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झुनझुनवाला, पैसा और मौत

यह कोई नई बात नहीं है कि पैसा हर खुशी दे सकता है लेकिन जान नहीं बचा सकता. कितने ही धन्ना सेठ, बड़े शहंशाह, राजनेता, उद्योगपति पैसे के बावजूद अस्मय मौत के शिकार हो चुके हैं. राकेश झुनझुनवाला भी उन में से एक हैं जो अरबों के शेयरों के मालिक थे पर 62 साल की आयु में मौत उसे छीन ले गई और उस का पैसा ताकता रह गया.

इस तरह के मौकों पर पंडितपादरी यह कहना नहीं भूलते कि दान दिया करो क्योंकि पैसा जान नहीं बचा सकता. उन का मतलब असल में यही होता है कि जिस के पास पैसा है वह पंडितों, पादरियों को लगातार दान देता रहे ताकि वे बिना काम किए मौज उड़ाते रहें. इसीलिए राकेश झुनझुनवाला जैसों के उदाहरण दिए जाते हैं कि देखो इतने पैसे का क्या फायदा हुआ.

असल में राकेश झुनझुनवाला ने जिस भी तरकीब से पैसा कमाया, यह तो पक्का है कि चार्टर्ड अकाउंटैंट बनने के बाद एक इन्कम टैक्स अफसर का बेटा इतना अगर कमा लेता है तो वह बहुत कमाल की बात है. अगर उस के तरीके गलत भी थे तो वे नीरव मोदी, विजय माल्या, ललित मोदी की तरह के नहीं थे. वे भारतीय जनता पार्टी के समर्थक थे और इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुरंत श्रद्धांजलि दी पर हरेक भाजपा के अमीर को तो मोदी की कृपा नहीं मिलती. उस में कुछ खासीयत थी कि उस ने बिना लंबेचौड़े आरोपों के पैसा कमाया और एक नई एयरलाइन भी शुरू की थी.

मौत का कोई भरोसा नहीं है पर इस का मतलब यह नहीं कि काम न किया जाए. कमाया न जाए या कमाया हुआ निठल्लों, निक्कमों को दे दिया जाए कि कहीं मौत न आ जाए. मौत पर लोग किसी को याद करते हैं तो इसलिए कि उस ने जीतेजी कमाया. वह लोगों के लिए आदर्श था. लोग उस के रहस्य को जानना चाहते थे. सैकड़ों उस जैसे बनना चाहते थे. अगर राकेश झुनझुनवाला ने पैसा न कमाया होता या सारा दान दे दिया होता तो उन की मौत सिर्फ म्यूनिसिपल रिकौर्ड में दर्ज होती, देशभर के अखबारों व चैनलों की हैडलाइन न बनती.

समाज का निर्माण उन्हीं लोगों ने किया है जिन्होंने मौत के डर को दिमाग से निकाल दिया. कुछ तो 80-90 वर्ष की आयु तक नया काम करते रहते हैं चाहे वे जानते हों कि उस का नतीजा 2-4 साल बाद आएगा और तब तक हो सकता है कि वे जिंदा ही न रहें.

मौत का डर असल में धर्म की देन है. उस ने ही सिखाया है कि पूजापाठ करो, पिरामिंड बनाओ, मुरदों को दफन करो, मरने के बाद भी आदमी की आत्मा रहती है. किसी धर्म में वह एक बार पैदा हो कर स्वर्ग या नर्क में जाता है तो किसी में बारबार जन्म लेता है. पर धर्म मौत की बात करते इसलिए हैं ताकि जीतेजी हरेक से वसूली की जा सके. मौत का डर किसी सिपाही को नहीं होता. एवरेस्ट पर चढऩे वाले को नहीं होता. समुद्र में अनजान राह पर जाने वाले को नहीं होता, नए हवाई अड्डा से पहली उड़ान भरने वालों को नहीं होता.

मौत का भय अमीरों को ज्यादा होता है क्योंकि पंडेपादरी उन के चारों ओर मंडराते रहते हैं, उन से बारबार कहते रहते हैं कि शरीर नश्वर है, आत्मा अजरअमर है, अपने की चिंता न कर पैसा हमें दे दो, तुम्हारी आत्मा का हम ख़याल रखेंगे. राकेश झुनझुनवाला का परिवार भी यही सोचता होगा. अब वे सब अनुष्ठान होंगे जिन में मुख्यतया बातें पैसे की निरर्थकता की ज्यादा होंगी जबकि राकेश झुनझुनवाले को याद इसीलिए किया जाएगा कि उन्होंने भरपूर कमाया और एक इतिहास बनाया.

मेरे पिताजी को शराब पीने की लत है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 21 साल की हूं. मेरे पिता बहुत ज्यादा शराब पीते हैं और जुआ भी खेलते हैं. वे अपनी सारी कमाई इन दोनों बुराइयों में उड़ा देते हैं. इतना ही नहीं, वे घर पर भी हमेशा झगड़ा करते रहते हैं. मैं इस समस्या से कैसे पार पाऊं?

जवाब
आप अपनी पढ़ाईलिखाई और कैरियर पर पूरा फोकस करें. जहां भी नौकरी मिले कर लें और अपने पैरों पर खड़ी होते ही घर से अलग हो जाएं.

ऐसे जुआरीशराबी बाप के साथ नरक सी जिंदगी आप को बहका भी सकती है. जब लड़के घर से अलग हो कर जिंदगी बसर कर सकते हैं, तो लड़कियां भी ऐसा कर सकती हैं. बस, जरूरत हिम्मत और अपने पैरों पर खड़े होने की है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

सब्जी: प्रिया को उस मुद्दे से क्यों चिढ़ हो रही थी?

“तुम मुझे अपनी सब्जी क्यों नहीं खिलातीं कभी? जब देखो तब बहाने लगाती रहती हो. नहीं खिलाना चाहती, यह बोल कर सीधा मना ही कर दिया करो. इस से तो कम ही बुरा लगेगा,” प्रिया गुस्से व अपमान के मिश्रित भाव से दीपा पर चिल्लाई.

दीपा व प्रिया 8वीं कक्षा की छात्राएं हैं, दोनों परम मित्र भी हैं. दोनों के बीच हर चीज का सहज लेनदेन है. लेकिन प्रिया को यह महसूस होता है कि दीपा उस से हर चीज, बात शेयर करती है लेकिन जब भी उस ने उस के लंचबौक्स से सब्जी मांगी, उस ने तुरंत कुछ न कुछ बहाना बना कर मना कर दिया, जैसे मिर्च ज्यादा है या मेरी मम्मी सब्जी अच्छी नहीं बनातीं, तेरा जायका बिगड़ जाएगा आदि .

आज भी जब वे दोनों लंचटाइम में अपना टिफिन बौक्स खोल कर बैठीं तो दीपा के टिफिन से आती खुशबू ने प्रिया के मुंह में पानी ला दिया.

खुशबू के वशीभूत हो उस ने जैसे ही रोटी का कौर दीपा की सब्जी में डालने का प्रयत्न किया, दीपा ने टिफिन को हाथ से ढक कर प्रिया को रोक दिया.

प्रिया को बुरा लगा. उस ने खीझते हुए कहा, “क्या है?”

“तुझे कितनी बार बताया है कि मेरी मम्मी बहुत ही तीखी सब्जी बनाती हैं और तुझे ज्यादा मिर्च पसंद नहीं है,” दीपा ने सफाई दी.

