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डोनाल्ड ट्रंप अब राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ पाएंगे या नहीं ?

कोलोराडो सुप्रीम कोर्ट की हैसियत अमेरिका में वही है जो भारत में किसी भी हाईकोर्ट की होती है. इस नाते डोनाल्ड ट्रंप के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का मौका अभी है और तय है वे जाएंगे भी क्योंकि एक बार फिर दुनिया के सब से ताकतवर देश का राष्ट्रपति बन जाने का सपना वे देख रहे हैं और इस के लिए जीतोड़ मेहनत भी कर रहे हैं. कोलोराडो सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अगले साल होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव के लिए अयोग्य घोषित कर दिया है.

मामला कैपिटल हिल हिंसा का है, जिस में अदालत ने ट्रंप समर्थकों की भूमिका को ले कर यह फैसला सुनाया है. गौरतलब है कि पिछले चुनाव में हार के बाद ट्रंप समर्थकों ने अमेरिकी संसद कैपिटल हिल को घेर लिया था और संसद में न केवल गोलीबारी की थी बल्कि तोड़फोड़ करते कई दफ्तरों पर कब्जा भी कर लिया था. इस हिंसा में 4 लोगों की मौत हुई थी.

अमेरिकी इतिहास में पहली बार किसी राष्ट्रपति को व्हाइट हाउस की दौड़ में शामिल होने से पहले ही अयोग्य घोषित किया गया है लेकिन ट्रंप जल्दी हार मान लेने वालों में से नहीं हैं. पिछले चुनाव के बाद बड़ी मुश्किल से उन्होंने सत्ता जो बाइडेन को सौंपी थी. तब एक बार तो दुनिया सकते में आ गई थी कि कहीं ऐसा न हो कि पूरे देश में ही इमरजैंसी लगानी पड़े और ट्रंप व उन के समर्थकों को काबू करने को मिलिट्री की सेवाएं लेनी पड़ें. अगर ऐसा होता तो इस का फर्क दुनियाभर पर पड़ता.

एक कट्टर चेहरा

आखिर क्यों डोनाल्ड ट्रंप कुरसी नहीं छोड़ना चाहते थे और क्यों अब फिर से उसे हासिल करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं? आमतौर पर अमेरिका में राष्ट्रपति दोबारा सत्ता हासिल करने को ज्यादा उत्सुक नहीं रहते हैं. लेकिन ट्रंप की बेताबी से लगता है कि अमेरिकी लोकतंत्र पर जो दागधब्बे उन के राष्ट्रपति रहते लगे थे उन्हें वे और स्याह कर देना चाहते हैं. 4 साल अमेरिका में कट्टरवाद जम कर फलाफूला. अश्वेतों और प्रवासियों का चैन से रहना दूभर हो गया था. इस से दक्षिणपंथी तो खुश थे पर चुनावी नतीजों ने ट्रंप को ख़ारिज कर दिया था.

खुद को फख्र से राष्ट्रवादी कहने बाले ट्रंप, दरअसल, एक कट्टर रिपब्लिकन नेता हैं जिस की नीतियांरीतियां लोकतंत्र को धता बताती हुई थीं. व्यक्तिगत रूप से भी वे एक खब्त, ऐयाश और सनकी व्यक्ति हैं. उन पर महाभियोग भी चला. यौनशोषण के अलावा भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे. भड़काऊ भाषण देने में तो वे माहिर हैं ही. न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया में यह वह दौर है जब राष्ट्रप्रमुख खुद की कट्टर इमेज छिपाने के बजाय उसे और उजागर कर रहे हैं जिस से धार्मिक, जातिगत, नस्लीय और दूसरे किस्म के छोटेबड़े भेदभाव बढ़ा कर राज किया जा सके. इसीलिए पूरी दुनिया से ये आवाजें आती रहती हैं कि लोकतंत्र खतरे में है.

ट्रंप पर अदालती फैसले के बाद जो बाइडेन ने भी उन्हें लोकतंत्र के लिए खतरा बता डाला. अमेरिकी लोकतंत्र को दुनिया का सब से पुराना और मजबूत लोकतंत्र कहा व माना जाता रहा है लेकिन हकीकत में ऐसा है नहीं. किसी भी दूसरे देश की तरह वहां के लोगों में भी आपसी मतभेद हैं. लेकिन ट्रंप ने इन्हें हवा दे कर जो किया वह उन की कमजोरी को ही उजागर करता है. आमतौर पर कट्टर शासक बहुत कमजोर होते हैं और देश की मुख्यधारा के लोगों का मसीहा खुद को दिखा कर धर्मगुरुओं की तरह या उन के इशारे पर देश हांकते हैं.

डैमोक्रेटिक बाइडेन भी हालांकि व्यक्तिगतरूप से कम विलासी या शौक़ीन नहीं हैं लेकिन उन की उदारवादी इमेज पर कोई शक नहीं करता जबकि ट्रंप के मामले में ऐसा नहीं है. कोलोराडो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 2 दिनों पहले ही उन्होंने प्रवासियों पर निशाना साधते हुए कहा था कि वे न केवल दक्षिणी अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया में जहर फैला रहे हैं. वे अफ्रीका, एशिया और पूरी दुनिया से हमारे देश में आते हैं. वामपंथियों को भी ट्रंप ने कीड़ा बताया था.

बाइडेन ने मौका लपकते पलटवार में कहा था कि ट्रंप अगर राष्ट्रपति बने तो इस बार उन के लिए पहले से भी ज्यादा कड़े कानून ला सकते हैं. पिछली बार राष्ट्रपति बनने पर उन्होंने अवैध प्रवासियों को उन के बच्चों से अलग रखा था. इस बार मुमकिन है उन्हें पकड़ कर उन के देश ही भेज दिया जाए. मुमकिन यह भी है कि प्रवासियों की वैचारिक स्क्रीनिंग की जाने लगे.

प्रवासी होंगे बड़ा मुद्दा

अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या आएगा, यह वक्त बताएगा लेकिन प्रवासी अगले चुनाव में बड़ा मुद्दा होंगे, यह अभी से साफ़ होने लगा है. इस में कोई शक नहीं कि अमेरिका प्रवासियों की पहली पसंद है. दिक्कत अवैध प्रवास को ले कर है जिस से स्थानीय और अमेरिकी मूल के लोग चिढ़ने व डरने लगे हैं. प्रवासियों को ले कर अमेरिकी कानून उदार हैं. डैमोक्रेट्स इन का आमतौर पर स्वागत ही करते हैं. बाइडेन सरकार ने 3 साल में लगभग 5 लाख वेनेजुएलावासियों को हिफाजत दी है. हालांकि, इस पर कुछ मेयर्स ने बजट गड़बड़ाने की शिकायत की थी.

