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इन टिप्स को करेंगे फॉलो तो नहीं बढ़ेगा वजन

बढ़ता वजन आप के माथे पर सिकुड़नों को बढ़ाता होगा, तो दिनबदिन बढ़ती चरबी आप को लोगों के सामने नहीं खुद अपनी नजरों में भी शर्मिंदा करती होगी. ऐसा चाहे डिलिवरी के बाद हुआ हो या अचानक यों ही, आप ने अपने वजन को घटाने के लिए व्यायाम, जिम, कार्डियो ऐक्सरसाइज वगैरह क्या कुछ नहीं किया लेकिन याद रखिए कि वजन घटाने का मतलब यह नहीं कि आप क्रैश डाइटिंग कर के एकदम से छरहरे बदन की हो जाएं. ध्यान रहे कि ऐसा करने से स्टैमिना कमजोर हो जाता है, तो न काम में मन लगता है और न दैनिक कार्यों के लिए ऐनर्जी रहती है. आप हैल्दी फूड के साथसाथ नियमित ऐक्सरसाइज व व्यायाम से ही अपना वजन मैंटेन कर सकती हैं.

आप का नाश्ता बिलकुल सही हो और थोड़ीथोड़ी देर बाद आप कुछ न कुछ खाती रहें. लेकिन डाइट में कैलोरी की मात्रा कम होनी चाहिए. तलेभुने और फास्ट फूड से दूर रहें. रात का खाना 8 बजे तक कर लें ताकि खाने को पचने का पर्याप्त समय मिल जाए और रात का खाना आप के पूरे दिन के खाने में सब से हलका होना चाहिए.

कुल मिला कर डाइट संतुलित मात्रा में लेनी चाहिए और डाइट में प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट की प्रचुर मात्रा होनी चाहिए. एक आम इनसान को प्रतिदिन 2,500 कैलोरी की डाइट लेनी चाहिए. तभी हमारा शरीर स्वस्थ व छरहरा रह सकता है. आप अपने लिए डाइट प्लान इस तरह करें:

– दिन में 3 बार की जगह 5 बार मील्स लें. इस में साबूत अनाज (ब्राउन राइस, व्हीट ब्रैड, बाजरा, ज्वार आदि) अवश्य शामिल करें. नौनरिफाइंड व्हाइट प्रोडक्ट्स (व्हाइट ब्रैड, व्हाइट राइस, मैदा आदि) को डाइट से पूरी तरह हटा दें.

– डाइट में टोंड दूध से बना दही, पनीर व दाल, मछली आदि शामिल करें.

– कब्ज व पेट की मरोड़ से बचने के लिए खाने में फाइबर की मात्रा बढ़ाएं. इस के लिए सप्लिमैंट्स के बजाय प्राकृतिक फाइबर लें. फाइबर के प्रमुख स्रोत हैं, साबूत अनाज, होम मेड सूप, दलिया, फल आदि. इन से फाइबर के साथसाथ कई मिनरल्स व विटामिंस भी मिलेंगे.

– हड्डियों की मजबूती के लिए डाइट में कैल्सियम की मात्रा बढ़ाएं. इस के प्रमुख स्रोत हैं- दूध, मछली, मेवा, खरबूज के बीज, सफेद तिल आदि. याद रहे कि पतले होने के फेर में कैल्सियम को डाइट से नदारद किया तो गठिया आप को जकड़ सकता है.

– वजन कम करने के लिए आप फैट इनटेक (वसा की मात्रा) कम करना चाहते हैं, तो डाइट से फैट्स एकदम हटाने की जरूरत नहीं. डाइटिशियन के अनुसार, ऐनर्जी लैवल को बनाए रखने, टिशू रिपेयर और विटामिंस को बौडी के सभी हिस्सों तक पहुंचाने के लिए खाने में पर्याप्त मात्रा में फैट्स होने जरूरी हैं. इसलिए डाइट से फैट्स को पूरी तरह हटाने के बजाय आप मक्खन जैसे सैचुरेटेड फैट्स को अवौइड करें और इस की जगह औलिव औयल इस्तेमाल में लाएं.

– दिन की शुरुआत जीरा वाटर, अजवाइन वाटर, मेथी वाटर या आंवला जूस से करनी चाहिए. इस से मैटाबोलिक रेट बढ़ता है.

– बहुत ज्यादा देर तक खाली पेट न रहें. इस से आप एक बार में अधिक भोजन करेंगी. बेहतर होगा कि आप बीचबीच में कम वसा वाले स्नैक्स या फिर फल, सूप जैसी चीजें लेती रहें.

– आरामदायक लाइफस्टाइल अपनाने के बजाय कुछ परिश्रम भी करें. याद रहे कि वजन तभी बढ़ता है, जब खाने से मिलने वाली कैलोरी पूरी तरह बर्न नहीं होती.

– वजन कम करने का अनहैल्दी तरीका है क्रैश डाइटिंग. इस से न सिर्फ वजन कम होता है, बल्कि मसल्स व टिशूज पर भी इस का बुरा असर पड़ता है.

– दिन में 8-10 गिलास पानी पीएं.

– आप के खाने में सोडियम की मात्रा कम होनी चाहिए. सोडियम शरीर से पानी सोखता है और ब्लडप्रैशर बढ़ाता है, इसलिए दिन भर में नमक बस 1 या 11/2 चम्मच ही लें.

– कोलैस्ट्रौल लैवल कंट्रोल करने के लिए फैट की मात्रा पर ध्यान दें.

– पानी वाले फलसब्जी (मौसंबी, अंगूर, तरबूज, खरबूजा, खीरा, प्याज, बंदगोभी आदि) रैग्युलर लें.

– कम से कम चीनी व नमक का प्रयोग करें.

कामकाजी लोग क्या करें

कामकाजी लोगों का ज्यादातर समय औफिस की कुरसी पर बैठेबैठे ही बीत जाता है. ऐसे में वजन बढ़ाना तो आसान होता है पर एक बार बढ़ जाए तो घटाना बहुत मुश्किल होता है. ऐसे लोगों को अपने खाने के प्रति काफी सतर्क रहना चाहिए. वे कुछ निश्चित नियमों का पालन कर के ही अपने वजन को काबू में रख सकते हैं. औफिस में कार्बोहाइड्रेट वाली चीजें बाहर निकाल कर या कैंटीन में खाना आम बात होती है और उन्हें खा कर बैठे रहना वजन ही बढ़ाता है. ऐसा न हो, इस के लिए घर का बना टिफिन आप की काफी मदद करेगा.

जब उम्र कम हो

बेवजह का खानपान और असमय भोजन लेने की आदत ऐसे लोगों के वजन को बढ़ाने का काम करती है. फास्ट फूड पर निर्भरता भी इस उम्र के लोगों में औरों की अपेक्षा ज्यादा ही होती है. इसलिए दिन भर में 2 बार का भोजन और सुबह का प्रोटीनयुक्त नाश्ता दिन भर आप को चुस्त रखेगा और आप का वजन भी नियंत्रित करेगा. साथ ही खाने में सलाद का ज्यादा से ज्यादा सेवन करें तो बेहतर होगा. कम उम्र में वजन बढ़ जाने से बुरा और कुछ नहीं हो सकता. ऐसा न हो इस के लिए जरूरी है कि पहले फास्ट फूड से बचें. इस उम्र में सब से ज्यादा ताकत की आवश्यकता होती है, इसलिए प्रोटीन से भरपूर भोजन लें. कार्बोहाइड्रेट को नाश्ते में जरूर शामिल करें.

बुजुर्गों की डाइट

अगर आप 60 की उम्र पार कर चुके हैं, तो सेहत के प्रति ज्यादा सजग होंगे. इस उम्र में पाचन क्रिया के साथसाथ हड्डियां और मांसपेशियां दोनों ही कमजोर हो जाती हैं. बुजुर्गों के लिए बेहतर है कि कम खाएं पर कई बार खाएं. साथ ही व्यायाम को भी अपने दिन के प्लान में जरूर शामिल करें. दिन में 1 बार 20 मिनट टहलने से आप खुद को काफी तरोताजा रख पाएंगे.

– दीप्ति अंगरीश डाइटिशियन, शिखा शर्मा से की गई बातचीत पर आधारित

कठघरे में प्यार : प्रो. विवेक शास्त्री के साथ क्या हुआ था ?

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कब तक चलेंगे ऐसे विवाद : अयोध्या, काशी और अब मथुरा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि से सटी शाही ईदगाह मसजिद का कोर्ट की देखरेख में सर्वेक्षण कराए जाने को मंजूरी दे दी है. यह सर्वेक्षण हाईकोर्ट की ओर से तय एडवोकेट कमिश्नर की निगरानी में होगा. श्री कृष्ण विराजमान की ओर से दाखिल अर्जी पर कोर्ट ने यह मांग स्वीकार कर ली है. मसले पर अगली सुनवाई 18 दिसंबर को होगी. जिस में यह तय किया जाएगा कि सर्वे कार्य कैसे होगा ?
अयोध्या मंदिर विवाद की तरह मथुरा विवाद में भी जस्टिस मयंक कुमार जैन की एकल पीठ ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि से सटी शाही ईदगाह मसजिद को मंदिर का ही हिस्सा बताए जाने से जुड़ी सभी 18 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है.

श्री कृष्ण विराजमान ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, हरिशंकर जैन और प्रभाष पांडेय की ओर से दाखिल अर्जी में दावा किया गया है कि ‘भगवान श्रीकृष्ण का जन्मस्थान मसजिद के नीचे है. वहां ऐसे कई प्रतीक हैं जो स्थापित करते हैं कि मसजिद एक हिंदू मंदिर है. वहां एक कमल के आकार का स्तंभ और शेषनाग की छवि मौजूद है. शेषनाग ने ही भगवान कृष्ण की रक्षा की थी.’

मसजिद के स्तंभ के निचले हिस्से पर हिंदू धार्मिक प्रतीक और नक्काशी भी दिखाई देती है. इसे देखते हुए कोर्ट 3 अधिवक्ताओं का एक एडवोकेट कमीशन नियुक्त कर जांच के निर्देश दे. पूरी कार्यवाही की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी भी कराई जाए.

विवादित मामले के मूल वाद भगवान श्री कृष्ण विराजमान कटरा केशव देव के नाम से रंजन अग्निहोत्री ने दाखिल किया है. इस से जुड़ी सभी 18 याचिकाओं में 12 अक्तूबर, 1968 को शाही ईदगाह मसजिद को 13.37 एकड़ जमीन देने के समझौते को अवैध बताया गया है. इस जमीन को भगवान श्री कृष्ण विराजमान को लौटाने की मांग की गई है. शाही ईदगाह मसजिद को भी हटाने की मांग की गई है. सभी 18 वादों में शाही ईदगाह मसजिद, यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, श्री कृष्ण जन्मभूमि सेवा संघ और श्री कृष्ण जन्मभूमि संघ को पक्षकार बनाया गया है.

कोर्ट ने आदेश में श्रीकृष्ण जन्मभूमि के इतिहास भी जिक्र करते कहा कहा है कि 5132 साल पहले भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कंस के मथुरा कारागार में जहां भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, उसे कटरा केशव देव के नाम से जाना जाता है. 1618 ईसवी में ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर निर्माण कराया था.

मुगल शासक औरंगजेब ने मंदिर ध्वस्त कर शाही ईदगाह मसजिद बनवा दी. गोवर्धन युद्ध के दौरान मराठा शासकों ने आगरा मथुरा पर आधिपत्य जमा लिया और श्रीकृष्ण मंदिर का फिर से निर्माण करा दिया. इस के बाद ब्रिटिश सरकार ने 1803 में 13.37 एकड़ भूमि नजूल की घोषित कर दी. 1815 में बनारस के राजा पटनीमल ने यह जमीन अंग्रेजों से खरीद ली. मुसलिम पक्ष के स्वामित्व का दावा खारिज हो कर 1860 में बनारस राजा के वारिस राजा नरसिंह दास के पक्ष में डिक्री हो गया.

जिला अदालत से 1920 में मुसलिम पक्ष को झटका लगा. कोर्ट ने कहा, 13.37 एकड़ जमीन पर मुसलिम पक्ष का कोई अधिकार नहीं है. इस के बाद 1935 में शाही ईदगाह मसजिद के केस को एक समझौते के आधार पर फिर से तय किया गया. 1944 में पूरी जमीन पंडित मदनमोहन मालवीय और 2 अन्य को बैनामा कर दी गई.