कभी चखने देगी तो पता चलेगा न कि आंटी कितना मिर्च डालती हैं. नहीं पसंद आएगी तो खुद ही मना कर दूंगी. खाने तो दे पहले,” प्रिया ने दीपा का हाथ टिफिन पर से हटाने की कोशिश की.

“प्रिया, मैं मना कर रही हूं न”.

“नहीं दूंगी मैं तुझे,” दीपा ने गुस्से से कहा.

“क्यों, क्यों नहीं देगी? मैं कभी मना करती हूं तुझे? तू यह बोल न कि अपना खाना मुझे खिलाना ही नहीं चाहती. शायद तू मेरा जूठा नहीं खा सकती, इसीलिए बहाने बनाती है. ठीक है, आज के बाद कभी नहीं कहूंगी तुझे कुछ भी और न ही तेरे साथ बैठ कर खाऊंगी, समझी? रह खुश,” प्रिया गुस्से में बरस कर उठी और अपना टिफिन उठा कर कमरे से बाहर चली गई.

दीपा की आंखें छलछला उठीं.

सब्जी को ले कर दोनों में अबोला हो गया. यह शीतयुद्ध 3 दिन जारी रहा और चौथे दिन भोजनावकाश के समय दीपा उधर चल दी जहां प्रिया बैठी थी. वहां जा कर उस ने अपना टिफिन खोल कर प्रिया के सामने रख दिया.

प्रिया ने देखा और फिर अनदेखा किया.

दीपा ने टिफिन और आगे खिसकाया प्रिया की नजरों की बिलकुल सीध में, फिर उस के सामने खुद बैठ गई. देखा, प्रिया बात करने को तैयार ही नहीं है तो एक लंबी सांस ली और प्यार से बोली, “खा ले, आलूमटर है, तेरा पसंदीदा.”

सब्जी की खुशबू प्रिया के नथुनों से हो कर उस के पेट व दिमाग में उथलपुथल मचा रही थी लेकिन यों एक सब्जी के लिए वह अपना आत्मसम्मान नहीं छोड़ सकती थी. उस ने खुद को मजबूत किया. अपना ईगो नहीं छोड़ा और बोली, “नहीं खानी, मेरे पास है.”

दीपा (प्यार से) बोली, “खा ले न, स्पैशल तेरे लिए बनवा कर लाई हूं मम्मी से, प्लीज.”

प्रिया ने आंखें तरेरीं, “आज आंटी मिर्च डालना भूल गईं?”

“देख, ज्यादा दिमाग मत लगा, चुपचाप खा ले,” दीपा ने प्यार से झिड़कते हुए कहा.

प्रिया बोली, “नहीं खानी.”

दीपा बोली, “क्यों?”

प्रिया ने जवाब दिया, “जब मांगती हूं तब तो देती नहीं. अब बिना जरूरत के कटोरा लिए बैठी है सामने. नहीं चाहिए.”

दीपा के चेहरे पर पीड़ा उभर आई.

उस ने मनुहार की, “खा ले, प्रिया, पैर पकडूं? देख, नया टिफिन भी लाई हूं तेरे लिए.”

“प्लीज, मुझे ये चोंचले मत दिखा…नया टिफिन? हुंह,” प्रिया ने मुंह बनाया और अपने इरादे पर दृढ़ रही.

दीपा ने कहा, “प्रिया, खा ले वरना मैं तुझ से कभी बात नहीं करूंगी.”

प्रिया बोली, “मत कर. मैं कौन सी मरी जा रही हूं.”

दीपा के आंसू नयनों की परिधि लांघ गए. उस ने एक पल प्रिया को निहारा और उठ कर चल दी.

उस का जाना प्रिया के आत्माभिमान पर चोट कर गया और वह एक पल में तूफान में औंधे पड़े वृक्ष की तरह छटपटा उठी और पीछे से जा कर दीपा का हाथ पकड़ रोक लिया.

अपनी बेस्ट फ्रैंड का दिल दुखाने पर उपजी पीड़ा को छिपाने की नाकाम कोशिश करती हुई वह नाटकीय गुस्से में बोली, “क्या है? खा रही हूं न. जब देखो, भागने की जल्दी लगी रहती है. जरा सा गुस्सा भी न कर सकूं?”

दीपा (आंसू पोंछते हुए विस्मय से), “जरा सा?”

प्रिया बोल पड़ी, “और क्या, बदला तो लेना ही चाहिए न? मुझे भी इतना ही बुरा लगता है जब तुम झट से सब्जी के लिए न कर देती हो.”

दीपा मुसकराई, “ले लिया बदला?”

प्रिया बोली, “हां, चल, अब खाना खाते हैं, भूख लगी है.”

दोनों मुसकरा देती हैं और मेज पर रखे टिफिन के सामने खाना खाने को बैठ जाती हैं.

खाते हुए प्रिया ने कहा, “दीपा, सचसच बता, तू हमेशा मुझे सब्जी खिलाने से मना क्यों कर देती है जबकि परांठे और अचार के लिए तू कभी मना नहीं करती? तुझे किसी का जूठा खाना पसंद नहीं, तो अलग से भी तो दे सकती है.”

दीपा खामोशी से कौर चबाते प्रिया को देखती रही लेकिन बोली कुछ नहीं.

प्रिया फिर बोली, “और आज यह नया टिफिन क्यों?”

दीपा ने अब भी कोई जवाब नहीं दिया.

प्रिया (अब खीझ कर) बोली, “बता न.”

दीपा गहरी सांस ले कर शांत स्वर में बोली, “सचमुच जानना है?”

प्रिया ने कहा, “हां.”

दीपा ने कहा, “पता नहीं तुझे कैसा लगेगा इस के पीछे की वजह जान कर. लेकिन सुन, चौथी क्लास में मैं ने पड़ोस में रहने व साथ पढ़ने वाली एक लड़की को अपने साथ खाना खिला लिया था. वह लड़की उस समय मेरी बहुत अच्छी दोस्त थी. हम बचपन में साथ खेले, साथ पढ़े थे. एक दिन वह अपना टिफिन लाना भूल गई तो मैं ने उसे अपने साथ लंच करवा लिया. यह बात जब उस के घर वालों को पता चली तो उसे बहुत डांट पड़ी और उन लोगों के ताने बातोंबातों से सफर कर हम लोगों तक पहुंचे थे. बहुत बुरा लगा. मेरी मम्मी से भी मुझे डांट मिली. उस के बाद धीरेधीरे हम दोनों के बीच दूरी बनती चली गई जो अब तक कायम हैं .

प्रिया (अचरज से) बोली, “ऐसा क्यों?”

दीपा ने कहा, “क्योंकि वह लड़की ब्राह्मण थी.”

प्रिया ने कहा, “तो?”

दीपा बोली, “मैं धानक हूं.”

प्रिया (हलका चौंक कर) बोली, “अच्छा.”

दीपा ने कहा, “और तू भी ब्राह्मण है.”

प्रिया ने कहा, “इस से क्या फर्क पड़ता है? मैं ऐसा नहीं सोचती.”

दीपा ने कहा, “तुझे मैं समझती हूं लेकिन तेरे घर वाले? उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगेगा.”

