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खेल को खेल रहने दें इसे जंग का मैदान न बनाएं

विश्वकप में भारत की पराजय हो गई है इसी बानगी पर हम दृष्टिपात करते हुए बता रहे हैं कि भारत की आम जनता हो या फिर विशेष वर्ग और साथ ही देश का मीडिया एक बार इन्होंने यह दिखा दिया है कि भारत जैसे महान देश की आज दृष्टि कितनी संकुचित हो गई है कि भारत के लोगों को अपने सिवा कुछ दिख ही नहीं देता.

विश्वकप के खुमार पर अभी हम जब पीछे पलट कर अवलोकन करते हैं तो देखते हैं कि किस तरह विश्वकप क्रिकेट के संपूर्ण माहौल को एक तरफ कर दिया गया. कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां क्रिकेट पर चर्चा न हो रही हो और कोई यह मानने को तैयार ही नहीं था कि भारत यह मैच फाइनल में हार जाएगा. यही राज मीडिया फैला रहा था और लोग इस में नाच कर झूम रहे थे यहां तक कि देश की सत्ता भी क्रिकेट को भुनाने में लग गई.

आननफानन में अंतिम मैच को अहमदाबाद के स्टेडियम में शिफ्ट किया गया जो कि सभी जानते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने अपने नाम पर रखवाया है. शायद सत्ता भी यही समझ रही थी कि क्रिकेट का यह फाइनल भारत जीत जाएगा और उस का सारा श्रेय हम लूट ले जाएंगे.

दरअसल, जब हम अपनी सोच को संकुचित कर लेते हैं तो सब से पहले हमारी स्वयं से हार हो जाती है. भारत को विश्व गुरु मानने वाले कितने लोग अपनी पीठ थपथपाते हैं अगर हमें सच्चे अर्थों में विश्व गुरु बनना है और कभी भी छोटी सोच दृष्टि नहीं रखनी चाहिए.

दरअसल, विश्वकप को ले कर के भारत में जैसा माहौल दिखाई दिया मानो भारत ही विजयी होगा. यह सभी कह रहे थे कि खेल भावना की कमी है हमारे देश में. हमें खेलों को खेल की तरह लेना चाहिए. यह सूत्र वाक्य भारत का आम से आम आदमी, खेल प्रेमी, राजनीतिज्ञ और पत्रकार भूल जाते हैं और अंधभक्त बन जाते हैं.

यही आज विश्वकप क्रिकेट के फाइनल मैच में दिखाई दिया जब भारत और आस्ट्रेलिया आमनेसामने आए. यह खेद का विषय है कि यही आजकल राजनीति में होता है. यही धर्म में हो रहा है और यही समाज में है. अगर हम निष्पक्ष भावना के साथ विवेचना करें तो पाते हैं कि यह दृष्टिकोण देश को पीछे ले जाएगा और समाज को पीछे ले जा रहा है.

राजनीति, समाज में भी अंधभक्त

विश्वकप क्रिकेट के परिपेक्ष्य में अगर हम आज देश की सोच दृष्टि और कार्य पद्धति पर विचार करें तो पाते हैं कि विगत कुछ वर्षों से भारत की राजनीति और समाज में एक बड़ा परिवर्तन आया है कि एक बड़ा तबका अंधभक्त की तरह व्यवहार करने लगा है.

दरअसल, यह समझ होनी चाहिए कि अगर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं तो उन्हें देश की सेवा करने का मौका मिला है. देश को ऊंचाइयों पर ले जाने का अवसर प्राप्त हुआ है. यह कोई लड़ाई, युद्ध से सत्ता प्राप्ति नहीं है. हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है जिस के तहत चुनाव होते हैं और देश का बहुमत जिस पार्टी के साथ होता है, उसे सत्ता प्राप्त होती है.

यह एक सामान्य सी प्रक्रिया है जो लगभग 75 वर्षों से चली आ रही है. मगर आज देखा जा रहा है कि देश में नरेंद्र मोदी के हर एक काम को चाहे वह कितना ही गलत क्यों न हो बहुत सारे लोग आंख बंद कर के समर्थन करते हैं. हम ने नीर क्षीर विवेचना की शक्ति होनी चाहिए.

अगर ऐसा नहीं है तो फिर हम गदह पचीसी की उम्र में जी रहे हैं. नरेंद्र मोदी की अंधभक्ति का सब से बड़ा उदाहरण अगर हम यहां बताएं तो वह था करोना कल में ‘थाली और घंटी’ बजवाना. प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने जाने किस सोच में देश की जनता से आह्वान कर दिया की थाली और घंटी बजाने से करोना भाग जाएगा और सारे देश ने आंख बंद कर के उन का कहना मानना शुरू कर दिया और घंटियां और तालियां बजने लगीं. लोग फोटो शेयर करने लगे.

आज समय है जब हम यह विवेचना करें कि देश का बड़ा सा बड़ा आदमी भी अगर कोई बात कर रहा है तो हमें उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आकलन करना चाहिए सिर्फ कोई हमारा अपना या जिसे हम पसंद करते हैं वह कुछ कह दे तो आंख बंद कर के उस पर चलना अपने साथसाथ देश को भी कमजोर बनाने जैसा है.

आज राजनीति में यह अपने चरम सीमाओं को छू रहा है और देश को पतन की ओर ले जाने का काम कर रहा है जिसे हमें रोकना चाहिए. राजनीति के साथसाथ अगर हम धर्म और समाज को भी देखें तो यहां भी अंधभक्तों की कमी नहीं है. धर्मगुरु अगर कुछ कह देते हैं तो हमें आंख बंद कर के उस का अनुसरण नहीं करना चाहिए बल्कि अपनी आंख कान खुले रख कर के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उसे पर विचार कर के उस का समर्थन करना चाहिए या फिर खुल कर विरोध करना चाहिए ताकि समाज में जागृति पैदा हो.

यही हालत समाज में है. समाज के मुखिया अगर किसी गलत चीज को बढ़ावा दे रहे हैं तो उसे रोकने का दायित्व आप का है भले ही आप अकेले क्यों न हों, अकेली आवाज क्यों न हो और इस के लिए चाहे आप को कितना ही कष्ट क्यों न उठाना पड़े.

सिद्धार्थ मल्होत्रा के कैरियर पर लगा सवालिया निशान

60 व 70 के दशक से एक मिथ बना हुआ है कि एक सफल मौडल कभी भी सफल अभिनेता नहीं बन सकता. अतीत में दीपक पाराशर सहित कई कलाकारों ने इस मिथ को तोड़ने का असफल प्रयास किया. तो क्या इसी वजह से मौडल से अभिनेता बने सिद्धार्थ मल्होत्रा को सफलता नसीब नहीं हो रही है या उनकी अपनी कमियां हैं. सिद्धार्थ मल्होत्रा अपने अभिनय की कमियों को सुधारने की बनिस्पत रोमांस की खबरों से लेकर अभिमानभरी बातोंतक सुर्खियों में रहते हैं.

38 वर्षीय अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा की परवरिश मर्चेंट नेवी में कैप्टन रहे पिता सुनील मल्होत्रा के यहां हुई.18 साल की उम्र में ही मौडलिंग करने लगे थे ये.27 वर्ष की उम्र में बतौर अभिनेता उनकी पहली फिल्म ‘स्टूडैंटऔफ द ईयर’ प्रदर्शित हुई थी. जी हां, मौडलिंग छोड़कर एकदो टीवी सीरियलों में अभिनय करने के बाद सिद्धार्थ मलहोत्रा ने 2012 में करण जौहर की फिल्म ‘स्टूडैंटऔफ द ईयर’ से अभिनय कैरियर की शुरुआत की थी.

2012 से अब तक वे कुल 15 फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं. सिद्धार्थ मल्होत्रा के कैरियर की 15वीं फिल्म ‘योद्धा’ पिछले डेढ़ सालों से सिनेमाघरों में पहुंचनेके लिए संघर्ष कर रही है,मगर बारबार इसके प्रदर्शन की तारीख बदलती जा रही है,जबकि फिल्म ‘योद्धा’ का निर्माण करण जौहर की ही कंपनी ‘धर्मा प्रोडक्शन’ ने किया है.

सागर आम्ब्रे व पुष्कर ओझा निर्देशित फिल्म ‘योद्धा’में सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ दिशा पाटनी,राशि खन्ना व सुनील शेट्टी भी हैं.इस फिल्म के पूरी हो जाने पर इसे देखकर करण जौहर ने अपना माथा पीट लिया.करण जौहर को यकीन ही नहीं हो रहा है कि सिद्धार्थ मल्होत्रा अभी भी इस कदर घटिया अभिनय कर सकते हैं.यही वजह है कि वे इसे प्रदर्शित करने की योजना बारबार टालते जा रहे हैं.

पहले यह फिल्म दिसंबर 2022 में प्रदर्शित होनी थी पर फिल्म ‘थैंक गौड’ के बौक्सऔफिस पर अपनी लागत वसूल न कर पाने के चलते इसका प्रदर्शन टाल कर इसे 7 जुलाई, 2023 को प्रदर्शित करने की घोषणा की गई.लेकिन नैटफ्लिक्स पर 20 जनवरी, 2023 से स्ट्रीम हो रही सिद्धार्थ मल्होत्रा की फिल्म ‘मिशन मजनू’ को दर्शक न मिलते देख करण जौहर ने एक बार फिर ‘योद्धा’ का प्रदर्शन टालते हुए इसे 15 सितंबर, 2023 को प्रदर्शित करने का ऐलान किया थापर फिल्म प्रदर्शितनहीं हो पाई.

बहरहाल, ‘योद्धा’ 22 दिसंबर को प्रदर्शित होनी थीलेकिन करण जौहर ने ऐलान कर दिया है कि दिसंबर माह में कई बड़ी फिल्में प्रदर्शित हो रही हैं,इसलिए अब वे अपनी फिल्म ‘योद्धा’ को 15 मार्च, 2024 को सिनेमाघरों में लेकर आएंगे.हम यहां याद दिला दें कि सिद्धार्थ मल्होत्रा ‘योद्धा’ की शूटिंग खत्म होने के बाद से घर पर आराम फरमाने या पत्नी कियारा आडवाणी संग समय बिताने के अलावा कोई काम नहीं कर रहे हैं.उन्हें कोई भी फिल्मकार अपनी फिल्म का हिस्सा नहीं बनाना चाहता.सभी की शिकायत है कि सिद्धार्थ मल्होत्रा अभिनय के मामले में शून्य हैं.

माना कि सिद्धार्थ मल्होत्रा चिकनेचुपड़े चेहरे के मालिक हैं,मगर आज का दर्शक कलाकार का चेहरा नहीं देखना चाहता.वह तो उसके अभिनय में विविधता देखना चाहता है.इसी वजह से करण जौहर को छोड़कर ज्यादातर फिल्मकार सिद्धार्थ मल्होत्रा के नाम से ही नाकभौं सिकोड़ने लगते हैं.