उद्योगपति जे के बिड़ला ने भूमि की कीमत अदा की. 21 फरवरी, 1951 को श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बना लेकिन 1958 में वह अर्थहीन हो गया. इसी साल मुसलिम पक्ष का एक केस खारिज कर दिया गया. 1977 में श्रीकृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ बना, जो बाद में सेवा संस्थान बन गया. न्यायमूर्ति अरविंद कुमार मिश्र की पीठ ने 26 मई, 2023 को जन्मभूमि विवाद से जुड़े सभी 18 वादों को मथुरा जिला अदालत से हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने का आदेश दिया था. इस के बाद से ही हाईकोर्ट प्रकरण की सुनवाई कर रहा है.

‘हर मसजिद में शिवलिंग देखना सही नहीं है.’ मोहन भागवत

राम मंदिर फैसले के बाद वाराणसी के ज्ञानवापी मसजिद विवाद और मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि विवाद ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि इस तरह के विवादों का अंत कब होगा? जब ज्ञानव्यापी मसजिद का विवाद उठा था तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का एक बड़ा बयान सामने आया था जिस में उन्होंने इन विवादों को बेकार करार दिया था.

मोहन भागवात ने कहा था कि ‘हर मसजिद में शिवलिंग देखना सही नहीं है.’ मोहन भागवत ने यह भी साफ किया था कि ‘राम मंदिर के बाद अब किसी भी धार्मिक स्थल को ले कर ऐसा आंदोलन नहीं खड़ा किया जाएगा.’

मोहन भागवत ने कहा कि ‘सभी को एकदूसरे की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए. दिल में कोई अतिवाद नहीं होना चाहिए, न ही शब्दों में और न ही कार्य में. दोनों तरफ से डरानेधमकाने की बात नहीं होनी चाहिए. हिंदुओं को यह समझना चाहिए कि मुसलमान उन के अपने पूर्वजों के वंशज हैं और खून के रिश्ते से उन के भाई हैं. अगर वे वापस आना चाहते हैं तो उन का खुली बांहों से स्वागत करेंगे. अगर वे वापस नहीं आना चाहते, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता, पहले ही हमारे 33 करोड़ देवीदेवता हैं, कुछ और जुड़ जाएंगे. हर कोई अपने धर्म का पालन कर रहा है.’ इस के बाद भी विवाद खत्म नहीं हो रहे हैं.

धर्म के नाम पर लड़ाई से क्या हासिल होगा ?

पहले अयोध्या फिर काषी और अब मथुरा धर्म के नाम पर लड़ाई से क्या हासिल होगा ? यह लड़ाई उसी तरह की है जैसे पहले के दौर में होता था कि जब जिस का राज रहता था वह अपने हिसाब से तोड़फोड़ करता था. मणिपुर में आज हिंदू चर्च को तोड़ रहे हैं. इस तरह से आपसी दूरियां बढ़ेंगी तो लोकतंत्र कैसे कायम रह पाएगा.

आज के दौर में बदले हुए राजनीतिक हालातों में 8-10 साल की लड़ाई में मथुरा में भी तोड़तोड़ हो सकती है. सवाल उठता है कि धर्म के नाम पर इस तरह के झगड़ों से हासिल क्या होगा? हिंदूमुसलिम झगड़े से दो वर्ग अलगअलग हो जाएंगे. देश में 25 करोड़ से अधिक आबादी के साथ लड़नेझगड़ने का समाज पर गलत असर पड़ेगा. मंदिर में एक मूर्ति रख जाने से दानदक्षिणा बढ़ जाएगी. चढ़ावा आने लगेगा. इस से धर्म की दुकानदारी बढ़ेगी, जिस के जरीए सत्ता हासिल की जा सकती है.

इस का सब से बड़ा उदाहरण काशी विश्वनाथ का मंदिर है. काशी कौरिडोर बनने से पहले बनारस में करीब 80 लाख पर्यटक आया करते थे. नया काशी बनने के बाद प्रति वर्ष 7 करोड़ 30 लाख लोग आने लगे. साल 2022 तक काशी विश्वनाथ में चढ़ाए जा रहे आर्थिक दान की राशि 100 करोड़ हो गई. अनुमान है कि अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद पर्यटन 10 गुणा अधिक हो जाएगा. काशी और केदारनाथ के जीर्णोद्धार के बाद ए देखने को भी मिला. पर्यटन विभाग के एक आकंड़े के अनुसार साल 2022 में मंदिरों से सरकार को 65 हजार लाख करोड़ की कमाई हुई. जो साल 2022 में बढ़ कर 1.34 लाख करोड़ हो गया.

इस को अगर जीडीपी के अनुसार देखें तो भारत के कुल जीडीपी का 2.32 प्रतिशत मंदिरो के चढ़ावा से आ रहा है. भारत के विदेशों में रहने वाले लोग अपने धर्म से जुड़े होते हैं. वह धर्म स्थलों को देखने आते हैं. वाराणसी की देव दिपावली को देखने भारी संख्या में विदेशी पर्यटक आते हैं. अयोध्या में इन की शुरूआत हो गई है. सरकार इस को बढ़ावा दे रही है. ऐसे में भारत की हालत इस तरह हो जाएगी की रोजी रोजगार की जगह पंडापुजारी और मंदिरों के सामने दुकान लगा कर सामान बेचते लोग रह जाएंगे.

बाकी काम के लिए हमें विदेशियों के भरोसे रहना पड़ेगा. भारत में विदेशों में जाने और वहां बसने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. यह हमारी आर्थिक व्यवस्था का अंग हो जाएंगे. हमारे जिन युवाओं को देश की तरक्की में अपना योगदान देना था वह मंदिर में पूजा करने या मंदिर के बाहर पूजन सामाग्री की दुकान खोलने अधिक से अधिक घूमने वालों की सेवा करते नजर आएगा. राम मंदिर में पूजा करने के लिए पहली बार परीक्षा का आयोजन किया गया. उस से चुने हुए लोग वेतन ले कर मंदिर में पूजा कराएंगे. परीक्षा के बाद चुने गए लोग पहले ट्रेनिंग लेंगे वहां से सफल होने के बाद पूजा कराएंगे.

पुजारी के लिए परीक्षा

यह चलन बढ़ने से अगर पुजारी की परीक्षा पास कराने के लिए कोचिंग और इन की मदद करने के लिए कंपटीशन बुक्स आने लगे तो भी चकित होने की जरूरत नहीं है. जानकारी के अनुसार 6 महीने तक प्रशिक्षण के बाद आवश्यकता के मुताबिक राम मंदिर के लिए पुजारी चुना जाएगा. सभी प्रशिक्षु पुजारियों को ट्रेनिंग सर्टिफिकेट दिया जाएगा.

इस दौरान उन के रहने और खाने की फ्री व्यवस्था की गई है. हर महीने 2 हजार रुपए का मानदेय भी दिया जाएगा. राममंदिर के मुख्य पुजारी का वेतन 25 हजार से बढ़ा कर 32 हजार 9 सौ रुपए कर दिया गया है. सहायक पुजारियों को 31 हजार रुपए मिलेगा. 1992 में सत्येंद्र दास को मुख्य पुजारी के रूप में 100 रुपए वेतन मिलता था.

राम मंदिर में पूजा अर्चना कराने के लिए चुने गए 24 प्रशिक्षु पुजारियों की ट्रेनिंग शुरू हो गई है. कुल 3 हजार आवेदन में से 200 लोग इंटरव्यू तक पहुंचे थे. उन में से केवल 50 को पुजारी के रूप में चुना गया है. राम मंदिर ट्रस्ट की तरफ से इन्हें प्रशिक्षण दिया जा रहा है. ट्रेनिंग लेने वाले पुजारी सुबह 6 बजे त्रिकाल संध्या से पूजा शुरू करते हैं. इस के बाद दोपहर और फिर शाम को पूजा होती है. ट्रेनिंग ले रहे पुजारियों के लिए ट्रेनिंग के दौरान दौरान फ्री आवासीय और भोजन की सुविधा दी जा रही है. साथ में 2 हजार रुपए मासिक भत्ता भी दिया जा रहा है. प्रशिक्षण पूरा करने के बाद नियुक्ति की गारंटी नहीं रहेगी.

सभी ट्रेनिंग लेने वाले पुजारियों को अलगअलग संतों और प्रमुख आचार्यो के आश्रम में भेजा गया जहां उन्होंने उन से दीक्षा ग्रहण की. इस के साथ ही उन्हें वैदिक रीति से सभी अनुष्ठानों को पूरा करने के लिए अभ्यास करवाया जा रहा है. मंदिर ट्रस्ट ने सभी के लिए एक ड्रेस कोड भी तय किया है. उन्हें हिदायत दी गई है कि वे तामसी आचरण और खान पान से दूर रहेंगे. साथ ही शराब और नशे की वस्तुओं का सेवन नहीं करेंगे.

यह प्रशिक्षण 6 माह का है. प्रशिक्षुओं के आवास की व्यवस्था रंग वाटिका में की गई है. उन का प्रशिक्षण श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र के आवासीय कार्यालय में चल रहा है. धार्मिक कार्यक्रम के आयोजन के लिए बनी हाई पावर कमिटी के अध्यक्ष गोविंद देव गिरि ने बताया कि प्रशिक्षण के बाद जरूरत के मुताबिक इन में से राम मंदिर के पुजारी का चयन किया जाएगा.

प्रशिक्षण पूरा करने वालों को मंदिर ट्रस्ट सर्टिफिकेट भी देगा. इस के आधार पर राम मंदिर में जब जरूरत पड़ेगी तो इन को चयनित किया जा सकेगा. इस से समझा जा सकता है कि आने वाले दिनों में दरोगा, पटवारी, टीचर जैसी भर्ती के साथ ही साथ पुजारी भर्ती की प्रवेश परीक्षा, कोचिंग और कंपीटिशन बुक्स दिखाई दे सकती है. इस तरह देश के युवा इंजीनियर, डाक्टर बनने की जगह पुजारी बनेंगे. मंदिर के गाइड बनेंगे. मंदिर के सामने पूजन सामाग्री बेचेंगे.

संसद पर हुए हमले ने उठाया युवाओं के रोजगार का सवाल

हम ने आतंकवाद, नक्सलवाद, माओवाद, अलगाववाद पर काबू पा लिया. हम ने भ्रष्टाचार को खत्म कर दिया. नोटबंदी कर के कालाधन जमा करने वालों की कमर तोड़ दी. ऐसी बड़ीबड़ी दावे करने वाली भारतीय जनता पार्टी के मुंह पर उस वक्त ताले पड़ गए जब 5 चक्र की सुरक्षा व्यवस्था को धता बता कर, पुलिस और इंटेलिजैंस की आंखों में धूल झोंक कर 5 युवा गैस स्प्रे की बोतलें लिए संसद के अंदर घुस गए और उन में से 2 संसद परिसर में और 2 चलती लोकसभा में पब्लिक दीर्घा से होते हुए नेताओं के बीच संसद की बेंचों पर कूदते हुए रंगीन गैस छोड़ने लगे और एक जिस ने उन को अंदर घुसने में मदद की वह संसद में अपने साथियों का वीडियो बना कर और उस को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर के फरार हो गया.

13 दिसंबर, 2023 की इस घटना ने 13 दिसंबर, 2001 की याद ताजा कर दी, जब 5 आतंकियों ने इसी तरह संसद की सुरक्षा भेद कर वहां गोलीबारी की थी, जिस में 5 जवानों सहित 9 लोगों की मौत हुई थी. उस दिन भी 5 लोग थे, सभी इसी देश के नागरिक थे, आज भी 5 लोग थे और इसी देश के नागरिक हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि तब वे पांचों मुसलमान थे, आज ये पांचों हिंदू हैं. शायद इसीलिए भाजपा नेताओं के मुंह बंद हैं.

शुक्र है कि इस बार संसद पर हमला करने वालों के पास सिर्फ गैस स्प्रे थे, अगर पिस्तौल या बम होते तो अंजाम पिछले हमले से कहीं ज्यादा भयावह होता क्योंकि पिछली बार संसद पर हमला करने वाले आतंकियों को जवानों ने बाहर ही रोक लिया था मगर अब की बार तो ये अंदर तक पहुंच गए.

शुक्र है कि क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह का अनुसरण करने वाले इन युवाओं ने भगत सिंह की तरह संसद में बम नहीं फोड़ा. भगत सिंह ने तो अंग्रेज शासकों को जगाने के लिए संसद में बम फोड़ा था तो क्या देश में फिर ऐसे क्रांतिकारी दल तैयार हो रहे हैं जो मोदी शासन को जगाना चाहते हैं? आईबी और रौ जैसी एजेंसियों को इस की जानकारी क्यों नहीं है? लोकल इंटेलिजैंस और पुलिस क्या कर रही है?