प्रिया बोली, “क्या यार, तू भी. पिछली क्लास में हम ने पढ़ा नहीं था कि अस्पृश्यता, छुआछूत, जातिवाद कानूनी अपराध बोलियां हैं और सामाजिक कुरीतियां भी?”

दीपा ने कहा, “पढ़ा था हम ने, हमारी मम्मियों ने नहीं.”

प्रिया बोली, “अब बदल रहा है यार सब. तू कैसी बातें कर रही है.”

दीपा ने कहा, “हां, मानती हूं यह बात. बहुतकुछ बदला है लेकिन सबकुछ नहीं. तू ही बता हम जैसों के लिए तेरे घर में चाय के कप अलग से रखे हुए हैं न, क्यों?”

दीपा ने सवाल गंभीर आवाज व गहरी निगाह के साथ पूछा था जिस की उम्मीद प्रिया को कतई न थी. वह ऐसे सकपकाई जैसे चोर की चोरी रंगे हाथों पकड़ी गई हो. क्या बोलती वह.

दीपा (प्रिया की आंखों में झांकते हुए) आगे बोली, “प्रिया, मेरी दोस्त, हमारी किताबों में क्या लिखा है, इस से अधिक माने हैं हमारे दिमागों में क्या लिखा है? बातों को रटने की नहीं, समझने की जरूरत होती है. तुझे मैं जानती हूं, समझती हूं. तेरा मन बहुत अच्छा है लेकिन तेरा मन सारे समाज का मन नहीं है. हम लोग अंडे खाते हैं, कभीकभी मांस भी. मुझे पता है कि तू शुद्ध शाकाहारी है, इसलिए तुम्हें मैं अपने घर की सब्जी नहीं खिलाना चाहती क्योंकि हम मांस और सब्जी एक ही कड़ाही में बनाते हैं,” यह कहतेकहते दीपा ने गहरी सांस ली.

प्रिया का सिर चकराने लगा था. समझ नहीं आ रहा था उसे कि वह क्या बोले. कहां सब्जी की बात और कहां यह मुद्दा? उलझ गई वह.

उस ने अजीब सी निगाहों से दीपा से सवाल किया, “तू मांस खाती है?”

दीपा ने कहा, “अब नहीं.”

प्रिया ने पूछा, “मतलब?”

दीपा ने कहा, “पहले खाती थी, अब छोड़ दिया.”

प्रिया ने आगे पूछा, “क्यों?”

दीपा (शरारत से मुसकरा कर) बोली, “तूने कहा था, इसलिए.”

प्रिया हैरत से बोली, “मैं ने… कब…?”

दीपा बोली, “तब जब ‘जैव विविधता एवं संरक्षण’ पाठ पढ़ते हुए तूने मांसाहार पर भावुक होते हुए कहा था, ‘यार, कैसे लोग हैं दुनिया में? अपने स्वाद के लिए मासूम जानवरों का दर्द भी महसूस नहीं करते. संसार में खाने की चीजों की कमी है क्या?’ यह बात लगी मुझे भीतर तक. तब से मैं वैजिटेरियन हूं.”

इतना कह कर दीपा मुसकराई. उस की इस मुसकराहट में प्रिया ने भी साथ दिया.

कुछ देर दोनों खामोश बैठी रहीं, फिर दीपा ने टिफिन खोला और बोली, “अच्छा सुन, खाना खाते हैं. आज तेरे लिए मम्मी से कह कर स्पैशल नई कड़ाही में सब्जी बनवाई है और टिफिन भी नया है. भई, तुम ऊंची जाति वालों का धर्म…” कहतेकहते दीपा की नजर प्रिया पर पड़ी. उस की आंखों में आंसू थे. दीपा घबरा गई, पूछा, “क्या हुआ, प्रिया? अब तो सब्जी का मसला हल हो गया है, यार. तो फिर ये आंसू?”

प्रिया उठी और दीपा के पास आ कर उसे कस कर गले लगा लिया. फिर भर्राए गले से बोली, “बकवास बंद कर अपनी, समझी? तू क्या है, मैं क्या हूं, ये छोटी बातें नहीं सोचती मैं. हम दोस्त हैं, बस. कल भी, आज भी और आगे भी. बात खत्म.

इतना कहकर दोनों ने एकदूजे पर अपनी बांहों की पकड़ और अधिक कस ली और एकदूसरे के कंधे भीगने लगे प्रेमनीर से.

पहाड़ की फायदेमंद मूली 

पहाड़ में पैदा होने वाली मूली भी मैदानी मूली की ही तरह खाद्य जड़ों वाली सब्जी है, जो कि क्रूसीफैरी परिवार की सदस्य है. मूली इतनी आसानी से पैदा होने और फैलने वाली फसल है कि यह न तो अधिक देखभाल मांगती है और न ही बहुत अधिक खाद आदि.  पहाड़ी मूली तकरीबन 2 किलो से 3 किलो वजन की होती है

दरअसल, यह एक जल्दी उगने वाली और सदाबहार फसल है. इस की जड़ें विभिन्न रंगों जैसे सफेद से लाल और हलके भूरे रंग की होती हैं.

पहाड़ी क्षेत्र में कुमाऊं मंडल, गढ़वाल, हिमाचल प्रदेश आदि मुख्य मूली उत्पादक राज्य हैं. पहाड़ की मूली के लिए अगस्त महीने का समय खेत तैयार कर के उत्पादन के लिए सही है.

पिछले कुछ सालों से पहाड़ में मूली की खूब पैदावार हो रही है. मूली की मांग हर शहर, हर गांवकसबे में सालभर बनी रहती है. वर्तमान में दूसरी फसलों की तरह मूली के दाम भी बहुत महंगे होते हैं.

मूली की खेती से अच्छा मुनाफा कमाने के लिए हाईब्रिड मूली की खेती करनी चाहिए, क्योंकि हाईब्रिड मूली का बीज बोने से उन की जड़ें दूध की तरह सफेद, लंबी और चमकदार होती हैं, इसलिए आप को बीज भंडार की दुकानों पर तमाम तरह की उन्नत किस्में मिल जाएंगी.

अगर हम मूली की उन्नत किस्मों की बात करें, तो पंजाब अगेती, पंजाब सफेद, पूसा देशी, पूसा चेतकी, जौनपुरी, बांबे रैड, पूसा रेशमी, अर्का, कल्याणपुर आदि के बीज मिल जाएंगे. मूली अगर घर पर ही गमले या मोटे डब्बे में लगाने जा रहे हैं, तो अखबार की गली हुई खाद और पत्तों को मिट्टी में मिला कर एक दिन बाद बीज बोने चाहिए. गमले या टीन और गत्ते के बक्से में मूली बहुत अच्छी होती है.

गमले में मूली लगाने का न कोई सीजन होता है और न ही मौसम. कभी भी मूली का बीज लगाया जा सकता है. अगर अगस्त महीने में मूली की खेती करते हैं, तो इन दिनों मूली के बीजों की बोआई मेंड़ पर नहीं की जाती है, बल्कि इन दिनों छिटकवां विधि से बोआई करते हैं, जैसे गेहूं की बोआई की जाती है.
3-4 दिन में अंकुरण होने के तुरंत बाद हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. इस के अलावा अगर मूली की खड़ी फसल में खरपतवार लग जाएं, तो हाथ से निकाल दें.

