लेखक- मनोज सूद
बांसों के झुरमुट के बीचोंबीच एक पगडंडी पर चलते हुए अचानक किसी दरवाजे के चरमराने जैसी आवाज को सुन कर हम सब ठिठक से गए. अपने गाइड के इशारे पर हम सभी कौतूहल से आसपास के बांसों की ओर देखने लगे. अब हमें उस वेणुवन में कुछ रुकरुक कर कपाट पर दस्तक देने जैसी एक लयमय ध्वनि सुनाई देने लगी. अकस्मात एक अग्निपुंज सदृश दृश्यमान चटकीले लालपीले रंगों वाला कोई पक्षी बांसों के गुल्म में से निकल कर हमारे सिरों के ऊपर से हौलेहौले उड़ता हुआ दूर एक पेड़ की ओर चला गया.
हमारे गाइड ने बताया कि यह एक फ्लेमबैक कठफोड़वा है, जो अकसर किसी कुशल तबलची की तरह अपनी चोंच से काष्ठ की सतहों को थपथपा कर भिन्नभिन्न धुनें निकालता है. कठफोड़वा की चित्ताकर्षक आकृति और उस के संगीतमयी अंदाज ने मेरा दिल जीत लिया था.
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कोलकाता के भारतीय प्रबंधन संस्थान यानी आईआईएम के जोका कैंपस में 15 साल पहले बर्डवाचिंग का मेरा यह पहला अनुभव था. 3 घंटे पैदल चलने के दौरान हम ने कैंपस में तकरीबन 50 प्रजातियाों के पक्षियों को देखाबूझा था. उसी दिन शाम को मैं खिदरपुर बाजार से पक्षी अवलोकन के लिए उपयुक्त एक दूरबीन खरीद लाया. अगले ही दिन मैं ने कालेज स्ट्रीट से पक्षीशास्त्री सलीम अली की ‘भारतीय पक्षियों की गाइडबुक’ भी मंगवा ली. इस के बाद तो जब भी मौका मिलता, मैं एक झोली में बर्ड गाइड, पानी की बोतल और बिसकुट का पैकेट डाल कर, गले में दूरबीन लटकाए किसी बर्डवाचिंग ग्रुप के साथ या कई बार अकेले ही विभिन्न स्थानों में नभचरों को देखने निकल जाता था. धीरेधीरे मैं भी किंगफिशर की ‘किल... किल’, दर्जी पक्षी की ‘ट्वी...ट्वी... ट्वी’, टिटोरी की ‘डिड... ई... डू’, ट्री पाई की ‘कोक... ओ... ली’ इत्यादि ध्वनियों को सुन कर आसपास के झाड़ों में छुपे पंछियों की टोह लेने लगा.
इसी प्रकार दूर आकाश में गश्त लगाते हुए पक्षियों के पंखों और पूंछ के आकार या उन के पंख फड़फड़ाने के आधार पर ही उन व्योमचारियों के गिद्ध अथवा चील होने का मुझे बोध होने लगा.
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बर्ड वाचिंग का चसका लग जाने के बाद अब मैं जब कहीं किसी पंछी को देखता हूं, तो अनायास ही उस के रूप, रंग और हरकतों के आधार पर उसे पहचानने की कोशिश करता हूं. और अगर मैं उस परिंदे का तत्क्षण आकलन नहीं कर पाता हूं, तो तब तक चैन से नहीं बैठ पाता, जब तक कि बर्ड वाचिंग की तमाम किताबों या इंटरनैट को टटोल कर उस पक्षी की पूरी शिनाख्त नहीं कर लेता हूं.
पिछले साल मैं राजस्थान के रामदेवरा स्टेशन पर बीकानेर जाने वाली गाड़ी का इंतजार कर रहा था. वहां सामने बिजली की तारों पर चहकती हुई कुछ बुलबुलों की ओर मेरा ध्यान गया. मुझे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि इन बुलबुलों की पूंछों की जड़ों में गंधक जैसा पीत वर्ण था. इस के पहले मैं ने विभिन्न प्रांतों में बुलबुलों की जिन नस्लों को देखा था, उन की पूंछों की जड़ों में अधिकतर रक्त वर्ण पाया जाता है. मैं ने सूटकेस में से बर्ड गाइड निकाली और उस में भारतीय बुलबुलों की सभी नस्लों के विषय में पढ़ने लग गया. इस बीच प्लेटफार्म पर गाड़ी कब आ कर खड़ी हो गई, इस का मुझे पता ही नहीं चला.