भटकते युवा

13 तारिख को ही महाराष्ट्र में एंटी टेरेरिस्ट स्क्वाड ने गौरव पाटिल नाम के एक 23 साल के युवा को गिरफ्तार किया जो पाकिस्तान बेस्ड इंटेलिजैंस औपरेटिव के एजेंट को यहां की खुफिया जानकारी उपलब्ध कराता था. गौरव के साथ मोहितो, पायल और आरती को भी गिरफ्तार किया गया है. इन के खिलाफ आईपीसी की धारा 120 (B) और औफिशियल सीक्रेट एक्ट की धारा 3(1)A, 5(A)(B)(D) और 9 के तहत एफआईआर (FIR) दर्ज की गई है.

गौरव पाटिल ने मई 2023 से अक्टूबर 2023 तक पीआईओ (PIO) की 2 एजेंट्स पायल और आरती से सोशल मीडिया प्लेटफौर्म फेसबुक और व्हाट्सऐप के जरिए भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित की गई जानकारी को शेयर किया. पाटिल मझगांव डाक पर अपरेंटिस के पद पर काम करता था और वहां रहने की वजह से उसे यह पता होता था कि नेवी की कौन सी वौरशिप कब आई और कब गई. इस जानकारी के बदले वह पैसे लेता था.

13 तारिख को ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पीसीबी हौस्टल में कमरा नंबर – 68 में जोरदार धमाका हुआ और धुवां छंटने पर पता चला कि उस कमरे में बम बनाए जा रहे थे. कमरे में मौजूद 2 छात्र प्रभात यादव और प्रत्यूसश सिंह जो वहां चोरीछुपे बम बनाने का काम कर रहे थे, इस बम धमाके में बुरी तरह जख्मी हुए.

प्रभात यादव का एक हाथ उड़ गया और सीना, चेहरा और अन्य अंग बुरी तरह झुलस गए. ये बम किसलिए बनाये जा रहे थे? किस के कहने पर बनाए जा रहे थे? बम बनाने का सामान विश्वविद्यालय में कब और कैसे पहुंचा? कितने कमरों में बम बन रहे हैं? कितने युवा इस काम को अंजाम दे रहे हैं? सवाल यहां भी हैं.

ये तमाम घटनाएं इस बात को इंगित करती हैं कि मोदी राज में युवाओं का एक हिस्सा न शिक्षा पा रहा है न रोजगार, वह बस अपनी और देश की बरबादी का सामान जुटा रहा है. सोशल मीडिया जिस पर कड़ी नजर रखने का दावा मोदी सरकार करती है, उसी के माध्यम से अपराधियों की नई युवा फौजें देश में तैयार हो रही हैं. इन युवाओं में न तो कानून का कोई डर है न किसी प्रकार की सजा का.

चारों तरफ से हथियारबंद जवानों से घिरी संसद की सुरक्षा भेदने वाले युवाओं को अपना अंजाम बखूबी मालूम रहा होगा. वे वहां पकड़े जाएंगे, पीटे जाएंगे, हो सकता है उन्हें गोली मार दी जाए, इन सारे खतरों को जानते हुए वे 5 चक्र की सुरक्षा भेद कर चलती हुई संसद में घुसे. इतना साहस दिखाने वालों का दिमाग किस के काबू में है, कौन उन्हें गाइड कर रहा था, किस ने उन्हें एकजुट किया, अपराध का रास्ता दिखाया, संसद के अंदर घुसने के लिए प्रताप सिम्हा नाम के बीजेपी सांसद से पास दिलवाए, क्या जांच एजेंसियां उस ‘गब्बर’ तक कभी पहुंच पाएंगी?
गौरतलब है कि संसद के बाहर गैस स्प्रे छोड़ने और नारेबाजी करने वाली नीलम हरियाणा की रहने वाली है. उस के साथ जो अन्य लड़का अमोल शिंदे गिरफ्तार किया गया है वह लातूर महाराष्ट्र का है. लोकसभा के अंदर घुस कर स्प्रे छोड़ने और बवाल काटने वाला सागर शर्मा लखनऊ का और मनोरंजन डी मैसूर कर्नाटक का रहने वाला है.

प्लानिंग के तहत घुसपैठ

नीलम जहां उच्च शिक्षा प्राप्त महिला है वहीं सागर शर्मा लखनऊ में ई-रिक्शा चलाता है. उस के पिता कारपेंटर हैं. उस का परिवार निम्वर्गीय श्रेणी में आता है. ऐसे अलगअलग आर्थिक और शैक्षिक भिन्नता वाले लोगों को एकजुट करना, उन का ब्रेनवाश कर के किसी एक मिशन से जोड़ना और दिल्ली तक पहुंचा कर संसद में घुसने का रास्ता दिखाना कोई दोचार दिन की बात या किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं है, निश्चित ही इस के पीछे कोई बड़ा गैंग है, गहरी साजिश है और एक खतरनाक विचारधारा है.

जिस भाजपा नेता प्रताप सिम्हा के जरिये इन्हें संसद में पब्लिक दीर्घा तक आने के पास हासिल हुए उस नेता तक इन में से किसी की अच्छी पहुंच रही होगी. कोई नेता हर ऐरेगैर को तो संसद का पास मुहैय्या नहीं करवा देता. इस के बाद सब से बड़ा सवाल यह कि जिन 4 लोगों को संसद हमले में गिरफ्तार किया गया है उन चारों के मोबाइल फोन और अन्य सामान कहां और किस के पास है? आज के समय में बिना फोन संपर्क के कोई काम नहीं हो सकता. जाहिर है इन चारों के मोबाइल फोन किसी के पास हैं और वो फरार है.

अगर ये युवा सिर्फ बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार को जगाने का उद्देश्य ले कर संसद में घुसे होते, जैसा कि उन्होंने पुलिस को बयान दिया तो उन के फोन और पर्स-पैसे, आईकार्ड वगैरह उन के पास होते, लेकिन इन में से कुछ भी उन के पास नहीं था. पूरी प्लांनिंग के तहत ये चीजें उन से अलग की गईं ताकि गिरोग के अन्य लोगों का पता न चल सके. इन की गतिविधियों की जानकारी न हो सके.

जरूरी सवाल जो पता लगने बाकी हैं

आखिर देश में शांति और सुरक्षा की जो छद्म चादर भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने तान रखी है उस के नीचे कौन सा ज्वालामुखी उबल रहा है? संसद हमले की साजिश में कितने किरदार हैं, मास्टर माइंड कौन है. कितने दिन की प्लानिंग थी? कितने दिन की ट्रेनिंग थी? संसद की रेकी में कितने लोग शामिल थे? असली उद्देश्य क्या था? कितना बड़ा गिरोह है? देश भर में इस के लोग कहांकहां बैठे हैं? सोशल मीडिया के जरिये ऐसे कितने गिरोह देश में तैयार हो चुके हैं? क्या इन के सूत्र देश से बाहर भी जुड़े हैं? ये तमाम सवाल अब जांच एजेंसियों और खुफिया विभाग के सामने हैं.

मोदी सरकार विकास के बड़ेबड़े ढोल पीटे, बेरोजगारी दूर करने के खूब दावे करे लेकिन हकीकत यह है कि देश में युवाओं के बहुत बड़े हिस्से के पास कोई नौकरी नहीं है, कोई व्यवसाय नहीं है, आय का कोई जरिया नहीं है. इन्हें कुछ पैसा औफर कर के आसानी से आतंकी और देशविरोधी गतिविधियों में लगाया जा सकता है. सरकारें और राजनीतिक दल इन बेरोजगारों को कुछ रुपए का लालच दे कर, शराब की एक बोतल या अन्य चीजें दे कर चुनाव के वक़्त अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं.

ये बेरोजगार युवा चुनाव के वक्त उन के लिए रैलियां निकलते हैं, नारेबाजी करते हैं, दंगे करते हैं. यही बेरोजगार संघ और भाजपा की छत्रछाया में सेनाएं बना कर डंडे और तलवारें ले कर वेलेंटाइन डे या अन्य अवसरों पर प्रेमी जोड़ों को नैतिकता का सबक सिखाते हैं, गौ रक्षा के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की हत्याएं करते हैं या धर्म के नाम पर कांवड़ यात्राओं के दौरान सड़कों पर हुड़दंग मचाते हैं. बेरोजगार युवाओं की यही फौज आज आर्टिफीशियल इंटेलिजैंस का गलत इस्तेमाल कर के साइबर क्राइम को बढ़ा रही है और धोखे से लोगों के बैंक अकाउंट खाली कर रही है.

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन द्वारा लिखी उन की हालिया किताब ‘ब्रेकिंग द मोल्ड रिइमेजिनिंग इंडियाज इकनौमिक फ्यूचर’ में कहा है, ‘भारत की सब से बड़ी ताकत इस की 1.4 अरब की मानव पूंजी है, हालांकि इस पूंजी को मजबूती देना सब से बड़ा सवाल बना हुआ है. भारत को विकास की राह पर आगे बढ़ते हुए हर स्तर पर नौकरियां पैदा करने की जरूरत है. हम युवाओं को नौकरियां नहीं दे पा रहे हैं, यह बुनियादी चिंता है. हमें शासन में सुधार की जरूरत है.

भाजपा का पुराने नेताओं को किनारे करने के क्या होंगे परिणाम ?

राजस्थान में सांगानेर विधानसभा सीट से जीते भजनलाल शर्मा को विधायक दल का नेता व मुख्यमंत्री चुना गया है. कयास और निगाहें पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया पर थीं, मगर भाजपा ने नया चेहरा सामने ला कर सभी को चौंका दिया.

लोकतंत्र का मतलब है बहुसंख्यक विधायकों का नेता मुख्यमंत्री बनना चाहिए. राजस्थान में अधिसंख्य विधायक वसुंधरा राजे के पक्ष में थे. मगर देश में भाजपा आलाकमान का यह अनुशासन का मंत्र राजनीति की पाठशाला में चर्चा का सबक बन गया है.

लोकसभा चुनाव 2024 को ले कर रणनीति सामने आई कि भाजपा के बड़ेबड़े चेहरों को परदे के पीछे जाना पड़ा. ये स्थितियां मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के साथ और छत्तीसगढ़ में डाक्टर रमन सिंह के साथ भी घटित हुई हैं और इस का परिणाम आगामी समय में आ सकता है, यानी इन नेताओं का अंदरखाने विद्रोह हुआ तो भाजपा को लोकसभा में नुकसान उठाना पड़ सकता है.

मजे की बात यह है कि वसुंधरा राजे, डाक्टर रमन सिंह तो खामोश रह गए मगर मध्य प्रदेश में निवृतमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, “मैं दिल्ली नहीं जाऊंगा… मैं मर जाऊंगा मगर मांग नहीं सकता.” उलटफेर मध्य प्रदेश में भी हुआ. एंटीइंकम्बेंसी से जूझ रहे इस प्रदेश में कांग्रेस के जीतने के कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन चुनाव परिणाम ने सभी को चौंका दिया.

भाजपा बड़े अंतराल से जीती. सभी को लगा शिवराज सिंह एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे, लेकिन हुआ उलटा और यहां मोहन यादव को चुना गया.

रास्ते का रोड़ा

भाजपा का यह कदम उस की फांस भी बन सकता है. दरअसल, मोदीशाह पपेट मुख्यमंत्रियों को बैठा कर केंद्र से चीजों को चलाने में विश्वास रखते हैं. इस से पहले भी जिन राज्यों में वह जीती है वहां पपेट मुख्यमंत्री बैठाए गए हैं, जिन्हें हर निर्णय के लिए केंद्र की तरफ मुंह ताकना पड़ता है. इस से राज्य की असली कमान केंद्र के हाथ में रहती है.

जिन 3 राज्यों में भाजपा जीती, वहां के नेता उन के इस काम में रुकावट जैसे थे. वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चौहान व रमन सिंह भाजपा से जरूर रहे हैं, लेकिन धार्मिक राजनीति में वे ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाते रहे, यही वजह है कि उन्हें दूर रखा गया.

निगाहें भविष्य पर आज देश की निगाह इन तीनों निवृतमान मुख्यमंत्रियों पर है. घटनाक्रम पर सभी की टकटकी लगी हुई है. वसुंधरा राजे राजस्थान में मुख्यमंत्री पद पर अपना पहला और अंतिम दावा समझती रहीं. मगर सभी जानते हैं कि शाही राज और नाज के कारण वसुंधरा राजे ने न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को और न ही उन के दाएं हाथ समझे जाने वाले अमित शाह को कभी तवज्जुह देती थीं.