लाखों की तादाद में प्रवासी अमेरिका जायज और नाजायज तरीकों से जाते हैं. कोविड के बाद इन की तादाद और बढ़ रही है. एक तरफ ट्रंप जहां इन की आमद को खतरा बताते हुए स्थानीय लोगों को भड़काते हैं तो दूसरी तरफ बाइडेन इसे बहुत बड़ी मुसीबत की शक्ल में नहीं देखते. अमेरिका में दिक्कत यह हो चली है कि स्थानीय और बाहरी लोगों के वोट लगभग बराबर हो चले हैं जिस का फायदा अलगअलग तरीकों से रिपब्लिकन और डैमोक्रेटिक पार्टियों को मिलता रहा है.

अगले चुनाव में क्या होगा, इस पर दुनियाभर के सियासी पंडितों को संशय है. हालफ़िलहाल तो यही दिख रहा है कि पिछले चुनाव की तरह बाइडेन और ट्रंप फिर एक बार आमनेसामने होंगे हालांकि दोनों की उम्मीदवारी को अपनी ही पार्टियों के अंदर से चुनौती मिल रही है. दक्षिणपंथी ट्रंप अभी भी अधिकतर स्थानीय लोगों की पसंद हैं पर उन्हें तगड़ी चुनौती भारतीय मूल के विवेक रामास्वामी से मिल रही है. निक्की हैली भी रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से दौड़ में हैं.

ट्रंप को अयोग्य ठहराए जाने पर विवेक रामास्वामी ने भी इसे लोकतंत्र की हत्या बताया है और फैसला उन के हक में न आने पर चुनाव से दूर रहने की बात कही है. सो, संभव है कि फैसला ट्रंप के पक्ष में न आने पर विवेक को रिपब्लिकन्स की सहानुभूति और समर्थन दोनों मिलेंगे जिन का रुख अभी प्रवासियों को ले कर स्पष्ट नहीं है जबकि वे खुद एक तरह से बाहरी हैं. जिस तरह ऋषि सुनक को ब्रिटेन ने स्वीकार लिया है उस तरह अमेरिका विवेक रामास्वामी या निक्की हैली को स्वीकारेगा, इस में ट्रंप जैसों की मानसिकता को ले कर शक ही है.

मिमिक्री कांड : अपमान के बहाने खेला ओबीसी कार्ड

लोकसभा और राज्यसभा में 142 सांसदों के निलंबन का विरोध कर रहे सांसदों ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की मिमिक्री की. टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने संसद के बाहर धनखड़ की मिमिक्री कर दी. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस का वीडियो बनाया. भाजपा ने इस को मुददा बना दिया. इसे देश के संवैधानिक पद के अपमान से जोड़ दिया गया है. इस मसले को ले कर उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सदन में जिस तरह से अपनी बात रखी उस से लगा कि वे बेहद आहत हैं.

भजभज मंडली ने धनखड़ की मिमिक्री को जाट अपमान से जोड़ दिया. जिस जाट बिरादरी को वह मानने के लिए तैयार नहीं थी उसे बिरादरी के तौर पर अब स्वीकार कर लिया है. इस की प्रमुख वजह पूर्व राज्यपाल सतपाल मलिक को भी माना जा रहा है. जिस तरह से वे मोदीशाह के निर्णयों को ले कर सवाल उठाते रहे हैं, ‘मिमिक्री कांड’ के बहाने सतपाल मलिक के महत्त्व को भी खत्म करने की योजना है.

प्रधानमंत्री ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ से फोन पर बात करते हुए उन को सांत्वना देते कहा, ‘पिछले 20 सालों में मैं खुद लगातार अपमान सहन कर रहा हूं.’ प्रधानमंत्री के बयान के बाद अब पूरी पार्टी, संगठन और सोशल मीडिया टीम ‘मिमिक्री कांड’ को विक्टिम कार्ड के रूप में खेल रही है. राज्यसभा में केंद्रीय संसदीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने साफसाफ इसे उपराष्ट्रपति की प्रतिष्ठा से जोड़ते हुए कहा, ‘हम ने देखा, कैसे एकदूसरे सदन के सदस्य आप के संवैधानिक पद को अपमानित किया है. हम इस की निंदा करते हैं, किसी वर्ग और समाज को अपमानित करना सही नहीं है.’

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा ने राहुल गांधी का बिना नाम लिए कहा, ‘जनता ने इन को चुन कर संसद में विचारविमार्श करने के लिए भेजा था. लेकिन उन्होंने जोकर का काम संभाल लिया है. वे गोरखपुर से भाजपा सांसद रवि किशन के फिल्म स्टूडियो में कैमरामैन के लिए आवेदन कर सकते हैं.’

कांग्रेस ने क्या कहा ?

कांग्रेस नेता सुरेंद्र सिंह राजपूत ने लखनऊ में इस प्रकरण पर बात करते कहा, ‘भाजपा नेता मामले को भटकाने, विषय को बदलने में माहिर हैं. 142 से अधिक विपक्षी सांसदों के निलंबन जैसे लोकतंत्र की हत्या करने वाले काम से ध्यान भटकाने के लिए ‘मिमिक्री’ को मुद्दा बना रहे हैं. ‘मिमिक्री’ करना कानूनन अपराध नहीं है. इस से पहले खुद प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह की नकल उतार चुके हैं. हास्य कवियों ने जब मोदी के बारे में कहना शुरू किया तो उन की आईटी सैल ने विरोध के स्वर को दबाने का काम किया. उपराष्ट्रपति महोदय को अगर अपना अपमान लगता है तो उन को इस के खिलाफ थाने में जा कर एफआईआर दर्ज कराना चाहिए. भाजपा में बड़े पदों पर बैठे छोटे लोग तानाशाही को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं.’

भाजपा की रणनीति

भाजपा ने उपराष्ट्रपति की मिमिक्री को जाति से जोड़ कर बड़ा दांव चल दिया है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी देश में ओबीसी जनगणना की मांग कर रहे हैं. इसी मुद्दे पर कांग्रेस ने राजस्थान, एमपी और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव भी लड़ा था. कांग्रेस इस मुद्दे को उठा कर बीजेपी के ओबीसी वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश में थी. अब भाजपा ने उपराष्ट्रपति के अपमान को ओबीसी से जोड़ कर अपने वोटर को बड़ा संदेश देने की कोशिश की है.

भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पिछडा नेता कहती है. केंद्रीय संसदीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने राज्यसभा में कहा कि ऐसा पहली बार नहीं है. ये लोग बारबार संवैधानिक पद पर बैठे लोगों को अपमानित करते हैं. पीएम नरेंद्र मोदी को 20 साल तक अपमानित किया. चूंकि वे गरीब तबके से आते थे, ओबीसी थे, इसलिए वे ऐसा करते थे. पीएम बनने के बाद भी उन को अपमानित किया गया. राष्ट्रपति को अपमानित किया क्योंकि वे अनुसूचित जनजाति के हैं. अब किसानपुत्र और जाट समाज का भी अपमान किया गया है. विपक्ष उपराष्ट्रपति का अपमान कर रहा है. उपराष्ट्रपति का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान. संविधान का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान.

पौराणिक कहानियों से सीखती भाजपा

पौराणिक कथाओं, प्रवचनों पर चलने वाली भाजपा उन्हीं कहानियों के बताए अनुसार चल रही है. महाभारत में जुआं खेलने की सहमति युधिष्ठिर ने दी. हारने पर वस्तु की तरह पत्नी को दांव पर लगाने का काम युधिष्ठिर ने किया. सारा दोष दुशासन को दिया गया. युधिष्ठिर को धर्मराज की उपाधि दे दी गई. रामायण में शूर्पणखा की नाक लक्ष्मण ने काटी लेकिन सारा दोष रावण के सिर मढ़ दिया गया. इसी तरह से अहल्या के साथ हुआ. उन के साथ छल इंद्र ने किया और पत्थर अहल्या को बनना पडा. पौराणिक कथाओं में ऐसे उदाहरणों की भरमार है.
इसी तरह से भाजपा भी ‘मिमिक्री कांड’ को ले कर कर सकती है. ओबीसी की गोलबंदी करने के लिए भाजपा ‘मिमिक्री कांड’ को एक हथियार की तरह से प्रयोग कर रही है. भाजपा के इस दांव से विपक्ष बैकफुट पर आ गया है. टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा कि उन का मकसद किसी को आहत करना नहीं था. वे मिमिक्री को आर्ट से जोड़ रहे हैं. इस के बाद भी भाजपा ने छोटेबड़े हर स्तर पर ‘मिमिक्री कांड’ को ओबीसी के सम्मान से जोड़ दिया है.

मैं अपने दोस्त की बहन को पसंद करता हूं, क्या ये बात मैं अपने दोस्त को बता दूं ?

सवाल

मैं 22 साल का हूं. एक लड़की मुझे पसंद करती है. लेकिन उस के भाई से मेरी बहुत अच्छी दोस्ती है. अगर उसे पता चला तो हमारी दोस्ती में दरार भी आ सकती है. मुझे उचित राय दें?

जवाब

अगर आप दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं तो कोई समस्या नहीं है. दोस्त की बहन से प्यार हो जाना कोई गुनाह नहीं?है. बेहतर होगा कि आप उस के घर के बड़ों को भरोसे में ले कर बात करें और दोस्त को भी सच बता दें. अगर वह समझदार होगा तो दोस्ती में दरार नहीं आएगी, बल्कि इस के रिश्तेदारी में तबदील होने की उम्मीद बढ़ जाएगी. और भी बेहतर होगा कि आप बात उजागर करने से पहले कुछ बन कर दिखाएं.

जीभ जल जाए तो अपनाएं ये घरेलू उपाय

अक्सर कुछ गर्म खाना खाना खाने या गर्म पानी या चाय कौफी पीने से हमारी जीभ जल जाती है. इसके बाद हमारी जीभ का स्वाद खराब हो जाता है, हमेशा मुंह में कुछ अजीब सी एहसास रहती है.

ज्यादा गर्म खाना या पीना हमारे सेहत के लिए भी अच्छा नहीं होता, कोशिश करनी चाहिए कि हम अत्यधिक गर्म खाना या पेय ना लें.

जीभ जलने से जब आपके सामने ऐसी परेशानियां आएं तो घरेलू नुस्खों से इनका इलाज कैसे करें इसकी जानकारी हम आपको देंगे.

बेकिंग सोडा

जीभ के जलने में बेकिंग सोडा काफी कारगर उपाय है. क्षारिय प्रकृति का सोडा जीब के जलन में काफी आराम देता है. पानी में घोल कर इससे कुल्ला करना काफी कारगर होता है.

एलोवेरा जेल

जीभ जलने में एलो वेरा काफी फायदेमंद है. इसके जेल का इस्तेमाल जलन में काफी कारगर होता है. इसको आइस क्यूब में जमा कर भी जीभ पर लगाया जा सकता है.

दही है कारगर

जीभ के जलने में दही काफी फायदेमंद होती है. एक चम्मच में दही लें और उसे कुछ देर तक मुंह में रखें. इसकी ठंडक से आपको काफी आराम मिलेगा.

खाएं सादा खाना

जीभ के जलने की हालत में कोशिश करें कि आप कम मसाले वाले खाने खाए. सादा भोजन खाने से पेट ठंडा रहता है और आपकी जीभ जल्दी रिकवर करती है.

चीनी

जीभ के जले हिस्से पर एक चुटकी चीनी छिड़क लें और उसे कुछ देर तक उसे रखें. चीनी के घुलने तक उसे वैसे ही रखें. ऐसा करने से आपको जलन और दर्द में काफी आराम मिलेगा.

आइस क्यूब है फायदेमंद

फ्रिज से आइस क्यूब निकालें और इसको चूसें. ऐसा करना आपके लिए काफी राहत देगा. एक बात का ध्यान दें, कि बर्फ के इस्तेमाल से पहले आप उसे समान्य पानी से हल्का गीला कर लें. इससे बर्फ जीभ से चिपकेगी नहीं.

शहद का करें इस्तेमाल

जीभ जलने में शहद का इस्तेमाल काफी फायदेमंद होता है. ये एक प्राकृतिक आराम देने वाला पदार्थ है.

डैमोक्रेसी पर धर्म की चोट, डरना जरूरी है

होना तो यह चाहिए था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्षी सांसदों से संसद की सुरक्षा के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए उन्हें बुलाते लेकिन बजाय किसी सार्थक पहल के उन्होंने पौराणिक ऋषिमुनियों सरीखे विपक्ष को यह श्राप दे दिया कि यदि विपक्ष का यही रवैया रहा तो 2024 के चुनाव में वे और भी कम सीटों के साथ विपक्ष में ही बैठे रहेंगे, यह श्राप अधिनायकवाद का एक बेहतर उदाहरण है.यह बात भी किसी सबूत की मोहताज नहीं रह गई है कि नरेंद्र मोदी और उन की सरकार अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं.

