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मैं नहीं मानती : भाग 1

‘एक विधवा जवान औरत जो घुटघुट कर नहीं, खुल कर जीना चाहती है,  सब के मुंह कैसे बंद किए उस ने?
तर्क देती ऐसी कहानियां पढ़ने को मिलती हैं सिर्फ सरिता में.’

 

“अरे, नीलिमा, घर नहीं चलना है क्या?” उस के कंधे पर हाथ रख कर अनु बोली.

“नहीं यार, मुझे देर लगेगी,” कंप्यूटर पर आंखें गड़ाए नीलिमा बोली, “आज मुझे कैसे भी कर यह असाइनमैंट पूरा करना ही है. इसलिए तू निकल, मैं दूसरी ट्रेन से आ जाऊंगी,” काम जल्दी खत्म कर के नीलिमा स्टेशन पहुंच तो गई मगर उस ट्रेन में इतनी ज्यादा भीड़ थी कि चढ़ना मुश्किल लग रहा था उसे. जो यात्री ट्रेन के अंदर थे वे बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे और जो प्लेटफौर्म पर खड़े थे वे ट्रेन के अंदर घुसने के लिए धक्कामुक्की कर रहे थे. नीलिमा को तो समझ ही नहीं आ रहा था कि वह ट्रेन में चढ़ेगी कैसे.

‘कैसे भी कर के चढ़ना तो पड़ेगा ही, वरना, अगर यह ट्रेन भी छूट गई, तो और ज्यादा मुसीबत हो जाएगी,’ अपने मन में सोच नीलिमा ने अपने पांव आगे बढ़ाए ही थे ट्रेन में चढ़ने के लिए कि एक आदमी उसे धकेलते हुए ट्रेन में चढ़ गया और वह गिरतेगिरते बची.

‘कैसेकैसे लोग हैं, जरा भी तमीज नहीं है इन्हें,’ खुद में ही बड़बड़ाती हुई नीलिमा पूरी ताकत के साथ ट्रेन में चढ़ तो गई, मगर ट्रेन में तिल रखने की भी जगह नहीं थी. लोगों को खड़े होने के लिए भी जगह बड़ी मुश्किल से मिल पा रही थी. वह एक तरफ जा कर खड़ी हो गई. गिर न जाए इसलिए कस कर सीट का हत्था पकड़ लिया.

कई यात्री तो जान की बाजी लगा कर ट्रेन में लटक कर यात्रा कर रहे थे.

‘गलती हो गई मुझ से. मुझे अनु के साथ ही घर चले जाना चाहिए था,’ नीलिमा मन में सोच ही रही थी कि अचानक से उसे अपने हाथ पर किसी का स्पर्श महसूस हुआ. देखा, तो पास खड़ा वह काला मोटा सा आदमी उसे अजीब तरह से घूर रहा था. नीलिमा ने झट से अपना हाथ खींच लिया लेकिन जब गिरने लगी, तो फिर से उस ने सीट का हत्था थाम लिया.

लेकिन उस आदमी ने तो इस बार नीलिमा का हाथ इतना कस कर दबाया कि वह ‘सी’ कर उठी.  मन तो किया उस को एक जोर का थप्पड़ उस के कनपट्टी पर जड़ दें. लेकिन इतने लोगों के बीच वह कोई तमाशा नहीं करना चाहती थी, इसलिए कुछ बोली नहीं और खिड़की के बाहर देखने लगी.

लेकिन वह बेशर्म इंसान तो नीलिमा की चुप्पी का गलत फायदा उठा कर उसे यहांवहां छूने की कोशिश करने लगा. एक तो उस के शरीर से इतनी गंदी बदबू आ रही थी और ऊपर से वह नीलिमा को परेशान भी कर रहा था.

“ऐस्क्यूज मी, आप यहां आ कर बैठ जाइए,” उस आदमी को कब से नीलिमा को परेशान करते देख एक युवक से रहा नहीं गया. इसलिए उस ने अपनी सीट नीलिमा को बैठने के लिए दे कर खुद उस की जगह पर जा कर खड़ा हो गया. उस युवक ने जब घूर कर उस आदमी को देखा तो वह घबरा कर वहां से खिसक गया.  शायद उस का स्टेशन आ गया होगा या डर के मारे कहीं और जा कर बैठ गया होगा.

खैर, नीलिमा ने चैन की सांस ली और मन ही मन उस युवक को धन्यवाद किया. अगली स्टेशन पर जब नीलिमा के पास बैठा आदमी उतरा, तो उस ने वह सीट उस युवक के लिए घेर लिया और इशारों से उसे यहां आ कर बैठने को कहा.

“शुक्रिया,” उस युवक ने मुसकराते हुए कहा.

“शुक्रिया, तो मुझे आप का कहना चाहिए,” नीलिमा बोली और एक पल के लिए दोनों की आंखें चार हुईं और फिर वे खिड़की से बाहर देखने लगे. नीलिमा ने पलट कर एक बार फिर उस युवक को भरपूर नजरों से देखा और अपने लटों को कानों के पीछे ले जाते हुए सोचने लगी कि दुनिया में अच्छे इंसान भी हैं.

“आप रोज क्या इसी ट्रेन से घर जाते हैं?” नीलिमा के सवाल पर उस युवक ने ‘हां’ में सिर हिला दिया और फिर खिड़की से बाहर देखने लगा. उस युवक में गजब का आकर्षण था.

6 फिट लंबा, सांवला वह युवक किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं जान पड़ रहा था. ऊपर से उस का धीरगंभीर चेहरा नीलिमा का मन मोह रहा था.

वह युवक तिरछी नजर से नीलिमा को ही देखे जा रहा था. हवा के झोंके से जब नीलिमा के बाल उड़उड़ कर उस के चेहरे पर आ कर उसे परेशान कर रहा था तो वह उन बालों को समेट पर फिर से कानों के पीछे खोंसने की बेकार कोशिश कर रही थी. तब वह इतनी खूबसूरत लग रही थी कि क्या कहें.  मन तो कर रहा था कि उस का कि हाथ आगे बढ़ा कर उस के उड़ते बालों को संवार दे ताकि नीलिमा परेशान न हो.

जब उस ने धीरे से पूछा कि नीलिमा को कहां उतरना है, तो उस के आंखों की गहराई नीलिमा के दिल में उतर गई. यह जान कर वह युवक मन ही मन मुसकरा उठा कि नीलिमा को भी उसी स्टेशन पर उतरना है, जहां उसे.

जैसे ही ट्रेन स्टेशन पर रुकी लोग पागलों की तरह धक्कामुक्की कर बाहर निकलने लगे जबकि उन्हें पता है कि ट्रेन की स्टोपेज यहीं तक है. फिर भी लोगों में सब्र नाम की चीज नहीं है. नीलिमा उतरने के लिए उठने ही लगी थी कि उस युवक ने यह कर कर उस का हाथ पकड़ लिया कि भीड़ छंट जाने दीजिए…

उस के स्पर्श से नीलिमा को लगा जैसे उस के मन में संगीत के तार बज उठे हों. वहीं जब उस शख्स ने उसे छूआ था तब वह कैसे विचलित हो उठी थी. मगर इस लड़के के छुअन में ऐसी क्या बात है कि नीलिमा का रोमरोम सिहर उठा.

“आप के लिए वही ट्रेन सही है. इस में बहुत ज्यादा भीड़ होती है,” अभी भी वह नीलमा का हाथ वैसे ही थामे हुए था जैसे वह कोई छोटी बच्ची हो.  लेकिन क्यों? वह तो नीलिमा को जानता तक नहीं. अभीअभी तो मिले हैं दोनों? कहीं यह उन का पहली नजर का प्यार तो नहीं.