माना जा रहा है कि ऐसे में अब आगे जब राजस्थान में जो राजनीतिक रस्साकशी देखने को मिलेगी वह किसी मल्ल युद्ध से कम न होगी.
आज संपूर्ण देश में भाजपा की केंद्रीय नेतृत्व को आंख दिखाने और बराबरी से बात करने का दमखम अगर किसी में है तो वह वसुंधरा राजे में है. कभी भी हद से ज्यादा नहीं झुकने के कारण आज का भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व राजे को उन के कद को कम करने का प्रयास करता रहा है मगर विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद जिस तरह 30 से 50 विधायकों ने उन के आवास पर जा कर मुलाकात की, वह इस बात का संकेत है कि वसुंधरा राजे राजस्थान की राजनीति को अपनी मुट्ठी में रखने की काबिलीयत रखती हैं.

उल्लेखनीय है कि एक दफा पूर्व मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत ने कहा था कि अगर कांग्रेस की सरकार राजस्थान में है तो उस का श्रेय वसुंधरा राजे को है. सीधी सी बात है, केंद्रीय नेतृत्व को झटका दे कर वसुंधरा राजे राजस्थान में एक अलग राजनीतिक रास्ता प्रशस्त कर सकती हैं.
राजस्थान की दावेदारी पर रार यही कारण है कि भाजपा के नेतृत्व को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में उतनी दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा जितना कि राजस्थान में. यहां मुख्यमंत्री पद का चयन एक तरह से लोहे के चबाने जैसा था. परंतु सबकुछ सामान्य ढंग से घटित होता चला गया, मगर अंदरखाने क्या पक रहा है, यह वसुंधरा राजे ही जानती हैं.

यह भी सच है कि वसुंधरा राजे ने स्वयं को नम्र बनाया है और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा से मुलाकात की, फिर पीछेपीछे मध्य प्रदेश के एक बड़े चेहरे बन चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी जे पी नड्डा से मुलाकात की, जिस का सीधा सा अर्थ यह है कि बूआ और भतीजे भाजपा को अपना संकेत दे चुके हैं. अगर केंद्रीय नेतृत्व अपनी जिद पर अड़ा रहा, तो आगे राजस्थान में राजनीति का वह प्रहसन देखने को मिल सकता है जिस की कोई कल्पना नहीं कर सकता.

नरेंद्र मोदी को मिल सकती है चुनौती माना जा रहा है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में तीनों पूर्व मुख्यमंत्री आने वाले लोकसभा चुनाव में अपनेअपने तरीके से नरेंद्र मोदी और केंद्रीय सत्ता को नुकसान पहुंचा सकते हैं. जिस तरह बिना किसी बड़ी वजह से तीनों ही चेहरों को मुख्यमंत्री पद से विमुख किया गया, उस से उन के क्षेत्रीय समर्थक नाराज हुए हैं.

सभी यह जानते हैं कि राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी का मतलब है वसुंधरा राजे का होना. दूसरी तरफ केंद्रीय नेतृत्व इस सच यानी वसुंधरा को बारबार नकारता रहा है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में भी नए चेहरों पर ताज पहनाया गया. मगर यह भी सचाई है कि वसुंधरा राजे के पास जो विधायकों का संख्याबल और समर्थन है, साथ ही, कांग्रेस पार्टी का अप्रत्यक्ष सहयोग है, उस से तो यहां संभव है कि आने वाले समय में राजनीतिक संग्राम देखने को मिले और नरेंद्र मोदी को एक ऐसी चुनौती का सामना करना पड़े जो उन्हें हतप्रभ कर सकती है.

सचाई यह है कि भाजपा में सिर्फ कहने के लिए अनुशासन है. डा. रमन सिंह हों और वसुंधरा राजे फिलहाल मौन रह गए मगर उन के चेहरे अगर आप पढ़ सकते हैं तो समझ सकते हैं कि केंद्र के फैसले से यह चेहरे नाखुश हैं. दूसरी तरफ, शिवराज सिंह चौहान ने यह कह कर अपना गुस्सा ही जाहिर किया कि मैं दिल्ली नहीं जा सकता. मैं मर सकता हूं मगर झुक नहीं सकता. जो भी हो, बताएगा भविष्य ही.

विधानसभा चुनाव नतीजों में धर्म की धमक

धर्म बहुत बड़ी राजनीतिक शक्ति है या अब राजनीति बहुत बड़ी धार्मिक शक्ति हो गई, यह तय कर पाना कभी कोई मुश्किल काम नहीं रहा. 3 दिसंबर को आए 5 में से 4 राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजे खास इस धारणा की पुष्टि करते हैं. नतीजों के बाद हार और जीत का विश्लेषण करना ज्यादा आसान काम होता है.

नतीजों में हिंदी पट्टी के 3 राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तमाम अनुमानों को पीछे छोड़ते हुए भारतीय जनता पार्टी अप्रत्याशित तरीके से बाजी मार ले गई और सकते में पड़े कांग्रेसी व सियासी पंडित गिनाते रह गए कि दरअसल भाजपा का संगठन बूथ लैवल तक मजबूत था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गारंटियों पर लोगों ने भरोसा किया और कांग्रेस हवाहवाई राजनीति करती रही.

इन में से तीसरी वजह सियासी तौर पर हकीकत के ज्यादा नजदीक लगती है लेकिन इसे बारीकी से अभी भी कम ही लोग समझ पा रहे हैं. चुनाव किस या किन मुद्दों पर लड़ा गया जिन के चलते वोटिंग के आखिरी दिनों में जीत भाजपा की झोली में जा गिरी, इस के लिए एक सनातनी संत राम भद्राचार्य का चुनाव के पहले दिया एक बयान काफी अहम है जिस में उन्होंने कहा था कि यह चुनाव धर्म की लड़ाई है जिस में भाजपा जीतेगी.

जगतगुरु के खिताब से नवाज दिए गए राम भद्राचार्य जन्मांध हैं जिन की दूरदृष्टि का कायल हर कोई रहता है. वे कई भाषाओँ के जानकार हैं. वे निहायत ही लुभावने और पेशेवर अंदाज में भागवत और रामकथा बांचते हैं. इस से भी ज्यादा अहम बात यह कि वे राम मंदिर मुकदमे के अहम गवाह हैं जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट की इस शंका को सनातनी धर्मग्रंथों के हवाले से दूर किया था कि राम दरअसल उसी स्थान पर जन्मे थे जिसे उन की जन्मभूमि बताया जा रहा है.

धर्म का कार्ड और मोदी

कहने का मतलब यह नहीं कि लोगों ने उन के कहने पर ही वोट किया बल्कि हुआ यह कि हिंदीभाषी राज्यों के लोगों के दिलोदिमाग में जो कशमकश चुनाव के 6 महीने पहले से चल रही थी, वह इस और ऐसे कई संतों की सक्रियता से दूर हो गई. लोगों को ज्ञान प्राप्त हो गया कि हमंे दिमाग की नहीं, बल्कि दिल की आवाज पर वोट करना है. हमें लोकतंत्र के लिए नहीं, बल्कि धर्मतंत्र के लिए वोट करना है. हमें उस पार्टी के लिए वोट करना है जो हमें धार्मिक सुरक्षा की गारंटी देती है, हमारी औरतों और मंदिरों की हिफाजत की बात करती है. ऐसी कई और बातों के अंदरूनी व खुले प्रचार ने एक नशे सा असर किया और बाजी कुछ इस तरह पलटी कि लोग खुद की रोजमर्राई जिंदगी से ताल्लुक रखते बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे अहम मुद्दों को भूल गए.

यह सब रातोंरात नहीं हुआ, बल्कि सालों से जो डर हिंदुओं के दिमाग में बैठाया जा रहा है उस का राजनीतिक और चुनावी इजहार भर एक बार फिर 3 दिसंबर को था. इन राज्यों के विधानसभा चुनाव भाजपा के लिहाज से बेहद अहम हो गए थे क्योंकि इसी साल उस ने हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों की सत्ता कांग्रेस के हाथों गंवाई है. पश्चिम बंगाल में तो उसे गांवों के चुनावों तक में मुंह की खानी पड़ी. ये हारें 2024 के चुनावों के मद्देनजर बेहद अहम थीं जिन के चलते उसे खासतौर से हिंदीभाषी राज्यों में भगवा परचम लहराना करो या मरो वाली बात हो गई थी.

पहली बार मोदी पर संशय

10 साल में पहली बार ऐसा हुआ था कि लोग नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और स्वीकार्यता को शक की निगाह से देखने लगे थे और एक हद तक उन्होंने राहुल गांधी में वैकल्पिक संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी थीं. दो टूक कहें तो मतदाता के मन से धर्म की राजनीति का सुरूर उतरने लगा था. कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के लोगों ने भाजपा के धार्मिक एजेंडे को नकारते साफ मैसेज दे दिया था कि अब यह नहीं चलेगा.
तो क्या चलेगा? यह भाजपा को भी समझ नहीं आ रहा था लेकिन उस ने हथियार नहीं डाले और अब तक का सब से बड़ा जुआ खेला. आमतौर पर विधानसभा चुनाव क्षेत्रीय क्षत्रपों के चेहरे बतौर मुख्यमंत्री पेश कर ही चुनाव लड़े जाते हैं जिस से वोटर के मन में प्रदेश के विकास और भविष्य को ले कर आशंकाएं न रहें.

सितंबर आतेआते राज्यों की तसवीर और माहौल बेहद साफ हो गया था कि भाजपा की राह आसान नहीं रह गई है तो चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे और नाम पर लड़ने का फैसला भाजपा ने ले लिया. हालांकि यह उस वक्त के लिहाज से बहुत बड़ा जोखिम था लेकिन भाजपा के पास कोई दूसरा रास्ता भी नहीं बचा था.

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया सहित छत्तीसगढ़ में डाक्टर रमन सिंह दरअसल बहुत कट्टरवादी इमेज वाले नेता नहीं थे. ये औसत से बेहतर उदारवादी इमेज वाले नेता थे जिन के नाम पर लड़ने में भाजपा हिचक रही थी. उसे इन राज्यों के साथसाथ 2024 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा जैसे कट्टर हिंदुत्व की इमेज वाले चेहरों की दरकार थी जो सरेआम मुसलमानों और इसलाम से नफरत प्रदर्शित करने में हिचकते न हों बल्कि फख्र महसूस करते हों. कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के हश्र से पार्टी को समझ आ गया था कि केवल राम, हनुमान और शंकर की जयजयकार से बात नहीं बनती. समाज के माहौल को मुसलिमविरोधी और हिंदुत्वहिमायती बनाया जाना चाहिए.

तब उस की चिंता दलित और आदिवासी कम वे सवर्ण ज्यादा थे जो उस का कोर वोटबैंक हुआ करता है. अगर यह भी हाथ से खिसक गया तो हथेलियां ही मलते रहना पड़ेगा. चूंकि बहुत कम वक्त में कट्टर चेहरे छांट कर उन्हें बतौर मुख्यमंत्री पेश कर जनता को लुभाना मुश्किल काम था, इसलिए उस ने नरेंद्र मोदी के नाम पर दांव खेला.

और फिर यों बिसात बिछाई

नरेंद्र मोदी के नाम पर विधानसभाओं के चुनाव लड़ने से जरूरी यह था कि माहौल इतना धर्ममय कर दिया जाए कि वोटर को सिवा सनातन और हिंदू राष्ट्र के कुछ और दिखे ही न.

देखते ही देखते बहुत हैरतअंगेज तरीके से चारों तरफ नए पुराने बाबा ही बाबा दिखने लगे, हिंदी पट्टी के तीनों राज्यों में ताबड़तोड़ और धुआंधार तरीके से भागवत कथाएं होने लगीं. आसमान में यज्ञ और हवनों का धुआं उठता दिखाई देने लगा.

अगस्त सितंबर के चुनावी समय में नेताओं की सभाओं से बहुत ज्यादा तादाद में बाबाओं के प्रवचन हुए, दिव्य दरबार लगे, आम और खास लोगों की व्यक्तिगत व सार्वजनिक समस्याएं परचियों और हनुमान शंकर के नाम और मंत्रों व टोटकों से हल होने लगीं.

इन्हीं दिनों में एक नएनवेले बाबा बागेश्वर यानी धीरेंद्र शास्त्री का नशा लोगों के सिर चढ़ कर बोला, जो दिव्य दरबार लगा कर लोगों की समस्याएं हल कर नाम और दक्षिणा बटोरते नजर आए. लेकिन मकसद कुछ और, यानी हिंदुत्व भी था, जिस के नाम पर इस बाबा ने अपने प्रवचनों का पैटर्न बदलते भड़काऊ हिंदुत्व की जम कर आहुतियां दीं. हनुमान को अपना इष्ट बताने वाले बागेश्वर बाबा ने मुसलमानों और ईसाईयों का जम कर डर अपने प्रवचनों में दिखाया.