मूली की बोआई के तकरीबन 30-40 दिन बाद वह मंडियों में बेचने लायक तैयार हो जाती है. इन की जड़ों को हाथ से बहुत ही आसानी से उखाड़ कर उन्हें पानी से धो कर मंडी तक ले जाया जाता है.

मूली को खेत से उखाड़ने से पहले हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. ऐसा करने से जड़ें टूटने से बच जाती हैं. यदि सब्जी मंडी आप के गांव के नजदीक है, तो इन्हें सुबह उखाड़ कर धोएं और यदि मंडी गांव से दूर शहर में है, तो शाम के समय ही खेत से उखाड़ कर अच्छी तरह धो कर ले जाना चाहिए.

खेत से मूली को उखाड़ने के बाद साफ पानी से धुलाई करते समय पीली और खराब पत्तियों को निकाल देना चाहिए. साथ ही, ऐसी मूली, जिन की जड़ें उखाड़ते समय टूट गई हैं, उन्हें भी निकाल देना चाहिए. इस के बाद जूट की बोरियों की झिल्ली बना कर उस में मूली को अच्छी तरह बांध कर और ऊपर से पानी डाल कर सब्जी मंडी में ले जाना चाहिए.

इस तरह से मूली की मार्केटिंग करने से जड़ें ताजी रहती हैं और इन के दाम भी अच्छे मिलते हैं, जिस से मूली की खेती से कमाई बहुत अच्छी होती है. मूली की प्रोसैसिंग कर इस का सलाद और अचार बना कर बाजार में बेच सकते हैं, जिस से उत्पादक को और भी ज्यादा मुनाफा होगा.

त्यौहार 2022: मेहमानों के लिए बनाएं ये खास स्प्रिंग डोसा और इडली अप्पम

त्योहारों की बात हो और खानेपीने का जिक्र न हो तो सब अधूरा है. लजीज पकवानों, जायकेदार खाना, चटपटे स्नैक्स, शीतल पेय, लुभावनी मिठाइयों के बिना भला क्या मजा त्योहारों का.

  1. स्प्रिंग डोसा

सामग्री :

3 कप चावल, 1 कप उड़द की धुली दाल, 1 छोटा चम्मच मेथीदाना, 1/2 चम्मच बेकिंग सोडा, नमक स्वादानुसार. भरने के लिए मसाला :  6 से 7 मैश किए हुए उबले आलू , 1/2 कप फ्रोजन मटर, 2-3 हरी मिर्चें बारीक कटी हुई, 2 प्याज बारीक कटे हुए, अदरक एक टुकड़ा कद्दूकस किया हुआ, 4 गाजर कसी हुई, 1 चम्मच राई, 2 चम्मच तेल, 1/2 चम्मच जीरा, 1/2 चम्मच हल्दी पाउडर, 1/2 चम्मच धनिया पाउडर, 1/2 चम्मच अमचूर, 1/2 चम्मच लाल मिर्च पाउडर, थोड़ा हरा धनिया बारीक कटा हुआ, नमक स्वादानुसार, डोसा तलने के लिए तेल जरूरत के अनुसार.

विधि :

  • डोसा बनाने के लिए सब से पहले उस का घोल तैयार करें. इस के लिए धुली उड़द की दाल और मेथीदाना को साफ कर के धो कर रातभर पानी में भिगो कर रख दें.
  • चावल भी साफ कर के अलग बरतन में भिगो कर रख दें.
  • मेथीदाना और उड़द की दाल का पानी निकाल कर बारीक पीस लें.
  • चावल को भी कम पानी में डाल कर पीस लें. अब दोनों मिश्रण को मिक्सी में दोबारा पीस कर गाढ़ा घोल तैयार कर लें.
  • अब इस में नमक और बेकिंग सोडा डाल कर ढक कर गरम जगह पर 12 से 15 घंटे के लिए रख दें.
  • यह मिश्रण फूल कर दोगुना हो जाता है. यह डोसा बनाने के लिए तैयार है. 
  • डोसा में भरने के लिए अब मसाला तैयार कर लें. कड़ाही में तेल डाल कर आंच पर चढ़ाएं.
  • जब तेल अच्छी तरह से गरम हो जाए तो इस में राई और जीरे का तड़का दें. जीरा भुनने के बाद इस में कटी प्याज, हरी मिर्च, अदरक डाल कर फ्राई करें.
  • इमें हल्दी और धनिया पाउडर मिक्स कर के हलका सा फ्राई करें. भुने मसाले में फ्रोजन मटर, मैश किए आलू, नमक, कसी गाजर, अमचूर पाउडर और लाल मिर्च पाउडर को डाल कर मिक्स करें.
  • आंच बंद कर दें. इस में कटा हुआ हरा धनिया मिला दें. अब मसाला डोसा में भरने वाला मसाला तैयार हो गया.
  • अब डोसा बनाने के लिए पहले से तैयार घोल को देखें. यह ज्यादा गाढ़ा न हो.
  • गैस पर नौनस्टिक तवा रखें. जब तवा गरम हो जाए तो गैस धीमी कर दें.
  • गीले कपडे़ से तवे को पोछ दें. पहली बार तवे पर थोड़ा सा तेल लगा कर हलका सा चिकना कर लें.
  • अब बड़ा चम्मच डोसा घोल ले कर तवे के बीच डाल कर चमचे को गोलगोल घुमाते हुए डोसे को तवे पर फैला दें. थोड़ा सा तेल डोसे के चारों तरफ लगा दें.
  • जब डोसे की ऊपरी सतह ब्राउन सी दिखने लगे तब डोसे की ऊपरी परत पर 3 चम्मच आलू मसाला फैला दें.
  • स्प्रिंग डोसा बनाने में यह मसाला ज्यादा रखा जाता है. डोसे को मोड़ लें.
  • इस को सावधानी से दूसरी प्लेट में रख लें. अब डोसे को पीस में काट लें.
  • टमाटर, धनिया, कसी गाजर और नारियल चटनी के साथ इस को सर्व करें.

इडली अप्पम

सामग्री :

2 कप इडली बैटर, 2 शिमला मिर्च, 2 बड़े चम्मच सोया सौस, 1 छोटा चम्मच सिरका, बारीक कटा अदरक, हरा धनिया, 2 बड़े चम्मच तेल, 1/2 छोटा चम्मच चिली सौस, 1 छोटा चम्मच नमक, 1/4 छोटा चम्मच लाल मिर्च पाउडर.

विधि :

  • इडली अप्पम बनाने के लिए अप्पम मेकर में इडली बैटर भरते जाएं.
  • 2 मिनट धीमी आग पर तब तक पकाएं जब तक दोनों तरफ भूरा न हो जाए. 
  • अब एक पैन में तेल गरम कर लें. उस में कटी हुई शिमला मिर्च और कटा अदरक भूनें. फिर टोमैटो सौस, चिली सौस, सिरका, सोया सौस, लाल मिर्च पाउडर अच्छी तरह मिलाएं और इस में अप्पम डालें.
  • अब इसे धनिया पत्ती से सजा कर गरमगरम परोसें ताकि खाने वाले कह उठें वाह.