संसद से लगभग पूरा विपक्ष इसीलिए निलंबित है कि सुरक्षा के मसले पर सरकार घिरने लगी थी. उस की कमजोरियां सामने आ रही थीं. इन्हें ढकने और इस स्थिति से बचने के लिए उम्मीद के मुताबिक किया वही गया जो आमतौर पर धार्मिक किस्म की सरकारें करती हैं. संसद उन के लिए मंदिर, चर्च और मस्जिद है जिस के दरवाजे पुरोहित, उलेमा या पौप जब चाहे बंद कर सकते हैं. वही ओ पी धनखड़ ने किया.

लेरी डायमंड अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के राजनीति शास्त्र के प्रोफैसर हैं जो पिछले 10 सालों से कहते रहे हैं कि जिस तरह के बदलाव दुनिया भर की राजनीति में हो रहे हैं उन से लोग परेशान हैं क्योंकि लोकतंत्र को एक रेडीमेड चश्मे से देखा जाता था. किसी भी देश में लोकतंत्र को एक खास पैमाने पर तौला जाता था इसलिए नए बदलावों को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया जा रहा है.

इस की वजह और उदाहरण भी हैं अमेरिकी संस्था प्यू की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1958 में जहां 73 फीसदी लोग यह मानते थे कि उन की सरकार सही फैसले लेगी उन की संख्या इन दिनों सिमट कर 19 फीसदी रह गई है. भारत में अक्सर नरेंद्र मोदी को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया जाता है यह ठीक है कि यह आरोप लगाने वाले वही विपक्षी होते हैं जो संसद के बाहर खड़े हायहाय कर रहे हैं. लेकिन सच यह भी है कि आम लोगों से यह उम्मीद करना बेकार है कि वे भाजपा के इशारे पर चल रही संसद पर कुछ बोलेंगे.

ऐसा क्यों , इस सवाल का जवाब बेहद साफ है कि अधिकतर देशों की तरह भारत के लोग भी अपनी ही चुनी गई सरकार से डरे हुए हैं. यह डर धर्म का है और सांसदों के निलंबन का मामला भी कुछ ऐसा ही है जैसे पुजारी ने भक्तों को मंदिर से बाहर कर मुख्यद्वार बंद कर लिया हो.
मंदिरों में प्रवेश के नियम बहुत कड़े होते हैं मसलन जनेऊ की अनिवार्यता जो न भी हो तो भक्तों से अपेक्षा की जाती है कि वे पूजापाठ के विधिविधान के दौरान खामोश रहेंगे और मंत्रोच्चार के वक्त तो पुतले बने खड़े रहेंगे. ऐसा न करने पर पुजारी को पूरा हक रहता है कि वह भक्तों को नास्तिक और विधर्मी करार देते बाहर खदेड़ दे.

यही ओ पी धनखड़ ने किया लेकिन इस से भी परे असल बात लोगों का वह डर है जो उन्हें चुप रहने मजबूर करता है. यह डर सिर्फ भगवान और दैवीय प्रकोप का होता है. अव्वल तो लोकतंत्र अगर है तो किसी को डरने की जरूरत नहीं लेकिन जब धार्मिक लोकतंत्र हो तो डरना जरूरी हो जाता है. डराने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी माहिर हैं. काशी में अपने भाषण के दौरान उन्होंने महादेव के आशीर्वाद का जिक्र यों ही नहीं किया था.

अकेले वाराणसी में ही नहीं बल्कि हर जगह उन की वेशभूषा धार्मिक होती है. वे पुरोहितों जैसी पोशाक पहनते हैं, माथे पर त्रिपुंड लगाते हैं और हर भाषण में राम, शंकर, हनुमान और कृष्ण का नाम जरूर मौके और जगह के हिसाब से लेते हैं. उन की धार्मिक छवि ही उन्हें तथाकथित रूप से लोकप्रिय बनाती है और लोग ताली बजा कर उन का प्रवचननुमा भाषण आत्मसात कर लेते हैं.

पुराने दौर के राजामहाराजा भी इसी तरह भगवान के नाम पर ही जनता को नियंत्रित रखते थे. वह उन्हें भरोसा दिलाया करता था कि वह जनहित में जरूरी काम कर रहा है लेकिन कैसे, इस बाबत कोई आवाज नहीं उठनी चाहिए. इधर देश में जो जनहित के काम हो रहे हैं वे दरअसल में किस तरह बहुसंख्यकों को संतुष्ट करते हुए हैं, उन के बारे में देसी मीडिया से कोई उम्मीद करना बेकार है लेकिन विदेशी मीडिया खामोश नहीं रहता.

अमेरिकी विदेश नीतियों पर आधारित सब से पुरानी और लोकप्रिय मैगजीन ‘फौरेन अफेयर्स’ भारत में लोकतंत्र की हालत पर कहती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रैस की स्वतंत्रता अल्पसंख्यक अधिकारों और न्यायायिक स्वतंत्रता पर कुठाराघात कर रहे हैं.मोदी जी की यही अदा बहुसंख्यकों को भाती और लुभाती है. इस के लिए वे अपने व्यक्तित्व और पोशाक सहित भाषणों में धर्म का तड़का लगाते रहते हैं.

लेकिन 85 फीसदी लोग इस से मन ही मन असहमत होते हुए भी मज़बूरी में इसे स्वीकार लेते हैं क्योंकि वे मुख्यधारा में नहीं हैं. मुमकिन है इन में से मुट्ठी भर उन से सहमत होने लगे हों लेकिन वे अभी इतने नहीं हैं कि चुनावी बिसात पलट या उलट पाएं.

विपक्ष की मजबूरी

संसद की मौजूदा हालत पर कोई खास सुगबुगाहट देश में नहीं है क्योंकि इसे भी पूजापाठ में व्यवधान डालने जैसा प्रचारित कर दिया गया है. विपक्ष की मजबूरी यह है कि वह सरकार के धार्मिक चेहरे से नकाब नहीं उठा पा रहा है. धर्म को लोकतांत्रिक राजनीति से दूर क्यों रहना चाहिए इस के लिए उस के पास वे टोटके नहीं हैं जो भाजपा के पास इस बाबत हैं कि धार्मिक राजनीति लोकतंत्र में क्यों जरूरी है और विपक्ष अगर सत्ता में आया तो वह कैसे धर्म और हिंदुत्व को तहसनहस कर देगा.

