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अगर आप भी हैं प्रेग्नेंट वर्किंग वुमन, तो जरूर अपनाएं ये 5 हेल्दी हैबिट

अगर आप वर्किंग हैं और प्रेग्नेंट हैं तो आप को अपना खयाल रखना होगा, जो आप के साथसाथ उस गर्भस्थ शिशु के लिए भी फायदेमंद होगा, जो जल्दी आप के जीवन में ढेर सारी खुशियां ले कर आने वाला है. गर्भस्थ शिशु का सही विकास हो और आप की सेहत भी दुरुस्त रहे, इस के लिए आप को ये 5 हैल्दी टिप्स अपने डेली रूटीन में शामिल करने होंगे: ऐसे करें दिन की शुरुआत

सुबह उठते ही कमरे की खिड़कियां और दरवाजे खोल दें. सुबह की ताजा हवा आप के तनमन को तरोताजा कर देगी. रात भर की अशुद्ध हवा जो बंद कमरे में जमा हो जाती है, बाहर निकल जाएगी. आमतौर पर सुबह उठ कर दूध वाली चाय की आदत होती है. अत: इस की जगह ग्रीन टी पीना शुरू करें. ऐंटीऔक्सीडैंट से भरपूर ग्रीन टी आप को ऐनर्जी देगी. एक रिसर्च के अनुसार दूध वाली चाय हानिकारक होती है. यदि मौर्निंग वाक के लिए बाहर नहीं जा सकती हैं तो घर पर ही 5-10 मिनट चहलकदमी करें. चाहे कितनी ही देर से क्यों न जागें, व्यायाम जरूर करें. ज्यादा समय न हो तो 10 मिनट ही करें, लेकिन करें जरूर. इस के ढेर सारे फायदे हैं. यह आप को दिनभर तरोताजा रखेगा. इसे करने से थकान कम होगी और रक्तसंचार सही रहेगा.

हैल्दी डाइट कभी भी कहीं भी प्रैगनैंसी के समय बैलेंस्ड और हैल्दी डाइट की जरूरत ज्यादा होती है. कामकाजी गर्भवती दफ्तर के कामकाज और घर की भागदौड़ में संतुलित आहार नहीं ले पाती. उस की शिकायत होती है कि औफिस में जब जी चाहे खापी नहीं सकती. सहकर्मी क्या कहेंगे? ऐसी सोच से बाहर आएं.

सब को पता है कि ऐसे समय में आप को पोषण की ज्यादा जरूरत है. इसलिए बेझिझक खाएं. अपने लंच के अलावा सेब, केला, अन्य फल, मिक्स सलाद, सूखा मेवा, हलवा आदि के छोटेछोटे लंचपैक अलग से रखें. इन्हें काम के बीच में निकाल कर थोड़ाथोड़ा खाती रहें. यानी थोड़ेथोड़े अंतराल पर कुछ न कुछ हैल्दी डाइट लेती रहें. पेयपदार्थों से करें दोस्ती

कामकाजी गर्भवती को पेयपदार्थों से दोस्ती कर लेनी चाहिए. खूब पानी पीएं. इस के अतिरिक्त जूस, सूप, शेक, ग्रीन टी लेती रहें. औफिस में ग्रीन टी की व्यवस्था न हो तो घर से ग्रीन टी के पाउच और थर्मस में गरम पानी ले जाएं. रात में 1 गिलास दूध जरूर लें. दूध पसंद न हो तो पनीर खाएं. कम से कम 1 बार सूप जरूर पीएं. कामकाजी महिलाएं एक धारणा बना लेती हैं कि उन के पास समय का अभाव है.

आप को हर काम मैनेज करना सीखना होगा. जैसे आप कहती हैं कि आप के पास इतना वक्त नहीं है कि सूप बना सकें. यदि आप के घर में अन्य लोग हैं तो आप सूप बनवा कर फ्रिज में रख लें. यह 2-3 दिन आराम से चल जाता है. खुद बनाना हो तो किसी दिन दूसरे कामों में कटौती कर सूप बनाएं. सिचुएशन के मुताबिक मैनेज करना सीखें, कोई परेशानी नहीं होगी.

चुराएं आराम के पल जरूरत से ज्यादा भागदौड़ थका देती है. आप की सेहत पर इस का बुरा असर पड़ता है. औफिस में घंटों एक जगह बैठना, कंप्यूटर पर लगातार काम करना प्रैगनैंसी पीरियड में अच्छा नहीं होता. इस के अलावा आनेजाने में भी परेशानी होती है.

शहरों में जाम में फंसना भी कम बड़ी सजा नहीं है. धूल, धुआं और भागदौड़ गर्भस्थ शिशु के लिए खतरनाक तो है ही, आप के लिए भी हानिकारक है. रिसर्च बताती है कि ऐसी स्थितियों के कारण आजकल ब्लीडिंग की समस्या और प्रीमैच्योर बेबी की आशंका बढ़ रही है. अत: समझदारी इसी में है कि आप काम का ज्यादा बोझ अपने ऊपर न लादें. तीसरेचौथे महीने से वीकैंड के अलावा सप्ताह के बीच एक दिन की छुट्टी अवश्य लें. 7वें महीने से यह छुट्टी 1 दिन और बढ़ा सकती हैं.

रिसर्च बताती है कि कामकाजी महिलाओं में बारबार गर्भपात का खतरा बढ़ता जा रहा है. अन्य कारणों के अलावा इस की एक बड़ी वजह काम के दौरान आराम न करना भी है. आप ने बेबी की प्लानिंग की है तो उस के प्रति पूरी जिम्मेदारी निभाएं. उसे स्वस्थ तनमन के साथ स्वस्थ माहौल में बाहर लाने की जिम्मेदारी आप की है और इस के लिए आप को आराम के पल चुराने होंगे. भरपूर नींद है जरूरी

अच्छी और गहरी नींद हर किसी के लिए जरूरी है. लेकिन गर्भवती महिलाओं के लिए यह बेहद जरूरी है. चाहे जितना भी काम हो, कम से कम 8 घंटे की नींद जरूरी है. औफिस का कोई काम घर न लाएं. सोने का एक निश्चित समय निर्धारित करें. यह तय कर लें कि आप को 10 बजे तक सो जाना है. इस नियम का सख्ती से पालन करें. इस के लिए कोई काम अधूरा छोड़ना पड़े तो छोड़ दें. अधूरा काम दूसरे दिन या फिर कभी और पूरा हो जाएगा, लेकिन आप की नींद की भरपाई दूसरे दिन नहीं हो पाएगी, क्योंकि सुबह होते ही फिर से आप का रूटीन वर्क शुरू हो जाएगा. इसलिए नींद से कोई समझौता न करें.

