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खिसियाते मुख्यमंत्री और सबक

राजनीति में आना, चुनाव जीतना और फिर शासन की बागडोर संभालना आसान है पर राज करना कठिन है. एक तरफ घिसेपिटे मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में ऐसा ही महसूस कर रहे हैं तो दूसरी तरफ दिल्ली में नईनवेली आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल. मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश यादव ने अपने पुश्तैनी गांव सैफई में एक महारंगारंग प्रोग्राम किया जबकि अरविंद केजरीवाल ने सचिवालय के सामने शिकायत दरबार लगाया. दोनों में वाहवाही की जगह थूथू हुई.

अखिलेश यादव ने जोश में आ कर सरकार के करोड़ों रुपए बरबाद कर के सलमान खान, माधुरी दीक्षित, कपिल शर्मा, आलिया भट्ट को नाचने के लिए बुला लिया और जहां मंच पर नाचगाना हुआ, उसी के पीछे समाजवादी पार्टी के युवाओं ने पुलिस से जम कर कुरसीतोड़ नाच कियाऔर नारों के गाने लगाए. टीवी चैनलों ने जम कर खिंचाई की कि जब राज्य में लोग राहत शिविरों में ठंड में ठिठुर रहे हैं तो इस नाचगाने का क्या औचित्य? अखिलेश यादव कितना ही कहते रहें कि यह परंपरा का सवाल है, बस. 1 करोड़ रुपए खर्च हुए. कोई इसे मानने को तैयार नहीं.

इधर, अरविंद केजरीवाल के जनता दरबार में भी सैफई की तरह भीड़ जुटी पर यह सरकारी अमले से सताए लोगों की थी जिन्हें यह भरोसा है कि अब मुख्यमंत्री उन का है, उन की सुनेगा. अरविंद केजरीवाल ने सोचा था कि लोग आएंगे, कतार में खड़े होंगे, एकएक कर के अफसरों की खिंचाई होगी. पर ऐसा न हुआ. लोगों ने एकदूसरे को खींचना शुरू कर दिया. भगदड़ सी मच गई. कुचले जाने का डर पैदा हो गया. आखिरकार, दरबार बरबाद हो गया. दोनों मुख्यमंत्री अब खिसिया रहे हैं, एक हठी में, रोब में, गुस्से में तो दूसरा एक अच्छा काम न कर पाने के मलाल में.

दरअसल, राज करना आसान नहीं है. यह पाठ पढ़ना होता है, सीखना होता है. आमतौर पर जो नेता काले दलदल में फंसते हैं वे राज न कर पाने और दूर की न सोचने के कारण फंसते हैं. न तो सरकार का काम छातियां मटकाने वाली लड़कियों को नचवाना है और न ही प्रजा को जहांगीरी न्याय दिलवाना है.

अरविंद केजरीवाल के लिए सबक है कि शिकायत सुननी हो तो शिकायतें मंगवाओ, 10-20 कार्यकर्ताओं से प्राइवेट जांच करवाओ, फिर एकएक को बुलाओ.

अखिलेश यादव को सबक सिखाना टेढ़ी खीर है. वे तो समझते हैं कि राजपुत्रों को सब माफ है. जो खिलाफ बोले उस का मुंह बंद कर दो. जो आईना दिखाए उसे जेल में डाल दो, आईना तोड़ दो. राजगद्दियां ऐसे ही छिनती हैं. पर अखिलेश यह समझते हैं कि गद्दी छिनने के बाद फिर मिलेगी, इसलिए डरना क्या. अरविंद केजरीवाल की निगाहें पूरे देश पर हैं इसलिए वे दूध के जले हैं तो रूहअफजा भी फूंक कर पिएंगे, ऐसी उम्मीद की जा सकती है.