ऐसी हालत में हालत बदलने की बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि विपक्ष भी खुद को धार्मिक दिखाने लगता है जबकि उसे सिर्फ स्वास्थ, शिक्षा और रोजगार पर जोर देना चाहिए वह भी इस तरह कि लोग उस से इस बात को ले कर भयभीत और शंकित न रहें कि ये हमारी धार्मिक पहचान छीन लेंगे. इन लोगों को भाजपा से धर्म रक्षा की गारंटी मिली हुई है और इस का रोजरोज रिनुअल कराया जाता रहता है.

लोकसभा चुनाव सिर पर हैं ऐसे में यह रोग अभी और बढ़ेगा. पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद का हल्ला है और इस के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं. यह डर 80 फीसदी काल्पनिक है लेकिन अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप खुलेआम कहने लगे हैं कि वे एक दिन का तानाशाह बन कर श्वेतों को देश का मालिक बना देना चाहते हैं. इस बात पर उन्हें अमेरिका के बहुसंख्यकों जो कम होते जा रहे हैं का समर्थन भी मिल रहा है क्योंकि ये लोग भी डर गए हैं कि उन का देश, जमीनजायदाद, धार्मिक पहचान, कारोबार वगैरह सब छीन लिए जाएंगे. अगर यह सब तानाशाही से बचता है तो सौदा घाटे का नहीं. दूसरी तरफ अश्वेत भी घबराए हुए हैं कि एक दफा ट्रंप के रहते तो श्वेत उन्हें शायद बख्श भी दें लेकिन जो बाइडेन शायद ही सरेआम होने वाली संभावित हिंसा से बचा पाए.

क्या विधेयक पास कराने के लिए ही विपक्ष को सदन से बाहर किया गया ?

संसद की सुरक्षा में सेंध मामले में मोदी सरकार पर आक्रामक विपक्ष के दो तिहाई सदस्यों को सदन से बाहर कर लोकसभा में भारतीय दंड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम को बदलने वाले तीन विधेयक लोकसभा की पटल पर फिर से रख कर बिना किसी चर्चा के पास करवा लिए गए. इस से पहले इन बिलों को संशोधनों के साथ 11 अगस्त को लोकसभा में पेश किया गया था जहां से उन्हें स्थायी समिति को भेजा गया था.

गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में कहा कि विधेयकों की स्थायी समिति द्वारा जांच की गई थी और आधिकारिक संशोधनों के साथ आने के बजाय, नए विधेयकों को लाने का निर्णय किया गया. गृहमंत्री के मुताबिक भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता 2023 और भारतीय साक्ष्य (द्वितीय) विधेयक 2023 का उद्देश्य आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य अधिनियम को प्रतिस्थापित करना है. चूंकि अब प्रौद्योगिकी और सूचना का युग है इसलिए विधेयक में कई प्रावधान डिजिटल रिकौर्ड, लैपटौप के उपयोग को बढ़ावा देने को सुनिश्चित करते हैं. नए प्रावधानों के तहत परीक्षण डिजिटल रूप से हो सकता है.

जम कर विरोध

सदन में विपक्ष की अनुपस्थिति में बिना किसी चर्चा के विधेयकों को पास करा लेने के सरकार के कदम की घोर निंदा और विरोध शुरू हो गया है. सदन के बाहर निलंबित सांसदों ने तख्तियां ले कर सरकार के विरुद्ध जैम कर नारेबाजी की. कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि ‘दमनकारी’ विधेयकों को चर्चा के बिना पारित कराने के लिए ही सदन से विपक्ष का सफाया किया गया है.

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, “वे (बीजेपी) जानबूझ कर सबको निलंबित कर रहे हैं. उन की मंशा है कि वे (बीजेपी) आपराधिक प्रक्रिया को लेकर जो तीन कानून ला रहे हैं उस पर कोई विरोध न हो. सब को बाहर निकाल कर वे तानाशाही करने की कोशिश कर रहे हैं. लोकतंत्र में ऐसा नहीं हो सकता, आज नहीं तो कल उन पर यह भारी पड़ेगा.”

मल्लिकार्जुन खड़गे ने सीधे प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रधानमंत्री और बीजेपी देश में ‘एकल पार्टी शासन’ स्थापित करना चाहते हैं और संसद से सांसदों का निलंबन उसी के लिए किया जा रहा है. निरंकुश भाजपा इस देश में लोकतंत्र को ध्वस्त करना चाहती है. संसद से 141 विपक्षी सांसदों का निलंबन हमारे इस आरोप को पुष्ट करता है.

खड़गे ने कहा कि जाहिर तौर पर घुसपैठिए महीनों से संसद में घुसने की योजना बना रहे थे और वे अपनी साजिश में कामयाब भी हो गए. हम ने जब पूछा कि इतनी बड़ी खुफिया विफलता के लिए कौन जिम्मेदार है, तो सरकार के पास जवाब नहीं है. मुझे आश्चर्य है कि संसद की बहुस्तरीय सुरक्षा के बीच भी दो घुसपैठिए अपने जूतों में पीले गैस कनस्तरों को छिपा कर इमारत में प्रवेश कर गए और भारत के लोकतंत्र के गर्भगृह तक पहुंचने में कामयाब हो गए? क्या विपक्ष इस पर सवाल भी न उठाएं? इस शर्मनाक सुरक्षा चूक के लिए उच्च पदों पर बैठे लोगों को दंडित करने के बजाय, सांसदों के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीना जा रहा है, जिस से वे जवाबदेही से बच जाएं.यह निंदनीय है. लोकतंत्र की नीतियों के खिलाफ है.

संसद की सिक्योरिटी का उल्लंघन एक बड़ा मुद्दा है. अगर सांसद और विपक्ष इस मुद्दे को नहीं उठाते हैं तो फिर उन के संसद में रहने का औचित्य ही क्या है ? उन को जनता ने चुन कर भेजा ही है ऐसे मुद्दे उठाने के लिए. ये दुर्भाग्यपूर्ण है. संसद में हल्लागुल्ला तो बीजेपी भी खूब करती थी. विपक्ष तो हमेशा ही हल्ला मचाता है लेकिन जिस संसद में घुसपैठ के जिस विषय पर विपक्ष गृह मंत्री से जवाब चाह रहा था वह बहुत गंभीर और अहम विषय था. ऐसे में अगर सांसदों का व्यवहार विघ्न डालने वाला भी था तो भी ये मुद्दा ऐसा था कि सरकार को कड़वा घूंट पी ही जाना चाहिए था. उन की बातें सुननी चाहिए थी और चाहते तो कुछ घंटों के लिए सस्पेंड भी कर देते, लेकिन उन्हें पूरी तरह सस्पेंड कर देना सवाल पैदा करता है.