भव्य धार्मिक आयोजन

बात हलके में न ली जाए, इस के लिए उस में घरवापसी का तड़का लगाते एक मुहिम भी जगहजगह चलाई. मुसलमान और ईसाई बन चुके कुछ दलितों व आदिवासियों को समारोहपूर्वक उन की हिंदू धर्म में वापसी कराई गई.

यह जाल कितने बड़े पैमाने पर बुना गया था, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा ने छोटेबड़े बाबाओं की फौज मैदान में उतार रखी थी. इन में प्रमुख नाम पंडोखर सरकार, कमल किशोर नागर, जया किशोरी, देवकीनंदन ठाकुर, रावतपुरा सरकार रविशंकर और एक और ब्रैंडेड बाबा प्रदीप मिश्रा थे.

इन बाबाओं की 3 महीनों में सौ से भी ज्यादा कथाएं जगहजगह हुईं. लग ऐसा रहा था कि क्रिकेट टीम का कोई अनुभवी और पेशेवर कप्तान फील्डिंग कुछ इस तरह जमा रहा है कि औफ और औन साइड का कोई भी कोना खाली न छूटे.

अब कहने को ही मैच चुनाव का रह गया था जिस पर मैदान में खेल ये 50 छोटेबड़े धर्मगुरु कर रहे थे. हर जगह इन के यजमान भाजपा नेता ही थे, मसलन भोपाल में विश्वास सारंग, आलोक शर्मा, रामेश्वर शर्मा सहित खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जो खुलेआम धर्म और हिंदुत्व के इन ठेकेदारों के चरणों में शीश नवाते नजर आए. प्रिंट मीडिया और नेशनल न्यूज चैनल्स ने इन बाबाओं के भव्य और खर्चीले आयोजनों को हाथोंहाथ लपका. सोशल मीडिया के तो ये सुपर हीरो हमेशा से रहे ही हैं.

भाजपा के कार्यकर्ताओं और आरएसएस के स्वयंसेवकों ने इन धार्मिक समारोहों को सफल बनाने में जीजान लगाते दिनरात एक कर दिया. उन्होंने गांवगांव से लाखों की भीड़ इन आयोजनों में जुटाई, भंडारों में खाना परोसा और भक्तों के रहने, खानेपीने व ठहरने का इंतजाम भी किया. यह सम्मोहन कितने बड़े पैमाने पर छाया था, इसे सटीक तरीके से तो वही बता सकता है जिसे जुलाई से ले कर सितंबर तक का मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ का भगवामय माहौल याद हो.

नतीजा यह हुआ कि जिन गलीचौराहों, चाय की गुमटियों से ले कर क्लबों और कौफीहाउसों में चुनावी चर्चा हो रही थी वह धर्म के चमत्कारों और हिंदुत्व की तथाकथित बदहाली के चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह फंस कर रह गई. जो लोग कल तक यह कह और पूछ रहे थे कि हम भाजपा को क्यों वोट दें वे अब यह पूछने और सोचने लगे थे कि हम कांग्रेस को क्यों वोट दें जो हर जगह मुसलमानों के हित साधती है और हिंदुओं के हित किनारे कर देती है. इस से न केवल मध्यप्रदेश की एंटीइंकम्बेंसी हवा हो गई, उलटे लोगों को राजस्थान और छत्तीसगढ़ में एंटीइंकम्बेंसी नजर आने लगी.

अघोषित एजेंट

इस माहौल को और हवा दी गलीकूचों में बने छोटे मंदिरों ने जहां बैठा पंडा भी भाजपा का अघोषित एजेंट होता है. ये पंडेपुजारी आम लोगों के ज्यादा नजदीक रहते हैं. सुबहशाम पूजा करने आते लोगों में महिलाओं की तादाद खासी रहती है, जिन्हें धर्म की घुट्टी ये एजेंट पिलाते रहते हैं. ये पंडेपुजारी व्रत, तीज, त्योहारों का महत्त्व बताने के साथसाथ यह एहसास भी भक्तों को कराते रहते हैं कि देश का माहौल दिनोंदिन क्यों और कैसे खराब हो रहा है.

लोग परेशान हैं क्योंकि उन्होंने धर्मकर्म करना कम कर दिया है वरना तो पूजापाठ में इतनी शक्ति होती है कि भगवान भक्तों को दुखों से दूर रखता है. बच्चों के कम नंबर इसलिए आते हैं क्योंकि वे पूजापाठ नहीं करते. घर में कलह फलां देवी और देवता के पूजनपाठ से दूर होती है और दुखों की परछाई तक नहीं पड़ती.

इन के चलताऊ, रैडीमेड धार्मिक किस्सों का असर यह होता है कि लोग अपनी समस्याओं का हल धर्म व भगवान में ढूंढ़ने लगते हैं, मसलन नौकरी मिलना, न मिलना भाग्य की बात है, सरकार और उस की नीतियों का इस से कोई लेनादेना नहीं. शिक्षा और इलाज महंगे हो रहे हैं तो सरकार से सवाल मत करो क्योंकि यह संसार भाग्य प्रधान है. सुखी जिंदगी के लिए इतने या उतने सोमवार या शुक्रवार का व्रत महिलाएं परेशानी के मुताबिक रखें तो दुर्भाग्य या परेशानियां या तो कम हो जाती हैं या खत्म ही हो जाती हैं. लोगों को भाग्यवादी बनाते इन मंदिरों और पुजारियों का रोल चुनाव के दिनों में अहम हो जाता है.

इसे समझने के लिए भोपाल की दक्षिणपश्चिम विधानसभा सीट सटीक उदाहरण है जिस में कोई 60 मंदिर हैं. इस विधानसभा से भाजपा ने जिन भगवानदास सबनानी को टिकट दिया था उन्हें लोग ढंग से जानते भी नहीं थे जबकि कांग्रेसी उम्मीदवार पी सी शर्मा वोटर के लिए जानामाना नाम था, जो पिछला चुनाव भाजपाई दिग्गज उमा शंकर गुप्ता को हरा कर जीते थे. लिहाजा, उन की जीत में किसी को कोई शक नहीं था क्योंकि भाजपा उम्मीदवार अनजान से थे. जब नतीजा आया तो सियासी पंडित तो दूर की बात है, खुद वोटर भी हैरान रह गए थे क्योंकि भगवानदास सबनानी 15 हजार वोटों के ज्यादा अंतर से जीते थे. कब और कैसे धर्म के एजेंट उन्हें जिता ले गए, यह किसी को समझ न आया.

लोगों का ब्रेनवाश

न केवल इस सीट पर बल्कि अधिकतर सीटों पर भाजपाई उम्मीदवारों की जीत में इन मंदिरों और पंडेपुजारियों का खासा रोल रहा, जिन्हें भाजपा का प्रचार करने कहीं नहीं जाना पड़ता बल्कि वोटर इन के पास चल कर आता है. गलीगली खुल गए इन मंदिरों में सुंदर कांड और भंडारे जैसे आधा दर्जन धार्मिक आयोजन भी आएदिन होते रहते हैं जिन में दलित और गरीब अब बढ़चढ़ कर शिरकत करने लगे हैं. इन्हें भाजपा की तरफ मोड़ने में नेताओं के भाषणों और कार्यकर्ता की सक्रियता से ज्यादा पूजापाठ कारगर साबित होता है और इस चुनाव में भी यही हुआ जिसे, यानी भाजपा की मंदिर नीति को समझने में कांग्रेस नाकाम रही कि दलित आदिवासियों का हिंदूकरण होना उस की शिकस्त की बड़ी वजह है.

अक्तूबर आतेआते लोगों का ऐसा ब्रेनवाश इन पंडेपुजारियों और बाबाओं ने किया कि लोगों को सपने में भी मुगल और अंगरेज दिखने लगे कि कैसे उन्होंने सोने की सी चिड़िया हमारे देश को लूटा, तबाही मचाई, मंदिरों को ध्वस्त किया,,हमारी मांबहनों की अस्मिता से चौराहों पर सरेआम खिलवाड़ किया और आज भी यह खतरा पूरी तरह से टला नहीं है.

इस तरह का प्रचार भी जम कर किया गया कि कांग्रेसी कहने को ही हिंदू हैं वरना तो ये नेहरू युग से ले कर मनमोहन सिंह के जमाने तक हमारे वोटों के दम पर मुसलमानों को सिर चढ़ाते रहे हैं. एक मोदी नाम का शेर ही है जो 10 साल से हमें दुश्वारियों से बचा रहा है और आगे भी बचाने की गारंटी ले रहा है. उस ने ही कश्मीर से 370 खत्म करने की हिम्मत दिखाई, हमारी अगाध आस्था के प्रतीक राम मंदिर के निर्माण का रास्ता खोला और अब जनसंख्या नियंत्रण कानून की तैयारी कर रहा है जिस से मुसलमानों की मुश्कें और कसी जा सकें.

56 इंच के सीने वाले इस शेर का साथ देने हमें इन राज्यों में भाजपा को जिताना ही होगा जिस से लोकसभा के साथसाथ राज्यसभा में भी भाजपा मजबूत हो ताकि हिंदुत्व और देश के भले वाले बिल बिना किसी रुकावट के पास हों. मनोविज्ञान के लिहाज से देखें तो आम लोगों के अचेतन मन में उमड़तीघुमड़ती दमित धार्मिक इच्छाओं को बाबाओं ने बाहर निकाल कर खड़ा कर दिया जिन से घबराए लोगों को अपना ट्रीटमैंट भी उसी धर्म और डर में दिखा जो इस की जड़ या उत्पत्ति स्थान है.

इत्तफाक से इन्हीं दिनों में इजराइल और हमास की जंग शुरू हो गई थी जिस का प्रचार यह कहते किया गया कि कट्टरवादी मुसलमान सीधेसादे बेकुसूर यहूदियों का कत्लेआम कर रहे हैं और भारतीय मुसलमान देशभर में इन्हीं कट्टरवादियों के पक्ष में प्रदेशन कर रहे हैं. एक और इत्तफाक तमिलनाडू के मंत्री उदयनिधि स्टालिन का सनातन धर्म विरोधी बयान रहा जिसे भगवा गैंग ने सीधेसीधे कांग्रेस से जोड़ते मनमाना प्रचार किया और कांग्रेस सलीके से इस का खंडन नहीं कर पाई.

बाबाओं ने बाजी और मोहरे जहां छोड़े थे, उन्हें वहीं से सोशल मीडिया वीरों और फिर नेताओं ने लपक लिया. फिर कोई खास मुश्किल नहीं रह गई थी. जो कशमकश लोगों के दिलोदिमाग में चल रही थी उसे सकपकाए कांग्रेसियों ने, अनजाने में सही, दूर करने में मदद की.

नहीं चला कांग्रेस का धर्म कार्ड

ऊपरी तौर पर अभी भी माहौल कांग्रेस के पक्ष में दिख रहा था जिसे और पुख्ता करने की गरज से कांग्रेस वही गलती कर बैठी जिसका इंतजार भगवा खेमा कर रहा था. मध्यप्रदेश में कांग्रेस मुखिया और मुख्यमंत्री पद के चेहरे कमलनाथ ने एक के बाद एक बागेश्वर बाबा और पंडित प्रदीप मिश्रा की कथाएं अपने गृहनगर छिंदवाड़ा में आयोजित कर डालीं और यजमान खुद सपरिवार बने. कमलनाथ की मंशा यह जताने की थी कि वे भी हिंदू हैं और धार्मिक आयोजन भी उन बाबाओं के करवा सकते हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के एजेंट कहे जा रहे हैं.

लेकिन कमलनाथ यह नहीं समझ पाए कि परोक्ष नहीं, बल्कि घोषिततौर पर ये लोग भाजपा के ही एजेंट हैं और अपने प्रवचनों के जरिए कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते रहते हैं. यह बात राजनीति में मामूली सी दिलचस्पी रखने वाला आदमी भी समझ सकता है कि जिस हिंदू राष्ट्र निर्माण या घोषणा की बात रामभद्राचार्य, बागेश्वर बाबा और प्रदीप मिश्रा जैसे हिंदूवादी संतमहंत करते रहते हैं उस का टैंडर भाजपा ने भर रखा है.

न केवल कमलनाथ बल्कि तमाम छोटेबड़े कांग्रेसी इस गलतफहमी का भी शिकार थे कि 2018 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने धर्मकर्म की जो राजनीति की थी उस के चलते ही तीनों राज्यों में कांग्रेस को वोटर ने चुना था. तब कमलनाथ छिंदवाडा और भोपाल में हनुमान का पूजापाठ करते नजर आए थे तो राहुल गांधी ने भी तब पहली बार राजस्थान से खुद का गौत्र उजागर किया था. उसी चुनाव के पहले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी नर्मदा नदी की परिक्रमा की थी.