इन सब बातों के साथसाथ एक बात जो सब से ज्यादा जरूरी है, वह है खुश रहें. इस का सीधा असर आने वाले बच्चे में दिखेगा.

दो महीने बाद मेरी शादी है और अभी तक मुझे खाना बनाना नहीं आया है, बताएं मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं 25 वर्षीय कामकाजी युवती हूं. 2 महीने बाद मेरी शादी होने वाली है. मुझे खाना बनाना नहीं आता. जबकि टीवी धारावाहिकों में मैं ने देखा है कि बहू को खाना बनाना नहीं आने पर ससुराल के लोग न सिर्फ उस का मजाक उड़ाते हैं वरन उसे प्रताडि़त भी करते हैं. बताएं मैं क्या करूं ?

जवाब

छोटे परदे पर प्रसारित ज्यादातर धारावाहिकों का वास्तविक जीवन से दूरदूर तक वास्ता नहीं होता. सासबहू टाइप के कुछ धारावाहिक तो इतने कपोलकल्पित होते हैं कि जागरूकता फैलाने के बजाय ये समाज में भ्रम और अंधविश्वास फैलाने का काम करते हैं. शायद ही कोई धारावाहिक हो जिस में सासबहू के रिश्ते को बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया गया हो.

वास्तविक दुनिया धारावाहिकों की दुनिया से बिलकुल अलग है. आज की सासें समझदार और आधुनिक खयाल की हैं. उन्हें पता है कि एक कामकाजी बहू को किस तरह गृहस्थ जीवन में ढालना है.

फिर भी आप अपने मंगेतर से बात कर इस बारे में जानकारी दे दें. अभी विवाह में 2 महीने बाकी भी हैं, इसलिए खाना बनाने के लिए सीखना अभी से शुरू कर दें. खाना बनाना भी एक कला है, जिस में निपुण महिला को किसी और पर आश्रित नहीं होना पड़ता. साथ ही उसे पति व बच्चों सहित घर के सभी सदस्यों का भरपूर प्यार भी मिलता है.

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स्वच्छता अभियान जारी है

किसी सरकारी कार्यालय में कार्यालय अध्यक्ष का आदेश हो और कोई न माने यह तो हो ही नहीं सकता. कार्यालय अध्यक्ष के ई-मेल पर ऊपर  से निर्देश मिला कि कार्यालय में गांधी जयंती के दिन स्वच्छता अभियान के चरण को शुरू करते हुए सुबह 10 बजे स्वच्छता शपथ ली जाए और साथ ही कार्यालय में सफाई व श्रमदान का आयोजन भी किया जाए.

कार्यालय अध्यक्ष महोदय जिन्हें कार्यालय का प्रत्येक कर्मचारी बड़े प्यार से ’बड़े साहब‘ कह कर संबोधित करते थे, उन्होंने अपने कार्यालय में तत्काल आदेश जारी किया-

’’कार्यालय के समस्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों को सूचित किया जाता है कि स्वच्छता अभियान के चरण को आरंभ करते हुए गांधी जयंती के दिन सुबह 10 बजे स्वच्छता शपथ और सफाई व श्रमदान का आयोजन किया जाएगा. इस अवसर पर कार्यालय के समस्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों से अनुरोध किया जाता है कि वे सभी इस आयोजन में शामिल हो कर अपने अंदर स्वच्छता के प्रति स्वच्छ भावना का स्वस्थ समावेश करें.

“स्वच्छता के नव संकल्प को जीवनभर अपने जीवन में उतारें. मैं खुद अपने उच्चाधिकारीपन को छोड़ कर, अपने दिलोदिमाग में स्वच्छता को बैठा कर, कार्यालय के इस सफाई अभियान में आप के साथ सफाई करूंगा.         -धन्यवाद”

वैसे उक्त आदेश को देख कर सभी कर्मचारियों ने मन में भारी भाव रखते हुए मन को अधिक दुखी होने से बचाया और चुप रहे. कुछ ने मन ही मन दुखी होते हुए कहा, ’’यार, यह सरकार भी न जब देखो तब हमारी छुट्टियों का सत्यानाश कर देती है. वैसे भी साल में पूरे 12 माह काम लेती है और तनख्वाह देती है 8 माह की. 4 महीने की तनख्वाह तो हम सरकारी लोग यों ही इनकम टैक्स के रूप में सरकार को वापस दे देते हैं.‘’

कुछ ने कहा, ’’बेचारे, सफाई कर्मचारी तो जम कर सफाई करते हैं. करना है तो स्टोर में जमा तमाम अनावश्यक सामानों की सफाई करवाई जाए. वहां सालों का जमावड़ा जमा है. कार्यालय में सुबह 8 बजे ही हो चुकी सफाई के ऊपर फिर 10 बजे सफाई करने से क्या बात बनेगी?‘‘

तो कोई बोला, ’’हमारी सरकार भी न, कभी घंटीथाली, झुनझुना बजाने का आदेश देती है, तो कभी स्वच्छता के नाम पर बड़ेबड़ों से सफाई करवाने का जिन्होंने कभी अपने घर में झाङूपोंछा नहीं किया वे सरकारी उच्चाधिकारी भी अब अपनेअपने कार्यालयों में झाड़ू लगाएंगे और कूड़ा उठाएंगे. अब मजा आ जाएगा.‘’

खैर साहब, सरकारी आदेश था तो लागू होना ही था. ठीक 10 बजे आयोजन आरंभ हुआ. पहले गांधीजी की फोटो पर फूलमालाएं चढ़ाई गईं. फिर ’जाई विद राखे सरकार, ताई विद रहिए‘ की तर्ज पर ली गई स्वच्छता शपथ-

“मैं शपथ लेता हूं कि मैं स्वयं स्वच्छता के प्रति सजग रहूंगा/रहूंगी और उस के लिए समय दूंगा. हर साल 100 घंटे यानी हर सप्ताह 2 घंटे श्रमदान कर के स्वच्छता के इस संकल्प को चरितार्थ करूंगा. मैं न गंदगी करूंगा, न किसी और को करने दूंगा. सब से पहले मैं स्वयं से, मेरे परिवार से, मेरे मोहल्ले से, मेरे गांव से एवं मेरे कार्यस्थल से शुरुआत करूंगा…”

और फिर छोटी झाड़ू, बड़ी झाड़ू, बड़ेबड़े डंडों में लगी झाड़ू, पोंछा, काले प्लास्टिक बैग्स, स्टैंड वाइपर और डस्टबिन के साथ शुरू हुआ स्वच्छता सफाई अभियान. बड़े साहब ने भी जागरूकता दिखाई और अपने दोनों हाथों में ग्लव्स और मुंह पर मास्क लगा कर जुट गए बड़े डंडे में लगी झाड़ू का ले कर. इन सब के साथ ही स्टोरकीपर साहब ने भी बड़े साहब के लिए भरपूर सैनिटाइजर अपने हाथों में ले रखा था. मौका लगते ही वह बड़े साहब के ग्लव्स चढ़े हाथों में बारबार छिड़कने से बाज नहीं आ रहे थे.