इसका सुबूत यही है कि सिद्धार्थ मल्होत्रा ने अब तक जिन 15 फिल्मों में अभिनय किया है,उन में से ‘स्टूडैंटऔफ द ईयर’,‘हंसी तो फंसी’,‘ब्रदर्स’,‘कपूर एंड संस’,‘बारबार देखो’, ‘शेरशाह’ और ‘योद्धा’ सहित 7 फिल्मों का निर्माण करण जौहर की ही कंपनी धर्मा प्रोडक्शन ने किया है.इन 7 फिल्मों में से एक भी फिल्म को सफल नहीं कहा जा सकता.इसके बावजूद करण जौहर की सिद्धार्थ मल्होत्रा पर मेहरबान होने की वजह समझ से परे है.

यदि सिद्धार्थ मल्होत्रा के पूरे 11साल के कैरियर पर नजर दौड़ाई जाएतो 2012 में प्रदर्शित उनकी पहली फिल्म ‘स्टूडैंट आफ द ईयर’ का निर्माण 60 करोड़ रुपए में हुआ था और इसने बौक्सऔफिस पर सिर्फ 97 करोड़ रुपए कमाए थे.यानी, निर्माता की जेब में तो महज 20 करोड़ रुपए ही आए थे.इसके बावजूद करण जौहर ने परिणीति चोपड़ा व सिद्धार्थ मल्होत्रा को लेकर दूसरी फिल्म ‘हंसी तो फंसी’ बनाई.इसने भी निर्माता को डुबोया.

इसके बाद एकता कपूर निर्मित फिल्म ‘एक विलेन’ प्रदर्शित हुई, जिसमें सिद्धार्थ मल्होत्रा के संग रितेश देशमुख,श्रृद्धा कपूर,आमना शरीफ,रेमो फर्नांडिस थे.लगभग 40 करोड़ में निर्मित इस फिल्म ने 170 करोड़ रुपए कमा कर सफलता के रिकौर्ड स्थापित किए थेलेकिन फिल्म की सफलता का सारा श्रेय रितेश देशमुख ले गए थे.

इतना ही नहीं, एकता कपूर और सिद्धार्थ मल्होत्रा के बीच क्या घटा कि उसके बाद एकता कपूर ने सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ फिल्म बनाने से तोबा कर लिया था.यह अलग बात है कि 5 वर्षों बाद एकता कपूर ने सिद्धार्थ मलहोत्रा के अभिनय वाली फिल्म ‘जबरिया जोड़ी’ की थी,जिसने निर्माताओं को बरबाद करने में कोई कसर नहीं रखी थी.

यहां तक कि लेखक व निर्देशक मिलाप झवेरी ने जब रितेश देशमुख व सिद्धार्थ मल्होत्रा को लेकर ‘एक विलेन’ का सीक्वल बनाना चाहातो एकता कपूर ने हाथ खींच लिया.तब उस कहानी में थोड़ा सा फेरबदल कर उसे ‘एक विलेन’ के सीक्वल के बजाय नया नाम देकर ‘मरजावां’ के नाम से 15 नवंबर, 2019 को प्रदर्शित किया.फिल्म में रितेश देशमुख,सिद्धार्थ मल्होत्रा,तारा सुतारिया, रकुल प्रीत सिंह,नासर,रवि किशन व अनंत जोग जैसे कलाकार थे.मगर फिल्म उम्मीद के मुताबिक सफलता दर्ज नहीं करा पाई.

उधर, ‘एक विलेन’ के बंपर कमाई करने के बावजूद 14 अगस्त, 2014 को प्रदर्शित ‘ब्रदर्स’ ने निराश किया.उसके बाद 18 मार्च, 2016 को करण जौहर निर्मित मल्टीस्टारर फिल्म ‘कपूर एंड संस’ प्रदर्शित हुई थी, जिसने बौक्सऔफिस पर अच्छी कमाई थी.लेकिन इसमें सिद्धार्थ मल्होत्रा के अभिनय की खास प्रशंसा नहीं हुई.इस फिल्म में रिषी कपूर,फवाद खान,आलिया भट्ट सहित सितारों की लंबीचौड़ी फौज थी.

फिर 9 सितंबर, 2016 को 55 करोड़ की लागत में बनी फिल्म ‘बारबार देखो’ प्रदर्शित हुई, जिस में कैटरीना कैफ भी थी.फिल्म लागत वसूल नहीं कर पाई.इसके बाद 25 अगस्त, 2017 को फिल्म ‘अ जेंटलमैन’ प्रदर्शित हुई. इस ऐक्शन कौमेडी फिल्म में सुनील शेट्टी, दर्शन कुमार,जैकलीन फर्नांडिस सहित कई कलाकार थे.पर बौक्सऔफिस पर इसकी दुर्गति होने से कोई नहीं बचा सका.

खैर,3 नवंबर, 2017 को प्रदर्शित रहस्यरोमांच प्रधान ‘इत्तफाक’ में सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ अक्षय खन्ना,सोनाक्षी सिन्हा,मंदिरा बेदी भी थीं.यह फिल्म यश चोपड़ा की सर्वाधिक सफल फिल्म ’इत्तफाक’ का ही रीमेक थी और फिल्म को दर्शकों ने सिरे से नकार दिया.इस फिल्म में सिर्फ अक्षय खन्ना के अभिनय की ही प्रशंसा हुई थी.सबसे बड़ी समस्या यह नजर आ रही थी कि सिद्धार्थ मल्होत्रा के सिर पर करण जौहर का हाथ होने की वजह से उन्हें फिल्में मिल रही थीं,मगर उनके अभिनय में कोई सुधार नहीं हो रहा था.

‘इत्तफाक’ के प्रदर्शन से महज साढ़े 3महीने बाद ही 16 फरवरी, 2018 को 65 करोड़ की लागत में बनी ऐक्शन प्रधान रोमांचक फिल्म ‘अय्यारी’ आई थी,जिसमें सिद्धार्थ के साथ मनोज बाजपेयी, रकुल प्रीत सिंह,पूजा चोपड़ा, आदिल हुसेन,नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार थे.जिसने बौक्सऔफिस पर कुल 30 करोड़ रुपए ही कमाए थे.

सारा खर्च निकालने के बाद निर्माता की जेब में बामुश्किल5 करोड़ ही आए थे.लगभग डेढ़ साल बाद स्वतंत्रता दिवस से महज एक सप्ताह पहले प्रदर्शित ‘जबरिया जोड़ी’ ने सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ ही परिणीति चोपड़ा के अभिनय कैरियर पर सबसे बड़ा सवालिया निशान लगा दिया था.लोगों को लगा था कि अब सिद्धार्थ मल्होत्रा का कुछ नहीं हो सकता.मगर एक बार फिर सिद्धार्थ के गौड फादर बनकर करण जौहर मैदान में कूद पड़े.

करण जौहर ने फिल्म ‘शेरशाह’ बनाई लेकिन इस फिल्म को वे सिनेमाघरों में प्रदर्शित नहीं कर पाए.पहले 3 जुलाई, 2020,फिर 20 फरवरी, 2021 तथा 2 जुलाई, 2021 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित करने की तारीखें घोषित की गईंपर ‘शेरशाह’ आज तक सिनेमाघर नहींपहुंची.तब उन्होंने इस फिल्म को प्राइम वीडियो को बेच दिया था.12 अगस्त, 2021 से अमेजन प्राइम पर स्ट्रीम हुई ‘शेरशाह’ कारगिल योद्धा बिक्रम बत्रा की ‘वार बायोपिक’ फिल्म थी.इस फिल्म को स्पैशल जूरी का राष्ट्रीय पुरस्कार सहित कुछ अन्य पुरस्कार मिले,मगर इससे सिद्धार्थ मल्होत्रा के कैरियर को कोई फायदा नहीं हुआ. हालांकि,निजी जिंदगी में जरूर उन्होंने बाजी मार ली.

‘शेरशाह’ की शूटिंग के दौरान फिल्म की अभिनेत्री कियारा आडवाणी संग उनका रोमांस हो गया,जिनके संग 7 फरवरी, 2023 को उन्होंने विवाह रचा लिया.वैसे, सिद्धार्थ मल्होत्रा का पहला रोमांस 2010 में अभिनेत्री आलिया भट्ट से हुआ था.कहा जाता है कि आलिया के ही कहने पर आलिया के साथ ही सिद्धार्थ मल्होत्रा को भी करण जौहर ने फिल्म ‘स्टूडैंटऔफ द ईयर’ में अभिनय करने का अवसर दिया था.बाद में यह रिश्ता टूटा,मगर 2019 में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने पहली बार कुबूल किया था कि वे लंबे समय तक आलिया भट्ट के साथ रिश्ते में रहे हैं.

अमेजन पर ‘शेरशाह’ के स्ट्रीम होने के एक साल बाद 25 अक्टूबर, 2022 को दीपावली के मौके पर ‘थैंक गौड’ सिनेमाघर पहुंची और लोगों ने अपनी दीवाली खराब करने के लिए सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ ही अजय देवगन व रकुल प्रीत सिंह को भी जमकर कोसा.फिल्म बहुत खराब थी.फिल्म अपनी लागत का कुछ प्रतिशत ही वसूल कर पाई.‘थैंक गौड’ से पहले ही सिद्धार्थ मल्होत्रा की फिल्म ‘योद्धा’ बनकर तैयार हो गई थी.पर करण जौहर इस फिल्म को सिनेमाघरों में प्रदर्शित नहीं कर पा रहे हैं,उधर कोई भी ओटीटी प्लेटफौर्म इस फिल्म को नहीं लेना चाहता, क्योंकि 20 जनवरी, 2023 से नेटफ्लिक्स’ पर स्ट्रीम हो रही सिद्धार्थ की फिल्म ‘मिशन मजनू’ घिसट ही रही है.

पाकिस्तानी अभिनेता अदनान सिद्दीकी ने फिल्म ‘मिशन मजनू’ में पाकिस्तान को गलत ढंग से दिखाने के लिए सिद्धार्थ मल्होत्रा की सोशल मीडिया पर कटु आलोचना भी की.तो वहीं सिद्धार्थ मल्होत्रा के पास अब कोई फिल्म नहीं है.

बतौर अभिनेता पहली फिल्म के प्रदर्शन के बाद 2013 में वे ‘पेटा’ संग जुड़ गए. फिर उत्तराखंड बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए आलिया भट्ट व कई अन्य कलाकारों के संग चैरिटी शो का भी हिस्सा बने थे.फिर करण जौहर के नेतृत्व में ‘ड्रीम टीम 2016’ के लिए 2016 में अमेरिका के कई शहरों में स्टेज पर परफौर्म किया था. फिलहाल वे पेपे जींस, ब्रायल क्रीम,ओप्पो, मैट्रोशूज,‘कोका कोला’ और मोवादो के ब्रैंडएंबेसडर के रूप में धन कमा रहे हैं.

बॉडी के बैड बैक्टीरिया को करें बाय, इम्यून सिस्टम बनाएं बेहतर

नेहा को अचानक कफकोल्ड ने घेर लिया. शुरू में सब यही मानते रहे कि ये सब मौसम में बदलाव के कारण हुआ है, लेकिन जब यह लगातार बना रहा तो घरवालों को चिंता हुई और वे उसे डाक्टर के पास ले गए.

तब डाक्टर ने बताया कि नेहा का इम्यून सिस्टम काफी कमजोर हो गया है, जिस की वजह से उस के शरीर में बीमारियों से लड़ने की ताकत नहीं रही है. इम्यून सिस्टम के कमजोर होने की वजह नेहा का खानपान व लाइफस्टाइल का सही न होना है.

