तलाक की अवधारणा हिन्दू धर्म, संस्कृति और समाज के बुनियादी उसूलों से मेल ही नहीं खाती जिसमें औरत को फख्र से पैर की जूती, दासी और नर्क का द्वार करार दिया गया है. धर्म ग्रन्थों में जगह-जगह महिलाओं को निर्देशित किया गया है कि उनका धर्म और कर्तव्य यह है कि वे पति परमेश्वर की सेवा करती रहें फिर चाहे वह कितना ही लंपट, दुष्ट, जुआरी, शराबी, कबाबी, व्यभिचारी और पत्नी पर कहर ढाने बाला क्यों न हो.

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