’चमचे की चम्मच में मक्खन‘ वाली बात यहां लागू होते दिखाई दे रही थी. रिकौर्डिंग कैमरे के सामने सफाई अभियान में सभी ने अपनाअपना सफाई दायित्व निभाते हुए बेहतर रोल निभाने का प्रयास किया. सोशल मीडिया के जमाने में हर बात की रिकौर्डिंग न हो तो बात बनती नहीं, इसलिए मोबाइल रिकौर्डिंग श्रमकर्म भी जारी था.

ज्यों ही सफाईदल कार्यालय परिसर में आगे बढ़ा तो एकाएक पेड़ पर बैठे हुए कबूतरों ने टपाटप बीट करना शुरू कर दिया. बीट का गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक तेज था कि वह सीधे बड़े साहब की गंजी चांद यानी गंजे सिर पर आकर्षणयुक्त हो कर पच्च…पच्च… से जा टिकी. बड़े साहब की गंजी चांद का सौंदर्य ऐसा बिगड़ा मानो चंद्रमा पर पहुंचे हुए चंद्रयान ने वहां की मटमैली मिट्टी का धरती पर नमूना भेजा हो. बड़े साहब को ज्यों ही अपनी गंजी चांद पर पच्च…पच्च… की आवाज सुनते हुए कुछ गीलागीला सा लगा तो स्वाभाविक क्रियावश उन्होंने अपनी झाड़ू एक तरफ रखते हुए अपनी चांद पर हाथ लगाया तो उन की चांद पर कबूतरों की बीट के ऐसे गड्ढे बन गए जैसे विक्रम लैंडर पर लगे कैमरे ने चंद्रमा की सतह पर घूमते प्रज्ञान रोवर के साथ तसवीरें ली थीं.

तभी बड़े साहब की आंखों की घूर्णन प्रक्रिया को शीघ्र समझते हुए स्टोरकीपर साहब ने तुरंत ही अपनी जेब में रखे रूमाल से उन की बीटयुक्त चांद की सफाई की. तब जा कर बड़े साहब की गंजी चांद का सौंदर्य यथावत वापस आया और फिर कैमरा औन और कार्यालय सफाई अभियान फिर से चालू हुआ.

सफाईदल आगे बढ़ा तो दल के सामने एक तरफ बहुत सारे टूटेफूटे मिट्टी के गमले और बहुत सारी मिट्टी का ढेर और सूखी पत्तियां पड़ी थीं. माली ने तत्परता दिखाई और बड़े साहब के कान में आ कर कहा, ’’सर, आप तो बस ये सूखी पत्तियों के ढेर के आसपास झाड़ू चला दीजिए. बाकी मैं सब समेट लूंगा.‘‘

साहब ने भी लगे हाथों वहां पड़े तमाम टूटेफूटे गमलों के संबंध में पूछताछ की तो बेचारे माली ने कहा, ’’सर, मैं क्या करूं, मैं ने कई बार स्टोरकीपर साहब को बड़ेबड़े व नए आधुनिक डिजाइन वाले आकर्षक प्लास्टिक के गमलों की खरीद के संबंध में अपना मांगपत्र भर कर दिया. मगर वे हमेशा ही कच्ची मिट्टी के गमले ही मंगवाते हैं. पूछने पर कहते हैं कि तुम्हें गमलों से मतलब होगा चाहिए. मैं बारबार जैसे भी गमले मंगवा कर देता हूं, तुम्हें हमेशा उसी से काम चलाना चाहिए. सर, आज गांधी जयंती के अवसर पर सच कहूं तो स्टोरकीपर साहब को एक बार बेहतरीन और टिकाऊ खरीद में विश्वास नहीं है. इन्हें हर चीज बारबार खरीदने में पता नहीं क्या मिलता है. आप इन्हीं से पूछ कर देखिएगा.‘‘

स्टोरकीपर साहब और बड़े साहब यदि ’चोरचोर मौसेरे भाई‘ न होते तो उन्हें समझने में देर लगती इसलिए बड़े साहब अहिस्ता से मुसकराए और अपनी बड़े डंड़े में लगी झाड़ू को ले कर सड़क साफ करते हुए अपने दल के साथ आगे चल दिए.

अब जैसेतैसे सब को मिल कर अपने कार्यालय के सफाई अभियान को पूरा तो करना ही था. स्टोरकीपर साहब ने बड़े साहब के कान में खुसरफुसर करते हुए कहा, ’’सर, बस आप को अब अपने कार्यालय के मुख्यद्वार तक और जाना है. मैं ने वहां पहले से ही कुछ कूड़ाकरकट डलवाया हुआ है. वहां पहुंच कर बस आप भी हम सब के साथ अपनी बड़े डंडे में लगी झाड़ू को एक तरफ रख कर उस कूड़े को अपने हाथों से उठाउठा कर डस्टबिन में डाल दें.‘’

बड़े साहब उत्साह लिए फिर से आगे बढ़े और अपना काम पूरा करने लगे. लेकिन यह क्या, तमाम सारे बाहरी कुत्ते उन पर झपटे. मुख्यद्वार के पास खड़े सुरक्षा संतरी ने ज्यों ही कुत्तों को साहब पर झपटते हुए देखा तो उस ने अपने पास पड़े एक डंडे को कुत्तों पर फेंक कर उन्हें भगाने का प्रयास किया ही था कि खौकिया कर एक कुत्ते ने बड़े साहब की टांग पकड़नी चाही. वह तो भला हो उन के अच्छे कालसमय का कि उन की टांग बच गई, बस पैंट ही कुत्ते के दांतों में आ कर फटी. वरना बेचारे सफाई अभियान के चक्कर में अस्पताल और अगले 2-4 दिन तक उस घातक कुत्ते के जीवित या मृत होने की खोजबीन ही करते घूमते.

