवे और गिद्ध भी ख़त्म हो रहे हैं. इन पक्षियों की विलुप्ती का मुख्य कारण है जंगलों का तेज़ी से ख़त्म होते जाना, आसमान में बिजली के नंगे तारों का जाल फैला होना और गगनचुम्बी इमारतों में लगे चमचमाते शीशे. जंगलों के ख़त्म होने पर पक्षियों के आशियाने ख़त्म हो गए हैं, उनके घोसले उजाड़ गए हैं और वह अब इंसानी दुनिया में आकार गर्मी, प्रदूषण और बिजली के खुले नंगे तारों के खतरों के बीच जीने को मजबूर हैं.
फारेस्ट रेंज ऑफिसर पियूष मोहन श्रीवास्तव
अधिकांशतः पक्षी धूप, गर्मी, पानी-खाने की कमी और प्रदूषण के चलते अपनी जान गवां रहे हैं.शहरों में वाहनों का ध्वनि प्रदूषण भी उनकी जान ले रहा है. उधर फसलों को बचाने के लिए भी पक्षियों को जहर देकर मारा जाने लगा है. फसलों पर अंधाधुंध कीड़े मारने की दवा के छिड़काव पक्षियों के लिए जानलेवा साबित हो ही थे. बढ़ता जल और ध्वनि प्रदूषण भी पक्षियों को मौत की नींद सुलाने वाला एक बड़ा कारक है. पानी में बढ़ते तमाम तरह के केमिकल और समुद्र के पानी में बिखरे तेल से भी पक्षियों की मौत हो रही है. जाने-अनजाने हम अपने घरों में भी पक्षियों की मौत के कारणों को बढ़ावा दे रहे हैं. घरों के आसपास इकट्ठा गहरे खुले पानी में भी पक्षी डूब कर मर जाते हैं. यही नहीं, हमारे पालतू जानवर भी पक्षियों के दुश्मन बने हुए हैं. पक्षियों को दूषित खाना या ब्रेड देना अक्सर उन्हें बीमारी से लेकर मौत तक के मुंह में धकेल देता है. पक्षी, प्राकृतिक आपदा जैसे तूफान और तेज आंधी आने तथा बिजली गिरने से भी मारे जाते हैं.
पक्षियों के संरक्षण पर काम करने वाली अमेरिका की एक संस्था नैशनल ऑडबोन सोसायटी से जुड़े बायॉलजिस्ट मेलानी डिसकोल अपने एक लेख में कहते हैं कि अकेले अमेरिका में हर दिन अलग-अलग प्रजातियों के सवा करोड़ से ज्यादा पक्षी मर जाते हैं. ‘नैचरल डेथ’ से ज्यादा मौत ‘मानव रचित’ कारणों से होती है. घरों, दफ्तरों में शीशे के दरवाजे-खिड़कियां लगाने का चलन हर साल करोड़ों पक्षियों की मौत का कारण बनता है. शीशे में प्राकृतिक दृश्य देख भ्रमित पक्षी तेजी से उड़ते हुए आते हैं और शीशों से टकरा जाते हैं. ऐसे में सदमा और गंभीर चोट लगने से 50 फीसदी से ज्यादा पक्षी दम तोड़ देते हैं. हाल ही में हुए एक सर्वे में बताया गया कि अमेरिका में पालतू और जंगली बिल्लियां भी हर साल करोड़ों पक्षियों को अपना शिकार बना लेती हैं. बिजली के नंगे तार तो इन बेज़ुबान जीवों के जान के दुश्मन हैं ही, अब जो नया दुश्मन पैदा हो गया है वह है वायरस। तेजी से पनपते माइट्स, वायरस, बैक्टीरिया मनुष्यों के ही लिए नहीं, पक्षियों के लिए भी खतरनाक हैं. वे एक साथ हजारों पक्षियों का खात्मा कर देते हैं.
बर्ड फ्लू वायरस का प्रकोप   
इन दिनों बर्ड फ्लू वायरस का संचार पक्षियों के बीच बहुत तेज़ी से हो रहा है. 2021 की शुरुआत के साथ ही दुनिया भर में पक्षियों की मौतों का आंकड़ा तेज़ी से बढ़ रहा है. जिसको लेकर जीवविज्ञानियों और डॉक्टर्स के बीच बड़ी चिंता व्याप्त है. बर्ड फ्लू को एवियन एंफ्लुएंजा भी कहते हैं. ये एक तरह का वायरल इंफेक्शन है, जो पक्षियों से मनुष्यों को भी हो सकता है. ये जानलेवा भी हो सकता है. इसका सबसे आम रूप H5N1 एवियन एंफ्लुएंजा कहलाता है. ये बेहद संक्रामक है. समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा हो सकता है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक सबसे पहले एवियन एंफ्लुएंजा के मामले साल 1997 में दिखे. इससे संक्रमित होने वाले लगभग 60 प्रतिशत लोगों की जान चली गई.