राजनीतिक दल और विकास

वर्ष 2014 के आम चुनाव देश के लिए नया इतिहास लिखेंगे. एक तरफ कांग्रेस है जो अपने शासन को बचाने में लगी है तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी में नई जान फूंकने वाले नरेंद्र मोदी हैं जिन की जीत से देश की नीतियों को नया मोड़ मिलना निश्चित है. तीसरी तरफ ‘आप’ है पर पता नहीं उस को किस के वोट मिलेंगे, वह किसे हराएगी. उस की नीतियां दोनों से अलग हैं पर मूलरूप से वह लोकतांत्रिक मूल्यों में व धर्म, जाति, वर्ण, वर्ग से ऊपर होने का दावा करती है. चुनावों के बाद इन में से जो भी जीतेगा, उसे क्षेत्रीय दलों के साथ नए समीकरण बनाने होंगे.

पर क्या जनता को कुछ नया मिलेगा? शायद नहीं. कांग्रेस और भाजपा के मामले में धर्मनिरपेक्षता और विकास के वादों के अलावा दोनों दल कुछ ऐसा न कह रहे हैं न कर रहे हैं कि जिस से लगे कि इन दलों की नीयत राजगद्दी पर चढ़ने के अलावा कुछ और है. दोनों दल अपने या अपनों के वास्ते कुछ करने के लिए चुनावी मैदान में हैं, जनता की सेवा के बारे में तो इन के घोषणापत्रों में बारीक अक्षरों में भी कहीं नहीं लिखा है.

जनता की सेवा का क्या अर्थ है? एक राजनीतिक दल से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह सड़कें साफ कराएगा या पुलिस वाले की ड्यूटी लगाएगा. यह काम प्रशासन का है. उस पर नजर रखना जीतने वाले राजनीतिक दल का काम है. यह जनता की सेवा नहीं है. यह तो प्रशासन जनता से मिले पैसे के बदले करता है. यह कर्तव्य है उस का.

सेवा उसे कहते हैं जो पैसे की अपेक्षा के बिना की जाए और ऐसे काम किए जाएं जो लोग खुद नहीं कर सकते. दलों का काम लोगों के मुंह में निवाला रखना भी नहीं. उन का काम जनता को नई राह सुझाना है, जनता की सोच बदलना है, 10-20-30 साल आगे की सोचना है. सेवा का अर्थ लोगों के उन कामों को करने का है जो वे अपने बलबूते नहीं कर सकते और न ही नौकरशाही से उस की अपेक्षा की जा सकती है.

इस में सब से बड़ा काम है लोगों को कुरीतियों, अवैज्ञानिक जड़ सोच, गलत परंपराओं, धर्मजाति के नाम पर अलगाव, आर्थिक भेदभाव, मुनाफाखोरी, तनाव, शोषण आदि से बचाना. अफसोस यह है कि देश के प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस ने उस जिम्मेदारी को बिलकुल छोड़ दिया है जिस के जरिए कांग्रेस महात्मा गांधी के काल में घरघर पहुंचाई गई थी. दूसरी प्रमुख पार्टी भारतीय जनता पार्टी उलटी सूई घुमा कर समाज को पुरातनपंथी विचारों के खूंटों से बांधना चाहती है.

आम आदमी पार्टी को छोड़ कर अन्य पार्टियों ने यह ध्येय रखने की कभी आवश्यकता ही नहीं समझी. उन्हें जनता या समाज से सरोकार नहीं है. वे केवल भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्र के जंजालों में जनता को फंसा कर गन्ने से निकाले रस की तरह निचोड़ कर पावर रस निकालने में लगी रही हैं. देश का विकास आर्थिक व प्रशासनिक नीतियों में बारबार हेरफेर से नहीं होगा. विकास बड़ेबड़े ब्लूपिं्रटों पर अपनी मोहर लगाने या शिलान्यासों से भी नहीं होगा. विकास तब होगा जब हर नागरिक की उत्पादकता बढ़े. पर जब तक नागरिकों के पैर सामाजिक कीचड़ में फंसे रहेंगे, कुछ ज्यादा नहीं हो सकता. नई तकनीक के कारण कुछ सुख नसीब हुए हैं पर वे ज्यादा नहीं चलेंगे. हां, अगर अरविंद केजरीवाल को खासी सीटें मिल गईं, जैसा दिल्ली विधानसभा चुनावों में हुआ, तो मामला कुछ और होगा पर ऐसा सोचना तो दिन में सपने देखने जैसा होगा.