सफाई अभियान की समाप्ति के बाद पार्टी तो होनी ही थी. कार्यालय की तरफ से सभी के लिए चाय, कौफी, समोसा, पनीरपकौड़ा, चटनी और रसगुल्ले के साथ नाश्ते का इंतजाम किया गया. सामूहिक पार्टी हुई. उस के बाद जब सब चले गए तो पक्के सफाई कर्मचारियों ने कार्यालय प्रांगण में पार्टी हेतु लगाई गई कुरसीमेजों और सोफों आदि को हटाया तो वहां प्रत्येक कोने में स्वच्छता श्रमदान के बाद उतरे हुए ग्लाव्स और मास्क, श्रमदान के नशे को कारगर बनाए रखने के लिए कर्मचारियों द्वारा खाए हुए गुटखे के खाली रैपर, ऐनर्जी ड्रिंक की खाली छोटी बोतलें, कार्यालय में गुपचुप पी गई बीड़ीसिगरेट के कुछ बुझे हुए टुकड़े. चायकौफी के जूठे कप, मीठी चटनी, प्लेट और नाश्ते के खाली डब्बे आदि पड़े दुखी हो रहे थे और अपने बड़े साहब को रहरह कर याद कर रहे थे कि काश… बड़े साहब की सफाई चिंता दृष्टि हम पर भी पड़ जाती तो हम भी आज गांधी जयंती के दिन ही सही, मगर एक दिन धन्य तो हो जाते.

इधर निदेशालय की साइट पर उक्त कार्यालय के सफाई अभियान का विडियो अपलोड हुआ तो महानिदेशक महोदय बेहद खुश हुए और उन्होंने अगले दिन ही उस कार्यालय का औचक दौरा कर डाला तो पाया कि उक्त कार्यालय के सामने तो सबकुछ ठीकठाक यानी स्वच्छ था मगर कार्यालय के पीछे की अस्वच्छ स्थिति को देख कर वह बेहद दुखी हुए. उन्होंने तुरंत ही बड़े साहब व स्टोरकीपर साहब को सुदूर क्षेत्र स्थानांतरण की सजा देनी चाही मगर यह क्या, इस से पहले कि वे कुछ बोलते उन के सामने उक्त कार्यालय के बड़े साहब और स्टोरकीपर साहब अपनेअपने हाथों में ग्लाव्स और मुंह पर मास्क लगाए हुए बड़े डंडे में लगी झाड़ू और डस्टबिन ले कर स्वच्छता अभियान के दूसरे पार्ट को सफल बनाने में जुट गए.

यह देख कर महानिदेशक महोदय ने भी अपनी आंख से नाक पर उतरे गुस्सेयुक्त चश्मे को यथावत ठीक किया और मुसकरा दिए. तब जा कर बड़े साहब और स्टोरकीपर साहब की जान में जान वापस आई.

मेरे पत्नी हमेशा मुझसे चिढ़ी रहती है, बताएं मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं 42 वर्षीय पुरुष हूं और अपने बीवीबच्चों के साथ रहता हूं. मेरे घर में मेरी पत्नी हमेशा ही मुझसे चिढ़ी हुई रहती है. उस की मुझ से हमेशा यह शिकायत रहती है कि मैं उस के लिए उतने महंगे कपड़े नहीं खरीदता या गहने नहीं खरीदता जैसे उस की किटी पार्टी की सहेलियों के पास हैं. अब आप ही बताएं जब बच्चों की पढ़ाई, घरखर्च और अन्य खर्चों में ही मेरी पूरी तनख्वाह उड़ जाएगी तो बीवी के खर्चे भला कैसे पूरे करूं?

जवाब

आप को अपनी पत्नी को समझाना चाहिए कि आप की आय में घरपरिवार के खर्चे ही पूरे नहीं बैठ रहे तो उन के शौक कैसे पूरे होंगे. हालांकि, औरतों को एकदूसरे की होड़ करने का शौक हमेशा से रहा है और इस में तो आप कुछ नहीं कर सकते.

हो यह सकता है कि आप अपनी पत्नी को महीने का पूरा घरखर्च हाथ में दें और उन से कह दें कि इस में से जो भी बचता है वह अपने लिए रख लें. इस से होगा यह कि वे जमीनी हकीकत से वाकिफ होंगी और उन्हें समझ आएगा कि व्यक्ति के सिर पर जब जिम्मेदारी पड़ती है तो क्या हालत होती है.

हेयर ट्रांसप्लांट : महंगी तकनीक, मगर फायदेमंद

पूनम विवाह के लिए सजधज रही थी. होने वाले पति को ले कर मन में सुनहरे सपने उमड़घुमड़ रहे थे. बरात के आने की खबर मिली तो उस की धड़कन बढ़ गई. दिल मचलने लगा. कुछ खुमारी सी छाने लगी. मन में बुलबुले से फूटने लगे. तभी वरमाला की रस्म के लिए उस की सहेलियां उसे लेने के लिए कमरे में आईं.

सजीधजी पूनम मतवाले कदमों के साथ पायल की छमछम की मधुर आवाज लिए वरमाला के लिए बने स्टेज पर पहुंच गई. वरमाला की रस्म शुरू हुई. दूल्हे ने जब अपना मुकुट उतारा तो पूनम मानो गश खा कर गिर पड़ी. दूल्हा गंजा था. दूल्हा और दुलहन के परिवार वालों और रिश्तेदारों में हड़कंप मच गया.

पूनम ने विवाह करने से साफ इनकार कर दिया. काफी समझानेबुझाने के बाद वह विवाह के लिए तैयार हुई. विवाह के 15 सालों के बाद भी पूनम के मन में यह कसक बाकी है कि उस का पति गंजा है. वह कहती है कि उस के पति इंजीनियर हैं और उन की अच्छीखासी कमाई है, उसे किसी चीज की कमी नहीं है, लेकिन वह अपनी बेटी की शादी किसी भी सूरत में किसी गंजे लड़के से नहीं करेगी.