साथ में शैलेंद्र सिंह

पूजा चोपड़ा: खुद के सपने को खुद करें पूरा

पूजा चोपड़ा उन हजारों लड़कियों में से एक है, जिनके जन्म से पिता खुश नहीं थे, क्योंकि वे एक बेटे के इंतजार में थे. यही वजह थी कि पूजा की माँ नीरा चोपड़ा अपने दोनों बेटियों के साथ पति का घर छोड़ दिया और जॉब करने लगी. इस दौरान परिवार के किसी ने उनका साथ नहीं दिया, पर उनकी माँ ने हिम्मत नहीं हारी और एक स्ट्रोंग महिला बन दोनों बेटियों की परवरिश की. आज बेटी और अभिनेत्री पूजा अपनी कामयाबी को माँ के लिए समर्पित करना चाहती है और जीवन में उनकी तरह ही स्ट्रॉग महिला बनने की कोशिश कर रही है.

असल में पूजा चोपड़ा एक भारतीय मॉडल-फिल्म अभिनेत्री हैं. वह वर्ष 2009 की मिस फेमिना मिस इंडिया का ताज अपने नाम कर चुकी हैं. पूजा चोपड़ा का जन्म 3 मई वर्ष 1986 पश्चिम बंगाल के कोल्कता में हुआ था. पूजा चोपड़ा ने अपनी शुरुआती पढाई कोलकाता और पुणे से पूरी है. कई ब्यूटी पेजेंट जीतने के बाद उन्होंने मॉडलिंग शुरू की और धीरे-धीरे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी साख जमाई.

 

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मानसिकता कम करना है जरुरी

अभिनेत्री पूजा आगे कहती है कि इस फिल्म की कहानी आज की है, केवल लखनऊ की नहीं, बल्कि मुंबई, पुणे, दिल्ली आदि में भी रहने वाली कुछ महिलाओं की हालत ऐसी ही होती है. आज भी पत्नी ऑफिस से आने पर घर के लोग, उसके ही हाथ से बने खाने का इंतजार करते है, ये एक मानसिकता है, जो हमारे देश में कायम है, इसे मनोरंजक तरीके से इस फिल्म में बताने की कोशिश की गई है. स्क्रिप्ट बहुत अच्छी है और मैंने इसमें एक मुस्लिम लड़की की भूमिका निभाई है, जो आत्मनिर्भर होना चाहती है.देखा जाय तो रियल लाइफ में मुस्लिम लड़कियों को बहुत दबाया जाता है, ऐसे में मेरे लिए एक मुस्लिम लड़की की भूमिका निभाना बड़ी बात है, क्योंकि मैं भी स्ट्रोंग और आत्मनिर्भर हूँ. इससे अगर थोड़ी सी भी मेसेज प्रताड़ित महिलाओं को जाएँ, जो खुद को बेचारी समझती है और सहती रहती है,तो मुझे ख़ुशी होगी.

अलग चरित्र करना है जरुरी

पूजा हंसती हुई कहती है कि इससे चरित्र से मेरा कोई मेल नहीं है, ये लड़की सकीना शादी-शुदा है और अंदर से खाली है. शादी के बाद उसके मायके वालों से उसका कोई रिश्ता नहीं है. उनकी एक गूंगी सास और पति है, वह घर पर खुद को स्ट्रोंग दिखाती है, पर अंदर से कमजोर है. उस पर काफी जुल्म होता है, पर वह घर से निकल नहीं सकती. इसका सबसे अधिक और बड़ा उदहारण मेरी माँ नीरा चोपड़ा है, जिसने दो बेटियों को लेकर बाहर निकल आई. एक पल के लिए उन्होंने कुछ सोचा नहीं, उन्होंने कई बड़ी-बड़ी होटलों में काम किया है. आज भी वह काम करती है. इस फिल्म में सकीना अंदर से कमजोर है, उसका कोई इस दुनिया में नहीं है, पति और सास उसपर अत्याचार के रहे है अब उसके पास 3 आप्शन है, या तो वह इसे सहती जाय, कुछ बोली तो घर से निकाल दिया जाएगा और घर से निकालने पर वह जायेगी कहा. अकेली कमजोर होते हुए खुद को मजबूत जाहिर करना बहुत चुनौतीपूर्ण था.

 

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बदलाव को करें सेलिब्रेट

पूजा कुछ बदलाव आज देखती है और कहती है कि पारंपरिक परिवारों में आज भी महिलाओं पर अत्याचार होते रहते है, लेकिन इसके लिए किसी पर ऊँगली उठाना ठीक नहीं. दूसरों को कहने से पहले खुद को सम्हालना जरुरी है. अभी बहुत कुछ बदला है. आज महिलाओं को काफी घरों में सहयोग मिलता है. इसे सेलिब्रेट करने की जरुरत है. पूरी बदलावहोने में समय लगेगा. विश्व प्लेटफार्म पर आजकल शादी-शुदा महिला को भी ब्यूटी कांटेस्ट में भाग लेने का मौका मिलता है, ये बहुत बड़ी बदलाव है.

मिली प्रेरणा

पूजा ने कॉलेज में एक्टिंग या मॉडलिंग के बारें में दूर-दूर तक सोचा नहीं था, क्योंकि स्कूल कॉलेज में वह टॉम बॉय की तरह थी. लेकिन उसकी हाइट अधिक होने की वजह से उन्होंने कई फैशन शो और ब्यूटी कांटेस्ट में भाग लिया और जीत भी गई.पुणे में उन्होंने काफी प्रतियोगिताए जीती इससे उनके अंदर एक कॉन्फिडेंस आया. आसपास के दोस्त और रिश्तेदारों ने भीबड़ी-बड़ी होर्डिंग मर पूजा की तस्वीरें देखकर तारीफ़ करने लगे फिर उन्होंने  एक्टिंग की तरफ आने के बारे में सोचा.

 

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मिला सम्मान

अभिनेत्री पूजा कहती है कि मैंने मिस इंडिया के लिए काफी मेहनत की थी, क्योंकि मुझे जीतना था और मिस वर्ल्ड में देश की प्रतिनिधित्व करना था. मैं पहली भारतीय थी, जिन्होंने ब्यूटी विथ पॉर्पोज अवार्ड जीती थी. मिस इंडिया के बाद फिल्मों के ऑफर आने लगे थे और मैंने किया. मिस इंडिया जीतने से लोगों के बीच एक सम्मान और ओहदा मिला, जो एक नार्मल पूना से आई हुई लड़की को नहीं मिलता. किसी से मिलना चाहती हूँ तो वो इंसान टाइम देता था. इससे जर्नी थोड़ी आसान हो गयी थी, लेकिन बाद में टैलेंट ही आपको आगे ले जाती है.

काम में पूरी शिद्दत

पूजा का कहना है कि मैं आउटसाइडर हूँ, इसलिए मुझे सोच-सोचकर कदम बढ़ाना है ये मैं जानती थी. इसके अलावा मैंने अपनी माँ से शिद्दत और मेहनत से काम करना सीखा है. मुझे सोशलाईज होना  पसंद नहीं, मेहनत और लगन  से ही काम करना आता है. मैं जिस किसी काम को आज तक किया, उसमे मैंने सौप्रतिशत कमिटमेंट देना सीखा है.

 

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करती हूँ सोशल वर्क

सोशल वर्क करने के बारें में अभिनेत्री पूजा बताती है कि सोशल वर्क मैं करती हूँ, क्योंकि ऐसी कई लडकियां होंगी, जो मेरी तरह ऐसी माहौल से गुजरी होंगी, मेरी माँ की तरह उन्होंने भी कष्ट झेले होंगे, या कही अनाथ होंगी. ऐसे में मैं उनकी कुछ मदद कर सकूँ, तो वह मेरे लिए अच्छी बात होगी. मैं अपने स्तर पर जो संभव हो करती जाती हूँ.