इस बारे में फिजिशियन डा. सुबोध गुप्ता ने बताया कि इम्यून सिस्टम हमारे शरीर को कीटाणुओं और विषाणुओं से बचा कर हमें तंदुरूस्त रखता है. जब इस में गड़बड़ी आती है तभी हमारा शरीर बीमारियों से नहीं लड़ पाता है. इसलिए फिट रहने के लिए इम्यून सिस्टम का स्ट्रौंग होना बहुत जरूरी है.

इन टिप्स पर गौर कर आप फिट रह सकती हैं:

पूरी नींद लें और तनाव से रहें दूर

हर व्यक्ति के लिए 7-8 घंटे सोना जरूरी है, मगर आजकल के व्यस्त जीवन और नाइट शिफ्ट जौब के कारण यह मुमकिन नहीं हो पाता. इस के अलावा कंपीटिशन के कारण तनाव भी बढ़ रहा है, जिस की वजह से कौर्टिसोल लैवल बढ़ जाता है, जो इम्यून सिस्टम को कमजोर बनाने का काम करता है. ऐसे में जरूरी है कि आप खुद की सेहत की अनदेखी न करें.

स्मोकिंग से बनाएं दूरी

आज स्मोकिंग ट्रैंड बन गया है. पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाएं भी सिगरेट पीने में पीछे नहीं हैं. स्मोकिंग उन की सेहत के लिए घातक साबित हो रही है. औलाद न होने की बढ़ती परेशानी का यह सब से बड़ा कारण है. स्मोकिंग करने से कई प्रकार के कैंसर होने का खतरा भी बढ़ जाता है. इसलिए स्मोकिंग से दूरी बनाएं.

शराब दे मौत को न्यौता

स्मोकिंग की ही तरह शराब पीना भी आजकल आम बात हो गई है. शराब पीने वाले भले इसे अपनी शान समझें, लेकिन यह लिवर को डैमेज कर देती है. इसलिए अगर आप जीना चाहते हैं, तो तुरंत शराब पीना छोड़ दें.

पानी और हरी सब्जियां

पानी जहां शरीर से जहरीले पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है वहीं सब्जियों में भरपूर मात्रा में कैल्सियम, फाइबर, विटामिन व खनिज होते हैं जो न सिर्फ शरीर की काम की ताकत बढ़ाते हैं, बल्कि रोगों से लड़ने की ताकत भी बढ़ाते हैं.

प्रोबायोटिक्स हैं फायदेमंद

हमारे शरीर में गुड और बैड दोनों तरह के बैक्टीरिया होते हैं. जब शरीर में बैड बैक्टीरिया ज्यादा बढ़ जाते हैं, तब हम जल्दीजल्दी बीमार होने लगते हैं. इसलिए दही को अपने खाने का हिस्सा जरूर बनाएं. यह आप की इम्यूनिटी को बढ़ाएगा.

सन ऐक्सपोजर जरूर लें

शरीर को विटामिन डी की जरूरत होती है, जिसे धूप से लिया जा सकता है. इस से हमारा इम्यून सिस्टम मजबूत बनता है.

ऐक्सरसाइज को न करें इग्नोर

अगर आप फिट रहना चाहती हैं, तो भले ही आप कितनी भी बिजी क्यों न हों, सुबह 15-20 मिनट कसरत के लिए निकालना न भूलें. कसरत से ब्लड प्रैशर कंट्रोल में रहने के साथसाथ वजन भी नहीं बढ़ता है और शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत भी बढ़ती है.

ड्राईफ्रूट्स भी हैं लाभकारी

ड्राईफ्रूट्स ज्यादातर लोग इसलिए नहीं खाते कि कहीं मोटे न हो जाएं. हकीकत में यह उन के मन का वहम होता है, क्योंकि ड्राईफ्रूट्स में विटामिंस, मिनरल्स, फाइबर आदि काफी मात्रा में होने के कारण ये इम्यूनिटी बढ़ाते हैं.

मेरी पत्नी मुझे छोटी-छोटी बातों पर नीचा दिखाती है, बताएं मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं 27 वर्षीय पुरुष हूं, पत्नी के साथ 2 कमरे के फ्लैट में रहता हूं. पत्नी पोस्टग्रेजुएट है, एसएससी की तैयारी कर रही है. उस की उम्र 23 वर्ष है. मैं ग्रेजुएट हूं, इलस्ट्रेटर के तौर पर एक अखबार में नौकरी कर रहा हूं. मुझे अपनी बीवी से बहुत प्यार है और मैं उस की इच्छाओं का खयाल रखता हूं. लेकिन, मुझे ऐसा लगता है जैसे वह मुझे नीचा दिखाने की कोशिश करती है. वह हर छोटीछोटी बात पर लड़ने को तैयार रहती है. कभीकभी मुझे लगता है कि वह एसएससी में सफल होती है तो कहीं मुझ से अलग ही न हो जाए.

हालांकि, वह मुझ से प्यार भी करती है और हमारे बीच सबकुछ ठीक भी है पर मुझे डर है कि कहीं उस का गुस्सा और हर बात पर टोकाटाकी हमारे रिश्ते को खत्म ही न कर दे. मेरे दोस्त भी इस बात पर मुझे चिढ़ाते और मजाक उड़ाते हैं. मुझे समझ नहीं आता कि मैं क्या करूं?

जवाब

जो कुछ भी आप ने बताया उस के हिसाब से मुझे नहीं लगता कि इस में आप की पत्नी की कोई भी गलती है. वह आप से ज्यादा पढ़ीलिखी है जिस में कोई बुराई नहीं है. आप को लगता है कि वह आप को नीचा दिखाने की कोशिश करती है जबकि हो यह सकता है कि उस का व्यवहार सामान्य ही हो परंतु आप उसे गलत नजरिए से देख रहे हों. हमारा समाज और आसपास का वातावरण ही ऐसा है कि पुरुष को यह एहसास कराया जाता है कि उस की बीवी कितनी ही अच्छी नौकरी करे लेकिन पति से ज्यादा अच्छी न कर पाए.

पढ़ीलिखी बीवी सभी को चाहिए, लेकिन खुद से ज्यादा नहीं. खुद को अपनी पत्नी की जगह रख कर सोचिए और फिर परिस्थिति को देखिए. आप को समझ आएगा कि रिश्ते को खराब आप की पत्नी के व्यवहार से ज्यादा आप की सोच कर रही है. और रही बात आप के दोस्तों की, तो यह समाज की सोच है, इस पर ध्यान न दें. आप का रिश्ता आप के हाथ है, अपनी पत्नी को समझने की कोशिश कीजिए, उस का सपना पूरा करने में उस का साथ दीजिए बजाय खुद को निरर्थक छोटा समझने के.

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शकुंतला और दुष्यंत की कहानी : स्त्रियों के साथ अनाचार की पुष्टि

इस साल अप्रैल में ऐक्ट्रैस सामंथा रुथ प्रभु की फिल्म ‘शकुंतलम’ रिलीज हुई थी. फिल्म में स्वर्ग की अप्सरा मेनका और विश्वामित्र से जन्मी शकुंतला की कहानी को दिखाया गया था. फिल्म की शुरुआत तपस्या कर रहे विश्वामित्र से शुरू हुई. इस तपस्या से डरे इंद्र स्वर्ग की अप्सरा मेनका को विश्वामित्र की तपस्या को भंग करने के लिए धरती पर भेजते हैं. पौराणिक कथाओं में अप्सराएं स्वर्ग की वे सुंदरियां हैं जो हर किसी को सैक्ससुख देती हैं. महाभारत में उर्वशी अर्जुन को उस के साथ इस कारण सैक्स न करने पर श्राप देती है कि, अर्जुन के अनुसार, वह इंद्र, उस के पिता के साथ सोती है. उर्वशी का कहना था कि, वह सभी दादाओं और पोतों को खुश करती रही है, अर्जुन यह कह कर उसका अपमान कर रहा है, वह उसे एक वर्ष तक के लिए किन्नर बन जाने का श्राप देती है.

एक ऋषि विश्वामित्र से संभोग के बाद शकुंतला जन्म लेती है जिसे मेनका धरती पर छोड़ क़र स्वर्ग लौट जाती है. जब महर्षि कण्व की नजर उस पर पड़ती है तो वह उसे अपने साथ आश्रम ले आते हैं. कुछ सालों बाद राजा दुष्यंत उस आश्रम में आते हैं और तब उन की मुलाकात शकुंतला से होती है. वे उस से गंधर्व विवाह कर लेते हैं. और वह गर्भवती हो जाती है. कुछ समय बाद वे अपने सैनिकों के साथ उसे लेने आएंगे, ऐसा वादा कर के वे अपने राज्य लौट जाते हैं. काफी समय तक जब राजा दुष्यंत उसे लेने नहीं आते तो गर्भवती शकुंतला उन के पास खुद चली जाती है. लेकिन राजा दुष्यंत उसे पहचाने से इनकार कर देते हैं.

गर्भवती शकुंतलाका क्या हुआ, राजा दुष्यंत ने उसे क्यों नहीं पहचाना,  फिल्म ‘शकुंतलम’ यही कहानी बताती है. फिल्म देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि यह फिल्म वही कहानी बताती है जो अब तक हम देखतेसुनते आए हैं. इस फिल्म ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि किसी की ऐसी हिम्मत नहीं जो धर्मग्रंथों की नैतिकता और असलियत पर सवाल उठाए. इस फिल्म ने भी वैदिक देवता इंद्र, पौराणिक ऋषि विश्वामित्र, मेनका, कण्व, राजा दुष्यंत के चित्रों को महान बनाकर प्रस्तुत किया है. जबकि, इन में से हरेक का चरित्र बेहद घटिया और विवादस्पद ही नहीं है, उस से आज भी आम जनता गलत सबक सीखती है और औरतों को वह इस्तेमाल करने की वस्तु मात्र मानती है.

शंकुतला और दुष्यंत की पौराणिक कहानी क्या वैसी ही है जैसी इस फिल्म में दिखाई गई या इस से पहले कई फिल्मों में दिखाई गईथी अथवा बच्चों और बड़ों को पढ़ाई जाती है या इस की सचाई कुछ और ही है. जो मूल कहानी में स्पष्ट है, क्या इस कहानी से हमें कोई ज्ञान और सही आदर्श मिलता है. यह बस धर्म का पालन करना सिखाती हुई पाखंडी व गलत बातों पर धार्मिक स्टैंप लगाती प्रतीत होती है जो हमारी अनैतिकता का कारण है.

हम से बारबार कहा जाता है कि देवताओं में कोई डर, कोई लालच नहीं होता. वे विश्व कल्याण के लिए ईश्वर की उत्पत्ति हैं. पर अगर देवता इंद्र में डर नहीं था तो वे ऋषि विश्वामित्र की तपस्या को भंग क्यों करना चाहते थे. क्यों वेअपनी सत्ता खोने से डर रहे थे. देवताओंके पास बहुत शक्ति होती है तो क्या देवता इंद्र शक्तिविहीन थे जो उन को षड्यंत्र की जरूरत पड़ गई. हमारे देवताओं का यह कौनसा रूप है. क्या हमें षड्यंत्र करने वाले देवताओं से सीख लेने की जरूरत है. एक ऐसे देवता जिसे अपनी कुरसी खोने का डर है, हमें उस से जिंदगी जीने के गुण सीखने चाहिए? दूसरी मुख्य बात यह है कि पौराणिक ग्रंथ कुछ नहीं बताते कि यह कैसी तपस्या है जिस से इंद्र का सिंहासन डोल सके. सिर्फ स्थिर बैठ कर, ध्यान लगाने से क्या इंद्र का स्थान जीता जा सकता है. यदि कुछ स्थान पाने के लिए सिर्फ बैठना है, तो देवताओं ने क्यों असुरों से युद्ध किए, क्यों अमृतमंथन किया?