आज के जमाने में पूनम जैसे हालात अब लड़कियों को नहीं झेलने पड़ेंगे. आज हेयर ट्रांसप्लांट की तकनीक और उस के बढ़ते चलन ने गंजेपन की परेशानी और उस से पैदा होने वाली अजीब स्थिति को काफी हद तक खत्म कर दिया है. डर्मेटोलौजिस्ट डाक्टर सुधांशु कुमार बताते हैं कि गंजेपन की समस्या से भारत ही नहीं, समूची दुनिया के युवा परेशान रहे हैं. बाल उड़ने के बाद इंसान असल उम्र से करीब 10-15 साल ज्यादा का दिखने लगता है. सिर के बालों के जाने के बाद आदमी की पर्सनैलिटी ही बदल जाती है. आत्मविश्वास खत्म हो जाता है. गंजा आदमी भीड़, पार्टियों, इंटरव्यू आदि में खुद को असहज महसूस करने लगता है.

बाल उगाने के नाम पर ठगी भी काफी होती है. होम्योपैथ और आयुर्वेद के डाक्टरों ने तो गंजों के सिर पर बाल उगाने के नाम पर खूब रुपए ऐंठे. बौलीवुड ऐक्टर अनुपम खेर ने एक बार किसी इंटरव्यू में बताया था कि जब किसी आदमी के बाल उड़ने शुरू होते हैं तो उन्हें बचाने के लिए वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता है. किसी ने कोई सलाह दी नहीं कि उस पर तुरंत अमल कर डालता है.

उन्होंने आगे कहा कि जब उन के सिर के बाल उड़ने लगे तो उन्होंने भी तरहतरह के हथकंडे अपनाए, एक बार किसी सज्जन ने कह दिया कि ऊंट का मूत्र लगाने से बाल निकल आते हैं तो उन्होंने वह भी कर डाला. इस के बाद भी बाल नहीं आए.

हेयर ट्रांसप्लांट

कम उम्र में ही गंजे होने वालों के लिए राहत की बात यह है कि आजकल हेयर ट्रांसप्लांट का चलन और क्रेज काफी तेजी से बढ़ रहा है. सर्जरी के जरिए गंजे सिर पर बाल उगाना अब दूर की कौड़ी नहीं रह गई है. आज भारत में हेयर ट्रांसप्लांट के 483 रजिस्टर्ड क्लीनिक खुल गए हैं. इन में हेयर ट्रांसप्लांट करवा कर गंजे हो चुके युवाओं के सिर पर फिर से बाल आ सकते हैं.

पटना एम्स की प्लास्टिक सर्जरी विभाग की एचओडी डाक्टर वीणा कुमारी कहती हैं कि अब हेयर ट्रांसप्लांट की तकनीक काफी विकसित हो चुकी है. इस की सर्जरी की जटिलता काफी हद तक कम हो गई है. सिर की सर्जरी वाली जगह को इंजैक्शन के जरिए सुन्न कर दिया जाता है. उस के बाद सिर के पिछले और अगलबगल के हिस्से के बालों को निकाल कर सर्जरी के द्वारा सिर की खाली हो चुकी जगहों पर सैट कर दिया जाता है.

ज्यादा घने बाल लगाने हों तो ज्यादा समय लगता है, और अगर कम बाल लगाने हों तो 4 से 8 छोटी सर्जरी करनी होती हैं. 2-3 दिनों तक सिर की डै्रसिंग करनी होती है और दवा भी लेनी होती है. सर्जरी के 5-6 दिनों के बाद घाव भर जाता है. सर्जरी के 3 सप्ताह के बाद ट्रांसप्लांट किए गए बाल गिर जाते हैं और उस के बाद नए बाल निकलने शुरू हो जाते है. उस के बाद 6 से 9 महीनों के अंदर पूरी तरह से नए बाल निकल आते हैं और गंजापन पूरी तरह खत्म हो जाता है.

महिलाओं में गंजापन

डाक्टर राजीव पांडे कहते हैं कि औरतों में गंजेपन की शिकायतें मर्दों के मुकाबले काफी कम होती हैं, लेकिन आज की तनावभरी जिंदगी के बीच औरतों में भी बाल उड़ने की समस्याएं बढ़ने लगी है. औरतों में थायराइड प्रौब्लम की वजह से भी गंजापन आना शुरू हो जाता है. अगर डाक्टर की सलाह से टीएसएच, टी-3 और टी-4 की नियमित जांच करवा कर दवा ली जाए तो बालों का गिरना कम हो सकता है.

50 के दशक में अमेरिका में शुरू हुई हेयर ट्रांसप्लाट सर्जरी आज भारत में भी काफी मशहूर हो चुकी है और कई युवाओं को गंजेपन से छुटकारा दिला चुकी है. डाक्टरों का दावा है कि हेयर ट्रांसप्लांट सर्जरी 95 फीसदी कामयाब होती है. समूचे सिर में बाल उगाने के लिए काफी रकम खर्च करनी पड़ती है. अगर किसी के सिर से पूरी तरह बाल जा चुके हैं तो दोबारा बाल उगाने के लिए क्व5-6 लाख तक खर्च करने पड़ सकते हैं. सिर के साथसाथ सर्जरी के जरिए दाढ़ी, मूंछ और भौंहों के बालों को भी ट्रीटमैंट और ट्रांसप्लांट कराने का चलन बढ़ रहा है.

हेयर ऐंड ब्यूटी ऐक्सपर्ट पल्लवी सिन्हा

5 सालों से पटना में हेयर ट्रीटमैंट का काम कर रही हैं. वे कहती हैं, ‘‘आज गंजे सिर पर बाल उगाना मुमकिन हो गया है. कुछ साल पहले तक इसे पत्थरों पर घास उगाने की तरह माना जाता था. सही इलाज से खोए बालोें को दोबारा हासिल किया जा सकता है. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के अंश:

किस आयुवर्ग के लोग आप के पास हेयर ट्रीटमैंट कराने के लिए आते हैं?

आजकल हारमोनल गड़बड़ी और खानपान में जंक फूड के ज्यादा इस्तेमाल तथा टैंशन आदि की वजह से हर आयुवर्ग के लोग बालों के उड़ने की समस्या से जूझ रहे हैं. कालेज में पढ़ने वाले युवकों के जब सिर से बाल कम होने लगते हैं तो निश्चित तौर पर उन की टैंशन बढ़ जाती है. बाल चेहरे की खूबसूरती में चार चांद जो लगाते हैं.

माना जाता है कि एक बार जिस के सिर से बाल गायब हुए तो दोबारा आने मुश्किल हैं?

आज से 6-7 साल पहले तक ऐसी स्थिति थी. बालों के दोबारा उगने की बात सोची भी नहीं जाती थी. आज हेयर ट्रीटमैंट और उस से भी आगे बढ़ कर हेयर ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध है. ऐसे में अब गंजे सिर पर बाल उगाना नामुमकिन नहीं रहा. बस सही इलाज और ऐक्सपर्ट की जरूरत है.