“चलिए, मैं आप को, आप के घर तक छोड़ दूं क्योंकि रात बहुत हो चुकी है,” वह युवक बोला.

“अरे नहीं, मेरा भाई आता ही होगा मुझे लेने. वैसे, थैंक्स,” मुसकराते हुए बोल नीलिमा आगे बढ़ी ही थी कि हवा से लहराता उस का दुपट्टा उड़ कर उस लड़के के सिर पर जा गिरा.

“अरे, यह हवा भी न,” कह कर वह  जैसे ही अपना दुपट्टा लेने के लिए मुड़ी, देखा वह लड़का एकटक उसे ही निहार रहा था. उसे अपनी तरफ  इस तरह से निहारते देख नीलिमा लजा गई. घर पहुंच कर फ्रैश होने के बाद जब नीलिमा खाने बैठी तो उस युवक का चेहरा उस के आंखों के सामने नाचने लगा.

“क्या हुआ, खा क्यों नहीं रही है? खाना अच्छा नहीं बना क्या?”  नीलिमा को रोटी से खेलते देख कर उस की मां संध्या ने पूछा.

“नहीं, म… मेरा मतलब है खाना तो अच्छा बना है, लेकिन मुझे भूख नहीं है मां. वह अनु ने समोसे मंगवाए थे न तो वही खा लिया था,” नीलिमा झूठ बोल गई लेकिन उस की भूख तो वह लड़का खा गया था जिस का वह नाम भी नहीं जानती.

‘नाम पूछा ही नहीं तो कैसे पता चलेगा?’

‘अरे, कैसे पूछती? अब क्या पहली मुलाकात में, वह भी ट्रेन में कोई किसी का नाम पूछता है भला?’

‘लेकिन फोन नंबर तो मांग ही सकती थी न उस से?’

‘क्या कह कर फोन नंबर मांगती? कहीं वह बुरा मान जाता तो?’

‘अरे, इस में बुरा मनाने वाली क्या बात है? फोन नंबर ही तो मांग रही थी, कोई उस की जायदाद थोड़े ही, जो वह बुरा मान जाता…’ नीलिमा का एक दिल कुछ और कहता, तो दूसरा कुछ और.

‘वह कौन है, कहां रहता है, क्या काम करता है नीलिमा को कुछ नहीं पता, लेकिन फिर भी वह लड़का उसे अपना सा क्यों लगने लगा था? क्या रिश्ता है उस का उस से?’ सोचसोच कर नीलिमा करवटें बदल रही थी और फिर पता नहीं कब उस की आंखें लग गईं.

सुबह किचन में चाय बनाते हुए भी वही लड़का उस के दिलोदिमाग पर छाया रहा. उस की बातें, उस की मुसकराहटें याद कर नीलिमा मुसकरा उठी. जिस हक से उस ने उस का हाथ पकड़ा हुआ था, याद कर नीलिमा रोमांच से भर उठी. लंबे समय से सुखी पड़ी दिल की मिट्टी पर जैसे किसी ने पानी का छींटा मार दिया था.

उधर उस लड़के का, जिस का नाम साहिल था, उस का भी यही हाल था. नीलिमा के दुपट्टे से आती परफ्यूम की खुशबू अभी भी उस के नथुनों में बसी थी. सोच रहा था कि काश, कल वह फिर मिल जाए. दूसरे दिन नीलिमा को फिर उसी ट्रेन में देख साहिल  का दिल धड़का. पर उस ने यह बात उस पर जाहिर नहीं होने दी.

“आप की ट्रेन फिर से मिस हो गई?” साहिल हंसा, तो नीलिमा बोली कि दरअसल, उस के औफिस में औडिट चल रहा है तो अभी उसे रोज इसी ट्रेन से घर जाना पड़ेगा.

“ओह, फिर तो अच्छा है,” बोल कर वह झेंप गया लेकिन नीलिमा मुसकरा उठी. पूछने पर दोनों ने अपनाअपना नाम बताया और फोन नंबर का भी आदानप्रदान हो गया. कहीं न कहीं दोनों के दिल के तार आपस में जुड़ चुके थे क्योंकि ट्रेन में चढ़ते ही दोनों की आतुर नजरें गौरैया की तरह यहांवहां फुदकने लगती थीं और जैसे ही वे एकदूसरे को देख लेते राहत की सांस भरते थे.

अपनी खुशी के लिए : भाग 1

‘‘नंदिनी अच्छा हुआ कि तुम आ गईं. तुम बिलकुल सही समय पर आई हो,’’ नंदिनी को देखते ही तरंग की बांछें खिल गईं.

‘‘हम तो हमेशा सही समय पर ही आते हैं जीजाजी. पर यह तो बताइए कि अचानक ऐसा क्या काम आन पड़ा?’’

‘‘कल खुशी के स्कूल में बच्चों के मातापिता को आमंत्रित किया गया है. मैं तो जा नहीं सकता. कल मुख्यालय से पूरी टीम आ रही है निरीक्षण करने. अपनी दीदी नम्रता को तो तुम जानती ही हो. 2-4 लोगों को देखते ही घिग्घी बंध जाती है. यदि कल तुम खुशी के स्कूल चली जाओ तो बड़ी कृपा होगी,’’ तरंग ने बड़े ही नाटकीय स्वर में कहा.

‘‘आप की इच्छा हमारे लिए आदेश है. पर बदले में आप को भी मेरी एक बात माननी पड़ेगी.’’

‘‘कहो न, ऐसी क्या बात है?’’

‘‘कल टिवोली में नई फिल्म लगी है. आप को मेरा साथ देना ही पड़ेगा,’’ नंदिनी ने तुरंत ही हिसाबकिताब बराबर करने का प्रयत्न किया.

‘‘यह कौन सी बड़ी बात है. मैं तो स्वयं यह फिल्म देखना चाह रहा था और इतना मनमोहक साथ मिल जाए तो कहना ही क्या,’’ तरंग बड़ी अदा से मुसकराया.

‘‘चलो, खुशी की समस्या तो सुलझ गई. क्यों खुशी, अब तो खुश हो?’’ तरंग ने अपनी बेटी की सहमति चाही.

‘‘नहीं, मैं खुश नहीं हूं, मैं तो बहुत दुखी हूं. मेरे स्कूल में जब मेरे सभी साथियों के साथ उन के मम्मीपापा आएंगे तब मैं अपनी नंदिनी मौसी के साथ पहुंचूंगी,’’ खुशी रोंआसी हो उठी.

‘‘चिंता मत करो खुशी बेटी. मैं तुम्हारे स्कूल में ऐसा समां बाधूंगी कि तुम्हारे सब गिलेशिकवे दूर हो जाएंगे,’’ नंदिनी ने खुशी को गोद में लेने का यत्न करते हुए कहा.

‘‘मुझे नहीं चाहिए आप का समांवमां. अगर मेरे मम्मीपापा मेरे साथ नहीं जा सकते तो मैं कल स्कूल ही नहीं जाऊंगी,’’ खुशी पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई.

‘‘तुम ने बहुत सिर चढ़ा लिया है अपनी लाडली को. घर आए मेहमान से कैसे व्यवहार करना चाहिए, यह तक नहीं सिखाया उसे,’’ तरंग नम्रता पर बरस पड़ा.

‘‘उस पर क्यों बरसते हो. तुम भी तो पापा हो खुशी के. तुम ने कुछ क्यों नहीं सिखायापढ़ाया?’’ तरंग की मां पूर्णा देवी जो अब तक तटस्थ भाव से सारा प्रकरण देख रही थीं अब स्वयं को रोक न सकीं.

‘‘मैं उसे ऐसा सबक सिखाऊंगा कि वह जीवन भर याद रखेगी,’’ तरंग तेजी से अंदर की ओर लपका तो नम्रता को जैसे होश आया. उस ने दौड़ कर खुशी को गोद में छिपा लिया.