वायु देवता भी इंद्र के इस षंडयंत्र में शामिल थे. उन्होंने ही योजना के अनुसार मेनका के कपड़े शरीर से उड़ा दिए. क्या  देवताओं को ऐसा करना शोभा देता है? देवता हमें ये सब क्या सिखा रहे हैं. यह स्त्री के सम्मान को ठेस पहुंचाने के समान है. धर्म के ठेकेदार तो हमें यह बताते हैं कि हमारे देवता सचरित्र थे. लेकिन यह कैसा सचरित्र है जो किसी स्त्री की मानमर्यादा का हनन कर रहा है. हम अपने देवताओं से ये सब सीखें और सीखकर क्या करें महिलाओं का शोषण. सब से बड़ी बात यह है कि स्वर्ग में मेनका, रंभा और उर्वशी जैसी कामसुख देने वाली स्त्रियां थीं ही क्यों. आज भी देश में लाखों वेश्यालयों को अप्सराओं की परंपरा को ढोना पड़ रहा है और उसे धर्म की मान्यता मिली हुई है.

दूसरे मुख्य पात्र हैं विश्वामित्र. उन्हें एक महान ऋषि कहा जाता है. वे कैसे अपनी कामुकता पर नियंत्रण नहीं रख पाए और देवताओं को कामुकसुख देने वाली अप्सरा मेनका से संभोग कर बैठे. जो व्यक्ति अपने काम पर नियंत्रण नहीं रख सकता वह महान ऋषि कैसे हुआ. क्या हमें ऐसे ऋषियों को अपना आदर्श मानना चाहिए. अगर किसी महिला के शरीर से उस के कपड़े हट जाएं तो क्या हमें उस के साथ संबंध बना लेने चाहिए. इस तरह से तो बलात्कार को बढ़ावा मिलेगा. तो क्या विश्वामित्र हमें बलात्कार करने की ओर प्रेरित कर रहे हैं. अगर मणिपुर में 2 कुकी औरतों के पहले कपड़े हटा दिए गए तो हटाने वाले क्या वायु देवता का काम कर रहे थे और बाद में अगर उस युवती के साथ मां के सामने बलात्कार हुआ तो क्या बलात्कारी ऋषि विश्वामित्र के दिखाए धर्मसम्मत काम को ही कर रहे थे.

मेनका के कपड़े उतरने के बाद विश्वामित्र ने उसे दूसरे कपड़े न दे कर उस स्थिति का फायदा उठाया. उस के कपड़े उतरने पर वे अपना मुंह भी तो फेर सकते थे न. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. क्या किसी नंगी लडक़ी को देख लेने से अपनी कामवासना को रोका नहीं जा सकता. क्या यह कठिन है. विश्वामित्र जैसे महान तेजस्वी ऋषि क्या हमें यही सिखा रहे हैं कि नंगी स्त्री को देखने पर उस के साथ संबंध बना लिए जाने चाहिए. कहने का मतलब यह है कि अगर कोई लडक़ी नंगी नहा रही है और उसे किसी पुरुष ने देख लिया तो उसे यह धार्मिक हक मिल गया कि वह उस लडक़ी के साथ सैक्स संबंध बना ले. क्या यह सच नहीं कि यही सब पढ़ पढ़ क़र हमारे समाज के पुरुष पथभ्रष्ट हो गए है और बलात्कार को पुरुषत्व ऋषित्व से जोड़ क़र देखने लगे हैं.

क्या हमारे ग्रंथ हमें यही पढ़ाते हैं. इस तरह से तो वे औरत को एक सामान की तरह पेश कर रहे हैं, जिस से समयसमय पर अपना काम निकलवाया जाए. क्या हमें ऐसे समाज की जरूरत है जहां षड्यंत्र हो, जहां महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाए. इस का जवाब होगा- नहीं – लेकिन धर्मग्रंथ तो हमें यही बता रहे हैं कि देवताओं और ऋषियों ने ऐसा ही किया था. क्या इन देवताओं और ऋषियों ने गलतियां की हैं.

महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखे महाभारत, जिसे गीताप्रेस गोरखपुर ने प्रकाशित किया है, के प्रथम खंड आदिपर्व और सभापर्व के 71वें अध्याय से 74वें अध्याय तक में शंकुतला और दुष्यंत की कहानी को वर्णित किया गया है. इस कहानी के माध्यम से हम यह भलीभांति जान सकते हैं कि हमारे धर्मग्रंथ ही हमें औरतों के साथ भेदभाव करना सिखाते हैं.

यह भेदभावआज भी हमारे अंतर्मन का हिस्सा है. शिक्षा के बावजूदयह भेदभाव कम नहीं हुआ है. जब राजा इलिल के पुत्र दुष्यंत महर्षि कण्व के आश्रम में गए तो वहां उन का सामना शकुंतला से हुआ. शंकुतला को देखकर राजा दुष्यंत उस की ओर आकर्षित हो गए और उस की सुंदरता का वर्णन करते हुए कहा-

सुव्रताभ्यागतं तं तु पूज्यं प्राप्तमथेश्वरम्,

रूपयौवन संपन्ना शीलाचारवती शुभा.

अर्थात, उत्तम व्रत का पालन करने वाली वह सुंदरी कन्या रूप, यौवन, शील और सदाचार से संपन्न थी. महाभारत के अनुसार, औरत की खूबसूरती उस के यौवन, रूप,अच्छे आचरण और व्यवहार से है. अगर कोई औरत इन मापदंडों पर खड़ी नहीं उतरती तो क्या वह औरत कहलाने के काबिल नहीं है. यदि औरत तेज आवाज में बात करे तो क्या वह औरत नहीं कहलाएगी.

गुस्सा अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का एक रूप है और अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अधिकार हमारा संविधान हमें देता है. लेकिन अगर हम महाभारत में कही गई बातों को मानें तो यह हमारे संवैधानिक अधिकारों का हनन होगा. अकसर गुस्सा आने पर लोग तेज आवाज में बात करने लगते हैं. ऐसे में अगर औरत को गुस्सा आता है तो उस की आवाज भी तेज हो जाती है. लेकिन हमारे सब धर्मग्रंथों ने यह अधिकार भी औरतों से छीन लिया है. वे कैसा महसूस कर रही हैं, यहबताने का अधिकार भी उन को नहीं है. यह व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं तो और क्या है. जबकि, पुरुष अपने गुस्से को दिखा सकता है. वह तो गुस्से में युद्ध भी कर सकता है. लेकिन औरत तो ऐसा नहीं कर सकती क्योंकि धर्मग्रंथ उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं दे रहे.

* इस तरह से हमारे धर्मग्रंथ सदैव पुरुषों के हित में रहे हैं. एक औरत की पहचान केवल उस का रूपरंग होता है. क्या उस की सारी विशेषताएं उस के रूप में होती हैं. इस के अलावा क्या उस का कोई अस्तित्व नहीं. वेदव्यास के महाभारत के पृष्ठ 208 में वर्णित वैशम्पायन उवाच के श्लोक 10 और 11 से तो यही साबित होता है. इस तरह के श्लोकों का सहारा लेकर धर्म-पाखंडी हमेशा औरतों को दबाते रहे हैं और अपने तथ्यों को इन श्लोकों के माध्यम से सही कहते रहे हैं.

* महाभारत में स्त्री के जांघों की तुलना हाथी की सूंड से की गई है. क्या औरतों के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग करना उचित है? क्या हमारे धर्मग्रंथ हमें यही सिखाते हैं. अगर महाभारत जैसा ग्रंथ हमें यह सिखा रहा है तो देश के घरघर में महाभारत पढ़ी जाती है या टीवी पर देखी जाती है और उस की दिखाईसिखाई बातें मान्य बन जाती हैं. इस का अर्थ तो यह हुआ कि औरतों का सम्मान न करना इन्हीं धर्मग्रंथों की उपज है. सडक़ पर चलते हुए जब औरतों को मनचलों की तरहतरह की बातों का सामना करना पड़ता है तो जितना दोष उन मनचलों का है उतना ही दोष धर्मग्रंथों का भी है क्योंकि ये सीख तो वे लोग हमारे धर्मग्रंथों से ले रहे हैं. महाभारत और अन्य पौराणिक ग्रंथों में लिखी ऐसी बातों की वजह से समाज में औरतों का शोषण होता आ रहा है.

स्त्री की विशेषताओं का वर्णन केवल उस की सुंदरता में किया गया है. इस के तहत उन के प्रति सुंदर भौहों वाली, हाथी के सूंड के समान जांघोंवाली जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है. मानो, स्त्री की विशेषता, बस, यही हो. इन में कहीं भी उसे साहसी और शक्तिशाली नहींबताया गया. क्या हम अपने समाज की स्त्रियों को यही संदेश देना चाहते हैं कि आप, बस, अपनी सुंदरता पर काम करें.

धर्मग्रंथ हमें संस्कार सिखाते हैं. औरत की जाघों की तुलना हाथी की सूंड से करना शरीर पर इस तरह की बात करना कौन से संस्कार सिखाते हैं. जो लोग ऐसे संस्कारों की बात करते हैं, वे दरअसल जाहिल हैं. अगर यही संस्कार हैं तो उखाड़ फेंक देना चाहिए ऐसे संस्कारों को जो औरतों का शोषण करना सिखाते हैं.

तीसरे मुख्य पात्र दुष्यंत ने जब ने जब कहा कि क्षत्रिय कन्या के सिवा दूसरी किसी स्त्री की ओर मेरा मन कभी नहीं जाता. अपने से भिन्न वर्ण की कुमारियों और स्त्रियों की ओर भी मेरे मन की गति नहीं होती. ऐसा कहने वाले दुष्यंत उन सभी स्त्रियों का अपमान कर रहे हैं जो क्षत्रिय नहीं हैं. उन के कहने का अर्थ है यह कि उन्हें केवल क्षत्रिय कन्या ही आकर्षित कर सकती है. इस कहानी को बारबार बच्चों और बड़ों को पढ़ा कर हमवर्णव्यवस्था को बढ़ावा दे रहे हैं जोकि एक आदर्श समाज के लिए खतरा है.

हमारे धर्मग्रंथ ही हमें इस तरह की बातें सिखा रहे हैं. इस का मतलब है कि समाज में होने वाला भेदभाव इन्हीं की देन है.स्त्रियों के शोषण के पीछे असली किरदार तो ये धर्मग्रंथ ही निभा रहे हैं.

पिता हि मे प्रभुर्नित्यं दैवतं परमं मतम्.

यस्य वा दास्यति पिता स मे भर्ता भविष्यति..

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने.

पुत्रस्तु स्थविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्रयमर्हति..

अमन्यमाना राजेन्द्र पितरं मे तपस्विनम्.

अधर्मेण हि धर्मिष्ठ कथं वरमुपास्महे..