माहेला जयवर्धने ने अपने चहेते ‘रो’ से मुंबई इंडियंस की कप्तानी क्यों छीन ली

फिलहाल रोहित शर्मा दक्षिण अफ्रीका में टैस्ट मैच खेलने गए हुए हैं, पर एक दूसरी खबर यह भी है कि अब उन से आईपीएल की मुंबई इंडियंस टीम की कप्तानी छीन ली गई है. मुंबई इंडियंस को 5 बार आईपीएल का खिताब दिला चुके ‘मुंबईकर’ रोहित शर्मा की जगह हार्दिक पंड्या को इस टीम की कप्तानी सौंपी गई है, जिस से रोहित शर्मा के फैन बड़े गुस्से में दिखाई दे रहे हैं. याद रहे कि ये वही रोहित शर्मा हैं, जिन्होंने हालिया वनडे वर्ल्ड कप में भारतीय टीम को लगातार 10 मैच जितवाए थे. हालांकि, हम फाइनल मुकाबले में आस्ट्रेलियाई टीम से हार गए थे.

अब यह मुद्दा बड़ा गरम हो चुका है कि रोहित शर्मा के साथ ऐसा क्यों किया गया है? तो इस सवाल का जवाब दिया माहेला जयवर्धने ने, जो मुंबई इंडियंस टीम के ग्लोबल डायरैक्टर हैं और रोहित को ‘रो’ कह कर बुलाते हैं. ‘जियो सिनेमा’ के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “यह एक मुश्किल फैसला था. ईमानदारी से कहूं तो यह इमोशनल डिसीजन था. हम क्रिकेट प्रेमियों की भावनाओं का कद्र करते हैं. मुझे लगता है कि हर कोई भावुक है और हमें इस का भी सम्मान करना होगा. लेकिन, साथ ही एक फ्रैंचाइजी के रूप में आप को ऐसे फैसले लेने होते हैं. युवा पीढ़ी को गाइड करने के लिए ‘रो’ (रोहित शर्मा) का औन ऐंड औफ फील्ड हमारे साथ जुड़े रहना काफी खास है.”

माहेला जयवर्धने कोई भी दलील दें, पर रोहित शर्मा के फैन सोशल मीडिया पर इस फैसले को सही नहीं मान रहे हैं. पूर्व क्रिकेटर इरफान पठान ने सोशल मीडिया पर इस बारे में बेबाक बोल कर सनसनी मचा दी है.

उन्होंने कहा, “रोहित शर्मा का जो कद मुंबई इंडियंस में है, वह उसी तरह का है जो सीएसके में धोनी का है. रोहित ने मुंबई टीम को बतौर कप्तान बनाया है. टीम को बनाने में रोहित ने काफी मेहनत की है. वे टीम मीटिंग में जाते हैं और अपनी बात रखते हैं, रणनीति बनाते हैं. मैं रोहित को गेंदबाज का कप्तान मानता हूं, जो सालोंसाल टीम को आगे ले कर आए हैं. पिछले साल जो टीम थी कितने लोगों ने माना होगा कि यह टीम क्वालिफाई करेगी. बतौर कप्तान रोहित ने टीम को क्वालिफाई करवाया. जो गेंदबाजी थी मुंबई की हलकी थी. जोफ्रा आर्चर नहीं खेल रहे थे. बुमराह भी टीम में नहीं थे, इस के बाद भी रोहित ने टीम को क्वालिफाई करवाया.”

हार्दिक पंड्या को कप्तानी सौंपने को ले कर इरफान पठान ने कहा, “मुझे लगता है कि मुंबई इंडियंस के पास सूर्यकुमार यादव मौजूद थे. बुमराह भी टीम में मौजूद थे. अब यहां हार्दिक पंड्या के लिए सब से बड़ा चलैंज यह रहेगा कि इन सब के साथ, रोहित के साथ, सूर्या के साथ, बुमराह के साथ, जो अपनेआप में एक लीडर हैं… बुमराह ने भी कप्तानी की है… बतौर कप्तान हार्दिक के सामने सब से बड़ा चैलेंज इन सब को साथ में ले कर चलने का होगा. मैं बता रहा हूं कि हार्दिक के लिए मुंबई की कप्तानी करना आसान नहीं होगा.”

इरफान पठान की बात में दम है क्योंकि अगर रोहित शर्मा इस फैसले से थोड़े भी खफा हैं, वे इस कि झलक आईपीएल मैचों में जरूर दिखा देंगे.

मेरे पति का अफेयर चल रहा है पर फिर भी वो मुझे तलाक नहीं दे रहे हैं, बताएं कि मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं 25 वर्षीय विवाहित महिला हूं. विवाह को 2 वर्ष हो गए हैं. लेकिन अब मुझे अपने पति के बारे में जो बातें पता चल रही हैं, अगर मुझे पहले पता होती तो मैं उन से शादी कभी न करती. मेरी केवल बहनें हैं कोई भाई नहीं है और पति का कहना है कि उन्होंने मेरे पिता के कहने पर मुझ से इसलिए विवाह किया ताकि मेरे गांव और शहर दोनों की संपत्ति उन के नाम हो जाए.

मेरे पति मुझ पर मायके से पैसा लाने के लिए दबाव डालते हैं और नशे में मुझे मारतेपीटते भी हैं. उन के खुद के अन्य महिलाओं से अफेयर हैं पर वे मुझ पर शक करते हैं जबकि मेरा ऐसा कोई संबंध नहीं है. वे मुझ पर हमेशा नजर रखते हैं और घर से बाहर नहीं जाने देते. कहते हैं, ‘‘मैं तुम्हें तलाक कभी नहीं दूंगा. तुम्हें ऐसे ही रहना होगा.’’ मैं बीए कर चुकी हूं और एमए कर रही हूं. मैं इतनी सक्षम हूं कि अकेले रह सकती हूं लेकिन मेरे पति मुझे तलाक नहीं देना चाहते. मैं बहुत परेशान हूं. मैं ऐसे इंसान के साथ और नहीं रह सकती. मैं अकेले रहना चाहती हूं. क्या करूं सलाह दें.