‘‘आज से इस का खानापीना बंद. 2 दिन भूखी रहेगी तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी,’’ तरंग लौट कर सोफे पर पसरते हुए बोला.

‘‘क्यों इतना क्रोध करते हो जीजाजी? खुशी तो 5 वर्ष की नन्ही सी बच्ची है. वह क्या समझे तुम्हारी दुनियादारी. जो मन में आया बोल दिया. चलो अब मुसकरा भी दो जीजाजी. क्रोध में तुम जरा भी अच्छे नहीं लगते,’’ नंदिनी बड़े लाड़ से बोली तो नम्रता भड़क उठी.

‘‘नंदिनी, मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं. इस समय तुम जाओ. हमें अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को स्वयं सुलझाने दो,’’ वह बोली.

‘‘दीदी तुम भी… मैं तो तुम्हारे लिए ही चली आती हूं. आज भी औफिस से सीधी यहां चली आई. तुम तो जब भी मिलती हो यही रोना रोती हो कि तरंग तुम से दुर्व्यवहार करते हैं. तुम्हारा खयाल नहीं रखते. मुझे लगा मेरे आने से तुम्हें राहत मिलेगी. नहीं तो मुझे क्या पड़ी है यहां आ कर अपना अपमान करवाने की?’’ नंदिनी ने पलटवार किया.

‘‘नम्रता, नंदिनी से क्षमा मांगो. घर आए मेहमान से क्या इसी तरह व्यवहार किया जाता है?’’ नम्रता कुछ बोल पाती उस से पहले ही तरंग ने फरमान सुना दिया.

नम्रता तरंग की बात सुन कर प्रस्तर मूर्ति की भांति खड़ी रही. न उस ने तरंग की बात का उत्तर दिया न ही माफी मांगी.

‘‘तुम ने सुना नहीं? नंदिनी से क्षमा मांगने को कहा था मैं ने,’’ तरंग चीखा.

‘‘मेरे लिए यह संभव नहीं है तरंग,’’ नम्रता ने उत्तर दिया और खुशी को गोद में उठा कर अंदर चली गई.

‘‘छोड़ो भी जीजाजी, क्यों बात का बतंगड़ बनाते हो. मैं अब चलूंगी,’’ नंदिनी उठ खड़ी हुई.

‘‘इस तरह बिना खाएपिए? रुको मैं कोई ठंडा पेय ले कर आता हूं.’’

‘‘नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए,’’ नंदिनी ने अपना बैग उठा लिया.

‘‘ठीक है, चलो मैं तुम्हें घर तक छोड़ कर आता हूं.’’

‘‘मैं अपनी कार से आई हूं.’’

‘‘अपनी कार में जाना भी अकेली युवती के लिए सुरक्षित नहीं है,’’ तरंग तुरंत साथ चलने के लिए तैयार हो गया और क्षणभर में ही दोनों एकदूसरे के हाथ में हाथ डाले मुख्य द्वार से बाहर हो गए.

द्वार बंद कर जब नम्रता पलटी तो खुशी और पूर्णा देवी दोनों उसे आग्नेय दृष्टि से घूर रही थीं जैसे उस ने कोई अक्षम्य अपराध कर डाला हो.

बौलीवुड स्टारपुत्र : काम न आया पिता का नाम

चर्चा फिल्म ‘एनिमल’ के बराबर ही रणबीर कपूर की ऐक्टिंग की भी हो रही है. यह कोई पहला मौका नहीं है जब रणबीर कपूर तारीफ हासिल कर रहे हों बल्कि इस से पहले भी उन की ऐक्टिंग ‘ये जवानी है दीवानी,’ ‘संजू,’ ‘बर्फी’ और ‘राजनीति’ जैसी फिल्मों के चलते चर्चाओं में रही है.

निश्चित रूप से भारत से लगभग 2000 किलोमीटर दूर मालदीव में बैठे कुमार गौरव तक भी फिल्म ‘एनिमल’ और रणबीर कपूर की धमक पहुंची होगी और निश्चित रूप से उन्हें साल 1982 में प्रदर्शित अपनी पहली फिल्म ‘लव स्टोरी’ की याद आई होगी जिस के सामने फिल्म ‘एनिमल’ की सफलता कुछ भी नहीं.

पहले हिट बाद में फ्लौप

इस रोमांटिक फिल्म ने बौक्स औफिस पर हाहाकार मचा दिया था. फिल्म ‘लव स्टोरी’ में नया कुछ नहीं था. यह उस दौर के प्रेमियों की दुश्वारियां बयां करती फिल्म थी जिस के तहत प्यार करने वालों के पहले दुश्मन उन के अपने पेरैंट्स ही होते हैं. प्रेमी जुदाई बरदाश्त नहीं कर पाते थे तो घर से भाग जाते थे. इस के बाद शुरू होता था परेशानियों का सिलसिला जो फिल्म के अंत में मांबाप की सहमती पर जा कर खत्म होती थी.

फिल्म ‘लव स्टोरी’ में कुमार गौरव के अपोजिट विजेयता पंडित थीं, जो उन्हीं की तरह बेहद ताजे चेहरे वाली मासूम और नाजुक करैक्टर की मांग के लिहाज से थीं. कुमार गौरव और वे रातोरात युवाओं के दिलोदिमाग पर कुछ इस तरह छा गए थे कि लगता था अब इन के सिवाय फिल्म इंडस्ट्री में कोई और चलेगा ही नहीं. कोई 150 सप्ताह यह फिल्म थिएटरों में चली थी और कुमार गौरव असीमित संभावनाओं वाले हीरो फिल्मी पंडितों को लगने लगे थे क्योंकि वे राजेंद्र कुमार के बेटे थे.

पहली ही फिल्म से सुपर स्टार करार दे दिए गए कुमार गौरव अपने दौर के मशहूर ऐक्टर राजेंद्र कुमार के बेटे थे, जिन्हें जुबली कुमार के खिताब से नवाज दिया गया था.

काम न आया नाम

60 से ले कर 80 के दशक तक राजेंद्र कुमार ने एक के बाद एक हिट फिल्में दी थीं जिन में से अधिकांश सिल्वर जुबली मनाती थी और जो उस वक्त बौक्स औफिस पर बड़े कलैक्शन की गारंटी होती थी.

फिल्म ‘धूल का फूल,’ ‘गूंज उठी शहनाई,’ ‘आस का पंछी,’ ‘ससुराल,’ ‘घराना,’ दिल एक मंदिर’, ‘मेरे महबूब’, ‘आई मिलन की बेला,’ ‘संगम’ और ‘आरजू’ से ले कर ‘सूरज’ तक दर्जनों फिल्मे हैं जिन्हें दर्शकों ने हफ्तों तक सर पर उठाए और बैठाए रखा था.

राजेंद्र कुमार के खाते में ‘मदर इंडिया’ जैसी कालजयी फिल्म होने का श्रेय भी है. इस नाते कुमार गौरव से सभी को उम्मीदें थीं कि वे भी पिता की तरह लंबी और हिट पारी खेलेंगे. लेकिन फिल्म ‘लव स्टोरी’ के बाद जो ऐक्टिंग उन्होंने फिल्म ‘तेरी कसम’ और ‘फूल और कांटे’ जैसी फिल्मो में की उस का जिक्र अब शायद वे भी करना पसंद न करें.

इस तरह कुमार गौरव की दौड़ फिल्म ‘लव स्टोरी’ से शुरू हो कर इसी पर ही खत्म हो जाती है. कमोबेश यही हाल फिल्म ‘लव स्टोरी’ की पिंकी यानी विजयेता पंडित का हुआ जिन का अब कहीं अतापता नहीं और हों भी तो उस के कोई माने नहीं.