एक कुली के द्वारा आगाह किए जाने पर मैं ने किसी तरह लपक कर ट्रेन पकड़ी. लेकिन चलती गाड़ी से लटकते हुए भी मुझे एक बात का सुकून था. मैं ने पता लगा लिया था कि स्टेशन पर जिन बुलबुलों को मैं देख रहा था, वे व्हाइट ईयर्ड प्रजाति की हैं. ये बुलबुलें हिमालय की तलहटियों से ले कर राजस्थान के शुष्क प्रदेशों में पाई जाती हैं.
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एक बार दिल्ली स्थित जापानी पार्क में भ्रमण करते हुए मुझे सहसा एक पेड़ पर कुछ हरकत दिखलाई दी. दूरबीन से फोकस करने पर वहां मुझे हरे रंग वाला कबूतर दिखाई दिया. मैं ने तुरंत ही अपनी बर्ड गाइड को निकाल कर देखा और पाया कि मेरा अनुमान सही था. वाकई उस पेड़ पर एक हरा कबूतर बैठा हुआ था.
जंगलों में पाए जाने वाले इन अरुणनेत्र पक्षियों को आमतौर पर वृक्षों की घनी हरी पत्तियों के बीच ढूंढ़ पाना बड़ा ही कठिन होता है. दिल्ली के कंक्रीट जंगल से घिरे हुए उद्यान में इस हरियाल विहंगम को खोज निकालने पर मुझे कुछ ऐसी तुष्टि प्रतीत हुई, जो शायद न्यूटन को सेब टपकने पर गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त के अन्वेषण से हुई होगी.
अचानक मैं ने उसी पेड़ की दूसरी शाखा पर शिकरा प्रजाति के एक बाज को बैठे हुए देखा. दूरबीन में बाज की तीक्ष्ण आंखों व वक्र चंचु को देख कर एकबारगी मैं सिहर उठा. लेकिन वह भयंकर ताक्ष्र्यनाशक काफी देरी तक उदासीन भाव से मुझे देखता रहा. अकस्मात उस ने पास ही पौधों की क्यारी में फुदकते हुए एक मेंढक पर झपट कर हमला किया और देखते ही देखते वह उसे अपने नखों में दबोच कर उड़ गया. पहले हरित कपोत से साक्षात्कार और फिर बाज द्वारा मेंढक के शिकार का जीवंत दर्शन... जापानी वाटिका की सैर की मेरी स्मृति आज भी तरोताजा हैं.
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कोरोना संक्रमण के कारण आजकल मेरी जीवनचर्या मुंबई के अपने फ्लैट की चारदीवारी के बीच सिमट कर रह गई है. पक्षी अवलोकन का शौक इस तनावपूर्ण दौर में मेरे लिए एक कारगर स्ट्रेस बस्टर सिद्ध हो रहा है. रोज सुबह मैं अपने कमरे की खिड़की से एक काले पिद्दे यानी पर्पल सनबर्ड को सामने कृष्णचूर के पेड़ पर नवीन कोंपलों के बीच उछलकूद करते देखता हूं. यदाकदा अपनी वक्रचोंच से पुष्पों का रसास्वादन करते हुए वह मदहोश हो कर वृक्ष की टहनी से औंधा लटक जाता है, परंतु रसपान का लोभ नहीं छोड़ता है. कई बार दमकते स्वर्णिम वर्ण वाला एक ओरियल यानी पीलक पक्षी युगल भी इस पेड़ पर आ बैठता है. लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए सदैव भयान्वित यह दिव्यरूपी खगों का जोड़ा बहुत जल्दी ही यहां से उड़ जाता है.