जवाब

आप की सारी बातों से पता चल रहा है कि आप के पति ने संपत्ति के लालच में आप से विवाह किया है और उन्हें आप से कोई लगाव या प्यार नहीं है. उन का मकसद सिर्फ आप को परेशान करना है. अगर आप सचमुच उन से छुटकारा पाना चाहती हैं तो या तो आप बिना तलाक के भी पति से अलग रह सकती हैं. इस के अलावा आप का इस तरह उन से अलग रहना कानूनन तलाक का आधार नहीं माना जाएगा. इस के अलावा अगर आप चाहें तो पति के क्रूरतापूर्ण व्यवहार के आधार पर न्यायिक पृथक्करण करवा सकती हैं या तलाक ले सकती हैं. अगर आप तलाक के लिए कोर्ट में अर्जी देती हैं तो कोर्ट एक खास समय के लिए कानूनी अलगाव की मंजूरी देता है ताकि पतिपत्नी अपने रिश्ते के बारे में पूर्ण विचार कर सकें. इस अवधि में आप दोनों कानूनन विवाहित रहेंगे. लेकिन इस अवधि के बाद भी आप का निर्णय अलग होने का होगा तो कानून के अंतर्गत आप की तलाक की याचिका पर सुनवाई होगी.

दिल को स्वस्थ और मजबूत रखने के लिए अपनाएं ये टिप्स

हैल्दी डाइट के सामने कौनकौन सी समस्याएं हैं, यह आम प्रश्न है. इस का जवाब ढूंढ़ा जाना चाहिए. आज हृदय रोग, कैंसर, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, किडनी की बीमारियां बहुत तेजी से फैल रही हैं और ये सभी किसी न किसी रूप में डाइट यानी खानपान से जुड़ी हैं.

दरअसल, आजकल लोग क्राइसिस मैनेजर हो गए हैं क्योंकि लोग तब तक अपने अच्छे स्वास्थ्य के लिए कठोर कदम नहीं उठा पाते जब तक कि पानी सिर के ऊपर से न गुजर जाए. बाजार में इन दिनों अच्छे तथा संतुलित आहार प्राप्त करना आसान नहीं है जबकि स्नैक्स, प्रोसैस्ड फूड आसानी से बाजारों में सर्वसुलभ हैं. फल तथा सब्जियों को रखने व बनाने की समस्या है. इस के लिए रेफ्रिजरेटर की जरूरत पड़ती है. यही कारण है कि बदलती फूड हैबिट, खानपान में अनियमितता, भागमभाग की जिंदगी, समय का अभाव, मानसिक दबाव एवं तनाव के कारण युवा पीढ़ी तरहतरह की मानसिक व शारीरिक बीमारियों का शिकार हो रही है. इन में हृदय रोग भी एक है. पहले उम्रदराज लोगों और अधेड़ावस्था में ही हृदय रोग के होने की शिकायत मिलती थी किंतु अब तो 20-25 साल के युवकयुवतियों में भी यह रोग तेजी से फैल रहा है. यदि खानपान, रहनसहन और चालचलन पर ध्यान दिया जाए तो यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि हृदय रोग के होने की संभावना घट तो जाएगी साथ ही, हृदय रोगियों को दीर्घायु होने से कोई रोक नहीं सकता.

चिकित्सा विज्ञान ने हृदय रोगियों के लिए रेशेदार फल तथा खाद्य पदार्थों के साथसाथ दूसरी चीजें निर्धारित की हैं जो हृदय को निरोग तथा स्वस्थ रखने में सहायक होती हैं. इन में एंटीऔक्सीडैंट पर विशेष जोर दिया जा रहा है ताकि हृदय रोग खतरनाक स्थिति न ले ले और सर्जरी कराने की जरूरत न पड़े. इन डाइट्स में हाई फाइबर डाइट, लो फैट डाइट, ऐंटीऔक्सीडैंट, हर्बल प्रोडक्ट, लो कार्बोहाइड्रेट और लो प्रोटीन डाइट शामिल हैं.

वजन प्रबंधन

हृदय रोगियों के लिए वजन को नियंत्रित करना जरूरी है. अगर वजन अधिक है और मोटापे के शिकार हैं तो वजन कम करने वाली डाइट लेनी होगी. इस के लिए किसी अच्छे डाइटीशियन से डाइट चार्ट बनवा कर अनुशासनपूर्वक उस का पालन करना जरूरी है.

प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट

वजन कम करने के लिए खानपान में अधिक प्रोटीन तथा कम कार्बोहाइड्रेट का प्रचलन लोकप्रिय हो रहा है. इस से वजन कम होता है. ऐसे खाद्य पदार्थों में वसा को नियंत्रित किया जाता है क्योंकि इस से कैलोरी प्राप्त होती है. आजकल वजन कम करने के लिए फास्ट एनर्जी फूड की भी वकालत की जा रही है. कार्बोहाइड्रेट का सेवन तब किया जाना चाहिए जब अधिक ऊर्जा की जरूरत होती है, जैसे सुबह या जब ऐक्सरसाइज कर रहे हों. रात में कम ऊर्जा की जरूरत पड़ती है, इसलिए डिनर में कार्बोहाइड्रेट से परहेज किया जाना चाहिए. इस तरह की डाइट के पीछे यह सिद्धांत काम करता है कि प्रोटीन तथा वसा से ऊर्जा धीरेधीरे प्राप्त होती है, इस कारण इस से वजन बढ़ने की संभावना काफी कम होती है. इतना ही नहीं, प्रोटीन का पाचन धीरेधीरे तथा देरी से होता है और कार्बोहाइड्रेट का पाचन अपेक्षाकृत तेजी से होता है, जिस से पेट जल्दी खाली हो जाता है.

कम वसा का सेवन

हृदय रोगियों के लिए कम वसा का सेवन फायदेमंद होता है. इस से एक तो वजन नियंत्रित रहता है, दूसरे, रक्तनलियों में वसा का जमाव नहीं हो पाता. फलस्वरूप हृदय रोगियों को इस से काफी राहत मिलती है. चूंकि वसा से अधिक मात्रा में कैलोरी मिलती है तथा इस का जमाव शरीर के विभिन्न भागों में कार्बोहाइड्रेट तथा प्रोटीन की अपेक्षा ज्यादा होता है इसलिए इस की मात्रा कम कर दी जाए तो अधिक ऊर्जा की बचत हो जाती है. उदाहरण के रूप में यदि वसा की मात्रा 10 ग्राम कर दी जाए तो 900 कैलोरी ऊर्जा की कमी होती है. वजन कम करने के दौरान कार्बोहाइड्रेट तथा प्रोटीन की मात्रा ज्यादा नहीं बढ़ानी चाहिए. बहरहाल, भोजन में वसा की कमी के पीछे मुख्य उद्देश्य रक्त में कोलैस्ट्रौल की मात्रा को कम करना होता है.