 

आपके पत्र

सरित प्रवाह, दिसंबर (द्वितीय) 2013
‘न्यायालय और कट्टरपंथी’ शीर्षक से प्रकाशित संपादकीय टिप्पणी में आप ने  ‘रामलीला’ फिल्म पर आए अदालती फैसले की सही आलोचना की है. आप का यह कहना उचित है कि दूसरे पक्ष का तर्क सुने और बहस किए बिना फैसला सुना देना न्यायसिद्धांतों के खिलाफ है.
जहां तक धर्म संबंधी विवाद है, उस में कट्टरपंथियों की बात आंख मूंद कर स्वीकार कर लेना और फैसले देना पश्चिम देशों में भी होता रहा है. ग्रीस में आज से 7 दशक पहले कट्टरपंथियों ने एक वैज्ञानिक के खिलाफ मुकदमा दायर कर विजय हासिल की थी.
हुआ यह था कि एक वैज्ञानिक ने ग्रीस में एक किताब लिखी जिस में उस की खोज कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है, लिखा था जबकि धर्मग्रंथ के अनुसार सूर्य ही पृथ्वी के चक्कर लगाता है. फैसला लिखने वाले भी अवैज्ञानिक (धर्मग्रंथ वाले) संस्कार ले कर बड़े हुए थे. लिहाजा, फैसला सत्य लिखने वाले के खिलाफ आया और वैज्ञानिक को कट्टरपंथियों ने मृत्युदंड दे दिया. इसीलिए आप की बात जायज है कि अदालतें कट्टरपंथियों की बात मान कर उन्हें पारलौकिक बना देती हैं.
माताचरण पासी, वाराणसी (उ.प्र.)
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‘नैना लाल किदवई की मंशा’ आप की एक अद्वितीय टिप्पणी है. नैना लाल किदवई ने सरकार से सुधारों की मांग की है. अमीर खरबपति उद्योगपति जब भी सुधारों की बात करते हैं तो उन का मतलब ऐसे सुधारों से होता है जिन से उन का मुनाफा बढ़े, उन्हें सरकार के काम में सुधार नहीं चाहिए. उन्हें उन किसानों की चिंता नहीं जिन की जमीन को सरकार मैले कागज पर कुछ भी टाइप कर, उन्हें नाममात्र का मुआवजा दे कर, उन से छीन लेती है. जबकि किसान भी छोटा उद्योगपति है, उत्पादन करता है, 2-3 नौकर रखता है.
नैना की और भी शिकायतें हैं जैसे पर्यावरण संबंधी कानून, औनलाइन पेमैंट की सुविधा, बिजनैस में नियमों, अनुमतियों आदि की भरमार, मगर इन से होने वाली हानियों की तरफ उन का ध्यान नहीं गया है.
असल में इस देश में उद्योगपति बनते ही इन नियमों के अंबार से हैं. जो लोग नेताओं व अफसरों के निकट होते हैं वे सफल हो जाते हैं. नैना लाल किदवई उद्योगों की कमजोरियों को सरकारी तंत्र के बहाने छिपा रही हैं जबकि सरकारी तंत्र व्यापारियों और कारखानेदारों को पनपने नहीं देना चाहते. औद्योगिक कंपनियों की संस्था को छोटे व्यापारियों की सुविधाओं का खयाल करना चाहिए ताकि उद्योगों का माहौल सुधरे.
कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)
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संपादकीय टिप्पणी ‘नैना लाल किदवई की मंशा’, अपने यहां छोटे उद्योगों के न पनपने के कारणों पर प्रकाश डालने के साथसाथ बहुत ही अमीर उद्योगपति सुधार की आड़ में क्या चाहते हैं, इस पर भी प्रकाश डालती है. सच तो यह है कि भारत की कृषि योग्य आधी धरती इन के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए कलकारखानों के जंगलों में बदल गई. इस पर भी शिकायत बिना यह सोचे कि आज अगर ये धरतीपुत्र न होते तो हमारी क्या दशा होती, जायज प्रतीत नहीं होती. पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा ऐसे ही नहीं लगाया था. यही हाल पर्यावरण संबंधी कानूनों से शिकायत का है.