फिल्म छोङ बिजनैस

63 के हो चुके कुमार गौरव जरूर मालदीव में अपना ट्रैवल और कंस्ट्रक्शन का कारोबार देखते हैं. जिंदगी में क्या उल्लेखनीय किया इस सवाल के जवाव में वे फिल्म ‘लव स्टोरी’ के बाद नाम फिल्म का नाम जरूर ले सकते हैं जो महेश भट्ट ने एक खास मकसद से संजय दत्त के डूबते कैरियर को बचाने में बनाई थी. नाम चली थी लेकिन इस का क्रैडिट संजय दत्त को गया था.

फिल्म ‘लव स्टोरी’ के निर्माता खुद राजेंद्र कुमार थे जिन्होंने डाइरैक्शन की जिम्मेदारी राहुल रवैल जैसे सधे डायरैक्टर को दी थी. फिल्म में राजेंद्र कुमार के साथ विद्या सिन्हा और डैनी भी थे. फिल्म चली तो आस राजेंद्र कुमार को बंधी थी कि अब बेटा गोल्डन जुबली कुमार कहलाएगा लेकिन अफसोसजनक तरीके से कुमार गौरव ‘फ्लौप कुमार’ साबित हुए लेकिन बुद्धिमानी उन्होंने यह की कि धीरेधीरे फिल्में में काम करना बंद कर दिया और बिजनैस करने लगे.

ऐक्टिंग से कैटरिंग में आए कुणाल

राजेंद्र कुमार के ही दौर के और उन्हीं के जैसे कामयाब एक और हीरो थे मनोज कुमार जो एक कामयाब प्रोड्यूसर भी थे. मनोज कुमार देशभक्ति वाली फिल्में बनाने के लिए ज्यादा जाने जाते थे, इसलिए इंडस्ट्री में उन का नाम भारत कुमार दिया गया था यह और बात यह भी कि देशभक्ति के साथसाथ वे सनातन धर्म का भी प्रचार करते रहते थे. फिल्म ‘उपकार’ और ‘पूरब पश्चिम’ के बाद मनोज कुमार ने चलताऊ और मसाला फिल्मों से ज्यादा नाम और दाम कमाया. फिल्म ‘दस नंबरी,’ ‘सन्यासी,’ ‘अमानत,’ ‘रोटी कपड़ा और मकान,’ ‘शोर,’ बेईमान,’ ‘नीलकमल,’ ‘पत्थर के सनम’ और ‘वो कौन थी’ से ले कर ‘अपना बना के देखो’ कुछ ऐसी ही फिल्मे थीं.

कुणाल गोस्वामी भी नहीं चले

मनोज कुमार के बेटे कुणाल गोस्वामी का हश्र तो कुमार गौरव से भी गयागुजरा हुआ. उन की फिल्में ‘रिंकी,’ ‘जयहिंद’ और ‘पाप की कमाई’ ने तो बौक्स औफिस पर पानी भी नही मांगा जबकि कुणाल भी चौकलेटी चेहरे के मालिक थे, ऐक्टिंग उन के खून में भी थी लेकिन उन के अंजाम से साबित हो गया कि यह जरूरी नहीं कि स्टार का बेटा स्टार ही हो.

हालांकि 1983 में प्रदर्शित फिल्म कलाकार में जरूर उन्होंने जबरिया ऐक्टिंग करने की कोशिश की थी लेकिन कामयाब नहीं रहे थे. इस फिल्म में उन के अपोजिट श्रीदेवी जैसी नामचीन ऐक्ट्रैस थीं जो उन की कोई मदद नही कर पाईं. इस फिल्म का एक गाना ‘नीलेनीले अअंबर पर चांद जब…’ आज भी गुनगुनाया जाता है. ठीक वैसे ही जैसे फिल्म ‘लव स्टोरी’ का यह गाना गुनगुनाया जाता है, ‘देखो मैं ने देखा है ये एक सपना, फूलों के शहर में हो घर अपना…’

अब कुणाल दिल्ली में कैटरिंग का बिजनैस संभालते हैं जिस से उन्हें खासी कमाई हो जाती है लेकिन तय है फिल्म ‘एनिमल को देख उन्हें भी कसक तो हुई होगी कि कैटरिंग के कारोबार में तो सिर्फ पैसा है लेकिन ऐक्टिंग में तो शोहरत भी बेशुमार है वहां चल जाते तो बात कुछ और होती.

पुरु ने डुबोया नाम

पिता के नाम को डुबोया पुरु ने फिल्मों और फिल्म इंडस्ट्री में कम से कम दिलचस्पी रखने वाला भी राजकुमार के नाम से वाकिफ जरूर रहता है. फिल्म ‘मदर इंडिया,’ ‘दिल एक मंदिर है,’ ‘लाल पत्थर’ और ‘पाकीजा’ जैसी कला फिल्मों से अपनी ऐक्टिंग के झंडे गाड़ने वाले राजकुमार ने फिल्म ‘बुलंदी,’ ‘मरते दम तक,’ ‘तिरंगा’ और ‘गलियों का बादशाह’ जैसी सी ग्रेड की फिल्में करने के पहले वक्त फिल्म ‘हमराज,’ ‘सौदागर’ और ‘कुदरत’ जैसी व्यसायिक फिल्मों में प्रभावी अभिनय कर अपनी अलग छाप छोड़ी है.

अपनी दमदार डायलौग के अलावा अक्खड़ और उजड्ड मिजाज के राजकुमार अपने आगे किसी को कुछ समझते नहीं थे और हमेशा ‘जानी’ संबोधन का इस्तेमाल करते थे.उन के अक्खड़पन के किस्से आज भी टीवी शोज की जान और शान होते हैं. इन्हीं राजकुमार का बेटा पुरु राजकुमार पिता के नाम के मुताबिक कामयाब नहीं हो पाया जिस पर फिल्म इंडस्ट्री में हर किसी को हैरत होती है. पुरु की फिल्मों के नाम भी दर्शकों की जबान तक नहीं चढ़े. इस से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे कितनी घटिया और फ्लौप होंगी जबकि राजकुमार की फिल्म आते ही दर्शक थिएटर की तरफ दौड़ पड़ते थे. जिन्हें इस बात से मतलब नहीं रहता था कि फिल्म कैसी होगी, वे सिर्फ यह देखने जाते थे कि राजकुमार ने कौनकौन से धांसू डायलौग बोले होंगे.

राजकुमार ने कई फ्लौप फिल्में भी दीं लेकिन हर फिल्म के बाद वे अपनी फीस एक लाख रुपए बढ़ा देते थे और इस बाबत पूछने पर कहते थे कि जानी, फिल्म फ्लौप हुई है हम नहीं.

पुरु में अपने पिता सी न तो अभिनय क्षमता है न वैसी संवाद अदायगी और न ही वस तेवर जिन के चलते लोग राजकुमार को राजकुमार मानते थे. पुरु की पहली फिल्म ‘बाल ब्रह्मचारी’ 1996 में आई थी जो थोड़ीबहुत इसलिए चल गई थी कि वह राजकुमार के बेटे हैं. इस के बाद तो लोगों ने उन की फिल्मों की तरफ पीठ भी नहीं की. फिल्म ‘हमारा दिल आप के पास है,’ ‘मिशन कश्मीर,’ ‘खतरों के खिलाड़ी’ और ‘उलझन’ से ले कर 2007 में आई फिल्म ‘दोष’ और 2010 में प्रदर्शित फिल्म ‘वीर’ सभी लाइन से बौक्स औफिस पर औंधे मुंह गिरी.