बाल उगाने के नाम पर काफी ठगी का बाजार भी चलता रहा है?

हर गंजा आदमी चाहता है कि उस के सिर पर फिर से हरियाली आए. जब बाल उड़ना, झड़ना या टूटना शुरू होते हैं तो लोग उन्हें बचाने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने के लिए तैयार रहते हैं. इसी सोच का फायदा उठाने के लिए बाजार में कई तरह की आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक दवाएं और तेल बिक रहे हैं. कोई भी एक मिसाल ऐसी नहीं है कि ऐसे तेलों और दवाओं से किसी को फायदा हुआ हो. विज्ञान और तकनीक के जमाने में झोला छाप डाक्टरों और हकीमों पर भरोसा कर लोग अपना समय और पैसा दोनों ही बरबाद कर रहे हैं.

आहत : स्वार्थी पत्नी से धोखा खाए पति की दर्दभरी कहानी

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आश्रम : अधर्म और प्रताड़ना के अड्डे

हमारा देश प्रारंभ से ही धर्मभीरु रहा है. जहां तक धर्म के सकारात्मक ऊर्जा का सवाल है उस से परहेज नहीं, मगर धर्म की नकारात्मकता और उस के पीछे के प्रोपगंडे के कारण जाने कितने लोग जिंदगीभर दर्द और यातना सहते रहते हैं और जब यह पीड़ा असहनीय हो जाती है तो लोग आत्महत्या कर लेते हैं.

ऐसा ही वाकेआ उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में घटित हुआ है जहां 2 सगी बहनों ने अंतर्राष्ट्रीय कह कर अपनी पीठ थपथपाने वाली ब्रह्माकुमारी संस्था के आश्रम में पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली और जो चिट्ठी लिखी, उससे कई चेहरे धीरेधीरे बेनकाब हो रहे हैं.

चिट्ठी को पढ़कर यह प्रतीत होता है कि लंबे समय से आर्थिक और मानसिक शोषण से परेशान होकर दोनों बहनों ने आत्महत्या कर ली. पहलेपहल उन्हें और परिवार को सब्जबाग दिखाए गए मगर जब सचाई सामने आई तो दोनों बहनों के सामने संभवतया आत्महत्या के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा था.

दरअसल, यह आश्रम पद्धति वर्तमान में हमारे देश में एक ऐसा नासूर सा बन गई है. आश्रम यातना और शोषण का अड्डा हो गए हैं. मगर, धर्म के नाम पर सबकुछ चलता रहता है और शासनप्रशासन कोई कार्रवाई नहीं करता या नहीं कर पाता.

आइए आज आपको उक्त सच्चे घटनाक्रम से रूबरू कराते हैं. उत्तर प्रदेश में आगरा के जगनेर थाना क्षेत्र स्थित ब्रह्माकुमारी आश्रम में रहने वाली 2 सगी बहनों के आत्महत्या करने और वहीं मिले उन के सुसाइड नोट के बाद आश्रम सवालों के घेरे में आ गया है.

आश्रम में रहने वाली 2 सगी बहनों एकता (37 वर्ष) और शिखा (34) ने 10 नवंबर, 2023, दिन शुक्रवार को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. उनके सुसाइड नोट ने आश्रम से जुड़ी एक महिला समेत 4 लोगों का कच्चाचिट्ठा खोला है.

बहनों ने आश्रम में पनपे इस आपराधिक रैकेट द्वारा आर्थिक गड़बड़झाले से लेकर अन्य अनैतिक गतिविधियों में संलग्न होने का खुलासा किया है. सुसाइड नोट में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ को संबोधित करते हुए पत्र में उन दोनों बहनों ने लिखा कि आरोपियों को आसाराम बापू की तरह ही आजीवन कारावास दिया जाए. अब सुसाइड नोट के तथ्यों के आधार पर पुलिस मामले की जांच कर रही है.

एकता और शिखा ने आत्महत्या से पहले 4 पेज का सुसाइड नोट लिखा. शिखा ने एक पेज में ही अपनी पूरी बात लिख दीजबकि एकता ने 3 पेज का सुसाइड नोट लिखा.शिखा ने लिखा,“ ‘हम दोनों बहनें एक वर्ष से परेशान थीं. हमारी मौत के लिए नीरज सिंघल, धौलपुर के ताराचंद, नीरज के पिता और ग्वालियर आश्रम में रहने वाली एक महिला जिम्मेदार हैं.”’ शिखा ने अपने सुसाइड नोट में मौत के जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग की है.

एकता ने सुसाइड नोट में पूरे मामले का परदाफाश किया है. इसमें उस ने लिखा है कि नीरज ने उनके साथ सैंटर में रहने का आश्वासन दिया था. सैंटर बनने के बाद उसने बात करना बंद कर दिया. एक साल से वे बहनें रोती रहीं, लेकिन उसने नहीं सुनी. उसका साथ उसके पिता, ग्वालियर आश्रम रहने वाली महिला और ताराचंद ने दिया. यही नहीं, 15 साल तक साथ रहने के बाद भी वह ग्वालियर वाली महिला से संबंध बनाता रहा. इन चारों ने उन के साथ गद्दारी की.

सुसाइड नोट में लिखा है कि उनके पिता ने 7 लाख रुपए प्लौट के लिए दिए थे. ये रुपए उन्होंने आश्रम से जुड़े व्यक्ति को दिए थे. इस घटना के बाद पुलिस अधिकारी सक्रिय हो गए हैं और पूछताछ करते हुए संदिग्धों की गिरफ्तारी की जा रही है. इस घटनाक्रम से यह सवाल एक बार फिर समाज के सामने है कि चाहे ब्रह्माकुमारी आश्रम हो या फिर बहुत सारे आश्रम, जो हमारे देश में बहुत ही तेजी से खुलते चले जा रहे हैं, सभी में भीतर ही भीतर क्या पकता रहता है.

शासन, प्रशासन और समाज का इन आंसुओं पर कोई अंकुश नहीं होने के कारण एकता और शिखा जैसी जाने कितनी लड़कियां, महिलाएं शोषण व अत्याचार की शिकार होती हैं. सिर्फ सफेद कपड़े या भगवा पहन लेने से ये लोग विशिष्ट हो जाते हैं और कानून से ऊपर होकर कानून व नैतिकता के खिलाफ काम करना अपना अधिकार समझ लेते हैं. आज समाज में जागरूकता की आवश्यकता है कि कोई भी आश्रम गैरजिम्मेदाराना व असामाजिक कार्य न कर पाए.