एक तरफ तो हम गंगा के मैली होने की शिकायत करते हैं दूसरी ओर उद्योगों का कचरा भी वहीं डालते हैं. ऐसी बात नहीं है कि प्रशासन इस से अनभिज्ञ हो परंतु उपरोक्त सुधार करने से अमीर उद्योगपतियों और खरबपतियों को घाटा जो हो जाएगा. इसलिए छोटे व्यापारियों को लगाने दो सचिवालय के चक्कर. हम तो एसी रूम में बैठे हैं न.
कृष्णा मिश्रा, लखनऊ (उ.प्र.)
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सरित प्रवाह में ‘न्यायालय और कट्टरपंथी’, ‘एफआईआर का अधिकार’ व ‘राजनीति का मोदीपन’ शीर्षक से प्रकाशित संपादकीय टिप्पणियां बहुत अच्छी लगीं.
हमारे देश में हर सरकारी विभाग में ऊपर से ले कर नीचे तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है. हालात तो ऐसे हो गए हैं कि सरकारी महकमे में काम करने वाले कुछ कर्मचारी इतने निठल्ले हो गए हैं कि जिस काम के एवज में वे सरकार से पैसा लेते हैं उस को करने में भी आनाकानी करते हैं. वे काम करने के बदले में रिश्वत मांगते हैं. कोई रिश्वत नहीं देता है तो उस का काम लटका कर उसे परेशान किया जाता है.
प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)
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अंजाम बुरा होगा
दिसंबर (द्वितीय) अंक में प्रकाशित ‘हिंसक होती महिलाएं’ लेख में महिलाओं द्वारा किए जा रहे अत्याचार का अच्छा बखान किया गया है. दरअसल, टीवी चैनलों पर दिखाए जा रहे धारावाहिकों में महिला पात्रों को बेहद क्रूर व षड्यंत्रकारी दिखाया जाता है. पुरुष द्वारा प्रताडि़त स्त्रियों के अंतर्मन में संचित आक्रोश भी कई बार दुर्घटनाओं को अंजाम देता है. स्त्रियों को दी जाने वाली शारीरिक व मानसिक यातनाओं पर अंकुश लगाने से अपराधों में कमी लाई जा सकती है.
श्याम चौरे, इंदौर (म.प्र.)
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सच्ची तसवीर
दिसंबर (द्वितीय) अंक में छपे व्यंग्य ‘सरकारी बाबू’ में सरकारी कर्मचारियों की सही तसवीर दिखाई गई है. सरकारी बाबू साल में 180 दिन ही काम पर जाते हैं.52 इतवार, 52 शनिवार, 30 अर्न्ड लीव, 15 कैजुअल लीव, 20  सिक लीव, 16 त्योहारों आदि की लीव यानी 365 दिनों में वे 185 दिन छुट्टी पर रहते हैं. जिस दिन काम पर जाते हैं उस दिन
2 बार चाय के लिए, 1 बार खाने के लिए आधेआधे घंटे की छुट्टी. कोई लीडर आदि मर जाए, चुनाव हो तो और छुट्टियां.
भारतीय जब काम करते हैं तो देखते हैं किस काम को करने में उन्हें निजी लाभ है जबकि चीनी ऐसा नहीं सोचते. इसीलिए हम से बाद में आजाद होने के बावजूद चीन हम से आगे निकल गया.
आई पी गांधी, करनाल (हरियाणा)
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परिवारवाद की राजनीति