* जब दुष्यंत शकुंतला से गंधर्व विवाह करने को कहते हैं तो शकुंतला कहती हैं कि मेरे पिता (ऋषि कण्व) ही मेरे प्रभु है. वे मुझे जिसे सौंपदेंगे, वही मेरा पति होगा. शकुंतला का ऐसा कहना एक स्त्री से उसके पति को चुनने के हक को खत्म कर देता है. कुमारावस्था में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में बेटा रक्षा करता है. स्त्री को कभी स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए. उन के ऐसा कहने के पीछे धर्म, पांखडिय़ों का मकसद स्त्रियों को पुरुषों के अधीन रखना है. ऐसा सीख देने वाला महाभारत एकस्त्री के अस्तिव पर प्रश्नचिह्न लगाता है. शंकुतला कहती है कि पिता की अवहेलना कर वह अधर्मपूर्वक किसी पति को अपना नहीं सकती. इस का मतलब तो यह हुआ कि गंधर्व विवाह करने वाली सभी लड़कियां अधर्म कर रही हैं.

* शंकुतला सेये सब बातें किस ने कहीं,इन पुरुषों ने ही. ये पुरुष भला क्यों चाहेंगे कि एक स्त्री अपने फैसले खुद ले. वे तो उसे हमेशा अपनी छत्रछाया में ही रखना चाहेंगे ताकि वह अपनेलिए आवाजन उठासके. वे उसे चारदीवारी से बाहर निकलने देना नहीं चाहते, इसलिए इन धर्मग्रंथों में लिखी स्त्रीविरोधी बातों का समर्थनलेकर वे स्त्रियों को दबाना चाहते हैं.

* हमारे धर्मग्रंथ ने स्त्री को अपना वर चुनने के अधिकार से वंचित रखा है. यही कारण है जो आज भी हमारे देश में प्रेमविवाह को नफरत की नजर से देखा जाता है. इन धर्मग्रंथों ने ही समाज को यह पट्टी पढ़ा रखी है कि स्त्रियों को हमेशा अपने वश में रखो, तभी तुम्हारा पौरुषत्व है और यह समाज अंधा हो कर इस बात का अनुसरण कर रहा है.

दुष्यंत कहते हैं कि गंधर्व विवाह धर्म का मार्ग है. इस बात को मानकर शकुंतला उन से शादी करने को राजी हो गई. शकुंतला के साथ एकांतवास बिताने के बाद उन के अनुराग से जन्मे पुत्र को राजकुमार बनाने और उन्हें यहां से ले जाने के वादे के साथ दुष्यंत अपने नगर चले गए. सवाल यह है कि दुष्यंत उसे अपने साथ उसी वक्त क्यों नहीं ले गए. जब वे शादी कर सकते हैं तो साथ क्यों नहीं ले जा सकते. एक शादीशुदा महिला अपने पति के स्नेह की हकदार होती है. ऐसे में अगर उसे दूर रहने की पीड़ासहन करनी पड़ रही है तो यह उस के साथ अन्याय है.

ततो धर्मिष्टतां वव्रे राज्याच्चास्खलनं तथा,

शकुंतला पौरवाणां दुष्यंतहितकाम्यया.

इस श्लोक में शकुंतला अपने लिए कुछ न मांग कर दुष्यंत के लिए वरदान मांगती है. वह कहती है कि धर्म में उन का विश्वास बना रहे और वे राज्य के प्रति अपने कतर्व्य से न हटें.

महिलाओं के दिमाग में धर्म के नाम पर इतना कुछ भर दिया गया है कि वे अपने लिए कुछ नमांग कर अपने पिता, पति, पुत्र के लिए ही वरदान मांगती हैं. करवाचौथ ऐसा ही एक व्रत है जो पति की लंबी उम्र के लिए पत्नियों द्वारा रखा जाता है. क्या पति नहीं चाहता कि उस की पत्नी की उम्र लंबी हो. क्या ऐसा भी कोई व्रत है जो पुरुषों द्वारा महिलाओं के लिए रखा जाता है. ऐसा ही एक व्रत अहोई का व्रत भी है जो माताएं अपनी संतान के लिए रखती हैं.

दिवारात्रमनिद्रैव स्नानभोजनवर्जिता,

राजप्रेषणिका विप्रा श्रतुरङगबलै: सहा.

अद्यश्र्वो वा परश्वोवासमायान्ततीति निश्चिता,

दिवसान् पक्षानृतून् मासानयनानि च सर्वश,

गण्यमानेषु सर्वेषु व्यतीयुस्त्रीणि भारत.

शंकुतला को न तो दिन में नींद आती, न ही रात में. उस का स्नान और खाना दोनों ही छूट गया. उसे यह विश्वास था कि राजा दुष्यंत के सिपाही आएंगे. लेकिन दिन, महीने और साल बीतते गए. 3 साल बाद भी कोई सिपाही न आया. किसी भी स्त्री को अपने पति की सब से ज्यादा जरूरत गर्भावस्था के समय होती है, ऐसे में उस के साथ न होना गलत है.

एक स्त्री का अपने पति पर इतना अडिग विश्वास होता कि वह उस का सालों इंतजार करती रहती है. उस को यह समझा रखा जाता कि वह अपने पति के पास खुद नहीं जाएगी, उसे इंतजार करना होगा चाहे यह इंतजार कितना ही लंबा क्यों न हो. ऐसी ही स्त्रियों का हवाला देकर आज भी महिलाओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने पतियों का सदियों तक इंतजार करें.

क्या कभी किसी महिला के पति ने उस का वर्षों तक इंतजार किया है? ऐसा कहीं देखनेसुनने को नहीं मिला तो महिला से ये उम्मीद क्यों की जाती है. इन दीमक लगे ग्रंथों का हवाला देकर आज के समय की स्त्री को चारदीवारी के अंदर कैद करने के सौ बहाने ढूंढे जाते हैं.

गर्भ सुषाव वामोरु: कुमारमममितौजसम्,

त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु दीप्तानलसमद्युतिम्,

रुपौदार्य गुणोपेतं दोषयन्तिं जनमेजय.

इस श्लोक में कहा गया है कि जब एक स्त्री शिशु को जन्म देती है तो वह 206 हड्डियों का दर्द सहन करती है. ऐसे में उन पलों का वर्णन नहीं किया जा सकता है. लेकिन महर्षि वेदव्यास के महाभारत के इस श्लोक में उन पलों को वर्णित करते हुए कहा गया है कि सुंदर जांघों वाली शकुंतला ने अपने गर्भ से एक कुमार को जन्म दिया, जो राजा दुष्यंत के वीर्य से जन्मा था. ऐसी महिला जो दर्द में है वहां उस की जांघों की खूबसूरती देखी जा रही है न कि उस की पीड़ा, उस का दर्द.

जब शकुंतला ने लडक़े को जन्म दिया तो आसमान से फूलों की बारिश होने लगी, देवताओं के बाजे बजने लगे, अप्सराएं नाचने लगीं. इन्हीं घटनाओं ने तो पुरुषों को स्त्री पर हावी होने का साहस दिया है. क्या लडक़ी के जन्म पर भी ऐसा ही होता है. लड़कियों के जन्म पर तो शोक मनाने की घटनाएं सामने आती रही है. जिस तरह उस समय के लड़कों के साथ व्यवहार होता था वैसा ही आज भी होता है और जिस तरह की उपेक्षा महिलाओं को पहले झेलनी पड़ती थी वहीउन्हें आज भी झेलनी पड़ती है.

यही वजह है कि लड़कियों के जन्म पर अधिक खुशियां नहीं मनाई जाती हैं. यह धार्मिक ग्रंथों की ही देन है जो लड़कियों को बचपन से ही भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

पति के वियोग में शकुंतला कमजोर और गरीब दिखाई देने लगी. उस के कपड़े मैले दिखने लगतेहैं. पति के बिना पली की यही हालत होती है. उस का अपना कोई अस्तित्व नहीं. स्त्री की सुंदरता क्या उस के पति से ही है. जब शरीर स्त्री का है तो सुंदरता का भार पति पर क्यों है.

पतिशुश्रूणं पूर्वे मनोवाक्कायचेष्टितै,

अनुज्ञाता मया पूर्वे पूजचैतद् व्रतं तव,

एतेनैव व वृत्तेन विशिष्टां लप्स्यसे श्रियम्.

इस श्लोक में ऋषि कण्व, उस के पालने वाले पिता, शकुंतला को सती स्त्री के कर्तव्य बताते हुए कहते हैं कि वह मन, वाणी, शरीर और चेष्टाओं द्वारा पति की सेवा करती रहे. तुम पतिव्रता का पालन करती रहो. इसी से ही तुम अलग शोभा प्राप्त कर सकोगी.ऐसी ही धारणाओं नेस्त्री को जकड़ रखा है. इन्हीं ग्रंथों ने पुरुष को स्त्री का शोषण करने का अधिकार दिया है. इन्हीं के चलते आज भी पत्नियों से पतिव्रता होने की उम्मीद की जाती है जिन के पति उन को छोड़ चुके है उन के प्रति भी.

वहीं अगर पत्नी अपने पति से यह उम्मीद करें तो इस पितृसत्तात्मक समाज को यह मंजूर नहीं है. ऐसे ग्रंथों में पतियों से क्यों नहीं कहा गया कि पत्नी के लिए उनके क्या कर्तव्य और जिम्मेदारी है. क्या पति के लिए सिर्फ पत्नी के ही कर्तव्य होते हैं,पत्नी के लिए पति के नहीं. पत्नी उस पति के लिए पतिव्रता बनी रहे जो उसे सालों तक छोड़ क़र अपनी जिंदगी जीता रहा. उस की खोजखबर तक नहीं ली कि वह कैसी है. ऐसा पाठ पढ़ाने वाली कथा का बारबार मंचन किया जाता है, चित्र-कथाएं बना कर बच्चों को पढ़ाया जाता है, फिल्में बनाई जाती हैं, मूर्तियां स्थापित की जाती हैं.

काफी सालों तक जब दुष्यंत शकुंतला को लेने नहीं आते तो कण्व उस से खुद दुष्यंत के पास जाने को कहते हैं कि तुम मेरी इस आज्ञा के उलट कोई जवाब मत देना. ऐसा कहकर एक स्त्री से उस की अपने विचार वक्त करने की स्वतंत्रता छीनी जा रही है. अगर कोई महिला अपने पति के पास नहीं जाना चाहती तो यह उस का निजी विचार है. लेकिन पौराणिक ग्रंथों की अगर बात की जाए तो उन में भरभर के ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं जिन में स्त्रियों का शोषण किया गया हो न केवल पति द्वारा, अनजाने पुरुष द्वारा बल्कि पिता तक द्वारा भी. आज के समय में भी स्त्री से यही अपेक्षा की जाती है कि उस के घर के मर्द जो फैसला करेंगे उसे वही मानना होगा. न पिता न भाई उस का कोई साथ नहीं देता है.