जिंदगी धूप, तुम घना साया : भाग 3

आखिरकार रिश्ते ने दम तोड़ दिया. किसी भी औरत को दूसरी औरत से रिश्ता कभी नहीं सुहाता है. तलाक तक बात पहुंची और हो भी गया. लव मैरिज का यह हश्र कई सारे बीज बो गया. अपनी बेटी को ले कर अनुराधा स्कूल के पास की कालोनी में रहने लगी. बलवंत महल्ले को छोड़ पास ही लगे पुश्तैनी गांव में चले गए और वहीं से अपडाउन प्रारंभ कर दिया. यह सब एक यौवन के शिखर पर पहुंचे पेड़ के कट जाने सा था.

पेड़ कट गया, ठूंठ बचा रह गया. जिंदगी धूप थी, घना साया दोनों के लिए हट गया था. यह सब तब महसूस होता है जब साया वास्तव में हटता है. जब तक दुख का एहसास ही न हो, सुख का कोई मूल्य नहीं जाना जा सकता. इसलिए सुख को ही कई बार दुख मानने की भारी भूल हो जाती है. साए में ही धूप महसूस करने वालों को समय परखता है और एक धोबीपछाड़ में ही नानी याद आ जाती है.

बिखराव के बाद अहं मन को संभालने लगता है और एहसास कराता रहता है सामने वाले की बुराई और समझाता है, अच्छा हुआ जो भी हुआ. रोजरोज की चिकचिक से तो बेहतर है. कोई भी काम करते हैं तो उस की कमियां सामने आती हैं और अहं और पुष्ट हो जाता है. अनुराधा और बलंवत के साथ यही कुछ हो रहा था. लगभग 2 साल साथ गुजारे और 4 वर्ष का कालेज का साथ, कुल मिला कर एक व्यकित के अंदर दूसरे के समा जाने का पूरा समय. अभी ऐसे समय में सिर्फ सामने वाले की कमियां, बुराइयां ही दिखाई देती हैं जैसा कि प्रेम के प्रारंभिक वर्षों में सामने वाले की सिर्फ अच्छाइयां दिखाई देती थीं. साथ रहने से कितनाकुछ बदल गया.

दोनों का स्कूल एक ही था, तो गाहेबगाहे नजरें टकरा जातीं और तुरंत एक ने दूसरे को नहीं देखा का आभास कराते. सहकर्मी भी अकसर उन से कहते कि “छोड़ो भई, यह इगो. तुम जोड़े में ही अच्छे लगते हो.” लेकिन दोनों टाल कर रह जाते. अनुराधा की खास सहेली कृष्णा ने उसे उदास देख कर कहा था, “अनु, तुम दोनों की वजह से तो प्यार जिंदा था इस शहर में. तुम ही अलग हो गए, तो प्यार ही बदनाम हो गया. कोई मांबाप अब तो इस के लिए कतई हामी नहीं भरेंगे.” उस ने आगे बोलना जारी रखा जैसे दिल के अरमान निकाल रही हो, “वैसे भी, कई लड़कियों ने हिम्मत ही नहीं की और जहां उन्हे बांध दिया वहां बंध गईं. चाहे उस में किसी के लिए अरमान हों तुम ने हिम्मत की और कईयों के लिए प्रेरणा बन गईं. लेकिन अब जैसे ही यह सब हुआ, तो… हमारे मांबाप वाली पीढ़ी बहुत खुश है. उन सब को कहने को हो गया.” अनुराधा ने उस समय कृष्णा की बात को हलके से लिया और अपनी कक्षा में चली गई. शाम को बेटी के साथ खेलतेखेलते उसे अचानक कृष्णा की बात याद आई और उस की बातें उसे किसी सयाने की सीख जैसी लगीं. वह सोचने लगी कि उस ने कभी इस तरह से सोचा ही नहीं, मैं, मेरा तक ही रही. कृष्णा ने उस की सोच को परिपक्व किया जबकि वह अविवाहित और उम्र में 4 साल छोटी थी. जिंदगी की कड़ी धूप हमें दुख तो देती है लेकिन सिखाती भी है. घना साया हमें सुख तो देता है लेकिन परिपक्व नहीं बनाता है.

बलवंत भी उतना ही अनमना था जितना अनुराधा. बलवंत के अंदर भी संवेदनशीलता थी और कुछ समय अकेले गुजारने के बाद उसे बेटी की याद सताती तो कभी किसी काम को करते हुए अनुराधा याद आ जाती. कभी किसी जोड़े को जाते हुए देखता तो उस के मन में भी कसक उठती, पेट में अजीब सा महसूस होता, तमाम पुरानी बातों को त्याग कर उसे अनुराधा का मासूम चेहरा याद आ जाता और ढ़ेर सारे अच्छे, रूमानी पल.

दोनों तरफ से अहं पिघलना शुरू हो चुका था और मन अब स्वतंत्र होने लगा था. यह शुरुआत थी. शुरुआत में अहं अपना पूरा जोर लगाता और फिर मन पर काबिज हो जाता है. लेकिन आखिरकार समय जख्मों को सिलता जाता है और उन्हें धुंधला करता जाता है. बलवंत, अनुराधा इसी दौर में थे जब उन के अहं पिघल रहे थे. उस दिन अनुराधा घरबाहर के काम और बेटी की देखरेख के कारण अतिकार्य की वजह से स्कूल में जाते हुए गिर पड़ी और बेहोश हो गई. साथियों द्वारा पास के अस्पताल ले जाया गया. बलवंत उस दिन देरी से आया था और जैसे ही पता चला, अस्पताल पहुंचा. तब तक अनुराधा होश में थी. दोनों की नजरें टकराईं और अनायास दोनों के मुंह से एकसाथ निकला, “सौरी.” आसपास खड़े सहकर्मियों के चेहरों पर मुसकान थी. पास ही खड़ी कृष्णा ने धीरे से गुनगुनाया, ‘जिंदगी धूप, तुम घना साया…’  बलवंत के हाथ में अनुराधा का हाथ था. कृष्णा के स्वर और सुरीले लग रहे थे.

कटा हुआ पेड़ का ठूंठ बरसात के बाद फिर से फूट पड़ा, किसलय थे शाखों पर. फिर से छाया देने के लिए तैयार हो रहा था पेड़. लेकिन इस बार गहरी और परिपक्व जड़ें उस की संगी थीं. आसपास उग रही खरपतवार को स्वीकार करते हुए उस ने ठाना था कि आगे बढ़ना ही जिंदगी है.