मिला परिवार का सहयोग

पूजा के जीवन में उसकी माँ और दीदी का बहुत सपोर्ट रहा, जिसकी वजह से वह यहाँ तक पहुँच पाई है. वह कहती है कि मेरा सपना हैं कि मेरी माँ का 12 घंटे काम कर थक जाना अच्छा नहीं लगता, मैं उन्हें एक ऐसी जिंदगी दे दूँ,जिसमे वह खुश होकर अपनी जिंदगी बिता सकें और कहे कि अब मैं बहुत खुश हूँ,मैंने देखा है कि मेरी माँ खुश होने पर ग्लो करती है. मेरी दीदी जॉब करती है. उन्होंने भी मुझे यहाँ तक आने में बहुत सहयोग दिया है, जब मैं 7 वीं कक्षा में थी तो मेरी दीदी उस समय कॉलेज जाती थी. उन्होंने सुबह 4 बजे उठकर शेयर रिक्शा में पुणे में 6 से 7 किलोमीटर कैंट एरिया में जाकर अखबार वितरितकरती थी. उससे आये एक्स्ट्रा पैसे से मैंने ट्यूशन लिया, क्योंकि मैं हिंदी और मराठी में बहुत कमजोर थी. मेरी दीदी मुझसे 4 साल बढ़ी है और उन्होंने मुझे नहलाना, धुलाना, खाना खिलाना आदि करती थी, क्योंकि माँ जॉब करती थी और सुबह निकलकर रात को आती थी. इस तरह से मेरी दो माएं है.

खुद के सपने को खुद करें पूरा

पूजा महिलाओं को मेसेज देना चाहती है कि खुद को पुरुषों से कभी कम न समझे, जो भी सपना उन्होंने देखा है, उसे उठकर खुद पूरा करें, खुद में आत्मविश्वास रखें. अभी महिलाएं,वार फील्ड से लेकर हर क्षेत्र में काम कर रही है. पुरुषों को चाहिए कि वे महिलाओं को आगे आने में सपोर्ट करें, लड़कियों को लड़कों से कभी कम न आंके.

स्वरा भास्कर: बनाए रखें शादी से पहले की फ्रेंडशिप को, पढ़ें इंटरव्यू

अभिनेत्री स्वरा भास्कर खुद को कंट्रोवर्सी चाइल्ड क्यों कहती है, आइये जानें

स्पष्टभाषी और साहसी अभिनेत्री स्वरा भास्कर (Swara Bhaskar) अक्सर ही अपने बयानों को लेकर सुर्खियों में रहती हैं. यूजर्स उनको ट्रोल करने का कोई मौका भी अपने हाथ से जाने नहीं देते. उन्होंने हिंदी सिनेमा जगत से लेकर देश-दुनिया से जुड़े हर मु्द्दे पर अपनी बेबाक राय रखी हैं. हाल में उन्होंने ‘बायकॉट बॉलीवुड’ ट्रेंड पर काफी सारे ट्वीट्स किए थे.स्वरा ने आम लोगों को ही इसका जिम्मेदार ठहराया है.जो उसकी सत्यता को जाने बिना ही ट्रोल करते है. कंट्रोवर्सी के बारें में स्वरा का कहना है कि मैं कंट्रोवर्सी में ही पली-बड़ी हुई हूँ. मुझे ‘कंट्रोवर्सी चाइल्ड’ कहलाना ही ठीक रहेगा. ये सही है कि पब्लिक लाइफ में कंट्रोवर्सी होती है. उसे झेलना पड़ेगा, उससे बचपाना संभव नहीं. मगर मैंने कोई फूहड़ बात नहीं कही है और बातों की नियत और आदर्श सही है, तो किसी भी गलत बात के लिए मैं अवश्य खड़ी रहूंगी और लडूंगी भी. जिसपर मेरा विश्वास होता है, मैं उसके लिए सामने खड़ी हूं, मेरी बातें सालों बाद उन्हें सही लगेगा. मैं वैसे ही कंट्रोवर्सी को लेती हूँ और देखा जाय तो कंट्रोवर्सी केवल 3 दिन तक चलती है.

किया संघर्ष

यहाँ तक पहुँचने में स्वरा ने बहुत मेहनत करनी पड़ी. वह कहती है कि अगर कोई जानने वाला इंडस्ट्री से नहीं है, तो संघर्ष करना ही पड़ता है, पर मुझे काम जल्दी मिल गया और अभी भी कर रही हूँ. मुझमें मेहनत और धीरज की कोई कमी नहीं, दर्शकों का साथ ही मेरी प्रेरणा है.

 

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एक्टिंग पर किया फोकस

‘निल बट्टे सन्नाटा’ फिल्म से चर्चित होने वाली अभिनेत्री स्वराभास्कर, तेलुगु परिवार में जन्मी और उनका पालन-पोषण दिल्ली में हुआ. वहां से स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त कर अभिनय करने मुंबई आईं और कुछ दिनों के संघर्ष के बाद फिल्मों में काम मिलने लगा. उन की पहली फिल्म कुछ खास नहीं रही, पर ‘तनु वैड्स मनु’ में कंगना रनौत की सहेली पायल की भूमिका निभा कर उन्होंने दर्शकों का दिल जीत लिया.स्वरा भास्कर के पिता उदय भास्कर नेवी में औफिसर थे. अब वे रक्षा विशेषज्ञ हैं और मां इरा भास्कर प्रोफेसर हैं.

 

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है चुनौती अभिनय में

इन दिनों स्वरा फिल्म ‘जहाँ चार यार’ में एक सहमी हुई गृहणी की भूमिका निभा रही है, जो उसके रियल लाइफ के चरित्र से बहुत अलग है, लेकिन उन्होंने इसे एक चुनौती की तरह लिया है और अपनी नानी की चरित्र से प्रेरित होकर इस भूमिका को निभाई है.उनकी नानी रमा सिन्हा की शादी 15 साल में हुई थी और इतनी कम उम्र में उन्होंने पूरे परिवार को सम्हाला था. इससे स्वरा बहुत प्रेरित हुई. स्वरा कहती है कि दोस्ती और रोड ट्रिप पर कई फिल्में बनी है, लेकिन शादी-शुदा महिलाओं को मुख्य किरदार में और उनकी दोस्ती को लेकर ऐसी फिल्में निर्माता, निर्देशक कम बनाते है. अधिकतर फिल्मों या टीवी में महिलाओं को प्रताड़ित और दुखी दिखाया जाता है, जिसे आज तक दर्शक देखते आ रहे है. ये सही भी है कि हमारे घर के चाची, मामी, नानी, दादी, माँ आदि के सपनों, उनकी खुशियों का ख्याल बहुत कम रखा जाता है. उनके जीवन में कुछ मजे या कुछ दिन चूल्हा- चौके से मुक्ति होकर खुद पर ध्यान दे सकती हो, क्योंकि उन्हें देखने, समझने वाला कोई नहीं होता. कही जाना हो, तो महिलाएं नहा-धोकर पसीने से तर-बतर होकर टिफिन पैक करती है, उनके परिश्रम को किसी ने आजतक महसूस नहीं किया है.  ऐसे में निर्देशक कमल पांडे इस कहानी को लेकर आये है, जो शादी-शुदा महिलाओं की कहानी है, जिसमे उनकेसपने, दोस्ती,मौज मस्ती, ट्रिप आदि को दर्शाने की कोशिश की गयी है.