कण्व कहते हैं कि पतिव्रताओं पर सभी वरों को देने वाले देवता लोग भी संतुष्ट रहते हैं. इस का अर्थ तो यह निकलता है कि जो स्त्रियां पतिव्रता नहीं हैं उन से देवता संतुष्ट नहीं होते हैं. मानो, एक स्त्री की पहचान, बस,पतिव्रता हो.पतिव्रतादेवियों को पति के प्रसाद से शुद्धता मिलती है, इसलिए तुम्हें अपने पति की आराधना करनी चाहिए. ऐसा कहने वाले कण्व समाज की स्त्रियों को यह बताना चाह रहे हैं कि स्त्रियों को अगर शुद्धता प्राप्त करनी है तो उन्हें अपने पतियों की सेवा करनी होगी. लेकिन उन्होंने पतियों के लिए ऐसा कुछ नहीं कहा, क्यों? क्या पति शुद्धता नहीं चाहते? राजा दुष्यंत क्या विवाहित नहीं थे और उन्होंने क्या अपनी पत्नी से छल नहीं किया?

नारीणां चिरवासो हिं बान्धवेषु न रोचते,

कीर्ति चारित्र धर्म घ्रस्त स्मात्रयत मा चिरम.

इस श्लोक में कण्व स्त्रियों को अपने भाईबंधुओं के यहां अधिक दिनों तक रहने की मनाही करते हैं. विवाह के बाद भी भाईबंधुओं के घर रहने वाली स्त्रियां पातिव्रत्य धर्म का नाश करती हैं. ऐसी स्त्रियों को बिना देर किए अपने पति के घर पहुंचा देना चाहिए. ऐसा कहना स्त्री के साथ भेदभाव करना है. यह उन केसाथकिएजाने वाला सब से बड़ा शोषण है.

पिता के घर में रहने का जितना हक बेटे का है उतना ही हक बेटी का भी है. यह हक हमारे देश का संविधान तो देता है पर पौराणिक ग्रंथों की सोच इस हक को छीन लेती है. लेकिन यह पुराण, पुरुषवादी समाज बेटियों को यह हक देना नहीं चाहता. वे स्त्रियां जो गलत शादी का शिकार हो गई हैं, जिन के पति उन्हें मारतेपीटते है या जिन का तलाक हो गया है, अगर वे स्त्रियां अपने पिता के घर में रह रही हैं तो, इस ग्रंथ के अनुसार,वे गलत हैं. उन का अपने ही घर में रहना कैसे गलत हो सकता है. इन्हीं ग्रंथों को आदर्श मानकर चलने वाले पथभ्रष्ट लोग स्त्रियों को ऐसी बातें बताकर उन से अपनी बात मनवाते हैं.

सा भार्या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रजावती,

सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता.

महाभारत के इस श्लोक में बताया गया है कि सिर्फ वह ही अच्छी पत्नी है जो घर का कामकाज अच्छे से जानती हो, जिस के बच्चे हों,

जो अपने पति को अपने प्राणों के समान प्रेम करती हो और जो पतिव्रता हो. पत्नी की इसी परिभाषा ने आज के समय में भी पत्नियों का जीना दूभर किया हुआ है. ग्रंथों में लिखी ऐसी बातों ने ही इन पुरुषों का दिमाग खराब किया हुआ है. इन्हीं बातों को पढ़पढ़ क़र सास अपनी बहू से यह आशा करती है कि वह घर के सभी कामअच्छे से करे, उसे सभी तरह का खाना बनाना आता हो. इस के अलावा वह शादी के एक साल बाद ही पोते की मांग करने लगती है. क्या केवल पत्नी की परिभाषा यहीं तक सिमटी हुई है. अगर वह खाना बनाना नहीं जानती तो वह एक अच्छी पत्नी नहीं है. यह बात लोगों ने इन्हीं ग्रंथों से सीखी है.

पुत्रास्त्रो नरकाद् यस्मात् पितरं त्रायते सुत,

तस्मात् पुत्र इति प्रोक्त : स्वयमेव खयम्भुवा.

महाभारत में लिखे इस श्लोक में कहा गया है कि बेटा पिता की नरक से रक्षा करता है. इस की जगह यह भी कहा जा सकता था कि संतान नरक से पिता की रक्षा करता है. लेकिन ऐसा न कहकर सिर्फ बेटे की बात की गई है. क्या बेटी अपने पिता की रक्षा नहीं कर सकती. यहां सीधेसीधे बेटी की उपेक्षा की गई है.

महाभारत के एक श्लोक में पत्नी को पति का आधा अंग और पति का सब से अच्छा दोस्त कहा गया है. पर यह भ्रामक मात्र है क्योंकि तथ्य कुछ और हैं. अगर दुष्यंत शकुंतला को आधे अंग की संज्ञा देते तो वे उस से गंधर्व विवाह कर के अपने साथ ले जाते, न कि उसे विरह की आग में जलने देते.

लेकिन यह सच से कोसों दूर है. इस पथभ्रष्ट समाज के लोग आज भी पत्नी को आधा अंग तो दूर की बात,इंसानहोने का दर्जा भी नहीं देते. वे न सिर्फ सड़कों पर उस की बेइज्जती करते हैं बल्कि उस को मारतेपीटते भी हैं. कई बार तो उसे जान से भी मार दिया जाता है.सुप्रीम कोर्ट तक ऐसे मामले गए हैं जिन में पति छोड़ी गई पत्नी को गुजारे के लिए 5,000 रुपए भी नहीं देना चाहता.

इसी महाभारत के एक श्लोक में यह कहा गया है कि अगर साध्वी स्त्री पहले मर गई हो तो परलोक में जा कर वह पति का इंतजार करती है और अगर पति पहले मर गया हो तो सती स्त्री पीछे से उस का पालन करती है. अगर किसी स्त्री का पति मर गया है तो क्या उस के जीने का हक खत्म हो गया है. उस की जिंदगी उस की है, न कि किसी और की. इन्हीं विचारों के आधार पर देश के कई हिस्सों में आज भी सती प्रथा का प्रचलन है. ऐसे विचारों को अब बदलने की बहुत ज्यादा जरूरत है क्योंकि यह स्त्री से उस के जीने का हक छीन रहा है. काशी और वृंदावन के विधवा आश्रमों में आज भी युवा विधवाएं लाई जा रही हैं.

महाभारत के एक श्लोक में कहा गया है कि पति अपनी उस पत्नी को माता के समान माने जिस ने बेटे को जन्म दिया है. यहां सिर्फ बेटा पैदा करने वाली स्त्री की बात कही गई है, बेटी पैदा करने वाली स्त्री की नहीं. इसी श्लोक से लडक़ालडक़ी के भेदभाव को समझा जा सकता है कि किस तरह हमारे ग्रंथों में पुरुष को श्रेष्ठ दर्जा दिया गया है जबकि बच्चा पैदा करने का कष्ट तो स्त्री ही सहती है. आज विज्ञान ने साफ कर दिया है कि बेटेबेटी पैदा करने के गुण पुरुष में होते हैं, स्त्री में नहीं. अगर इन ग्रंथों में विज्ञान पहले से ही भरा है तो यह उलटी बात क्यों कहीं गई.

अंतरात्मैव सर्वस्य पुत्रनास्त्रोच्यते सदा,

गती रूपं च चेष्टा च आवर्ता लक्षणानि च,

पितृणां यानि दृश्यन्ते पुत्राणां सन्ति तानि च,

तेषां शीलाचारगुणास्तत्सम्पर्काच्छुमाशुभा.

इस श्लोक में कहा गया है कि  एक पुत्र ही पिता की तरह चाल पाता है. एक पुत्र ही अपने पिता का रूपरंग पाता है. पुत्र में वैसी ही चाल और लक्षण होते हैं जैसे पिता के होते हैं. पिता से ही पुत्र में सारे गुण आते हैं. इस श्लोक में कहा गया है कि पिता के गुण बेटे में होते हैं, कहीं भी बेटी का जिक्र नहीं किया गया है. क्या बेटी पिता की संतान नहीं है. क्या उस के गुण पिता से नहीं मिल सकते. ऐसे ही जगहजगह पर बेटों को बेटियों से ज्यादा महत्त्व दिया गया  है जो कि भेदभाव को दर्शाता है.

महिलाओं को पीछे करने में इस तरह की बातों ने सब से ज्यादा योगदान दिया है. यह समाज जोकि पितृसत्तामक सोच पर बना है, कभी नहीं चाहेगा कि स्त्रियां पुरुषों से आगे निकलें. वे उन्हें, बस, अपने पैरों में रखना चाहते हैं.

समाज में फैली रूढ़िवादी सोच से ग्रसित लोगों को शादी के लिए कुंआरी लड़की ही चाहिए चाहे वह खुद कुंआरे न हों. इस रूढ़िवादी समाज से तो महिलाओं की दूसरी शादी भी पचाई नहीं जाती है.

महाभारत के सम्भवपर्व भाग के श्लोक 117 में दुष्यंत कहते हैं कि,“अगर मैं सिर्फ शकुंतला के कहने पर इसे अपना लेता तो सब लोग इस पर शक करते. वे इसे शुद्ध मानते.”वे कहते हैं,‘‘यह समाज समझता कि मैं अपनीकामवासना पर नियंत्रण नहीं रख सका.” ऐसा कहकर दुष्यंत शकुंतला की गरिमा को चोट पहुंचा रहे हैं. और अपनी निरर्थक सफाई दे रहे हैं जबकि दोषी वही हैं.लेकिन जब देवता और तपस्वी ऋषि शकुंतला को पतिव्रता बताते हुए फूलों की वर्षाकरते हैं तो दुष्यंत शकुंतला और अपने बेटे को अपनाने के लिए तैयार हो जाते हैं.

कृतो लोक परोक्षोऽयं संबंधो वै त्वया सह,

तस्मादेतन्मया देवि त्वच्छुद्धयर्थ विचारितम्.

इस श्लोक में दुष्यंत कहते हैं कि,“मैंने जो तुम से विवाह किया. वह लोगों के सामने नहीं किया. मैंने ये सब तुम्हारी शुद्धि के लिए किया.” अगर दुष्यंत और शकुंतला का विवाहसमाज के सामने होता तो शकुंतला को बच्चे के पिता का सुबूत देने की जरूरत न होती. दुष्यंत, जो लोकलाज के चक्कर में अपनी पत्नी का निरादर करते हैं, कैसे एक अच्छे राजा साबित हो सकते हैं. अगर उन्हें समाज की इतनी ही फ्रिक थी तो वे समाज के सामने शकुंतला से शादी करते. संबंध बनाते समय वे समाज को भूल गए और अपनाते समय उन्हेंसमाजका खयाल आ रहा है.

हमारे पौराणिक ग्रंथों को समाज को आदर्श समाज व्यवस्था देने वाला कहा जाता रहा है क्योंकि यहां शादी का चलन है. वहीं, पश्चिमी समाज को गलत कहा जाता है क्योंकि वहां अवैध संबंध होना सामान्य बात है. लेकिन शकुंतला तो असल में विश्वामित्र और मेनका के अवैध संबंधों से जन्मी संतान थी. इन की शादी नहीं हुई थी तो हमारा समाज आदर्श कैसे हुआ. दुष्यंत और शकुंतला का संबंध भी बिना विधिवत विवाह के हुआ तो वह कैसे आदर्श हुआ. जिस आदर्श समाजकीबात हमेंबताईगईहै वह इन धर्मग्रंथों से अलग है. हमारे समाज को अब नए मापदंडों की जरूरत है जिन पर चलकर हमारा देश विकास कर सके.