अचानक अनुराधा यादों से सजग हो उठी, उस के सामने से याद के रूप में उतारचढ़ाव गुजर गए. गोद में खेल रहे पोते को देखती जा रही थी, उस में बलवंत की छाया दिखाई दे रही थी.

मेरी खातिर : भाग 3

आज अनिका स्कूल गई थी. उस ने अपने सारे कागजात निकलवा कर उन की फोटोकौपी बनवानी थी. वहां जा कर उसे ध्यान आया वह अपनी 10वीं और 11वीं कक्षा की मार्कशीट्स घर पर ही भूल गई है. उस ने तुरंत मम्मी को फोन लगाया, ‘‘मम्मा, मेरी अलमारी में दाहिनी तरफ की दराज में आप को लाल रंग की एक फाइल दिखेगी, उस में से प्लीज मेरी 10वीं और 11वीं की मार्कशीट्स के फोटो भेज दो.’’

फोटो भेजने के बाद उस फाइल के नीचे दबी एक गुलाबी डायरी पर लिखे सुंदर शब्दों ने मम्मी का ध्यान अपनी ओर खींचा-

‘‘की थी कोशिश, पलभर में काफूर उन लमहों को पकड़ लेने की जो पलभर पहले हमारे घर के आंगन में बिखरे पड़े थे.’’

शायद मेरे चले जाने के बाद उन दोनों का अकेलापन उन्हें एकदूसरे के करीब ले आए. इसीलिए तो अपने दिल पर पत्थर रख उसे इतना कठोर फैसला लेना पड़ा था. पेज पर तारीख 15 जून अंकित थी यानी अनिका का जन्मदिन.

मम्मी के मस्तिष्क में उस रात हुई कलह के चित्र सजीव हो गए. एक मां हो कर मैं अपनी बच्ची की तकलीफ को नहीं समझ पाई. अपने अहम की तुष्टि के लिए वक्तबेवक्त वाक्युद्ध पर उतर जाते थे बिना यह सोचे कि उस बच्ची के दिल पर क्या गुजरती होगी.

उन की नजर एक अन्य पेज पर गई, ‘‘मुझे आज रात रोतेरोते नींद लग गई और मैं सोने से पहले बाथरूम जाना भूल गई और मेरा बिस्तर गीला हो गया. अब मैं मम्मा को क्या जवाब दूंगी.’’

पढ़कर निकिता अवाक रह गई थी. जगहजगह पर उस के आंसुओं ने शब्दों की स्याही को फैला दिया था, जो उस के कोमल मन की पीड़ा के गवाह थे. जिस उम्र में बच्चे नर्सरी राइम्ज पढ़ते हैं उस उम्र में उन की बच्ची की ये संवेदनशीलता और जिस किशोरवय में लड़कियां रोमांटिक काव्य में रुचि रखती हैं उस उम्र में यह गंभीरता. आज अगर यह डायरी उन के हाथ नहीं लगी होती तो वे तो अपनी बेटी के फैसले के पीछे का कठोर सच कभी जान ही नहीं पातीं.

‘‘आप आज अनिका के घर पहुंचने से पहले घर आ जाना, मुझे आप से बहुत जरूरी बात करनी है,’’ मम्मी ने तुरंत पापा को फोन मिलाया.

‘‘निक्की, मुझे ध्यान है नया फ्रिज खरीदना है पर मेरे पास अभी उस से भी महत्त्वपूर्ण काम है… और फिलहाल सब से जरूरी है अनिका का कालेज में एडमिशन.’’

‘‘और मैं कहूं बात उस के बारे में ही है.’’

‘‘मम्मी के इस संयमित लहजे के पापा आदी नहीं थे. अत: उन की अधीरता जायज थी,’’

‘‘सब ठीक तो है न?’’

‘‘आप घर आ जाइए, फिर शांति से बैठ कर बात करते हैं.’’

‘‘पहेलियां मत बुझाओ, साफसाफ क्यों नहीं कहती हो, जब बात अनिका से जुड़ी थी तो पापा कोई ढील नहीं छोड़ना चाहते थे. अत: काम छोड़ तुरंत घर के लिए निकल गए.’’

‘‘देखिए यह अनिका की डायरी.’’

पापा जैसेजैसे पन्ने पलटते गए, अनिका के दिल में घुटी भावनाएं परतदरपरत खुलने लगीं और पापा की आंखें अविरल बहने लगीं. मम्मी भी पहली बार पत्थर को पिघलते देख रही थी.

‘‘कितना गलत सोच रहे थे हम अपनी बेटी के बारे में इस तरह दुखी कर के तो हम उसे घर से हरगिज नहीं जाने दे सकते,’’ उन्होंने अपना फोन निकाल अनिका को मैसेज भेज दिया.

‘‘कोशिश को तेरी जाया न होने देंगे, उस कली को मुरझाने न देंगे,

जो 17 साल पहले हमारे आंगन में खिली थी.’’

‘‘शैतान का नाम लिया और शैतान हाजिर… वाह पापा आप का यह कवि रूप तो पहली बार दिखा,’’ कहती हुई अनिका घर में घुसी और मम्मीपापा को गले लगा लिया.

‘‘हमें माफ कर दे बेटा.’’

‘‘अरे, माफी तो आप लोगों से मुझे मांगनी चाहिए, मैं ने आप लोगों को बुद्धू जो बनाया.’’

‘‘मतलब?’’ मम्मीपापा आश्चर्य के साथ बोले.

‘‘मतलब यह कि घी जब सीधी उंगली से नहीं निकलता है तो उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है. इतनी आसानी से आप लोगों का पीछा थोड़े छोड़ने वाली हूं. हां, बस यह अफसोस है कि

मुझे अपनी डायरी आप लोगों से शेयर करनी पड़ी. पर कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है न?’’

‘‘अच्छा तो यह बाहर जा कर पढ़ने का फैसला सिर्फ नाटक था…’’

‘‘सौरी मम्मीपापा आप लोगों को करीब लाने का मुझे बस यही तरीका सूझा,’’ अनिका अपने कान पकड़ते हुए बोली.

‘‘नहीं बेटे, कान तुम्हें नहीं, हमें पकड़ने चाहिए.’’

‘‘हां, और मुझे इस ऐतिहासिक पल को कैमरे में कैद कर लेना चाहिए,’’ कह वह तीनों की सैल्फी लेने लगी.

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