पिप्पल फलों का शौकीन एक कौपरस्मिथ बार्बेट यानी छोटा बसंत तो यहां के अश्वत्थ वृक्ष पर दिन में बारबार आता रहता है. ऐसा प्रतीत होता है कि हरित वर्ण वाले इस फैशनपरस्त पंछी ने छाती पर चटकदार लालपीली जैकेट और सिर पर सुर्ख लाल टोपी पहनी हुई है. इस पेड़ पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए वह दिनभर इस के इर्दगिर्द बैठ कर किसी ठठेरे के द्वारा बरतनों को पीटने सरीखे ‘ठुकठुक’ शब्द का महाघोष करते हुए सभी प्रतिद्वंद्वियों को अपने इस वांछित क्षेत्र में प्रवेश न करने की चेतावनी देता है.
एक अन्य रसिकमिजाज परिंदा तो वक्तबेवक्त मेरे घर के आसपास किस्मकिस्म की सीटियां बजाता फिरता है. यह श्वेतश्याम रंगी मैग्पाई- रौबिन पक्षी है, जो किसी भी ऊंची जगह पर जा बैठ अपनी प्रेमिका के मनोरंजन के लिए अपनी पूंछ को जोरों से उचकाते हुए तरहतरह की धुनें निकालता है. कई बार तो यह निपुण संगीतज्ञ आसपास के दूसरे पक्षियों की बोलियों का अपनी सीटियों में समावेश कर नवीन मेलोडीज का सृजन भी करता है.
पक्षियों की गतिविधियों में ऋतुओं के अनुसार कई परिवर्तन दिखाई देते हैं. कोरोना लौकडाउन जब शुरू हुआ था, उन दिनों नीड निर्माण के लिए टहनियों की तलाश में आकाश का चक्कर लगाती हुई चीलों का ‘ई...ई...ई’ क्रंदन लगातार सुनाई देता था. उन्हीं दिनों कौओं के घोंसलों पर घात लगाए बैठा नर कोयल भी निरंतर ‘कुहू... कुहू’ का राग अलापता था. कई बार कलई खुल जाने पर कौओं के द्वारा खदेड़ी गई मादा कोयल ‘किक... किक... किक’ का कर्कश चीत्कार करती हुई मेरी खिड़की के पास से उड़ती हुई गुजरती थी.
सर्दियों में चीलों और कोयलों का प्रजननकाल न होने के कारण आजकल इन पक्षियों की कूक नहीं सुनाई देती है. लेकिन इन दिनों जब भी समंदर का ज्वार ढला होता है, तब मुझे अपनी खिड़की से दूर सागरतट पर एक लंबी गुलाबी चादर सी बिछी प्रतीत होती है.
दरअसल, मुंबई में कई स्थानों पर हजारों प्रवासी राजहंस (फ्लेमिंगो) आ पहुंचे हैं. गुलाबी और श्वेत रंगों वाले ये लंबाकार पक्षी बड़े यत्न से अपनी गरदनों को झुका कर समुद्र के छिछले पानी में प्लैंक्टन, केंकड़ों, झींगों आदि का शिकार करते हैं.
भले ही कोरोना ने इनसानों के क्रियाकलापों पर अंकुश लगा दिया है, परंतु अन्य सभी प्राणियों की गतिविधियां अभी भी अपने प्राकृतिक स्वरूप के अनुसार पूर्ववत जारी हैं.
रोज शाम को मेरे घर के बाहर पेड़ों पर बहुत से कौओं का जमावड़ा आ बैठता है. लगता है, दिनभर के थकेहारे ये सभी यमदूतक पक्षधर कांवकांव करते हुए आपस में खबरें दे रहे हैं. सूरज ढलने पर इन पक्षियों का कलरव शांत हो जाता है. खिड़की के बाहर अब कई चमगादड़ों के साए मंडराते दिखाई देते हैं. गहन अंधेरा हो जाने पर पास के खंडहर में रहने वाला निशाचर उलूक भी जाग कर अपनी भीषण फुफकार द्वारा इंगित करता है कि वह मूषकों व पक्षी शावकों का आखेट करने के लिए निकल पड़ा है. समय के पाबंद इन सभी पक्षियों के संकेत का अनुमोदन करते हुए अब मैं भी लैपटौप को बंद कर अपने ‘वर्किंग फ्रौम होम’ वाले औफिस की दिनचर्या समाप्त करता हूं.

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