बस, उसी को जीत का तंत्र और मंत्र मानते कांग्रेसियों ने भी धर्म और पूजापाठ का खेल शुरू कर दिया. इधर भाजपाई हमलावर हो कर कांग्रेसियों को नकली और चुनावी हिंदू बताते रहे जो सच इस लिहाज से था कि भाजपाई तो सत्ता में हों न हों, बारहों महीने चौबीसों घंटे धर्म की राजनीति करते रहते हैं क्योंकि इस के सिवा उन्हें कुछ और आता नहीं.

विकास जितना हो जाता है वह प्रशासन की देन होता है वरना इन का बस चले तो पूरा खजाना मंदिरों के निर्माण-पुनर्निर्माण, भव्यता, पूजापाठ और दक्षिणा में ही लुटा दें. ऐसा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने खासतौर से आखिरी दिनों में खूब किया भी था. छोटे मंदिरों के पुजारियों को भी उन्होंने खूब सौगातें व खैरातें बांटीं.

शिवराज सिंह ने उज्जैन, दतिया, ओंकारेश्वर सहित हर शहर के मंदिर पर सरकारी खजाना लोक और महालोक बनाने के नाम पर लुटाया. छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल राम वन पथ गमन के विज्ञापन करते रामराम जपते नजर आए. राजस्थान में हालांकि अशोक गहलोत ने मंदिरों से यथासंभव परहेज किया लेकिन वे भी खुद को हिंदू बताते यह कहते रहे कि धर्म की राजनीति देश को बरबाद कर देगी.

जोशजोश में कमलनाथ, भूपेश बघेल और अशोक गहलोत ने धर्म नाम का अंगारा तो हथेली पर रख लिया लेकिन इस की जलन से कैसे बचना है, इस के टोटके इन्हें नहीं मालूम थे. यह एक जटिल और गंभीर बात है जिस पर कांग्रेस मात खा गई, वरना उस का प्रशासन भाजपा से कहीं ज्यादा बेहतर रहता है.

भाजपा वोटर को यह जताने में कामयाब रही जो हकीकत भी है कि कांग्रेस धर्म की दिखावटी राजनीति ही करती है. अगर इस किस्म की राजनीति देश को बरबाद करती है तो क्यों अशोक गहलोत जयपुर के खाटू श्याम मंदिर कौरीडोर के लिए 100 करोड़ रुपए स्वीकृत करते हैं और इसी मंदिर में महिला भक्तों से आशीर्वाद मांगते हैं. क्यों भूपेश बघेल को 5 साल यह चिंता सताती रही कि वन गमन के दौरान छत्तीसगढ़ में राम जहांजहां से हो कर गुजरे थे उन जगहों को सरकारी पैसे से जितना हो सके, चमका दें. क्यों कमलनाथ करोड़ों का हनुमान मंदिर छिंदवाड़ा में बनवाते हर कभी सुंदरकांड और हनुमान चालीसा का पाठ करते रहते हैं.

ऐसे हुआ नुकसान ?

बात सौ फीसदी सच है जिसे कांग्रेसियों को स्वीकारना आना चाहिए कि धर्म की राजनीति उन के बस की बात नहीं क्योंकि इस का सीधा सा मतलब होता है वर्णव्यवस्था से सहमति जताने के अलावा सवर्णों और उन में भी ब्राह्मणों को खुश रखने की कवायद जिसे दलित, पिछड़े और मुसलमान सब बारीकी से समझते हैं. धर्म की राजनीति करने का हक भाजपा को ही है क्योंकि उस का तो जन्म ही इस के लिए हुआ है. वह अयोध्या सहित सोमनाथ, काशी और मथुरा की भी बात करती है और काफीकुछ कर के दिखा भी देती है, फिर इस खेल में सैकड़ोंहजारों जानें जाएं तो चली जाएं, इस की परवा वह नहीं करती.

यह बहस बहुत लंबीचौड़ी है जिस का निष्कर्ष यही निकलता है कि तीनों राज्यों में कांग्रेस का परंपरागत वोटबैंक दलित, आदिवासियों का जो उस के नजदीक 5 साल पहले आया था वह धर्म की आधीअधूरी राजनीति के चलते उस से छिटक गया है. इसी धर्म की राजनीति के होहल्ले में जातिगत जनगणना का मुद्दा दब कर रह गया.

राहुल गांधी लाख जनेऊ दिखाएं, अपना गोत्र बताएं और कैलाश पर्वत या महाकाल जाएं, इस देश में उन्हें हिंदू होने की मान्यता कभी नहीं मिलने वाली. कांग्रेस को सफलता तभी मिलती है जब वह धर्मनिरपेक्षता की बात करती है जिस से दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को ब्राह्मण राज के चंगुल से छूटने की गारंटी मिलती है. अब खुद कांग्रेस ही इन लोगों के वोट धर्मकर्म करते मांगेगी तो इन का भरोसा खोने का ही काम करेगी और मुसलमानों को छोड़ कर ये तबके भाजपा को वोट करने को मजबूर होंगे.

भाजपा और नरेंद्र मोदी ने अपना धार्मिक चेहरा इन चुनावों में उधेड़ कर दिखाने से परहेज नहीं किया जबकि कांग्रेस ने अपने चेहरे पर धर्म का घूंघट ढकने की गलती की तो वोटर ने उसे सबक भी सिखा दिया. लेकिन, एक उम्मीद और मौका भी इन नतीजों में छिपा है कि जनता ने कांग्रेस को चुनावी रेस से बाहर नहीं किया है.

आस बाकी है अभी

कांग्रेस के लिए सुकून देने वाली बात यह है कि वोटर ने उसे महज चेतावनी दी है कि वह धर्म को छोड़ते, मुद्दों की राजनीति करे तो वह उस पर भरोसा भी कर सकता है जो पूरी तरह टूटा नहीं है, थोड़ा दरका भर है. नतीजों में आंकड़े इस की गवाही भी देते हैं. सब से ज्यादा 230 सीटों वाले मध्यप्रदेश में उसे 66 सीटें 40.4 फीसदी वोटों के साथ मिली हैं. पिछले चुनाव के मुकाबले उस की सीटें भले ही 48 कम हुई हों लेकिन वोट शेयर में महज आधा फीसदी की ही गिरावट आई है.

इसी तरह, 199 सीटों वाले राजस्थान में तो 2018 की 99 में से 69 यानी 30 सीटें कम मिलने के बाद भी उस का वोट शेयर, मामूली ही सही, बढ़ा ही है. 90 सीटों वाले छत्तीसगढ़ में 2018 में मिली 68 के मुकाबले 33 सीटें कम मिलने पर वोट शेयर महज 1.3 फीसदी ही कम हुआ है. तीनों राज्यों में यह इतना बड़ा नुकसान नहीं है जिस की भरपाई संभव न हो.

दिल्ली सहित भोपाल, जयपुर और रायपुर में हार का विश्लेषण करते कांग्रेसी गलत टिकट बंटवारे, आपसी फूट, पैसों और कार्यकर्ताओं की कमी सहित ईवीएम मशीनों पर ठीकरा फोड़ते नजर आए तो सहज लगा कि वे हार के सही कारणों की चर्चा करने से कतरा रहे हैं कि कैसे भाजपा ने उन्हें धर्मजाल में फंसाया और बाजी मार ले गई.

तेलंगाना में उसे सत्ता मिलने की एक बड़ी वजह वहां के दलित, आदिवासी और मुसलमानों का भी साथ मिलना रहा, जहां के मुख्यमंत्री बीआरएस के मुखिया केसीआर ने बौखलाहट में अनापशनाप पैसा और सहूलियतें मंदिरों को देना शुरू कर दिया था. वहां किसी कांग्रेसी दिग्गज, खासतौर से मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश किए गए रेवंत रेड्डी, ने हिंदी पट्टी के कांग्रेसी नेताओं जैसी गलती धर्म की राजनीति करने की नहीं की, इसलिए कांग्रेस 119 में से 64 सीटें 39.4 फीसदी वोटों के साथ ले गई.

अब अगर रेवंत रेड्डी गलती करेंगे तो उस का फायदा भाजपा को ज्यादा मिलेगा जो 7 सीटें 14 फीसदी वोटों के साथ ले जाने में कामयाब रही है. हालांकि, भाजपा की प्राथमिकता तेलंगाना में भी तोड़फोड़ कर सत्ता हथियाने की रहेगी जिस से बचने के लिए कांग्रेस को सावधान रहना पड़ेगा वरना कर्नाटक, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र सहित गोवा के उदाहरण उस के सामने हैं.

चेहरे की किताब : भाग 1

ज़रीना बेग़म ख़ामोशी से आनेजाने वाले मेहमानों का जायज़ा ले रही थीं. वे वलीमे की दावत में शामिल होते हुए भी शामिल नहीं थीं. उन को लग रहा था कि उन को नीचा दिखाने के लिए देवरानी ने आननफानन बेटे की शादी कर दी है. उन का दानिश 4 साल बड़ा था माहिर से.

वे सोच रही थीं कि माहिर की उम्र ही क्या है, 26 का ही तो हुआ है, क्या हर्ज था एकाध साल रुक जाती तो. ख़ानदान भर में मेरा और दानिश का मज़ाक बना कर रख दिया, लोग तरहतरह की बातें कर रहे होंगे. हालांकि उन्होंने किसी को बातें करते सुना तो नहीं था पर जो भी उन की तरफ़ देख कर कुछ कहता या हंसता, उन्हें लगता, उन्हीं पर कटाक्ष किया जा रहा है.

‘दानिश मेरा बच्चा. मेरी रूह की ठंडक, मेरी आंखों का नूर. इकलौता होने के नाते कितना ज़िद्दी, नख़रीला सा था, जब लाड़ उठाने वाले, मुंह से निकलने के पहले हर ख़्वाहिश पूरी कर देने वाले वालिदैन हों तो होना ही था न,’ ज़रीना के दिमाग में कशमकश जारी थी.

पर 12 साल की उम्र में ही अब्बू को खो देने के बाद वह जैसे एकदम बड़ा हो गया था. बिलकुल ख़ामोश, संजीदा, मां का हद से ज़्यादा ख़याल रखने वाला, पढ़ाई जितना ही अब्बू के बिज़नैस को भी सीरियसली लेने लगा था. अम्मी की कभी नाफ़रमानी न हो, यही कोशिश रहती थी.

उस ने अपनी ज़िंदगी के फैसले लेने का हक अपनी मां को दे दिया था. बस, उस की एक ही शर्त थी, जब उन की तरफ से रिश्ता फाइनल हो जाए, उन का दिल लड़की को बहू मान ले, तभी लड़की देखनेदिखाने का सिलसिला शुरू हो. वह कभी किसी लड़की को रिजैक्ट कर के उस को एहसासे कमतरी में मुब्तिला कर के अपने ज़मीर पर बोझ नहीं ले सकता.

उस की बात से पहले तो ज़रीना बेग़म मानो निहाल हो गईं, पर वक़्त गुज़रने के साथ उन पर जेहनी दबाव बढ़ता जा रहा था. उन को लगने लगा था कि अदब व तहज़ीब में ढली, नफ़ासत और क़ाबिलीयत से लबरेज़ इंसान पैदा होना बंद ही हो गए हैं जैसे ज़मीन पर. फूहड़, बेढंगी लड़कियां एक आंख नहीं सुहाती थीं उन को. ऊपर से ग़ज़ब यह कि कुलसूम, उन की देवरानी, अपने बेटे माहिर के रिश्ते के सिलसिले में सलाह लेने आ गईं.

‘अरे माहिर की उम्र ही क्या है, अभी और सुघड़ सलीकेमंद लड़कियां…’ वे बात पूरी करतीं, उस से पहले कुलसूम बोल पड़ीं, ‘भाभी साहिबा, हम भी अल्हड़, चंचल थे जब ब्याह कर आए थे इस घर में. हमारी सास ने सब्र से, प्यार से हमें इस घर के सांचे में ढाल ही लिया न. 26 का हो गया है माहिर. तालीम मुकम्मल हो गई. 2 साल से अपने अब्बू के साथ हाथ बंटा रहा है बिज़नैस में. इफ़रा, उस की दुल्हन, 22 की है. ग्रेजुएशन कर चुकी है. सही उम्र है दोनों की. एडजस्ट करने में दिक़्क़त नहीं आएगी. सब से बड़ी बात, उन दोनों की यही मरजी है.’

‘ए हे बीबी, ये कहो न आंख लड़ गई है दोनों की, चक्कर चल रहा है, तो अब कोई रास्ता तो है नहीं तुम्हारे पास. फिर यह सलाह का ढोंग क्यों?’ ज़रीना बेग़म तुनक कर बोलीं.