ऐंटीऔक्सीडैंट

औक्सीडैंट या फ्री रेडिकल से कई तरह के रोग होते हैं, जैसे कैंसर, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, एथेरो स्कलोरोसिस, मोतियाबिंद, स्ट्रोक, दमा, पैंक्रियाटाइटिस, पार्किंसन डिजीज तथा पेट की बीमारियां. फ्री रेडिकल के शरीर में आने के मुख्य स्रोत तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, वायु प्रदूषण, एनेस्थेटिक्स, पैस्टिसाइड्स तथा कुछ दवाएं व रेडिएशन हैं. इस के प्रभाव को खत्म करने के लिए ऐसे लोगों को ऐंटीऔक्सीडैंट के सेवन की सलाह दी जाती है. ये विटामिंस हैं जो लवणों तथा दूसरे एजेंट के साथ मिल कर फ्री रेडिकल या औक्सीडैंट के प्रभाव को समाप्त कर देते हैं. शरीर के अंदर इन का निर्माण नहीं होता है. ये हमारे द्वारा खाए गए भोज्य हैं. जब विटामिंस तथा लवण का सेवन ऐंटीऔक्सीडैंट की तरह करते हैं तो ये हृदय व दूसरे शारीरिक अंगों को क्षतिग्रस्त होने से बचाते हैं. सो हर हृदय रोगी को इस का सेवन करना चाहिए. हालांकि हम जानते हैं कि एलडीएल कोलैस्ट्रौल बैड कोलैस्ट्रौल माना जाता है जिस के कारण हृदय रोग होता है. अभी हाल में अनुसंधान से पता चला है कि यह और कुछ नहीं एलडीएल का औक्सीडाइज्ड रूप है जो हृदय की नलियों में जमा हो कर एथरोजेनेसस नामक बीमारी का कारण बनता है. यहां बता दें कि सामान्यतया अनऔक्सीडाइज्ड एलडीएल हृदय रोग पैदा करने में सक्षम नहीं होता है. इसलिए हृदय रोगों को रोकने के लिए 2 बातें मुख्य हैं : एलडीएल कोलैस्ट्रौल की मात्रा को नियंत्रित करना और एलडीएल कोलैस्ट्रौल को औक्सीडाइज होने से बचाना. इस के लिए हृदय रोगियों को विटामिन तथा लवण के साथ ऐंटीऔक्सीडैंट का भी सेवन करना जरूरी है. इस से एलडीएल के औक्सीडाइज होने की संभावना कम होती है.

लवण का सेवन

कुछ ऐसे लवण हैं जो शरीर को सक्रिय, मैटाबोलिज्म तथा हृदय को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी हैं. इन में प्रमुख हैं : क्रोमियम, मैग्नीशियम तथा कैल्शियम. इन की कमी से कई तरह की बीमारियों के होने की संभावना होती है, जैसे क्रोमियम की कमी से इंसुलिन रेजिस्टेंट, हाइपर इंसुलिनेमिया, इंपेयर ग्लूकोज रालटेस तथा हाइपर लिपिडेनिया होने की संभावना होती है. इस की उचित मात्रा का सेवन करने से ये परेशानियां दूर हो जाती हैं. मैग्नीशियम की कमी से कोरोनरी आर्टेरियो, स्कलोरेसिस नामक रक्तनलियों की बीमारियां होती हैं और कैल्शियम की कमी से आट्रेरियो स्कलोरेसिस तथा उच्च रक्तचाप नामक बीमारियां होती हैं. अत: हृदय रोग विशेषज्ञ हृदयरोगियों को कुछ विटामिन जैसे विटामिन-ई, विटामिन-सी के साथ कैल्शियम, सेलेमियम तथा क्रोमियम का सेवन नियमित रूप से करने की सलाह देते हैं.

ऐसे कम करें रिस्क फैक्टर

अधिक मछली खाएं. मछली प्रोटीन तथा दूसरे पोषक तत्त्वों का अच्छा स्रोत है. इस में प्रचुर मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है जो हृदय रोग की संभावना तथा स्ट्रोक को कम करने में सहायक होता है. हरी रेशेदार सब्जियां, फल, जूस तथा मोटे अनाज का सेवन करें. मौसमी फल, हरी सब्जियां, मोटे अनाज आसानी से सुलभ हैं. ये खाने में स्वादिष्ठ तो लगते ही हैं, हृदय रोग से लड़ने में सहायक भी होते हैं.

  1. नियंत्रित वसा का चुनाव करें.
  2. कम वसा का सेवन करें.
  3. सैचुरेटेड फैट का त्याग करें.
  4. अनसैचुरेटेड फैट का चुनाव करें.
  5. प्रोटीन में विविधता लाएं.
  6. कोलैस्ट्रौल का सेवन कम करें.
  7. थोड़ाथोड़ा खाएं.
  8. खानपान पर ध्यान

हार्ट को हैल्दी रखने के लिए इस बात पर ध्यान देने की जरूरत होती है कि आप क्या खा रहे हैं. ऐसा करने पर हार्ट की आर्टरीज में रक्त के क्लौट बनने से रोका जा सकता है. यदि किसी आर्टरी में क्लौट का जमाव होना शुरू हो भी गया हो तो उस के बढ़ने की संभावना कम हो जाती है. इस से टोटल तथा एलडीएल कोलैस्ट्रौल कम होता है जिस से रक्तचाप नियंत्रित रहता है. ऐसे मरीजों के लिए डाइटीशियन जब डायरी प्लान बना रहे होते हैं तो वे इस बात का ध्यान रखते हैं कि मरीज को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं. हकीकत यह है कि हार्ट की सुरक्षा के लिए एक ओर जहां कुछ खाद्य पदार्थों को डाइट चार्ट में जोड़ा जाता है वहीं कुछ खाद्य पदार्थों को हटाया भी जाता है. जिस खाद्य पदार्थ को आप खा रहे हैं, उस को एंजौय करें. खुशीखुशी खाएं, न कि नाकभौं सिकोड़ कर. अपनी जिंदगी के बारे में पौजिटिव थिंकिंग रखते हुए उस का आनंद लें ताकि आप अपने में सहजता का अनुभव करें. इस बात को बोनस के रूप में मानें कि आप को कम खाने की जरूरत पड़ रही है. इस से एक ओर जहां आप का वजन कम होता है वहीं दूसरी ओर इस से रक्त में कोलैस्ट्रौल की मात्रा भी कम होती है.

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