अयोध्या के कुमारगंज रेंज में पोस्टेड फारेस्ट रेंज ऑफिसर पियूष मोहन श्रीवास्तव ने इस सम्बन्ध में 'सरिता' से लम्बी बातचीत के दौरान कई बातों पर प्रकाश डाला. बता दें कि पियूष मोहन श्रीवास्तव कतर्नियाघाट वाइल्डलाइफ सेंचुरी, लखनऊ चिड़ियाघर, दुधवा टाइगर रिज़र्व जैसी महत्वपूर्ण जगहों पर लम्बे समय तक पोस्टेड रहे हैं और जीव-जंतुओं के व्यवहार, खानपान और प्रजनन पर बारीक नज़र रखते हैं. पियूष मोहन कहते हैं कि देश के कई राज्यों से अचानक बड़ी संख्या में पक्षियों के मरने की खबरें आ रही हैं. हर साल सर्दियों के मौसम में पशु-पक्षियों की मुसीबत तो बढ़ ही जाती है, लेकिन उनकी लगातार हो रही मौतों से अलग तरह की चिंता पैदा हो रही है. कुछ पक्षियों की पोस्टमार्टर्म रिपोर्ट से पता चलता है कि पक्षी वायरस जनित रोगों का शिकार हो रहे हैं.
पियूष मोहन कहते हैं, 'बर्ड फ्लू का वायरस प्रवासी पक्षियों के द्वारा बाहर से भारत में आ रहा है. इसको रोकना बहुत मुश्किल हो रहा है. हर साल सर्दियां शुरू होते हे माइग्रेंट पक्षियों की तादात देश में बढ़ती है. हम हमेशा इनका स्वागत करते हैं. हिमाचल, उत्तराखंड से लेकर केरल तक इन माइग्रेंट बर्ड्स से गुलजार होते हैं. लेकिन इस बार ये प्रवासी अपने साथ खतरनाक वायरस और बैक्टीरिया भी लेकर आये हैं. कुछ समय पहले ही राजस्थान में अलग-अलग प्रजातियों के लगभग 18 हजार प्रवासी पक्षी मृत पाए गए थे. बरेली स्थित इंडियन वैटनरी रिसर्च इंस्टिट्यूट ने जांच के बाद बताया कि पक्षी न्यूरो मैसकुलर डिसऑर्डर से पीड़ित थे. यह बीमारी एक प्रकार के बैक्टीरिया के विकसित होने से पैदा हुए जहर के कारण होती है.'
गौरतलब है कि इसी बीच भारत में राजस्थान झालावाड़ की राड़ी के बालाजी क्षेत्र में 50 कौवों की मौत हो गई है. पहली नजर में ये बर्ड फ्लू ही लगा. राजस्थान के जयपुर समेत 7 जिलों में 200 से ज़्यादा कौओं की मौत होने की सूचना है. वहां राज्य सरकार ने हालात की निगरानी के लिए कंट्रोल रूम स्थापित कर दिए हैं. साथ ही, चार संभागों में विशेषज्ञ दल भी भेजे गए हैं. सांभर झील में बड़े पैमाने पर पक्षियों की अचानक मृत्यु की घटना के बाद यह दूसरी सबसे बड़ी मुसीबत सामने आई है.
मध्य प्रदेश में भी इंदौर के एक निजी कॉलेज परिसर में मृत पाए गए 100 से ज्यादा कौओं में से 2 की जांच में 'एच-5 एन-8' वायरस पाया गया है. गुजरात के जूनागढ़ स्थित बांटला गांव में भी 2 जनवरी को 53 पक्षी मृत मिले थे. इन्हे भी बर्ड फ्लू होने का अंदेशा जताया जा रहा है. हिमाचल प्रदेश स्थित पोंग डैम इलाके में 1,400 से अधिक प्रवासी पक्षियों की रहस्यमयी मौत हो गई. एहतियातन कांगड़ा जिला प्रशासन ने बांध के जलाशय में सभी तरह की गतिविधियों में अगले आदेश तक रोक लगा दी है. मौत के कारण का पता लगाने के लिए भोपाल स्थित हाई सिक्यॉरिटी एनिमल डिजीज लैब में सैंपल भेजे जा चुके हैं. पंचकूला जिले के बरवाला में 10 दिन में 4,09,970 मुर्गियों की मौत हो चुकी है. बरवाला के गांव गढ़ी कुटाह और गांव जलोली के पास 20 पोल्ट्री फार्मों में चार लाख से ज्यादा मुर्गियों की असामान्य मौत होने पर नमूने एकत्र कर क्षेत्रीय रोग निदान प्रयोगशाला (आरडीडीएल) जालंधर को भेजे गए हैं.
कोरोना वायरस महामारी के साथ ही अब देश में बर्ड फ्लू का संकट गहराता जा रहा है. इस बीच केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने सभी राज्य मुख्य सचिवों और मुख्य वन्यजीव वार्डनों को चिट्ठी लिखकर उनसे एवियन इन्फ्लुएंजा (H5N1) के लिए राज्य स्तरीय निगरानी समितियों का गठन करने को कहा है. राज्यों को सलाह दी गई है कि पशुपालन विभाग द्वारा सैंपलिंग टेक्नीक पर आयोजित ट्रेनिंग में भाग लेने के लिए कर्मचारियों/अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की जाए. साथ ही प्रवासी पक्षियों की सभी मौतें - उनकी संख्या और कारण पर्यावरण मंत्रालय को बताया जाए. मंत्रालय ने कहा है कि भेजे गए सैंपल और टेस्टिंग रिपोर्ट्स के कलेक्शन, डिस्पैच के लिए स्थानीय पशु चिकित्सा विभाग से संपर्क किया जाना चाहिए.

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