कठिन था शूट करना

एक दृश्य को शूट करते हुए स्वरा बहुत परेशान हुई . वह हंसती हुई कहती है कि मुझे पानी में भीगना एकदम पसंद नहीं. एक दृश्य में मुझे पानी में शूट करना पड़ा. मैं पूरी तरह से भींग चुकी थी. मुझे गीला होना पसंद नहीं. मुझे तैरना भी बहुत कम आता है. इसके अलावा इसकी शूटिंग कोविड 19 की दूसरी वेव के दौरान गोवा में हुई जहाँ हम सब फंस चुके थे. एक एक्ट्रेस को कोविड भी हुआ, शूट कैंसिल करना पड़ा. 8 से 10 महीने देर हुई. इसके बाद फिर से गोवा जाकर उसे शूट किया गया.

 

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चरित्र में स्ट्रेंथ है जरुरी

अभिनेत्री स्वरा कहती है कि मैंने हमेशा एक अलग भूमिका निभाने की कोशिश की है,फिर चाहे वह नील बटे सन्नाटा’ हो या राँझना, तनु वेड्स मनु, प्रेम रतन धन पायों आदि सभी में मैंने अपनी भूमिका की स्ट्रेंथ को देखा है. इस बार भी मैंने बेचारी यानि दब्बू महिला की भूमिका निभाई है, जो मेरे लाइफ के विपरीत है. हर बात को वह अपने पति से पूछ लेती है, जो उसकी टैग लाइन भी है. उसे जिंदगी में डर है कि पति से बिना पूछे वह कुछ करना गलत होगा. मुझे एक कलाकार के रूप में इसे नया लगा और मैंने किया, क्योंकि सोशल मीडिया, ट्विटर, फेसबुक पर मेरी एक अलग इमेज है, जिसे मैं काम के द्वारा ब्रेक कर सकूँ. यही मेरा उद्देश्य रहा. मुझे हंसी आती है कि मैं एक अकेली लड़की होकर शादी-शुदा महिलाओं की भूमिका निभा रही हूँ.

अलग किरदार निभाना जरुरी

स्वरा आगे कहती है कि कलाकार को हमेशा खुद से अलग भूमिका निभानी चाहिए. मुझे मेरी भूमिका से बस एक चीज ऐसी ढूंढ़नी होती है, जो मुझे समझ में आये या फिर किसी करीबी इंसान में वो गुण हो, जिससे मैं रिलेट कर सकूँ. फिल्म राँझना में मेरे और बिंदिया में बहुत फर्क था, पर मैंने उनमे पाया कि बिंदियाँ दिल से नहीं दिमाग से सोचती है, जो मुझसे मेल खाती थी. ‘नील बटे सन्नाटा’फिल्म में मैंने माँ के तरीके को सोचकर ढालने की कोशिश की फिल्म ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ में अन्याय के खिलाफ लड़ाई, जो मुझसे काफी मेल खाता हुआ रहा है. इस फिल्म की चरित्र में मैंने नानी को अपने जीवन में उतारा है, क्योंकि उनकी शादी 15 साल में हो गयी थी. बनारस में रहती थी, उन्हें अंग्रेजी बोलना नहीं आता था, जबकि मेरे नाना बिहार के जमींदार थे और इंग्लैंड में अपनी पढाई पूरी की थी. वे बहुत आधुनिक तरीके से जीवन-यापन करते थे. नानी उस समय बहुत डरी हुई रहती थी कि उनसे कोई गलती न हो जाय. ये सारी कहानियां उन्होंने अपने जीवन की मुझे सुनाया करती थी. उन्होंने पूरी जिंदगी बच्चों और परिवार के लिए जिया है. कई कहानियाँ बताया करती थी. मैं उन्हें बहुत मिस करती हूँ, क्योंकि कैंसर से उनकी मृत्यु कुछ साल पहले हो चुकी है.

बनाए रखे शादी से पहले की फ्रेंडशिप को

स्वरा के साथ सभी को स्टार ने बहुत अच्छा काम किया है. दोस्तों की केमिस्ट्री को निर्देशक ने अच्छी तरह से फिल्माया है. महिलाओं की दोस्ती शादी के बाद ख़त्म होने की वजह पूछने पर स्वरा स्पष्ट रूप में कहती है कि कोई महिला दोस्ती को बनाएं रखने के बारें में नहीं सोचती, वे घर गृहस्थी में इतना घुस जाती है कि वे अपने बारें में कुछ नहीं सोचती. समय बचता ही नहीं, जबकि वह दूसरों की सेवा करने में व्यस्त है. दोस्ती महिलाओं के लिए उतना ही जरुरी है, जितना पुरुषों को है, क्योंकि सबके पास अपने जीवन की किसी समस्या को कहने के लिए किसी का होना आवश्यक है. उनके अनुभव भी आपके जैसे ही कुछ है. इसे कौन समझेगा? वही व्यक्ति समझ सकता है, जिनके जीवन में पति, बच्चे सास-ससुर आदि हो. मेरा नानी को उनकी सहेलियों के साथ 40 से 50 साल तक साथ निभाते हुए देखना मेरे लिए बड़ी बात है. मैं जब शूटिंग के दौरान मुंबई आती थी, तो नानी को मुंबई में उनके दोस्तों के साथ कुछ दिनों के लिए छोडती थी. मैंने हमेशा उनकी लाइफ में एक्साइटमेंट को देखा है.

तोषु के अफेयर की सच्चाई जानकर किंजल करेगी सुसाइड? बहू को खो देगी अनुपमा!

टीवी सीरियल अनुपमा में लगातार हाईवोल्टेज ड्रामा दिखाया जा रहा है. जिससे दर्शकों का फुल एंटरटेनमेंट हो रह हो रहा है. शो में पारितोष का एक्सट्रा मैरिटल अफेयर दिखाया जा रहा है. जल्द ही ये तोषु का पोल अनुपमा के सामने खुलने वाली है. स्टार प्लस का एक नया प्रोमो सामने आया है. आइए बताते हैं, इस प्रोमो के बारे में…

फैंस को ये प्रोमो कॉफी पसंद आ रहा है. पारितोष और अनुपमा के बीच बातचीत के दौरान वनराज भी शर्मिंदा होता दिखाई दे रहा है. अनुपमा परेशान है कि जब किंजल को यह बात पता चलेगी तो क्या होगा.

 

प्रोमो में दिखाया गया है कि अनुपमा को यकीन नहीं होता कि पारितोष किंजल के साथ ऐसा कर सकता है. वह उससे बोलती है कि कह दे कि ये सारे इल्जाम झूठ हैं. इस पर राखी बोलती है कि उसके पास तोषू के खिलाफ सारे सबूत हैं.

 

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पारितोष खुद को जस्टिफाई करने की कोशिश करता है और कहता है कि किंजल प्रेग्नेंट थी, ऐसे में एक हसबैंड का किसी और औरत की ओर अट्रैक्ट होना नॉर्मल है. इस बात पर अनुपमा भड़क जाती है और बोलती है, कितनी आसानी से मर्द अपने नाजायज संबंध रखने की जायज वजह ढूंढ़ लेते हैं. अनुपमा आगे कहती है कि किसी भी मर्द को ये अधिकार नहीं है कि वह अपनी पत्नी को धोखा दे. इस पर वनराज शर्मिंदा होता दिखाई देता है.