हमारा संविधान, आज के बनाए कानून, आज का सुप्रीम कोर्ट कानूनों की व्याख्या कर के जिस समाज को बना रहा है वह उस से कहीं अधिक श्रेष्ठ है जो पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है और जिस के पात्रों को भगवान मान करउन्हें पूजा ही नहीं जाता बल्कि ‘महान’ नरसंहार तक उन के नाम पर कर दिए जाते हैं. विधर्मियों और दलितों-शूद्रों को तो छोडि़ए, राजाओं के घरों की स्त्रियों से ले कर आज की सवर्ण जातियों की स्त्रियां तक तकरीबन सभी इसी पौराणिक मान्यता की शिकार हैं.

अगर आप भी हैं प्रेग्नेंट वर्किंग वुमन, तो जरूर अपनाएं ये 5 हेल्दी हैबिट

अगर आप वर्किंग हैं और प्रेग्नेंट हैं तो आप को अपना खयाल रखना होगा, जो आप के साथसाथ उस गर्भस्थ शिशु के लिए भी फायदेमंद होगा, जो जल्दी आप के जीवन में ढेर सारी खुशियां ले कर आने वाला है. गर्भस्थ शिशु का सही विकास हो और आप की सेहत भी दुरुस्त रहे, इस के लिए आप को ये 5 हैल्दी टिप्स अपने डेली रूटीन में शामिल करने होंगे: ऐसे करें दिन की शुरुआत

सुबह उठते ही कमरे की खिड़कियां और दरवाजे खोल दें. सुबह की ताजा हवा आप के तनमन को तरोताजा कर देगी. रात भर की अशुद्ध हवा जो बंद कमरे में जमा हो जाती है, बाहर निकल जाएगी. आमतौर पर सुबह उठ कर दूध वाली चाय की आदत होती है. अत: इस की जगह ग्रीन टी पीना शुरू करें. ऐंटीऔक्सीडैंट से भरपूर ग्रीन टी आप को ऐनर्जी देगी. एक रिसर्च के अनुसार दूध वाली चाय हानिकारक होती है. यदि मौर्निंग वाक के लिए बाहर नहीं जा सकती हैं तो घर पर ही 5-10 मिनट चहलकदमी करें. चाहे कितनी ही देर से क्यों न जागें, व्यायाम जरूर करें. ज्यादा समय न हो तो 10 मिनट ही करें, लेकिन करें जरूर. इस के ढेर सारे फायदे हैं. यह आप को दिनभर तरोताजा रखेगा. इसे करने से थकान कम होगी और रक्तसंचार सही रहेगा.

हैल्दी डाइट कभी भी कहीं भी प्रैगनैंसी के समय बैलेंस्ड और हैल्दी डाइट की जरूरत ज्यादा होती है. कामकाजी गर्भवती दफ्तर के कामकाज और घर की भागदौड़ में संतुलित आहार नहीं ले पाती. उस की शिकायत होती है कि औफिस में जब जी चाहे खापी नहीं सकती. सहकर्मी क्या कहेंगे? ऐसी सोच से बाहर आएं.

सब को पता है कि ऐसे समय में आप को पोषण की ज्यादा जरूरत है. इसलिए बेझिझक खाएं. अपने लंच के अलावा सेब, केला, अन्य फल, मिक्स सलाद, सूखा मेवा, हलवा आदि के छोटेछोटे लंचपैक अलग से रखें. इन्हें काम के बीच में निकाल कर थोड़ाथोड़ा खाती रहें. यानी थोड़ेथोड़े अंतराल पर कुछ न कुछ हैल्दी डाइट लेती रहें. पेयपदार्थों से करें दोस्ती

कामकाजी गर्भवती को पेयपदार्थों से दोस्ती कर लेनी चाहिए. खूब पानी पीएं. इस के अतिरिक्त जूस, सूप, शेक, ग्रीन टी लेती रहें. औफिस में ग्रीन टी की व्यवस्था न हो तो घर से ग्रीन टी के पाउच और थर्मस में गरम पानी ले जाएं. रात में 1 गिलास दूध जरूर लें. दूध पसंद न हो तो पनीर खाएं. कम से कम 1 बार सूप जरूर पीएं. कामकाजी महिलाएं एक धारणा बना लेती हैं कि उन के पास समय का अभाव है.

आप को हर काम मैनेज करना सीखना होगा. जैसे आप कहती हैं कि आप के पास इतना वक्त नहीं है कि सूप बना सकें. यदि आप के घर में अन्य लोग हैं तो आप सूप बनवा कर फ्रिज में रख लें. यह 2-3 दिन आराम से चल जाता है. खुद बनाना हो तो किसी दिन दूसरे कामों में कटौती कर सूप बनाएं. सिचुएशन के मुताबिक मैनेज करना सीखें, कोई परेशानी नहीं होगी.

चुराएं आराम के पल जरूरत से ज्यादा भागदौड़ थका देती है. आप की सेहत पर इस का बुरा असर पड़ता है. औफिस में घंटों एक जगह बैठना, कंप्यूटर पर लगातार काम करना प्रैगनैंसी पीरियड में अच्छा नहीं होता. इस के अलावा आनेजाने में भी परेशानी होती है.

शहरों में जाम में फंसना भी कम बड़ी सजा नहीं है. धूल, धुआं और भागदौड़ गर्भस्थ शिशु के लिए खतरनाक तो है ही, आप के लिए भी हानिकारक है. रिसर्च बताती है कि ऐसी स्थितियों के कारण आजकल ब्लीडिंग की समस्या और प्रीमैच्योर बेबी की आशंका बढ़ रही है. अत: समझदारी इसी में है कि आप काम का ज्यादा बोझ अपने ऊपर न लादें. तीसरेचौथे महीने से वीकैंड के अलावा सप्ताह के बीच एक दिन की छुट्टी अवश्य लें. 7वें महीने से यह छुट्टी 1 दिन और बढ़ा सकती हैं.

रिसर्च बताती है कि कामकाजी महिलाओं में बारबार गर्भपात का खतरा बढ़ता जा रहा है. अन्य कारणों के अलावा इस की एक बड़ी वजह काम के दौरान आराम न करना भी है. आप ने बेबी की प्लानिंग की है तो उस के प्रति पूरी जिम्मेदारी निभाएं. उसे स्वस्थ तनमन के साथ स्वस्थ माहौल में बाहर लाने की जिम्मेदारी आप की है और इस के लिए आप को आराम के पल चुराने होंगे. भरपूर नींद है जरूरी

अच्छी और गहरी नींद हर किसी के लिए जरूरी है. लेकिन गर्भवती महिलाओं के लिए यह बेहद जरूरी है. चाहे जितना भी काम हो, कम से कम 8 घंटे की नींद जरूरी है. औफिस का कोई काम घर न लाएं. सोने का एक निश्चित समय निर्धारित करें. यह तय कर लें कि आप को 10 बजे तक सो जाना है. इस नियम का सख्ती से पालन करें. इस के लिए कोई काम अधूरा छोड़ना पड़े तो छोड़ दें. अधूरा काम दूसरे दिन या फिर कभी और पूरा हो जाएगा, लेकिन आप की नींद की भरपाई दूसरे दिन नहीं हो पाएगी, क्योंकि सुबह होते ही फिर से आप का रूटीन वर्क शुरू हो जाएगा. इसलिए नींद से कोई समझौता न करें.

इन सब बातों के साथसाथ एक बात जो सब से ज्यादा जरूरी है, वह है खुश रहें. इस का सीधा असर आने वाले बच्चे में दिखेगा.

दो महीने बाद मेरी शादी है और अभी तक मुझे खाना बनाना नहीं आया है, बताएं मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं 25 वर्षीय कामकाजी युवती हूं. 2 महीने बाद मेरी शादी होने वाली है. मुझे खाना बनाना नहीं आता. जबकि टीवी धारावाहिकों में मैं ने देखा है कि बहू को खाना बनाना नहीं आने पर ससुराल के लोग न सिर्फ उस का मजाक उड़ाते हैं वरन उसे प्रताडि़त भी करते हैं. बताएं मैं क्या करूं ?

जवाब

छोटे परदे पर प्रसारित ज्यादातर धारावाहिकों का वास्तविक जीवन से दूरदूर तक वास्ता नहीं होता. सासबहू टाइप के कुछ धारावाहिक तो इतने कपोलकल्पित होते हैं कि जागरूकता फैलाने के बजाय ये समाज में भ्रम और अंधविश्वास फैलाने का काम करते हैं. शायद ही कोई धारावाहिक हो जिस में सासबहू के रिश्ते को बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया गया हो.

वास्तविक दुनिया धारावाहिकों की दुनिया से बिलकुल अलग है. आज की सासें समझदार और आधुनिक खयाल की हैं. उन्हें पता है कि एक कामकाजी बहू को किस तरह गृहस्थ जीवन में ढालना है.

फिर भी आप अपने मंगेतर से बात कर इस बारे में जानकारी दे दें. अभी विवाह में 2 महीने बाकी भी हैं, इसलिए खाना बनाने के लिए सीखना अभी से शुरू कर दें. खाना बनाना भी एक कला है, जिस में निपुण महिला को किसी और पर आश्रित नहीं होना पड़ता. साथ ही उसे पति व बच्चों सहित घर के सभी सदस्यों का भरपूर प्यार भी मिलता है.

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स्वच्छता अभियान जारी है

किसी सरकारी कार्यालय में कार्यालय अध्यक्ष का आदेश हो और कोई न माने यह तो हो ही नहीं सकता. कार्यालय अध्यक्ष के ई-मेल पर ऊपर  से निर्देश मिला कि कार्यालय में गांधी जयंती के दिन स्वच्छता अभियान के चरण को शुरू करते हुए सुबह 10 बजे स्वच्छता शपथ ली जाए और साथ ही कार्यालय में सफाई व श्रमदान का आयोजन भी किया जाए.

कार्यालय अध्यक्ष महोदय जिन्हें कार्यालय का प्रत्येक कर्मचारी बड़े प्यार से ’बड़े साहब‘ कह कर संबोधित करते थे, उन्होंने अपने कार्यालय में तत्काल आदेश जारी किया-

’’कार्यालय के समस्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों को सूचित किया जाता है कि स्वच्छता अभियान के चरण को आरंभ करते हुए गांधी जयंती के दिन सुबह 10 बजे स्वच्छता शपथ और सफाई व श्रमदान का आयोजन किया जाएगा. इस अवसर पर कार्यालय के समस्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों से अनुरोध किया जाता है कि वे सभी इस आयोजन में शामिल हो कर अपने अंदर स्वच्छता के प्रति स्वच्छ भावना का स्वस्थ समावेश करें.