दिसंबर (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘मुलायम का सियासी कुनबा’ तथा ‘लालू बिन सब सून’ पसंद आए. जहां तक राजनेताओं की बात है, आज शायद ही कोई नेता ऐसा होगा जिस ने अपने कुटुंब को अपना सियासी कुनबा न
बनाया हो. उत्तर प्रदेश में ही देखिए, युवा मुख्यमंत्री लैपटौप और कन्याधन बांट कर युवाओं का कितना भला कर रहे हैं. यह दिनोंदिन बढ़ती बेरोजगारी बता रही है.
लोकप्रिय बनने के लिए सरकारी धन को लुटाने की नहीं, जनता के लिए कुछ विकास करने की जरूरत है. जनता का प्यारा नेता ही लोकप्रिय होता है और जननायक भी. जैसे लाल बहादुर शास्त्री, सरदार पटेल और महात्मा गांधी थे. पर किसे इस की परवा है. अब तो इस के
2 ही रास्ते प्रतीत होते हैं, प्रथम आरक्षण की बैसाखी प्रत्येक वर्गजाति को पकड़ाते जाओ, दूसरा अपने कुनबे को विरासत देते जाओ, ताकि कुरसी जाने न पाए.
के मिश्रा, लखनऊ (उ.प्र.)
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प्राथमिकताएं तय हों
दिसंबर (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘विकास पर राजनेताओं की खोखली सोच’ में राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय पार्टियों एवं नेताओं की कार्यशैली की पोल सही ढंग से खोलने का प्रयास किया गया है. लेकिन क्या ये मोटी चमड़ी वाले राजनेता जातीय, धार्मिक व हर क्षेत्र को निष्पक्षता की आंख से देख पाएंगे? क्या विकास, विकास के अंतर्विरोधों को हटा कर विकास की प्राथमिकताएं तय कर पाएंगे?
आम जनता का विश्वास इन राजनेताओं से हट गया है. लेकिन अब यह प्रश्न खड़ा होता है कि देश में लोकतंत्र कैसे चले? इस संबंध में मैं लोकप्रिय सरिता के माध्यम से कुछ सुझाव रखना चाहता हूं :
  1. अमेरिका की तरह राष्ट्रपति शासन प्रणाली कायम की जाए. ताकि गठबंधन सरकारों से देश को मुक्ति मिले और सही निर्णय लिए जा सकें.
  2. देश हजारों वर्ष गुलाम रहा है तथा आज भी देश के ज्यादातर लोगों की भावनाएं ढोंगी, धार्मिक पंडे, मुल्लाओं, बड़े व्यापारियों, साधुसंतों, राजेरजवाड़ों, पंचों, बड़े घरानों से जुड़ी हुई होने के कारण वे लोकतंत्र में भी स्वतंत्र जिंदगी जीना नहीं चाहते हैं. तथा इन्हीं के प्रभाव से आज निष्पक्ष, ईमानदार, योग्य, समाजसेवी, देशभक्त व्यक्ति चुनाव में सफल नहीं हो पाते हैं. इसलिए गुलामी से जकड़े देशवासियों को स्वतंत्र हो कर जीना सिखाया जाए.
  3. देश के 30 प्रतिशत व्यक्ति मूलभूत सुविधाओं रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल, बिजली आदि से वंचित रह कर केवल वोट देने के लिए जी रहे हैं. वे आज भी संविधान, मौलिक अधिकारों, नियमअधिनियमों को नहीं जानते, फिर वे अपने मतों का सही उपयोग कैसे करेंगे?
  4. देश की 30 प्रतिशत आम जनता राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों व उन के चुनाव चिन्ह की ही जानकारी नहीं रखती. ऐसे में वह सही मतदान कैसे करेगी? उन्हें जानकारी मुहैया कराई जाए.
  5. देश के पंचायत स्तर के गांवों, कसबों, नगरों व महानगरों में हर स्तर के दलाल, चमचे जीवित हैं. उन को आम जनता से अलग किया जाए.