 

अनुपमा, वनराज और राखी नहीं चाहते हैं कि किंजल को परितोष के अफेयर के बारे में पता चले. खबरों के अनुसार किंजल उनकी बात सुन लेगी. किंजल को बड़ा झटका लगेगा और उसे पैनिक अटैक आएगा. डिप्रेशन और पैनिक अटैक के बाद किंजल की हालत और बिगड़ जाएगी. किंजल इस धोखे को सह नहीं पाएगी. वह परितोष की बेवफाई से इस कदर टूट जाएगी कि वह सुसाइड करेगी.क्या राखी और अनुपमा किंजल को बचा पाएंगे?

GHKKPM: सई से हमेशा के लिए दूर हो जाएगा विराट! मौके का फायदा उठाएगी पाखी

स्टार प्लस का मशहूर सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’  का  ट्रैक इन दिनों दर्शकों को खूब पसंद  रहा है. यह शो लगातार टीआरपी लिस्ट में भी टॉप पर बना हुआ है. शो में लगातार ऐसे ट्विस्ट और टर्न्स आ रहे हैं, जिससे दर्शकों का इंटरेस्ट बना हुआ है. ‘गुम है किसी के प्यार में’ में जल्द ही विराट और सई का आमना सामना होगा. इस ट्विस्ट का फैंस को बेसब्री से इंतजार है. शो के अपकमिंग एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए बताते हैं, शो के नए एपिसोड के बारे में…

बताया जा रहा है कि सई के जिंदा होने के बाद भी विराट उसे अपने साथ चौहान हाउस लेकर नहीं जाएगा. वह सई से हमेशा के लिए दूर चला जाएगा. दरअसल विराट को लगेगा कि सई जानबूझकर उससे दूर हुई और जिंदा होने के बाद भी वापस नहीं आई.

 

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इतना ही नहीं, विराट सई से विनायक का इलाज करवाने से मना कर देगा. यह देखकर सई का दिल टूट जाएगा और उसके मन में ख्याल आएंगे कि इतने सालों के बाद मिलने के बावजूद विराट ने एक भी बार उससे बात करने की कोशिश नहीं की.

 

खबरों के मुताबिक विराट जबरदस्ती विनायक को सई से दूर ले जाएगा. वह अपनी सगी बेटी की तरफ भी मुड़कर नहीं देखेगा. बताया जा रहा है कि सीरियल में इस ट्विस्ट के कारण पाखी मौके का फायदा उठाएगी. तो दूसरी ओर विराट सई को धोखेबाज मानकर पाखी के नजदीक जाएगा. शो में अब ये देखना होगा कि क्या हमेशा के लिए अलग हो जाएंगे विराट-सई?

 

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पौराणिक राह पर सत्ता

हालांकि बिहार के नीतीश कुमार की अलटापलटी ने भारतीय जनता पार्टी के चक्रवर्ती बनने के सपने पर कुछ अंकुश लगा दिया है पर कांग्रेस के बूढ़े हो रहे नेता गुलाम नबी आजाद का लंबी चिट्ठी लिख कर कांग्रेस को छोड़ देना इसी सपने को पूरा करने का एक और प्रयास है. समृद्ध, सुखी भारत की जगह कांग्रेस मुक्त भारत या विपक्षी मुक्त भारत की कल्पना हमारे पौराणिक ग्रंथों में भरी है जिस में राजा अश्वमेघ यज्ञ करा कर घोड़ा छोड़ता था कि वह जहां जाए वहां का राजा हथियार डाल दे. पौराणिक ग्रंथों में हर राजा, राम और पाडंव ही नहीं, यह स्टंट करते रहे हैं.

सवाल उठता है कि एक राजा के चक्रवर्ती बनने से लाभ किसे होता है? अगर जनता इसी भूभाग की है, जिसे आज भी एक देश कहते हैं और पौराणिक ग्रंथों में एक ही देश मानते थे, तो किस ने किसे हराया, कौन जीता यह किस मतलब का था. जब युधिष्ठिर ने कुछ समय के लिए राज किया तो उस ने राजसूर्य यज्ञ कराया और अर्जुन, भीम, नकुल व सहदेव से कई देशों के राजाओं को हराने के साथ वहां लूटपाट कर के धनसंपत्ति लाने को कहा. उदाहरण के तौर पर भीमसेन ने पांचालों, गंडक, विदेह दशार्ण देशों को जीता. दशार्ण नरेश सुशर्मा ने भीम से युद्ध किया पर हार गया तो ???…दलबदल…??? करा कर उस ने उसे प्रधान सेनापति बना डाला.

फिर भीम ने अश्वमेघ देश के राजा रोचमन को हराया, पूर्व देश को बिना युद्ध हथियार डालने को मजबूर किया, पुलिंदों के नगर सुकुमार को अधीन किया, शिशुपाल जो चंदिराज का राजा था उस से समझौता कर लिया, कंसल राज को जीता.

ये सब देश हिंदू राजाओं के थे. वहां पौराणिक परंपराओं को माना जाता था. कोई भी राजा अपनी जनता के प्रति क्रूर नहीं था. कुछ ???…ओच्छा…??? राजाओं को जरूर अपने वश में किया पर उन को बराबर का स्थान दिया, यह स्पष्ट नहीं. हर राजा से धर्मखर्च लिया गया. चंदन, वस्त्र, मणि, मोती, सोना, चांदी ‘करोड़ों की संख्या’ में ला कर युधिष्ठिर को इंद्रप्रस्थ में दिए.

क्या यही कहानी अब नहीं दोहराई जा रही, अपने ही लोगों को तोडफ़ोड़ कर पैसे का लालच दे कर फुसलाया जा रहा है. एक बार चुंगल में आने के बाद मनमरजी का जीएसटी, खानों और जमीनों के बेचने का काम कर के प्रदेशों की जनता को लूटा नहीं जा रहा? जहां भी सत्ता परिवर्तन हुआ है वहां क्या पहले अराजकता थी? न महाभारत में युधिष्ठर के भाइयों ने किसी क्रूर राजा को हराया न 2014 से अब तक भारतीय जनता पार्टी ने किसी गलत व भ्रष्ट सरकार को दलबदल कर के हटाया.

पहले युद्ध तीरों, भालों से होते थे आज इंद्रप्रस्थ सरकार के पास दूसरे हथियार हैं. पर जनता को क्या लाभ हो रहा है, क्या मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गोवा, असम, नागालैंड, महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन से सोने की वर्षा होने लगी है.

उलटे संदेश यह जा रहा है कि कोर्ई नेता अपने समर्थकों, विधायकों, सांसदों पर भरोसा नहीं कर सकता. रामायण और महाभारत में भाइयों पर जिस तरह संदेह करना सिखाया गया है उसे भारतीय जनता पार्टी दूसरी पार्टियों की तोडफ़ोड़ कर के सिखा रही है. विभीषण और शकुनि हर जगह होते हैं, आज भी हैं और हमारे नेता यही साबित कर रहे हैं कि वे पौराणिक संदेशों व पौराणिक शिक्षा को सही से लागू कर रहे हैं.

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