नशे में कैरियर खत्म

एक कामयाब पिता के इस बिगङैल बेटे ने साल 1993 में शराब के नशे में मुंबई के बांद्रा में फुटपाथ पर सो रहे 8 लोगों पर अपनी कार चढ़ा दी थी जिन में से 3 की मौत हो गई थी. हालांकि यह मामला अदालत के बाहर ही सुलझ गया था लेकिन इस के लिए राजकुमार को भारी जुरमाना बेटे को बचाने के लिए देना पड़ा था.
ये 2 ही नहीं बल्कि स्टार पुत्रों की लंबी फेहरिस्त है जो विरासत में मिले नाम और काम को संभाल नहीं पाए. ऐसे में कपूर खानदान के ऋषि कपूर के बेटे रणबीर कपूर जैसे इनेगिने नाम ही बचे हैं जो ऐक्टिंग के जरिए साबित कर रहे हैं कि मौके को भुनाया कैसे जाता है. मिसाल कपूरों की ही लें तो शशि कपूर के बेटे करण और कुणाल भी इंडस्ट्री में चल नहीं पाए और राजीव कपूर भी फ्लौप ही रहे. जितेंद्र का बेटा तुषार चर्चित जरूर रहता है पर सफल नहीं कहा जा सकता. बाबी देओल और सन्नी देओल ने जरूर धर्मेंद्र का नाम आगे बढ़ाया लेकिन इन की तीसरी पीढ़ी इतनी कामयाब हो पाएगी इस में शक है.

राज छिपाना कोई नीरा से सीखे : भाग 1

तुम टैंशन मत लो, उसे शक नहीं होगा,” नीरा ने अपने पति सुनील के दोस्त केशव को उन की नजरों से छिप कर झटपट मैसेज भेज तुरंत उसे डिलीट कर दिया.

वह तुम्हारे घर के लिए निकल रही है, काफी गुस्से में है. संभाल लेना,” केशव ने नीरा को वापस मैसेज भेज कर उसे डिलीट कर दिया.

आप चाय लोगे?” नीरा ने अखबार के साथसाथ न्यूज देखते हुए सुनील से पूछा.

हां, बनाओ,” चाय पीने के लिए हर पल आतुर सुनील ने जैसा अनुमानित था वैसा उत्तर दिया.

नीरा किचन में पहुंची और चायपत्ती का खाली डब्बा खंगालने लगी और कहा,”अरे, आप को सुबह कहा था न कि चायपत्ती खत्म हो गई है. जाइए न नीचे की दुकान से ले आइए,” नीरा सुनील को कुसुम के आने से पहले रफादफा करना चाहती थी कि कहीं उन के सामने कोई तमाशा न हो जाए और वे भी उन दोनों पर शक करना न चालू कर दें.

क्या तुम भी छुट्टी के दिन तंगगाती हो,” सुनील जैसे ही सोफे से उठ कर अपनी चप्पलें पहन दरवाजे पर पहुचने लगे नीरा ने प्रेमपूर्वक कहा,”अच्छा, अब जा ही रहे हैं तो 1 किलोग्राम टमाटर और आधा किलोग्राम पनीर लेते आइएगा,”

यह दुकान दूसरी तरफ है, आनेजाने में बहुत समय लग जाएगा.”

अच्छा ही है न, आप की थोड़ी वौक भी हो जाएगी. उन के यहां पनीर सब से ताजा मिलता है, वहीं से लाना,” नीरा चाहती थी कि सुनील देर से देर घर वापस लौटें ताकि सब बातें इत्मीनान से हो सके और उन्हें कानोंकान खबर न हो.

जैसे ही वे गए, बाहर से सामान्य और भीतर से घबराई हुई नीरा अपने सूखे गले को 2 गिलास ठंडा पानी पिला कर शांत कर, कुछ गहरी सांसें ले अपनेआप को कुसुम का सामना करने के लिए मजबूत करने लगी.

कुसुम और केशव उन्हीं के अपार्टमैंट के आखिरी विंग में रहते हैं. कुसुम अपनी डिलिवरी के समय मायके अपने 7वें महीने से गई हुई थी और कुछ दिनों पहले ही वापस आई. 15 दिन घर पर 15 दिन खदान पर सेवा देने वाले इंजीनियर सुनील कई बार अपनी मौजदूगी में केशव को खाने पर आमंत्रित करते रहते थे. तभी घंटी बजी, जैसा वह जानती थी यह कुसुम ही होगी.

अरे, कुसुम तुम, कैसी हो? आओ अंदर आओ,” कुसुम अपने 3 महीने के बेटे के साथ तिलमिलाए दरवाजे के बाहर खड़ी दिखी.

भाभीजी, मैं यहां बैठने नहीं आई हूं, बस, यह पूछने आई हूं कि आप दोनों के बीच क्या खिचड़ी पक रही है?”
शुरू से ही बातबात पर केशव पर शक करने वाली कुसुम आज कुछ सुनने के मूड में नहीं थी.

केशव इसी वजह से उसे अपने से जुड़ी कोई भी बातें साझा करने से कतराता था कि पता नहीं कब क्या बखेड़ा खड़ा कर दे.

अंदर तो आओ. किन दोनों की बात कर रही हो?” अपनेआप को नीरा बिलकुल अनजान सी प्रस्तुत करने लगी.

मैं आप की और केशव की बात कर रही हूं. मुझे पता है कि आप दोनों का चक्कर चल रहा है.”

क्या… क्या कहा फिर से कहना. रुको, सुनील आते ही होंगे यह सब उन से भी कहना प्लीज,” और नीरा अपना पेट पकड़ कर जोरों से हंसने लगी.

नीरा के ऐसे हावभाव देख कर कुसुम दुविधा में पड़ गई कि कहीं वह जो सोच रही है उस की गलतफहमी तो नहीं?

शक्की कुसुम ने जब मायके से अपनी कामवाली को बीचबीच में फोन लगाया तो पता चला कि केशव रोज शाम को खाना बनाने से मना कर देते हैं. ऊपर से उन का मूड बहुत खुशनुमा रहता है. हर पल रोमांटिक गाने सुनते रहते हैं या गुनगुनाते रहते हैं.

बाई के प्रेमी सत्या चौकीदार के सनसनी खबर देने के बाद कि केशव भैया रात को नीरा भाभीजी के यहां अकसर जाते हैं और घंटों बाद लौटते हैं और कई बार नीरा भी उन के यहां जातीआती रहती है, यह सब सुन कुसुम के पैरों तले जमीन खिसक गई और वह बच्चे को लिए, बिना केशव बताए घर आ पहुंची.

मुन्ने को मुझे दो, बड़ा प्यारा है,” नीरा ने ₹2 हजार का नोट मुन्ने के कपड़ों में दबा दिए.

इस की जरूरत नहीं है.”

अपनी कमाई दे रही हूं, इस में क्या?”

अच्छा, आप की कब नौकरी लग गई, मैं भी तो सुनूं?”

अरे, आजकल 4 टिफिन दे रही हूं, केशव मेरे पहले ग्राहक हैं,” नीरा ने गौरव से मुसकराते हुए आगे कहा.

तुम थीं, नहीं तो यह रात के खाने पर केशव भाई साहब को अकसर बुला लेते थे. भाई साहब को आप की बाई के हाथ का खाना बिलकुल पसंद नहीं आता था. कहते थे कि एक टाइम से ज्यादा नहीं निगल सकता. सुनीलजी की गैरमौजदूगी में मैं शाम का टिफिन दे आती थी. बस, यहीं से शुरुवात हो गई. वैसे तुम्हें ऐसे बेतुके खयाल कैसे उपज जाते हैं, बताओगी? जरा मैं भी सुनूं…”

नीरा पर इतना बड़ा दोष लगाने पर वह समान्य जैसा बरताव करने लगी. नीरा के हावभाव से उसे कहीं से भी घबराती न देख कुसुम का गुस्सा ठंडा पड़ने लगा.