जगदीश प्रसाद पालड़ी, जयपुर (राजस्थान)
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रोचक कहानी
कहानी ‘मिशन मुहब्बत’ मजेदार लगी. हर रिश्ते की एक गरिमा होती है. यह ठीक है प्रेम भावना कभी भी किसी भी उम्र में पनप सकती है लेकिन फिर भी मर्यादित सीमा के अंदर ही यह भावना अच्छी लगती है. कहानी का अंत सही है.
 मीना टंडन, कृष्णानगर (दिल्ली) 
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चहेती पत्रिका सरिता
आज 69 वर्ष की आयु में भी सरिता मेरी और मेरे परिवार की चहेती पत्रिका है. इस का कलेवर कई बार बदला परंतु ढोंग और आडंबर के विरुद्ध इस की धार कुंद कभी नहीं हुई. स्वास्थ्य, बागबानी, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक आदि विविध विषयवस्तु के साथसाथ नियमित स्तंभों में भी रोचक सामग्री परोस कर यह पत्रिका सभी रुचियों व विभिन्न आयुवर्ग के पाठकों को बांधे रखने में पूरी तरह से सफल रही है.
पिछले कई वर्षों तक मैं सरिता हाथ में आते ही सर्वप्रथम पूरे पृष्ठ की कविता का आनंद लेता रहा हूं. आजकल हिंदी कविता अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष से गुजर रही है ऐसी स्थिति में हिंदी साहित्य की इस अनूठी विधा को आप की पत्रिका जैसी अन्य पत्रिकाओं के सहारे की बहुत जरूरत है.
बी डी शर्मा, यमुना विहार (दिल्ली) 
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राजनेताओं की राजनीति
सरिता दिसंबर (द्वितीय) अंक में छपे ‘विकास पर राजनेताओं की खोखली सोच’, ‘बिन लालू सब सून’, ‘मुलायम का सियासी कुनबा’ और ‘गोरखालैंड को भूल गए दार्जिलिंग के जसवंत’ ये 4 लेख राजनीति में रुचि रखने वाले सजग पाठकों के लिए सामयिक खुराक हैं. राजनीति आज पद और पैसा पाने का सहज, सरल धंधा है उन के लिए, जो बेशर्म और बेईमान बनने की हिम्मत रखते हैं.
राजनेताओं की खोखली सोच के कारण कहीं केवल करोड़ों की लागत से हाथियों की मूर्तियां खड़ी हुईं तो कहीं 2,500 करोड़ रुपए की लागत से गुजरात के सरदार सरोवर तट पर सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा स्थापित की जा रही है. पश्चिम बंगाल में ममता की सरकार ने विकास के नाम पर सड़क के किनारे त्रिफला लैंपपोस्ट खड़ी कर के लंदन की रौनक लाने का वादा पूरा किया.  लेकिन साल होतेहोते ही रोशनी बुझ गई है. दूसरी तरफ कोयला घोटाला, आदर्श सोसायटी, 2जी स्पैक्ट्रम तथा कौमनवैल्थ गेम्स में खोखली व्यवस्था की तसवीर प्रकाश में आई तो सत्ता की सुरक्षा में तैनात पुलिस वाहिनी साप्ताहिक और मासिक के अलावा अतिरिक्त कमाई करने में लगी है.
जहां तक दार्जिलिंग के सांसद जसवंत सिंह की बात है, उन्हें तो यह पद दार्जिलिंग की विकलांग राजनीति के उपहार के रूप में मिला था. ‘आप गोरखालैंड चाहते हैं, मैं भी गोरखालैंड चाहता हूं’, कहने वाले जसवंत सिंह दार्जिलिंग ही भूल गए. सांसद की गुमशुदगी की रिपोर्ट तक दर्ज की गई.
बिर्ख खडका डुवर्सेली, दार्जिलिंग (प.बं.) 

