लेखक- रोहित और शाहनवाज

दिल्ली की सीमाओं पर जहां एक तरफ विभिन्न राज्यों के किसान विवादित कृषि कानूनों के रिपील को लेकर पिछले 85 दिनों से लगातार आंदोलनरत है वहीं इसी बीच पंजाब में निकाय चुनाव हुए जिसका जरूरी शोर मचते मचते तमाम बड़े मीडिया संस्थानों द्वारा दबा दिया गया.

वैसे तो चर्चा हमेशा जीतने वाले पक्ष की गर्म होती है लेकिन इस बार मसला अलग है. जून 2020 में कृषि कानूनों के अध्यादेश आने के बाद से ही पंजाब में भारी उथल-पुथल चल रही है. जिसका संभावित नतीजा निकाय चुनाव में साफ तौर पर माना जा रहा है. भाजपा का सूपड़ा ऐसा साफ हुआ कि जिन इलाकों में वह जीतती भी थी इस बार वह बिल्कुल ही गायब हो चुकी है. मसलन इन निकाय चुनाव में भाजपा और अकाली दल की जो दुर्दशा हुई है वह छुपाए भी नहीं छुप रही.

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