क्या करूं, भाभीजी, अपने शक्की स्वभाव के कारण कितनों से रिश्ते खराब कर लिए मैं ने. यह सब आप मुझे बता रही हैं, मुझे इस की कोई भी जानकारी केशव ने आज तक नहीं दी.”

बिना सोचेसमझे इतने शर्मसार करने वाले बेबुनियाद इलजाम लगा कर कुसुम शर्मिंदा होने लगी.

तुम बेवजह भाईसाहब पर शक करोगी इसलिए ही तुम्हें कुछ बताने से बचते होंगे. तुम ने बहुत पीड़ा देने वाला इलजाम हम दोनों पर लगाया है, कुसुम. बिना किसी सुबूत के किसी पर भी ऐसे कीचड़ उछालना कोई बरदाश्त नहीं करता,” कुसुम को अपने गलत होने का एहसास होते देख नीरा ने अपना अगला पासा फेंका,”मुझे छोटी बहन समझ कर माफ कर दो, भाभीजी. मैं अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हूं.”

मैं तो बाहरी हूं, माफी तुम्हें भाईसाहब से ज्यादा मांगनी चाहिए. अब इन सब बातों को अपने दिमाग से निकाल दो.”

प्यार का तीन पहिया : क्या वसुधा को मंजर था आटो वाले का प्यार ?

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संसद पर हमला : दोष किस के सिर मढ़ेगी भाजपा

जिस दिन देशभर में संसद पर 22 साल पहले हुए हमले की चर्चा थी, ठीक उसी दिन एक बार फिर कुछ नौजवानों ने संसद में दाखिल हो कर जो किया उस से हर कोई सकते में है. जिस तरीके से वारदात को अंजाम दिया गया वह निहायत ही पुरानी हिंदी फिल्मों सरीखा था जिन में विलेन और उस के गिरोह के सदस्य सुरक्षा को धता बताते इमारत में घुसते हैं और बाहर पुलिस वाले सीटियां बजाते इधर से उधर दौड़ते एकदूसरे से क्या हुआ, क्या हुआ पूछते रह जाते हैं.

नीलम, सागर, मनोरंजन और अमोल न तो विदेशी एजेंट हैं न रूरल नक्सली या अर्बन नक्सली हैं, न किसी अलगाववादी आतंकवादी संगठन से जुड़े हैं. वे मुसलमान भी नहीं हैं और न ही खालिस्तानी हैं. वे, और तो और, वामपंथी भी नहीं हैं, वे शुद्ध भारतीय हैं और बहुत स्पष्ट शब्दों में बता भी रहे हैं जिस का सार यह है कि वे बेरोजगार हैं, छात्र हैं, किसी संगठन से जुड़े नहीं हैं.

उन के मातापिता छोटेमोटे काम करते हैं. सरकार हर जगह उन जैसे लोगों की आवाज दबाने की कोशिश करती हैं फिर उन के अंदर की भड़ास जबान पर यह नारा लगाते आती है कि तानाशाही नहीं चलेगी, नहीं चलेगी.

सकते में है भाजपा

इस सुनियोजित हमले को ले कर भाजपा सकते में है कि अब ठीकरा किस के सिर फोड़ अपनी नाकामी को ढका जाए. संसद पर 2001 का हमला तो खालिस आतंकवादी हमला था जिस में सुरक्षाकर्मियों सहित 9 लोग मारे गए थे. तब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी. आरोपी पकड़े गए थे. इन में से अफजल गुरु को 9 फरवरी, 2013 को फांसी पर लटका भी दिया गया था.

अब देश में कहीं भी आतंकी घटना होती है और न भी हो तो भी मोदी सरकार की आलोचना करने वाले को झट से टुकड़ेटुकड़े गैंग का हिस्सा बता कर यह जताने की कोशिश की जाती है कि न केवल आज बल्कि सदियों से देश पर हमले बाहरी लोग करते रहे हैं और कुछ देशवासी भी इन का साथ देते हैं. इन्ही जयचंदों की वजह से देश खतरे में रहता है और लुटतापिटता रहा है.

जब मौजूदा मुद्दों और हालात से जनता का ध्यान भटकाना होता है तब भाजपाई बेमौसम यह राग अलापने से नहीं चूकते कि सोमनाथ का मंदिर महमूद गजनवी ने लूटा था. यह इतिहास की बात है लेकिन भाजपाई यह नहीं बता पाते कि आखिर न केवल मुगलों बल्कि अंगरेजों सहित दूसरे विदेशियों की हिम्मत कैसे पड़ी थी देश पर आंख उठाने की. हिंदुओं की जातिगत टूटफूट की चर्चा ये लोग कभी नहीं करते. न ही इस सवाल का कोई तार्किक जवाब दे पाते हैं कि जब मंदिर लुटते थे तब इन में विराजे शक्तिशाली देवीदेवता क्यों लुटरों को भस्म नहीं कर देते थे.

आज जिस राम मंदिर के भव्य निर्माण और लौंचिंग के चर्चे देशभर में हैं और 22 जनवरी को ले कर भारी उत्साह पैदा किया जा रहा उस अयोध्या पर बाबर का हमला और लूटपाट किस कमजोरी की देन था, मानवीय या दैवीय. या हम इतने कमजोर थे कि खामोशी से खुद को लुटते देखते रहते थे जिस से आने वाले वक्त में दोष देने में सहूलियत रहे कि देखो, वह मुगल हमारे आराधना स्थल को तहसनहस कर के चला गया, हमारी आस्था को छिन्नभिन्न कर गया और हम गुबार देखते रहे. हमारे देवीदेवताओं ने भी कुछ नहीं किया जबकि कुछ भी कर सकने की ताकत उन्हें मिली हुई है.

ताजेताजे पुलवामा के हमले को ले कर भी भाजपा के पास दोष देने को जैश ए मोहम्मद नाम का इसलामिक आतंकी संगठन है. 14 फरवरी, 2019 को इस भीषण आतंकी हमले में हमारे 40 जवान शहीद हो गए थे. इसी आतंकी संगठन ने जनवरी 2016 में पठानकोट पर हमला किया था. इस के पहले भी देश में हुए कई हमलों की जिम्मेदारी यह संगठन ले चुका है.

कोई पंजाब में अलग खालिस्तान की मांग करता है तो भाजपाई झट से उसे खालिस्तानी करार देते देशद्रोही भी ठहरा देते हैं. इस से भी जी नहीं भरता, तो आंदोलन करते किसानों को भी खालिस्तानी कहने में भगवा गैंग को हार्दिक सुख मिलता है.

लेकिन आज…

आज संसद के हमलावर अपने वाले ही हैं. उन का किसी धर्म या संप्रदाय या फिर आतंकी संगठन से कोई लेनादेना नहीं है, तब भाजपा की खामोशी बेचारगी ज्यादा लगती है क्योंकि इन देसी हमलावरों ने सरकार के प्रति पनपते असंतोष को उजागर कर दिया है. अतीत में जो हुआ उस की जिम्मेदारी आज कोई नहीं ले सकता लेकिन आज जो हुआ वह सरकार की नाकामी, बेरोजगारी और भड़ास की वजह से हुआ. क्या सरकार इस की जिम्मेदारी लेने को तैयार है.

इस हमले के मद्देनजर अफसोस तो इस बात का है कि सरकार अपनी गलतियां मानने को तैयार नहीं. उस के अपने हिंदुत्व के एजेंडे में आम जनता की बात सुनने को कोई स्पेस ही नहीं है. हां, इतना जरूर हो रहा है कि संसद की सुरक्षा व्यवस्था की खामियों को ठीक किया जा रहा है जिस से दोबारा ऐसा हादसा न हो.