कुलसूम ने उन्हें अफ़सोस से देखा और कहा, ‘पसंद की शादी इतनी बुरी बात तो नहीं. जब हर लिहाज़ से जोड़ी क़ाबिलेक़ुबूल है तो इस बात पर एतराज़ कि लड़के ने पसंद कर ली लड़की, फुज़ूल है.’

‘हां, जब उड़ा कर ले जाएगी वह चंट बला लड़के को अपने साथ, तब रोते बैठी रहना,’ ज़रीना बेगम कब हथियार डालने वालों में से थीं.

‘अच्छा न कहें तो बुरा भी न कहें. मैं किसी की फूल सी बच्ची के लिए ऐसी सोच नहीं रख सकती. आख़िर, मेरी भी एक बच्ची है जो कल को किसी के घर की रौनक बनेगी. मैं रिश्ता पक्का करने जा रही हूं. आप का दिल गवारा करे, तो आ जाइएगा. कुदरत दानिश पर रहम करे.’

उन का आख़िरी जुमला ज़रीना बेग़म को सिर से पांव तक सुलगा गया था. वे सोचने लगी थीं, ‘क्या होगा जब दानिश को माहिर की शादी पक्की होने की ख़बर मिलेगी. क्या सोचेगा वह कि अम्मी मेरे लिए एक अदद हमसफ़र न तलाश सकीं. कहीं वह ख़ुद ही किसी को ले आया तो’

उन की तबीयत बिगड़ गई थी. अपनी मां को अच्छे से समझने वाला दानिश इस बार भी सब समझ गया था. ढेरों तसल्लियों के साथ उस ने मां को मना लिया था कि ख़ुशी से शादी में चलें और किसी को कुछ कहने का मौका न दें.

ओह मेरा सब्र वाला बच्चा, कैसे आगे बढ़बढ़ कर हर काम संभाले हुए है. क्या मैं सचमुच नकारी मां हूं?

इन्हीं सब ख़यालों से घबरा कर वे शोरशराबे से दूर गार्डन के पिछले हिस्से में आ बैठी थीं.

उन के ख़यालों के सिलसिले को तोड़ती एक मीठी आवाज़ कानों से टकराई, “माफ़ कीजिएगा आपी, क्या मैं इस चेयर पर बैठ सकती हूं?”

उन्हें बेवक़्त का यह ख़लल पसंद नहीं आया. बड़ी मुश्किल से तो यह कोना नसीब हुआ था शोरगुल से दूर, चिड़चिड़े अंदाज़ में जवाब दिया, “कुरसी मेरे अब्बू की तो है नहीं, बैठ जाओ जहां बैठना हो.”

“ओह, दोबारा माफ़ी चाहती हूं, शायद आप को डिस्टर्ब कर दिया, मैं चलती हूं.”

ज़रीना बेग़म के होश बहाल हुए तो देखा, 20-22 साल की ताज़ा गुलाब की तरह खिली हुई परी चेहरा लड़की उन से मुख़ातिब है.
अपनी बदएख़लाकी पर अफ़सोस करते हुए उन्होंने कहा, “अरे नहीं, मैं पता नहीं किस धुन में थी माफ़ी चाहती हूं. बैठ जाओ यहीं, प्लीज़.”

“कोई बात नहीं, आप बड़ी हैं, माफ़ी न मांगें,” कह कर वह लड़की मुसकरा कर बैठ गई.

अब ज़रीन बेग़म का पूरा ध्यान उसी पर था. उन्होंने जब उस का जायज़ा लिया तो चौंक पड़ीं. बेबी पिंक और स्काई ब्लू कौम्बिनेशन की वे दीवानी थीं कालेज टाइम में.

हालांकि एक बार पति ने टोक दिया था- ‘बेगम, मेरी आंखें कालीसफ़ेद के बजाय गुलाबीफिरोज़ी होने को हैं इस रंग को देखदेख कर.’

तब चिढ़ और कुढ़न में उन्होंने कुछ जोड़े हाउसहैल्प को और कुछ छोटी बहन को दे दिए थे. बाद में लाख मनाने पर भी दोबारा वह रंग नहीं पहना, पति की मौत के बाद तो बिलकुल नहीं, 16 साल से.

उसी कौम्बिनेशन में मोतियों के वर्क वाला दुपट्टा, मोतियों के ही छोटेछोटे इयरिंग्स और मोती की नोज़पिन. किसी सीप से निकल कर आई हुई लग रही थी वह. एकदम लाइट मेकअप और पिंक लिपस्टिक. उस के फैशन सैंस की वे कायल हो गईं.

दूसरी हैरत उन्हें तब हुई जब उन्होंने देखा कि उस की प्लेट में एक बाउल में रसगुल्ला रखा है, एक में दाल. एकएक चम्मच दाल ले कर वह चावल में मिक्स कर के खाती जा रही थी. यही उन का तरीक़ा था. चावल में एकसाथ ख़ूब सारी दाल डाल कर भकोस लेने वाले जाहिल लगते थे उन्हें.

दयादृष्टि : भाग 1

वह बहुत देर से कतार में खड़ा था. उस के पीछे उस की पत्नी खड़ी थी. उन्हें नियमानुसार, जूतेचप्पलें देवालय से बहुत दूर उतारना पड़े थे. तपती जमीन पर उन के तलवे जल रहे थे. वे सोच रहे थे कि भगवान का दर्शन चाहिए तो कष्ट तो उठाने ही होंगे.

वे मन में असीम श्रद्धा लिए, लंबी कतार के साथ धीरेधीरे आगे बढ़ने लगे. उन के सामने बहुत दूर, श्वेत संगमरमर से बना भव्य देवालय चमक रहा था. वहीं साक्षात भगवान मिलेंगे, यह सोच वे गदगद हुए जा रहे थे.

धीरेधीरे वे देवालय के प्रवेशद्वार पर पहुंच गए. वहां खड़े कर्मचारियों ने उन की जांच की,”मोबाइल हो तो अंदर लौकर में रखिए,” कर्मचारी ने निर्देश दिया.

” नहीं है,” मोबाइल न खरीद पाने की असमर्थता को उस ने चेहरे पर आने से रोका.

“ठीक है. उधर चले जाइए, उधर सभागार है,” कर्मचारी ने सभागार के मार्ग की ओर संकेत किया. अब वे मंदिर के विशाल सभागार में थे.
सभागार में श्रीअनंत देव की विशाल तसवीर लगी हुई थी. उन के दोनों हाथ आशीर्वाद मुद्रा में थे. भक्त तसवीर से आशीर्वाद ले रहे थे. श्रद्धा से उन की आंखें सजल हो रही थीं.

सभागार में पुरुषों और महिलाओं को अलगअलग स्थान पर बैठने का कहा गया. वातानुकूलित सभागार की शीतल हवा सुकून दे रही थी. वह बुदबुदा उठा, ‘भगवान आप की माया, कभी धूप कभी शीतल छाया.”

उस ने पत्नी की ओर देखा. भीड़ के बीच वह आंखें बंद कर बैठी हुई थी. शांति का भाव उस के चेहरे पर थिरक रहा था. उस ने भी ध्यान लगाना चाहा. वह आंखें बंद कर ही रहा था कि एक श्वेत वस्त्रधारी सेविका सभागार के मंच पर उपस्थित हुई. सभागार में सन्नाटा छा गया.

“सभी को नमस्ते,”सेविका ने सभी के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा.

“आप सभी कैसे हैं?” सेविका ने मुसकराते हुए पूछा.

“बढ़िया हैं…बढ़िया हैं…” के समवेत स्वर से सभागार गूंज उठा.

टूटती आशा : भाग 1

‘‘ओफ्फोकितना काम हैसुबह बाढ़ पीड़ितों के लिए चंदा और कपड़ा इकट्ठा करना है. दोपहर में राजदूत’ में भोजन तो शाम को राजभवन में चायसांस तक लेने की फुरसत नहीं है,’’ महिला ग्रुप की अध्यक्षा नीरादेवी अपने चेहरे पर परेशानी के भाव लाते हुए सदस्याओं से बोलीं.

‘‘नीराजीआप वास्तव में समाज के लिए कितना करती हैं,’’ एक सदस्या ने उन की प्रशंसा करते हुए कहा.

‘‘आप सचमुच बड़ी कर्मठ हैं. सुना है आप को उच्च रक्तचाप भी हैफिर भी आप इतनी मेहनत करती हैं,’’ दूसरी ने पहली से बाजी मारते हुए कहा.

‘‘भईऐसे समाजसेवियों के कारण ही तो हमारा समाज रसातल में जाने से बचा हैनहीं तो देश की आज जो स्थिति है वह क्या किसी से छिपी है?’’ तीसरी ने तो जोरदार प्रमाणपत्र ही दे डाला.

नीरा ग्रुप की सदस्यों से इतनी प्रशंसा पा कर फूल कर कुप्पा हो गई. वह बड़ी अदा से अपनी गवींली मुसकान छिपाने का प्रयत्न करती हुई ऐसा अभिनय करने लगीमानो वह इन सब बातों से बेजार हो रही हों. वह बोलीं, ‘‘आप सब इस तरह अपने विचार प्रदर्शित कर ठीक नहीं कर रही हों. मैं यह सब कार्य प्रशंसा के लिए नहीं वरन सैटिस्फैक्शन के लिए करती हूं. यदि देश और समाज के लिए हम अपना इतना सा भी योगदान न दे पाएं तो लानत है हमारे जीवन को.’’ फिर उन्होंने प्रसंग को नया मोड़ देते हुए कहा, ‘‘खैरअब हम लोग ग्रुप के उद्देश्यों पर ध्यान दें. कल का हमारा कार्यक्रम देहरी ग्राम जाने का है. वहां हमें 8 साल से कम उम्र के बच्चों को नहलानाधुलाना और वहां के लोगों को सफाई का महत्त्व समझाना है. हमें सुबह 9 बजे तक वहां पहुंच जाना है. नीरा यादव के पिता ने एमएलए का चुनाव कई बार लड़ा था और लीडरी उस के खून में आ गई थी. हालांकि पार्टियां बदलने के कारण वह कभी जीत नहीं पाए पर उन की तमन्ना थी कि नीरा कम से कम नगरपालिका पार्षद का चुनाव तो लड़ ले और अकसर उसे उकसाते रहते थे.

नीरा यादव का प्रेम विवाह हुआ था. तब वह पढ़ने में होशियार थी और उसे उम्मीद थी कि किसी अच्छी सरकारी नौकरी में लग जाएगी पर उस के पैसे वाले पिता उसे राजनीति में ला कर अपने सपने पूरा करना चाहते थे. उन्हें मालूम था कि जो रौब नेतागीरी में हैवह अफसर गीरी में नहीं और रौब गांठने का गुण नीरा ने उन से सीख लिया था.

यदि प्रत्येक सदस्या तीनतीन बच्चों को भी नहलाधुला दे तो कम से कम 24-25 बच्चों के शरीर की कल सफाई हो जाएगी. निश्चित ही यह करतेकरते बारहएक तो बज ही जाएंगे. इसलिए मैं सोच रही हूं कि वहीं आम्रकुंज में दालबाटी और चूरमा का कार्यक्रम रखें और शाम तक लौट आएं.’’ अभी पिछली किट्टी में रेखा सरिया वहां की दालबाटी की तारीफ कर रही थी.

‘‘वाहनीराजीफिर तो मजा आ जाएगा. समाजसेवा भी हो जाएगी और मौजमस्ती भी.’’ एक कम उम्र सदस्या चहक कर बोली. एकदूसरी सदस्या को भय हुआ कि समाजसेवा के इस काम में कहीं दोपहर का यह भोजन महंगा न पड़ जाए. यदि खुद की जेब से कुछ जाना हो तो दालबाटी पेट को माफिक न आने का बहाना कर देना ही अच्छा है. इस ग्रुप की सारी महिलाएं बहुत पैसे वाली नहीं थी. सब के घरवाले पहली पीढ़ी के पढ़ेलिखे नौकरी वाले थे और समाज की सीढ़ियांचढ़ने की कोशिश कर रहे थे और इसीलिए नीरा यादव से चिपकीं थीं.

‘‘मैं ने सब सोच लिया है. आम्रपाली का मालिक पिताजी का जानकार है और पिताजी ने उसे एक बार फूड इंस्पेक्टर से पकड़े जाने से बचाया था. वह आधे 50 परसेंट डिस्काउंट देगा.

इतने में नीरा का मोबाइल बजामैम घर से फोन हैये बात कर हैं.’’ कहते हुए नीरा फोन पर लग गई. ‘‘ओहमेरे बिना आप का कोई काम ही नहीं होता. मैं बेचारी निश्चिंत हो कर समाज सेवा का कार्य करूं तो कैसेकितना भी इंतजाम कर के आओपर आप चाहते होमेरे को घर में चौकीदार की तरह निगरानी के लिए रहना ही चाहिए.’’