हिंदी मराठी भाई भाई

सियासत की तरह फिल्मी दुनिया में भी दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं रहती, इस बात को अमिताभ बच्चन और राज ठाकरे ने एक बार फिर सच साबित कर दिया. सब जानते हैं कि लगभग 5 साल पुरानी तल्खी के चलते राज ठाकरे बिग बी से इतने खफा थे कि जबतब उन पर तीखी टिप्पणियां करते रहते थे. कभी भोजपुरी फिल्मों में काम करने के नाम पर तो कभी यूपी का ब्रैंड ऐंबेसडर बनने पर. बीते दिनों अमिताभ और राज ठाकरे के रिश्तों में आई दरार उस वक्त भर गई जब दोनों ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के कार्यक्रम में मंच साझा किया. कार्यक्रम के दौरान मंच पर राज ठाकरे अमिताभ के पैर छूने के लिए आगे बढ़े लेकिन बिग बी ने उन्हें गले से लगा लिया. यानी अब कह सकते हैं कि हिंदीमराठी भाईभाई.

अलविदा फारुख

बौलीवुड के मशहूर अभिनेता 65 वर्षीय फारूख शेख का 27 दिसंबर को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. गौरतलब है कि फारूख परिवार के साथ छुट्टियां मनाने दुबई गए थे. उन्होंने फिल्म ‘गरम हवा’, ‘चश्मे बद्दूर’, ‘उमराव जान’, ‘नूरी’, ‘किसी से न कहना’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसी बेहतरीन फिल्मों में अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का दिल जीता. हाल ही में वह रणबीर कपूर के साथ फिल्म ये ‘जवानी है दीवानी’ में नजर आए थे. साथ ही टैलीविजन में ‘जीना इसी का नाम है’ जैसे कार्यक्रम की मेजबानी भी की जिस में उन्होंने कई जानीमानी हस्तियों का इंटरव्यू भी लिया था.

बुरे फंसे गायक पलाश

यूफोरिया बैंड के प्रमुख गायक पलाश सेन इन दिनों खासे परेशान हैं. दरअसल, पलाश आईआईटी बौंबे के एक फैस्टिवल में लोगों का मनोरंजन करने के इरादे से मंच पर मौजूद थे. उसी दौरान उन के द्वारा किया गया एक मजाक आईआईटी की छात्रा को इतना बुरा लगा कि उस ने अपने ब्लौग के जरिए महिलाओं पर अश्लील टिप्पणी का आरोप लगा डाला और उन के बैंड को बैन करने की मांग भी कर डाली. उस के मुताबिक, कार्यक्रम के दौरान पलाश ने ऐसी टिप्पणी की जिस से लगता है कि वे महिलाओं को केवल सुंदरता और शारीरिक बनावट के तौर पर जानते हैं. अब बेचारे पलाश हर जगह सफाई देते फिर रहे हैं.

बौक्स औफिस पर धूम

हमेशा की तरह मिस्टर परफैक्शनिस्ट आमिर खान ने अपना तुरुप का इक्का साल के आखिर में चल ही दिया. धूम 3 नाम के इस पत्ते ने बौक्स औफिस पर कमाई के सारे रिकौर्ड तोड़ कर साबित कर दिया कि खान ब्रिगेड में उन का कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता. शाहरुख खान की चेन्नई ऐक्सप्रैस का रिकौर्ड तोड़ते हुए आमिर की इस फिल्म ने अपने पहले ही वीकेंड में 150 करोड़ से ज्यादा का कारोबार कर लिया है. कहा जा रहा है कि इस के सैटेलाइट राइट्स 70 करोड़ रुपए में बिके हैं और अगर ओवरसीज के कलेक्शन को मिलाया जाए तो लगभग 150 करोड़ के बजट में बनी फिल्म अपनी दोगुनी कीमत यानी 300 करोड़ रुपए वसूल चुकी है. इस में आडियोवीडियो राइट, रेडियो व मोबाइल्स ऐप्लीकेशन के अलावा म्यूजिक राइट की कमाई भी शामिल है.