जबकि जरूरत इस बात की है कि सरकार अपना पौराणिक चालचलन और मनमाना रवैया छोड़ नीलम, मनोरंजन, सागर और अनमोल जैसी मानसिकता वाले युवा पैदा न हों, इस बाबत कोशिश करे और यह काम मंदिरों और देवीदेवताओं के भरोसे तो होने से रहा.

इन युवाओं ने सरकार का ध्यान खींचने के लिए जो रास्ता चुना उसे आखिरी रास्ता नहीं कहा जा सकता. युवाओं को चाहिए कि वे लोकतांत्रिक तरीके से अपना पक्ष रखें. यह ठीक है कि ऐसे तरीकों से किसी के कान पर जूं नहीं रेंगती लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि वे हिंसक रास्ते पर चल पड़ें.

गांधी, जेपी या अन्ना हजारे वाला रास्ता अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है. वह मुश्किल और कठिन जरूर है लेकिन निजाम भी उसी ने बदले हैं. हिंसा से तो देश का और खुद का नुकसान ही होता है. नरेंद्र मोदी सरकार अनियंत्रित हो चुकी है, संसद पर हमले का संदेश तो यही है लेकिन दिक्कत यह है कि इस का ठीकरा भाजपा किस के सिर फोड़े, खुद के सिर तो लेने की उस से उम्मीद करना फुजूल है.

सड़क हादसे : रफ्तार का जनून जान न ले ले

रफ्तार का जनून और लोगों की लापरवाही का आलम दिल्ली में सड़क दुर्घटनाओं के कहर के रूप में सामने आ रहा है. दिल्ली में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले सब से ज्यादा 43 फीसदी पैदल यात्री होते हैं. जरूरत है थोड़ी सी सावधानी और नियमकानूनों के पालन की.

दिल्ली पुलिस आयुक्त संजय अरोड़ा द्वारा 13 दिसंबर को जारी की गई दिल्ली सड़क दुर्घटना रिपोर्ट-2022 के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2023 में 30 नवंबर तक सड़क हादसों में जान गंवाने वालों की संख्या 1,300 रही. वर्ष 2022 में यहां सड़क हादसों में 1,461 लोगों की जानें गईं.

इन मामलों में पैदल यात्री व दोपहिया वाहन सब से ज्यादा असुरक्षित हैं. 2022 में सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए कुल व्यक्तियों का क्रमशः 43 प्रतिशत पैदल यात्री और 38 प्रतिशत दोपहिया वाहन का है. दिल्ली की 10 खतरनाक रोड में सब से प्रमुख रिंग रोड, जी टी करनाल रोड और एनएच 24 हैं.

रफ्तार भारत की सड़कों पर होने वाली हर 10 में से 7 मौत की वजह बनती है. 2018 से 2022 के बीच तेज रफ्तार से मौतों का प्रतिशत 64 फीसदी से बढ़ कर 71 फीसदी हो गया. 2022 के आंकड़े बताते हैं कि सड़क हादसों में रिकौर्ड 1,68,491 मौतें हुईं. इन में करीब 44 फीसदी बाइक सवार शामिल थे. सड़क हादसों में मौतों के मामले में भारत दुनिया में नंबर वन है. पिछले साल 4.4 लाख लोग घायल हुए जिन में करीब 2 लाख को गंभीर चोटें आईं.

रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाईवे मिनिस्ट्री का डेटा बताता है कि दिल्ली देश की ‘रोड-डैथ कैपिटल’ बनी हुई है. 2022 में दिल्ली के भीतर सड़क हादसों में करीब डेढ़ हजार लोग मारे गए. यह संख्या 2021 के मुकाबले 18 फीसदी ज्यादा रही. सड़क हादसों में मौतों के मामले में बेंगलुरु (772 मौतें) दूसरे नंबर पर रहा. 10 साल से ज्यादा आबादी वाले शहरों में सड़क हादसों में मौतों के मामले में दिल्ली नंबर वन रही. मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में 2021 में 4,720 सड़क हादसे हुए.

शाम 6 बजे से रात 9 बजे का टाइम बड़ा खतरनाक

रिपोर्ट में सड़क की स्थिति, मानवीय भूल और वाहन की स्थिति को दुर्घटनाओं का कारण बताया गया. मानवीय भूल का मतलब है तेज गति से गाड़ी चलाना, नशे में गाड़ी चलाना, लालबत्ती पार करना और गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना आदि. दिल्ली में ज्यादातर दुर्घटनाएं शाम 6 बजे से रात 9 बजे के बीच होती हैं.

लापरवाही का ताजा उदाहरण

13 दिसंबर को दिल्ली के सिग्नेचर ब्रिज पर रिकौर्ड किए गए एक वीडियो में युवक लापरवाही से औटो पर स्टंट करता नजर आ रहा है. औटो से बाहर खड़े हो कर हवा में हाथों को लहराता हुआ आगेपीछे मुड़ता नजर आता है. उस युवक की लापरवाही का आलम यह था कि वह इस दौरान उस के आगे चल रहे साइकिल सवार से टकरा गया. जिस कारण वह साइकिल सवार जमीन पर गिर कर चोटिल हो गया.

गनीमत यह रही कि पीछे से कोई तेज रफ्तार गाड़ी नहीं आ रही थी वरना उस साइकिल सवार की जान भी जा सकती थी. पीछे से आ रहे वाहन चालकों ने तुरंत ही ब्रेक लगा कर अपनी गाड़ियों को रोका. वहीं अगर वह युवक साइकिल सवार की जगह किसी गाड़ी से टकराता तो उस के खुद के लिए भी यह प्राणघातक हो सकता था.

यह महज एक उदाहरण है. ऐसा अकसर होता रहता है. लोग हवा में बातें करते हैं. स्टंटबाजी करते हैं. गलत तरीके से ड्राइव कर लालबत्ती जंप करते हैं. इन सब का नतीजा पैदल यात्रियों या बाइक सवारों को भुगतना पड़ता है. हमें जिंदगी की कीमत का एहसास होना चाहिए. आप की अपनी जिंदगी भी खतरे में पड़ सकती है. आप की जल्दबाजी, रफ्तार या गलतियों का नतीजा आप का परिवार या कोई और न भुगते. इस के लिए बस थोड़ी सी सावधानी और नियमकानूनों का पालन ही तो जरूरी है.

सर्दी की धूप से जलती स्किन का कैसे रखें ध्यान ?

सर्दी में धूप सेंकना सब को पसंद है क्योंकि धूप शरीर को गरम करने के अलावा विटामिन डी भी देती है जो मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है. लेकिन याद रखने वाली बात यह है कि सूरज की किरणें हमेशा हमारे लिए लाभदायक नहीं होतीं क्योंकि अधिक समय तक सूरज की रोशनी के संपर्क में रहने से स्किन डैमेज होने की संभावना रहती है.

सूरज की हानिकारक किरणों से स्किन में फाइन लाइंस आना,  झुर्रियां,  झांइयां जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जिस के चलते समय से पहले एजिंग के लक्षण दिखने लगते हैं. ऐसा नहीं है कि स्किन को डैमेज से बचाने के लिए आप सर्दी में धूप का आनंद न लें लेकिन इस मौसम में स्किन का खास ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है ताकि सर्दी की धूप से त्वचा न तो जले और न किसी प्रकार की स्किन डैमेज हो.