फिर रुक मुड़ कर बोलीं, ‘‘मैं जल्दी ही घर पहुंच रही हूं.’’

फिर उन्होंने बाकी महिलाओं की ओर मुखातिब होकर कहा, ‘‘आप सब कल ठीक साढ़े 7 बजे यहां पहुंच जाएं. जरा सी भी देर होने से कार्यक्रम तो बिगड़ ही जाता हैमन भी खिन्न हो उठता है.’’

इस के बाद सभी सदस्याएं चहचहाती हुई बाहर निकलने लगीं. अलगअलग बिरादरियों की होते हुए भी तो औरतें आजकल नीरा यादव के साथ थी कि नहीं उन का भी भला हो जाए. 5 स्टार होटलों में होने वाली अमीरों की बीवियों को किट्टियों के लायक तो इन के पास पैसे नहीं थे पर कोशिश करती थी कि कुछ न कुछ तो करा जाए. इसलिए सरकारी बंगले में बने इस टूटे से क्लब से काम चलाना पड़ता था. इन लोगों को नीरा जाटव बस्ती में ले जाना चाहती थी ताकि वहां वोट पक्के हो सकें. बाहर दो कारें खड़ी थीं. उन में क्लब की सदस्याएं जा लदीं. अभी सब के पास कारें नहीं थीं.

दोनों कारें ठसाठस भर गईं. दोनों ही कारों की मालकिनें नीरादेवी को मक्खन लगाने की गरज से अपनी कार में ले जाना चाहती थी. पर उन में से एक के घर का रास्ता नीरादेवी के घर के आगे से हो कर जाता थाइसलिए वह उसी में बैठीं. दूसरी कार की मालकिन अपने लिपस्टिक से रंगे होंठों पर एक जबरदस्ती की मुसकान बिखेरती चली गई. नीरा के पास एक ही कार थी जो उस के पति इस्तेमाल करते थे. वे अपनी दुकान चलाते थे. उन्होंने मेहनत से बड़ी दुकान बनाई थी.

पहली महिला का घर आते ही उस ने नीरा देवी से निवेदन किया कि 5 मिनट को ही सहीवह उस के घर को गुलजार कर के जाएं. उस के आग्रह पर सभी महिलाएं कार से उतर गईं. उस महिला का पति दफ्तर जाने की तैयारी में था.

‘‘तुम ने खाना ठीक से खाया या नहीं?’’ उस महिला ने प्रेमपगी आवाज में पति से पूछा, ‘‘स्वीटडिश ली या नहींमैं ने कितने प्रेम से तुम्हारे लिए सुबह जल्दी उठ कर बनाई थी.’’

‘‘स्वीटडिश.’’ पति को मन ही मन हंसी आ गई. कल रात का बना कस्टर्ड. हां…हां…हां… पर जोर से हंस नहीं सका. संयत हो कर अपरोक्ष भाव में बोला, ‘‘हांहांली.’’ यह कह कर सभी महिलाओं को नमस्ते करते हुए वह स्कूटर स्टार्ट कर के भागा. मानो इन सब से बचना चाहता हो.

‘‘हाय पुष्पातुम ने ड्राइंगरूम कितना अच्छा सजा रखा है.’’

पर रग के नीचे जमा हो गई धूल की 2 इंच परत कोजिस से रग और मोटा हो रहा थाकौन देखता है?

‘‘शुक्रिया. भईइन्हें घर बिलकुल साफसुथरा चाहिए. जरा सी धूल दिखी नहीं कि नाक पर गुस्सा आया. इसीलिए नौकर के सफाई करने के बाद भी मैं अपने हाथ से साफ करती हूं. अच्छा आप लोग बैठेंमैं अभी दो मिनट में आई.’’ कहती हुई पुष्पा अंदर चली गई.

‘‘कुछ तकलीफ मत करना. अभी घर जा कर खाना खाना है.’’ नीरा पति का फोन और घर सब भूल चुकी थीं. पर भूख ने उन्हें घर की याद दिला दी.

फूल सी दोस्ती : भाग 1

आजकल मंजरी का मन घर में बिलकुल भी नहीं लग रहा था. उस के पति शिशिर बिजनैस के सिलसिले में ज्यादातर बाहर रहा करते थे और बेटा अतुल एमएस करने अमेरिका गया, तो वहीं का हो कर रह गया. साक्षी से ही वह अपने मन की बातें कर लिया करती थी. साक्षी भी मंजरी को मां नहीं सहेली समझती थी. तभी तो पिछले सप्ताह उसे एअरपोर्ट तक छोड़ते समय मन बहुत उदास हो गया था मंजरी का. हालांकि इस बात से वह बहुत खुश थी कि मिलान से फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई करने के लिए स्कौलरशिप मिली साक्षी को. शिशिर ने उसे सोसाइटी की महिलाओं का क्लब जौइन करने का सुझाव दिया.

पर मंजरी ने सोचा कि पहले की तरह फिर उसे क्लब छोड़ना पड़ गया तो वह सब की आंखों की किरकिरी बन जाएगी. उस की दिलचस्पी औरों की तरह लोगों की कमियां निकालने, गहनों की चर्चा करने और साडि़यों की सेल के बारे में जानने की नहीं थी. किट्टी पार्टी में महंगी क्रौकरी के प्रदर्शन और ड्राइंगरूम में नित नए शो पीसेज से अपना रुतबा बढ़ाचढ़ा कर दिखाने का स्वांग रचना भी नहीं जानती थी वह. उसे कुछ अच्छा लगता था तो बस देर तक प्रकृति की गोद में बैठे रहना या फिर बच्चों के साथ हंसतेखिलखिलाते हुए बचपन को फिर से महसूस करना. उसे कभी एहसास ही नहीं हुआ कि वह 50 वर्ष पार चुकी है.

साक्षी के चले जाने के बाद मंजरी अकसर किसी पार्क में जा कर बैठ जाया करती थी. एक दिन पार्क में बैंच पर बैठी हुई वह व्हाट्सऐप पर मैसेज पढ़ने में तल्लीन थी कि ‘एक्सक्यूज मी’ सुन कर उस का ध्यान भंग हुआ. सामने एक 28-29 वर्षीय लंबा, हैंडसम युवक उसे बैंच पर रखा उस का पर्स हटाने को कह रहा था. मुसकराते हुए उस ने पर्स उठा लिया और वह युवक बैंच पर बैठ गया.

लगभग 5 मिनट यों ही बीत गए. युवक बेचैन सा कभी पार्क के गेट की ओर देखता तो कभी अपने मोबाइल को. ऐसा लग रहा था कि वह किसी की प्रतीक्षा कर रहा है. मंजरी ने पूछ लिया, ‘‘किसी का इंतजार कर रहे हो क्या?’’ लेकिन प्रश्न पूछते ही उसे लगा कि उस से गलती हो गई. एक अजनबी, वह भी नवयुवक….अब जरूर यह खीज उठेगा. परंतु उस की आशा के विपरीत युवक ने मुसकरा कर उस की ओर देखा और कहा, ‘‘मैं… हां… इतंजार कर रहा हूं… आप… अकेली बैठीं हैं?’’

‘‘हां…जब बोर होती हूं तो यहां आ कर बैठ जाती हूं. मेरे अलावा घर के सब लोग बिजी हैं…लगता है यह बैंच उन लोगों के लिए ही बनी है जो अपनों का साथ पाने को बेचैन हैं,’’ वह निराश, पर थोड़े से मजाकिया लहजे में बोली. ‘‘हां… शायद… मेरी गर्लफ्रैंड… नहीं, हाफ गर्लफ्रैंड भी बिजी रहती है. वह ऐसे बच्चों के हौस्टल में औफिसर इन चार्ज है जो देख नहीं सकते. काफी काम रहता है उसे वहां. शायद इसीलिए टाइम पर नहीं पहुंच पाती मेरे पास.’’ निराशा छिपाते हुए एक सांस में ही नवयुवक ने सब कह डाला.

फिर अपना परिचय देते हुए उस ने मंजरी को अपना नाम बताया, ‘‘जी, मेरा नाम विराट है. और आप?’’ ‘‘मैं मंजरी,’’ थोड़ा हिचकिचाते हुए मंजरी ने भी अपना परिचय दिया.

‘‘काम तो अच्छा कर रही हैं आप की साहिबा. नाम क्या है और हाफ गर्लफ्रैंड क्यों?’’ ‘‘रिया नाम है मैडम का… हम दोनों मुंबई में 5वीं क्लास तक एकसाथ पढ़ते थे, फिर उस के पापा का ट्रांसफर हो गया और वे लोग दिल्ली आ गए. 3 महीने पहले एक दिन अचानक ही उस से मुलाकात हो गई. उस के बाद से ही हमारा मिलनाजुलना शुरू हो गया. हम दोनों एकदूसरे को पसंद भी बहुत करते हैं. बस…वो ‘3 वर्ड्स’ अभी तक नहीं कह पाए एकदूसरे को,’’ विराट ने शरमाते हुए कहा.

‘‘फिर तो तुम भी हाफ बौयफ्रैंड हुए न उस के,’’ मंजरी ने विराट की बातों में दिलचस्पी लेते हुए कहा. ‘‘नहींनहीं, रिया तो कब की मेरे मन की बात जान चुकी होगी, क्योंकि मेरे वाट्सऐप और फेसबुक के स्टेटस मेरे मन के राज खोल देते हैं. पर रिया…वह तो इस मामले में पूरी साइलैंट मूवी की हीरोइन है,’’ और विराट होंठों पर उंगली रख, चुप्पी का इशारा करते हुए मुसकराने लगा.

और फिर मंजरी के ‘‘ओह…नौटी गर्ल’’ कहते ही दोनों हंस पड़े. ‘‘आप से एक बात पूछूं?… पुरानी हिंदी फिल्मों में हीरो हमेशा हीरोइन के पीछे भागता दिखाई देता था. क्या सच में ऐसा तब भी होता था? आजकल की लड़कियां तो अपने पीछे भगाभगा कर थका ही देती हैं. अब मुझे ही देख लीजिए,’’ कह विराट ने अपना निचला होंठ बाहर निकालते हुए मंजरी की ओर इस तरह देखा कि उस की मासूमियत पर स्नेह बरस पड़ा मंजरी के मन में.

‘‘विराट, यह जमाने पर नहीं व्यक्ति पर निर्भर करता है. मैं ने तो किसी को अपने पीछे भागने का मौका ही नहीं दिया कभी. शिशिर के लिए प्यार महसूस करते ही बिना समय गंवाए उसे बता दिया था मैं ने तो. जब मिलती थी तब भी पटरपटर बोलती रहती थी. वैसे शिशिर क्या मैं तो किसी के सामने छिपा ही नहीं सकती अपनी फीलिंग्स. चाहे फिर वे मेरे बच्चे हों या दोस्त,’’ थोड़ा भावुक हो कर मंजरी बोली. ‘‘वही तो, मैं भी नहीं रह सका चुप. अपरोक्ष रूप से ही सही बता ही दिया रिया को कि कितना बेताब हूं उस के लिए मैं. अब मैं भी तो सुनना चाहता हूं कि मेरे लिए वह क्या महसूस करती है?’’ बेचैन सा होता हुआ वह बोला.

‘‘मैं ने बहुत कुछ सीखा है अपने बड़बोले स्वभाव से. मैं तुम्हें बता दूंगी कि रिया से कैसे उस के दिल की बात उगलवानी है तुम्हें… ठीक?’’ ‘‘डील?’’

‘‘डील.’’ और दोनों ने हंसते हुए एकदूसरे से हाथ मिलाया. मोबाइल नंबरों के आदानप्रदान के बाद मंजरी घर की ओर चल पड़ी.

विराट दिल्ली में स्थित एक इंटरनैशनल कंपनी में वाइस प्रैसिडैंट था. उस के मातापिता मुंबई में रहते थे. यों तो विराट बहुत बातूनी था, पर कम ही लोग उस के दिल को छू पाते थे. मंजरी के अपनेपन और दोस्ताना व्यवहार ने विराट के दिल में जगह बना ली और दोनों के बीच फोन और व्हाट्सऐप के द्वारा बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया. कुछ ही दिनों में वे इतना घुलमिल गए कि अपनी रोज की बातें शेयर करने लगे. विराट जब भी मंजरी से मिलता, अपने मन में हलचल मचा रहे कई सवाल पूछ डालता. मंजरी भी आराम से उस के सवालों का जवाब देती. जब कभी वह मंजरी से अपने और रिया के संबंधों को ले कर कोई सवाल करता तो मंजरी की प्रेम के विषय में इतनी गहरी समझ देख कर हैरान रह जाता.

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