औस्कर में कामसूत्र

मौडल व अभिनेत्री शर्लिन चोपड़ा कल तक सी गे्रड की फिल्मों और इरोटिक म्यूजिक वीडियो में ही नजर आती थीं, पर लगता है अब उन के भी दिन बदल रहे हैं. पहले प्लेबौय में छपने वाली पहली इंडियन बनने का मौका मिला शर्लिन को, अब खबर है कि उन की अंतर्राष्ट्रीय फिल्म कामसूत्र 3डी को औस्कर की 3 श्रेणियों में शामिल कर लिया गया है. रूपेश पौल की इस फिल्म को 2014 के 86वें औस्कर अवार्ड की 3 श्रेणी, बैस्ट मोशन पिक्चर, ओरिजिनल स्कोर और ओरिजिनल सौंग विद फाइव सौंग की श्रेणी में रखा गया है. बता दें कि यह भारतीय कलाकारों की पहली फिल्म है जिसे इस तरह की कैटेगिरी में नौमिनेट किया गया है. खैर, देखने वाली बात यह है कि इरोटिक फिल्म कितने औस्कर जीतती है.

जैकपौट

इस फिल्म को देखना बहुत बड़ा सिरदर्द मोल लेना है. नसीरुद्दीन शाह जैसे बेहतरीन कलाकार को ले कर बनाई गई इस फिल्म में सबकुछ बकवास है. निर्देशक कैजाद गुस्ताद, जिस ने कई साल पहले अमिताभ बच्चन को ले कर ‘बूम’ फिल्म बनाई थी, ने इस फिल्म को बनाया है. उस वक्त ‘बूम’ का बुरा हाल हुआ था. अब वही हश्र ‘जैकपौट’ का भी होगा.
फिल्म की कहानी गोआ में एक कैसीनो चलाने वाले बौस (नसीरुद्दीन शाह) की है. उस कैसीनो में फ्रांसिस (सचिन जोशी), माया (सनी लियोनी), एंथनी (भारत विकास) और कीर्ति (एलिक्स) आते हैं. इन चारों का एक ही मकसद है, बौस द्वारा रखे गए 5 करोड़ के जैकपौट को जीतना. चारों में से एक ‘जैकपौट’ जीतता है पर कोई बौस के कैसीनो से यह रकम लूट कर ले जाता है. अब इन सभी का प्लान बीमा कंपनी से पैसा वसूलना है. बौस को फ्रांसिस और माया पर शक है. इन सब को मारने के चक्कर में बौस खुद डूब कर मर जाता है और तब रहस्य खुलता है, किस तरह इन चारों ने मिल कर रकम हड़पने की योजना बनाई थी. सब मिल कर लूटी रकम बांट लेते हैं.
फिल्म की कहानी का कोई सिरपैर नहीं है. फिल्म में लफ्फाजी बहुत है. फिल्म एकदम रूखी है. निर्देशन बेकार है. सनी लियोनी की संवाद अदायगी मजोर है. उसे हाफ नैकेड देखने वाले दर्शकों को निराशा ही हाथ लगेगी.
गीतसंगीत पक्ष बेकार है. किसी भी कलाकार की ऐक्टिंग अच्छी नहीं है. गोआ की लोकेशनों पर शूटिंग की गई है. छायांकन कुछ अच्छा है. 
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