इस बारे में मुंबई की एस्थेटिक क्लीनिक की कंसल्टैंट डर्मेटोलौजिस्ट और डर्मेटो सर्जन डा. रिंकी कपूर कहती हैं कि सर्दी के मौसम में त्वचा का खयाल रखना काफी जरूरी है क्योंकि इस मौसम में सूरज की रोशनी त्वचा के लिए हानिकारक होती है. सूर्य की किरणें कुहरे और बादलों को भेद कर त्वचा तक पहुंच सकती हैं जिस से सूखापन, समय से पहले त्वचा का एजिंग होना, बेजान त्वचा और यहां तक कि त्वचा का कैंसर भी हो सकता है. इसलिए खासकर, सर्दी के महीनों में त्वचा की देखभाल करना काफी जरूरी है.

अधिक समय तक धूप लेने से त्वचा में जलन और टैनिंग होने लगती है जिस का मुख्य कारण यूवी किरणें हैं. इसलिए यदि आप सर्दी की छुट्टियां बर्फ में बिताने जा रहे हैं, तब भी त्वचा को जलने से बचाने के लिए देखभाल की आवश्यकता होगी. यूवी किरणें कांच में भी प्रवेश कर सकती हैं. इस के लिए कुछ सु झाव हैं जिन्हें अपनाने से सर्दी में भी त्वचा स्वस्थ रहेगी.

  • सर्दी में मुलायम कपड़े पहनना अच्छा होता है. इस मौसम में शरीर को पूरा ढकने वाले मुलायम कपड़े पहनने चाहिए. धूप से बचने के लिए चश्मा पहनें. इस से चेहरे, सिर और गरदन की सुरक्षा में मदद मिलती है. धूप से बचने के लिए हलके रंग के कपड़े अच्छे विकल्प साबित होते हैं.
  • सनस्क्रीन का उपयोग जाड़े में अवश्य करें. कम से कम 30 एसपीएफ वाली सनस्क्रीन क्रीम का प्रयोग करना जरूरी होता है. इस मौसम में चेहरे को साफ रखना भी बेहद आवश्यक होता है. चेहरा साफ कर लेने के बाद सनस्क्रीन लगानी चाहिए. त्वचा को रूखेपन से बचाने के लिए मौइस्चराइजिंग लोशन या क्रीम लगाएं. हर 4 से 6 घंटे में सनस्क्रीन दोबारा लगाएं.
  • दिन में अधिकतम धूप के समय से बचें, जो आमतौर पर सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे के बीच में होती है.
  • सर्दी में त्वचा पर एलोवेरा जैल का प्रयोग करें. इस मौसम में जैल वाले लोशन और क्रीम का प्रयोग कर सकते हैं. इस के अलावा त्वचा पर सीधे शुद्ध एलोवेरा जैल का उपयोग कर सकते हैं. यह सूरज की रोशनी से होने वाले नुकसान, त्वचा की जलन और सूजन को कम करने में मदद कर सकता है.
  • धूप से होंठों को सुरक्षित रखने के लिए विटामिन ई से भरपूर लिपबाम लगाना न भूलें. हर बार खाने या पीने के बाद इसे लगाएं.
  • भोजन में धूप से बचाव वाले विटामिन, जैसे डी, ए, सी, ई आदि को शामिल करें. खट्टे फल, दूध, मछली, अंडे, फोर्टिफाइड सेरेस, एवोकाडो, ब्लूबेरी, नट्स, ग्रीन टी, शकरकंद, स्ट्राबेरी, टमाटर, गाजर और पत्तेदार सब्जियां त्वचा को अंदर से मजबूत बनाने में मदद करेंगी.

धूप की वजह से सर्दी में त्वचा के टैन हो जाने पर कुछ घरेलू उपाय किए जा सकते हैं, जिन से आप की त्वचा फिर से निखर सकती है :

  • शहद और नीबू का रस बराबर मात्रा में मिला कर फेस पर लगा लें, सूखने पर धो लें, चेहरा निखर जाएगा. इसे सप्ताह में एक या दो बार किया जा सकता है.
  • मसूर दाल का पाउडर लें और उस में दूध मिला लें. इस पेस्ट को फेस पर लगा लें. सूखने पर धो लें. इस से डैड स्किन निकलने के अलावा चेहरे का कालापन और  झांइयां भी दूर हो जाएंगी.
  • खीरा और गुलाब जल से भी आप सन टैन को दूर कर सकते हैं. खीरे का रस और गुलाब जल को बराबर मात्रा में मिलाएं और कौटन बौल की मदद से त्वचा पर लगाएं. कुछ देर बाद त्वचा को ठंडे पानी से धो लें. इस से सन टैन का असर खत्म हो जाएगा.
  • हलदी और बेसन भी धूप से जली हुई त्वचा को साफ करने में सहायक होता है. 2 चम्मच बेसन में, आधा चम्मच हलदी मिला कर पेस्ट बना कर चेहरे पर लगा लें. सूखने पर गुनगुने पानी से धो लें. सन टैन दूर हो जाएगा.

मेरी दोस्त बहुत कंजूस है, अक्सर वो मुझसे पैसे मांगती है और वापस भी नहीं करती, बताएं कि मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं और मेरी सहेली एकसाथ कालेज में पढ़ते थे. कई वर्ष बीत गए हैं. हम दोनों सहेलियां कालेज के बाद कुछ खास मिलीं नहीं. वह बहुत कंजूस किस्म की लड़की थी और बहुत ज्यादा उधारी रखने वाली भी. सभी से उधार लेले कर उस ने अच्छाखासा कर्ज अपने सिर पर चढ़ा रखा था.

मुझ से भी 7-8 हजार रुपए तो उस ने ले ही रखे थे. अभी एक हफ्ता पहले ही वह मुझे एक फंक्शन में मिली. वह बिहार से 2 महीने पहले ही दिल्ली आई है और यहां उसे अच्छा किराए का घर भी नहीं मिल रहा. मेरा यहां खुद का 4 मंजिला घर है और बातोंबातों में मैं ने उस से यह कह दिया कि एक मंजिल किराए के लिए खाली पड़ी है. यह जान कर उस ने झट से कह दिया कि वह अगले हफ्ते ही मेरे घर में किराए पर रहने के लिए शिफ्ट कर जाएगी. मुझे पता है कि वह किराया तो देगी नहीं और कर्ज अलग लेती रहेगी, जो कभी लौटाएगी भी नहीं. आखिर, मैं उसे मना करूं तो कैसे करूं?

जवाब

आप को अपनी सहेली की आदत पता है और यह भी पता है कि वह आप का पैसा नहीं देगी तो फिर यह तो तय है कि आप को किसी भी तरह उसे अपने घर में शिफ्ट करने से रोकना ही होगा. अब रोकने के लिए आप को झूठ का सहारा भी लेना पड़े तो ले लीजिए. आप यह कर सकती हैं कि अपनी सहेली को फोन करें और यह कहें कि आप ने अपने पति से इस बारे में बात की जिस के बाद उन्होंने साफ कह दिया कि वे उस मंजिल को किराए पर देने के लिए तैयार नहीं हैं.

आप अपनी सहेली से यह कह दें कि आप के खुद के बच्चे उस ऊपरी मंजिल को सेपरेट रूम की तरह इस्तेमाल करना चाह रहे हैं और किराए पर देने का विचार आप त्याग चुकी हैं.

इन सब के बाद तो आप की दोस्त शायद समझ ही जाएगी कि आप घर किराए पर देने के मूड में नहीं हैं. इस बात का ध्यान जरूर रखें कि भावनाओं में बह कर या दोस्ती के नाम पर आप ने अपनी दोस्त को रूम किराए पर दे दिया तो उस के दूरगामी परिणाम बुरे भी हो सकते हैं. आप के निजी जीवन में तो वह टांग अड़ाएगी ही, साथ ही आप के घरपरिवार को आर्थिक रूप से भी प्रभावित करेगी. इसलिए कड़े मन से फैसला करें और उसे घर किराए पर न दें.

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