“स्वच्छता के नव संकल्प को जीवनभर अपने जीवन में उतारें. मैं खुद अपने उच्चाधिकारीपन को छोड़ कर, अपने दिलोदिमाग में स्वच्छता को बैठा कर, कार्यालय के इस सफाई अभियान में आप के साथ सफाई करूंगा.         -धन्यवाद”

वैसे उक्त आदेश को देख कर सभी कर्मचारियों ने मन में भारी भाव रखते हुए मन को अधिक दुखी होने से बचाया और चुप रहे. कुछ ने मन ही मन दुखी होते हुए कहा, ’’यार, यह सरकार भी न जब देखो तब हमारी छुट्टियों का सत्यानाश कर देती है. वैसे भी साल में पूरे 12 माह काम लेती है और तनख्वाह देती है 8 माह की. 4 महीने की तनख्वाह तो हम सरकारी लोग यों ही इनकम टैक्स के रूप में सरकार को वापस दे देते हैं.‘’

कुछ ने कहा, ’’बेचारे, सफाई कर्मचारी तो जम कर सफाई करते हैं. करना है तो स्टोर में जमा तमाम अनावश्यक सामानों की सफाई करवाई जाए. वहां सालों का जमावड़ा जमा है. कार्यालय में सुबह 8 बजे ही हो चुकी सफाई के ऊपर फिर 10 बजे सफाई करने से क्या बात बनेगी?‘‘

तो कोई बोला, ’’हमारी सरकार भी न, कभी घंटीथाली, झुनझुना बजाने का आदेश देती है, तो कभी स्वच्छता के नाम पर बड़ेबड़ों से सफाई करवाने का जिन्होंने कभी अपने घर में झाङूपोंछा नहीं किया वे सरकारी उच्चाधिकारी भी अब अपनेअपने कार्यालयों में झाड़ू लगाएंगे और कूड़ा उठाएंगे. अब मजा आ जाएगा.‘’

खैर साहब, सरकारी आदेश था तो लागू होना ही था. ठीक 10 बजे आयोजन आरंभ हुआ. पहले गांधीजी की फोटो पर फूलमालाएं चढ़ाई गईं. फिर ’जाई विद राखे सरकार, ताई विद रहिए‘ की तर्ज पर ली गई स्वच्छता शपथ-

“मैं शपथ लेता हूं कि मैं स्वयं स्वच्छता के प्रति सजग रहूंगा/रहूंगी और उस के लिए समय दूंगा. हर साल 100 घंटे यानी हर सप्ताह 2 घंटे श्रमदान कर के स्वच्छता के इस संकल्प को चरितार्थ करूंगा. मैं न गंदगी करूंगा, न किसी और को करने दूंगा. सब से पहले मैं स्वयं से, मेरे परिवार से, मेरे मोहल्ले से, मेरे गांव से एवं मेरे कार्यस्थल से शुरुआत करूंगा…”

और फिर छोटी झाड़ू, बड़ी झाड़ू, बड़ेबड़े डंडों में लगी झाड़ू, पोंछा, काले प्लास्टिक बैग्स, स्टैंड वाइपर और डस्टबिन के साथ शुरू हुआ स्वच्छता सफाई अभियान. बड़े साहब ने भी जागरूकता दिखाई और अपने दोनों हाथों में ग्लव्स और मुंह पर मास्क लगा कर जुट गए बड़े डंडे में लगी झाड़ू का ले कर. इन सब के साथ ही स्टोरकीपर साहब ने भी बड़े साहब के लिए भरपूर सैनिटाइजर अपने हाथों में ले रखा था. मौका लगते ही वह बड़े साहब के ग्लव्स चढ़े हाथों में बारबार छिड़कने से बाज नहीं आ रहे थे.

’चमचे की चम्मच में मक्खन‘ वाली बात यहां लागू होते दिखाई दे रही थी. रिकौर्डिंग कैमरे के सामने सफाई अभियान में सभी ने अपनाअपना सफाई दायित्व निभाते हुए बेहतर रोल निभाने का प्रयास किया. सोशल मीडिया के जमाने में हर बात की रिकौर्डिंग न हो तो बात बनती नहीं, इसलिए मोबाइल रिकौर्डिंग श्रमकर्म भी जारी था.

ज्यों ही सफाईदल कार्यालय परिसर में आगे बढ़ा तो एकाएक पेड़ पर बैठे हुए कबूतरों ने टपाटप बीट करना शुरू कर दिया. बीट का गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक तेज था कि वह सीधे बड़े साहब की गंजी चांद यानी गंजे सिर पर आकर्षणयुक्त हो कर पच्च…पच्च… से जा टिकी. बड़े साहब की गंजी चांद का सौंदर्य ऐसा बिगड़ा मानो चंद्रमा पर पहुंचे हुए चंद्रयान ने वहां की मटमैली मिट्टी का धरती पर नमूना भेजा हो. बड़े साहब को ज्यों ही अपनी गंजी चांद पर पच्च…पच्च… की आवाज सुनते हुए कुछ गीलागीला सा लगा तो स्वाभाविक क्रियावश उन्होंने अपनी झाड़ू एक तरफ रखते हुए अपनी चांद पर हाथ लगाया तो उन की चांद पर कबूतरों की बीट के ऐसे गड्ढे बन गए जैसे विक्रम लैंडर पर लगे कैमरे ने चंद्रमा की सतह पर घूमते प्रज्ञान रोवर के साथ तसवीरें ली थीं.

तभी बड़े साहब की आंखों की घूर्णन प्रक्रिया को शीघ्र समझते हुए स्टोरकीपर साहब ने तुरंत ही अपनी जेब में रखे रूमाल से उन की बीटयुक्त चांद की सफाई की. तब जा कर बड़े साहब की गंजी चांद का सौंदर्य यथावत वापस आया और फिर कैमरा औन और कार्यालय सफाई अभियान फिर से चालू हुआ.

सफाईदल आगे बढ़ा तो दल के सामने एक तरफ बहुत सारे टूटेफूटे मिट्टी के गमले और बहुत सारी मिट्टी का ढेर और सूखी पत्तियां पड़ी थीं. माली ने तत्परता दिखाई और बड़े साहब के कान में आ कर कहा, ’’सर, आप तो बस ये सूखी पत्तियों के ढेर के आसपास झाड़ू चला दीजिए. बाकी मैं सब समेट लूंगा.‘‘

साहब ने भी लगे हाथों वहां पड़े तमाम टूटेफूटे गमलों के संबंध में पूछताछ की तो बेचारे माली ने कहा, ’’सर, मैं क्या करूं, मैं ने कई बार स्टोरकीपर साहब को बड़ेबड़े व नए आधुनिक डिजाइन वाले आकर्षक प्लास्टिक के गमलों की खरीद के संबंध में अपना मांगपत्र भर कर दिया. मगर वे हमेशा ही कच्ची मिट्टी के गमले ही मंगवाते हैं. पूछने पर कहते हैं कि तुम्हें गमलों से मतलब होगा चाहिए. मैं बारबार जैसे भी गमले मंगवा कर देता हूं, तुम्हें हमेशा उसी से काम चलाना चाहिए. सर, आज गांधी जयंती के अवसर पर सच कहूं तो स्टोरकीपर साहब को एक बार बेहतरीन और टिकाऊ खरीद में विश्वास नहीं है. इन्हें हर चीज बारबार खरीदने में पता नहीं क्या मिलता है. आप इन्हीं से पूछ कर देखिएगा.‘‘

स्टोरकीपर साहब और बड़े साहब यदि ’चोरचोर मौसेरे भाई‘ न होते तो उन्हें समझने में देर लगती इसलिए बड़े साहब अहिस्ता से मुसकराए और अपनी बड़े डंड़े में लगी झाड़ू को ले कर सड़क साफ करते हुए अपने दल के साथ आगे चल दिए.

अब जैसेतैसे सब को मिल कर अपने कार्यालय के सफाई अभियान को पूरा तो करना ही था. स्टोरकीपर साहब ने बड़े साहब के कान में खुसरफुसर करते हुए कहा, ’’सर, बस आप को अब अपने कार्यालय के मुख्यद्वार तक और जाना है. मैं ने वहां पहले से ही कुछ कूड़ाकरकट डलवाया हुआ है. वहां पहुंच कर बस आप भी हम सब के साथ अपनी बड़े डंडे में लगी झाड़ू को एक तरफ रख कर उस कूड़े को अपने हाथों से उठाउठा कर डस्टबिन में डाल दें.‘’

बड़े साहब उत्साह लिए फिर से आगे बढ़े और अपना काम पूरा करने लगे. लेकिन यह क्या, तमाम सारे बाहरी कुत्ते उन पर झपटे. मुख्यद्वार के पास खड़े सुरक्षा संतरी ने ज्यों ही कुत्तों को साहब पर झपटते हुए देखा तो उस ने अपने पास पड़े एक डंडे को कुत्तों पर फेंक कर उन्हें भगाने का प्रयास किया ही था कि खौकिया कर एक कुत्ते ने बड़े साहब की टांग पकड़नी चाही. वह तो भला हो उन के अच्छे कालसमय का कि उन की टांग बच गई, बस पैंट ही कुत्ते के दांतों में आ कर फटी. वरना बेचारे सफाई अभियान के चक्कर में अस्पताल और अगले 2-4 दिन तक उस घातक कुत्ते के जीवित या मृत होने की खोजबीन ही करते घूमते.

सफाई अभियान की समाप्ति के बाद पार्टी तो होनी ही थी. कार्यालय की तरफ से सभी के लिए चाय, कौफी, समोसा, पनीरपकौड़ा, चटनी और रसगुल्ले के साथ नाश्ते का इंतजाम किया गया. सामूहिक पार्टी हुई. उस के बाद जब सब चले गए तो पक्के सफाई कर्मचारियों ने कार्यालय प्रांगण में पार्टी हेतु लगाई गई कुरसीमेजों और सोफों आदि को हटाया तो वहां प्रत्येक कोने में स्वच्छता श्रमदान के बाद उतरे हुए ग्लाव्स और मास्क, श्रमदान के नशे को कारगर बनाए रखने के लिए कर्मचारियों द्वारा खाए हुए गुटखे के खाली रैपर, ऐनर्जी ड्रिंक की खाली छोटी बोतलें, कार्यालय में गुपचुप पी गई बीड़ीसिगरेट के कुछ बुझे हुए टुकड़े. चायकौफी के जूठे कप, मीठी चटनी, प्लेट और नाश्ते के खाली डब्बे आदि पड़े दुखी हो रहे थे और अपने बड़े साहब को रहरह कर याद कर रहे थे कि काश… बड़े साहब की सफाई चिंता दृष्टि हम पर भी पड़ जाती तो हम भी आज गांधी जयंती के दिन ही सही, मगर एक दिन धन्य तो हो जाते.

इधर निदेशालय की साइट पर उक्त कार्यालय के सफाई अभियान का विडियो अपलोड हुआ तो महानिदेशक महोदय बेहद खुश हुए और उन्होंने अगले दिन ही उस कार्यालय का औचक दौरा कर डाला तो पाया कि उक्त कार्यालय के सामने तो सबकुछ ठीकठाक यानी स्वच्छ था मगर कार्यालय के पीछे की अस्वच्छ स्थिति को देख कर वह बेहद दुखी हुए. उन्होंने तुरंत ही बड़े साहब व स्टोरकीपर साहब को सुदूर क्षेत्र स्थानांतरण की सजा देनी चाही मगर यह क्या, इस से पहले कि वे कुछ बोलते उन के सामने उक्त कार्यालय के बड़े साहब और स्टोरकीपर साहब अपनेअपने हाथों में ग्लाव्स और मुंह पर मास्क लगाए हुए बड़े डंडे में लगी झाड़ू और डस्टबिन ले कर स्वच्छता अभियान के दूसरे पार्ट को सफल बनाने में जुट गए.

यह देख कर महानिदेशक महोदय ने भी अपनी आंख से नाक पर उतरे गुस्सेयुक्त चश्मे को यथावत ठीक किया और मुसकरा दिए. तब जा कर बड़े साहब और स्टोरकीपर साहब की जान में जान वापस आई.

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